श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 321–330
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 321–330
पृष्ठ 321
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०७ ज्वराः कपायैर्वमनड वनैर्ल भोजनः ॥ २१६ ॥।
रूक्षस्य ये न शाम्यन्ति सर्पिस्तेपा भिषग्जितम् ।
रूक्ष तेजो वरकर तेजसा रूक्षितस्य च ॥ २१७ ॥
यः स्यादनुवलो धातुः स्नेहसाव्यः स चानिलः ।
कपायाः स एते सर्पिपा सह योजिताः ॥ २१८ ॥
प्रयोज्या ज्वरशान्त्यर्थमनिसंवुक्षणाः शिवाः । रूक्ष शरीर वाले रोगी का जो ज्वर कपाय, वमन, लवन, लघु भोजन से शान्त नहीं होते, उनके लिये मृत का प्रयोग करना चाहिये । ऐसे रोगियो की औषधी है । ज्वर को उत्पन्न करने वाला तेज ( पित्त ) रूल होता है, तेज के कारण रोगी का शरीर भी रूक्ष हो जाता है । रुक्षता के कारण जो धातु पीछे से बलवान् हो जाता है, वह वायु घी से ही शान्त होता है । स्नेह से ही बायु और पित्त दोनो शान्त होते हे । प्रथम कहे हुए कपायों का घी के साथ प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार प्रयोग करने से ज्वर शान्त होता है, अनि प्रबल होती है और ये काय हितकारी है ॥ २१६-२१८ ॥ पिप्पल्यञ्चन्दन सुस्तशीर कटुरोहिणी ॥ २१६ ॥
कलिङ्गकस्तामलकी सारिवाऽतिविगा स्थिरा ।
द्राक्षामलकनिवानि त्रायमाणा निदिग्धिका ॥। २२० ॥
सिद्धमेतैर्धृत सद्यो जीर्णज्वरमपोहति ।
क्षयं काम शिरःशूल पार्श्वशूलं हलीमकम् ॥ २२१ ॥
साभितानि च विपम सनियच्छति । पिप्पल्यादि घृत – पिपळी, लाल चन्दन, मोथा, खस, कुटकी, इन्द्र, जौ, भूई आवला, सारिवा, अतीस, शालपर्णी, द्राक्षा, आवळा, बेलगिरी, त्रायमाणा, छोटी कटेरी इनसे सिद्ध घृत जीर्ण ज्वर को शीघ्र नष्ट करता है । क्षय, कान, शिरोवेदना, पार्श्वशूल, हलीमक, असाभिताप और विषम अनि को नष्ट करता है । [ यह घृत सुश्रुत और चिकित्सा - कलिका आदि मे कुछ थोडे से परिवर्त्तन से आया है । यहा पर घृत का पाक पिपल्यादि के कल्क से ही अथवा इनके कल्क तथा क्वाथ दोनो से सिद्ध करने की परिपाटी है | कही कही पर इसमे दूध का भी योग होता है ] | [ घृतपाक मे — प्रथम घी का सम्मूर्च्छन करना चाहिये । इसके लिये घी को आग षर गरम करना चाहिये । जब झाग रहित हो जाये तब इसमे नीचे उतार कर हरड, बहेडा, आवला, मोथा, हल्दी इनका कल्क, बिजौरे का रस एक
पृष्ठ 322
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०८ चरकसहिता [ अ ० ३ पल, पानी ८ प्रस्थ मे घोल कर घी ९ प्रस्थ मे मिसाना चाहिये फिर पकाना चाहिये | मन्द मन्द आग पर पकाने से जब थोडा सा पानी रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इससे आम दोप नष्ट हो जाता है । इसको काथ मे मिलाना चाहिये । इस घृत को पिपल्यादि क्वाथ और कल्क से दूध के साथ सिद्ध किया जाये तो अधिक उत्तम होगा ] ॥। २१६-२२१ ॥ वासा गुडूची त्रिफला त्रायमाणा यवासकम् ॥ २२२ ॥
पक्त्वा तेन कषायेण पयसा द्विगुणेन च ।
पिपलीमुस्तमृद्वीकाचन्दनोत्पलनागरैः ॥ २२३ ॥
कल्कीकृतैश्व विपचेद्धृतं जीर्णज्वरापहम् । वासाय घृत - वासा, गिलोय, त्रिफला, त्रायमाण, जवासा इनके क्वाथ से दुगने ( घी से ) गाय के दूध के साथ, पिपली, माथा, सुनक्का, लाल चन्दन, नीला कमल और सोठ इनके कल्क से वृतपाक करना चाहिये । यह वृत जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है । [ गव्य वृत २ प्रस्न, वासामूल त्वक् का कपाय ४ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, कल्क १ शराव | अथवा कपाय आठ प्रस्थ, प्रस्थ, कल्क १ शराव लेकर भी घृत सिद्ध किया जा सकता बला श्वदृष्ट्रा बृहती कलसी धावनी स्थिराम् निम्बं पर्यटक मुस्तं त्रायमाणा दुरालभाम् । कृत्वा कपाय पेष्यार्थे दद्यात्तामलकी शटीम् द्राक्षा पुष्करमूलं च मेदामामलकानि च घृत पयश्च तत्सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं परम् क्षयकासशिरःशूलापार्श्वशूलासतापनुत् । दूध ४ प्रस्थ, घी २ है | २२२-२२३ ॥ || २२४ ॥ ॥ २२५ ॥
।
॥ २२६ ॥
ज्वरिभ्यो बहुदोपेभ्य ऊर्ध्व चाधश्च बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥
दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते । बलाद्य घृत — बला ( खरैटी ), गोखरू, बडी कटेरी, पृश्निपर्णी, कण्टकारी, शालपर्णी, नीम की छाल, पित्तपापडा, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा इनका क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्कार्थ, भूम्यामलकी, कचूर, मुनक्का, पोहकरमूल, मेदा, आवला, मिलित १ शराब, दूध, घृत के सम - परिमाण २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि लेकर पाक करना चाहिये । [ कई आचार्य यहा पर वृत से द्विगुण दूध लेते है ] । यह घृत ज्वर को नष्ट करता है । क्षय, कास, शिरोवेदना, पार्श्वशूल और अस-वेदना को नष्ट करता है । ज्वर के रोगियों में यदि दोष की मात्रा अधिक हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि कल्पस्थान मे वर्णित सशोधनों ( वमन और विरेचनों ) को समय २ पर देवे || २२४-२२७
पृष्ठ 323
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् मदनं पिप्पलीभिर्वा कलिङ्गमधुकेन वा ॥ २२८ ॥
युक्तमुष्णाम्बुना पेय वमन ज्वरशान्तये ।
क्षौद्राम्बुना रसेनेक्षोरथवा लवणाम्बुना ॥ २२ ९
ज्वरे प्रच्छर्दन जस्त मद्येर्वा तर्पणेन वा । वमन के योग - ( १ ) मेनफल को पिपली के साथ, ( इन्द्रजौ के साथ, ( ३ ) मैनफल को मुलहठी के साथ, गरम से ज्वर - रोगो को वमन देना चाहिये । अथवा पानी के स्थान पानी, गन्ने का रस, नमक मिला पानी या माय लाजा दोप और रोगी के बलाबलानुसार प्रयोग करे || २२८-२२६ ३०६ ॥ २ ) मैनफल को जल के अनुपान पर शहद मिला सत्तुओं से तर्पण, ॥ मृद्वीकामलकाना वा रस प्रस्कन्दनं पिबेत् ॥ २३० ॥
रसमामलकाना वा घृतभृष्टं ज्वरापहम् ।
लिह्याद्वा वृत चूर्ण संयुक्तं मधुसर्पिपा ॥ २३१ ॥
पिवेद्वा श्रद्रमासाद्य सघृत त्रिफलारसम् ।
आरग्वध वा पयसा मृद्वीकाना रसेन वा ॥ २३२ ॥
त्रिवृता त्रायमाणा वा पयसा ज्वरितः पिबेत् ।
ज्वराद्विमुच्यते पीत्वा मृद्वीकाभिः सहाभयाम् ॥ २३३ ॥
पयोऽनुपानसुष्ण वा पीत्वा द्राक्षारस नरः ।
कासाच्छ्वासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाविरज्वरात् ॥ २३४ ॥
मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलभृत पयः । विरेचन के योग — अगूंगे का रस ( द्राक्षा का काय ) और आवल का रस मिलाकर विरेचन के लिये पीना चाहिये, या आवलो के रस को घी में भून कर पीना चाहिये । इससे ज्वर नष्ट होता है । अथवा निशोथ के चूर्ण को घी और शहद के साथ चाटना चाहिये । अथवा त्रिफला के क्वाथ ( रस ) मे घी ओर मधु मिलाकर पीना चाहिये । अथवा अमलतास के गुदे को दूध के साथ खाना चाहिये । निशोथ या त्रायमाण के चूर्ण को दूध के साथ पीना चाहिये । हरड के साथ गूरो को या द्राक्षाओं को देना चाहिये । अथवा द्राक्षा रस को पीकर पीछे से गरम पानी पीना चाहिये, इससे ज्वर छूट जाता है । पञ्चमूल ( कटेरी, बडी कटेरी, शालिपणी पृक्षिपणी और गोखरू अथवा बृहत्पचमूल ) के क्वाथ के साथ सिद्ध किया हुआ दूव, कास, वास, शिरो-वेदना, पार्श्वशूल और पुरातन ज्वर को नष्ट करता है ' || २३०-२३४ ॥ १ पचमूल २ तोले, दूध १६ तोले, पानी ६४ तोले इसमें से दृब बचाना चाहिये ।
पृष्ठ 324
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३१० चरकसहिता [ अ ० ३ wwwwNA एरण्डमूलोत्कथित ज्वरात्सपरिकर्तिकात् ॥ २३५ ॥
यो विमुच्यते पीत्वा तद्वद्विन्वशलाटुभिः । ज्वर मे परिकर्त्तिका साथ हा तो एरण्ड - मूल के क्वाथ से साधित दूध अथवा बेलगिरी ( कच्ची ) से सावित दूध पीवे । मल त्याग से पीडा होती हो तो इनका क्वाथ देवे || २३५ - ॥ त्रिकण्टकवलाव्याघ्रीगुडनागरसावितम् ॥ २३६ ॥
वचोमूत्रविबन्वन्न शोफज्वरहर पयः । त्रिकण्टकाद्य दूध —— गाखरू, खरैटी, छाटी कटेरी, गुड, सोठ इनसे साधित गाय का दूव मलमूत्र के अवराव का, सूजन का ओर ज्वर को नष्ट करता है ॥ २३६ ॥
सनागर समृद्वीकं सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ २३७ ॥
शृतं पयः सखर्जूर पिपासाज्वरनाशनम् ।
चतुर्गुणेनाम्भसा वा शृत ज्वरहरं पयः ॥ २३८ ॥
धारोष्ण वा पयः सद्यो वातपित्तज्वर जयेत् । सोठ, मुनक्का और खजूर इनके कल्क से यथाविवि साधित दूध से गाय का घी, शर्करा और मधु ( ठण्डा होने पर ) मिला कर पीने से प्यास तथा ज्वर नष्ट होता है । चौगुने जल मे सिद्ध किया दूध अथवा धारोष्ण दूध शीघ्र ही वात - पित्त ज्वर को नष्ट करता है ॥ २३७-२३८ ॥ जीर्णज्वराणा सर्वेपा पयः प्रशमनं परम् ॥ २३६ ॥
पेयं तदुष्णशीत वा यथास्वं भेपजैः शृतम् । सब प्रकार के पुरातन ज्वरो मे दूध का प्रयाग करना उत्तम है । दूध को गरम या ठण्ढा करके और यथादाप ओपविया से सिद्ध करके देवे ॥ २३६ ॥
प्रयोजयेज्ज्वरहरान्निरूहान् सानुवासनान् ॥ २४० ॥
पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु । पक्वाशय ( बृहदन्त्र ) मे स्थित दोषो को निकालने के लिये सिद्धिस्थान मे कहे ज्वरनाशक निरूह और अनुवासन बस्तियों का प्रयोग करे ॥ २४० ॥
पटोलारिष्टपत्राणि सोशीरचतुरङ्गुलः ॥ २४१ ॥
रोहिणी तक्ता श्वदष्ट्रा मदनानि च ।
स्थिरा बला च तत्सर्व पयस्यर्धोदके शृतम् ॥ २४२ ॥
क्षीरावशेषं निर्यूहं सयुक्त मधुसर्पिषा ।
कल्कैर्मदनमुस्तानां पिप्पल्या मधुकस्य च ॥ २४३ ॥
वत्सकस्य च सयुक्त बस्ति दद्याज्ज्वरापहम् ।
पृष्ठ 325
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३११ शुद्ध मार्गे हृते दोषे विप्रसन्नेषु धातुषु ॥ २४४ ॥
गताङ्गशूलो लघ्वङ्गः सद्यो भवति विज्वरः । पट'लाद्य बस्ति — परवल, नीम के पत्ते, खस, अमलतास, ह्रीवेर ( नेत्र-वाला ), कुटकी, गोखरू, मैनफल, गालिपर्णी और बला इनको आधे जलमि-श्रित दूध ' मे डाल कर पकाना चाहिये । जब केवल दूध शेष रह जाये तब इस क्वाथ मे घी और मधु, मैनफल, नागरमोथा, पिप्पली, मुलहठी, इन्द्रजौ इनके कल्क से बस्ति सिद्ध करनी चाहिये । यह ज्वर को नष्ट करती है । मार्ग के शुद्ध होने पर और दोपो के निकल जाने पर, धातुओं के निर्मल होने पर मनुष्य ज्वररहित हो जाता हे | अगो की वेदना नष्ट हो जाती है, अग लघु हो जाते
है, ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । [ इस क्वाथ मे दूध के बराबर पानी मिलाना चाहिये ।
क्वाथ द्रव्यो से आठ गुणा जल उतना ही दूध मिलाना चाहिये । ] ॥२४१-२४४ ॥ ।
आरग्ववमुशीराणि मदनस्य फलानि च ॥ २४५ ॥
चतस्रः पणिनीश्चैव निर्यूहमुपकल्पयेत् ।
प्रियङ्कर्मदनं मुस्तं ताह्वा मधुयष्टिका ॥ २४६ ॥
कल्कः सर्पिर्गुडः क्षौद्रं ज्वरघ्नो बस्तिरुत्तमः । आरग्वधादि बस्ति — अमलतास, खस, मैनफल, चारो पर्णिया ( माष-पर्णी, मूगपणी, शालपर्णी और पृग्निपणी ) इनके क्वाथ बनावे | इस क्वाथ मे फूल प्रियगु, मैनफल, नागरमाथा, सौफ, सुलहठी इनका कल्क डाले | घी और गुड तथा शहद मिलावे यह ज्वर नाशक उत्तम बस्ति है ॥ २४५ –२४६ ॥ गुडूची त्रायमाणा च चन्दनं मधुक वृषम् ॥ २४७ ॥
स्थिरा बला पृश्निपर्णी मदनं चेति साधयेत् ।
रसं जाङ्गलमासस्य रसेन सहितं भिपक् ॥ २४८ ॥
पिप्पलीफलमुस्ताना कल्केन मधुकस्य च ।
ईषत्सलवण युक्तया निरूह मधुसर्पिषा ॥ २४६ ॥
ज्वरप्रशमन दद्याद्वलस्वेदरुचिप्रदम् । गुडूच्यः दि निरूह — गिलोय, त्रायमाणा, लाल चन्दन, मुलहठी, बासे की मूल की छाल, स्थिरा ( शालपर्णी ), खरैटी, पृश्निपर्णी, मैनफल इनका क्वाथ सिद्व करे । इस क्वाथ मे जागल मास का रस और पिप्पली, मैनफल, नागर-मोथा, मुलहठी इनका कल्क डाले । इसमे युक्तिपूर्वक थोडा नमक, घी और मधु भी मिलावे | यह बस्ति ज्वरनाशक, बल, स्वेद को बढाने वाला और रुचिकर है । [ अष्टाग - संग्रह के अनुसार गिलोय आदि क्वाथ द्रव्यों के साथ ही मास का पाक करे । पृथक् मासरस सिद्ध नही करे ] ॥ २४७–२४६ ॥
पृष्ठ 326
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३१२ चरकसंहिता [ अ ० ३ जीवन्ती मधुकं मेदां पिप्पली मरिचं वचाम् ॥ २५० ॥
ऋद्धि रास्ना aai विश्व शतपुष्पा शतावरीम् ।
पिष्ट्वा क्षीर जल सपिरतैल च विपचेद्विपकू ॥ २५१ ॥
आनुवासनिक नेहमेतद्विद्याज्ज्वरापहम् । जीवन्त्याद्यनुवासन — जीवन्नी, मुलहठी, नेदा, पिपली, मरिच, वच, ऋद्धि, रास्ना, खरैटी, सोठ, सौफ, शतावरी, इनके कल्क के साथ दूध, घी, जल और तैल पावे । यह अनुवासन वस्ति ज्वर का नष्ट करती ' है ॥ २५१- ॥ पटोलपिचुमर्दाभ्या गुडूच्या मधुकेन च ॥ २५२ ॥
मदनैश्च शृतः स्नेहो ज्वरनमनुवासनम् । पटोल पत्र, नीम की छाल, गिलोय, मुल्हटी, मैनफल अनुवासन रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता हे ॥ चन्दनागुरुकाश्मर्यपटोलमधुकोत्पलैः ॥ २५३ सिद्धः स्नेहो ज्वरहरः स्नेहवरितः प्रयुज्यते । लाल चन्दन, अगर, गम्भारी, परवल, मुलहठी, नीला स्नेह अनुवासन - रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता इनसे सावित स्नेह २५२ ॥ ॥ कमल, इनसे सिद्ध है || २५३ ॥ यदुक्तं भेषजाध्याये विमाने रोगभेषजे ॥ २५४ ॥
शिरोविरेचनं कुर्याद् युक्तिज्ञस्तज्वरापहम् ।
यच्च नावनिकं तैलं याश्च प्राग्धूमवर्तयः ॥ २५५ ॥
मात्राशितीये निर्दिष्टाः प्रयोज्यास्ता ज्वरेष्वपि । भेषज - चतुष्क अध्यायों में और विमानस्थान के रोगभेषज प्रकरण मे जो शिरोविरेचन कहे है, उन ज्वरनाशक शिरोविरेचनो का भी युक्ति को समझने वाला वैद्य ही प्रयोग करे | मात्राशितीय अध्याय मे जो नावनिक तैल ( अणु तैल ) और शिरोविरेचन के लिये धूम - वर्त्तिया कही है, उनका भी ज्वर मे प्रयोग करे || २५४–२५५ ॥ अभ्यङ्गाश्च प्रदेहाश्च परिषेकाच कारयेत् ॥ २५६ ॥
यथाभिलापं शीतोष्ण विभज्य द्विविधं ज्वरम् । " कविराज गंगाधर सेन मरिच के स्थान पर ' मदन ' पढते है । अष्टाग-सग्रह में भी यही पाठ है । अष्टांग संग्रह के टीकाकार इन्दु के अनुसार दूध, जल, घी और तिल - तैल चारो समान चाहिये । चक्रपाणि के अनुसार दूध, घी और तेल समान, जल तीन गुना और कल्क चतुर्थाश होना चाहिये । इस प्रकार से जल और दूध स्नेह से चौगुना हो जाते है । तैल और घी बराबर-बराबर या दोष की अपेक्षा से कम अधिक ले सकते है ।
पृष्ठ 327
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१३ सहस्रधौतसर्पिर्वा तैलं वा चन्दनादिकम् ॥ २५७ ॥
ढाहज्वरप्रशमनं दद्यादभ्यञ्जनं भिपक् । ज्वर को गीत और उग्ण भेद से दो भागो मे विभक्त करके अभ्यग प्रदेह, परिषेक का प्रयोग करे । शीत ज्वर हो ता उण अभ्यग, परिषेक, प्रदेह करते । दाह ज्वर मे मालिग के लिये सहस वार ( वा सो बार ) बाया हुआ घी, या
चन्दनादि तैल का प्रयोग करे । इससे दाह मिटता है ॥ २५६ - २५७ ॥
अथ चन्दनाद्यं तैलमुपदेक्ष्यामः - चन्दन शैलेय- - भद्राश्रय - कालानुसा-- कालीयक- पद्मा पद्मकोशीर - सारिवा मधुक - प्रपौण्डरीक- नागपुष्पोटी-कय चव्य - पद्मोत्पल- नलिन कुमुट सौगन्धिक- - पुण्डरोक- शतपत्र - विस- मृणा-ल आलूक- - शैवाल- कशेरुकानन्ताकुला - काशेलुदर्भ ठार - नल - लि - मूल-जम्बु- वेत्र- वेतस - वानीर गुन्द्रा- ककुभागनाश्वकर्णे- स्यन्दन - वातपोथ- शाल-ताल - धपति - निश - खदिर - कदर - कदम्ब काश्मर्य - फल- सर्ज - लक्ष - वट - कपीत-नोदुम्बराश्रत्य - न्यग्रोध- वातकी दूर्वोत्कण्टक - शृङ्गाटक - मझिष्टा- ज्योतिष्म-ती - पुष्कर वीज कौवान चढरी- कोविदार कदली मवर्तकारिष्ट- शतपर्वा-श्वेतकुम्भिका शतावरी - श्रीपर्णी- आगणी महाश्रावणी - रोहिणी- शीतपाक्यो-ढनपाकी- काला - बला - पयस्या- विदारी- जीवकर्षभक शुद्रमेवा - महामेदाम-धुरर्ण्यप्रोक्ता- तृणशून्य - मोचरसा - टरूपक बहुल- कुटज - पटोल - निरव शाल्म-ली - नारिकेल - खर्जूर - मृद्वीका प्रियाल- प्रियद्दु धन्वनात्मगुप्ता - मधुकानाम-न्येपा च शीतवीर्याणा यथालाभमोपधाना कपाय कारयेत् । तेन कपा-येण द्विगुणितपयसा तेषामेव च कल्केन कगायार्धमात्र सुनिना साथ-येत्तेल सद्योदाह ज्वरमपनयति । एतेरेव चोपधेः सुऋणपिष्टः सुर्शतिः प्रदेहं कारयेत्, एतैरेव च श्रुतशीत सलिलमवगाहपरिषेकार्थ प्रयुञ्जीत । इसके आगे चन्दनादि तेल का उपदेश करते है —चन्दन, शैलेय ( छैल-छरीला ), भद्राश्रया ( श्वेत चन्दन ), कालानुसार्न ( तगर ), कालीयक ( पीत-काष्ठ चन्दन ), पन्ना ( भाडी ), पद्माख, खम, सारिवा, मुलहठी, पुण्डरीक-काष्ठ, नागकेसर, उदीच्य ( नेत्रवाला ), चविका, वन्य ( मोथा ), पद्म ( कमल ), उत्पल ( नील - कमल ), नलिन ( कमल भेद ), कुमुद ( श्वेत कमल भेद ), सौगन्धिक, पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), शनपत्र ( लाल कमल ), बिस ( कमल नाल ), मृणाल ( कमल- दण्ड ), शालूक ( कमल आदि के कन्द ), शेवाल ( सरवाल ), कसेरू, अनन्ती ( दुरालभा ), कुशा, कास, ईख, शर और दाभ इनकी जड ), नलसर, शालि धान्य की जड, जामुन, बेत, अम्लवेतस, वानीर ( जल बेतस ), गुन्द्रा ( तृण भेद ), अर्जुन, असन ( पीत साल ), अश्वकर्णं
पृष्ठ 328
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३१४ चरकसंहिता [ अ ० ३ ^^ AAAA ( साल का भेद ), स्यन्दन ( सादन ), वातपोथ ( ढाक ), शाल, ताड, धव, तिनिश ( जिससे रथ बनता हे वह वृक्ष ), खैर, कदर ( श्वेत खैर ), कदम्ब, भारी का फल, सर्ज ( राल जिससे निकलती है वह वृक्ष ), प्लक्ष ( पिलखन ), वट ( बरगद ), कपीतन ( गिरीस या पारस पीपल ), गूलर, पीपल, बरगद ( जिसमे जटाये लटकती है ), वाय के फूल, दूब, इत्कट ( तृण विशेष ), सिघाडा, मजीठ, मालकगनी, कनल वीज, क्रोञ्चादन ( खिरनी ), बेर, कोवि-दार ( श्वेत कचनार ), केश, मवर्त्तक ( बहेडा ), नीम, गतपर्वा ( श्वेत दूब ), शीत कुम्भिका ( काठ पटला, जिससे फूल नही आता वह पाटला ), गतावरी, श्रीणी ( गम्सारी ), नावणी ( सुण्डी ), महाश्रावणी ( मुण्डी भेद ), रोहिणी ( कुटकी ), गीतणकी ( गन्धा या शिखण्डिका ), ओदनपाकी ( नील झिण्टी ), काला ( सारिवा या मजीठ ), खरैटी, पयस्या ( क्षीरकाकोली या क्षीरविदारी ), विदारीकन्द, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, मधुरा ( काकोली या मूर्खों ), क्षुद्रसहा ( मूगपर्णी ), ऋष्यप्रोक्ता ( अतिबला ), तृणशून्य ( केतकी, केवडा ), मोचरस ( मेमलकी गोद ), अडूसा, मौलसरी, वूडा, पटोलपत्र, नीम, सेमल की जड़, नारियल, खजूर, अगूर, पियाल, फूल प्रियगु, धन्वन, नौच और मुलहठी | उन्हें तथा अन्य जो शीतल द्रव्य प्राप्त हो सके उनको लेकर काथ करे । इस क्वाथ से दुगुना दूध, इन्ही द्रव्यो का कल्क और कपाय से आधा तैल मिलाकर तैल सिद्ध करे । यह तैल शीघ्र दाह ज्वर को नष्ट करता है । इन्ही ओपधियो को अत्यन्त बारीक पीस कर पतला लेप करे । इनके क्वाथ मे अव-गाहन या परिषेचन करे । [ बारीक लेप करना चाहिये गाढा लेप उष्णता करता है ] || २५८ ॥ मधारनाल - क्षीर- सौवीर - दधि घृत - सलिल - सेकावगाहाश्च सद्योदाह-ज्वरमपनयन्ति शीतस्पर्शत्वादिति ॥ २५६ ॥
मद्य, आरनाल ( कॉजी ), दूध, सौवीर ( धान्यासव ), दही, घी और जल का परिषेक और अवगाहन बहुत जल्दी दाहज्वर को नष्ट करता है । क्योकि ये वस्तुएँ गीत स्पर्शवाली है ॥ २५६ ॥
भवन्ति चात्र - पौष्करेषु सुशीतेषु पद्मोत्पलदलेषु च ।
काराणां च पत्रेषु क्षमेषु विमलेषु च ॥ २६० ॥
चन्दनोदकशीतेषु सुप्यादाहार्दितः सुखम् ।
हिमाम्बुसि सदने शीते धारागृहेऽपि वा ॥ २६१ ॥
हेमशङ्खप्रवालानां मणीनां मौक्तिकस्य च ।
पृष्ठ 329
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१५ चन्दनोदकशीताना सस्पर्शानुरसान् स्पृशेत् ॥ २६२ ॥
स्रग्भिर्नीलोत्पलैः पद्मैर्व्यजनैर्विविधैरपि ।
शीतवातावहैर्व्यज्येच्चन्दनोदकवर्पिभिः ॥ २६३ ॥
नद्यस्तडागाः पद्मिन्यो हृदाश्च विमलोदकाः ।
अवगाहे हिता दातृष्णाग्लानिज्वरापहाः ॥ २६४ ॥
प्रियाः प्रदक्षिणाचाराः प्रमदाश्चन्दनोक्षिताः ।
सान्त्वयेयुः परैः कामैर्मणिमौक्तिकभूषणाः ॥ २६५ ॥
शीतानि चान्नपानानि शीतान्युपवनानि च ।
वायवश्चन्द्रपादाश्च शीता दाहज्वरापहाः ॥ २६६ ॥
१ ) पुष्कर ( लाल कमल ), पद्म, उत्पल तथा कल्हार ( कुमुद ) के शीतल पत्ता पर अथवा चन्दन के पानी से ठण्डे किये निर्मल ओम वस्त्रां पर, शीतल या बर्फ से शीतल बने ( जल के छिडकाव से ठण्डे ) या शीतल वारा-गृह । मे ( जहॉ पर फुहारे छूट रहे हो ) दाह से पीडित मनुष्य को सुख से सोना चाहिये । ( २ ) स्वर्ण, शख, मूगा, मणि, मोती और चन्दन के पानी से शीतल किये पदार्थो का स्पर्श करे । गरम होने पर छोड दे । [ चक्रदत्त मे शीत-क्रिया के लिने एक उत्तम विधि दी है । रागी का पीठ के भार लेटा कर उसकी नाभि पर कासी आदि शीतल पात्र रख कर ऊपर से पानी की धारा गिरानी चाहिये इससे दाह मिटता है | ] ( ३ ) नीले कमल की या श्वेत कमल की मालाओ को धारण करावे खस आदि के नाना प्रकार के पखो को चन्दन के पानी से तर करके शीतल वायु देवे । ( ४ ) नदिया तालाब, पद्मिनी ( पुख-रणिया ), हृद जिनका पानी निर्मल हा, उनमे अवगाहन करे । इससे दाह, ' यास, ग्लानि और ज्वर नष्ट होता है । ( ५ ) प्रिय, अनुकूल आचार वाली, चन्दन का लेप किये हुए, मणि और मोतियों के आभूषणों को पहिने हुए कामिनियो द्वारा रोगी की शान्ति करे । [ वाह्य परिशीलन मात्र करे वीर्य का नाश नही होने देवे | ] ( ६ ) शीतल खान पान, शीतल बाग बगीचे, शीतल वायुए, चन्द्रमा की शीतल किरणे ये दाह ज्वर को नष्ट करती है ॥ २६०-२६६ ॥ अथोष्णाभिप्रायिणा ज्वरितानामभ्यङ्गादीनुपक्रमानुपदेक्ष्यामः । अगुरु - कुष्ठ - तगर - पत्र नलद- शैलेयक व्यामक- हरेणुका - स्थौणेयक- क्षेमिकै-ला - बरा बराङ्गदल - पूर- तमाल पत्र - भूतीक - रोहिष - सरल - शल्लकी - देवदार्वग्नि-मन्थ- बिल्व- स्योनाक- काश्मय पाटला- पुनर्नवा वृश्चीर - कण्टकारिका - बृह-ती शालपर्णी - पर्णी - माषपर्णी- मुद्गपर्णी गोक्षुरकैरण्ड- शोभाञ्जनक - व-
पृष्ठ 330
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३१६ चरकसहिता [ अ ० ३ wwwww रुणार्क - चिरिविल्वातिबिल्वक शटीपुष्कर - मूलगण्डीरोरुबूक - पत्तूराक्षीबा-इमान्तक- त्रिश्रु- मातुलुङ्ग - मूलक- मूलपणी - पीलुपर्णी - तिलपर्णी - मोरटा -मेपशृङ्गी हिस्सा - दन्त - ठेरावतक- भल्लातका - स्फोट कण्डीरात्मजा - - काका-ण्डैकैपीका - करञ्ज - धान्यकाजमोद - पृथ्वीका सुमुख- सुरस - कुठेरक - काण्डीर-कालमालक - वर्णास क्षवक - फणिज्जक भूस्तृण - शृङ्गवेर - पिप्पली - सर्पपावग-न्वारानारुहावरोहा - वाचा - चला तिला गुड्डू पुष्पा शीतवली - नाक-ली - गन्धनाकुली - श्वेता- ज्योतिष्नती - चित्रकाव्यण्डाम्ल - चाङ्गेरी - बदर - फुल-त्थ - मापाणामेव विधानामन्येषा चोष्णवीर्याणां यथालाभमौषधाना कमाय कारयेत् । तेन कपायेण तेषामेव च कल्केन सुरा - सौवीरक - तुषोदक-मैरेय मेदक - डायमण्डारनाल - कट्वर - प्रतिविनीतेन तैलपात्र विपाचयेत्, तेन सुखोष्णेन तैलेनोष्णाभिप्रायिण ज्वरितमभ्यञ्ज्यात्, तथा शीतज्वरः प्रशाम्यति । तैरेव चोषधैः ऋक्ष्गपिष्ठैः सुखोष्णैः प्रदेह कारयेत्, एते-मेव च सुखोष्णमुत्काथमवगाहनपरिषेकार्थ प्रयुञ्जीत ज्वरप्रशमार्थ-मिति ॥ २६७ ॥
इति शीतज्वरेऽगुर्वादितैलम् । जिस ज्वर के रोगी उष्ण प्रलेप आदि की इच्छा करते है, उनके लिये अभ्यग आदि का उपदेश करे । यथा - अगुरु, कुष्ठ, तगर, तेजपत्र, नलद ( बालछड ), गैलेय ( छैलछरीला ), व्यामक ( तृणविशेष ) हरेणु, ( रेणुका ), स्थाणे ( सुगन्धित द्रव्य गठिवन ), क्षेमिक ( चोरक ), एला ( इलायची ), वरा ( त्रिफला ), बरागदल ( दालचीनी की छाल अथवा प्रियगुपत्र ), पुर ( गुग्गुलु ), तमालपत्र, भूतीक ( तृणविशेप ), राहिप ( तृणविशेष ), सरल ( च ), शल्लकी ( सर्जभेद ), देवदारु, अनिमन्थ ( अरणी ), बेलगिरी, स्थोनाक ( सोना पाठा ), काश्मरी ( गम्भारी ), पाटला ( पाढल ), श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, छोटी कटेरी, बडी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्रपर्णी, माप-पर्णी, गोखरू, एरण्ड, सहजना, वरना आक, करञ्ज ( नाटा ), तिल्वक ( लोध ), कचूर, पोहकरमूल, भाण्डीर ( भाट ), उरुवक ( लाल एरण्ड ), पत्तूरा ( राज गरी ), अक्षीव ( महानिम्ब ), अश्मान्तक शित्रु ( कडुआ सहजन ), बिजौरा, मूलपर्णी, पीलुपर्णी, ( बिम्बी, मूर्वा भेद ), तिलपर्णी ( तलवणो या हुलहुल ), मेगी, हिंसा ( मासी, कथार ), दन्तशठ ( गलगल ), ऐरावतक ( नारगी ), भिलावा, आस्फोतक ( हरफा रेवड़ी ), कण्डीर ( जगली करेली ), आत्मज ( पुत्रजरा ), काकाण्ड ( कौच ), एकैत्रिका ( त्रिवृता या पाठा ), करजुआ,