श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 381–390
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 381–390
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३६६ चरकसंहिता [ अ ० ५ द्राक्षाभयारस गुल्मे पैत्तिके सगुडं पिवेत् ॥ १३० ॥
लिह्यात्कम्पिल्लक वाऽपि विरेकार्थ मधुद्रवम् । ( ७ ) पित्त - गुल्म मे विरेचन के लिये द्राक्षा और हरड के काथ में गुड मिलाकर अथवा कमीले को मधु में मिलाकर चाटे ॥ १३० ॥
दाहप्रशमनोऽभ्यङ्गः सर्पिषा पित्तगुल्मिनाम् ॥ १३१ ॥
चन्दनाद्येन तैलेन तैलेन मधुकस्य वा । ( ८ ) पित्त - गुल्म म अभ्यग के लिये घी ( शतधौत या सहस्रधौत ),
चन्दनाद्य तैल, या मुलहठी के क्वाथ ओर कल्क से सिद्ध तैल का उपयोग करे ।
इससे दाह की शान्ति होती है ॥ १३१ ॥
ये च पित्तज्वरातना सतिक्ताः क्षीरबस्तयः ॥ १३२ ॥
हितास्ते पित्तगुल्मिभ्यो वक्ष्यन्ते ये च रिद्धिषु । पित्त - गुल्म में बस्तिया — पित्तज्वर के रागियों के लिये तिक्त द्रव्यों से सिद्ध दूध की जो बस्तिया कही है, ओर जिन बस्तियों को सिद्धि - स्थान मे आगे कहेंगे उनका पित्त - गुल्म में प्रयाग करे ॥ १३२ ॥
शालयो जाङ्गल मास गव्याज्ये पयसी घृतम् ॥ १३३ ॥
खर्जूरामलक द्राक्षा दाडिप सपरूपकम् ।
आहारार्थे प्रयोक्तव्य पानार्थ सलिलं श्रुतम् ॥ १३४ ॥
बलाविदारिगन्धाद्यैः पित्तगुल्म चिकित्सितम् । आहार के लिये शालि वान्य, जागल मास, गाय और बकरी के घी और दूध, खजूर, आवला, द्राक्षा, अनारदाना, फालसा, इनको भोजन के लिये दे और पीने के लिये बला और विदारीगन्वादि स्वल्प पचमूल से षडंग पानीय विधि द्वारा साधित जल पीने के लिये देवे, यह पित्तगुल्म की चिकित्सा है ॥ १३३-१३४ ॥ आमान्वये पित्तगुल्मे सामे वा कफवातिके ॥ १३५ ॥
यवागूभिः खडैर्यूषैः संधुक्ष्योऽग्निर्विल घिवे ।
प्रकोप दोषाणा सर्वेषामग्निसंश्रितौ ॥ १३६ ॥
तस्मादग्निसदा रक्षेन्नदानानि च वर्जयेत् । पित्तगुल्म मे यदि आम का अनुबन्ध हो, या आमयुक्त कफ अथवा आमयुक्त वायु का ससर्ग हो तो प्रथम लघन कराके यवागुओ द्वारा और खड षो से अग्नि का प्रदीपन करे । सब दोषों का शमन और प्रकोप अग्नि के उपर ही निर्भर करता है । इसलिये सदा अग्नि की रक्षा करनी चाहिये और निदाना ( कारणो ) का परित्याग करना चाहिये ॥ १३५–१३६- ॥
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् वमनाय मन प्रदद्यात्कफगुल्मिने ॥ १३७ ॥
स्निग्धस्विन्नशरीराय ल्मे शैथिल्यमागते ।
परिवेष्टन प्रदीप्तांस्तु बल्वजानथवा कुशान् ॥ १३८
भिपक्कुम्भे समावाप्य गुल्म घटमुखे क्षिपेत् ।
सगृहीतो यदा गुल्मस्तदा घटमथोद्धरेत् ॥ १३६ ॥
वस्त्रान्तरं ततः कृत्वा भिन्द्याद् गुल्म प्रमाणवित् ।
विमार्गजं यदा पश्येद्यथालाभं प्रपीडयेत् ॥ १४० ॥
मृद्नीयाद् गुल्ममेनैक न त्वत्र हृदय स्पृशेत् । ३६७ ॥ कफ - गुल्म की चिकित्सा - ( १ ) कफ - गुल्म का रोगी यदि वमन के योग्य हो तो उसको वमन देवे । स्नेहन और स्वेदन क्रिया से गुल्म को शिथिल बना कर इसको तन्त्र से लपेट देवे । फिर एक घडे ( घटीयत्र ) मे जलते हुए बल्वज ( तृणविशेप ) और कुगाओ को डाल देवे और घड़े के मुख को गुल्म पर लगा देवे, इससे गुल्म घडे के मुख की ओर खीचा जाकर पकडा जाता है [ वायु के निकल जाने से शून्य स्थान बनने से यत्र गुल्म को खीच लेता है, यत्र मे से वायु निकालने के लिये जलती घास यत्र में रक्खी जाती है । आग के बुझने पर परन्तु गरम रहने पर यत्र को लगावे ] | जिस समय गुल्म पकडा जाये, उस समय घटीयत्र को उतार ले । इम गुल्म को वस्त्र से बावकर प्रमाण का समझने वाला वैद्य चीर देवे, अब विमार्ग, अजपद और आदर्श इनमें से जो घी मिले उस से इसको दबाते जिससे दोष निकल जाय, गुल्म का ही मर्दन पीड़न करे । हृदय पर किसी प्रकार का आघात ( रक्तक्षय से या भय से ) नही आने देवे । [ आज कल यह कार्य कपिग से किया जाता है । घास के स्थान पर स्पिरिट का उपयोग किया जाता है ' विमार्ग ' चमारों का यत्र है । इसमें वे चमड़े को सीधा काटते है । इसको राफडी कहते हैं । ' अजपद '
बकरी के पेर के समान लकडी का बना यत्र होता है । ] ॥ १३७ - १४०- ॥
तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ॥ १४१ ॥
श्लेष्मगुल्ममयः पात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भि । ( २ ) कफज गुल्म पर तिल, एरण्डबीज, अलसी, सरसो इन का लेप करके सुहाते हुए गरम लोहे के पात्रों से सेक करे ॥ १४१ ॥
सव्योषक्षारलवणं दशमूलीशृतं घृतम् ॥ १४२ ॥
कफगुल्मं जयत्याशु सहिङ्गुबिडदाडिमम् । इति दशमूलीघृतम् ।
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३६८ चरकसंहिता [ अ ० ५ ( ३ ) दशमूली वृत – दशमूली के क्वाथ से और त्रिकटु, यवक्षार, सैन्वा नमक, हीग, बिड नमक, और अनारदाना इनके कल्क से साधित घी के प्रयोग
से कफगुल्म शान्त होता है । काई २ वैद्य दशमूल का कल्क भी डालते हे ।
[ श्री गंगाधर सेन ने अनार का छिलका डालना लिखा है । ] ॥। १४२– ॥
भल्लातकाना द्विपलं पञ्चमूलं पलोन्मितम् ॥ १४३ ॥
साध्यं विदारिगन्धाद्यमापोथ्य सलिलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् पिप्पली नागरं वचाम् ॥। १४४ ॥
विडङ्ग सैन्धवं हिङ्गु यावशूकं बिड यटीम् ।
चित्रक मधुकं रास्ता पिष्ट्वा कर्षसम भिषक् ॥ १४५ ॥
प्रस्थ च पयसः कृत्वा घृतप्रस्थ विपाचयेत् ।
एतद्गल्लातकघृत कफगुल्महर परम् ॥ १४६ ॥
महापाण्ड्वामयश्वासग्रहणीरोगकासनुत् । इतिभल्लातकाद्यं घृतम् । ( ४ ) मल्लातकाद्यवृत — भिलावा १ पल, विदारीगन्धादि स्वल्प पचमूल ( शालिपर्णी, प्रनिपर्णी गोखरू, कटेरी, बडी कटेरी ), एक पल, पानी दो आढक, हींग, यवक्षार विड नमक, कचूर, चीता, मुलहठी, रास्ना प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनका कल्क बनाये, घी २ प्रस्थ मिलाकर घृत - पाक करे । यह भल्ला-तक घृत कफ - गुल्म नाशक, प्लीहा, पाण्डुरोग, श्वासरोग, ग्रहणी राग, और का 4 को नष्ट करता है । [ मात्रा २ मासे से ४ मासा । ] ॥ १४३–१४६ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ ४४७ ॥
पलिकेः सयवक्षारैर्धृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
क्षारप्रस्थेन ' तत्सर्पिर्हन्ति गुल्म कफात्मकम् ॥ १४८ ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगन शीटकासज्वरापहम् । इति पञ्चकोलघृतम् । ( ५ ) पचकाल घृत – पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक, सोठ ओर यवक्षार प्रत्यक एक पल, घा २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ इनसे यथाविवि घृत पाक करे | यह वृत कफ - गुल्म ग्रहणी रोग, पाण्डु रोग, प्लीहा, कास, और ज्वर को नष्ट करता ह । [ इसका ' क्षीरषट्पल घृत ' भी कहते हे । ] ॥ १४७- १४८ ॥ त्रिवृता त्रिफला दन्ती दशमूलं पलोन्मितम् ॥ १४६ ॥
जले चतुर्गुणे पक्त्वा चतुर्भागस्थितं रसम् । १ ' क्षीरप्रस्थ च ' इति वा पाठ ' ।
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अ ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६ सर्पिरैरण्डजं तैल क्षीर चैकत्र साधयेत् ॥ १५० ॥
स सिद्धो मिश्रकस्नेहः सक्षौद्रः कफगुल्मनुत् ।
कफवातविबन्धेषु कुष्टमीहोदरेषु च ॥ १५१ ॥
प्रयोज्यो मिश्रकः स्नेहो योनिशूलेषु चाधिकम् । इति मिश्रः स्नेहः । ( ६ ) मिश्रक स्नेह – निशोथ, त्रिफला, दन्तीमूल दशमूल प्रत्येक वस्तु एक - एक पल, इनको चार गुणे जल ( ६० पल ) मे पका कर चतुर्थाश ( १५ पल ) शेष रखे | इसमे क्वाथ के समान ( १५ पल ) प्रत्येक घी, ऐरण्ड तैल, दूध मिलाकर सिद्ध करना चाहिये । इस स्नेह को मधु के साथ मिलाकर प्रयोग करे । कफ - गुल्म, कफवातजन्य विबन्ध, कुष्ठरोग, प्लीहारोग, उदररोग और योनिरोगो मे विशेष रूप से इसका प्रयोग करे । [ श्री चक्रपाणि दूध को क्वाथ के समान लेने को कहते है, तथा घी ओर एरण्ड तैल को इस मिलित द्रवाश से चतुर्थाश लेने का आदेश करते है । अष्टाग - सग्रह में क्वाथ के लिये सोलह गुणा जल लेकर सोलहवा भाग शेष रखने का
वचन है । ] ॥१४६-१५१- ॥
यदुक्तं वातगुल्मघ्न्न स्रंसनं नीलिनीघृतम् ॥ १५२ ॥
द्विगुण तद्विरंकार्थ प्रयोज्य कफगुल्मिनाम् । ( ७ ) वात- गुल्म में जा नीलिनी घृत विरचन के लिये कहा है, उसी को दुगुनी मात्रा मे कफ- गुल्म मे विरेचन के लिये बरते ॥१५२ ॥
सुधाक्षीरद्रवे चूर्ण त्रिवृतायाः सुभावितम् ॥ १५३ ॥
कार्षिकं मधुसर्पिलीढवा साधु विरिच्यते । ( ८ ) निसात के चूर्ण को सेहुण्ड के दूध में भली प्रकार भावना देकर एक कर्ष मात्रा [ आजकल ४ से ६ रत्ती ] मधु और घी के साथ खाना चाहिये । इससे भली प्रकार विरेचन होता है ॥ १५३ ॥
जलद्रोणे विपक्तव्या विशतिः पञ्च चाभयाः ॥ १५४ ॥
दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च ।
अष्टभागस्थितं तं च रस पूतमधिक्षिपेत् ॥ १५५ ॥
दन्ती समं गुडं पूतं क्षिपेत्तत्राभयाश्च ताः ।
तैलार्धकुडवं चैव त्रिवृतायाश्चतुष्पलम् ॥ १५६ ॥
चूर्णितं पलमेकं च पिप्पलीविश्वभेषजम् ।
तत्साध्यं लेहवच्छीते तस्मिस्तैलसमं मधु ॥ १५७ ॥
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३७० चरकसंहिता [ अ ० ५
क्षिपेच्चूर्णपलं चैकं त्वगेळापत्रकेशरात् ।
ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ॥ १५८ ॥
सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः ।
गुल्मं श्वयथुमर्शासि पाण्डुरोगमरोचकम् ॥ १५६ ॥
हृद्रोगं ग्रहणीदोष कामलां विषमज्वरम् ।
कुष्ठं प्लीहानमानाहमेषा हन्त्युपयोजिता ॥ १६० ॥
निरत्ययः क्रमश्चास्या द्रवो मासरसौदनः । इति दन्तीहरीतकी | ( ८ ) दन्ती - हरीतकी - २५ हरडो को एक पोटली मे ढीला बाधकर, दन्तीमूल २५ पल लेकर दो द्रोण पानी मे पकावे । जब अष्टमाश ( ४ प्रस्थ ) शेष रह जाय तब छान लेवे इसमे २५ पल गुड मिलाकर छान ले । इसमे अब हरड़ो को छोड़ दे फिर हरड़ो को निकाल कर गुठली निकाल दे । इन हरडो को ४ पल तिल तैल मे भून कर गुड मिश्रित क्वाथ मे मिला दे । इसमे निशोय का चूर्ण ४ पल, पिप्पली और सोठ एक पल मिलाकर मन्द २ आच पर पकाये । जब लेह तेय्यार हो जाय तब नीचे उतार कर तैल के समान शहद ( ४ पल ), दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेसर का मिलित चूर्ण १ पल मिलावे । इसमे से एक पल अवलेह चाट कर और एक हरड को खाने से सुखपूर्वक विरेचन होता है । नीरोग और स्निग्ध पुरुष मे एक प्रस्थ दाष बाहर आता है । गुल्म, सूजन, अर्श, पाण्डुरोग, अरुचि, हृदयरोग, ग्रहणी-रोग, कामला, विषम ज्वर, कुष्ठ, प्लीहा, आनाह इससे नष्ट होते है । इसका सेवन निर्दोष है । इसका पथ्य मास रस और भात है । मास रस इतना हो जिससे भात पतला बन जाये । [ यहा पर प्रस्थ १३ ॥ पल का समझे । वमन, विरेचन और शाणित - मोक्षण मे १३३ पल का एक प्रस्थ बतलाया गया है ] ॥ १५४-१६० ॥ सिद्धाः सिद्धिषु वक्ष्यन्ते निरूहाः कफगुल्मिनाम् ॥। १६१ ॥
अरिष्टयोगाः सिद्धाश्च ग्रहण्यर्शश्चिकित्सिते ।
चूर्णं गुटिका याश्च विहिता वातगुल्मिनाम् ॥ १६२ ॥
द्विगुणक्षारहिग्वम्लवेतसास्ताः कफे मताः ।
य एव ग्रहणदोषे क्षारास्ते कफगुल्मिनाम् ॥ १६३ ॥
सिद्धा निरत्ययाः शस्ता दाहस्त्वन्ते प्रशस्यते । कफ गुल्म मे प्रयोग करने योग्य निरूह बस्तियो का सिद्धि - स्थान मे कहेंगे ।
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१ फलप्रद अरिष्ट प्रयोगों का ग्रहणी तथा अर्शरोग की चिकित्सा में कहेगे ^^ । जो चूर्ण ओर गुटिकाये वातगुल्म मे कही है, उनमे यवक्षार, हीग और अम्लवेतस की मात्रा को दुगुना करके ( शेप चूर्ण को उसी परिमाण मे ) कफ - गुल्म मे प्रयोग करे । ग्रहणी राग मे जो क्षार कहे है, उनको कफ - गुल्म मे प्रयोग करे, ये क्षार निदोष ओर प्रशस्त है । जब किसी भी चिकित्सा से लाभ न हो तभी अन्त में दाहकर्म करे ॥ १६१-१६३ ॥ प्रपुराणानि धान्यानि जागला मृगपक्षिणः ॥ १६४ ॥
कौलत्थो मुद्गयूपश्च पिप्पल्या नागरस्य च ।
शुष्कमूलकयूपञ्च विल्वस्य वरुणस्य च ॥ १६५ ॥
चिरविल्वाङ्कराणा च यवान्याश्चित्रकस्य च ।
बीजपूरकहि ग्वम्लवेतसक्षारदाडिमैः ॥ १६६ ॥
तक्रेण तैलसपिभ्यां व्यञ्जनान्युपकल्पयेत् ।
पचलीत तोयं पुराणं वारुणीरसम् ॥ १६७ ॥
गुल्मी पिवेत्काले जीणं माध्वीकमेव वा ।
यवानीचूत तक्र बिडेन लवणीकृतम् ॥ १६८ ॥
पिबेत्सदापन वातमूत्रवर्चोनुलोमनम् । आहार - तीन चार वर्ष पुराने धान्य, जागल पशु - पक्षिया का मास, कुलथी, गूग का यूप, पिप्पली का यूप, सोठ का यूप, सूखी मूली का यूष, बेलगिरी, वरुण, करज के अकुर, अजवायन और चित्रक का यूष कफ - गुल्म मे उत्तम है । बिजौरा, हींग, अम्लवेतम, क्षार, अनारदाना, छाछ, तैल और घी इनके साथ व्यजन ( सूप शाक आदि ) बनावे | कफ - गुल्म रोगो को प्यास लगने पर स्वल्प पचमूल से सिद्ध किया पानी या पुरातन वारुणी ( ताड़ वा खजूर का मन्त्र ) अथवा पुरातन मा वाक ( मधु, महुवे, अगूर के रस से बना मद्य ) पीने क लिये दे | तक्र में अजवायन का चूर्ण और बिड नमक मिलाकर पीवे | यह तक अग्निदीपक, वायु, मल, मूत्र का अनुलोमन करती है ॥ १६४ - १६८ ॥ संचितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः ॥ १६६ ॥
कृतमूलः सिरानो यदा कूर्म इवोन्नतः ।
दौर्बल्यारुचिहल्लासकासवम्यरतिज्वरः ॥ १७० ॥।
तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्युज्यते न स सिध्यति ।
गृहीत्वा सज्वरश्वासं वम्यतीसारपीडितम् ॥ १७१ ॥
हृन्नाभिहस्तपादेषु शोफः कर्षति गुल्मिनम् ।
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३७२ चरकसंहिता [ अ ० ५ असाध्यता - जो गुल्म धीरे - धीरे बढ कर बडे भारी स्थान को घेर लेता है, जिसने जड पकड़ ली हो, सिराओ से व्याप्त, कछुए के समान ऊपर को उठा हुआ, दुर्बलता, अरुचि, जी मचलाना, कास, वमन, बेचैनी, ज्वर, प्यास, तन्द्रा, प्रतिश्याय से युक्त होता है, वह गुल्म असाव्य हे । ज्वर, श्वास, वमन और अतीसार से पीडित गुल्म रागी के हृदय, नाभि और हाथ पाव में शोथ हो जाय ता रागी की मृत्यु हा जाती है । यह शोथ उसका पीडित करता है || १६६-१७१ ॥ रोधिरस्य तु गु · मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे ॥ १७२ ॥
स्निग्धस्विन्नशरीराय दद्यात्स्नेहविरेचनम् । रक्त- गुल्म की चिकित्सा - ( १ ) गर्भकाल अर्थात् दस मास व्यतीत हो जाने पर गर्भवती के शरीर का स्नेहन और स्वेदन करके [ घृत आदि को ]
स्निग्ध विरेचन दे । जैसे -- एरण्ड तैल ॥ १७२ ॥
पलाशक्षारपात्रे ' द्वे द्वे पात्रे तैलसर्पिषोः ॥ १७३ ॥
गुल्मशथिल्यजननी पक्त्वा मात्रा प्रयोजयेत् । ( २ ) पलाश - क्षार यमक - तिल तेल २ पात्र ( २ आढक ), घी २ पात्र, पलाश शरादक [ ढाक की भस्म को ६ गुने पानी मे २१ वार परिस्रुत करके तय्यार किया क्षारादक ] चार आढक लेकर स्नेह पाक करे । जब झाग उठ जाये और आकृति फटे दूध के समान हो जाये तब स्नेहपाक समझे । इस यमक की मात्रा रागिणी का पिलावे इससे गुल्म शिथिल हो जाता है । [ मात्रा ३ मासा ] ॥ १७३ ॥
प्रभिद्येत न यद्येवं दद्याद्यनिविशोधनम् ॥ १७४ ॥
क्षारेण युक्तं पललं सुधाक्षीरेण वा पुनः ।
आभ्या वा भावितान्दद्याद्योनौ कटुकमत्स्यकान् ॥ १७५ ॥
वराहमत्स्यपित्ताभ्या लक्तकान् वा सुभावितान् ।
अधोहरैश्वोव हरैर्भावितान् वा समाक्षिकैः ॥ १७६ ॥
किण्वं वा सगुडक्षार दद्याद्योनिविशोधनम् ।
रक्तपित्तहर क्षारं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १७७ ॥
लशुनं मदिरा तीक्ष्णा मत्स्याञ्चास्यै प्रदापयेत् ।
बस्ति सक्षीरगोमूत्र सक्षार दाशमूलिकम् ॥ १७८ ॥
१ ' पादे ' इति च पाठ. । २ ' समाक्षिकान् ' इति च पाठ ॥
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अ ० ५ ] चिकित्सितस्थानम्
अदृश्यमाने रुधिरे दद्याद् गुल्मप्रभेदनम् ।
प्रवर्त्तमाने रुविरे दद्यान्मांसरसौदनम् ॥ १७६ ॥
घृततैलेन चाभ्यङ्ग पानार्थ तरुणी सुराम् ।
रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहराः क्रियाः ॥ १८०
कार्या वातरुगात याः सर्वा वातहराः पुनः ।
घृततैलावसेकाश्च तित्तिरीश्चरणायुधान् ॥ १८१
३७३ ॥ ॥ सुरासमण्डा पूर्व च पानमम्लस्य सर्पिपः ॥ १८२ ॥
प्रयोजयेदुत्तर वा जीवनीयेन सर्पिपा ।
अतिप्रवृत्ते रुधिरे सति तेनानुवासनम् ॥ १८३ ॥
( ३ ) यदि इस प्रकार से गुल्म का भेदन न हो तो योनि - शोधन करावे । इसके लिये ( १ ) क्षार से युक्त तिल- कल्क या सेहुण्ड के दूध से युक्त तिल-कल्क अथवा क्षार और सेहुण्ड के दूध से भावित कटु मछलियो ( शफरी मछली ) को योनि मे रखे । [ यहा पर तिल - कल्क न लेकर मास ( छुछुन्दरी या मूषक ) का प्रयोग करना अच्छा है । श्रीगंगाधर की भी यही मान्यता है, क्षार मे पलाशक्षार या यवक्षार बरते । ] ( २ ) पिचुओ ( फाया ), को सूअर या मछली के पित्तो से अच्छी प्रकार भावना देकर अथवा मधु - युक्त विरेचन द्रव्यो या मधु - मिश्रित वमन -द्रव्या से पिचुओं को भावित करके योनि मे रखे । ( ३ ) योनि के शोधन के लिये किण्व ( सुरा - बीज ) को गुड और पलाश-क्षार मे मिला कर योनि मे रखे । रक्तपित्तनाशक क्षार ( नीलोत्पल क्षार ) मधु और घी के साथ चटावे । ४ ) अन्नपान मे—– लहसुन, तीक्ष्ण मदिरा, मछलिया देवे । दूध, गोमूत्र और क्षार से ' युक्त दशमूल क्वाथ की उत्तर वस्ति देवे । ( ५ ) यदि योनि से रक्त स्रावित न हो तो गुल्म को फाडने की चिकित्सा करे । यदि रक्त योनि से बहता हो ता मास रस और चावल दे, घी और तेल की मालिश करे, पीने के लिये सुरा दे । रक्त के अधिक बहने पर रक्तपित्त नाशक क्रिया करे । वातव्याधि हा ता वातनाशक चिकित्सा करे । घी और तैल का परिषेक, तीतर, मुर्गे के मास रस का भोजन, सुरा, मण्ड-युक्त सुरा, अम्ल रस द्रव्यों से युक्त घी का पान करावे । रक्त के अधिक बहने पर जीवनीय गण से साधित घृत की उत्तर बस्ति देवे । तिक्त घृत से
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३७४ चरकसंहिता [ अ ० ५ w WAV अनुवासन दे, अथवा तिक्त द्रव्यों से युक्त जीवनीय घृत से अनुवासन करावे ॥ १७४ - १८३ ॥
तत्र श्लोकाः स्नेहः स्वेदः सपिवर्णानि बृंहण गुडिकाः ।
वमनविरेको मोक्षः क्षतजस्य च वातगुल्मवताम् ॥ १८४ ॥
सर्पिः सतिक्तसिद्ध क्षीर प्रस्रसनं निरूहाश्च ।
रक्तस्य चावसेचनमाश्वामनसशमनयोगाः ॥ १८५ ॥
उपनाहनं सशस्त्र पक्वस्याभ्यन्तरप्रभिन्नस्य ।
संशोधनसंशमने पित्तप्रभवस्य गुल्मस्य ॥ १८३ ॥
स्नेहः स्वेदो भेदो लङ्घनमुल्लेखन विरेकञ्च ।
सपिर्बस्तिर्गुडिकाश्वर्णमरिष्टाश्च सक्षाराः ॥ १८७ ॥
गुल्मस्यान्ते दाहः कफजस्याग्रेऽपनीतरक्तस्य ।
गुल्मस्य धरस्य क्रियाक्रमः स्त्रीभवस्योक्तः ॥ १८८ ॥
पथ्यान्नपानसेवाहेतूना वर्जनं यथास्वं च ।
नित्यं चाग्निसमाधिः स्निग्धस्य च सर्वकर्माणि ॥। १८६ ॥
हेतुलिंगं सिद्धिः क्रियाक्रमः साध्यतानुयोगाश्च ।
गुन्मचिकित्सितसंग्रह एतावाननिवेशस्य ॥ १६० ॥
वात - गुल्म मे — स्नेह, स्वेद, घृत, चूर्ण, बृहण गुटिकाये, वमन, विरेचन, रक्त - मोक्षण करे । पित्त गुल्म मे तिक्त द्रव्यो से सिद्ध घृत, दूध, विरेचन, निरूह, रक्तमोक्षण, आश्वासन, सशमनीय योग, उपनाहन, पकने पर शस्त्र - क्रिया, अन्तः गुल्म के प्रभिन्न होने पर सशोवन और समशन चिकित्सा करे । कफ-गुल्म मे — स्नेहन, स्वेदन, भेदन, लघन, वमन, विरेचन, घृत, बस्तिया, गुटिका, चूर्ण, अरिष्ट - पान, क्षार - प्रयाग, रक्तभाक्षण और अन्त में दाह करना यह चिकित्सा क्रम है । स्त्रियों में होने वाले रक्त गुल्म का चिकित्सा क्रम कह दिया है । पथ्यकारी खान - पान, रोग के अपने कारण का परित्याग, नित्य अभि की रक्षा, गुल्म- रागी को स्नेहन देकर पश्चात् सब काथो का करना, गुल्म का हेतु, लक्षण, चिकित्साविवि, साध्यासाव्यता और योग इतना गुल्म की चिकित्सा का संग्रह अग्निवेश ने बतलाया है ॥ २८४ - १६० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने गुल्मचिकित्सित नाम पञ्चमोऽव्याय समाप्तः ॥ ५ ॥
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७५ wwwwwwwwww षष्ठोऽध्यायः अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब प्रमेह की चिकित्सा का उपदेश करते है । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः ।
कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच महान् शमनं च तेषाम् ॥ ३ ॥
आस्यासुख स्वप्नसुख दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयासि ।
नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ४ ॥
निर्मोह, निरभिमानी, तृष्णारहित, आकाक्षारहित, महाज्ञानी, महातपस्वी पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश का प्रमेह, उसके कारण, लक्षण और चिकित्सा का उपदेश दिया । कफ- प्रमेह का निदान — सुख का जीवन बिताना ( चलना फिरना नही ), आराम तलबी मे लेटे रहना, दही, ग्राम्य, औदक ( जलचर ) जन्तु और आनूप ( जल - प्रधान ) देश के पशु - पक्षिया का मास रस, दूध, नूतन खान - पान ( नवीन अनाज ओर नूतन मद्य ), गुड से बने पदार्थों का अति सेवन तथा अन्य कफकारक पदार्थ कफ- प्रमेह को उत्पन्न करते है ॥ ३-४ ॥
मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य ।
करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ ५ ॥
क्षीणेषु दोपेष्ववकृष्य बस्तौ धातून्प्रमेहाननिलः करोति ।
हि स् समुपेत्य मूत्रं सदूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम् ॥ ६ ॥
सम्प्राप्ति— ( १ ) दूषित कफ- मेद, मास और शारीरिक क्लेद को दूषित करके बस्ति मे पहुच कर प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( २ ) उष्ण द्रव्यों से प्रवृद्व और कुपित पित्त मेद आदि को दूपित करके पैत्तिक प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( ३ ) कफ - पित्त दोषो के क्षीण होने पर वायु, मज्जा, वसा, ओज ओर लसीका को बस्ति मे लाकर प्रमेह को उत्पन्न करता है । ( ४ ) दूषित दाष बस्ति मे पहुच कर मूत्र को दूषित बनाकर अपने अपने लक्षणो वाले प्रमेहों को उत्पन्न करते है । ५–६ ॥