श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 401–410
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 401–410
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४१६ चरकसंहिता [ अ ० ८ ~~~
स यक्ष्मा हुकृतोऽश्विभ्या मानुषं लोकमागतः ।
लब्ध्वा चतुर्विध हेतुं समाविशति मानवान् । १२ ॥
यक्ष्मा की उत्पत्ति का उपाख्यान —- देवताओ के कहते हुए ऋषियो ने चन्द्रमा के काम व्यसन से सम्बन्धित पुराण में वर्णित कथा को इस प्रकार सुना है-भगवान् प्रजापति की अट्ठाईस कन्याओ का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ था । इन कन्याओ को भाया रूप मे लेकर चन्द्रमा ने सबके साथ समानता का व्यवहार नही किया । शरीर पर व्यान न रखते हुए उसने रोहिणी के साथ अति आसक्ति का व्यवहार किया । इस आसक्ति से शरीर का स्नेह क्षीण होने के कारण चन्द्रमा का शरीर कृश हो गया । शेष स्त्रियो ने चन्द्रमा के इस अस-मान व्यवहार की बात दक्ष प्रजापति से कही । तब दक्ष प्रजापति के मुख से निःश्वास रूप मे मूर्त्तिमान् क्रोध उत्पन्न हुआ । भाय रूप मे सबका ग्रहण करने पर समान व्यवहार न होने पर असमान व्यवहार करने वाला चन्द्रमा को गुरु ( प्रजापति ) ने शाप दिया । इसमे रजोगुण से युक्त निर्बल चन्द्रमा मे यक्ष्मा ने प्रवेश किया उसको यक्ष्मा हो गया ' । वह चन्द्रमा गुरु ( श्वशुर ) के अत्यन्त बलवान् क्राध से तिरस्कृत होकर कान्तिरहित हो गया । तब देवा ओर देवर्षियो को साथ मे लेकर चन्द्रमा गुरु ( प्रजापति ) की शरण मे गया । इसके पश्चात् चन्द्रमा की बुद्धि शुद्ध हो गई जान कर गुरु प्रसन्न हो गये । इसके पीछे अश्विनी-१ ( १ ) प्रजापति की अट्ठाईस कन्याये अट्ठाईस नक्षत्र ये हे । ( १ ) अश्विनी, ( २ ) भरणी, ( ३ ) कृत्तिका, ( ४ ) रोहिणी, ( ५ ) मृगशिरा, ( ६ ) आद्रा, ( ७ ) पुनर्वसु, ( ८ ) पुण्या, ( ६ ) आश्लेषा, ( १० ) मघा, ( ११ ) पूर्वा फाल्गुनी, ( १२ ) उत्तरा फाल्गुनो, ( १३ ) हस्ता, ( १४ ) चित्रा, ( १५ ) स्वाति, ( १६ ) विशाखा, ( १७ ) अनुराधा, ( १८ ) ज्येष्ठा, ( १६ ) मूला, ( २० ) पूवापाढा, ( २१ ) उत्तराषाढ़ा, ( २२ ) श्रवणा, ( २३ ) धनिष्ठा, ( २४ ) शतभिपा, ( २५ ) पूवा भाद्रपदा, ( २६ ) उत्तरा भाद्रपदा, ( २७ ) रेवती और ( २८ ) अभिजित् । ( २ ) राजयक्ष्मा के लक्षण – स्नेह का परिक्षय, शरीर का कृश और निष्प्रभ ( आज का ह्रास ) होना, ये तीन लक्षण है जो कि सबसे प्रथम शरीर पर दिखाई देते है | क्षीण होते हुए चन्द्र मे ये तीनो लक्षण स्पष्ट होने से चन्द्र की कथा से ही राजयक्ष्मा को जोड दिया है । दिन रात्रि ये दो अश्वी है 1 । वे ही क्षीण होते हुए चन्द्र के क्षय को दूर करके पुनः पुनः पूर्ण कर देते हैं । इस प्रकार यह अलकार से कथन है ।
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अ ०८ 1 २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७ V कुमारो ने उसकी चिकित्सा की । इस प्रकार रोग से मुक्त चन्द्रमा विशेष रूप से शोभित होने लगा, उसका ओज बढने लगा और शुद्ध सत्त्व ( मन ) को प्राप्त हुआ । क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर, रोग ये सब एक ही अर्थ को बतलाते है । यह रोग सबसे प्रथम नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ, अतएव राजयक्ष्मा नाम से कहा जाता है । यह यक्ष्मा रोग अश्विनीकुमारो के हुकार से भयभीत होकर मनुष्य-लोक में आगया । यह चार प्रकार के कारणों का प्राप्त करके मनुष्यो मे प्रवेश कर जाता है ॥ ८-१२ ॥
अयथाबलमारम्भ वेगसन्धारणं क्षयम् ।
यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुथ विपमाशनम् ॥ १३ ॥
यक्ष्मा के चार कारण - ( १ ) अपने बल वा शक्ति से अधिक कार्य करना, ( २ ) वेगो का रोकना, ( ३ ) धातुक्षय और ( ४ ) विषम भोजन, राजयक्ष्मा के ये चार कारण है ॥ १३ ॥
युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनप्लवनादिभिः ।
पतनैरभिघातैर्वा साहसेर्वा तथाऽपरः ॥ १४ ॥
अयथाबलमारम्भेर्जन्तोरुरसि विक्षते ।
वायुः प्रकुपितो दोषावुदीयां भौ विधावति ॥ १५ ॥
स शिरःस्थः शिरःशूल करोति गलमाश्रितः ।
कण्ठोद्ध्वंस च कास व स्वरभेदमरोचकम् ॥
पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः । जम्भा ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्वोरसो रुजम्
क्षणनाचोरसो रक्तं कासमानः कफानुगम् ।
जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरः शूली निरस्यति ॥ १८
sa साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते ।
एकादशभिरात्मज्ञः सेवेतातो ' न साहसम् ॥
१६ ॥
॥ १७ ॥
॥
१६ ॥
( १ ) शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय —खूब युद्ध करना, खूब अध्ययन ( पढना ), बहुत भार उठाना, बहुत मार्ग चलना, बहुत लघन, बहुत प्लवन ( कूदना ), गिरना, चोट लगना, साहस तथा शक्ति से बाहर के अन्यान्य कार्य करने पर पुरुष की छाती मे क्षत हो जाता है । तब प्रकुपित वायु - पित्त और कफ दोनो दापो को उदीर्ण करके इधर - उवर भागता है । शि मे पहुच कर शिर.शूल उत्पन्न करता है, गले मे आश्रित होकर कण्ठोदूध्वंस, १. ' भजेत्तस्मात् ' इति वा पाठः ।
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४१८ चरकसंहिता [ अ ० ८ I कास, स्वरभेद और अरुचि उत्पन्न करता है । पार्श्व मे स्थित पार्श्वशूल को गुदा मे स्थित होकर अतीसार को, सन्धियों में स्थित वायु जम्भाई और ज्वर को, उरः मे स्थित वायु छाती में दर्द को उत्पन्न करता है । उरः ( फेफड़ों ) मे छत होने से रोगी के खांसते समय कफ से मिला रक्त बाहर आता है । छाती के जर्जरित होने से कष्ट के साथ कफ निकलता है । साहसिक यक्ष्मा इन कारणो से उत्पन्न होता है, यह यक्ष्मा ग्यारह लक्षणो सहित होता है । इसलिये अपने सामर्थ्य को जानने वाला पुरुष कभी साहस नही करे ॥ १४–१६ ॥
ह्रीमत्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् ।
वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः ॥ २० ॥
तदा वेगप्रतीघातात्कफपित्ते समीरयन् ।
ऊर्ध्व तिर्यगधश्चैव ' विकारान्कुरुतेऽनिलः ॥ २१ ॥
प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम् ।
पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम् ॥ २२ ॥
अङ्गमर्द मुहुश्छर्दि वर्चोभेदं त्रिलक्षणम् ।
रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान् ॥ २३ ॥
( २ ) वेग - सन्धारण से उत्पन्न यक्ष्मा – लज्जा से, घृणा से वा भय के कारण जब मनुष्य वायु, मूत्र तथा मल के उपस्थित वेगो को रोकता है, तब वेगों के रुक जाने से प्रकुपित वायु कफ और पित्त को ऊपर, नीचे, तिरछे तीनों गतियों मे प्रेरित करके अनेक विकारो को उत्पन्न करता है । तब प्रतिश्याय, कास, स्वरभेद, अरोचक, पार्श्वशूल, शिरःशूल, ज्वर, कधो मे पीड़ा, अंगमर्द बार बार वमन, अतीसार ये नाना विकार तीनो लक्षणो से उत्पन्न होते हैं । राजयक्ष्मा के ये ग्यारह रूप है, जिनको देख कर राजयक्ष्मा महान् रोग कहा जाता है || २०-२३ ॥
हर्षोत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्षणात् ।
व्यवायानशनाभ्या च शुक्रमोजश्च हीयते ॥ २४ ॥
ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषानुदीरयन् ॥
प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्द शिरोरुजम् ॥ २५ ॥
श्वासं विडभेदमरुचि पार्श्वशूलं स्वरक्षयम् ।
करोति चांससन्तापमेकादशमिमान् गदान् ॥ २६ ॥
१ ' तिर्यगधः कुर्याद् ' इति च
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४२० चरकसंहिता [ अ ०८ स्त्रीमद्यमासप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ ३४ ॥
मक्षिकाघुणकेशाना तृणाना पतनानि च ।
प्रायोऽन्नपाने, केशाना नखाना चाभिवर्धनम् ॥ ३५ ॥
पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदंश्चाभिधर्पणम् ।
स्वप्ने केशास्थिराशीना भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ ३६ ॥
जलाशयाना शैलाना बनाना ज्योतिपामपि ।
शुष्यता क्षीयमाणाना पतता यच्च दर्शनम् ॥ ३७ ॥
प्राग्रूपं वहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः । राजयक्ष्मा का पूर्वरूप – प्रतिश्याय ( जुकाम ), दुर्बलता, दोषरहित पदाथो मे भी दोष का दीखना, शरीर मे बीभत्सता दीखना, घृणा होना, खाते हुए भी बल और मास का क्षोण होना, स्त्री - प्रियता ( मैथुन की चाह ), मद्यगियता, मासप्रियता, शर्मीलापन ( लोगो से मिलने मे सकोच ), खान पान मे मविखयो, घुण, केश, तिनकों का गिरना, केश और नखो का जल्दी जल्दी बढ़ना, स्वप्न मे पक्षियों तथा व्याघ्र आदि हिंसक पशुओ से पराजित होना, बालो, अस्थिया ओर राख के ढेर पर चढना, तालाबो का सूखते हुए, पर्वतो को तथा वनो को क्षीण होते हुए और ताराओ को गिरते हुए देखना, यह बहुत रूप वाले यक्ष्मा
के पूर्वरूप है । ३३ - ३७ ॥
रूपं तस्य यथोद्देशं परं शृणु सभेषजम् ॥ ३८ ॥
यथा स्वेनोसणा पाक शारीरा यान्ति धातवः ।
स्रोतसा च यथास्वेन धातुः पुष्यति धातुना ॥ ३६ ॥
स्रोतसा सनिरोधाच रक्तादाना च सक्षयात् ।
धातूप्मणा चापवयाद्राजयक्ष्मा प्रवर्तते ॥ ४० ॥
तस्मिन्काले पचत्यग्नियेदन्न कोष्ठमाश्रितम् ।
मलीभवति तत्प्रायः कल्पते किचिदोजसे ॥ ४१ ॥
तस्मात्पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद्राजयक्ष्मणः ।
सर्वधातुक्षयार्तस्य बल तस्य हि विड्बलम् ॥ ४२
रसः स्रातःसु रुद्धेषु स्वस्थानस्थो विवर्धते ।
स ऊर्ध्व कासवेगेन बहुरूपः प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
जायन्ते व्याधयश्चातः षडेकादश वा पुनः ।
येषा सघातयोगेन राजयक्ष्मेति कल्प्यते ॥ ४४ ॥
॥
अब यक्ष्मा के रूप और औषध सुनो - शरीर मे अपनी गरमी से धातुओ का पाक ( पोषण ) होता है । धातु अपने अपने स्रोतो द्वारा जाकर धातु का
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अ ०८ चिकित्सितस्थानम् ४२१ ^^ ^^ ^^ MA ^^^ पोषण करता है, रस से रक्त का और रक्त से मास का पोषण होता है । स्रोतों के रुक जाने से, रक्त आदि धातुओं के क्षीण होने से और धातुओ की उष्णिमा के घट जाने से राजयक्ष्मा रोग उत्पन्न हो जाता है । इस अवस्था मे कोष्ठामि आमाशय मे जिस अन्न का परिपाक करती है, उसका अधिक भाग मल बन जाता है । कुछ थोडा सा भाग ही ओज में परिणत होता है । इसलिये राज-यक्ष्मा के रोगी मे मल की रक्षा करनी चाहिये । क्योकि मल के सिवाय अन्य सब धातु इसमे क्षीण हो जाते है अतः यक्ष्मा रोगी का बल ( शक्ति ) मल ही है " । अत. रोगी को अतिम्मार से बचाना चाहिये । स्रोतो के रुक जाने पर अपने स्थान मे ही रस का सचय अर्थात् वृद्धि होने लगती है, यह रस खासी के वेग के कारण ( आमाशय से ) ऊपर की ओर मुख नाक से अनेक रूपो मे प्रवृत होता है । इसके पश्चात् छ. या ग्यारह रोग ( लक्षण यक्ष्मा के ) हो जाते है, जिनके एकत्र समूह को राजयक्ष्मा के नाम से कहते है ॥ ४०-४४ ॥
यक्ष्मा के लक्षण-कासोऽसतापो वैवर्य ज्वरः पार्श्वशिरोरुजौ ।
शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ॥ ४५ ॥
रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मिणः षडिमानि वा । यक्ष्मा के ग्यारह रूप – कास, कन्धो मे ताप, ( पीडा ) स्वरभेद, ज्वर, पार्श्वशूल, शिरोवेदना, रक्तवमन, कफ का आना, श्वास, कोष्ठामय ( अतिसार ), अरुचि, ये यक्ष्मा के ग्यारह रूप है ॥ ४५- ॥ कासो ज्वरः पार्श्वगूल स्वरवचगदोऽरुचिः ॥ ४६ ॥
छः रूप —– कास, ज्वर, पार्श्वशूल, स्वरभेद, मलभेद और अरुचि ॥ ४६ ॥
सर्वैधैखिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मासबलक्षये ।
युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽयतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥
१ आहार रस के जीर्ण होते समय पाचकाग्नि से प्रसाद और मल दो भाग बनते है । प्रसाद भाग भी स्थूल और सूक्ष्म दो भागो मे बट जाता है । सूक्ष्म भाग उसी धातु का पोषण करता है, और स्थूल भाग आगे पहुच जाता है, वहा पर अग्रिम धातु की गरमी से तीन भाग बनते है । इस प्रकार होते समय मजा से दो ही भाग बनते है, उसमे मलभाग नही होता । यक्ष्मा के रोगी मे मल भाग अधिक बनता है, प्रसाद भाग कम बनता है । ऐसा यत्न करना चाहिये कि शरीर इस मल मे से भी अधिक से अधिक प्रसाद अश को ले सके, अतः मल की रक्षा करने को कहा है ।
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४२२ चरकसंहिता [ अ ० ८ बल और मास के क्षीण होने पर इन ग्यारह या छः अथवा तीन ( ज्वर, कास, रक्तवमन ) लक्षणो से युक्त यदि रोगी हो तो उसको असाध्य समझे । परन्तु यदि रोगी का बल और मास क्षीण न हुआ हो और उसको ग्यारह लक्षण भी हो तो भी उसको साध्य समझे ॥ ४७ ॥
घ्राणमूले स्थितः श्लेष्मा रुधिरं पित्तमेव वा ।
मारुताध्मातशिरसो मारुतः श्यायते प्रति ॥ ४८
प्रतिश्यायस्ततो घोरो जायते देहकर्षणः ।
तस्य रूप शिरःशूल गोरव प्राणविसवः ॥ ४६ ॥
ज्वरः कासः कफोत्क्लेशः स्वरभेदोऽरुचिः क्लमः ।
इन्द्रियाणामसामर्थ्य यक्ष्मा चातः प्रवर्तते ॥ ५०
पिच्छिलं बहल विस्रं हरित श्वेतपीतकम् ।
॥
॥
कासमानो रसं यक्ष्मी निष्ठीवति कफानुगम् ॥ ५१ ॥
( १ ) वायु से पूर्ण शिर वाले रोगी के नासिका - मूल मे स्थित कफ, रक्त या पित्त जिस समय वायु के प्रति गमन करते है, तब शरीर को कम करने वाला भयानक प्रतिश्याय ( जुकाम ) उत्पन्न होता है । शिरमे दर्द, भारीपन, नासिका से स्राव बहना, ज्वर, कास, कफ का उत्क्लेश, स्वरभेद, अरुचि, क्लम, इन्द्रियो का अपने विषय मे प्रवृत्त न होना, ये प्रतिश्याय के पूर्वरूप है । पीछे से प्रति-श्याय यक्ष्मा मे बदल जाता है । यक्ष्मा रोगी खांसते समय कफ से मिश्रित चिकना, घना, दुर्गन्धयुक्त, हरा, श्वेत, पीला रस ( थूक ) थूकता है ॥ ४८ - ५१ ॥
अंसपार्श्वाभितापश्च तापः पादकरस्य च ।
ज्वरः सर्वाङ्गगश्चेति लक्षणं राजयक्ष्मणः ॥ ५२
राजयक्ष्मा का लक्षण — अस और पाश्वो का अभिताप और पैरो मे दाह, जलन, सर्वशरीरगत ज्वर यह राजयक्ष्मा के
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात्कासवेगात्सपीनसात् ।
स्वरभेदो भवेद्वाताद्रक्षः क्षामश्चलः स्वरः ॥ ५३
तालुकण्ठपुरीदाहः " पित्ताद्वक्तुमसूयते ।
कफान्मन्दी विबद्धश्च स्वरः खुरुखुरायते ॥ ५४
सन्नो रक्तविबन्धत्वात्स्वरः कृच्छ्रात्प्रवर्त्तते ।
कासातिवेगात्करुणः पीनसात्कफवातिकः ॥ ५५
( २ ) स्वरभेद - वायु से, पित्त से, कास से, पीनस से, १ ' परिप्लोषः ' इति च ॥। ( पीडा ), हाथ लक्षण है ॥५२ ॥
॥ ॥॥। स्वरभेद होता है ।
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अ ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२३ इनमे वात से उत्पन्न स्वरभेद मे - स्वर रूक्ष, निर्बल और कम्पित होता है, पित्त के कारण — तालु और कण्ठ मे दाह होता है, रोगी बोलना पसन्द नहीं करता, उसे बोलने मे कष्ट होता है । कफ के कारण — स्वर मन्द ( धीमा ), बघा ( रुका हुआ, खुरखुर करता है, रक्त से उत्पन्न मे —- रक्त का विबन्ध होने से स्वर बैठा हुआ और बहुत कष्ट से प्रवृत्त होता है, खाँसी के अतिवेग के कारण स्वरभेद मे स्वरयंत्र खराब हो जाता है, पीनस ( प्रतिश्याय ) से उत्पन्न स्वरभेद के लक्षण कफजन्य, वातजन्य प्रतिश्याय के समान होते है ॥ ५३–५५ ॥ पार्श्वशलं त्वनियतं संकोचायामलक्षणम् । ( ३ ) पार्श्वशूल —सकोच तथा विस्तार निश्चित नही है, यह लक्षण ( पार्श्व -शूल ) भी अवश्यम्भावी नही है, पार्श्वशूल कभी सोच मे होता है, और कभी आयाम अवस्था मे होता है । पार्श्वशूल - यक्ष्मा मे कभी ता फेफड़ो के सकुचित अवस्था मे होता है, और कभी फेफडो के फूलने की अवस्था मे होता है, निमो-निया की तरह एक अवस्था मे निश्चित नह । रहता । शिरःशूलं ससतापं यक्ष्मणः स्यात्सगोरवम् ॥ ५६ ॥
( ४ ) यक्ष्मा के रोगी को शिर मे शूल, सन्ताप ( दाह ) और भारीपन प्रतीत होता है ॥ ५६ ॥
अतिखिने शरीरे तु यक्ष्मिणो विषमाशनात् ।
कण्ठात्प्रवर्तते रक्त श्लेष्मा चोत्क्लिष्टसंचितः ॥ ५७ ॥
रक्तं विबद्धमार्गत्वान्मासादीन्नानुपद्यते ।
आमाशयस्थमुत्क्लिष्टं बहुत्वात्कण्ठमेति वा ॥ ५८ ॥
( ५ ) शरीर के आते शिथिल या दुर्बल होने के कारण, विषम भोजन करने पर, रागी के कण्ठ द्वारा उत्क्लेश से सचित रक्त और कफ की प्रवृत्ति होती है । मार्गो के रुके होने से रक्त मास आदि धातुओ मे वह पहुँचता ( वह फुस्फुसो मे सचित हो जाता ) है, अथवा आमाशय मे सचित होने ( बढ़ने ) पर
उत्क्लेश के कारण कण्ठ की ओर आ जाता है । रक्त का वमन होता है ॥५७-५८ ॥
वातश्लेष्मविबन्धत्वादुरसः श्वासमृच्छति ।
दोषैरुपहते चाग्नौ सपिच्छमतिसार्यते ॥ ५६ ॥
( ६ ) छाती के वायु और कफ से भरे हाने पर श्वास ( वास मे कठिनता ) रोग उत्पन्न होता है । वातादि दोषो द्वारा अग्नि के मन्द हो जाने से पिच्छा-युक्त अतिसार होता है ॥ ५६ ॥
पृथग्दोषैः समस्तैर्वा जिह्वाहृदयसंश्रितैः ।
जायतेऽरुचिराहारैस्तुष्टैरर्थैश्च मानसैः ॥ ६० ॥
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४२४ चरकसंहिता [ अ ० ८ wwwwww wwww
कषायतिक्तमधुरैर्विद्यान्मुखरसैः क्रमात् ।
वाताद्येररुचि जाता मानसी दोपदर्शनात् ॥ ६१ ॥
अरोचकात्कासवेगादोषोत्क्लेशाद्भयादपि ।
छदिर्यासा विकाराणामन्येपामप्युपद्रवः ॥ ६२ ॥
सर्व त्रिदोषजो यक्ष्मा दोपाणां तु बलाबलम् ।
परीक्ष्यावस्थितं वैद्यः शोषिण समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥
( ७ ) जिहा और हृदय मे आश्रित वात, पित्त, कफ, पृथक् पृथक् अथवा समस्त दोषो से या मानसिक विषय ( काम, शोक, क्रोध ) के दूषित होने से आहार मे अरुचि हो जाती है । मुख मे कषाय रस होने पर वातजन्य, निक्त रस होने पर पित्तजन्य, मधुररस होने पर कफजन्य अरुचि को समझना चाहिये । मन के अप्रिय ( द्विष्ट ) वस्तु के दर्शन मे मानसी अरुचि उत्पन्न होती है । अरुचि, कास का वेग, दोष का उत्क्लेश और भय इन अनेक कारणों मे जो वमन होता है, वह अन्य विकारो मे भी उपद्रव रूप होता है । सब यक्ष्मा त्रिदोषजन्य है । इसलिये वैद्य को चाहिये कि रोगी की अवस्थानुसार दोषो के बलाबल को देखकर चिकित्सा करे ॥ ६०–६३ ॥
प्रतिश्याये शिरःशूले कासे श्वासे स्वरक्षये ।
पार्श्वशूले च विविधाः क्रियाः साधारणीः शृणु ॥ ६४ ॥
पीनसे स्वेदमभ्यङ्ग धूममालेपनानि च ।
परिषेकावगाहांश्च यावक वाट्यमेव च ॥ ६५ ॥
लवणाम्लकटूष्णाश्च रसान्स्नेहोपबृहितान् ' लावतित्तिरिक्षाणा वर्तकाना च कल्पयेत् ॥ सपिप्पलीकं सयवं सकुलत्थ सनागरम् । दाडिमामलकोपेतं स्निग्धमाज रस पिबेत्
ते षड् विनिवर्तते विकाराः पीनसादयः ।
मूलकानां कुलत्थाना यूषैर्वा सूपकल्पितैः ॥
यवगोधूमशाल्यन्नैर्यथासात्म्यमुपाचरेत् । | ६६ ॥ || ६७ ॥ ६८ ॥ पिबेत्प्रसादं वारुण्या जलं वा पाचमूलिकम् ॥ ६६ ॥
धान्यनागरसिद्धं वा तामलक्याऽथवा श्रुतम् ।
पर्णिनीभिश्चतसृभिस्तेन चान्नानि कल्पयेत् ॥ ७० ॥
१ ' स्नेहोपसहितान् ' इति च ।
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अ ० ८ 1 चिकित्सितस्थानम् ४२५ प्रतिश्याय, शिरःशूल, कास, श्वास, स्वरभग और पार्श्वशूल मे नाना प्रकार की साधारण ( सशमनी ) चिकित्साए सुनो । ( १ ) प्रतिश्याय मे - स्वेद, अभ्यग, धूप, आलेपन, परिषेक, अवगाहन, यावक ( यवान्न ), वाट्य ( यवमण्ड, जौ का दलिया ) इनका प्रयोग करे । ( २ ) लाव, तीतर, मुर्गा और बटेर, इनके मासो से लवण, अम्ल कटु रसयुक्त उष्ण और घी आदि से युक्त मास रसो की कल्पना करे । ( ३ ) पिम्पली, जौ, कुलथी, सोठ, अनारदाना ( अनार का रस ) आवला इनके द्वारा सावित घी आदि से स्निग्ध बनाकर बकरी के मास का प्रयोग करे । इसके प्रयोग से प्रतिश्याय आदि छ विकार शान्त होते है । ( ४ ) मूली वा कुलथी से यथाविधि यूप सिद्ध करके अथवा जौ, गेहूँ, शालि के अन्न के सात्म्य के अनुसार रोगी को देवे । ( ५ ) वारुणी मन्त्र के ऊपर का स्वच्छ भाग अथवा विदारीगन्ध आदि पचमूल से सिद्ध जल या धनिया और सोठ से साधित जल, अथवा तामलकी ( भूई आवला ) से सिद्ध जल, या चारो पर्णिनियो ( मुद्गपर्णी, मात्रपर्णी शालपर्णी और पृक्षिपर्णी ) से सिद्ध जल पीने के लिये देवे । इनसे ही साधित जल मे या इनमे संस्कृत भक्ष्य बनाकर देवे ॥ ६४ ७० ॥
कृशरोत्कारिकामाषकुलत्थयवपायसैः ।
संकरस्वेदविधिना कण्ठं पार्श्वमुरः शिरः ॥ ७१ ॥
स्वेदयेत्पत्रभङ्गेण शिरश्च परिषेचयेत् ।
बलागुडूचीमधुकतैर्वा वारिभिः सुखैः ॥ ७२ ॥
बस्तमत्स्यशिरोभिर्वा नाडीस्वेद प्रयोजयेत् ।
कण्ठे शिरसि पार्श्वे च पयोभिर्वा सवातिकैः ॥ ७३ ॥
औदकानूपमांसानि सलिलं पाञ्चमूलिकम् ।
सस्नेह मारनालं वा नाडीस्वेद प्रयोजयेत् ॥ ७४ ॥
जीवन्त्याः शतपुष्पाया बलाया मधुकस्य च ।
बचाया वैशवारस्य विदार्या मूलकस्य च ॥ ७५ ॥।
औदकानूपमासानामुपनाहाश्च संस्कृताः ।
शस्यन्ते च चतुःस्नेहा शिरःपार्श्वासशूलिनाम् ॥ ७६ ॥
शतपुष्पा समधुक कुष्ठ तगरचन्दने ।
आलेपनं स्यात्सघृत शिरःपर्श्वासशूलनुत् ॥ ७७ ॥
स्वेदन – ( १ ) कृशरा ( तिल, चावल, उडद की यवागू ), उत्कारिका ( रोटी के समान बना खाद्य द्रव्य जौ आदि का ), उड़द, कुलथी, जौ, पायस
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४२६ चरकसंहिता [ अ ० ८ ( खीर अथवा मावे के रूप मे ) द्वारा सकर- स्वेद की विधि से, पार्श्व, कण्ठ, छाती और शिर पर स्वेद दे । ( २ ) वातहर पत्तो से अथवा खरैटी, गिलोय, मुलहठी, इनसे साधित सुहाते गरम क्वाथ से शिर का परिषेचन करे । ( ३ ) बकरे वा मछली के सिर के क्वाथो से नाडीस्वेद द्वारा अथवा वातनाशक द्रव्यो से साधित क्वाथो से नाडी स्वेद विवि द्वारा कण्ठ सिर और पावों में स्वेदन करे । [ वातहर औषधिया — बिल्व, अग्निमन्थ, काश्मर्य, श्रेयसी, पाटला, बला, शाल-पर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, एरण्ड और मूलक । ] ( ४ ) औदक या आनूप पशु - पक्षियों के मास से अथवा पचमूल क्वाथ से या काजी मे घी, तैल, वसा आदि स्नेह मिलाकर नाड़ीस्वेद दे । ( ५ ) जिनके सिर, पार्श्व और कन्धो ने शूल होता हो उनके लिये १ - जीवन्ती, सोया, बला, मुलहठी २ – वचा, वेशवार, विदारी, मूली, ३ – औदक मास, ४ – आनूप मास इनसे पृथक् २ संस्कृत उपनाह लगावे । [ अस्थि से रहित पिसा मास सिजाकर काली मरिच मिलाकर तैयार किया ' वेशवार ' कहाता है । ] ( ६ ) शिर, पार्श्व और कन्धो के शूल मे — सोया, मुलहठी, कूठ, तगर, चन्दन इनको लेप करे ॥ ७१-७७ ॥
बला रास्ना तिलाः सर्पिर्मधुकं नीलमुत्पलम् ।
पलङ्कषा देवदारु चन्दनं केशरं घृतम् ॥ ७८ ॥
वीरा बला विदारी च कृष्णगन्धा पुनर्नवा ।
शतावरी पयस्या च कत्तृणं मधुकं घृतम् ॥ ७६ ॥
चत्वार एते श्लोकाः प्रदेहाः परिकीर्तिताः । घी मे मिला कर ( ७ ) प्रदेह – १ – जिन यक्ष्मा के रोगियो मे द्वन्द्व दोष के कारण शिर, स्कन्ध और पार्श्व मे वेदना हाती हो, उनके लिये आधे २ श्लोक मे समाप्त होने वाले निम्न लिखित प्रदेहो का लेप करना चाहिये । यथा – १ – खरैटी, रास्ना, तिल, घी, मुलहठी, नीलाकमल, २ – गुग्गुल, देवदारु, चन्दन, केशर ( अथवा नागकेसर ) और घी, ३ - क्षीरकाकोली, बला, विदारी, लाल सहजन, पुनर्नवा, ४ - शतावरी, क्षीरकाकोली ( अथवा विदारीकन्द ), कत्तृण, मुलहठी और घी इनका लेप करे || ७८–७६ ॥ शस्ताः संसृष्टदोषाणा शिरः पार्श्वासशूलिनाम् ॥ ८० ॥
नावनं धूमपानानि स्नेहाश्वोत्तरभक्तिकाः ।
तैलान्यभ्यङ्गयोगानि बस्तिकर्म तथा परम् ॥ ८१ ॥
जलौकाला शृङ्गैर्वा प्रदुष्टं व्यधनेन वा ।
शिरः पार्श्वासशूलेषु रुधिरं तस्य निर्हरेत् ॥ ८२ ॥