श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 391–400
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 391–400
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३७६ चरकसंहिता [ अ ० ६
साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याग्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्काः ।
समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्त्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ७ ॥
कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दृष्यं प्रमेहिणा विशतिरेव मेहाः ॥ ८ ॥
( १ ) सम क्रिया होने से कफजन्य दस प्रमेह साध्य है, ( २ ) विषम क्रिया होने से पित्तजन्य छः प्रमेह याप्य है और ( ३ ) महात्यय अर्थात् बहुत आपत्तिकारक होने से वातजन्य चार प्रमेह असाध्य है । ( १ ) समक्रिय — जो ओषधिया दूष्य, मेद, मज्जा, लसीका आदि को शान्त करते है, वे ही ओषविया कफ को भी शान्त करती है, इसलिये इनकी क्रिया समान है । ( २ ) विपमक्रिय - जो ओषविया कटु, तिक्त आदि मेद, मज्जा को कम करती है, वे पित्त को बढाती है, और जो मधुर आदि रस पित्त को शान्त करते है, वे इनको बढाते है, इसलिये विषम क्रिया है । ( ३ ) महात्यय - मजा, ओज, लसीका आदि महान् धातुओ का इसमे क्षय होता है । स्निग्ध चिकित्सा जो वायु को शमन करती है, इनको बढाती है । रूक्ष चिकित्सा वायु को बढाती है । इसलिये ये असाव्य है ' । प्रमेह मे कफ, पित्त और वायु ये तीन दोप है, मेद, रक्त, शुक्र, आप्य
( जलीय भाग ) वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और मास ये दूष्य हे ।
प्रमेहियो के बीस प्रकार के ही प्रमेह हाते है ॥ ७–८ ॥
जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घन घन चोपरि विप्रसन्नम् ।
शुक्लं सशुक्रं शिशिर शनैर्वा लालेव वा बालुकया युत वा ॥ ६ ॥
विद्यात्प्रमेहान्कफजान्दशैतान दस प्रकार के कपजन्य प्रमेह - ( १ ) जिसमे मूत्र जल के समान हो ( उदक - मेह ), २- गन्ने के रस के समान हो ( इक्षुमेह ), ३ - मूत्र घना हो ( सान्द्रमेह ), ४ – जिसमे मूत्र नीचे घना और ऊपर स्वच्छ हो ( सान्द्रप्रसाद प्रमेह ), ५ - मूत्र श्वेत हो ( शुक्लमेह ), ६- शुक्रमिश्रित मूत्र हा ( शुक्रमेह ), ७ - मूत्र शीतल हो ( शीतमेह ), ८ - मूत्र का वेग धीमा हा ( शनैर्मेह ), ६ - मूत्र लार के समान हो ( लालामेह ), १० - मूत्र बालुका के कणों से युक्त हो ( सिकतामेह ), इन दस प्रमेहो को कफ से उत्पन्न हुआ जाने ॥ ६- ॥ १ प्रमेह मे दोष ओर दूष्य की समानता का होना ही सुखसाध्यता का लक्षण है । ज्वर मे ऋतु और दोष की समानता, प्रमेह मे दोष और दूष्य की समता तथा रक्तगुल्म मे पुरातनता ये सुखसाध्यता के चिह्न कहे जाते है ।
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७७
क्षारोपमं कालमथापि नीलम् ।
हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान्प्रमेहान्षडुशन्ति पैत्तान् ॥ १० ॥
पित्तजन्य छ प्रमेह – ( १ ) क्षार के समान ' क्षारमेह ', ( २ ) काले वण का मूत्र ‘ कालमेह ', ( ३ ) नीलेवर्ण का सूत्र ' नील मेह ', ( ४ ) हल्दी के समान वर्ण का मूत्र ' हारिद्र मंह ', ( ५ ) मजीठ के वर्ण का ' माजिष्ठमेह ', ( ६ ) लालवर्ण का ' रक्तमेह ', ये छ. पित्तजन्य प्रमेह हे ॥ १० ॥
मज्जौजसा वा वसयाऽन्वित वा लसीकया वा सतन विबद्धम् ।
चतुर्विध मूत्रयतीह वाताच्छेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु ॥ ११ ॥
वर्णं रस स्पर्शमथापि गन्ध यथास्वदोष भजते प्रमेहः ।
श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः ॥ १२ ॥
चार प्रकार के वातिक प्रमेह - ( १ ) मज्जा मेह, ( २ ) ओजामेह, ( ३ ) वसामेह ओर ( ४ ) लसीका मेह ( जिसमे लसीका की तारे निकलती है ) ये चार प्रमेह आरम्भक वातुआ ( मजा, ओज आदि ) के क्षीण होने पर होते है । अथवा पित्त और कफ की अपेक्षाकृत न्यूनता होने से प्रमेह हाते है । प्रमेह मे अपने वात आदि दोपो के अनुसार वर्ण, रस, रपर्श अथवा गन्ध होता है । असाध्य वातजन्य प्रमेह मे श्याव, अरुण, शूलयुक्त तथा मज्जा, वसा, लसीका या ओज के समान गुण होता है ॥११- १२ ॥
स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता तु शय्यासनम्वप्रमुख रतिश्व ।
नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहा घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः ॥ १३ ॥
शीतप्रियत्व गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः ।
भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिका ॥ १४ ॥
पूर्वरूप - पसीना, शरीर से गन्ध का आना, अगा मे शिथिलता, लेटने, बैठने और सोने मे प्रीति, हृदय, नेत्र, जीभ और कान मे मैल का आना, शरीर मे मोटापन, केश, नखो का अधिक बढना, गीत की चाह, गला और तालु का शुष्क होना, मुख मे मधुरता, हाथ और पात्र के तलुवे मे जलन, मूत्र पर ( मधुरता से ) चिउटियो का आना, ये प्रमेह के पूर्वरूप है । १३–१४ ॥
स्थूलः प्रमेही बलवानिहैकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च ।
संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्य संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १५ ॥
प्रमेह रोगी दो प्रकार के हैं । जैसे एक स्थूल और बलवान्, दूसरा कृश तथा दुर्बल शरीर का । इनमे से कृश व्यक्ति का बृहण करना चाहिये और प्रबल दोष और अधिक बलवान् पुरुष मे सशोधन करना चाहिये । चिकित्सा
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३७८ चरकसंहिता [ अ ० ६ दो प्रकार की है, सशोधन और सशमनी । इनमे जिन पुरुषो की माता - पिता के द्वारा जन्म से प्रमेह होता है वे कृश होते है और जिन को अधिक खाने से वा स्निग्ध भोजन से होता है, वे बलवान् होते है । [ दो प्रकार के प्रमेह होते है ( १ ) सहज, और ( २ ) अपथ्य से उत्पन्न । माता - पिता के बीजदोष से उत्पन्न ' सहज ' है, प्रतिकूल आहार से उत्पन्न ' अपथ्य ' होता है । प्रथम प्रकार का प्रमेही कृश, अल्पभोजी और प्यास बहुत अनुभव करता है । दूसरे प्रकार का प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला,
सेज पर पडे रहने वाला, आलसी होता है । [ सुश्रुत । ] ॥ १५ ॥
स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय ।
ऊर्ध्व तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥ १६ ॥
उपचार- ( १ ) स्निग्ध रोगी के मल के सशावन के लिये कल्पस्थान से वर्णित नाना प्रकार के यागा का प्रयाग करे । इसके लिये वमन और विरेवन का प्रयोग करे । वमन और विरेचन द्वारा मल निकल जाने पर प्रमेह मे सन्तर्पण ही कर । स्नेहन के लिये सरसा, अलसी, इगुदी आदि के तैल हो या प्रियग्वादि गण से सिद्ध वृत आदि से स्नेहन कर ॥ १६ ॥
गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रश्चाप्यपतर्पणेन ।
प्रमेहिणः स्युः परिबृंहणानि ' कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम् ॥१७ ॥
संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया सामनी प्रयोज्या ।
मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लववश्च भक्ष्याः ॥ १८ ॥
ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषा रसेर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ।
यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यं मद्यात्ससक्तूनपि चाप्यपूपान् ॥ १६ ॥
मुद्गादियुषरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत ।
दन्तीङ्गुदीतैलयुत प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥ २० ॥
सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्न यवप्रधानस्तु भवेत्प्रमेही ।
यवस्य भक्ष्यान्विविधास्तथाऽद्यात्कफप्रमेही मधुसप्रयुक्तान् ॥ २१ ॥
निशिस्थिताना त्रिफलाकषायैः स्यस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम् ।
तान्सीधुयुक्तान्प्रपिबेत्प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव ॥ २२ ॥
( २ ) प्रमेह रोगी को अपतर्पण कराने से गुल्म, क्षय, मूत्रेन्द्रिय वा बस्ति मे शूल, मूत्रग्रह ( मूत्र का कम आना ) हो जाता है । इसके लिये रोगी की अग्नि देखकर बृहण चिकित्सा करे । १ ' परितर्पणानि ' इति च पाठ ।
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६ ( ३ ) जो प्रमेह रोगी सशोधन के योग्य न हो उसके लिये सगमनी चिकित्सा करे । उसको प्रमेह की शान्ति के लिये -मन्थ, कषाय, जौ, चूर्ण, अवलेह और लघु भक्ष्य पदार्थों का सेवन करावे । ( ४ ) विष्किर, प्रतुद पक्षियों का तथा जागल पशु - पक्षियों के मन मोहक मुस्वादु मास - रसो के साथ, रूक्ष यवान्न, वाट्य ( जौ का मण्ड ), पुराना मद्य, सत्तू, अपूप ( बडे ) मू ग आदि का यूष, तिक्त शाक, पुराने शालियो का भात, दन्ती तेल, इगुदी ( हिगोट ) का तैल, अलमी तथा सरसो के तेल के साथ साठी आदि तृणवान्यो को दे । प्रमेह रोगी का सास कर जौ का भोजन करावे । कफ - मेही को मनु के साथ जौ के नाना प्रकार के पदार्थ खाने के लिये दे | ( 2 ) नमह का रागो त्रिफला के काम में जौ का डालकर रात भर रख दे । पीछे स इनको सत्तू बनाकर जल मे आलाडित करके मनु मिला कर तर्पण नावे । इन तर्पण का सीधु के साथ मिलाकर प्रति दिन पान करे ॥ १७-२२ ॥ ये श्लेष्ममे विहिताः कषायास्तैर्भाविताना च पृथग्यवानाम् । सक्तूनपूपान्सगुडान्सधानान्भक्ष्यांस्तथाऽन्यान्विविधाश्वखादेत् २३
खराश्वगोह सटृपद्धृताना ' तथा यवाना विविधाश्चभक्ष्याः ।
देयास्तथा वेणुयवा यवाना कल्पेन गोधूममयाश्च भक्ष्याः ॥ २४ ॥
सशोधनोल्लेखनलंघनानि काले प्रयुक्तानि कफप्रमेहान् ।
जयन्ति पित्तप्रभवान्विरेकाः संतर्पणः सशमनो विधिश्च ॥ २५ ॥
दारा त्रिफला समुस्ता कषायमुत्काथ्य पिबेत्प्रमेही ।
क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रा पिबेद्रसेनामलकीफलानाम् ॥ २६ ॥
( ६ ) कफप्रमेह मे जो कषाय कहे हैं, उन कषायो से पृथग् २ रूप मे जौ को भावित करके सत्तू, अधूप, धाना ( भुने जौ ) और अन्य भक्ष्य पदाथो का नाकर गुड के साथ खावे । ( ७ ) गदहा, घोडा, गाय, हस, पृषत् ( हरिण ) इनके द्वारा खाये हुए जौ जो उनके मल मे बाहर आवे उनसे नाना प्रकार के भक्ष्य बना कर देवे । इसी प्रकार वेणुयव ( बास के जो, वशफल ) और गेहूँ के बने मक्ष्य पदार्थ सेवन करने के लिये देवे । ( ८ ) उचित समय मे दिये गये सशोधन, उल्लेखन ( वमन ), लघन कफप्रमेह को नष्ट करते है, सतर्पण, सशमन और विरेचन पित्तजन्य प्रमेहो को जीतते है । १ ' खराश्वगोधेनुकसभृताना ' इति च पाठः ।
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३८० चरकसहिता [ अ ० ६ 10 MMV ( e ) दारु हरिद्रा, हरड बहेडा, आवला और मोथा इनके क्वाथ पीवे, अथवा हल्दी के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर आवलो के रस के साथ पीवे ॥२३-२६ ॥
हरीतकीकट्फलमुस्तलो पाठाविडङ्गाजु नधन्वनाश्च ।
उभे हरिद्र तगर विडग कदम्बशालाजु नदीप्यकाश्च ॥ २७ ॥
दावीं विडङ्ग खटिरो धवश्च सुराह्वकुष्ठागुरुचन्दनानि ।
दार्व्यग्निमन्थौ त्रिफला सपाठा पाठा च सूर्वा च तथा श्वदंष्ट्रा ॥ २८ ॥
यवान्युगीराण्यभया गुडूची चव्याभयाचित्र कसप्तपर्णाः ।
पादैः कषायाः कफमेहिना ते दशोपदिष्टा मधुसंप्रयुक्ताः ॥ २६ ॥
कफप्रमेह के दस योग - ( १ ) हरड, कायफल, मोथा और लोध, ( २ ) पाठा, वायविडंग, अर्जुन, धन्वन ( धावन की छाल ), ( ३ ) हल्दी, दारुहल्दी, तगर, वायविडंग, ( ४ ) कदम्ब, शाल, अर्जुन, अजवायन, ( ५ ) दारूहल्दी, वायविडग खैर और धव की छाल, ( ६ ) देवदारु, कूठ, अगरु और लालचन्दन, ( ७ ) दारूहल्दी, अग्निमन्थ, त्रिफला और पाठा, ( ८ ) पाठा, मूबा और गाखरू, ( ६ ) अजवायन, खस और हरड़ तथा गिलोय, ( १० ) चविका, हरड, चीतामूल, सतवन की छाल, ये दस कषाय
श्लोका के चतुर्थ भागो मे कहे गये है । इनका मधु के साथ मिलाकर कफ प्रमेह
मे बरते ॥ २७–२६ ॥
उशीरलोध्राञ्जनचन्दनानामुशीर मुस्तामलकाभयानाम् ।
पटोलनिम्बामलकामृताना मुस्ताभयापद्मकवृक्षकाणाम् ॥ ३० ॥
लोध्राम्बुकालीयकधातकीना निम्बार्जुनाम्रार्तानिशोत्पलानाम् ।
शिरीषसर्जार्जुनकेशराणि प्रियङ्गपद्मोत्पलकिशुकानाम् ॥ ३१ ॥
अश्वत्थपाठासनवेतसाना कटकॅटेयुत्पलमुस्तकानाम् ।
पैतेषु मेहेषु दशैव दृष्टाः पादैः कषायाः मधुसंप्रयुक्ताः ॥ ३२ ॥
पैत्तिक प्रमेह मे दस प्रयोग - ( १ ) खस, लाध, अजन ( रसाजन लाल चन्दन, ( २ ) खस, मोथा, आवला ओर हरड, ( ३ ) परवल, नीम की छा आवला, गिलाय, ( ४ ) मोथा, हरड, पद्माख और इन्द्रजो ( कूडे की छाल ), ( ५ ) लोध, गन्धबाला, कालीयक ( पीतकाष्ठ चन्दन ) धान के फूल, ( ६ ) नीम की छाल, अर्जुन की छाल, अम्बाडा, हल्दी, नीला कमल, ( ७ ) सिरस की छाल, सर्जत्वक्, अर्जुन की छाल, नाग केसर, ( ८ ) फूलप्रियगु, श्वेतकमल, नीलात्पल, ढाक के फूल, ( ६ ) अश्वत्थ, पाठा, असन ( पीतशाल ) की छाल, वेतस की छाल, ( १० ) कटकटेरी, ( दारूहल्दी ), नीलोत्पल, मोथा, ये दस
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् पाय - योग श्लोक के चतुर्थांशो मे कहे गये है । इनको शहद के प्रयाग करे । ये पित्तनाशक है ॥ ३०-३२ ॥
सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वी कषाययोगो विहितास्तु सर्वे ।
मन्थस्य पाने यवभावनाया स्युभोंजने पानविधो पृथक्च ॥
सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु ।
मेदः कफश्चैव कषाययोगः स्नेहैश्च वायुः शममेति तेपाम् ॥
३८१ साथ मिलाकर ३३ ॥ ३४ ॥ ( १ ) सब से पूर्व ( दार्वी और सुराह्वा ) कहे दा योगो को सब प्रकार के प्रमेहो मे देवे । इन बाईस प्रयोगों को मन्थ के पान मे, जौ की भावना देने मे, भक्ष्य ओर पेय पदाथो के सस्कार मे विवेचनापूर्वक देवे । ( २ ) वात प्रमेह में इन्ही कपायो से सिद्ध घी और तैल का प्रयोग करे । इन कषाया से मेद आर कफ शान्त हाते हे और स्नेहन से वायु शान्त होता है ॥ ३३-३४ ॥ [ वातज और कफपित्तज में यापन के लिये कषाय पीये वसामेह मे अग्निमन्थ का, मज्जामेह मे गिलोय और चीते का, उसमे कूठ, कुड़ा, पाठा और कटुरोहिणा मिला ले | हस्तिमेह मे हाथी, शूकर, गधा, ऊट इनकी अस्थि क सार का उपयोग करे । मधुमेह मे कदर और खदिर का, कफानुगतादि महा ने तदनुसार उपदेश किये कषायो से साधित तैला का उपयोग करे ओर पित्तानु-गत म घृत और यमको का प्रयोग करे – अष्टाग स ० ] ।
कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि ।
कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ ३५ ॥
पिबेद्रसेनामलकस्य वापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले ।
जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजर्मनोज्ञेः ॥ ३६ ॥
( ३ ) कफ प्रमेह और पित्त - प्रमेह मे – कमीला, सतवन की छाल, शाल की लकडी इनका चूर्ण या बहेडा, रोहेडा की छाल, कुटज की छाल इनका चूर्ण अथवा कैथ के फूलो के चूर्ण का मधु के साथ चाटे । अथवा इन्ही तीनो योगो मे से एक का चूर्ण ( एक कर्प ) करके आवले के रस के साथ पीवे । आषध के जीर्ण होने पर पुराने शालि आदि के भात को जागल पशु - पक्षियों के म्वादु मास - रसो के साथ खावे ॥ ३५–३६ ॥
दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात्कफस्य पित्रास्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्य ।
तैलं कफे स्यात्स्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः ॥ ३७ ॥
वायु के साथ पित्त या कफ का अनुबन्ध देखकर स्नेह विधि मे भेद
करना चाहिये । अर्थात् कफ से कफघ्न औषधियो के कषाय मे सिद्ध तैल बरते ।
पित्त का अनुबन्ध होने पर पित्तत्र ओषधियो के कषाय मे सिद्ध घृत बरते ॥ ३७ ॥
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३८२ चरकसहिता [ अ ० ६
त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोधैः ।
वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च ॥ ३८ ॥
मञ्जिष्ठया वाऽगुरुचन्दनैश्च सर्वैः समुस्तैः कफवातजेषु ।
मेहेषु तैलं विपचेद् घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु ॥ ३६ ॥
( ५ ) त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक - ( १ ) गोखरू, अश्मन्तक, सोमवल्क ( श्वेत खदिर ) | ( २ ) भिलावा अतीस, लोध । ( ३ ) वच, पर-वल, अर्जुन, नीम की छाल, नागरमोथा । ( ४ ) हल्दी, पद्माख, अजवायन । ( ५ ) मजीठ, अगर और लाल चन्दन इन पाच योगो को मोथे के साथ मिला कर कफ - वातजन्य प्रसेहो ( कफमेह मे वायु का योग हो ) मे, तैल का पाक करे । तैल से चतुर्थाश कल्क और चौगुने जल मे धीरे २ तैल पकावे । पित्त-जन्य प्रमेह में वायु का अनुबन्ध हा तो इनके कल्क से घृत पाक करे । तीनो दोषो के लक्षण हो तो इन्ही द्रव्यों के कल्क से घी और तैल के यमक को यथा-विधि सिद्ध करके प्रयोग करे | || ३८ - ३६ ॥
फलत्रिकं दारुनिशा विशालां मुस्ता च निःक्काथ्य निशा सकल्काः ।
पिबेत्कषाय मधुमंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धतेषु ॥ ४० ॥
( ६ ) फल त्रिकादि क्वाथ —1 - त्रिफला, दारूहल्दी, विशाला ( इन्द्रायण ), मोथा इनका काथ करके हल्दी के कल्क का प्रक्षेप मिला कर मधु के साथ प्रवृद्ध प्रमेो मे पीवे ॥ ४० ॥
लोध्रं शटी पुष्करमूलमेलां मूर्वा बिड त्रिफलां यवानीम् ।
चव्य प्रियंगुं क्रमुक विशाला किराततिक्तं कटुरोहिणी च ॥ ४१ ॥
भाङ्गतं चित्रक पिप्पलीना मूलं सकुष्ठातिविष सपाठम् ।
कलिङ्गकान्केशर मिन्द्रसाह्वा नख सपत्रं मरिचं सवं च ॥ ४२ ॥
द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्भागजलावशेषे ।
रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः ॥ ४३ ॥
लोप्रासवोऽय कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद् द्विपलप्रयोगात् ।
षाण्ड्वामयार्शास्यरुचि ग्रहण्या दोष किलासं विविधं च कुष्ठम् ॥४४ ॥
इति लोध्रासवः २ । १ यहा पर पाच योग है । सब के साथ मोथा मिलाना चाहिये । कई आचार्य ' समुस्तेः ' के स्थान पर ' समस्तै ' पढते है । उनके लिये एक ही योग है । अष्टाग - सग्रह मे इसको एक ही योग पढा है । वहा पर चतुर्जातक का प्रयोग करने के लिये लिखा है २ ' मव्वासव " इति च पाठः ।
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३८३ ( ( ) बासव -लाव, कचूर, पोहकरमूल, छोटी इलायची, मूर्वा मूल, बायविडंग, त्रिफला, अजवायन, चबिका, फल प्रियगु, क्रमुक ( सुपारी या पट्टिका लोव ), इन्द्रायण, चिरायता, कुटकी, भार्गी, तगर, चीतामूल, पिप्पलीमूल, कूठ, अतीस, पाठा, इन्द्रजा, नागक्सर, इन्द्रसाहा ( छोटी इन्द्रायण ), नखी, तेज-पत्र, कालीमिचें, प्लत ( केवटी मांथा ) प्रत्येक वस्तु १ कर्प लेकर दो द्राण पानी मे क्वाथ करे । चतुर्थाश ( ( २ आढक ) रहने पर छान ले । इसमे एक आढक मधु मिला कर घी से भावित पात्र में डाल कर पन्द्रह दिना तक सन्धान करके रख दे | मात्रा - दो पल है, यह लोब्रासव कफजन्य, पित्तजन्य प्रमेह का, पाण्डुरोग, अर्ग अरुचि, ग्रहणीरोग, किलास जोर नाना प्रकार के कुठा का नष्ट करता है || ४१–४४ ॥
काथः स एवाटपले च दन्त्या भल्लातकाजा च चतुष्पलं स्यात् ।
सितोपला त्वपला विशेषः क्षौद्रं च तावत्पृथगासवौ तौ ॥ ४५ ॥
( ८ ) दन्त्यासव - पूर्वोक्त लोब्रासव के क्वाथ में दन्तीमूल के आठ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा ( १ आटक ) मिला कर रखे । यह दन्त्यासव है | ( ६ ) मल्लातकासव - लोध्रासयोक्त क्वाथ आधा द्रोण, विशुद्र भिलावा का चूर्ण ४ पल, मिसरी = पल, शहद काथ से आपा डाल कर सन्धान करे । वे दोनो आसव कफजन्य और पित्तजन्य प्रमेहा को नष्ट करते है || ४५ || सारोदक चाथ कुशोदक वा मधूदुक वा त्रिफलारस वा । शीधु पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा ।४६ । ( १० ) डगपानीय विधि से खैर की लकडी का सावित जल, कुशा मूल का जल ( काथ ), शहद का शरबत, त्रिफला का काथ या रस, दोष रहित शीधु ( जौ का मन्त्र ), या पुरातन श्रेष्ठ माध्वोक ( मनु या द्राक्षा आदि से बना मद्य ) पीवे ॥। ४६ ॥
मासानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवाना विविधाश्च भक्ष्यान् ।
संशोधनारिष्टकपायलेहैः सन्तर्पणोत्थान् शमयेत्प्रमेहान् ॥ ४७ ॥
भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्काश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः ।
श्वित्रं च कुष्ठं च कफ च कृच्छ्रं तथैव मुद्गामलकप्रयोगात् ॥ ४८ ॥
सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विना ये च मयोपदिष्टाः ।
विरूक्षणार्थ कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः ॥४६ ॥।
१ सतर्पणज्ञ इति च पाठः ।
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३८४ चरकसंहिता [ अ ० ६
व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढेरुद्वर्तनैः स्नानजलाव सेकैः ।
सेव्यत्वगेला गुरुचन्दनाद्यविलेपनैवाशु न सन्ति मेहाः ॥ २० ॥
her मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः प्रसमीक्ष्य तस्मात् ।
वैद्येन पूर्न कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि ॥ ५१ ॥
या बातमेहान्प्रति पूर्वमुक्ता वातो बणाना विहिता किया सा ।
वायुहि मेहेष्यतिकपिताना कुप्यत्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता ॥ ५२ ॥
यह तुभये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहषु न ते निषेव्याः ।
तोर सेवा विहिता यथव जातस्य रागस्य भवेश्चिकित्सा ॥ ५३ ॥
( १० ) पशु - पक्षियों के शलाका पर सुन मास, जो से बने नाना प्रकार के मक्ष्य पदार्थ खाव । रुतर्पण से उत्पन्न प्रमेही का सशाधन, आरष्ट, कषाय, अवलेहो द्वारा शान्त कर । ( ११ ) भुने हुए जो का, सूखे सत्तुओ का, मूग ओर आवलो के आहार को नित्य खाने से प्रमेह, श्वित्र, कुष्ठ, कफ राग ओर मूत्रकृच्छ्र नही होते । ( १२ ) सतर्पण से उत्पन्न रागो मे तथा मेदस्वी पुरुषा के लिये विरूक्षण योग जो पहिले सतर्पणीय अध्याय मे तथा ' अष्टा - निन्दितोय ' अध्यान मे कहे है, उनका कफज ओर पित्तज प्रमेो मे प्रयोग करे । ( १३ ) नाना प्रकार की व्यायामोसे, बलपूर्वक मर्दन से, स्नानजल के परिषेका से, खस, दालचीनी, इलायची, अगरु, चन्दन आदि के लेपन से प्रमेह नष्ट होते है । ( १४ ) प्रवृद्ध क्लेद, मेद और कफ प्रमेह के कारण है, इसलिये वैद्य को चाहिये कि कफ - पि-त्तज प्रमेहो मे अपतर्पण करे । ( १५ ) वात प्रमेहो की जो चिकित्सा प्रथम कही है, वही चिकित्सा वातावण प्रमेही की हानी चाहिये । क्योकि प्रमहा मे अत्य-धिक कर्षण हाने से वायु प्रकुपित हा जाती है, इसलिये ये वातावण है । असाव्य वातजन्य प्रमेह का चिकित्साविधि मे विचार करना व्यर्थ है । ( १६ ) जिन जिन कारणो से प्रमेह उत्पन्न होता है, प्रमही को चाहिये कि उनका सेवन न करे । जैसे — स्वस्थ पुरुषो मे रोगोलत्ति के कारणों को सेवन न करने का विधान है उसी प्रकार यहा भी कारणो को सेवन न करना ही चिकित्सा है ॥ ४७–५३ ॥
हारिद्रवर्णं रुविरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः ।
यो मूत्रयेत्तं न वदेत्प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥ ५४ ॥
१ ' नाश प्रयाति ' इति च पाठ ।
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अ ०८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५ की स्मृति और बुद्धि को बढाने के लिये कुष्ठ - नाशन अध्याय मे संग्रह किया है ॥ १७७ - १७६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने कुष्ठ चिकित्सितनाम सप्तमोऽव्याय समाप्त || ७ | } अष्टमोऽध्यायः अथातो राजयक्ष्मचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ' राजयक्ष्मा की चिकित्सा ' का वणन करते है । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
दिवौकसं कथयतामृषिभिव श्रुता कथा ।
कामव्यसनसयुक्ता पौराणी शशिनं प्रति ॥ ३ ॥
रोहिण्यामतिसक्तस्य शरीरं नानुरक्षतः ।
आजगामाल्पतामिन्दोदेहः स्नेहपरिक्षयात् ॥ ४ ॥
दुहितृणामसंभोगाच्छेपाणां च प्रजापतेः ।
क्रोधो निःश्वासरूपेण मूर्तिमान् निःसृतो मुखात् ॥
पजापतेहिं दुहितरष्टाविशतिमशुमान् ।
भार्यार्थ प्रतिजग्राह न च सर्वास्ववर्तत ॥ ६ ॥
गुरुणा तमवध्यात भार्यास्वसमवर्तिनम् ।
रजःपरीतमबल ' यक्ष्मा शशिनमाविशत् ॥ ७ ॥
सोऽभिभूतोऽति लिना गुरुक्रोधेन निष्प्रभः ।
देवदेवपिसहितो जगाम शरण गुरुम् ॥ ८ ॥
अथ चन्द्रमसः शुद्धा मति बुद्ध्वा प्रजापतिः ।
प्रसाद कृतवान्सोमस्ततोऽश्विभ्या चिकित्सितः ॥
विमुक्त ग्रचन्द्रो विरराज विशेषतः ।
ओजसा वर्धितोऽश्विभ्या शुद्ध सत्त्वमवाप च ॥।
क्रोधो यक्ष्मा ज्वरो रोग एकोऽथ दुःखसंज्ञितः ।
यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः ॥
१ ' रजोऽन्धमबल दोन ' इति च । २ ' गुरुणा ' इति च ५ ॥ ६ ॥ १० ॥ ११ ॥