श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 331–340

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१७ ^ वनिया, अजवायन, पृथ्विका ( फलोजी ), मुमुग्व, सुरस, कुठेरक, काण्डीर, कालमालक, पणास, क्षत्रक, फणिजक, ( सब तुलसी के मेद ह ), भूतस्तृण ( गन्वतृण ), अदरख, पिपली, सरसो, असगन्ध, रास्ना, रहा ( वृहरुहा या माराहिणी ), जवराहा ( असगन्ध भेद, लाजवन्ती ), वच, वला अतिबला, गलाय, साफ, शीतवल्ला ( नीलदूवा ), नाकुला ( रास्ना भेद ), श्वेता ( सफेद गरणी ), मालकगनी, चित्रक, अव्यण्डा ( तालमखाना या कोच ), अम्लचागेरी ( तितिया ), बदर, कुलत्थी, मात्र ( उड़द ) इस प्रकार के तथा अन्य उष्ण वीर्य पदाथों में जितने भी प्राप्त हा सके उन सबका संग्रह करके उनके साथ कषाय बनावे | इन्हीं उष्णवीर्य द्रव्यों के कल्क के साथ और सुरा, सौवीरक ( वान्याम्ल ), तुपोदक ( धान्यासव ), मेरेय, मेदक, दही का पानी, काजी, कटवर, ( मक्खन न निकाला गया तक्र ) मिलाकर तेल पकावे । ( यहा पर द्रव के द्रव्य स्नेह के समान होने चाहिये । इस प्रकार से मुरा आदि तेल के समान ओर कल्क तैल से चतुर्थाश चाहिये ) । कुछ गरम गरम तैल से अभ्यंग करे, इनमे शीतज्वर नष्ट हो जाता है । इन्ही ओपवियो को बारीक पीस कर कवोष्ण प्रदेह करे । इन्ही के सुहाते गरम पानी मे अवगाहन, परिषेक, ज्वर की शान्ति के लिये करे ॥ - २६७ ॥

भवन्ति चात्र - त्रयोदशविधः स्वेदः स्वेदाध्याये निदर्शितः ।

मात्राकालविदा युक्तः स च शीतज्वरापहः ॥ २६८ ॥

सा कुटी तच्च शयन तच्चावच्छादनं ज्वरम् ।

शीत प्रशमयन्त्याशु धूपाचागुरुजा घनाः ॥ २६६ ॥

पवित्रचारुगात्राश्च तरुण्यो यौवनोष्मणा ।

आलेपाच्छमयन्त्याशु प्रमदाः शिशिरज्वरम् ॥ २७० ॥

स्वेदनान्यन्नपानानि वातश्लेष्महराणि च ।

शीतज्वर जयन्त्याशु संसर्गबलयोजनात् ॥ २७१

स्वेद अध्याय मे जो तेरह प्रकार के स्वेद कहे है, मात्रा ओर काल को जानने वाला वैद्य इनका भी प्रयोग करे । ये शीत ज्वर का नष्ट करते है । ( १ ) वह कुटी, वह बिस्तर और वह ओढने के वस्त्र जो कुटी - स्वेद में वर्णित है तथा अगर के धने धूप शीत को शान्त करते है । ( २ ) स्वच्छ और सुन्दर शरीर वाली, युवती स्त्रिया अपने यौवन की गरमी से आलिंगन द्वारा शीत को नष्ट करती है । ( ३ ) स्वेदन अर्थात् पसीना लाने वाले और वात कफ नाशक खान-पान ससर्ग के बल के अनुसार शीत ज्वर को नष्ट करते है । यथा – यदि ज्वर

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३१८ चरकसंहिता www . वात कफ से हो और इसमे वायु बलवान् हो तो गुरु, उष्ण, बरते, यदि कफ बलवान् हो तब उष्ण, रूक्षप्राय चिकित्सा करे

वातजे श्रमजे चैव पुराणे क्षतजे ज्वरे ।

लङ्घन न हित विचाच्छमनेस्तानुपाचरेत् ॥ २७२

वायुजन्य - वातुआ के क्षत्र में उत्पन्न, पुरातन वर, घन हितकारी नहीं है, उनके लिय लगमनी चिकित्सा करे ॥ [ अ ० ३ स्निग्ध, अनुपान || २६८ - २७१ ॥ ॥ क्षयजन्य ज्वर मे २७२ ॥

विक्षिग्यासाायोप्माण यस्माद् गत्वा रस नृणाम् ।

ज्वर कुर्वन्ति दोगास्तु हीयतेऽनिबल ततः ॥ २७३ ॥

यथा प्रज्वलितो वः स्थास्यामिन्धनवानपि ।

न पचत्योदन सम्यगनिलप्रेरितो बहिः ॥ २७४ ॥

पक्तिस्थानात्तदा दोषरूपमा क्षिप्तो बहिनृणाम् ।

न पचत्यभ्यवहृत कृच्छ्रात्पचति वा लघु ॥ २७५ ॥

अतोऽग्निबलरक्षार्थ लड्घनादिक्रमो हितः ।

सप्ताहेन हि पच्यन्ते सर्ववातुगता मलाः ॥ २७६ ॥

निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि । क्योकि आमाशय की ऊष्मा को बाहर निकाल कर रस - वातु मे जा कर ज्वर उत्पन्न करते है, इसलिये पुरुषो का अनि बल घट जाता है । जिस प्रकार चूल्हे मे जलती हुई आग ईन्धन होने पर भी वायु के झोके से बाहर की ओर आने से पतीली के चावलो को नहीं पकाती, इसी प्रकार दोपो के कारण आमा-शय से बाहर आई हुई अनि भुक्त भोजन को नही पचाती, या लघु भोजन कठिनाई से पचता है । इसलिये अग्निवल की रक्षा के लिये ही यह लघन आदि उपक्रम बताया है । सव धातुओ के मल प्राय सात दिन के भीतर पच जाते है । इसलिये प्राय आठवे दिन ज्वर को ' निराम ज्वर ' कहते है । [ कभी कभी

सात दिन के पीछे भी सामता रह जाती है । ] ॥ २८३–२७६ ॥

उदीर्णदोषस्त्वल्पाग्निरग्नन् गुरु विशेषतः ॥ २७७ ॥

मुच्यते सहसा प्राणैश्चिरं क्लिश्यति वा नरः ।

एतस्मात्कारणाद्विद्वान्वातिकेऽप्यादितो ज्वरे ॥। २७८ ॥

नाति गुर्वति वा नग्ध भोजयेत्सहसा नरम् ।

ज्वरे मारुतजे त्वादावनपेक्ष्यापि हि क्रमम् ॥ २७ ९ ॥

कुर्यान्निरनुबन्धानामभ्यङ्गादीनुपक्रमान् । पाययित्वा कषायं च भोजयेद्रसभोजनम् ॥ २८० । } जीर्णज्वरहरं कुर्यात्सर्वशश्चाप्युपक्रमम् ।

पृष्ठ 333

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम ३१६ जिस पुरुष मे दाप बढे हुए हो और अग्नि मन्द हो, वह पुरुष यदि गुरु भाजन का सेवन करता है, तो पुरुष सहसा मर जाता है अथवा देर तक कष्ट पाता है । इन कारणो का देखते हुए वातिक ज्वर मे भी रोगी को प्रथम गुरु वा स्निग्व भाजन नही करावे । वातजन्य ज्वर मे यदि पित्त और कफ का अनुबन्ध न हो ता पूवोक्त क्रम की उपेक्षा करके भी अन्यग आदि का उपक्रम करे, कत्राय पिला कर मास रस का भोजन देवे । जीर्ण ज्वर के लिये जो भी चिकित्सा है, वह सब वायुजन्य ज्वर मे प्रथम ही करे ॥ २७७-२८० ॥ श्लेष्मलानामवाताना ज्वरोऽनुष्णे कफाविकः ॥ २८१ ॥

परिपाक न सप्ताहेनापि याति मृत्ष्मणाम् ।

तं क्रमेण यथोक्तेन लङ्घनान्पाशनादिना ॥ २८२ ॥

आढशाहमुपक्रम्य कषायाद्यैरुपाचरेत् । कफ - प्रकृति के पुरुषो मे जब वायु न हो, उष्मा मृदु हो और कफ प्रवान ज्वर हो, पित्त का अनुबन्ध न हो तो दोष ( आत ) सात दिन मे भी नही पकते । इसके लिये पूर्व वर्णित लवन और अल्लाशन विधि का दस दिन तक प्रयोग करके पीछे से कपाय पान करावे ॥ २८२-२८२ ॥ सामा ये ये च कफजाः कफपित्तज्वराश्च ये ॥ २८३ ॥

लह लहनीयोक्त तेषु कार्य प्रति प्रति ।

Enter विरेकैश्च बस्तिभिश्च यथाक्रमम् ॥ २८४ ॥

जो ज्वर साम हो, जो ज्वर कफजन्य हो, कफ - पित्त ज्वर में, लघनीय प्रत्येक पुरुष ' को लघन करावे । आम वायु से मिला हो तो भी लघन करावे । कफ निराम हो तो भी लघन करावे । कफयुक्त पित्त की अवस्था में ही लघन करावे । परन्तु निराम पित्त मे लघन नही करावे । साम पित्त मे ल्घन उत्तम है || २८३ - २८४ ॥

ज्वरानुपचरेद्धीमान् कफपित्तानिलोद्भवान् ।

संसृष्टान् सन्निपतितान् बुद्ध्वा तरतमैः समः ॥ २८५ ॥

ज्वरान्दोपक्रमापेक्षी यथोक्तरोषधैर्जयेत् । कफ - पिन और वायुजन्य ज्वरो मे क्रमश वमन, विरेचन आर बस्तियां द्वारा चिकित्सा करे | यदि स्वर कफ्जन्य होता वमन, पित्तजन्य हो तो विरेचन और वायुजन्य होता बुद्धिमान् वैद्य बस्ति का उपयोग करे । ] ससृष्ट अथात् द्वन्द्वज भौर सन्निपातजन्य ज्वरो मे दोषो के तारतम्य तथा समान अवस्था के क्रम की विवेचना करके पूर्वोक्त ओषधियो से चिकित्सा करे ॥ २८५ ॥

पृष्ठ 334

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३२० चरकसंहिता [ अ ० ३ वर्धने indi पस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा ॥ २८६ ॥

कफस्थानानुपूर्व्या वा सनिपातज्वर जयेत् । सन्निपात ज्वर मे एक एक दान का बटाना चाहिये और बढे हुए ( वृद्व-तर ओर वृद्धतम ) दान का घटावे । अथवा कफ स्थान के अनुक्रम से सनि-पात ज्वर की चिकित्सा कर | [ जैसे - कफ वृद्ध, पित्त वृद्वतर, वायु वृद्वतम हा तो मधुर देवे । अथवा कफ वृद्ध हा आर वात - पित्त दानो वृहतर हो तो भी मधुर रस देवे । मधुर रस जहा कफ का बढ़ाता है वहा वायु आर पित्त का घटाता है । यदि तीनो दाष समानावस्था मे हो ता प्रथम कफ की चिकित्सा करे । ] कफ का स्थान आमाशय है । इसलिये प्रथम स्थान का जीतना चाहिये । ( क ) अन्यत्र ज्वरो मे प्रथम वायु का फिर पित्त का और तब कफ का शमन करना चाहिये । परन्तु जीर्णज्वर मे प्रथम पित्त की चिकित्सा करनी चाहिये । नवज्वर तथा सन्निनात ज्वर से प्रथम कफ को ही शमन करना चाहिये । ( ख ) कोल्बण- सन्निपात मे युद्ध एक दाप को घटाना चाहिये और जो दात्र क्षीण हो उनकी थाड़ी वृद्धि करनी चाहिये । ( ग ) वृद्धदोष सत्रिपातो की भाति क्षीण-दोष सन्निपात भी बारह प्रकार के होते है, परन्तु इनमे दोप अपने लक्षणो को छोड देते है । जैसा कि कहा भी है, ' क्षीणा जहति स्व लिगम् । ' इस प्रकार से

पच्चीस पन्निपात होते है । इनकी चिकित्सा का सामान्य सूत्र भी कह दिया ॥ २८६ ॥

संनिपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ॥ २८७ ॥

शोथ: सजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ।

रक्तावसेचनेः शीघ्रं सर्पिष्पानैश्च तं जयेत् ॥ २८८ ॥

प्रदेहैः कफपित्तन्नर्नावनेः कवलग्रहैः ।

शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैज्वरो यस्य न शाम्यति ॥ २८६ ॥

शाखानुसारी रक्तस्य सोऽवसेकात्प्रशाम्यति ।

विसर्पेणाभिघातेन यच विस्फोटकैर्ध्वरः ॥ २६०

तत्रादौ सर्पिपः पानं कफपित्तोत्तरो न चेत् ।

दौर्बल्याद्देहधातूना ज्वरो जीर्णोऽनुवर्तते ॥ २६१

बल्यैः संबृंहणैस्तस्मादाहारैस्तमुपाचरेत् ।

कर्म साधारणं कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ २६२ ॥

आगन्तुरनुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे ॥॥।

वातप्रधानं सर्पिर्भिर्वस्तिभिः सानुवासनैः ॥ २ ९ ३ ॥

पृष्ठ 335

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अ ० ३ ] २१ चिकित्सितस्थानम् ३२१

स्निग्धोष्णैरनुपानैश्च शमयेद्विपमज्वरम् ।

विरेचनेन पयसा सर्पिपा संस्कृतेन च ॥ २६४ ॥

विषम तिक्तशीतैश्च ज्वरं पित्तोत्तरं जयेत् ।

वमन पाचनं रूक्षमन्नपानं विलङ्घनम् ॥ २६५ ॥

कषायोष्णं व विषमे ज्वरे शस्तं कफोत्तरे । सन्निपात ज्वर के अन्त मे कान की जड़ मे ( कान मे भी ) दुःखदायक शोथ उत्पन्न हो जाता है । इस रोग से काई मला ही बचता है, प्रायः करके यह रोग होता ' हे । इसके लिये जोक आदि द्वारा रक्त का मोक्षण और घृतपान शीघ्रता से ( रोग के प्रारम्भ मे ही ) करे और कफपित्त नाशक नावन ( नस्य ) और कवल देवे | ( १ ) जिस पुरुष का ज्वर शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष क्रिया से शान्त नही होता है, उस मे दोष एव ज्वर रक्त धातु मे आश्रित होता है । अतः वह ज्वर रक्त मोक्षण से शान्त हो जाता है । ( २ ) वीसर्प के कारण, चोट लगने से अथवा विस्फोटको के कारण यदि ज्वर उत्पन्न हो जाय, परन्तु कफ - पित्त प्रधान न हो तो प्रथम घृतपान करावे । ( ३ ) शरीर के धातुओ की निर्बलता से भी जीर्णज्वर बार बार लौट आता है । इसके लिये बलकारक बृहण ( पुष्टि - दायक ) आहार देवे । ( ४ ) तृतीयक और चतुर्थक ज्वर मे साधारण चिकित्सा करे । प्राय. विषम ज्वर मे आगन्तुज कारण का सम्बन्ध रहता है । [ यहा तृतीयक और चतुर्थक भी विषमज्वर ही ग्रहण किये जाते है । इसलिये भूत आदि दोष उत्पत्ति मे कारण हो तो भी साधारण चिकित्सा ही करे अर्थात् दैवव्यपाश्रय हो तो बलि - मंगल आदि रूप चिकित्सा और युक्ति - व्यपाश्रय हो तो दोषानुरूप कषाय - पान आदि चिकित्सा करनी उचित है | ( चक्र ॰ ) ] ( ५ ) वातप्रधान विषम ज्वर मे — स्निग्व उष्ण अनुपानो से घृतयुक्त अनुवासन - बस्तियो से चिकित्सा करे । ( ६ ) पित्तप्रवान ज्वर मे - विरे-चन, तिक्त, शीत द्रव्यो से संस्कृत दूध और घी से चिकित्सा करे । ( ७ ) कफ-प्रधान विषम ज्वर मे – वमन, पाचन, रूखा खानपान, लघन, कषाय और उष्ण द्रव्य देवे || २८७-२६५ ॥ १ ज्वर के आदि मे कान के मूल मे हुआ शोथ साध्य होता है, ज्वर के मथ्य मे शोथ हुआ कष्टसाध्य होता है और ज्वर के अन्त मे हुआ असाध्य होता है । कान के मूल मे पित्त एकत्र होकर शोथ उत्पन्न करता है । वह शोथ दुःसाध्य होता है, प्रायः रोगी को मार देता है ।

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३२२ चरकसहिता [ अ ० ३ योगाः पराः प्रवक्ष्यन्ते विषमज्वरनाशनाः ॥ २६६ ॥

प्रयोक्तव्या मतिमता शेषादीन् प्रविभज्य ये ।

सुरासमण्डा पानार्थे भक्ष्यार्थे चरणायुधान् ॥ २६७ ॥

तित्तिरीश्च मयूराश्च प्रयुञ्ज्याद्विषमज्वरे ।

पिबेद्वा पट्पल सर्पिरभया वा प्रयोजयेत् ॥ २६८ ॥

त्रिफलायाः कषाय वा गुडूच्या रसमेव वा ।

नीलिनीमजगन्धा च त्रिवृता कटुरोहिणीम् ॥

पिवेज्ज्वरागमे युक्त्या स्नेहस्वेदोपपादितः ।

सर्पिषो महती मात्रा पीत्वा वा छर्दयेत्पुनः ॥

उपयुज्यान्नपान वा प्रभूत पुनरुल्लिखेत् । सान्नं मद्य प्रभूत वा पीत्वा स्वायाज्ज्वरागमे

आस्थापन यापन वा कारयेद्विषमज्वरे ।

२६६ ॥

३०० ॥

॥ ३०१ || पयसा वृपदंशस्य शकृद्वा तद्हः पिबेत् ॥ २०२ ॥

वृषस्य दधिमण्डेन सुरया वा ससैन्धवम् ।

पिपल्यास्त्रिफलायाश्च दघ्नस्तस्य सर्पिषः ॥ ३०३ ॥

पञ्चगव्यस्य पयसः प्रयोगो विषमज्वरे ।

लशुनस्य प्राग्भक्तमुपसेवनम् ॥ ३०४ ॥

मेध्यानामुष्णवीर्याणामामिषाणा च भक्षणम् ।

हिङ्गुतुल्या तु वैयाघ्री वसा नस्य ससैन्धवा ॥ ३०५ ॥।

पुराणसर्पिः सिंहस्य वसा तद्वत्ससैन्धवा ।

सैन्धवं पिप्पलीना च तण्डुलाः समनःशिलाः ॥ ३०६ ॥

नेत्राञ्जनं तैलपिष्टं शस्यते विषमज्वरे ।

पलङ्कषा निम्बपत्र वचा कुष्ठ हरीतकी ॥ ३०७ ॥।

सर्षपाः सयवाः सर्पिर्धूपन ज्वरनाशनम् ।

ये धूमा धूपन यश्च नावन चाञ्जन च यत् ॥ ३०८ ॥

मनोविकारे व्याख्यातं कार्य तद्विषमज्वरे ।

नामोषधीनाच मङ्गल्याना विषस्य च ॥ ३०६ ॥

धारणाद्गदाना च सेवनान्न भवेज्ज्वरः ।

सोम सानुचरं देवं समातृगणमीश्वरम् ॥ ३१० ॥

पूजयन् प्रयतः शीघ्रं मुच्यते विषमज्वरात् ।

विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपति विभुम् ॥ ३११ ॥

पृष्ठ 337

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२३ I

स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वानपोहति ।

ब्रह्माणमश्विनाविन्द्रं हुतभक्ष हिमाचलम् ॥ ३१२ ॥

गङ्गा मरुद् गणांश्चेष्ट्या पूजयञ्जयति ज्वरान् ।

भक्त्या मातापितॄणा च गुरूणा पूजनेन च ॥ ३१३ ॥

ब्रह्मचर्येण तपसा सत्येन नियमेन च ।

जपहोमप्रदानेन वेदाना श्रवणेन च ॥ ३१४ ॥

ज्वराद्विमुच्यते शीघ्रं साधूनां दर्शनेन च ।

ज्वरे रसस्थे वमनमुपवास च कारयेत् ॥ ३१५

प्रदेह रक्तस्थे तथा सशमनानि च ।

विरेचनं सोपवासं मासमेटः स्थिते हितम् ॥ ३१६

अस्थिमज्जगते देया निरूहाः सानुवासनाः । आगे विषम ज्वर नाशक योगो को कहते है । बुद्धिमान् दोप आदि की विवेचना करके इनका प्रयोग करे ॥॥। को चाहिये कि ( १ ) विषमज्वर मे पीने के लिये मण्ड युक्त मुरा, खाने के लिये कुक्कुट का मास, तीतर, मोर देने चाहिये । अथवा गुल्म रोग मे कहे. पट्पल घृत अथवा हरड या त्रिफला का क्वाथ, अथवा गिलोय का रस पान करे । ( २ ) प्रथम स्नेहन और स्वेदन लेकर ज्वर के आक्रमण के समय नीलिनी ( नील ), अजगन्धा, निशोथ और कुटकी इनका क्वाथ पीवे । अथवा घी की प्रभूत मात्रा पीकर वमन करे या खूब खा पीकर वमन कर दे । अथवा अन्न के साथ खूब मद्य पीकर सो जावे । अथवा आस्थापन और मुस्तादि तीन बस्तिया जो कि सिद्धि स्थान मे कहेंगे उनका प्रयोग करे । ( ३ ) जिस दिन ज्वर चढता हो उस दिन बिल्ली के पुरीष को दूध के साथ पीना चाहिये । अथवा बैल के गोबर को दधिमण्ड, सुरा ओर नमक के साथ लेवे । [ ये सब वमन कराने के उपाय प्रतीत होते है । घृणित वस्तुओ से सम्भवत वमन आ जाये ] । ( ४ ) विषम ज्वर मे पिप्पली, त्रिफला, दही, छाछ, घी, पचगव्य ( दूध, घी, गोमूत्र, गोमय रस और दही या अपस्मारोक्त पचगव्य घृत ) और दूध का प्रयोग करे । ( ५ ) भोजन से पूर्व तैलयुक्त लहसुन का उपयोग करे । इसी प्रकार पवित्र या मेदुर तथा उष्णवीर्य मासो को खावे । ( ६ ) विषम ज्वर मे व्याघ्र की वसा मे हीग और सैन्धा नमक मिला कर नस्य दे । अथवा पुरातन घृत, सिंह की वसा ( चर्बी ) को सैन्धानमक के साथ मिला कर उसका नस्य देवे । ( ७ ) विषम ज्वर मे — सैन्धा नमक, पिप्पली के निस्तुत्र दाने, मनसिल इनको तेल मे पीस कर नस्य देवे । ( ८ ) गुग्गुलु, नीम के पत्ते, बच, कूठ, हरड, सरसो, जौ और

पृष्ठ 338

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३२४ चरकसंहिता [ अ ० ३ बी इनका धूप विषम ज्वर में ढेवे । उन्माद ओर अपस्मार ( हिस्टीरिया ) रोग मे जो वूम, धूप, नस्य और अजन कहे है, उन सब का विषम ज्वर मे प्रयोग करे । ( ६ ) मणि, ओषविया के ( सहदेवी, जयन्ती आदि ), लागलिक द्रव्यो के, विष के धारण करने तथा अगदो के सेवन से विषम ज्वर नही होता । ( १० ) पवित्र होकर पार्वती, नन्दी जादि अनुचरो से युक्त, सोम माहेश्वरी आदि आठ मातृकाओं से युक्त श्री शकर की पूजा करने से रोगी विषम ज्वर से मुक्त हो जाता है । ( ११ ) हजार सिर वाले, चर - अचर के स्वामी, व्यापक विष्णु की सहस्र नामो से पूजा करने पर सब प्रकार के ज्वरो से मुक्त हो जाता है । ( १२ ) ब्रह्मा, दोनों अश्वी, इन्द्र, अमि, हिमालय, गंगा, मरुद् - गण इनकी इष्टि ( यज्ञ ) द्वारा पूजा करने से ज्वर से मुक्त हो जाता हे । ( १३ ) भक्तिपूर्वक माता, पिता, गुरु की पूजा करने से, ब्रह्मचर्य से, तप सँ, सत्यव्रत से, नियमो के पालन से अर्थात् शौच, सन्तोष, ईश्वर - प्रणिधान इनके पालन से जप और होम के करने से से, सत्पुरुषो के दर्शन से रोगी ज्वर से शीघ्र मुक्त हो जाता है ( १४ ) ज्वर यदि रस मे स्थित हो तो वमन और चाहिये । रक्तस्थ होने पर सेक, शीत प्रदेह, सगमन चिकित्सा करे मे स्थित हाने पर विरेचन और उपवास करावे । अस्थि और होने पर निरूह और स्निग्ध बस्तियों का प्रयोग करे | ( चिकित्सा निरर्थक है ) ॥ २६६-३१६- ॥ तप, स्वाध्याय, , वेदा के सुनने । उपवास कराना । मास और मेद मज्जा मे आश्रित शुक्रगत ज्वर मे शापाभिचाराद् भूतानामभिषङ्गाच्च यो ज्वरः ॥ ३१७ ॥

दैवव्यपाश्रयं तत्र सर्वमौषधमिष्यते ।

अभिघातज्वरो नश्येत्पानाभ्यङ्गेन सर्पिषः ॥ ३१८ ॥

रक्तावसेकैर्मद्यैश्च सात्म्यैर्मासरसौदनैः ।

सानाहो मद्यसात्म्याना मदिरारसभोजनैः ॥ ३१६ ॥

क्षताना व्रणिताना च क्षतत्रणचिकित्सया ।

आश्वासेनेष्टलाभेन वायोः प्रशमनेन च ॥ ३२० ॥

हर्षणैश्च शमं यान्ति कामशोकभयज्वराः ।

काम्यैरथैर्मनोज्ञैश्च पित्तन्नैश्चाप्युपक्रमैः ॥ ३२१ ॥

सद्वाक्यैः शाम्यति ह्याशु ज्वरः क्रोधसमुत्थितः ।

कामात्क्रोधज्वरो नाशं क्रोधात्कामसमुद्भवः ॥ ३२२ ॥

याति ताभ्यामुभाभ्या च भयशोकसमुत्थितः ।

ज्वरकालं च वेगं च चिन्तयज्वर्यते तु यः ॥ ३२३ ॥

तस्येष्टैस्तु विचित्रैश्च विषयैर्नाशयेत्स्मृतिम् ।

पृष्ठ 339

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२५ wwwww ( १ ) शाप, अभिचार तथा भूतो के अभिपग के कारण ज्वर उत्पन्न हुआ हो तो दैव व्यपाश्रय ( बलि, मगल, होम आदि ) चिकित्सा करे । ( २ ) अभिघातजन्य ज्वर मे — घृतपान, अभ्यग, रक्त - मोक्षण, मद्य, सात्म्य मास - रस तथा ओदन ( भाजन ) देवे | यदि आनाह ( अफारा ) हो तो मद्य-सात्म्य पुरुषो मे मदिरा के साथ मास रस का भोजन देवे । ( ३ ) क्षत और व्रण के कारण हुआ ज्वर क्षत और व्रण की चिकित्सा से शान्त होता है | काम, शोक और भय से उत्पन्न ज्वर सान्त्वना देने से, इष्ट वस्तु के मिलने से, वायु के शान्त करने से और प्रसन्नता पैदा करने से नष्ट हो जाता है । ( ४ ) क्राध से उत्पन्न ज्वर वाञ्छित विषयो के, मन पसन्द बातों से, पित्त-नाक चिकित्सा से और मधुर बचनो से शीघ्र शान्त हो जाता है । ( ५ ) काम मे क्रोवजन्य ज्वर, क्रोध से कामजन्य ज्वर, काम और क्रोध मे गोकजन्य तथा भयजन्य दोनों प्रकार के ज्वर नष्ट होते है । ( ६ ) जिस पुरुष को ज्वर का समय या ज्वर के आक्रमण की चिन्ता ( विचार मात्र ) मे ज्वर चढता हो, उसके लिये अभिलषित, विचित्र ( विस्मयोत्पादक ) विषयो द्वारा उसकी ज्वर की स्मृति भुला देवे ज्वरप्रमोक्षे पुरुषः कूजन्वमति चेष्टते ॥ ३२४ ॥

वर्णः स्वन्नाडो वेपते लीयते मुहुः ।

प्रलपत्युष्णसर्वाङ्गः शीताङ्गश्च भवत्यपि ॥ ३२५ ॥

विज्ञो ज्वरवेगार्तः सक्रोध इव वीक्ष्यते ।

सदोषशब्दं च शकुद् द्रव स्रवति वेगवत् ॥ ३२६

लिङ्गान्येतानि जानीयाज्ज्वरमोक्षे विचक्षणः ।

बहुदोषस्य बलिनः प्रायेणाभिनवो ज्वरः ॥ ३२७

सत्क्रियादोपपक्तया चेद्विमुवति स दारुणम् ।

कृत्वा दोपवशाद्वेग क्रमादुपरमन्ति ये ॥ ३२८ ॥

तेपामदारुणो मोक्षो ज्वराणा चिरकारिणाम् ।

|| ३१७-३२३ ॥

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क्योंकि धातुओ को छोडते समय दोष लीन हो जाता है, इसलिये ज्वर के जाने के समय रोगी के गले ते कराहने की अव्यक्त व्वनि होती है, वमन होता है, रोगी नाना प्रकार की चेष्टाये करता है, सास तेज चलता हे, रंग बदल जाता है, पसीना आता है, कापता है, बार बार मूर्च्छित होता है, बुडबुडाता है, शरीर गरम या ठण्डा हो जाता है, सज्ञा रहित हो जाता है, ज्वर के वेग के

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३२६ चरकसंहिता [ अ ० ३ vv कारण क्रावित प्रतीत होता है, मल दाप के साथ शब्द युक्त, पतला आता है । ये लक्षण ज्वरमाक्ष के है । ये लक्षण सन्निपातज्वर के मुक्त होने पर समझे, उसमे ये लक्षण अधिक स्पष्ट होते है । जिस प्रकार बुझता हुआ दिया एक बार चमकता है, उसी प्रकार कुछ समय के लिये ये लक्षण प्रकट होते है । [ क्लम, मोह, ताप कम हाता है, मुख मे पाक होता है, इन्द्रिया तुखी रहती है, देह मे दर्द नही रहता, पसीना छूटता है, मन स्वभाव मे गति करता है, अन्न की इच्छा होती है, सिर पर खाज होती है, यह ज्वर छूटने के चिह्न है ] ( १ ) प्राय नवीन ज्वर बलवान् और बहुत दोषवाले व्यक्ति मे चिकित्सा करने पर सहसा उतर जाता है, तब अति भयानक होता है । ( २ ) जो ज्वर दोष के कारण वेग के क्रम मे वीरे वीरे उतरते है, उन चिरकालीन ज्वरा का माक्ष ( छूटना ) भयानक नही होता ॥ ३२४–३२८ ॥ विगतक्लमसतापमव्यथ विमलेन्द्रियम् ॥ ३२६ ॥

युक्तं प्रकृतिसत्त्वेन विद्यात्पुरुषमज्वरम् ।

सज्वरो ज्वरमुक्तश्च विदाहीनि गुरूणि च ॥ ३३० ॥

असात्म्यान्यन्नपानानि विरुद्धानि विवर्जयेत् ।

व्यवायमतिचेष्टाश्च स्नानमत्यशनानि च ॥ ३३१ ॥

तथा ज्वरः शम याति प्रशान्तो न च जायते ।

व्यायाम च व्यवाय च स्नानं चङ्क्रमणानि च ॥

ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् ।

असंजातबलो यस्तु ज्वरमुक्तो निषेवते ॥ ३३३ ॥

वर्ज्यमेतन्नरस्तस्य पुनरावर्तते ज्वरः ।

दुर्हृतेषु च ढोषेषु यस्य वा विनिवर्तते ॥ ३३४ ॥

स्वल्पेनाप्यपचारेण तस्य व्यावर्तते पुनः ।

चिरकालपरिक्लिष्ट दुर्बल दीनचेतसम् ॥ ३३५ ॥

अचिरेणैव कालेन स हन्ति पुनरागतः ।

अथवाऽपि परीपाक धातुष्वेव क्रमान्मलाः ॥ ३३६

यान्ति ज्वरमकुर्वन्तस्ते तथाऽप्यपकुर्वते ।

३३२ ॥

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दीनता व ग्लानि पाण्डुता नान्नकामताम् ॥ ३३७ ॥

कण्डूरुत्कोठपिडकाः कुर्वन्त्यग्नि च ते मृदुम् ।

एवमन्येऽपि च गदा व्यावर्तन्ते पुनर्गताः ॥ ३३८ ॥

अनिर्घातेन दोषाणामल्यै यहितैर्नृणाम् ।