श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 361–370
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 361–370
पृष्ठ 361
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४६ चरकसहिता [ अ ० ५ पञ्चमोऽध्यायः IIIII अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इत ह स्मा SSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ' गुल्म की चिकित्मा ' का उपदेश करते है । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजाना पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीशः ।
चिकित्सित गुल्मनिबर्हणार्थ प्रोवाच सिद्ध वदता वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विटइलेष्म पित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरेव वृद्धैर तिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णविहितैरधो वा बाहाभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
कक्षान्नपानरतिसेवितैर्वा शोकेन मिध्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैव विषमातिमात्रः कोष्ठे प्रकोप समुपैति वायु. ॥ ५ ॥
कफ च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धय मार्गान्विनिबद्धथ ताभ्याम् ।
इन्नाभिपाश्वोदर बस्तिशूल करोत्यधो याति न वद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियो के लिये पिता के समान मगलकारी, भूत जार भविष्य के म्वासी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरीक्षित चिकित्सा का उपदेश किया । काठ में वायु के कुपित होने के कारण - ( १ ) पुरीप, कफ और पित्त इनके अतिलाव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बटकर रुकावट पैदा करने से, ( ३ ) मल - मूत्र के उपस्थित वेगा का रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से, ( ५ ) अति दवाव पड़ने से, ( ६ ) रुक्ष, खान - पान के अति नेवन से, ( ७ ) शोक से, ( ८ ) बमन - विरचन के मिथ्याचरण से ओर ( 8 ) विषम चेष्टाआ से कोष्ठ मे वायु प्रकुपित हो जाता है । गह कुपित वायु कफ और पित्त को दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मांगो को रोक लता है । इससे हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति मे शूल उत्पन्न होता है । मार्ग के रुकने से वायु नीचे ' गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३–६ ॥
पक्काशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय मे, पित्ताशय में, कफाशय मे स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप मे हो जाता है तब दाषानुसार इसके वात- गुल्म आदि नाम होते है । [ वात- गुल्म मे वायु स्वतन्त्र और अन्य गुल्मों
पृष्ठ 362
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम ३४७ मे परतन्त्र रहता है । यही वायु जब पित्ताशय मे पित्ताश्रित होकर रहे तब पित्त- गुल्म हाता है । पक्वाशय मे स्वतन्त्र रूप से रहने पर वात- गुल्म, कफाशय मे कफ के आश्रित रहने पर कफ - गुल्म हाता है ] ॥ ७ ॥
तौ हि नाया हदि पार्श्वयोर्वा स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च ।
पञ्चात्मकस्य प्रभव तु तस्य वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सित च ॥ ८ ॥
पाच प्रकार के ( वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य सान्निपातिक और रक्त-जन्य ) गल्भा के पात्र स्थान ह । जैसे -- वस्ति, नाभि, हृदय और दोनों पार्श्व । इन पाचा प्रकार के गुल्मों का निदान, लक्षण और चिकित्सा आगे कहेंगे ॥ ८ ॥
रूक्षान्नपान विमानात्र निपेष्टित वेगविनिग्रहश्च ।
शोकोऽभिघाऽति नल जयश्च ' निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ६ ॥
यः स्थानसम्थानमजा विकल्प विड्वानसङ्ग गलवक्त्रशोषम् ।
श्यावारुणत शिशिरज्वर व कुक्षिपार्श्वासशिरोरुज च ॥ १० ॥
करोति जाणेऽभ्यधिकं प्रकोप भुक्ते मृदुत्यं समुपैति यश्च ।
वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्ष कपायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ११ ॥
वात- गुल्म के कारण – रूखा खानपान, अति अधिक विषम चेष्टाओ का करना, मल मूत्र के उपस्थित वेगा का राकना, शोक, चिन्ता, मल का अतिशय क्षीण हाना, भाजन का न करना ( उपवास ), वात - गुल्म का कारण है । वात- गुल्म के लक्षण - वात- गुल्म का कोई स्थान निश्चित नहीं रहता, कभी उवर, कभी उधर, न उसका काई आकार निश्चित होता है, कभी छोटा और कमा बड़ा, न इसम वेदना ही निश्चित रहती है, कभी अधिक वेदना होती है । जार कभी नही हातो । मल आर वायु का अवराध रहता है, गला और मुख शुष्क हो जाता है । शरीर का रंग काला - लाल हा जाता है, शीत- ज्वर सा प्रतीत होता है । हृदय, कुक्षि, पार्श्व आर कन्या में दर्द रहती है, भोजन के जीर्ण हान पर बहुत आवक बढता है, परन्तु भाजन करने पर कम हो जाता है, ये पात गुल्म के लक्षण है, इस गुल्म में कपाय, तिक्त ओर कटु रस लाभ नहा करत ॥ ६-११ ॥
कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहि रूक्षक्रोधार्तिमद्यार्कहुताशसेवा ।
आमाभिघातो रुधिर च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ १२ ॥
ज्वरः पिपासा वढनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च । १ ' ऽतिबलक्षयश्च ' इति च पाठः ।
पृष्ठ 363
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४८ चरकसंहिता [ अ ० ५ N स्वेदो विदाहो व्रणवञ्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १३ ॥
पित्त- गुल्म का कारण —–कटु, अग्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, विदाहि, रूक्ष भोजनो से, क्रोध, अति मद्य, सूर्य और अग्नि के सेवन से, आमाभिघात ( विदग्धाजीर्ण ) से और दूषित रक्त से पित्त - गुल्न उत्पन्न होता है । पित्त- गुल्म के लक्षण – ज्वर, त्यात का लगना, शरीर का लाल वर्ण, भोजन के जीर्ण होने के समय तीव्र शूल, पसीना, विदाह, व्रण के समान गुल्म मे हाथ के स्पर्श का सहन न करना ये पैतिक गुल्म के लक्षण है ॥ १२-१३ ॥
शीत गुरु स्निग्धमचेष्टन च सपूरण प्रस्वपनं दिवा च ।
गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य सर्वस्तु दुष्टो निचयात्मकस्य ॥ १४ ॥
स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसादहल्लासकासारुचिगौरवाणि ।
शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्व गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥ १५ ॥
कफ- गुल्म का कारण —— शीतल, गुरु, स्निग्ध खानपान, चेष्टा या श्रम न करना, तृप्तिपूर्वक आहार, दिन से सोना कफ गुल्म के कारण है । तीनों दोषों को दूषित करने वाले आहार विहार सान्निपातिक गुल्म को उत्पन्न करते है । कफ - गुल्म के लक्षण — स्तिमितता ( गीले वस्त्र से आच्छादित की माति अनुभव ), शीत ज्वर, अगो मे पीडा या भारीपन, वमन की इच्छा, जीमच-लना, कास, अरुचि, भारीपन, शीत प्रतीति, थाडा थाडा दर्द, गुल्म का कठिन तथा ऊपर को उठा होना ये कफजन्य गुल्म के लक्षण है ॥१४- १५ ॥
निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे द्विदोषजे दोषबलाबल च ।
व्यामिश्रलिङ्गानपरास्तु गुल्मांस्त्रीनादिशेदौपधकल्पनार्थम् ॥ १६ ॥
द्विदोषजन्य गुल्म से निदान, लक्षण ओर दाषों के बलाबल को देख कर शेष तीन द्विदाषजन्य ( वातपितज, पित्तकफज, वातकफज ) गुल्मो को ओषध-क्रिया ( चिकित्सा कार्य ) मे जानना चाहिये ॥ १६ ॥
महारुजं दाहपरीतम मवद्धनोन्नत शीघ्रविदाहि दारुणम् ।
मनःशरीराग्निबलापहारिण त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १७ ॥
सन्निपातजन्य गुल्म के लक्षण - अतिशय वेदनायुक्त, दाह से युक्त, पत्थर की भाति कठोर और उठा हुआ, शीघ्र विवाह को प्राप्त होने वाला ( शीघ्रपाकी ), मन, शरीर और अग्नि के बल को हरने वाला त्रिदोषजन्य गुल्म है, यह असाध्य है ॥ १७ ॥
ऋतावनाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च ।
संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति ॥ १८ ॥
पृष्ठ 364
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४६
यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्विरात्सशूलः समगभेलिङ्गः ।
स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः ॥ १६ ॥
रक्त - गुल्म का निदान — ऋतुकाल मे आहार न करने से, भय से ( गर्भ-स्थिति के भयमात्र से ), रूक्ष आहार - विहार से, उपस्थित वेगो के रोकने से, रात - स्तम्भक ओषधियों से, वमन के प्रयोग से,, योनि दोष के कारण स्त्रियो मे रक्तजन्य गुल्म होता है । रक्तगुल्म के लक्षण — हाथ- पाव से रहित, पिण्डित मात्र, देर मे स्पन्द करता है, गर्भ के समान ( स्तन का भारी होना आदि ) लक्षणो से युक्त रक्त-जन्य गुल्म स्त्रियों में ही हाता है । इसकी चिकित्सा दसवें मास के पीछे करनी चाहिये । उस समय वह सुखसाध्य होता है । [ रक्तगुल्म आर्त्तव दर्शन के समय मे ही होता है । वृद्धा और कुमारियो मे जिनमे आत्तंव नही होता, रक्त-गुल्म नही होता । रक्तगुल्म पुराना होने पर ही सुख साध्य होता है । वह पुराना होने पर पर्याप्त प्रमाण मे बडा हो जाता है और साथ ही स्वाभाविक गर्भाशय के आकुचन इसको बाहर करने में मदद करते है । दसवे मास में ही प्रसव क्या प्रारम्भ होता है, इसका सिवाय शरीर - धर्म के और कोई उत्तर नही है ] ॥ १८-१६ ॥
क्रियाक्रममतः सिद्धं गुल्मिनां गुल्मनाशनम् ।
प्रवक्ष्याम्यत ऊर्ध्व च योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥
रूक्षव्यायामजं गुल्म वातिकं तीव्रवेदनम् ।
बद्धविण्मारुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत् ॥ २१ ॥
भोजनाभ्यञ्जनैः पानैनिरूहैः सानुवासनैः ।
farata fruit स्वेदः कर्तव्यो गुल्मशान्तये ॥
स्रोतसा मार्दवं कृत्वा जित्वा मारुतमुल्बणम् ।
भित्त्वा विबन्धं स्निग्धस्य स्वेदो गुल्ममपोहति ॥
स्नेहपानं हित गुल्मे विशेषेणोवनाभिजे ।
पक्काशयगते बस्तिरुभयं जठराश्रये ॥ २४ ॥
२० ॥
२२ ॥
२३ ॥
गुल्म- रोगियो के लिये गुल्म को नष्ट करने वाला सिद्ध ( अनुभूत ) चिकित्सा -क्रम कहते है, उसके पीछे गुल्मनाशक योग कहेगे । वात- गुल्म की चिकित्सा – रूक्ष आहार और व्यायाम से उत्पन्न, तीव्र वेदना वाले, वायु और मल का अवरोध करने वाले वात- गुल्म की प्रथम स्नेहों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । स्नेह के भोजन, अभ्यग, पान, निरूह बस्ति और अनुवासनो द्वारा रोगी को स्निग्ध बना कर गुल्म की शान्ति के लिये रोगी
पृष्ठ 365
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५० चरकसंहिता [ अ ० ५ को स्वेद देना चाहिये । स्नेहन के पीछे दिया स्वेद खातों को नरम बना कर, तीव्र वायु को शान्त करके मल, वायु की रुकावट को तोड कर गुल्म को शान्त करता है । विशेषकर नाभि से ऊपर के गुल्म मे स्नेहपान हितकारी है । पक्वाशय के गुल्म मे बस्ति उत्तम है, जठराश्रित गुल्म से स्नेहपान और बस्ति दाना उत्तम है ॥ २०-२४ ॥
दीप्तेन वातिके गुल्मे विबन्धेऽनिलवर्चसोः ।
बृहणान्यन्नपानानि निधोष्णानि प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
पुनः पुनः स्नेहपान निरूहाः सानुवासनाः ।
प्रयोज्या वातगुल्मेषु कफपित्तानुरक्षिणा ॥ २६ ॥
वातिक गुल्म मे यदि अग्नि दीत हा और मल और वायु का विबन्ध हा ता पुष्टिदायक स्निग्ध और उष्ण खानपान प्रयोग करने चाहिये । वात- गुल्म मे कफ और पित्त की रक्षा करते हुए बार बार स्नेहपान आर निरूह तथा अनु-वासन देना चाहिये ॥ २५–२६ ॥
कफे वा जितप्राये पित्तं शोणितमेव वा ।
यदि कुप्यति वा तस्य क्रियमाणे चिकित्सिते ॥ २७ ॥
यथोल्बणस्य दोषस्य तत्र कार्य भिषग्जितम् ।
आदावन्ते च मध्ये च मारुतं परिरक्षता ॥ २८ ॥
कफ - वात के प्राय जीत चुकने पर चिकित्सा करते हुए यदि कदाचित् पित्त या रक्त कुपित हो जाये, तो प्रवृद्ध दोष के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये, परन्तु आदि, अन्त और मध्य सब समयो मे वायु की रक्षा करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥
वातगुल्मे कफो वृद्धो छत्वाऽग्निमरुचि यदि ।
हृल्लास गौरवं तन्द्रां जनयेदुल्लिखेत्तु तम् ॥ २६ ॥
वात- गुल्म मे यदि कफ बढ कर अग्नि को नष्ट करके अरुचि भारीपन, तन्द्रा आदि को उत्पन्न कर दे तो वमन द्वारा कफ को देना चाहिये ॥ २६ ॥
शूलानाहविबन्धेषु गुल्मे वातकफोल्बणे ।
वर्तयो गुलिका चूर्ण कफवातहरं हितम् ॥ ३० ॥
, जी मचलाना, बाहर निकाल वात - कफ गुल्म मे शूल, आनाह और विबन्ध होने पर कफवातनाशक
वत्तियो, गोलियो और चूर्णों का प्रयोग करे । वे बडी हितकारी हैं ॥ ३० ॥
पित्तं वा यदि संवृद्धं संतापं वातगुल्मिनः ।
पृष्ठ 366
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५१ कुर्याद्विरच्यः स भवेत्स्नेहनैरानुलोमकैः ॥ ३१ ॥
गुल्मो यद्यनिलादोना कृते सम्यग्भिपग्जिते ।
न प्रशाम्यति रक्तस्य सोऽवसेकात प्रशाम्यति ॥ ३२ ॥
वातगुल्म रोगी म यदि पित्त बढकर सन्ताप को उत्पन्न कर दे, तो अनुलामन प्रभाव वाले स्नेटो द्वारा विरचन करना चाहिये । [ इसके लिये एरण्ड का तेल देना चाहिये । ] । वात आदि दोषो की चिकित्सा भली प्रकार करने पर भी यदि गुल्म शान्त न हा ता यह समझ कर कि रक्त दूषित है, रात अथात् रक्तमोक्षण करे उससे वह शान्त हो जाता है ॥ ३१-३२ ॥
स्निग्धोष्नोदिते गुल्गे पैत्तिके स्रंसनं हितम् ।
रुक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम् ॥ ३३ ॥।
पित्त वा पित्तगुल्म वा ज्ञात्वा पक्वाशयस्थितम् ।
कालविन्निरेत्सद्यः सतिक्तैः क्षीरबस्तिभिः ॥ ३४ ॥
पयसा वा सुखोष्णेन सतिक्तेन विरचयेत् ।
भियगभिबलापेक्षी सर्पिपा तैल्वकेन वा ॥ ३५ ॥
स्निग्ध, उष्ण कारणा से उत्पन्न पेत्तिक गुल्स मे खसन ( मृदु विरेचन ) हितकारी है । रूक्ष और उष्ण कारणों से उत्पन्न गुल्म में घी का पान औपध उत्तम है | [ स्रमन के लिये – कमीले के चूर्ण को मधु के साथ, अगूर का रस और हरड़ का गुड के साथ पीना चाहिये । रुक्ष - उष्ण से उत्पन्न गुल्म के लिये —— तिक्तक घृत, वासा घृत, पचतृण मूल से साधित चाहिये | ] पित्त गुल्म या पित्त यदि पक्वाशय मे स्थित हो वाला वैद्य तिक्त द्रव्यों से साधित दूध की बस्तियो से अथवा अग्नि के बल को देखकर तिक्त द्रव्यो से युक्त अथवा तैल्वक घृत सेविरेचन देवे । [ तैल्वक घृत का
करेंगे । ] ॥ ३३-३५ ॥
तृष्णाज्वरपरीदाहशूलस्वेदाग्निमार्दवे ।
गुल्मिनामरुचौ चापि रक्तमेवावसेचयेत् ॥
घृत या दूध देना तो समय का जानने इसको शान्त करे गरम दूध पिलाकर वर्णन उदर - रोग मे ३६ ॥
छिन्नमूला विदह्यन्ते न गुल्मा यान्ति च क्षयम् ।
रक्तं हि व्यम्लता याति तच नास्ति न चास्ति रुक् ॥ ३७ ॥
तदोषं परिम्लाना जाङ्गलैस्तर्पितं रसैः ।
समाश्वस्त सशेषार्ति सर्पिरभ्यासयेत् पुनः ॥ ३८ ॥
१ ' रक्तेन संखुतेनोपशाम्यति ' इति च पाठ । २ ' सर्पिषा पुनराचरेत् ' इति च पाठः ।
पृष्ठ 367
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५२ चरकसंहिता [ अ ० ५
रक्तपित्तातिवृद्धत्वात् क्रियामनुपलभ्य च ।
यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्र तत्र भिषग्जितम् ॥ ३६ ॥
तृष्णा, अरुचि, ज्वर, दाह, स्वेद और अग्निमन्दता होनेपर गुल्म- रोगियो मे ( विदाह के पूर्वरूप होने पर ही ) रक्तमोक्षण करे । रक्तमोक्षण से जड के कट जाने पर विदाह नही होता, गुल्म नष्ट हो जाते है । चूंकि रक्त ही विदग्ब होता है, जब कारण ( रक्त ) ही नही रहेगा तो रोग भी नही रहेगा । रक्त मोक्षण के कारण मुरझाये रोगी को जागल पशु - पक्षियो के मास - रस से तर्पण करे । इसको सान्त्वना दे । शेष रोग की शान्ति के लिये बार - बार घी का सेवन करावे । रक्त ओर पित्त अति प्रवृद्धि होने से अथवा चिकित्सा के न करने से यदि गुल्म मे विदाह हो जाय तो शस्त्र - कर्म करे, यही औषध है ॥ ३६-३६ ॥
गुरुः कठिनसंस्थानो गूढमासोत्तराश्रयः ।
अविवर्णः स्थिरः स्निग्धो ह्यपको गुल्म उच्यते ॥। ४० ॥
अपक्क गुल्म के लक्षण – गुरु, कठोर आकृति वाला, गम्भीर, मास मे छिपा, त्वचा के समान वर्ण का स्थिर, स्निग्ध ( चिकना ) होता है ॥ ४० ॥
दाहशूलार्ति ' संक्षोभस्वप्ननाशारतिज्वरैः ।
विद्यमान जानीयाद् गुल्म वमुपनाहयेत् ॥ ४१ ॥
विदह्यमान गुल्म के लक्षण – दाह, शूल, पीड़ा, सक्षोभ ( कीडियो के चलने का सा अनुभव ), नीद का न आना, बेचैनी, ज्वर का होना, ये गुल्म के पकते समय के लक्षण है । इस अवस्था मे उपनाह पुल्टिम आदि बाधनी चाहिये || ४१ ॥
विदाहलक्षणे गुल्मे बहिस्तु समुन्नते ।
श्यावे सरक्तपर्यन्ते सस्पर्शे बस्तिसनिभे ॥ ४२ ॥
निपीडितोन्नते स्तब्धे सुप्ते तत्पापीडनात् ।
तत्रैव पिण्डिते शूले संपक गुल्ममादिशेत् ॥ ४३ ॥
तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ ।
वैद्याना कृतयोगानां व्यधशोधनरोपणे ॥ ४४ ॥
पक्क गुल्म के लक्षण —– गुल्म मे पक्कव्रण के लक्षण, दर्द का न होना, झुर्रियो का आ जाना, खाज आदि, गुल्म मास को छोड़कर त्वचा मे पृष्ठवर्त्ती हो जाये, उभरा हो, बीच मे से श्यामवर्ण, किनारो से लाल, स्पर्श मे बस्ति के समान ( एक ओर से दबाने पर तरग दूसरी ओर अनुभव होती हो ), दत्राने से दब जाये, परन्तु दबाव हटाने पर फिर उठ जाये, सुप्त ( बढे नही ), पार्श्व १ ' शूलानि ' इति च पाठः । २ ' समुपना - ' इति च पाठः ।
पृष्ठ 368
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] २३ चिकित्सितस्थानम् ३५३ के दबाने पर भी स्तब्ध रहे, गुल्मस्थान मे ही सम्पूर्ण शूल एकत्र हो जाये तब गुल्म को पका समझना चाहिये । गुल्म के पक जाने पर जिन वैद्यो ने • व्यधन, शोधन और रोपण काया मे अभ्यास किया हो, वे ही वान्वन्तरीय वैद्य शस्त्र - कर्म करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥
अन्तर्भागस्य चाप्येतत्पन्यमानस्य लक्षणम् ।
हृत्क्रोडशूनताऽन्तःस्थे बहिःस्थे पार्श्वनिर्गतिः ॥ ४५ ॥
पक्कः स्रोतासि संक्लिद्य व्रजत्यूर्ध्व मधोऽपि वा ।
स्वयं प्रवृत्तं त दोपमुपेक्षेत हिताशनैः ॥ ४६ ॥।
दशाहं द्वादशाह वा रक्षन्भिषगुपद्रवान् । गुल्म के दो मार्ग हैं | यदि गुल्म पक कर अन्दर को मुख करता है तो ' अन्तःस्थ ' और बाहर की आर मुख करता है, तो ' बहिःस्थ ' होता है अन्तःस्थ भाग वाले गुल्म के पकने पर भी उपरोक्त लक्षण हाते है, साथ ही हृदय और क्राड़ ( कुक्षि और उदर ) मे शूनता ( सूजन ) आती है । बहि • स्थिति मे सूजन पाव की आर आ जाती है । गुल्म पक कर खातो का क्लिन्न बना कर ऊपर वमन द्वारा अथवा नीचे की आर मल के साथ प्रवृत्त होता है । अपने आप प्रवृत्त हुए दोष की पथ्याहार द्वारा दस या बारह दिनो तक उपद्रवो से रक्षा करते हुए उपेक्षा करनी चाहिये, दाषो को बहने देना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ अत ऊर्ध्व हित पानं सर्पिपः सविशोधनम् ॥ ४७ ॥
शुद्धस्य तिक्तं सक्षौद्रं प्रयोगे सर्पिरिष्यते ।
अन्तर्विद्रधिवच्चास्य कार्ये शोधनरोपणे ' ॥ ४८ ॥
इसके पश्चात् विशाधनयुक्त द्रव्यो से साधित घृत का पान करावे । पूय आदि का शोधन हो जाने पर तिक्त द्रव्यो से साधित घृत को मधु के साथ देवे पीछे से अन्तर्विद्राध के समान शोवन और रोपण कार्य करे ॥ ४७-४८ ॥
शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे जाते कफात्मके ।
अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लघनमादितः ॥ ४६ ॥
मन्दोऽग्निर्वेदना मन्दा गुरुस्तिमितकोष्ठता ।
सात्क्लेशा चारुचिर्यस्य स गुल्मी वमनोपगः ॥ ५० ॥
उष्णैरेवोपचर्यश्च कृते वमनलघने ।
योज्याश्चाहारसंसर्गा भेषजैः कटुतिक्तकैः ॥ ५१ ॥
सानाहं सविबन्धं च गुल्मं कठिनमुन्नतम् । १ ' शुद्ध सतिक्त ' इति च पाठः । २ इद श्लोका कचिन्नास्ति ।
पृष्ठ 369
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५४ चरकसंहिता [ अ ० ५ www I दृष्ट्वाऽऽदौ स्वेदयेद्युक्त्या स्विन्न च विलये ' I द्भिषक् ॥ ५२ ॥
कफजन्य गुल्म यदि शीतल, गुरु, स्निग्ध आहारों के कारण उत्पन्न हुआ हो और रोगी वमन के अयोग्य तथा मन्दाग्निवाला हो तो प्रथम लघन करावे । वमन योग्य - जिसकी अग्नि मन्द हो, वेदना भी कम हो, कोष्ठ भारी और जकडा हो, वमन की अभिरुचि ( प्रवृत्ति ) होती हो अरुचि रहती हो तो गुल्म रोगी को वमन के योग्य समझे । वमन और लघन हो चुकने पर रोगी की उष्ण परिचर्या करे । कटु और तिक्त ओषधियो से सिद्ध आहार करावे । यदि गुल्म मे आनाह, मल, वायु का विबन्ध हो और गुल्म कठिन तथा ऊपर को उठा हुआ हो तो प्रथम स्वेदन दे शून्य होनेपर अगुली आदि से दबा कर या मर्दन कर इसको विलीन करे ॥ ४६-५२ ॥
लङ्घनोल्लेखने स्वेदे कृतेऽनां सप्रधुक्षिते ।
कफगुल्मे पिबेत्काले सक्षारकटुक घृतम् ॥ ५३
स्थानादपसृतं ज्ञात्वा कफगुल्मं विरेचनैः ।
सस्नेहैर्बस्तिभिर्वाऽपि शोधयेद्दशमूलकैः ॥ ५४ ॥
वृद्धेऽमावनिले मूढे ज्ञात्वा सस्नेहमाशयम् ।
गुटिकावर्णनिर्यूहाः प्रयोज्याः कफगुल्मिनाम् ॥
॥
५५ ॥
कफ गुल्म मे — लघन से, वमन से, स्वेदन से अग्नि को प्रदीप्त करने पर भोजन - काल मे क्षार और कटु - द्रव्या से युक्त घृत पिलावे । यदि कफ - गुल्म अपने स्थान से चलायमान हो जाये तो विरेचन द्वारा अथवा स्नेह युक्त दश-मूल की बस्तियो से सशोधन कर । अनि के प्रवृद्ध होने पर, वायु के अनुलोम होने पर, आमाशय ( कोष्ठ ) को स्निग्ध हुआ समझ कर, कफ - गुल्म रोगी को गुटिका, चूर्ण और क्वाथो का सेवन करावे ॥ ५३-५५ ॥
कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम् ।
जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ॥ ५६
दोषः प्रकृतिगुल्मं तु योगं बुद्ध्वा कफोल्बणे ।
बलदोषप्रमाणज्ञः क्षार गुल्मे प्रयोजयेत् ॥ ५७ ॥
एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः ।
शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ॥ ५८ ॥
श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मासक्षीरघृताशिनः ॥।
भित्त्वा भित्त्वाऽऽशयात्क्षारः क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ॥ ५६ ॥
१ ' विनयेद् ' इति । २ ' मन्दाग्नावनिले मूढे ' इति च । ३. ' ऽऽशयान् चार ' इति च पाठः ।
पृष्ठ 370
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५५ कफजन्य गुल्म यदि जड़ बनाले, बहुत अधिक फैला हो, कठिन हो, जड हो और गुरु हो तो क्षार, अरिष्ट - पान और अग्नि - कर्म द्वारा शान्त करे । कफजन्य गुल्म मे दोष ( कफ दोष ), प्रकृति ( रोगी की कफ प्रकृति ), गुल्म ( स्थिर, महावास्तु आदि लक्षणो से युक्त ), ऋतु ( वसन्त या हेमन्त ) के अनुसार रोगी के बल, दोष के प्रमाण को समझने वाला वैद्य क्षार का प्रयोग करे । शरीर के बल, दोपो की वृद्धि तथा क्षय को समझने वाला वैद्य एक दिन, दो दिन या तीन दिन की बाधा देकर पुन. दूसरी बार क्षार का प्रयोग करे । मास, दूध, घी को खानेवाले पुरुष के मधुर और स्निग्ध कफ तोड़ कर क्षार नीचे की ओर क्षरित करते है । क्योकि क्षार की
करने की है । ५६-५६ ॥
मन्देऽग्नावरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमश्नताम् ।
प्रयोज्या मार्गशुद्वयर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ॥
लघनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पाने विरेचनैः ।
बस्तिभिर्गुलिकाचूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ॥ ६१ ॥
ऋष्मिकः कृतमूलत्वाद्यस्य गुल्मो न शाम्यति ।
तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ॥ ६२ ॥
औष्ण्यात्तैक्ष्ण्याच शमयेदग्निगुल्मे कफानिलो ।
तयोः शमाच्च सघातो गुल्मस्य विनिवर्तते ॥ ६३
दा धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिपजां बलम् ।
क्षारप्रयोगे भिषजा क्षारतन्त्रविदा बलम् ॥ ६४
व्यामिश्रदौपैर्व्यामिश्र एप एव क्रियाक्रमः । को कोष्ठ से तोड़-प्रकृति ही क्षरण ६० ॥ ॥ ॥ अरिष्ट प्रयोग के काल – जो रोगी स्निग्ध आहार करते हों, अनि मन्द हो, अरुचि हो और उनको मंत्र का सात्म्य हो तो मार्ग की शुद्धि के लिये अरिष्टो का प्रयोग करे । लघन से, वमन से, स्वेदन से, घृतपान से, विरेचन से, बस्तियो से, गुटिका, चूर्ण, क्षार और अरिष्ट के प्रयोगो से भी कफजन्य गुल्म, जड़ पकड़ लेने के कारण शान्त नही होना, उस गुल्म को रक्तमोक्षण करने पर शरलोह ( बाण का लोह ) आदि से दाह करे । गुल्म मे अनि उष्ण होने से, तीक्ष्ण गुण होने से कफ ओर वायु दोनो को शान्त कर देती है । इन दोनो के शान्त होने पर गल्म का सघात ( एकत्र होना ) भी टूट जाता है । इस दाह - कर्म के प्रयोग मे भी धान्वन्तरीय शस्त्र - चिकित्सको का ही अधिकार है, क्षार - प्रयोग मे क्षार - तन्त्र को जानने वालो से कर्म करावे । मिश्रित दोषो मे दोषों की मिश्रित चिकित्सा करे ॥ ६० - ६४ ॥