श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 341–350

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७ निवृत्तेऽपि ज्वरे तस्माद्यथावस्थं यथाबलम् । wwIAN यथाप्राणं हरेहोषं प्रयोगर्वा शमं नयेत् ॥ ३३६ ॥।

मृदुभिः शोधनैः शुद्धिर्यापना वस्तयो हिताः ।

हिताश्च लघवो यूपा जाङ्गलामिषजा रसाः ॥ ३४० ॥

अभ्यङ्गोद्वर्तनस्नानधूपनाभ्यञ्जनानि च ।

हितानि पुनरावृत्ते ज्वरे तिक्तघृतानि च ॥ ३४१ ॥

गुर्व्यभिष्यन्द्यसात्म्याना भोजनात्पुनरागते ।

लशुनोष्णोपचारादिः क्रमः कार्यश्च पूर्ववत् ॥

किराततिक्तकं तिक्ता मुस्तं पर्पटकोऽमृता । न्नन्ति पीतानि चाभ्यासात्पुनरावर्तक ज्वरम् तस्या तस्यामवस्थाया ज्वरिताना विचक्षणः ज्वरक्रियाक्रमापेक्षी कुर्यात्तत्र चिकित्सितम् ॥

रोगराट् सर्वभूतानामन्तकृद्दारुणो ज्वरः ।

३४२ ॥

|| ३४३ ॥

।

३४४ ॥

तस्माद्विशेषतस्तम्य यतेत प्रशमं भिषक् ॥ ३४५ ॥ इति ।

( ३ ) ज्वर से मुक्त पुरुष के लक्षण – क्लम ( थकान ) और सन्ताप से रहित, व्यथा से रहित, प्रसन्न इन्द्रियों वाले, स्वाभाविक मन वाले पुरुष को ज्वर मे मुक्त समझना चाहिये । ( ४ ) वर वाले ओर ज्वर से मुक्त दानों पुरुषों को चाहिये कि विदाही, गुरु, असात्म्य अन्नपान और विरुद्ध भाजन का परित्याग कर दे । इसी प्रकार से व्यवाय ( स्त्रीसग ), अधिक चलना - फिरना, स्नान, अधिक खाना इनका भी परित्याग करे । इस प्रकार करने से स्वर शान्त हो जाता है और फिर दुबारा नही हाता । ( ५ ) ज्वर से उठे रागी जब तक बलवान् न हो तब तक व्यायाम, मैथुन, स्नान ओर घूमना - फिरना परित्याग कर देवे । ज्वर से मुक्त निर्बल व्यक्ति यदि इनका सेवन करे, तो ज्वर पुन, लौट आता है । ( ६ ) दोषों के भली प्रकार बाहर न निकलने पर जो ज्वर शान्त हो जाता है, वह थोडे से भी मिथ्या आहार - विहार से पुन आ जाता है । पुन लोट कर आया ज्वर देर से पीडित, निर्बल, कमजोरमन वाले, पुरुष को शीघ्र ही मार देता है । ( ७ ) अथवा अवशिष्ट दोप ज्वर का पुन न करके धातुओ मे धीरे धीरे पकते रहते है 1 । वे ज्वर को उत्पन्न करके अन्य हानियॉ करते है । जैसे— दीनता, गोथ, ग्लानि, पाण्डुता, भोजन मे अनिच्छा, कण्डू ( खाज ), कोठ, पिडकाये और मन्दाग्नि करते है । ( ८ ) इसी प्रकार से दोषो के सम्पूर्ण न निकलने पर जो रोग एक

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३२८ चरकसंहिता [ अ ० mw बार नष्ट हो चुकते है, वे अहिताचरण से पुन हो जाते है । ( ६ ) इसलिये ज्वर के उतर जाने पर भी अवस्था, बल और शक के अनुसार दोषो का सशोधन अथवा प्रयोगो द्वारा इनका शमन करे । इसके लिये मृदु सशोधनो से शुद्धि, मुस्तादि यापना बस्तियाँ, लघु गुणवाले यूप, जॉगल पशु पक्षियों का मास - रस हितकारी है । इसी प्रकार अभ्यग, उबटन, स्नान, धूपन, अजन और तिक्त द्रव्यो से सावित या पचतिक्त घृत ज्वर के पुन होजाने पर हितकारी है । ( १० ) जो ज्वर गुरु, अभिष्यन्दी और असात्म्य भोजन के सेवन से पुनः हुआ हो उसके लिये लघन और उष्ण उपचार आदि प्रथम कहा हुआ क्रम पूर्व की भॉ ति बरते । ( ११ ) चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्त पापड़ा और गिलोय इनका कषाय कुछ दिनो तक लगातार पीने से बार बार लौट कर आने वाला ज्वर नष्ट हो जाता है । ज्वराक्रान्त रोगी की उस उस अवस्था मे ज्वर - चिकित्सा-क्रम के अनुसार वैसी वैसी चिकित्सा कर । ज्वर रोगो का राजा है, सब प्राणियो का अन्त करने वाला है, वह कष्टदायक है । इसलिये वैद्य इसकी शान्ति मे विशेषतः प्रयत्न करे ॥३२६–३४५ ॥

तत्र श्लोकः - यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्त ज्वरचिकित्सितम् ।

अत्रिजेनाग्निवेशाय भूताना हितमिच्छता ॥ ३४६ ॥

भगवान् आत्रेय ने प्राणियो की हितकामना से अग्निवेश के प्रश्नो के क्रम से ज्वर की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है ॥ ३४६ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने तृतीयोऽव्याय समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ज्वर के सताप से रक्त - पित्त उत्पन्न होता है, इसलिये ज्वर के पीछे रक्त-पित्त की चिकित्सा के लिये इस अध्याय का अवतरण करते है । अथातो रक्तपित्तचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब हम ' रक्त - पित्त चिकित्सित ' की व्याख्या करते है भगवान् आत्रेय ने ऐसा

उपदेश किया है । १–२ ॥

पृष्ठ 343

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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् m

विहरन्तं जितात्मानं पञ्चग पुनः सुम् ।

प्रणम्योवाच निर्मोहमग्निवेशोऽग्निवर्चसम् ॥ ३ ॥

भगवन् रक्तपित्तस्य हेतुरुक्तः सलक्षणः ।

वक्त्व्यं यत्पर तस्य वक्तुमर्हसि तद् गुरो ॥ ४ ॥

गुरुरुवाच — महागद महावेगमग्निवच्छीत्रकारि च ।

हेतुलक्षणविच्छीव्रं रक्तपित्तमुपाचरेत् ॥ ५ ॥

तम्योष्ण तीक्ष्णमम्ल च कटूनि लवणानि च ।

धर्मश्वान्नविदाच हेतु: पूर्व निदर्शितः ॥ ६ ॥

तुभिः समुत्क्लिष्ट पिक्त रक्त प्रपद्यते ।

तद्योनित्वात्प्रपन्न च वर्धते तत्प्रदूपयेत् ॥ ७ ॥

तस्योष्मणा द्रवो धातुतो वातोः प्रसिच्यते ।

स्विद्यतस्तेन संवृद्धि भूयस्तदधिगच्छति ॥ ८ ॥

सयोगाद् दूपणात्तत्तु सामान्याद् गन्धवर्णयोः ।

रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीपिभिः ॥ ६ ॥

महान च यच्चैव तदधिष्ठाय वर्तते ।

स्रोतासि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम् ॥

पचगग ( पंजाब था पंचनद ) मे घूमते हुए जितेन्द्रिय, अग्नि के समान तेजस्वी पुनर्वसु को अग्निवेश ने नमस्कार कर ३२६ १० ॥ मोह से रहित, निवेदन किया-हे भगवन् | आपने प्रथम निदान - स्थान मे रक्त - पित्त के कारण और लक्षण का उपदेश किया है । इसके आगे रक्त पित्त के विषय में जो कुछ और अधिक कहना है, वह भी कृपा करके कहिये । भगवान् आत्रेय ने कहा— हेतु अ र लक्षणो को जानने वाले वैद्य का चाहिये कि अति वेग वाले, अनि के समान शीघ्र प्राणनाशक, महारोग रक्त - पित्त की चिकित्सा तुरन्त करे । इस रक्त - पित्त के कारण - उष्ण, तीक्षण, अम्ल, कटु, लवण, धर्म ( गरमी ) और अन्न का विदाह ये रक्त - पित्त के कारण निदानस्थान मे कह दिये है । इन उपरोक्त कारणो मे प्रकुपित पित्त रक्तस्थान ( यकृत् और प्लीहा ) मे पहुच जाता है । रक्त के प्रभवस्थान यकृत् और प्लीहा मे पहुच कर पित्त बढता हैं और रक्त को भी दूषित करता है । इस पित्त की उष्णिमा से मासादि धातुओं मे स्वेद होने से द्रव धातु ( रक्त ) चूने लगता है । इसी कारण से रक्तभी मात्रा मे बढ जाता है । रक्तपित्त नाम का कारण — रक्त के साथ सयुक्त होने के कारण, रक्त को

पृष्ठ 344

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३३० चरकसहिता [ अ ० ४ दूषित करने और रक्त के समान ही गन्ध और वर्ण होने से बुद्धिमान् व्यक्ति पित्त का ‘ रक्त - पित्त ' कहते है | यह रक्त प्लीहा और यकृत् का आश्रय लेकर प्रवृत्त होता है | मनुष्यों के देह मे रक्तवाही स्रोतों के मूल ये ही यकृत् और प्लीहा हे ॥ ३-१० ॥

मान्द्र सपाण्डु सस्नेह पिच्छिल च कफान्वितम् ।

श्यावारुण सफेन च ततु रूक्ष च वातिकम् ॥ ११ ॥

रक्तपित्त कपायाभ कृष्ण गोमूत्रसनिभम् ।

मेचकागार बुसाभमञ्जनाभ च पैतिकम् ॥ १२ ॥

ससृष्टलिङ्ग समर्गात् त्रिलिङ्ग सानिपातिकम् । कफ आदि दाषा के मसर्ग - पित्त में यदि कफ का भी मिश्रण हो तो रक्त का रंग पाण्डुवण, रक्त घट्ट ( गाढा, ) स्नेहयुक्त आर चिकास वाला हाता हे । यदि वायु का याग हा ता काला - लाल सा, झागयुक्ता, पतला ओर रूखा हाता है । पित्त की प्रबलता से रक्तपित्त हा ता रक्त कषाय वर्ण की झलख वाला, काला, गामूत्र के समान, मेचक ( काला, चिकना ), गृहधूम, अजन, काजल के समान काला होता है, इसमे चमक रहती है । दो दोषों के मिलने पर उन दो दोपो के लक्षण दीखते है और तीनो दोपा के मिलने पर सान्निपातिक लक्षण दीखते है । [ जिस प्रकार सब गुल्मो मे वायु की प्रधानता रहने पर अन्य दोषो के मिलने पर पित्तगुल्म आदि होते है, उसी प्रकार रक्तपित्त मे पित्त की प्रधा-नता रहने पर भी पित्त - गुल्म आदि होते है । इनमे ऊर्ध्व गति वाले रक्तपित्त मे कफ का मिश्रण और अ वागति वाले रक्तपित्त मे वायु का मिश्रण रहता है ] ॥ ११-१२- ॥ एकदोपानुगं साध्य द्विदोष याप्यमुच्यते ॥। १३ ॥

यत् त्रिदोपमसाध्यं तन्मन्दाग्नरतिवेगवत् ।

व्याधिभिः क्षोणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ १४ ॥

साध्य असाव्य — इनमे से जा रक्तपित्त एक दोष से सम्बन्धित होता है, वह साध्य है । जिस रक्तपित्त में दा दाम मिले रहते है वह याप्य है । जिसमे तीनो दोषा का योग रहता है वह असाध्य है । इसी प्रकार से मन्दाग्निवाले पुरुष एक दान वाले रक्तपित्त का वेग यदि प्रबल हो तो वह भी असाध्य है । इसी तरह रोगों के कारण निर्बल शरीरवाले व्यक्ति मे, वृद्ध पुरुष मे आहार न करने वाले व्यक्ति से एक मार्ग वाला रक्तपित्त भी असाध्य है ॥१३-१४ ॥

गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तिपित्तस्य दर्शिता ।

ऊर्ध्वा सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः ॥ १५ ॥

सप्तच्छिद्राणि शिरसि, द्वे चाधः, साध्यमूर्ध्वगम् ।

पृष्ठ 345

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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् A ^^ याप्यं त्वधोग, मागौ तु द्वावसाध्य प्रपद्यते ॥ यदा तु मर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च । वर्तते तामसया गति तस्याऽऽहुरान्तिकीम

यच्चोभयाभ्या मार्गाभ्यामतिमात्र प्रवर्तते ।

तुल्य कुणपगन्धेन रक्त कृष्णमतीव च ॥ १८ ॥

ससृष्ट कफवाताभ्या कण्ठे सज्जति चापि यत् ।

यच्चाप्युपद्रः सर्वैर्यथोक्तः समभिद्रुतम् ॥ १६

हारिद्रनीलहरितताकोणैरुपद्रतम् । ३३१ १६ ॥ ॥ १७ ॥

॥ क्षीणस्य कासमानस्य यच तत्र न सिध्यति ॥ २० ॥

यद् द्विढोपानुग यद्वा शान्त शान्त प्रकुप्यति ।

मार्गान्मार्ग चरेद्यद्वा याप्य पित्तनसृक् च तत् ॥ २१ ॥

एकमार्ग बलवतो नातिवेग नवोत्थितम् ।

रक्तपित्त सुखे काले साध्य स्यान्निरुपद्रवम् ॥ २२ ॥

रक्तपित्त की गति — निदानस्थान मे रक्तपित्त की ऊर्ध्वगति के सात द्वार ( दो कान, दो नाक, दो आखे आर एक मुख ) है । इन सात मार्गों से रक्त बाहर आता है । अवोगति के दो मार्ग है गुदा और उपस्थ । स्त्रियो मे योनि-मार्ग का अन्तर्भाव उपस्थ मे ही हो जाता है । इनमे से ऊ I गति वाला रक्तपित्त साध्य है और अधोमार्ग से जाने वाला याप्य है, और जो रक्तपित्त दोनो मार्गों से प्रवृत्त होता है वह असाध्य है । जिस समय रक्तपित्त शरीर के नौ छिद्रो से तथा रोमकूपो से जाने लगता है, तब इसकी असख्य वा आन्तिकी गति कहाती है । उस समय इसकी गति के मार्ग गिने नहीं जा सकते और रागी शीघ्र मर जाता है । जो रक्तपित्त दोनो मागो से बहुत मात्रा मे प्रवृत्त हाता है, जिस रक्तपित्त मे मुर्दे की सी बास आती है, जिसका रंग बहुत काला हाता है, जिसमे कफ और वायु का मिश्रण रहता है, जो रक्तपित्त गले से बाहर नही आता, वही रुक जाता है, निदानस्थान मे वर्णित दुर्बलता आदि उपद्रवो से युक्त, पीला, नीला, हरा, तावे के समान रंग का दीखता हो, क्षीण व्यक्ति का तथा जिसको खासी उठती हो, उसका रक्तपित्त ' ' असाव्य है । जिस रक्तपित्त मे दो दोषो का मिश्रण रहता है, अथवा जो रुक रुक कर उत्पन्न होता है, अथवा कभी ऊर्ध्व मार्ग से चले और कभी अधोमार्ग से प्रवृत्त होता हो, वह रक्तपित्त याप्य होता है । बलवान् पुरुष मे एक मार्ग से प्रवृत्त होने वाला, जो बहुत प्रबल रूप में न हो, नया ही उत्पन्न हुआ हा, साथ मे किसी प्रकार का उपद्रव न हो तो रक्तपित्त सुखकाल ( हेमन्त और शिशिर ऋतु ) मे साव्य है ।

पृष्ठ 346

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३३२ चरकसहिता [ अ ० ४ [ हेमन्त शिशिर ऋतु में उत्पन्न रक्तपित्त साव्य है, यहा पर ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का ही ग्रहण करना चाहिये ] ॥ १५-२२ ॥

स्निग्धोष्णमुष्णरूक्ष च रक्तपित्तस्य कारणम् ।

अधोगस्योत्तर प्रायः पूर्व स्यादूगस्य तु ॥ २३ ॥

ऊर्ध्वग कफससृष्टमवोग मारुतानुगम् ।

द्विमार्ग कफवाताभ्यामुभा - यासनुवव्यते ॥ २४ ॥

रक्तपित्त का कारण — ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त का मुख्य कारण स्निग्व और उष्ण आहार है, अधोगामी रक्तपित्तका कारण उष्ण और रूक्ष आहार है । इनमे ऊर्ध्व-गामी रक्तपित्त मे कफ का और जवागामी मे वायु का मिश्रण रहता है । दोना मागो से जाने वाले रक्तपित्त में कफ और वायु दोनो का ही मिश्रण रहता है || २३-२४ ॥

अक्षीणबलमासस्य रक्तपित्त यदश्नतः ।

तद्दोषदुष्टमुत्क्लिष्ट नादौ स्तम्भनमर्हति ॥ २५ ॥

गलग्रह पूतिनस्यं मूर्च्छाऽयमरुचि ज्वरम् ।

गुल्म लहानमानाह किलासं कृच्छ्रमूत्रताम् ॥ २६ ॥

कुष्ठान्यसि वीसर्प वर्णनाश भगन्दरम् ।

बुद्धीन्द्रियोपरोधं च कुर्यात्स्तम्भितमादितः ॥ २७ ॥

तस्मादुपेक्ष्यं बलिनो बलदोपविचारिणा ।

रक्तपित्त प्रथमतः प्रवृद्धं सिद्धिमिच्छता ॥ २८ ॥

चिकित्सा विधि — जिस पुरुष का बल और मास क्षीण नही हुआ ओर जो अच्छी प्रकार से खाता पीता हो, रक्त दोषो से दूपित और बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति रखता हो तो प्रारम्भ मे एकदम इसको न रोकना चाहिये । सहसा प्रारम्भ मे रोक देने से गलग्रह, पूतिनस्य, मूर्च्छा, अरुचि, ज्वर, गुल्म, प्लीहा, आनाह, किलास ( कुठभेद ), मूत्रकृच्छ्र, कुष्ठ, अर्ग, वीसर्प, विवर्णता, भगन्दर, बुद्धि और इन्द्रियो का अपने विषयो मे प्रवृत्त न होना, ये उपद्रव होते है । इसलिये बल और दोप को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि बलवान् पुरुष मे प्रथम रक्त को रोके नहीं, वढे हुए रक्त को बहने दे । जब बल घट जाये या दोष कम हो जाये तब इसको बन्द करे ॥ २५-२८ ॥

प्रायेण हि समुत्क्लिष्टमामदोषाच्छरीरिणाम् ।

वृद्धिं प्रयाति पित्तासृक्तस्मात्तल्लड घ्यमादितः ॥ २६ ॥

मार्गान्दोषानुबन्धं च निदान प्रसमीक्ष्य च ।

पृष्ठ 347

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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३३ लङ्घनं रक्तपित्तादौ तर्पणं वा प्रयोजयेत् ॥ ३० ॥

प्रायः करके पुरुषो मे आम - दोष के कारण मे ही उत्क्लेशित रक्त - पित्त वृद्धि को प्राप्त होता है, इसलिये प्रथम लघन कराना चाहिये । मार्ग, दोपो के अनुबन्ध और निदान को देखकर रक्त - पित्त मे लघन अथवा तर्पण का प्रयोग करना चाहिये । [ अर्थात् ऊर्ध्वमार्ग, साम पित्त, कफ दोष, स्निग्ध और उपभ निदान हो तो लघन करावे । अवोमार्ग, वायु, दोष और रूक्ष और उष्ण निदान हो तो सतर्पण ( भोजन जैसे – यवागू या लाजासक्तु ) देवे ] ॥ २६-३० ॥

ह्रीवेरचन्दनोशीरमुतपर्पटकैः शृतम् ।

केवलं शृतीत वा दद्यात्तोय पिपासवे ॥ ३१ ॥

ऊर्ध्वगे तर्पणं पूर्व पेया पूर्व मधोगते ।

कालसात्म्यानुबन्धज्ञो दद्यात्प्रकृतिकल्पवित् ॥ ३२ ॥

रक्तपित्त मे प्यास लगने पर, ह्रीवेर ( गन्धवाला ), लाल चन्दन, खस, नागरमोथा, पित्तपापडा इनका श्रुत कषाय ( क्वाथ ) अथवा पानी को पका कर ठण्डा करके ( औषध से द्वेप करने वाले को ) देना चाहिये । काल, सात्म्य, अनुबन्ध ( दोषो के ), प्रकृति ( गुरु लाघव आदि कल्पना ) के सस्कार का समझने वाले वैद्य को चाहिये कि ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त मे प्रथम लाजा - सत्तू से तर्पण कराये और अधोगामी रक्तपित्त मे पेया का पान करावे । यदि रागी लघन के योग्य हो तो प्रथम लघन करावे । पीछे से तर्पण या पेया दे । अयोग्य हो तो प्रथम से ही तर्पण या पेया का प्रयोग करे ॥ ३१–३२ ॥

जल खर्जूरमृद्वीकामवूकैः सपरूपकैः ।

शृतशीतं प्रयोक्तव्यं तर्पणार्थे सशर्करम् ॥ ३३ ॥

तर्पणं सघृतक्षौद्रं लाजचूर्णेः प्रयोजयेत् ।

ऊर्ध्वगं रक्तपित्तं तत् पीत काले व्यपोहति ॥ ३४ ॥

मन्दाग्नरम्लसात्म्याय तत्साम्लमपि कल्पयेत् ।

दाडिमामलकैर्विद्वानम्लार्थ चानुदापयेत् ॥ ३५ ॥

रक्तपित्त मे तर्पण – ( १ ) पिण्डखजूर, मुनक्का, महुवे का फूल, फालसा इनका २ पल लेकर, ३२ तोला पानी मे पका कर पचमाश रहने पर छान कर शर्करा मिला कर तर्पण ( प्यास बुझाने ) के लिये देवे । अथवा sa पनीय विधि से पकावे । ( २ ) लाजा ( खीलो ) के चूर्ण को घी और शहद के साथ देवे | इस तर्पण को उचित काल मे देने से ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त मिटता है । [ इसको खजूरादि क्वाथ मे घोल कर भी दे सकते है । ]

पृष्ठ 348

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३३४ चरकसहिता [ अ ० ४ I ( ३ ) जिस पुरुष की अग्नि मन्द हो और उसको अम्ल - सात्म्य अर्थात् खड्ड पदार्थ अनुकूल पडते हो तो इसका अनार या आवले से खड्डा बना कर पूर्वोक्त तर्पण दे । [ मधु, खर्जूर दाख, फालसा ओर चीनी का शरबत वा चसार के साथ खीलो के सत्तुओं के साथ मन्य वा अनार का शरबत देना चाहिये ] ॥३३-३५ ||

शालिपकिनीवार कोरदूपप्रशातिकाः ।

श्यामाकश्च प्रियङ्गुश्च भोजन रक्तपित्तिनाम् ॥ ३६

मुद्गा मसूराश्चणकाः समकुष्ठाढकी फलाः ।

प्रशस्ताः सूपयूपार्थं कल्पिता रक्तपित्तिनाम् ॥ ३७

पटोलनिम्बवेत्राग्रलक्षवेतसपल्लवाः ।

किराततिक्तकं शाकं गण्डीरः सकठिल्लकः ॥ ३८

कोविदारस्य पुष्पाणि काश्मर्याश्चाथ शाल्मलेः ।

अन्नपानविधो शाक यच्चान्यद्वक्तपित्तनुत् ॥ ३८ ॥

शाकार्थं शाकसात्म्यानां तच्छस्त रक्तपित्तिनाम् ॥।

॥

॥

स्विन्नं वा सर्पिषा भृष्टं यूपवद्वा विपाचितम् ॥ ४० ॥

पारावतान्कपोताश्च लावान् रक्ताक्षवर्तकान् ।

शशान्कपिञ्जलानेणान् हरिणान्कालपुच्छकान् ॥ ४१ ॥

रक्तपित्ते हितान्विद्याद्रसांस्तेषा प्रयोजयेत् ।

ईषदम्लाननम्लान् वा घृतभृष्टान् सशर्करान् ॥ ४२ ॥

कफानुगे यूपशाक दद्याद्वातानुगे रसम् । रक्तपित्ती का भोजन - ( १ ) रक्तपित्त के रोगी को भोजन के लिये शालि ( हेमन्त धान्य ), साठी, नीवार, कारदूष ( कोदो ), प्रशातिका, व्यामाक, प्रियगु ( कगनी ) इनका भोजन करावे । ( २ ) मूग, मसूर, चना, मोठ, आढकी ( अरहर ) इन दालो का सूप तथा यूष रक्तपित्त रोगी को दे । ( ३ ) परवल, नीम, बेत का अग्रभाग, पिलखन के पत्ते, वेतस के पत्ते, चिरायता, गण्डीर ( दो प्रकार का हे स्थलजन्य और जलजन्य, इसमे जलजन्य रामठ शाक ), कठिल्लक ( पुनर्नवा ), कोविदार ( कचनार ) के फूल, गम्भारी के फूल और सिम्बल के फूल तथा अन्नपान विधि मे जो रक्तपित्त नाशक शाक कहे हैं, उनका भी उपयोग करे । जिन पुरुषो को शाक सात्म्य ( अनुकूल ) है उनको इनका शाक देवे ।

पृष्ठ 349

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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३५ ( ४ ) कबूतर, कपोत, बटेर, रक्ताक्ष ( चकोर ), वर्त्तक, शशक, कपिञ्जल, एण, हरिण, कालपुच्छ, इनके मास को विन्न करके ( भाप से मिजाकर ) अथवा घी में भूनकर या ग्रूप के समान पकाकर ( अनार आदि के रम से खट्टा बनाकर ) मास रस देवे । ये रक्तपित्त रोग मे हिनकारी है । इनको खट्टा करके अथवा विना खड्डा वनाये घी से भूनकर शक्कर के साथ प्रयोग करे । ( ५ ) यदि रक्तपित्त में कफ का मिश्रण हो तो यूप शाक वायु का अनुबन्ध हो तो मास - रस देवे ॥३६-४२ ॥ रक्तपित्ते यवागूनामतः कल्पः प्रवक्ष्यते ॥ ४३ ॥

पद्मोत्पलाना किञ्जल्क- पुनिपणी प्रियकाः जले साध्या रसे तस्मिन् पेया स्याद्रक्तपित्तिनाम् ॥

चन्दनोशीरोधाणा रसे तद्वत्सनागरे ।

किराततिक्तकोशीरमुस्ताना तद्वदेव च ॥ ४५ ॥

धातकीधन्वयासाम्वुविल्वाना वा रमे शृताः ।

मसूरपुनिपयोंर्वा स्थिरा मुद्गरसेऽथवा ॥ ४६ ॥

रसे हरेणुकाना वा सघृते सबलारसे ।

सिद्धाः पारावतादीना रसे वा स्युः पृथक्पृथक् ॥

इत्युक्ता रक्तपित्तघ्न्यः शीताः समधुशर्कराः । देव और यदि ४४ ॥ ४७ ॥ यवाग्वः, कल्पना चैपा कार्या मासरसेष्वपि ॥ ४८ ॥

शशः सवास्तुकः शस्तो विबन्धे रक्तपित्तिनाम् ।

वातोल्बणे तित्तिरिः स्यादुदुम्वररसे शृतः ॥ ४६ ॥

मयूरः लक्षनिर्यूहे न्यग्रोधस्य च कुक्कुटः 1 से बिल्वोत्पलादीना वर्तकक्करौ हितौ ॥ ५० ॥

रक्तपित्त मे यवागू कल्प - इसके आगे रक्तपित्त रोग मे यवागुओ का कल्प कहते है-( १ ) पद्मोत्पलादि रस से साधित पेया — कमल, नीला कमल, केशर, पृश्निपर्णी, प्रियगु, इनको पडगपानीय विधि से पकाकर जलक्काथ सिद्ध करे । इस क्वाथ मे पेया वनावे । यह पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । ( २ ) चन्दनादि साधित पेया — लाल चन्दन, खस, लोध, साठ, इनके क्वाथ मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है । ( ३ ) किराततिक्तादि साधित पेया - चिरायता, मोथा और खस इनके क्वाथ मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है । ( ४ ) धात-क्यादि जल से साधित पेया - धाय के फूल, धमासा, गन्धबला और बेलगिरी इनके रस मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकर है । ( ५ ) मसूरादि जल से माधित

पृष्ठ 350

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३३६ चरकसंहिता [ अ ० ४ पेया - मसूर, पृश्निपर्णी से सिद्ध पेया अथवा ( ६ ) स्थिरा ( शालपर्णी ) ओर मूग से साधित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । ( ७ ) रेणुका के रस मे ( ८ ) वृतयुक्त वला रस मे या ( ६ ) पारावत आदि के मास - रस मे सावित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । पेया के लिये शालि, साठी, नीवार आदि धान्या का उपयाग करे | इन यवागू, पेयाओ को ठण्डा करके मधु और शर्करा से मीठा बनाकर देवे । जिस प्रकार से उपरोक्त रतो मे यवागू तैयार की जाती है, उसी प्रकार इन रमा में मास रस भी सिद्ध करके देवे । रक्तपित्त रोग में यदि विबन्ध ( कब्ज ) हा तो बथुए के साथ खरगोश का मास सिद्ध करके देवे । यदि रक्त-पित्त में वायु का जार हा तो गूलर के रस मे तीतर का मासरस सिद्ध करके देवे । मोर को पिलखन के रस में, मुर्गे को बरगद के रस मे, बेलगिरी और कमल के रस मे बर्त्तक और कुकुर के मासरस को सिद्ध करके देवे । उष्णवीर्न हा पर भी प्रतिनियत सावक द्रव्य के सयोग से ही ये वस्तुए रक्तपित्त मे हितकारी है ॥ ४३ - ५० ॥

तृष्यते तितके: सिद्ध तृष्णाघ्नं वा फलोदकम् ।

सिद्धं विदारिगन्धाद्यैरथवा श्रुतशीतलम् ॥ ५१ ॥

ज्ञात्वा दोपावनुबलौ बलमाहारमेव च ।

जल पिपासवे दद्याद्विसर्गादल्पशोऽपि वा ॥ ५२ ॥

निदानं रक्तपित्तस्य यत्किचित्सप्रकाशितम् ।

जीवितारोग्यकामैस्तन्न सव्य रक्तपित्तिभिः ॥ ५३ ॥

इत्यन्नपानं निर्दिष्टं क्रमशो रक्तपित्तिषु । रोगी को प्यास लगे तो तिक्त द्रव्यों से सिद्ध जल, तृष्णानाशक फालसा आदि फला का पाना या विदारीगन्वादि ( स्वल्प पचमूल ) गण से सिद्ध जल अथवा गरम करके ठण्डा बनाया पाना देवे । रक्तपित्त रोग मे दोष ( कफ और वायु ) को तथा रागी के बल और आहार का पहिचान कर प्यास की शान्ति के लिये यथेच्छ अथवा थोड़ा थोडा पानी देवे । यदि अनि बलवान् हा और शरीर महान् हा ता यथेच्छ पानी देवे, वैसे थोडा २ देवे । रक्तपित्त के जिन रोगियो को जीवन और आरोग्य की चाह हो, रक्तरित्त रोग के जो कारण बतलाये है वे उनका सेवन न करे, वे उनसे परहेज करते रहे । इस प्रकार रक्तपित्त रोगियों की यथाक्रम चिकित्सा कह दी है ॥ ५१-५३ ॥ वक्ष्यते बहुदोषाणां कार्य बलवता च यत् ॥ ५४ ॥

अक्षीणबलमांसस्य यस्य संतर्पणोत्थितम् ।