श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 41–50
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 41–50
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२६ चरकसंहिता [ अ ० १ नैष्कम्यमनहङ्कारः सयोगे भयदर्शनम् ॥ १४५ ॥
मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम् ।
तरवस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत्प्रवर्तते ॥ १४६ ॥।
मोक्ष के उपाय -सजनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, नाना प्रकार के नियम, धर्म शास्त्रों का अभ्यास, आत्मा आदि का जानना, निर्जन स्थान में रति, विषयों में अनासक्ति, मोक्ष मे प्रयत्न करना, वैर्य, कार्यों को फल की इच्छा ने न करना, किये हुए कनो का फल भोग करके क्षय करना गृहस्थाश्रम से निकलना, सन्यास ग्रहण करना, अहकार का परित्याग, शरीरादि भयोग में अथवा मनुष्यों के सम्पर्क में आने में भय मानना, मन और बुद्धिका समाधान, वस्तुओं की तत्र रूप मे परीक्षा करना, यह सब तत्त्वज्ञान योग के उपस्थित होने से होता है ॥ १४३ - १४६ ॥
स्मृतिः सत्सेवनाथैश्च धृत्यन्तरुपलभ्यते ।
स्मृत्वा स्वभावं भावाना स्मरन् दुःखात्प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥
स्मृति - तत्त्वस्मृति सज्जन पुरुषों के ससर्ग से लेकर धैर्य तक कहें हुए लक्षणो से उपलब्ध हो जाता है, तब पुरुष आत्मा आदि भावों के स्वरूप का स्मरण करक तत्त्व को जानता हुआ दुखों से छूट जाता है ॥ १४७ ॥
वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतियैरुपजायते ।
निमित्तरूपग्रहणात्सादृश्यात्सविपर्ययात् ॥ १४८ ॥
सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात्पुनः श्रुतात् ।
दृष्टश्रुतानुभूताना स्मरणात्स्मृतिरुच्यते ॥ १४६ ॥
स्मृति की उत्पत्ति के आठ कारण -जिन कारणो से यह स्मृति उत्पन्न होती है उन २ कारणों का उपदेश करते हैं । जैसे -- ( १ ) निमित्त - कारण से इनका ग्रहण, जैसे धूम को देख कर अग्नि का रूप दर्शन से ( २ ) वातिक लक्षणो से वातिक रोग का स्मरण होता है । ( ३ ) सादृश्य से जैसे देवदत्त के समान चित्र को देख कर देवदत्त का स्मरण होता है ( ४ ) सादृश्य विपर्य्यय अर्थात् असादृश्य से, अत्यन्त विरुद्ध बस्तु के दर्शन से दूसरे का स्मरण होता है जैसे दुख से पूर्व अनुभूत सुख का स्मरण होता है । ( ५ ) सत्व ( मन ) के प्रणिधान अर्थात् मनोयोग करने से । ( ६ ) अभ्यास से । ( ७ ) तत्त्वज्ञान से । ( ८ ) फिर सुनने से भूली बात फिर स्मरण हो जाती है । पूर्व दृष्ट, पूर्व श्रुत और पूर्व अनुभूत पदार्थों के स्मरण को ' स्मृति ' कहते हैं ॥ १४८-१४९ ॥
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अ ० १ ] शारीरस्थानम् २७
एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम् ।
तत्त्वस्मृतिवळं, येन गता न पुनरागताः ॥ १५० ॥
मुक्त पुरुषों ने इस तत्त्वस्मृति के बल को मोक्ष का एक ऐसा श्रेष्ठ मार्ग बताया है जिस मार्ग से गये हुए पुरुष फिर यहा पर वापिस नही आते ॥१५० ॥
अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः । संख्यातथमेः साख्यश्च मुक्तर्मोक्षस्य चायनम् योगी पुरुष इस तत्त्वस्मृति के बल को ही योग का मार्ग ज्ञानी और मुक्त पुरुष इस स्मृतिबल को भी मोक्ष कहते हैं || १५१ ॥
सर्व कारणवद् दुःखमस्व चानित्यमेव च ।
न चात्मकृतक तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता ॥ १५२
यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यथा ।
नैतन्मम च विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते ॥ १५३ ॥
कारणवान् अर्थात् उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण वस्तुए बुद्धि, आत्मा मे भिन्न दु ख रूप हैं, वे दुःख उत्पन्न करता हैं और से अनित्य है । आत्मा कारण रहित और नित्य है । जो वस्तु ॥ १५१ ॥
कहते हैं और का एक मार्ग ॥ अहंकार आदि कारणवान् होने कारणवाली होती है, उसमें ममता उत्पन्न होती है । अनात्मा में आत्मबुद्धि ' यह मेरा शरीर, मैं गोरा ' हू, माटा हू ' इस प्रकार का मिथ्याज्ञान तब तक रहता है, जब तक सत्यबुद्धि अर्थात् तत्त्वज्ञान उत्पन्न नही होता । सत्यबुद्धि उत्पन्न होने पर ' मेरा यह शरीर नहीं, मैं गोरा नहीं ' यह ज्ञान हो जाता है । इस ज्ञान के होने पर ज्ञानी जन्म, कर्म आदि सब बन्धनों का अतिक्रमण कर जाता है । तभी सब वेदनाओ ( पीड़ाओं ) की अत्यन्त निवृत्ति होती है ॥ १५२-१५३ ॥
तस्मिञ्चरमसन्यासे समूळाः सर्ववेदनाः ।
असंज्ञाज्ञानविज्ञाना निवृत्ति यान्त्यशेषतः ॥ १५४ ॥
इस अन्तिम सन्यास अवस्था में सब कर्मों के परित्याग करने पर मिथ्या ज्ञान रूपी कारणों से उत्पन्न सव वेदनायें, ज्ञेय के भली प्रकार से जान लेने से सम्पूर्ण रूप में निवृत्त हो जाती हैं ॥ १५४ ॥
अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा ' नोपलभ्यते निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्न यस्य न विद्यते ॥ १५५ ॥
इसके अनन्तर विदेह मोक्ष को प्राप्त करने के पीछे भूतात्मा ( जीव ) सब भावों से निकल कर ब्रह्म रूप हो जाने से कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, वह
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२८ चरकसंहिता [ अ ० २ VI n सब पदार्थों से पृथक् हो जाता है, तब इसके प्राण अपान आदि लक्षण नहीं रहते, इसलिये वे उपलब्ध नही होते ॥ १५५ ॥
गतिर्ब्रह्मविदा ब्रह्म तचाक्षरमलक्षणम् ।
ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति ॥ १५६ ॥
ब्रह्म का जानने वालों की ब्रह्म ही गति है । वह ब्रह्म ' अक्षर ' कभी नाश न होने वाला और लक्षण से रहित है, ब्रह्मविद् ही ब्रह्म को जानता है, अर्थ, मूर्ख पुरुष इस ब्रह्म को नहीं नान सकता ॥ १५६ ॥
तत्र श्लोकः - प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविशतिरुत्तमाः ।
कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना । १५७ ॥
इस ' कतिवापुरुषीय ' शारीर में तत्त्वदर्शी भगवान् आत्रेय ने पुरुष को उपलक्ष्य करके तेईस उत्तम प्रश्नो का निर्णय कर दिया है ॥ १५७ ॥
इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कतिधागुरुपीय शारीर नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्याम ॥ १ ॥
इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्व अध्याय में धातु - भेद से पुरुष का वर्णन किया है । अब गर्भ की
उत्पत्ति को बताने के लिये ' अतुल्य गोत्रीय नाम शारीर का व्याख्यान करेगे ।
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अतुल्यगात्रम्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य ।
किं स्याच्चतुष्पात्प्रभव च षड्भ्यो यत्स्त्रीषु गर्भत्वमुपेति पुंसः ॥३ ॥
स्त्री के गोत्र से भिन्न गोत्रवाले पुरुष का स्त्रो के रजोधर्म हो चुम्ने के पश्चात् स्त्री के साथ एकान्त स्थान में सम्भोग करते हुए, स्त्रो की योनि में त्याग और किया वह क्या पदार्थ है जा चतुष्पाद अर्थात् चार पाद अर्थात् गुणोंवाला छ. तत्त्वो से उत्पन्न होता है ओर जो स्त्रियों के शरीरों मे गर्भ रूप हो जाता है | ३ |
शुक्र तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय ।
वाय्वग्निभूम्यन्गुणपादवत् वत्, षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य ॥४ ॥
उत्तर -- गर्भ की उत्पत्ति के लिये पुरुष जिस पदार्थ का स्त्री योनि मे * ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काडूचाते ।
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अ ० २ ] शारीरस्थानम् २६ आधान करता है, बुद्धिमान् पुरुष इस वस्तु को ' शुक्र ' कहते हैं । यह शुक्र उत्तम वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल इन चार भूतो के गुणों से युक्त होता है । ये ही चार इसके चार पाद हैं । यह शुक्र मधुर आदि छः रखों वाले आहार-रस से उत्पन्न होता है । [ मधुर को शुक्रजनक और अम्ल रस को शुक्रविघातक कहा है उसका तात्पर्य अधिक उपयोग करने से है । वैसे छहों रसों से उत्पन्न वीर्य ही विशुद्ध शुरू होता है ] ॥ ४ ॥
संपूर्णदेहः समये सुखं च गर्भः कथ केन च जायते स्त्री ।
गर्भं चिराद् विन्दति सप्रजाऽपि भूत्वाऽथवा नश्यति केन गर्भः ॥ ५ ॥
प्रश्न - ( १ ) गर्भ किस प्रकार से सम्पूर्ण शरीर वाला होता और ( २ ) किस प्रकार से और किस कारण से ठीक समय पर उत्पन्न होता है? ( ३ ) किस प्रकार से गर्भ उत्पन्न होता और सुख से उत्पन्न होता है? ( ४ ) स्त्री बन्ध्यान होते हुए भी किस कारण से देर में गर्भ धारण करती है? ( ५ ) और गर्भ रह कर फिर किस कारण से नष्ट होना सम्भव है ॥ ५ ॥
शुक्रास्मृगात्माशय कालसंपद् यस्योपचारश्च हितैस्तथाऽर्थैः ।
गर्भ काले च सुखी सुखं च संजायते संपरिपूर्णदेहः ॥ ६ ॥
उत्तर- जिस गर्भ के बनने में शुक्र, आर्त्तव, आत्मा, गर्भाशय और काल ये गर्भकारक भाव ( पदार्थ ) उत्तम गुणवाले अविकृत हो और जिसका पालन पोषण भी उत्तम हितकारक अन्नो वा पदाथो द्वारा हो २ र वह गर्भ सम्पूर्ण शरीर वाला होकर सुखी, सब प्रकार के रोगो से मुक्त और ठीक समय पर उत्पन्न होता है । [ पुरुष के शुक्र और माता के रज तथा गर्भाशय का उष्ण होना यह उत्तम गुण है, शुक्र और रज के योग होने पर भी आत्मा पूर्व जन्म के उत्तम कर्मों से युक्त हो, काल, अतिगरमी, अति सरदी आदि तीक्ष्णस्वभाव का न हो, गर्भ के प्रसव का ठीक काळ नवम मास के अनन्तर दसवे भास के भीतर २ है । गर्भ मुखी अर्थात् किसी रोग से पीड़ित न हो और १ यद्यपि आगे आकाश का भी गर्भोत्पत्ति में कारण कहेंगे, तथापि यहा पर आकाश के अक्रिय होने से इसको नहीं गिना । क्योंकि वायु आदि चारो भूत पुरुष के शरीर से निकल कर क्रियावान् की तरह गर्भाशय में जाते हैं, आकाश नहीं जाता । २ कही पर अन्न के स्थान पर ' अर्थ ' पाठ है । यहा पर ' माता के सात्म्य विषयों के सेवन से ' ऐसा अर्थ करना चाहिये ।
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३० चरकसंहिता [ अ ० २ ANNA सुख से हो अर्थात् प्रसव काल में माता को बहुत अस्वाभाविक पीड़ा वा बालक की मृत्यु आदि न हो, बालक की गर्भ मे स्थिति भी ठीक २ हो ] ॥ ६ ॥
योनिप्रदोषान्मनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् ।
अकालयोगाद्बलसक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ॥ ७ ॥
योनि के दोष से, मन के सताप से, शुक्र, आर्त्तव ( रज ) और आहार विहार के दोष से, ऋतुकाल बीतने पर या निषिद्ध दिनों में पुरुष के साथ सयोग करसे मे और दुर्बलता से स्त्री वन्ध्या न होती हुई भी देर मे गर्भ धारण करती है । [ गर्भ धारण का काल ( ऋतुकाल ) चरक के मत से १६ रात्रि और सुश्रुत के मत से १२ रात्रिया हैं ] ॥ ७ ॥
असृड् निरुद्ध पवनेन नार्या गर्भं व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदस्रमस्रावि विवर्धमानम् ॥ ८ ॥
मुढ व्यक्ति कभी २ [ सौम्य एव पुष्टिकारक आहार के सेवन करने से ] वायु के द्वारा रुके हुए स्त्री के आर्त्तव ( रजो रूविर ) को ही ' गर्भ ' समझ लेते हैं, क्योकि वह रुका हुआ रुधिर ही बाहर न आकर गर्भाशय में प्रात दिन बढता हुआ गर्भ के लक्षण प्रकट करता है ॥ ८ ॥
तदग्निसूर्यश्रमशोकरोगैरुष्णान्नपानेरथवा प्रवृत्तम् ।
दृष्ट्वाऽसृगेवं न च गर्भमज्ञा. केचिन्नरा भूतहृत वदन्ति ॥६ ॥
ओजोशनानां रजनीचराणामाहारहेतोर्न शरीरमिष्टम् ।
गर्भ हरेयुर्यदि ते न मातुर्लब्धावकाशा न हरेयुरोजः ॥ १० ॥
वायु से रुका रक्त अग्नि, सूर्य अथवा थकान आदि से या वायु का अनु-लोमन करने वाले उष्ण खान - पान मे स्वयं प्रवृत्त हो जाता है, तब कई मूढ़ मनुष्य रक्त को ही अकेला देख कर ओर गर्भ को न देख कर इस गर्भ का ' भूत बुरा ले गये ' ऐसा कहने लगते हैं । [ जो इस प्रकार कहते हैं, वे मूर्ख हैं । क्योंकि भूतों द्वारा गर्भ का हरण सम्भव नहीं है ] | जिन का ओज ही भोजन है, ऐसे रात में विचरने वाले भूतों के आहार के लिये शरीर की आवश्यकता नहीं है । वे भृत गर्भ का अपहरण कर सकते हैं, यदि उनको अवकाश मिल जाये, ता वे गर्म का हरण न करके माता के ओज का ही अपहरण कर सकते हैं?
कन्या सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान्वहून्वा ।
कस्मात्प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धि च यमेऽभ्युपैति ॥११ ॥
प्रश्न – ( १ ) स्त्री कन्या को क्यों कर उत्पन्न करती है? अथवा ( २ ) पुत्र को ही क्योंकर उत्पन्न करती हैं १ ( ३५ ) दो कन्या वा दो पुत्रों वा कन्या और
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अ ० २ ] शारीरस्थानम ३१ पुत्र दोनों को एक साथ क्योकर उत्पन्न करती है १? ( ६ ) किस कारण से बहुत से लड़कों को एक साथ उत्पन्न करती है? ( ७ ) कभी चिरकाल में गर्भ को क्यों प्रसव करती है? ( ८ ) किस कारण से युगल सतति में एक सतान अधिक वृद्धि का प्राप्त होती है ॥ ११ ॥
रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शक्रेण, तेन द्विविधीकृतेन ।
बीजेन कन्या च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन ॥ १२ ॥
शुक्राधिकं द्वेधमुपैति बीज यस्याः सुतौ सा सहितौ प्रसूते ।
रक्ताधिक वा यदि भेटमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते ॥ १३ ॥
भिनत्ति यावद् बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः ।
तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात्प्रसूते ॥ १४ ॥
माता आ की अधिकता से कन्या को उत्पन्न करती है । शुक्र की अधिकता से पुत्र को उत्पन्न करती है और जिस समय शुक्र और रक्त रूपी बीज के दो भाग हो जावें, एक भाग में रक्त की अधिकता हो और दूसरे भाग में शुक्र की अधिकता रहे तब क्न्या और पुत्र दोनों एक साथ उत्पन्न होते हैं । जिस स्त्री के गर्भ में शुक्र की अधिकता वाला बीज ( शुक्रार्त्तव ) दो भागों मे विभक्त हो जाता है, वह स्त्री दो पुत्रों को एक साथ उत्पन्न करती है और जब रक्त की अधिकता वाला बीज दो भागों में विभक्त हो जाता है, तब स्त्री दो कन्याओं को एक साथ उत्पन्न करती है । वायु बहुत प्रवल होकर बीज ( शुक्र आर्त्तव ) के जितने अधिक खण्ड कर देती है, उतने ही सन्तानों को अपने कर्म के कारण स्त्री उत्पन्न करती है । इस मे स्त्री का अपना कोई वश नहीं है ।
आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा ।
तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥ १५ ॥
कर्मात्मकत्वाद्विषमाशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्विमुपैति कुक्षौ ।
एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एव यमेऽप्यभ्यविको विशेषः ॥ १६ ॥
रसवाहिनी नाडी के दोष के कारण जिस समय गर्म का आहार रस नहीं * कुत्ता आदि जन्तुआ भ जिस प्रकार स चार पाच बच्चे एक साथ उत्पन्न होते हैं । इनमें शुक्र - आर्त्तव के जितने विभाग बनते हैं, इन विभागों में जिनमें शुक्र की अधिकता रहती है, उतने नर और जितनों में आर्त्तव की अधिकता रहती है, उतने मादा उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य- स्त्रियों में भी समझना चाहिये ।
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३२ चरकसंहिता [ अ ०२ www मिलता, तब गर्भ गर्भाशय में सूखने लगता है । अथवा जब स्राव होने लगता है, तब भी गर्भ की वृद्धि नहीं होती, इसलिये वह देर तक गर्भाशय मे रुका रहता है । वह जब कभी बहुत समय के पीछे आहार मे पुष्ट होता है तब स्त्री चिरकाल में स्त्री प्रसव करती है । [ वह गर्भ बहुत से वर्षों के बाद बहुत कष्ट से उत्पन्न होता है या माता के जीवन भर उत्पन्न ही नही होता । ऐसा वाग्भट आचार्य का लेख है । जिस समय गर्भ को पुष्ट होने का रस पर्याप्त नही मिलता और इस कारण से प्रसव में देर हो तो ऐसे गर्भ को ' नागोदर ' कहते हैं । यदि परिस्राव होने से वर्षो का विलम्ब हो जावे तो उसको ' उपविष्टक ' कहते हैं । जब वे बहुत वर्षो के बाद आहार से पुष्ट होकर पैदा होते हैं तब इनके प्रसव काल में गर्भाशय के भीतर ही देश और दात बड़े हो जाते है ] । उत्पन्न होने वाले जीवों के कर्मों के कारण और न्यून - अधिक रूप में शुक्रार्त्तव के विषम विभाग होने से, जिस समय शुक्रार्त्तव गर्भाशय में वृद्धि का
प्राप्त होता है, तब एक भाग अधिक रहता है और दूसरा भाग न्यून रहता है ।
इस प्रकार से जोड़े सन्तान में भी यही विशेषता रहता है ॥ १६ ॥
कस्माद् द्विरेताः पवनेन्द्रियो वा सरकारवाही नरनारिषण्डो ।
वक्री तथेर्ष्याभिरतिः कथ वा सजायते वातिकषण्डको वा ॥ १७ ॥
प्रश्न- किस कारण से ' द्विरेत ' अर्थात् दो वीर्य वाला जीव उत्पन्न होता हे? किस कारण से पवनेन्द्रिय ( वायु मात्र वीर्य वाला ) उत्पन्न होता है? किस कारण से सस्कारवाही ( जिसको स्त्री वा पुरुष होने का सस्कार मात्र हो ) होता है? किस कारण से नरषण्ड ( नपुसक ) और नारी षण्ड होती है? किस कारण से वक्रध्वज ( टेड़े लिंग वाला ), ईर्ष्याभिरत ( जो दूसरे को देख कर कामार्च हो ) अथवा वातिक षण्ड ( वीर्य के स्थान पर केवल वायु छोड़ने वाला ) होता है? || १७ | बीजात्समाशादुपतप्तबीजात्स्त्रीपुंलिङ्गी भवति द्विरेताः । शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम्
शुक्राशयद्वारविघट्टनेन सस्कारवाह हि करोति वायुः ।
मन्दाल्पबीजावबलावहष क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य ॥
मातुर्व्यवायप्रतिधेन वक्री स्याद् बीजदौर्बल्यतया पितुश्च ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षावीर्थ्यारतेरेव वदन्ति हेतुम् ॥ * जिस प्रकार गान्धारी के दो साल गर्भ पेट मे रहा था ॥। १८ ॥ १६ ॥
।
२० ॥
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अ ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३
वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ बातिकषण्डकः सः ।
इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥
जिस समय स्त्री पुरुष के बीज ( शुक्र और आर्त्तव ) समान भाग हों, अथवा जब बीज किसी दोष के प्रकोप के कारण दुष्ट होता है, तब स्त्री - पुरुषों के लक्षणों वाला ' द्विरेत ' ( नपुंसक ) उत्पन्न होता है । वायु शुक्राशय को नष्ट करके गर्भाशय में स्थित गर्भ को ' पवनेन्द्रिय ' वाला बना देता है । वायु शुक्राशय द्वार को खोलकर सस्कारवादी षण्ड करता है । जिस समय स्त्री प्रथम सतुष्ट हो जाती है, तब पीछे पुरुष का उत्सृष्ट शुक्र हर्प के कारण मन के अस्थिर होने से, स्त्री की वायु को चचल कर देता है । साथ में पुरुष के शुक्रवाहक स्रोत भी पुष्ट हो जाते हैं, तब वातेन्द्रिय पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्री के साथ सम्भोग करने पर शुक्र की भाति वायु ही आता है और जब यह वायु इस पुरुष के शुक्रवाही स्रोतों को नष्ट न करके केवल मुखो को बन्द कर देता है तब कारवाही नपुंसक उत्पन्न होता है । सस्कार से ( वाजीकरण, बस्ति, खान पान से ) वह प्रवृत्त होता है । मन्द एव अल्प बीज वाले निर्बल एवं अन कामेच्छा वाले स्त्री - पुरुष नरषण्ड एवं नारीषण्ड की उत्पत्ति मे कारण होते हैं । माता और पिता के मेथुन के प्रतिघात होने से ( अनुचित रीति से सम्भोग करने पर ) तथा बोज की निर्बलता से वक्रध्वज ( टेड़ी इन्द्रिय वाला ) नपुसक उत्पन्न होता है । ई से युक्त मन्द कामेच्छा वाले स्त्री पुरुष ' ई से रति करने वाले नपुंसक ' का कारण है । जिस समय अल्पबल वाला पुरुष अल्प कामेच्छा या द्वेषवाली स्त्री के साथ काम उद्वेग के कारण सम्भोग करता है, तब नरषण्ड उत्पन्न होता है । वह ईर्षा रति नामक नपुसक दूसरों को रति करते देख कर रति मे प्रवृत्त होता है, इसलिये इसे ' ईर्याण्ड ' कहते हैं । जिस पुरुष के गर्भ में वायु और अग्नि दाष के कारण वृषण नाश हा जाते है, उसे ' वातिक षण्ड ' कहते है । गर्भ को ये आठ द्विरेत आदि विकृतिया आठ डोनिया कर्म की विचित्रता से होता है ॥ १८-२१ ॥
गर्भस्य सद्याऽनुगतस्य कुतो बी - पु - नपुसामुद्रस्थितानाम् ।
कि लक्षण कारणमिष्यते किं सरूपतां यन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥
प्रश्न -- गर्भाशय मे तत्काल गर्भ स्थिर होने के क्या लक्षण हे? उदर में स्थित स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं? और किस कारण से सतान में माता पिता का समान रूप आता है १? ॥ २२ ॥
निष्ठीविका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदयव्यथा च ।
तृप्ति बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥ २३ ॥
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३४ चरकसंहिता [ अ ० www तुरन्त गर्भस्थिति के लक्षण - मुख से लार आना, योनि में भारीपन, अगों का टूटना, तन्द्रा और हर्ष अर्थात् रोमाञ्च का अविक होना और हृदय प्रदेश में पीड़ा, योनि में तृप्ति, सतुष्टि, अर्थात् भोग की इच्छा न रहना, बीज ( शुक्र ) का ग्रहण अर्थात् उसका बाहर न आना, ये गर्भ के तुरन्त स्थित हो जाने के लक्षण हैं ॥ २३ ॥
सयाजचेष्टा पुरुषाथिनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा ।
सत्यान्तगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यपदुग्धा स्त्रियमेव सूते ॥ २४ ॥
पुत्रं त्वतो कि विपययेण व्यामिश्रलिङ्गां प्रकृति तृतीयाम् । गर्न में स्थित कन्या और बालक के लक्षण - स्त्री बाए अगो से कार्य करने वाली, पुरुष का चाह रखने वाली, स्त्रियों के स्वप्न, स्वप्न में स्त्रीलिंग वाले खान पान करने वाली, स्त्रियो के झील एव चेटा में प्रेम रखने वाली हो, बाए कोख में वृद्धि, गर्म परिमण्डल अर्थात् गोल आकार का न हो, वाम स्तन मे प्रथम दून का दर्शन हो तो वह स्त्री निश्चय से कन्या को ही उत्पन्न करती है । उपरोक्त कन्या के लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाग स्त्री पुत्र को उत्पन्न करनी है । जिस स्त्री में कन्या और पुत्र दोनों के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं तो वह नपुंसक सतान उत्पन्न करती है ॥ २४ ॥
गर्भोपपत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तु व्रजेत्तत्मदृश प्रसूते ॥ २५ ॥
माता पिता के सदृश सन्तान का कारण - गर्भ की उत्पत्ति अर्थात् बीन
ग्रहण करने के समय स्त्री का मन जिस प्राणि या ( वस्तु ) का ध्यान करता है ।
वह स्त्रो उसी के समान संतान उत्पन्न करती है ॥ २५ ॥
गर्भस्य चत्वारि चतुर्विधानि भूतानि मातापितृसभवानि ।
आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्ति देहे ॥ २६ ॥
तेषां विशेषाद बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि ।
तानि व्यवस्येत्सदृशाहेतु सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत् ॥ २७ ॥
माता से उत्पन्न होने वाले रज रूप और पिता से उत्पन्न होने वाले शुक्र रूप तथा आहार मे और अपने कर्मों मे उत्पन्न ' कर्मज ' ये चार २ प्रकार के वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चारों के १६ प्रकार के कर्मों में जो २ बल्लवान् होते है, उन २ के समान ही गर्भ का शरीर बनता है । माता के किये कर्मों के बलवान् होने पर सन्तान माता के समान और पिता से उत्पन्न कर्मों के बलवान् होने पर पिता के समान बनती है । मन अपने पूर्व देह अभ्यास मे * इसीलिये पाण्डु - पीले, वृतराष्ट्र अन्धे थे । चूकि एक व्यास के रूप का देखकर पीली पड़ गई थी, और दूसरी ने आखें बन्द करली थीं ।
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अ ० २ ] शारीरस्थानम् A उत्पन्न वासना के अनुकूल इस जन्म में होता है । [ अर्थात् यदि देव शरीर मे ही वह आत्मा तुरंत इस देह में आवे तो उसका चित्त देवतुलन, राचस शरीर से आये तो चित्त राचमतुल्य और पशु शरीर मे आवे तो पशुतुल्य होता है ] ॥ २६-२७ ॥
कस्मात्प्रजा स्त्री विकृता प्रसूते हीनाधिकाङ्गी विकलेन्द्रिया च ।
देहात्कथ देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च ॥ २८ ॥
प्रश्न - ( १ ) स्त्री किस कारण से विकृत रूपवाली प्रजा को उत्पन्न करती है १ ( २ - ३ ) किस कारण मे हीन अथवा अधिक अगवाली प्रजा को उत्पन्न करती है? ( ४ ) किस कारण से विकल इन्द्रियोवाला प्रजा को उत्पन्न करती है? ( ५ ) क्सि प्रकार से आत्मा इस शरीर मे दूसरे में पहुँचता हैं? ( ६ ) सदा आत्मा किन २ से बन्धा रहता है १ ॥ २८ ॥
त्मकर्माशयकालदोपैर्माटस्तथाऽऽहारविहारदोपेः ।
कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः सस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि ॥ २६ ॥
बीज ( शुक्र शोणित ), आत्मा के अपने कर्म, गभाशय और काल इनके दोषो से तथा माता के आहार - विहार के दोषों से दूषित हुए दोष बात आदि संस्थान ( रचना ), वर्ण, इन्द्रिय आदि में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न कर देते हैं ॥ २६ ॥
वर्षासु काष्ठामघनाम्बुवेगास्तरोः मरित्स्रोतसि सस्थितस्य ।
यथैव कुर्युर्विकृति तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः ॥ ३० ॥
जिस प्रकार वर्षा मे काठ, पत्थर और बरसात का पानी ये तीनों मिल कर नदी की धार में स्थित वृक्ष में विकार उत्पन्न कर देते है, इसी प्रकार तीनों दूषित दोष कर्म वश से गर्भाशय में स्थित गर्भस्थ जीव के शरीर में विकृति उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३० ॥
भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात् ।
कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्य दिव्यं विना दशनमस्ति रूपम् ॥ ३१ ।
यह आत्मा क्र्मों के कारण आकाश को छोड़ कर शेष वायु, जल, अग्नि और पृथिवो इन चार सूक्ष्म भूतो ( तन्मात्रो ) के साथ लिंग शरीर रूप मे मन के वेग से एक देह दूसरे देह में जाता है । अर्थात् मरने वाले देह मे निकल पर अगले उत्पन्न होने वाले देह में जाता है । वह कमात्मक होने से, दिव्य चक्षुओं के विना इसके सूक्ष्म रूप का दर्शन नहीं होता ॥ ३१ ॥
* गीता मे भी कहा है- -न तु मा शक्यसे द्रष्टु अनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्य ददामि ते चतुः पश्य में योगमैश्वरम् ॥