श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 371–380
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 371–380
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३५६ चरकसंहिता [ अ ० ५ VAAVAA w सिद्धानतः प्रवक्ष्यामि योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ ६५ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाधान्यबिडङ्गचव्यचित्रकैः ।
कल्कीकृतैर्धृतं सिद्ध सक्षीरं वातगुल्मनुत् ॥ ६६ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतम् । इसके आगे गुल्मनाशक सिद्ध प्रयोगो का वर्णन करते है । ( १ ) त्र्यूषणादि धृत - सोठ, कालीमिर्च, पिप्पली, हरड, बहेड़ा, आवला, धनिया, वायविडंग, चविका, चीतामूल इनके कल्क से और दूध द्वारा साधित
घृत वात- गुल्म को नष्ट करता है । [ मात्रा आधा तोला ] ॥ ६५–६६ ॥
एत एव च कल्काः स्युः कषायः पाञ्चमूलिकः ।
द्विपञ्चमूलिको वाऽपि तद् घृत गुरुमनुत्परम् ॥ ६७ ॥
इति ध्यूपणादिघृतमपरम् । ( २ ) त्र्यूषणादि घृत —–— काली मरिच आदि वस्तुआ के कल्क के साथ बृहत्पचमूल क्वाथ मे घृत सिद्ध करे । अथवा पचमूल के स्थान पर दशमूल का क्वाथ लेकर इन्ही कल्को से ( त्र्यूषणादि ) घृत सिद्ध करे । [ घृत २ प्रस्थ, क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्क १ शराव हो ] यह घृत गुल्मनाशक है ॥ ६७ ॥
षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ।
प्रसन्नया वा क्षीरोत्थ सुरया दाडिमेन वा ॥ ६८ ॥
दध्नः सरेण वा कार्य घृत मारुतगुल्मनुत् ' ।
इति गुल्मषट्पलघृतम् ॥
( ३ ) गुल्मषट्पल घृत —— राजयक्ष्मा मे कहे ' षट् पल ' घृत का पान करावे । दूध से निकले घी को प्रसन्ना ( सुरा के ऊपर के स्वच्छ भाग ) के साथ, सुरा से, अनार के रस से, दही की मलाई के साथ ले । यह वृत वात- गुल्म को नष्ट करता है । [ प्रसन्ना आदि को दूध के साथ मिला कर मथने से घृत को पृथक् करके बरते यह श्री गंगाधरसेन का मत है । ] ॥६८ ॥
हिडुसोवर्चलाजाजीबिडदाडिमदीप्यकैः ॥ ६६ ॥
पुष्करव्योषधान्याम्लवेतसक्षारचित्रकैः ।
शटीवचाजगन्धैलासुरसैश्च विपाचितम् ॥ ७० ॥।
शूलानाहहरं सर्पिर्दध्ना चानिलगुल्मिनाम् । इति हिंगुसौवर्चलाद्यं घृतम् । ( ४ ) हिंगुसौवर्चलादि वृत - हीग, सौचर नमक, अजाजी ( जीरा ), विडनमक ( काला नमक ), अनारदाना, अजवायन, पोहकरमूल, त्रिकटु, १ ' मारुतगुल्मिनाम् ' इति वा पाठ: । २ ' धान्याक ' इति च पाठः ।
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५७ VV ww www AA धनिया, अम्लवेतस, यवक्षार, चीता, कचूर, वचा, अजगन्धा, छोटी इलायची, तुलसी, इनका कल्क मिलित १ शराव, दही ८ प्रस्थ और घृत २ प्रस्थ लेकर यथाविधि पाक करना चाहिये । यह घृत वात- गुल्म रोगियों के शूल और आनाह को नष्ट करता है ॥ ६६-७०- ॥ बुषाव्योपपृथ्वीकाचव्यचित्रकसन्धवैः ॥ ७१ ॥
साजाजीपिप्पलीमूलदीप्यकैर्विपचेद् घृतम् ।
मातुलुङ्गदधिक्षीरकोलमूलकदाडिमैः ॥ ७२ ॥
रसैस्तद्वातगुल्मघ्न शूलानाहविमोक्षणम् ।
योन्यग्रहणोदोपश्वासकासारुचिज्वरान् ॥ ७३
बस्ति - हृत्पार्श्वशूल च घृतमेतद् व्यपोहति ।
इति बुषाद्य घृतम् ॥
( ५ ) हा घृत — बुपा ( हाऊबेर ), त्रिकटु मिर्च, पिप्पली ), पृथ्वीका ( हिगुपत्री या मोटा जीरा ), सैन्धव नमक, अजाजी ( जीरा ), पिप्पली मूल, अजवायन कल्क १ शराव, बिजारे का रस, दधि, दूध, बेर का क्वाथ, ओर अनार का रस प्रत्येक २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ इन से ॥ ( सोठ, काली चविका, चीता, मिलित इनका मूली का क्वाथ घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत वात - गुल्म को नष्ट करता है, शूल, आनाह को मिटाता है । योनिरोग, अर्श, ग्रहणी, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, बस्तिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल को यह घृत नष्ट करता है ॥ ७१-७३ ॥ पिपल्याः १ पिचुरध्यर्द्धा दाडिमाद् द्विपलं पलम् ॥ ७४ ॥
धान्यात्पञ्च घृताच्छ्रुण्ठ्याः कर्षः क्षीरं चतुर्गुणम् । सिद्धमेतैर्वृतं सद्यो वातगुल्म चिकित्सति ॥ ७५ I योनिशूलं शिरःशूलमर्शामि विषमज्वरम् ।
इति पिप्पल्याद्यं घृतम् ।
घृतानामौपधगणा य एते परिकीर्तिताः ॥ ७४ ॥
ते चूर्णयोगा वर्त्यस्ताः कपायास्ते च गुल्मिनाम् । ( ६ ) पिप्पल्या घृत - घी ५ पल, गाय का दूध २० पल, पिप्पली १ || पित्रु, अनारदाना २ पल, धनिया १ पल, सोठ १ कर्प इनसे सिद्ध घृत वात- गुल्म, योनिशूल, शिरोवेदना, अर्श और विषम ज्वर को नष्ट करता है । [ चक्रदत्त मे इस घृत का नाम ' पचपल घृत ' दिया है । अष्टागसग्रह मे— १ ' पिप्पल्यः पिचु ' इति च । २ गंगाधर सेन ने ' प्रस्थ घृतात् ' पाठ माना है ।
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३५८ चरकसंहिता [ अ ०५ WA शुण्ठी १ पल, पिप्पली १ || पल, धान्य १ कुडव, दाडिम २ कुडव, घृत २० पल और दूध एक साथ पकावे ] | घृतसाधन के लिये जिन आषधियो के गुण कहे है, उनका चूर्ण, वत्ति और कषाय के रूप मे भी प्रयोग करे ॥ ७४-७६ ॥ कोलदाडिमघर्माम्बुसुरामण्डाम्लकाखिकैः ॥ ७७
शूलानाहनुदः पेया बीजपूररसेन वा ।
चूर्णानि मातुलुङ्गस्य भावितानि रसेन वा ॥ ७८
कुर्याद्वर्तीः सगुडिका गुल्मानाहातिशान्तये । इन औषधि गणो के चूणो को बेर का रस, अनार का सुरा, मण्ड, खट्टी काजी या बिजौरे के रस के साथ पीवे । गुल्म रोगियो पर ॥ ॥ रस, गरम पानी, इससे शूल और आनाह नष्ट होते है । उपरोक्त चूणों को बिजोरे के रस से भावना देकर बत्तिया और गुटिकाये बनावे | ये वर्त्तिया गुल्म और आनाह नष्ट करती है || ७७-७८ ॥ हिगु त्रिकटुकं पाठा हबुषामभया शटीम् ॥ ७६ ॥
अजमोदाजगन्धे च तिन्तिडीकाम्लवेतसो ।
दाडिमं पुष्करं धान्यमजाजी चित्रकं वचाम् ॥
द्वौ क्षारौ लवणे द्वे च चव्य चैकत्र चूर्णयेत् ।
चूर्णमेतत्प्रयोक्तव्यमनुपानेष्वनत्ययम् ॥ ८१ ॥
प्राग्भक्तमथवा पेयं मद्येनोष्णोदकेन वा ।
पार्श्वहृद् - बस्तिशूलेषु गुल्मे वातकफात्मके ॥ ८२
आनाहे मूत्रकृच्छ्रे च शूले च गुद्योनिजे । ( अफारा ) को ८० ॥ ॥ ग्रहण्यर्शोविकारेषु सीहि पाण्ड्वामयेऽरुचौ ॥ ८३ ॥
उरोविबन्धे कासे च हिक्काश्वासे गलग्रहे । ( ७ ) हिग्वादि चूर्ण— हीग, त्रिकटु, पाठा, हाऊबेर, हरड़, कचूर, अजवायन, अजगन्धा ( अजवायन का भेद ), तिन्तिडीक ( इसली ), अम्ल-वेतस, अनारदाना, पोहकरमूल, धनिया, श्वेत जीरा, चीता, वच, यवक्षार, सर्जिक्षार, सेन्धा नमक, सचलनमक और चविका इनको समान भाग मे लेकर चूर्ण करना चाहिये । [ मात्रा १ मासे से ३ मासे तक । ] इस चूर्ण को भोजन से पूर्व [ यदि पेट मे अम्ल अधिक हो तो ] मद्य या गरम पानी से पीवे । भोजन के तत्काल पीछे [ यदि क्षार अधिक हो तो ] उष्ण जल या तक्र से ले । यह चूर्ण पार्श्वशूल, बस्तिशूल, कफजन्य और वातजन्य
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५६ ^^ ~ ^^ गुल्म, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, गुदाशूल, योनिशूल, ग्रहणी, अर्शरोग, प्लीहा, पाण्डु रोग, अरुचि, छाती मे रुकावट ( कफावरोध - ), कास, हिचकी, श्वास और गलग्रह मे उपयागी हे । [ चिकित्सा - कलिका मे पिप्पली मूल और वि s नमक का भी मिश्रित किया है । अन्त प्रयोगो मे अजमोदा से मानिका ( अजवायन ) लेनी चाहिये । बाह्य प्रयोग मे अजमोदा से अजमोद
लेनी चाहिये । ] ॥ ७६–८३ ॥
भावित मातुलुङ्गस्य चूर्णमेतद्रसेन वा ॥ ८४ ॥
बहुशो गुडिकाः कार्याः कार्मुकाः स्युस्ततोऽधिकम् ।
इति हिग्वादिचूर्णं गुडिका च ।
मातुलुङ्गरसो हिगु दाडिमं विडसेन्धवे ॥ ८५ ॥
सुरामण्डेन पातव्य वातगुल्मरुजापहम् । ( ८ ) हिग्वादि गुटिका -- - इस हिग्वादि चूर्ण का बिजोरेके रस से [ सात बार या जब तक चूर्ण खट्टा न हो जाय तत्र तक ] भावना देकर गोलिया बनावे । च गाया चूर्ण से आवक काम करती है । ( ६ ) वात- गुल्म की पीड़ा को शान्त करने क लिने विजोर का रस, हींग, अनारदाना और बिड नमक इनको सुरा मण्ड के साथ पावे ॥ ८४-८५ ॥ टीपुष्करग्विम्लवेतसक्षारचित्रकान् ॥ ८६ ॥
धन्याकं च यवानी च विडग सैन्धव बचाम् ।
सचव्यपिपलीमूलमजगन्धा सदाडिमाम् ॥ ८७
अजाजी चाजमोदां च चूर्ण कृत्वा प्रयोजयेत् ।
रसेन मातुलुङ्गस्य मधुयुक्तेन वा पुनः ॥ ८८ ॥
भावित गुडिका कृत्वा सुपिष्टा कोलसंमिताम् ।
॥
गुल्म मीहानमानाह श्वासं कासमरोचकम् ॥ ८६ ॥
raj traffe fa विधा शिरसो रुजाम् ।
पाण्ड्वामयं कफोल्लोश सर्वजा च प्रवाहिकाम् ॥ ६० ॥
पार्श्वस्तिशूल च गुटिकैपा व्यपोहति । ( १० ) शट्यादि वटी - कचूर, पुष्करमूल, हींग, अम्लवेतस, चीता, यवाखार, धनिया, अजवायन, वायविडंग, सेन्धा नमक, वच, चविका, पिप्पली-मूल, अजगन्धा, अनारदाना, जीरा, अजमोदा [ वन - यमानी ], इनके चूर्ण को बिजौरे के रस की अथवा मधु शुक्त की भावना देकर बेर के समान आकार की गोलिया बना लेनी चाहियें । यह गुल्म, प्लीहा, आनाह, श्वास, कास,
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३६० चरकसहिता [ अ ० ५ www ~ अरुचि, हिचकी, हृदय रोग, अर्श नाना प्रकार की शिरोवेदना, पाण्डु - रोग, कफ का उत्क्लेश [ जी मचलाना ], त्रिदोषजन्य प्रवाहिका, पार्श्व - शूल, हृदयशूल, बस्तिशूल को नष्ट करता है । [ मधु शुक्त बनाने के लिये जम्बीर ( नीम्बू ) का रस और पिप्पली - मूल की कल्क डाल
देना चाहिये । ] ॥ ८६-६०– ॥
नागरार्धपलं पिष्ट्रा द्वे पले लुलितस्य च ॥ ६१ ॥
तिलस्यैकं गुडपलं क्षीरेणोष्णेन वा पिबेत् ।
वातगुल्ममुदावर्त योनिशूलं च नाशयेत् ॥ ६२ ॥
पिवेदेरण्डतैलं वा वारुणीमण्डमिश्रितम् ।
तदेव तैलं पयसा वातगुल्मी पिवेन्नरः ॥ ६३ ॥
मण्यनुबले पूर्व हितं पित्तानुगे परम् । मधु के बर्त्तन मे कर सन्धान कर ( ११ ) नागरादि योग - सोठ आधा पल ( ३ कर्प ), साफ किये तिल २ पल, गुड़ एक पल इनको कूट कर मात्रा मे गरम दूध से पीना चाहिये । यह वात- गुल्म, उदावर्त्त और योनिरोग को नष्ट करता है । अथवा एरण्ड तैल को वारुणी - मण्ड मे मिलाकर पीवे । इससे वातगुल्म का आराम होता है । जब कफ का अनुबन्ध हो तो पूर्वयोग और पित्त का अनुबन्ध हो तो पिछला योग बरते ॥ ६१-६३ ॥ साधयेत् शुद्धशुष्कस्य लशुनस्य चतुष्पलम् ॥ ६४ ॥
क्षीरे जलाष्टगुणिते क्षीरशेषं च ना पिवेत् ।
वातगुल्ममुदावर्त गृध्रसी विषमज्वरम् ॥ ६५ ॥
हृद्रोग विद्रधिं शोथ सावयत्याशु तत्पयः । इति लशुनक्षीरम् । ( १२ ) लशुन - क्षीर - सूखे और छिलके उतार कर साफ किये लशुन की गिरिया ४ पल लेकर इनको जल मिश्रित आठ गुने दूध ( ३२ पल ) मे सिद्ध करे, केवल दूध रह जाने पर इसको पीवे । इससे वातगुल्म, उदावर्त्त गृध्रसी, विषम ज्वर, हृदय रोग, विद्रधि और शोथ शीघ्र शान्त होते है । [ यद्यपि दूध और लशुन विरोधी है, परन्तु तो भी रोग की महत्ता के कारण तथा आर्ष शास्त्र
के प्रयोगवश उपयोग करना चाहिये । ] ॥ ६४–६५ ॥
तैलं प्रसन्ना गोमूत्र मारनालं यवाग्रजम् ॥ १६ ॥
१, ' पिबेदैरण्डक तैल ' इति वा । २, ' सिद्धशुष्कस्य ' इति च पाठः ॥
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६१ गुल्मं जठरमानाहं पीतमेकत्र साधयेत् । इति तैलपञ्चकम् । ( १३ ) तैल - पचक – एरण्ड तैल, प्रसन्ना, गोमूत्र, काजी और यवक्षार
इनको उचित माना में पीने से गुल्म, जठर और आनाह रोग नष्ट होते है ।
पञ्चमूलीकपायेण सक्षीरेण शिलाजतु ॥ ६७ ॥
पिवेत्तस्य प्रयोगेण वातगुल्मात्प्रमुच्यते । इति शिलाजतुप्रयोगः । ( १४ ) शिलाजतु प्रयोग - पचमूल काथ मे दूध मिलाकर इसके साथ शिलाजतुका प्रयोग करने से वातगुल्म नष्ट होता है । [ यहा पर बृहत्पचमूल
लेना चाहिये । ] ॥ ६७ ॥
वाटय यूपेण पिप्पल्या मूलकाना रसेन वा ॥ ६८ ॥
भुक्त्वा स्निग्धमुदावर्ताद्वातगुल्माद्विगुच्यते ।
शूलानाहविबन्धार्तं स्वेदयद्वातगुल्मिनम् ॥ ६६ ॥
स्वेदैः स्वेदविधावुक्तैर्नाडीप्रस्तरसङ्करेः । ( १५ ) स्नेहयुक्त जो के अन्न को मूंग आदि के यूप के साथ, अथवा पिप्पली प्रधान यूप के साथ, अथवा मूली के रस के साथ खाने से उदावर्त्त और वातगुल्म राग शान्त होते है । ( १६ ) वातगुल्म मे यदि शूल, आनाह और विबन्ध हो तो स्वेदाध्यायमे कहे नाड़ी - स्वेद, प्रस्तर - स्वेद और सकर स्वेद देने चाहिये ॥ बस्तिकर्म पर विद्याद् गुल्मन्नं तद्धि मारुतम् ॥
स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति ।
तस्मादभीक्ष्णशो गुल्मा निरूहैः सानुवासनैः ॥।
प्रयुज्यमानैः शाम्यन्ति वातपित्तकफात्मकाः । गुमना विविधा दृष्टाः सिद्धाः सिद्धिषु बस्तयः इति बस्तिक्रिया | ६८-६६- ॥ १०० ॥ १०१ ॥ ॥ १०२ ॥
गुल्म को नष्ट करने के लिये बस्तिकर्म अतिशय उत्कृष्ट है । चू कि यह कर्म पकाशय में वायु का शमन करके गुल्म को नष्ट करता है । इसलिये बारबार निरूह और अनुवासन बस्तियो के प्रयोग से बात - पित्त - कफजन्य गुल्म शान्त हो जाते है । सिद्धिस्थान में फलप्रद गुल्मनाशक बस्तियों का उपदेश किया है ॥ १०० - १०२ ॥
गुल्मन्नानि च तैलानि वक्ष्यन्ते वातरोगिके ।
तानि मारुतगुल्मेषु पानाभ्यङ्गानुवासनैः ॥ १०३ ॥
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३६२ चरकसंहिता A ANN wwwwwww n प्रयुक्तान्याशु सिध्यन्ति तैल ह्यनिलजित् परम् वात - व्याधि चिकित्सा मे गुल्मनाशक तैलो को कहेंगे । मे पान अभ्यग और अनुवासन के रूप में प्रयोग करने से क्योंकि वात के शमन के लिये तैल श्रेष्ठ औषध है ॥ १०३ नलिनी चूर्णसंयुक्त पूर्वोक्त धृतमेव च ॥ १०४ समलाय प्रदेय स्याच्छोधनं पातगुल्मिने । [ अ ० ५ । यह तैल वातगुल्मों
फलदायक होते है ।
॥
॥
नीलिनीत्रिवृतादन्तीपध्याकम्पिलकैः सह ॥ १०५ ॥
शोधार्थ तं देय विक्षारनागरम् ।
नीलिनी त्रिफला राख्ना वला कटुकरोहिणीम् ॥ १०६ ॥
पचे ि ss व्याघ्री च पलिकानि जलाढके ।
तेन पादावशेपेण घृतप्रस्थ विपाचयेत् ॥ १०७ ॥
दनः प्रस्थेन सयोज्य सुधाक्षीरपलेन च ।
ततो घृतपल दद्याद् यवागूमण्ड मिश्रितम् ॥ १०८ ॥
जीर्णे सम्यग्विरिक्तं च भोजयेद् रसभोजनम् ।
गुल्मकुष्ठोदरव्यङ्गशोफपाण्डवामयज्वरान् ॥ १०६ ॥
स्वित्रं प्लीहानमुन्मादं वृतमेतद् व्यपोहति । इति नीलिन्याद्यं घृतम् । ( १७ ) वातगुल्म रोगी के पेट मे मल हो तो शोधन के लिये पूर्व कथित त्र्यूषणादि घृत मे नीलिनी का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । ( १८ ) नीलि-न्याद्य वृत --- नीलनीमूल, निशोय, दन्तीमल, हरड, कमीला इनसे साधित घी मे [ घृत की अपेक्षा चौगुना पानी मिला कर ] बिड नमक, यवक्षार और साठ मिला कर विरेचन के लिये देना चाहिये । अथवा त्र्यूपणादि घृत मे इनका चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । ( १२ ) नीलिन्याद्य घृत ( २ ) - गाय का घी १ प्रस्थ, नीलिनी मूल, त्रिफला, रास्ना, खरैटी, कुटकी, वायविडंग, कटेरी इनको एक एक पल लेकर १ आढक पानी मे पकाना चाहिये । चतुर्थाश शेप रहने पर घी और दही १ प्रस्थ, सेहुण्ड का दूव १ पल मिला कर घी पकाना चाहिये । इम घी की एक पल मात्रा ( आज कल १ तोला ) को यवागू के मण्ड ' मे मिला कर देवे | इसके जीर्ण हा जाने पर और रागी को विरेचन हो जाने पर मास रस का भोजन देवे । इस घी से गुल्म, कुष्ठ, उदर रोग, व्यग, शोफ, पाण्डु रोग, ज्वर, श्वित्र, प्लीहा और उन्माद रोग नष्ट होते है ॥ १०४ -१०६ ॥ कुक्कुटाच मयूराव तितिरिक्रौञ्चवर्तकाः ॥ ११० ॥
शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ।
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६३ ^ हितमुष्णं दवं स्निग्धं भोजन वातगुल्मिनाम् ॥। १११ ॥
समण्डवारुणीपानं पक्क वा धान्यकैर्जलम् ।
मन्देऽग्नों वर्धते गुल्मो दीप्ते चाग्नौ प्रशाम्यति ॥ ११२ ॥
तस्मान्ना नातिसौहित्य कुर्यान्नातिविलङ्घनम् ' ।
सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते ॥ ११३ ॥
या क्रिया क्रियते सिद्धि सा याति न विरूक्षिते । वातगुल्म मे पथ्य – मुर्गा, मार, तीतर, कौच, वत्तक, ( बटेर ), शालि चावल, मदिरा, घी ये सब वस्तुये वातगुल्म मे औषध है । वातगुल्म के रोगी के लिये उष्ण द्रव और स्निग्ध भाजन हितकारी है । अथवा मण्डयुक्त वारुणी का पीना या जानने से ( उगपानीय विवि से ) पकाये जल का उपयोग उत्तम है | अग्नि के मन्द होने पर गुल्म बढता है, आग्न के बढ जाने पर गुल्म शान्त हो जाता है । इसलिये पुरुष को चाहिये कि न तो बहुत तृप्त होकर ( पेट भरकर ) भाजन करे और न लघन ही करे । मात्रा मे थोडा खावे । सबगुल्मा मे प्रथम स्नेहन और स्वेदन करने पर फिर जो भी क्रिया की जाती है, वह अवश्य सफल हाती है । रूक्ष ( वात प्रकोप की ) अवस्था मे की हुई क्रिया फलवती नही होती ॥११०-११३ ॥ भिषगात्ययिकं बुद्ध्वा पित्तगुल्ममुपाचरेत् ॥ ११४ वैरेचनिकसिद्धेन पयसा सर्पिपाऽपि वा । वैद्य को चाहिये कि पित्तगुल्म को घातक समझकर शीघ्र इसके लिये विरेचक वस्तुओं से सिद्ध हुए दूब या घी का प्रयाग रोहिणीकटुकानिम्बमधुकं त्रिफलात्वचः ॥ ११५ ॥
कार्षिका त्रायमाणा च पटोलत्रिवृतोः पले ।
द्विपलं च मसूराणा साध्यमष्टगुणेऽम्भसि ॥ ११६
शृताच्छेषं घृतसमं सर्पिषश्च चतुष्पलम् ॥।
उपचार करे ।
करे || ११४ ॥
॥
पिबेत्संमूच्छित तेन गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ॥ ११७ ॥
ज्वरस्तृष्णा च शूल च भ्रमो मूर्च्छाऽरुचिस्तथा ।
इति रोहिण्याद्यं घृतम् ॥
( १ ) राहिण्याद्य घृत — कुटकी, नीम की छाल, मुल्हठी, हरड़, बहेड़ा, आवला की बकली, त्रायमाणा प्रत्येक १ कर्प, पटाल और निशोथ एक - एक पल, मसूर २ पल इनको घी से आठ गुणे जल मे पकावे । अष्टमाश ( ४ पल ) १ ' तस्मादन्नातिसौहित्य कुर्यान्नातिविलङ्घितम् ' इति च पाठः ।
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३६४ चरकसंहिता [ अ ० ५ MAA ANNIN शेष रहने पर छान ले । इसको चार पल घी के साथ रोगी को दे । इससे पैत्तिक गुल्म शान्त होता है, और ज्वर, प्यास, शूल, भ्रम, मूर्च्छा और अरुचि नष्ट होती है । [ आजकल २ पल क्वाथ और २ पल घी बरते । ] ॥ ११५ - ११७ ॥ जले दशगुणे साव्यं त्रायमाणाचतुष्पलम् ॥ ११८ ॥
पञ्चभागस्थित पूतं कल्कैः सयोज्य कापिकैः ।
रोहिणी कटुका मुस्ता त्रायमाणा दुरालभा ॥ ११६ ॥
कल्कैस्तामलकीवीराजीवन्तीचन्दनोत्पलैः ।
रसस्यामलकाना च क्षीरस्य च घृतस्य च ॥ १२० ॥
पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्वा सम्यग्विपाचयेत् ।
पित्तरक्तभवं गुल्मं विसर्प पैत्तिक ज्वरम् ॥ १२१ ॥
हृद्रोग कामला कुष्ठ हन्यादेतद् धृतोत्तमम् । इति त्रायमाणाद्य घृतम् । ( २ ) त्रायमाणाद्यघृत — त्रायमाणा ४ पल, पानी दस गुना ( चालीस पल ) लेकर पकाना चाहिये । पचमाश ( ८ पल ) रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे कुटकी, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा, तामलकी ( भूई आवला ), वीरा ( क्षीरकाकोली, शतावरी या शालिपर्णी ), जीवन्ती, चन्दन, नीला कमल प्रत्येक एक एक कर्प लेकर इनका कल्क, आवले का रस ८ पल, दृव ८ पल, घी ८ पल लेकर सब से घृत सिद्ध करे | यह घृत पित्त - रक्तजन्य गुल्म, वीसर्प, पित्तजन्य ज्वर, हृदय रोग, कामला और कुष्ठ को नष्ट करता है ॥। ११८-१२१ ॥ रसेनामलकेक्षूणा घृतप्रस्थ ' विपाचयेत् ॥ १२२ ॥
पथ्यापाद पिवेत्सर्पिस्तत्सिद्ध पितगुल्मनुत् । इत्यामलकाद्यं घृतम् । ( ३ ) आमलकाद्यघृत — आवले का रस या क्वाथ प्रस्थ, गन्ने का रस ८ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, और हरड का कल्क १ शराव ( ८ पल ) लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घी पित्त गुल्म को नष्ट करता है ॥ १२२ ॥
द्राक्षा मधूकं खर्जूरं विदारी सशतावरीम् ॥ १२३ ॥
परूषकाणि त्रिफला साधयेत्पलसंमिताम् ।
जलाढके पादशेष रसमामलकस्य च ॥ १२४ ॥
घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् ।
साधयेत्तद् घृत सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ १२५ ॥
१ ' घृतपाद ' इति च पाठः ।
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६५ प्रयोगात्पित्तगुल्मन्नं सर्वपित्तविकारनुत् । इति द्राक्षाद्यं घृतम् । ( ४ ) द्राक्षाद्यघृत मुनक्का, महुवा, पिण्डखर्जूर, विदारीकन्द, शतावरी, फालसा, त्रिफला, इनको एक - एक पल लेकर २ आढक जल मे क्वाथ करे । ( २ प्रस्थ ) रहने पर छान ले । इसमे आवले का रस दो प्रस्थ, ईख का रस २ प्रस्थ, दूव २ प्रस्थ, ओर घी २ प्रस्थ मिलावे । कल्कार्य हरड़ ८ पल ले । इनके द्वारा घृत पकावे । शीतल होने पर इसमे चतुर्थाश शर्करा और मधु ( मिलित ) मिलाकर प्रयाग करे | यह पित्त गुल्म ओर पैत्तिक रोगो को नष्ट
करता है " ॥ १२३ - १२५- ।
वृप समूलमापोथ्य पचेदष्टगुणे जले ॥ १२६ ॥
शेपेऽष्टभागे तस्यैव पुष्पकल्क प्रदापयेत् ।
तेन सिद्धं घृत शीत सक्षांद्र पित्तगुल्मनुत् ॥ १२७ ॥
रक्तपित्तज्वरश्वासकासहृद्रोगनाशनम् । इति वासाघृतम् । ( ५ ) वासाघृत - जड समेत वासा ( अडूसा ) को लेकर इसको कुचल कर आठ गुणे पानी म क्वाथ करे । जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर वासा के फूला का कल्क मिला कर घी सिद्ध करे । घी के ठण्डा होने पर मधु मिलावे यह वा पित्त - गुल्म, रक्त पित्त, ज्वर, श्वास, कास और हृदय रोग का नष्ट करता है । [ यह बासा - घृत रक्तपित्त के वासा घृत से पृथक् है । इसलिये उसे चतुर्गुण पाना मसद्ध किया हे । अष्टागसग्रहकार दोनो का एक ही माना है ] ॥ १२६ - १२७ ॥ द्विलं त्रायमाणाया जलद्विप्रस्थसाधितम् ॥ १२८ ॥
अष्टभागस्थित पूर्वं कोष्ण क्षीरसम पिबेत् ।
पिबेदुपरि तस्योष्ण क्षीरमेव यथाबुलम् ॥ १२६ ॥
तेन निर्हृतदोषस्य गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः । ( ६ ) त्रायमाणा का दा पल लेकर ४ प्रस्थ ( ६४ पल ) पानी मे पकावे, अष्टमाश रहने पर इसको छान कर कोसा होने पर इसमे समान मात्रा दूध को मिलावे, इसको पीकर ऊपर से शक्ति अनुसार गरम दूध पीवे । इससे विरेचन हाने पर पैत्तिक गुल्म शान्त हो जाता है । [ अष्टागसग्रह में त्रायमाणा से ही दूध को सिद्ध करके प्रयोग करना लिखा है ] ॥ १२८-१२६- ॥ १. महुवे के स्थान पर मधुक पाठ मे मुलहठी अर्थ होगा ।