श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 351–360
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 351–360
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अ ० ४ ] २२ चिकित्सितस्थानम् ३३७ बहुदोप बलवतो रक्तपित्तं शरीरिणः ॥ ५५ ॥
काले सशोधनार्हस्य तद्धरेन्निरुपद्रवम् ।
विरेचनेनो भागमधोग वमनेन च ॥ ५६ ॥
त्रिवृतामभया प्राज्ञः फलान्यारग्वधस्य वा ।
त्रायमाणागवाक्ष्योवी मूलमामलकानि वा ॥ ५७
विरेचन प्रयुञ्जीत प्रभूतमधुशकरम् ।
रसः प्रशस्यते तेषा रक्तपित्ते विशेषतः ॥ ५८ ॥
वमनं मदनोन्मिश्रो मन्थः सक्षौद्रशर्करः ।
सशर्करं वा सलिलमिक्षूणा रस एव वा ॥ ५६ ॥
वत्सकस्य फलं मुस्तं मदन मधुकं मधु ।
अधोगे रक्तपित्ते तु वमनं परमुच्यते ॥ ६० ॥
ऊर्ध्वगे शुद्धकोष्ठस्य तर्पणादिक्रमो हितः ।
अधोव यवाग्वादिर्न चेत्स्यान्मारुतो बली । ६१
॥
॥
अब बलवान् ओर बहुदा वाले रोगिया की चिकित्सा कहते है । जिस रोगी का बल और मास क्षीण न हुआ हो, बलवान् हो, सन्तर्पण के कारण बहुत दोष उत्पन्न हुए हों, साथ मे कोई उपद्रव न हो तो, रोगी सशोधन के योग्य हो तो उचित समय मे सशोधन देवे । इसके लिये यदि रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी हो तो विरेचन, अधोगामी हो तो वमन देवे । विरेचन के लिये — निशाथ और हरड़, या अमलतास के फला की मज्जा, या त्रायमाण और इन्द्रायण की जड, अथवा ऑवले का प्रचुर मधु और शर्करा के साथ देवे । रक्तपित्त में विशेष कर इनको रस के रूप में, क्वाथ के रूप मे भी देना अच्छा है । वमन के लिये —मैनफल से युक्त मन्थ मे घी और शर्करा मिलाकर, पानी मे शर्करा मिलाकर अथवा गन्ने का रस, अथवा इन्द्रजौ, मोथा, मैनफल, मुल-For और मधु इनको मिलाकर वमन के लिये चटावे । अधोगामी रक्तपित्त मे यह वमन श्रेष्ठ है । ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त मे विरेचन द्वारा कोष्ठ के शुद्ध होने पर लाजा सत्तु आदि से तर्पण करना हितकारी है । अधोगामी रक्तपित्त मे यदि वायु बलवान् हो तो यवागू आदि का प्रयोग कर ॥ ५४ - ६१ ॥
बलमांसपरिक्षीणं शोकभाराध्व कर्शितम् ।
ज्वलनादित्यसंतप्तमन्यैर्वा क्षीणमामयैः ॥ ६२ ॥
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३३८ चरकसंहिता ww www
गर्भिणी स्थविर बाल रूक्षाल्पप्रमिताशनम् ।
अवम्यमविरेच्यं वा यं पश्येद्रक्तपित्तनम् ॥ ६३
शोषेण सानुबन्ध वा तस्य सामनी क्रिया ।
शस्यते रक्तपित्तस्य परं चातः प्रवक्ष्यते ॥ ६४ ॥
आटरूपकमृद्वीकापथ्याक्वाथः सशर्करः ।
मधुमिश्रः श्वासकासरक्तपित्तनिबर्हणः ॥ ६५ ॥
आटरूपकनिर्यूहे प्रियङ्ग मृत्तिकाञ्जने ।
विनीय लोध्रं क्षौद्र च रक्तपित्तहर पिबेत् ॥ ६६
पद्मक पद्मकिञ्जल्कं दूर्वा वास्तुकमुत्पलम् । [ अ ० ४ ॥ ॥ नागपुष्प च लो च तेनैव विधिना पिबेत् ॥ ६७ ॥
प्रपौण्डरीकं मधुक मधु चाश्वशसे ।
यवासभृङ्गरजसोर्मूल वा गोशकृद्रसे ॥ ६८ ॥
विनीय रक्तपित्तनं पय स्यात्तण्डुलाम्बुना ।
युक्तं वा मधुसर्पिर्ध्या लिह्याद् गोऽश्वशकृद्रसम् ॥
खदिरस्य प्रियङ्गणा कोविदारस्य शाल्मलेः ।
पुष्पचूर्णानि मधुना लिह्यान्ना रक्तपैत्तिकः ॥ ७० ॥
शृङ्गाटकाना लाजाना मुस्तखर्जूरयोरपि ।
लिह्याच्चूर्णानि मधुना पद्माना केशरस्य च ॥ ७१ ॥
धन्वजानामसृग्लिह्यान्मधुना मृगपक्षिणाम् ।
सक्षौद्र प्रथिते रक्ते लिह्यात्पारावतं शकृत् ॥ ७२
जिनका बल और मास क्षीण हो गया हो, जो शाक, भार, ६६ ॥ ॥ वा मुसाफिरी से कृश हो गये हों, आग या सूर्य की गरमी से अथवा रोगा से जो क्षीण हो गया है, गर्भवती, वृद्ध, बालक, रूक्ष, अल्प और नियमित भोजन करने वालो को, जो वमन या विरेचन के अयोग्य हो, यक्ष्मा रोग से पीडित हो तो इनकी सश-मनीं चिकित्सा करे 1 । रक्तपित्त रोगी के लिये जो सशमनी क्रिया है, उसका अब उपदेश करते है । सशमनी क्रिया - ( १ ) वासा, मुनक्का, हरड के काथ मे शर्करा और मधु मिलाकर देवें । यह श्वास, कास और रक्तपित्त का नाशक है । ( २ ) बासा के क्वाथ मे प्रियगु, मिट्टी, अजन, लोध्र [ मिळित एक कर्ष ] और शहद एक ' कर्ष मिलाकर पीवे यह रक्तपित्त नाशक है । ( ३ ) इसी प्रकार पद्माख, कमल का केशर, दूर्वा, बथुवा, नीला कमल, नाग केसर, लोध, इनका भी
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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६ क्वाथ या इनके चूर्ण को वासा के क्वाथ मे शहद डालकर पीवे । ( ४ ) बोडे की लोद के रस मे पुण्डरीक काष्ठ और मधु तथा मुलहठी मिलाकर देना चाहिये । ( ५ ) गोबर के रस मे जवासा और भागरे की जड का चूर्ण मिलाकर चावलो के धोवन के साथ पीवे । ( ६ ) खैर, प्रियगु, कचनार और सिम्बल के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटे, यह रक्तपित्त नाशक है । ( ७ ) सिंघाडा, खील, मौथा, खजूर और कमल का केशर इनको मधु के साथ चाटे । ( ८ ) जागल पशु पक्षियों के रक्त का शहद के साथ मिलाकर पीवे । यदि रक्त जमा हुआ ( घट्ट ) हो तो पारावत ( कबूतर ) की वीट को शहद के साथ चाटे ॥ ६२-७२ ॥
उशीर - कालीयक - लोध्र - पद्मक- प्रियङ्गुका कट्फल शङ्ख नगरिकाः ।
पृथक्पृथक् चन्दनतुल्यभागिकाः सशर्करास्तण्डुलधावनाप्लुताः ॥ ७३ ॥
रक्त सपित्त तमक पिपासा दाहं च पीताः शमयन्ति सद्यः । किराततिक्त क्रमुक समस्त प्रपुण्डरीकं कमलोत्पले च ७४
हीवेरमूलानि पटोलपत्र दुरालमा पर्पटको मृणालम् ।
धनञ्जयोदुम्बर- वेतसत्वड न्यग्रोध शालेय - यवासक - त्वक् ॥ ७५ ॥
तुगालतावेतसतण्डुलीयं ससारिवं मोचरसः समङ्गा ।
पृथक् पृथक् चन्दनयोजितानि तेनेव कल्पेन हितानि तत्र ॥ ७६ ॥
निशि स्थिता वा स्वरसीकृता वा कल्कीकृता वा मृदिता श्रुता वा ।
एते समस्ता गणशः पृथग्वा रक्त सपित्त शमयन्ति योगाः ॥ ७७ ॥
( ६ ) खस, कालीयक ( पीत काष्ठ ), पठानी लोव, पद्माख, प्रियगु, कायफल, शख और शोधित स्वर्ण गेरू इनको पृथक् पृथक् चन्दन के समान मिलाकर खाड के समपरिमाण मे चावलो के वोवन के साथ देवे । ( १० ) प्रत्येक वस्तु के समान भाग चन्दन मिला कर दोनो के बराबर खाड मिलाकर इनको चावला के वोवन के साथ देवे । इससे रक्तपित्त, तमक श्वास, प्यास, दाह शीघ्र शान्त होते है । ( ११ ) पुण्डरीक, कमल ( श्वेत ), नीला कमल, हीबेर ( गन्धवाला ) इनके मूल, परवल के पत्ते, दुरालभा, पित्तपापडा, मृणाल ( बिसनाल ), धनञ्जय ( अर्जुन ), गूलर, वेतस इनकी छाल, न्यग्रोध ( बरगद ), शालेय ( चालो का भेद या जामुन ), बासे की छाल, तुगा ( वशलोचन ), लता ( श्यामलता या प्रियगु ), नागकेशर, तण्डुलीय ( चावल ), सारिवा ( अनन्त मूल ), मोचरस, समगा ( लाजवन्ती ) इनको पृथक् पृथक् लेकर, चन्दन के
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३४० चरकसंहिता [ अ ० ४ साथ मिलाकर, खाड का योग देकर चावलो के वावन के साथ दे | इन औष-वियो को पृथक् पृथक् या सम्मिलित रूप मे मिलाकर शीत कषाय, क्वाथ, चूर्ण, फाण्ट, स्वरस के रूप मे प्रयोग करे, ये योग रक्तपित्त का शमन करते है || ७३–७७ ॥
मुद्गाः सलाजाः लयवाः सकृष्णाः सोशीरमुस्ताः सह चन्दनेन ।
बलाजले पर्युपितः कपायो रक्त सपित्त शमयत्युदीर्णः ॥ ७८ ॥
वैडूर्यमुक्तामणिगरिकाणा मृच्छहेमामलकोदकानाम् ।
मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छम गच्छति रक्तपित्तम् ॥ ७८ ॥
उशीरपद्मोत्पलचन्दनाना पङ्कस्य लोष्ट्रस्य च यः प्रसादः ।
सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतो रक्तातियोगप्रशमाय देयः ॥ ८० ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनलोध्रसारिवामधूकमुस्ताभयधातकीजलम् ।
समृत्प्रसाद सह षष्टिकाम्बुना सशर्कर रक्तनिबर्हण परम् ॥ ८१ ॥
( १२ ) मूग, लाजा ( खील ), जौ, पिप्पली, खस, मोथा और चन्दन इनको रात भर बला क्वाथ मे भिगो कर प्रात. पीना चाहिये । यह तीव्र रक्तपित्त का शान्त करता है । बला- क्वाथ षडगपानीय विधि से बनाये । ( १३ ) वैडूर्य ( लहसनिया ), मोती, मणि, स्वर्ण गैरिक, मिट्टी सोरठी, शख, हेम ( नागकेसर ), आवला, गन्धबाला इनके चूर्ण को पानी के साथ ( इसमे घोल कर ) लेना चाहिये । अथवा शहद के शरबत को या गन्ने के रस को पीने से रक्तपित्त शान्त होता है | ( १४ ) खस, कमल, नील कमल, लाल चन्दन इनको कूट कर रात मे पानी मे भिगो दे । प्रात. निवार कर इसमे शक्कर और मधु मिला कर दे, इसी प्रकार पके हुए मिट्टी के ढेले को तोड कर पानी मे घोल दे । इस पानी को भी मधु और शर्करा के साथ दे यह याग अति रक्तस्राव मे उपयोगी है । [ कही २ ' लो ' भी पाठ है । परन्तु अष्टाग - सग्रह मे भुनी हुई मिट्टी का पाठ है ] । ( १५ ) प्रियगु, चन्दन, लोध, अनन्तमूल, महुआ, माथा, हरड़ और धाय के फूल इनके जल को पकी हुई मिट्टी के जल के साथ मिला कर साठी चावलो के साथ खाड डाल कर पिलावे, यह रक्तपित्त का नष्ट करता है ॥ ७८-८१ ॥
कषाययोगविविधैर्यथोक्तैर्दीप्तेनले श्लेष्मणि निर्जिते च ।
यद्रक्तपित्तं प्रशमं न याति तत्रानिलः स्यादनु तत्र कार्यम् ॥ ८२ ॥
छाग पयः स्यात्प्रथम प्रयोगे गव्य शृतं पञ्चगुणे जले वा ।
सशर्कर माक्षिकसंप्रयुक्त विदारिगन्धादिगणैः शृतं वा ॥ ८३ ॥
द्राक्षातं नागरकैः शृतं वा बलामृतं गोक्षुरकैः शृत वा ।
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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४१ NAMAN ANMASAA सजीवक सर्पभक मसर्पिः पयः प्रयोज्यं सितया शृतं वा ॥ ८४ ॥
शतावरीगोअरकेः शृतं वा मृत पयो वाऽप्यथ पर्णिनीभिः ।
रक्त हिनस्त्याशु बिशेषतस्तु यन्मूत्रमार्गात्सरुजं प्रयाति ॥ ८५ ॥
विशेषतो विटपथसंप्रवृत्ते पयो हित मोचरसेन सिद्धम् ।
वटावरोहैर्बटगुङ्गकैर्वा ह्रीवेरनीलोत्पलनागरैर्वा ॥ ८६ ॥
कषाययोगान्पयसा पुरा वा पीत्वा तु चाद्यात्पयसैव शालीन् ।
कषाययोगैरथवा विपक्कमेतैः पिवेत्सपिरतिस्रुते च ' ॥ ८७ ॥
उपरोक्त इन कपाय योगो से अग्नि के दीत होने पर और कफ के क्षीण हो जाने पर भी जो रक्तपित्त शान्त नहीं होता, उसमें वायु की प्रबलता समझें । इसके लिये - ( १६ ) प्रथम बकरी का दूध दे अथवा गाय के दूध को पाच गुणे पानी मे पका कर अथग स्वल्प पचसूल ( विदारी गन्वादि गण ) से सावित गाय का दूध शर्करा और मधु के साथ दे | ( १७ ) द्राक्षा, सोंठ, बला-मूल और गोखरू इन मे से किसी एक से सिद्व गाय के दूध का अथवा जीवक, ॠभक और घी इनका उबाले दूध मे प्रक्षेप डाल कर मधु मिला कर दे । ( १८ ) शतावरी और गोखरू से साधित या मुद्गपर्णी, मात्रपर्णी, नि-पर्णा और शालपर्णी इन चारों से सावित दूध को देने से रक्तपित्त नष्ट होता हैं, खास कर मूत्र मार्ग से पीडा के साथ बहने वाला रक्तपित्त नष्ट होता है । ( १ ९ ) गुदा मार्ग से बहने वाले रक्त के लिये - मोचरस द्वारा सिद्ध दूध देवे! ( २० ) या बरगद अकुर या वटजटा से अथवा गन्धवाला, नीला कमल और सोंठ से सिद्ध दूव देना चाहिये । ( २१ ) पहिले कहे वासक आदि कपायों को दूध ' के साथ पीकर पीछे से दूध चावल खावे । ( २२ ) अथवा इन क्वाथ से घृत ' सिद्ध करके रक्त स्राव से पीवे ॥ ८२-८७ ॥
वासा सशाखा सपलाशमूला कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्य ।
प्रदाय कल्क विपचेद् घृत तत्सक्षोद्रमाश्वेव निहन्ति रक्तम् ॥ ८८ ॥
इति वासाघृतम् ।
पलाशवृन्तस्य रसेन सिद्ध तस्यैव कल्केन मधुद्रवं हि ।
लिह्याद् घृत वत्सककल्कसिद्ध तद्वत्समङ्गोत्पललोध्रसिद्धम् ॥ ८६ ॥
स्यात् त्रायमाणाविविरेष एव सोदुम्बरे चैव पटोलपत्रे ।
सर्पषि पित्तज्वरनाशनानि सर्वाणि शस्तानि च रक्तपित्ते ॥ ६० ॥
घृतपाक - ( १ ) वासा घृत - शाखा, मूल, फल और पत्तो समेत वासा १ ' रतिस्रवेच्च ' इति च पाठ ।
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३४३ चरकसहिता [ अ ० ४ को लेकर उसका क्वाथ करे । इस काथ में इसी के फल का कल्क मिला कर धृत पकावे । इस घृत को शहद के साथ मिला कर खाने से रक्तपित्त अच्छा होता है । [ कही २ ' पलाशमूल ' पाठ है । पाकविवि - गोघृत २ प्रस्थ, वासा के क्वाथ भाग ४ प्रस्थ, पानी ३२ प्रस्थ, शेप ४ प्रम्थ, कल्क ( वासा के फूल का ) ४ पल यथाविधि पाक करना चाहिये । इसमें कल्क का परिमाण एक ग्रन्थ मे चार पल है | अष्टाग - सग्रह में भी यह प्रयाग है । वहा पर टीकाकार ने चतु-ग या छठा भाग कल्क डालना लिखा है । ] ( २ ) ढाक के वृन्तो ( आगे लगे पत्ते ) के स्वरस मे इन्ही के कल्क के साथ वृत पाक करे । इस सिद्ध घृत को चतुर्थाश मधु के साथ चाटे । ( ३ ) इन्द्रजौ या कुडे के कल्क से घी सिद्ध करके, अथवा समगा ( लाजवन्ती ), नीला कमल, लाध इनसे सिद्ध घी का उपयोग करना चाहिये । इसी प्रकार त्रायमाणा के साथ, गूलर और परवल के पत्तो के साथ घृत को पकाना चाहिये । ये घृत तथा पित्त ज्वर को नाश करने वाले घृत रक्तपित्त मे उत्तम है | ८८-६० ॥
अभ्यङ्गयोगाः परिषेचनानि सेकावगाहाः शयनानि वेश्म ।
शीतो विधिर्वस्तिविधानमत्र्य पित्तज्वरे यत्प्रशमाय दृष्टम् ॥ ६१ ॥
तद्रक्तपित्ते निखिलेन कार्य काल च मात्रा च पुरा समीक्ष्य ।
सर्पिर्गुडा ये च हिताः क्षतेभ्यस्ते रक्तपित्त शमयन्ति सद्यः ॥ ६२ ॥
( १ ) पित्त ज्वर को नाश करने के लिये जो दाह ज्वरनाशक अभ्यग प्रयोग, परिषेक, अवगाहन, शमन घर तथा शीत विधि और वस्ति विधि कही है, इन सब को काल और मात्रा के अनुसार रक्तपित्त मे प्रयोग करे | उरःक्षत
अव्याय मे जो सर्पिर्गुड कहे है वे सत्र रक्तपित्त को तुरन्त अच्छा कर देते है ।
सर्पिर्गुड उर क्षत के रोगियो के लिये हितकर है ॥ ६१–६२ ॥
कफानुबन्धे रुधिरे सपित्ते कण्ठागमे स्याद् ग्रथिते प्रयोगः ।
युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य ॥ ६३ ॥
( २ ) रक्तपित्त मे यदि कफ का अनुबन्ध हो, ग्रथित होने के कारण रक्त गले मे आकर रुक जाये तब कमलनाल के क्षार को मधु और घी के साथ मिला कर युक्तिपूर्वक प्रयोग करे ॥ ६३ ॥
मृणालपद्मोत्पलकेशराणा तथा पलाशस्य तथा प्रियङ्गोः ।
तथा मधूकस्य तथाऽसनस्य क्षाराः प्रयोज्या विधिनैव तेन ॥ ६४ ॥
( ३ ) इसी प्रकार से कमलनाल, कमल का केसर, नीलोत्पल का केसर
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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४३ इनके क्षार को, ढाक को, प्रियगु के क्षार को, महुए के क्षार को, असन के क्षार को मधु और घी के साथ चटावे ॥ ६४ ॥
शतावरीदाडिमतिन्तिडीक काकोलिमेदो मधुकं विदारीम् ।
पिष्ट्वा च मूलं फलपूरकस्य घृत पचेत्क्षीर चतुर्गुणेन ॥ ६५ ॥
कासज्वरानाहविबन्धशूलं तद्रक्तपित्तं च घृतं निहन्यात् । ( ४ ) शतावरी वृत —– शतावर, अनार, इमली, काकोली, मेदा, मुलहठी, विदारीकन्द और बिजौरे की जड इनके कल्क के साथ चतुर्गुण दूध में घृत का पाक करे । यह घृत कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध, शूल और रक्तपित्त को नष्ट करता है ॥ ६५- ॥ यत्पञ्चमूलैरथ पञ्चभिर्वा सिद्ध घृत तच्च तदर्थकारि ॥ ६६ ॥
इति शतमूलादिघृतम् । ( ५ ) रसायन अन्याय में कहे पाच पन्चमूलो से सिद्ध किया हुआ घी भी कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध ओर रक्तपित्त को नष्ट करता है । इस घृत को कषाय और कल्क दोनो मे सिद्ध करे ॥ ६६ ॥
कषाययोगा य इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः । ( ६ ) जिस समय ढूपित दाप नाक से बहने वाले रक्त के साथ निकल चुके तब रक्तस्राव को राकने के लिये उपराक्त कपायों को कुट कर इनसे रस निकाल कर नासिका मे डालना चाहिये । प्रारम्भ मे रक्त का बन्द करना
अच्छा नही ।
प्राणात्प्रवृत्तं रुधिर सपित्त यदा भवेन्निःस्रुतदुष्टदोषम् ॥ ६७ ॥
रक्ते प्रदुष्टे वपोडबन्वे दुष्टप्रतिश्यायशिरोविकाराः ।
रक्त सपूयं कुणपञ्च गन्धः स्याद् ब्राणनाशः कृमयश्च दुष्टाः ॥ ८ ॥
नीलोत्पल गरिकशङ्खयुक्त सचन्दनं स्यात्तु सिताजलेन ।
नस्य तथाऽऽम्रास्थिरसः समङ्गा सधातकीमोचरसः सलोः ॥६६ ॥
( ७ ) अवपीडन द्वारा यदि आरम्भ मे ही रक्तावराव हा जाय तो दूषित दात्र के अन्दर रुक जाने से दूपित प्रतिव्याय ( पुरातन या दारुण ) और शिरो-राग उत्पन्न हा जाते हे, तथा पूय मिश्रित रक्त, मुर्दे की गन्ध ( रक्त में, नासिका मे ), गन्ध की अनभिज्ञता और दूपित कृमि उत्पन्न हा जाते है । इसी प्रकार से आम की गुठली ( गीली या पानी मे कूट कर ) का स्वरस या नीला कमल, स्वर्ण गैरिक ओर शख भस्म, श्वेत चन्दन इनके कल्क को शरबत के साथ पीस कर अवपीड़न करे । लाजवन्ती या मजीठ को धाय के फूल के साथ अथवा मोचरस और लोध को जल से पीसकर अवपीडन करे ॥ ६७-६६ ॥
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३४४ चरकसंहिता [ अ ० ४
द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्य क्षीरस्य दुर्वास्वरसस्य चैव ।
यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम् ॥ १०० ॥
प्रियालतैल मधुकं पयश्च सिद्ध घृतं माहिषमाजकं वा ।
आम्रास्थि पूर्वे: पयसा च नस्य ससारियैः स्यात्कमलोत्पलैश्च ॥१०१ ॥
निम्न वस्तुओं का नस्य देवे - ( १ ) अगूर का रस, गन्ने का रस, दूध, दूब का स्वरस, जवासे की जड का स्वरस, प्याज का रस और अनार के फूल के रस को नस्य के लिये देवे । ( २ ) पियाल के तैल को मलहठी के कल्क और दूध ' के साथ सिद्ध करके उसका नस्य देवे । ( ३ ) अथवा पियाल के तैल या मुलहठी को दूध के साथ पीस कर उसका नस्य देवे । ( ४ ) भैस या बकरी के घी को आम की गुठली के साथ, लाजवन्ती और धाय के फूल के साथ, मोच-रस और लोध के साथ, अगूर के रस, गन्ने के रस, दूध, दूब का स्वरस, जब से की जड़ का रस, प्याज का रस या अनार के फूल के रस के साथ सिद्ध करके देवे । ( ५ ) अथवा भैस या बकरी के घी को अनन्तमूल, कमल और नीलो-त्पल के फूलो के कल्क से पका कर नस्य देवे । पकाने मे सब द्रव्य घृत के समान, कल्क घी से चतुर्थाश लेवे ॥ १०० - १०१ ॥
भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपोण्डरीकं कमलोत्पले च ।
उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुक पयस्या ॥ १०२ ॥
शालीक्षुमूलानि यवासगुन्द्रामूल नलाना कुशकाशयोश्च ।
कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः ॥ १०३ ॥
मूलानि पुष्पाणि च वारिजाना प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च ।
उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कपायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे ॥ १०४ ॥
प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ ।
रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक्प्रयुञ्ज्यात् ॥ १०५ ॥
भद्रश्रिया ( श्वेत चन्दन ), लाल चन्दन, पोण्डरीक, श्वेत कमल, नीला कमल, खस, बानीर ( जलवेतस ), जल ( गन्धवाला ), मृणाल ( कमल नाल ) सहस्रवीर्या ( दूर्वा ), मुलहठी, क्षीरकाकोली, शालि मूल, गन्ने की जड, जवासे की जड, गुन्द्रा ( तृणविशेष ) की जड़, नड़ सर, कुश, कास की जड़े, कुचन्दन ( लाल चन्दन ), सरवाल, सारिवा, कालानुसारी ( तगर ), गन्धतॄण की जड़, ऋद्धि, कमलों की जड और पुष्प, और पोखर ( तालाब ) की मिट्टी का लेप, गूलर, पीपल, महुआ, लोध तथा कषाय रस वाले और शीतक वृक्ष ये सब रक्तपित्त की शान्ति के लिये प्रदेह, परिषेचन, अवगाहन, घी, तैल पाक मे प्रयोग करने चाहिये । इनसे घी आदि सिद्ध करके रक्तपित्त मे बरते ॥ १०५ ॥
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अ ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४५ V
धारागृह भूमिगृहं च शीत वनं च रम्यं जलवातशीतम् ।
वैदूर्यमुक्तामणिभाजनाना स्पर्शाच दाहे शिशिराम्बुशीताः ॥१०६ ॥
दाह की शान्ति के लिये - वारागृह ( फव्वार वाले घर ), भूमिगृह ( तहखाने ), जल और वायु से शीतल सुन्दर वन, लहसुनिया, मोती, मणि आदि से बने तथा शीतल पानी से ठण्डे किये वर्त्तनों का स्पर्श करना चाहिये इन पात्रा मे बर्फ का पानी या चन्दनोदक भर कर स्पर्श करे ॥ १०६ ॥
पत्राणि पुष्पाणि च वारिजाना क्षौम च शीत कदलीदलं च ।
प्रच्छादनार्थ शयनासनाना पद्मोत्पलाना च दलाः प्रशस्ताः ॥१०७ ॥
विस्तर और आसन पर बिछाने के लिये जल में उत्पन्न कमल आदि के पत्ते या फूल, शीतल क्षौम वस्त्र, केले के पत्ते, कमल या नीले कमल के पत्ते बिछा कर उन पर सोवे ॥ १०७ ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनरूपिताना स्पर्शा. प्रियाणा च वराङ्गनानाम् ।
दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलाना च कलापवाताः ॥ १०८ ॥
दाह मे प्रियगु, श्वेतचन्दन में लिप्त अगो वाली प्रिय वारागनाओ ( स्त्रियों ) का स्पर्श, कमल, नीले कमल का स्पर्श अथवा इनका और मोर के पत्रो से बने पखों को शीतल पानी से भिगो कर हिलाना उत्तम है ॥ १०८ ॥
सरिद्भदाना हिमवदरीणा चन्द्रोदयाना कमलाकराणाम् ।
मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्त शमयन्ति पित्तम् ॥ १० ॥
नदिया, तालाव, पर्वता की गुफाये, चन्द्रमा की किरणे, तालाबो का सेवन, मन के अनुकूल शान्ति देने वाली सब कथाये रक्तपित्त को शान्त करती है ॥ १०६ ॥
तत्र श्लोकौ - हेतुं वृद्धि संज्ञा स्थानं लिङ्ग पृथक् प्रदुष्टस्य ।
मागौ साध्यमसाध्य याप्यं कार्यक्रम चैव ॥ ११० ॥
पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च ।
गुरुरुक्तवान् यथावचिकित्सिते रक्तपित्तस्य ॥ १११ ॥
रक्तपित्त रोग के कारण, वृद्धि, सज्ञा, स्थान, लक्षण ( पृथक् पृथक् ), दानो मार्ग, साध्यता असाव्यता, याप्य, चिकित्सा क्रम, हितकर खान - पान, त्याज्य पदार्थ, सशाधन, सशमन ये सब भगवान् आत्रेय ने इस रक्तपित्त चिकित्सा मे कह दिये है ॥ ११०-१११ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने रक्तपित्तचिकित्सितनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
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३४६ चरकसहिता [ अ ० ५ पञ्चमोऽध्यायः अथातो गुल्मचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति हम्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा ' का उपदेश करते है । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजाना पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुभूतभविष्यदीयः ।
चिकित्सित गुल्मनिबर्हणार्थ प्रोवाच सिद्ध बढ़ता वरिष्ठः ॥ ३ ॥
बिट्लेष्मपित्तातिपरित्रवाद्वा तैरेव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
dindia तैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रुक्षान्नपानतिरो वितेर्वा शोकेन मिध्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोप समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफ च पित्तं च स दूपयित्वा प्रोद्भूय मार्गान्विनिबद्धच ताभ्याम् ।
हन्नाभिपाश्वोदर बस्तिशूल करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियो के लिये पिता के समान मगलकारी भूत और भविष्य के स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरीक्षित चिकित्सा का उपदेश किया । काष्ठ मे वायु के कुपित होने के कारण - ( १ ) पुरीष, कफ और पित्त इन्के अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढकर रुकावट पैदा करने से, ( ३ ) मल - मूत्र के उपस्थित वेगा को रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से, ( ५ ) अति दबाव पडने से, ( ६ ) रूक्ष, खान - पान के अति सेवन से, ( ७ ) शोक से, ( ८ ) वमन - विरचन के मिथ्याचरण से ओर ( ६ ) वित्रम चेष्टाओ से कोष्ठ मे वायु प्रकुपित हो जाता है । यह कुपित वायु कफ और पित्त को दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मांगो को रोक लेता है । इससे हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति मे शूल उत्पन्न होता है । मार्ग के रुकने से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३–६ ॥
पकाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप मे हो जाता है तब दोषानुसार इसके वात - गुल्म आदि नाम होते है । [ वात - गुल्म में वायु स्वतन्त्र और अन्य गुल्मों