श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 411–420
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 411–420
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अ ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् V I 0 ( १८ ) सिर, पार्श्व और स्कन्ध मे शूल होने पर — नस्य, के पश्चात् स्नेहपान, अभ्यग के लिये तैल और बस्तिकर्म करे रक्त को जलौका, कफ से दूषित को अलाबु, बात से दूषित अथवा अति दूषित व्यापक रूप मे रक्त को शिरावेध से निकाले
प्रदेहः सघृतश्चेष्टः पद्मकोशीरचन्दनैः ।
दूर्वा मधुकमञ्जिष्ठाकेश रर्वा घृताप्लुतैः ॥ ८३ ॥
प्रपौण्डरीकनिर्गुण्डीपद्मकेशरमुत्पलम् ।
कशेरुकाः पयस्या च ससर्पिष्क प्रलेपनम् ॥ ८४ ॥
४२७ धूमपान, भोजन । पित्त से दूषित को शृङ्ग द्वारा, || ८०-८२ ॥ ( ६ ) पद्माख, खस, चन्दन इनको घी में मिलाकर अथवा दूब, मुलहठी, मजीठ और नागकेशर इनको घी मे मिला कर प्रलेप करे । ( १० ) पुण्डरीक काष्ठ, सम्भालु, पद्म ( कमल ), नागकेसर ( अथवा कमल - केसर ), नीलोत्पल, कशेरु, क्षीरकाकोली इन्हे पीस कर घी के साथ मिलाकर लेप करे ॥ ८३-८४ ॥
चन्दनाद्येन तैलेन शतधौतेन सर्पिषा ।
अभ्यङ्गः पयसा सेकः शस्तश्च मधुकाम्बुना ॥ ८५ ॥
माहेन्द्रेण सुशीतेन चन्दनादिशृतेन वा ।
परिषेकः प्रयोक्तव्य इति सशमनी क्रिया ॥ ८६ ॥
इति संशमनी क्रिया । ( ११ ) चन्दनाद्य तैल, अथवा शतधौत घृत का अभ्यग उत्तम है । दूध या मुलहठी के काथ का परिषेचन हितकारी है । ( १२ ) सुशीतल वर्षाजल से
अथवा चन्दनादि गण ( चन्दनाद्य तैलोक्त ) के काथ से परिषेचन करे ।
यह शमन चिकित्सा का उपदेश कर दिया ॥ ८५-८६ ॥
दोषाधिकानां वमनं शस्यते सविरेचनम् ।
स्नेहस्वेदोपपन्नाना सस्नेहं यन्न कर्षणम् ॥ ८७ ॥
( १३ ) यक्ष्मा के जिन रोगियो मे दोष की अधिकता हो उनको प्रथम स्ने-हन और स्वेदन कराके पीछे से स्नेह युक्त वमन और स्नेहयुक्त विरेचन देवे | परन्तु ये वमन विरेचन ऐसे होने चाहिये जिनसे रोगी का शरीर कृश या निर्बल न हो जाय ॥ ८७ ॥
शोषी मुञ्चति गात्राणि पुरीषस्रंसनादपि ।
अबलापेक्षिणीं मात्रा कि पुनर्यो विरिच्यते ॥ ८८ ॥
यक्ष्मा रोगी मल के स्रसन ( टूटकर लगने ) मात्र से मर जाता है । इस-लिये रोगी के बल की अपेक्षा न करके दी गई विरेचन की मात्रा का क्या
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४२८ चरकसंहिता WWW कहना? उससे तो मर ही जायेगा । इसलिये बहुत ही विचार निशोथ आदि का मृदु विरेचक उपयोग करे ॥ ८८ ॥
योगात्संशुद्धकोष्ठाना कासे श्वासे स्वरक्षये ।
शिरःपार्श्वासशूलेषु सिद्धानेतान्प्रयोजयेत् ॥ ८६ ॥
बलाविदारिगन्धाहोविंदार्या मधुकन वा ।
सिद्धं सलवणं सर्पिनेस्य स्यात्स्वर्यमुत्तमम् ॥ ६० ॥।
प्रपोण्डरीकं मधुक पिपली बृहती बला ।
क्षीरं सर्पिश्च तत्सिद्धं स्वयं स्यान्नावनं परम् ॥ ६१
शिरः पार्श्वासशूलनं कालश्वासनिबर्हणम् ।
प्रयुज्यमानं बहुशो घृतमौर रभक्तिकम् ॥ ६२ ॥
[ अ ०८ कर अमलतास, ॥ जब कोष्ठ शुद्ध हो जाये तो कास, गास, स्वरक्षय मे, शिर गूल, पार्श्वशूल और असशूल मे निम्न लिखित सिद्ध योगों का प्रयोग करे । ( १ ) बला, विदारीगन्धादिगण ( स्वल्प पचमूल ), अथवा विदारीकन्द और मुलहठी इनके क्वाथ में तथा सैन्वा नमक के कल्क से सिद्ध घृत का नस्य देने से स्वरभग मिटता है ' ( २ ) पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी, पिप्पली, खरैटी और गाय का दूब इनसे साधित वृत का नस्य स्वरभेद को नष्ट करता है । ( ३ ) शिरःशूल, पार्श्वशूल और असशूल, कास और श्वास को नष्ट करने के लिये भोजन के पश्चात् प्राय घृतपान करे ॥ ८६-६२ ॥
दशमूलेन पयसा सिद्धं मालरसेन च ।
बलागर्भ घृत सद्यो रोगानेतान्प्रबाधते ॥ ६३ ॥
( ४ ) दशमूलाद्य घृत — दशमूल काथ ८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, मासरस २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, बला का कल्क १ शराव, इनसे यथाविधि सिद्ध किया हुआ घी शिरःशूल आदि रोगो को नष्ट करता है ॥ ६३ ॥
भक्तस्योपरि मध्ये वा यथाग्नि प्रविचारितम् ।
रास्नाघृतं वा सक्षीरं सक्षीरं वा बलाघृतम् ॥ ६४ ॥
( ५ ) भोजन के मध्य मे या भोजन के पश्चात् यक्ष्मा के रोगी की अग्नि १ श्री गंगाधर सेन ने पाठ निम्न पढा है - ' बलाविदारीगन्धाभ्या पिप्पल्या मधुकेन च ॥ ' अष्टाग - सग्रह मे पिप्पल्या के स्थान पर ' विदार्या ' है । विदारी-गन्धा से शालपर्णी का ग्रहण होगा । इस प्रकार से दो योग मानकर बला, शालपर्णी, पिप्पली, मुलहठी और सैन्धानमक इनसे घृत सिद्ध करना चाहिये, ऐसा योग माना है ।
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अ ० = ] चिकित्सितस्थानम् ४२६ के बलानुसार, रास्ना घृत को दूध के साथ, अथवा बलावृत को दूध के साथ मे दे । [ रास्नाघृत आगे इसी अध्याय में कहेंगे और बलावृत वातरक्त चिकित्सा मे कहा हे । यहा पर दोनो घृतो को चतुर्गुण दूध मे रास्नाकल्क, या बला कल्क द्वारा सिद्ध करे ] ॥ ६४ ॥
लेहान्कासापहान्स्वर्यान्यास हिकानिबर्हणान् ।
शिरः पार्श्वासशूलघ्नान् स्नेहाचातः पर शृणु ॥ ६५ ॥
घृतं खर्जूर मृद्वीकाशर्कराक्षाद्ररूयुतम् ।
सपिप्पलीक बेस्वयंकासश्वासनिबर्हणम् ॥ ६६
दशमूलशृतात्क्षीरात्स पियेदुदियान्नवम् ।
सपिप्पलीक सक्षौद्रं तत्पर स्वरबोधनम् ॥ ९ ७
शिरः पार्श्वासशूलघ्न कामश्वासज्वरापहम् । इसके आगे कास, श्वास, शिर. शूल, पार्श्वशूल और करने वाले स्नेह और लेहा को सुनो । ( १ ) खर्जूर, मुनक्का, मुलहठी, फालसा और पिप्पली कल्क से ' ८ प्रस्थ जल मे २ प्रस्थ घृत यथाविधि पकावे ।
कास, श्वास को नष्ट करता है ।
॥
॥
स्कन्धशूल का नष्ट इनके एक शराव यह घृत स्वरभेद, ( २ ) दशमूल से साधित दूध से निकाले हुए नूतन घी को पिप्पली और मधु के साथ खाने से स्वरभेद, शिर शूल, पार्श्वशूल, असशूल, कास श्वास और ज्वर नष्ट होता है । अथवा पाचां पचमूलो से साधित दूध से निकाले ताजे वी को पिप्पली और मधु के साथ खाने से स्वरभेद आदि सातो विकार नष्ट होते है ॥ ६५–६७ ॥ पञ्चभिः पञ्चमूलैर्वा शृताद् यदुदियाद् घृतम् ॥ ६८ ॥
पञ्चाना पञ्चमूलाना रसे क्षीरचतुगुणे ।
सिद्धं सपिजेयत्येतद्यक्ष्मणः सप्तकं बलम् ॥ ६६ ॥
( ३ ) पच - पचमूल घृत — ब्राह्म- रसायन मे कहे पाचां पचमूलोका काथ ८ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि पकावे । यह घृत यक्ष्मा के स्वरभेद, शिर शूल, असशूल, पार्श्वशूल, कास, श्वास और ज्वर को नष्ट करता है ॥ ६८-६ ॥
खर्जूरं पिप्पली द्राक्षा पथ्या शृङ्गी दुरालभा ।
त्रिफला पिप्पली मुस्तं शृङ्गाटगुडशर्कराः ॥ १०० ॥
वीरा शटी पुष्कराख्यं सुरसः शर्करा गुडः ।
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४३० चरकसंहिता [ अ ० = नागर चित्रको लाजाः पिप्पल्यामलकं गुडः ॥ १०१ ॥
लोकाविहितानेता लिह्यान्ना मधुसर्पिषा ।
कासश्वासापहान्स्वर्यान्पार्श्वशूलापहास्तथा ॥ १०२ ॥
( ४ ) चार लेह – १ – पिण्डखर्जूर, पिपली, मुनक्का, हरड़, काकड़ा-शृगी और दुरालभा । २ – त्रिफला, पिप्पली, मोथा, सिंघाड़ा, गुड और शर्करा । ३ —– क्षीरकाकोली, कचूर, पोहकरमूल, तुलसी, शर्करा, और गुड़ ४ – सोठ, चीता, लाजा, पिप्पली, ऑवला और गुड आधे आधे श्लोको मे कहे हुए इन चार योगो को मधु और घी के साथ चाटने से कास, श्वास, स्वर-भेद और पार्श्वशूल नष्ट होते है ॥ १००-१०२ ॥
सितोपला तुगाक्षीरी पिप्पली बहुलां त्वचम् ।
अन्त्यादूर्ध्वं द्विगुणितं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १०३ ॥
चूर्णितं प्राशयेद्वा तच्छ्वासकासकफातुरम् ।
सुप्तजिह्वारोचकिनमल्पाग्नि पार्श्वशूलिनम् ॥ १०४ ॥
हस्तपादाङ्गदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे । ( ५ ) सितोपलादि लेह – मिसरी १६ भाग, बशलोचन ८ भाग, पिप्पली ४ भाग, इलायची २ भाग और दालचीनी १ भाग इस प्रकार पीछे से पूर्व के द्रव्य को दुगुना लेकर मधु और घी मे चाटे । इसके प्रयोग से श्वास, कास और कफ नष्ट होता है । सुप्तजिह्वा ( जिसमे स्पर्श या मधुर आदि रसों का ज्ञान नही होता ), अरुचि, मन्दाग्नि, पार्श्वशूल, हाथ पॉव शरीर मे जलन, ज्वर और ऊर्ध्वगामी रक्त - पित्त मे लाभकारी है ॥ १०३-१०४ ~ ॥ वासासर्पिः शतावर्या सिद्धं वा परमं हितम् ॥ १०५ ॥
( ६ ) वासा घृत और शतावरी ( कल्क और कषाय ) से सिद्ध घृत अति-शय हितकारी है ॥ १०५ ॥
दुरालभा श्वदंष्ट्रां च चतस्रः पर्णिनीर्बलाम् । भागान्पलोन्मितान्कृत्वा पलं पर्पटकस्य च
पचेद्दशगुणे तोये दशभागावशेषिते ।
रसे सुपूते द्रव्याणामेषां कल्कान्समावपेत् ॥
शट्याः पुष्करमूलस्य पिप्पलीत्रायमाणयोः । तामलक्याः किराताना तिक्तस्य कुटजस्य च फलाना शारिवायाश्च सुपिष्टान्कर्षसंमितान् || १०६ ॥ १०७ ॥ ॥ १०८ ॥
।
ततस्तेन घृतप्रस्थं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ १०६ ॥
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अ ०८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३१ N ज्वर दाह भ्रमं कासमसपार्श्वशिरोरुजम् । { तृष्णा छर्दिमतीसारमेतत् सर्पिरपोहति ॥ ११० ॥
इति दुरालभादि घृतम् । ( ७ ) दुरालभादि घृत - दुरालभा, गोखरू, चारो पर्णिनियॉ ( मुद्गपणी, मात्रपर्णी, शालपर्णी और पृनिपणी ) खरैटी, पित्तपापडा प्रत्येक १ - १ पल को दस गुने ( २० प्रस्थ ) पानी मे पकावे । जब दसवाँ भाग रह जाये तो छान ले | इसमे कचूर, पोहकरमूल, पिप्पली, त्रायमाणा, तामलकी ( भुई ऑवला ), चिरायता, कुडे के फल ( इन्द्रजौ ) और सारिवा प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनका कल्क मिला दे, घी एक प्रस्थ और दूध घी से दुगुना ( २ प्रस्थ ) मिला कर यथाविधि घी सिद्ध करे | यह घी ज्वर, दाह, भ्रम, कास, कधी मे पीडा, पार्श्व-शूल, शिर. शूल, तृष्णा, वमन और अतिसार को नष्ट करता है ॥ १०६–११० ॥
जीवन्ती मधुकं द्राक्षा फलानि कुटजस्य च ।
शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री गोक्षुरकं बलाम् ॥ १११ ॥।
नीलोत्पलं तामलकों त्रायमाणा दुरालभाम् पिप्पली च समं पिष्ट्वा घृतं वैद्यो विपाचयेत् ॥ ११२ ॥
एतद् व्याधिसमूहस्य रोगेशस्य समुत्थितम् ।
रूपमेकादशविधं सर्पिरम्य व्यपोहति ॥ ११३ ॥
इति जीवन्त्यादिघृतम् । ( ८ ) जीवन्त्यादि घृत — जीवन्ती, मुलहठी, मुनक्का, इन्द्रजौ, कचूर, पोह करमूल, कटेरी, गोखरू, बला, नीला कमल, भूई ऑवला, त्रायमाणा, दुरालभा और पिप्पली ये सम परिमाण मे लेकर इनके कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत
रोगसमूह रूप रोगराज ( यक्ष्मा ) के ग्यारह प्रकारों के रूप को नष्ट करता है ।
[ यहाँ पर पानी चार गुणा लेवे ] ॥ १११-११३ ॥
बलां स्थिरां पृश्निपर्णी बृहती सनिदिग्धिकाम् ।
साधयित्वा रसे तस्मिन्पयो गव्यं सनागरम ॥ ११४ ॥
द्राक्षाखर्जूरसर्पिर्भिः पिप्पल्या च शृतं सह ।
सक्षौद्रं ज्वरकासन्नं स्वर्य चैतत्प्रयोजयेत् ॥ ११५ ॥
( ६ ) बलादि क्षीर - बला, स्थिरा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी इनको सम परिमाण मे लेकर आठ गुने जल मे काथ करे । चतुर्थांश रहने पर छान ले | इसमे क्वाथ से चतुर्थाश गाय का दूध, दूध से अष्टमाश सोंठ, पिण्डखर्जूर, घी, पिप्पली मिलावे । इनसे सिद्ध दूध मे
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४३२ चरकसंहिता [ अ ० ८ V मधु मिला कर प्रयोग करे । यह घी ज्वर, कास और स्वरभग को नष्ट करता है | ११४ - ११५ ॥
आजस्य पयस प्रयोगो जाङ्गला रसाः ।
यूपार्थ चणका लुगा मकुष्ठाश्चोपकल्पिताः ॥ ११६ ॥
ज्वराणा शमनीयो यः पूर्वमुक्तः क्रियाविधिः ।
यक्ष्मिणा ज्वरदाहेषु ससपिष्कः प्रशस्यते ॥ ११७ ॥
कफप्रसेके वलवान् लेष्मिकश्छक्ष्येन्नरः ।
पयसा फल्युक्तेन मधुरेण रसेन वा ॥ ११८ ॥
सपिष्मत्या यवाग्वा वा वमनायोपसिद्धया ।
वान्तोऽन्नकाले लव्वन्नमाददीत सदोपनम् ॥ ११६ ॥
यवगोधूममाव्वोकशीध्वरिष्टसुरासवान् ।
जाङ्गलानि च शूल्यानि सवमानः कफं जयेत् ॥ १२० ॥
श्लेष्मणोऽतिप्रसेकेन वायुः श्लेष्माणमस्यति ।
कफप्रसेकं त विद्वान्स्निग्धोष्णेनेव निर्जयेत् ॥ १२१ ॥
क्रिया कफप्रसेके या वन्या सेव प्रशस्यते ।
हृद्यानि चान्नपानानि वातघ्नानि लघूनि च । १२२ ॥
( १० ) बकरी का दूध, जागल पशु - पक्षिया का मास - रस, यूष के लिये चना, मूग, मोठ का व्यवहार करे । ( ११ ) ज्वर की संशमन चिकित्सा जो प्रथम कह चुके हैं, उसी मे घृत मिला कर यक्ष्मा रोगी के दाह और ज्वर मे व्यवहार करे । ( १२ ) बलवान् और कफ प्रकृति वाले पुरुष को यदि कफ-प्रसेक हो तो वमन करावे । इसके लिये मैनफल युक्त मधुर दूध या मैनफल से युक्त माम - रस से अथवा वमनीय द्रव्या से सिद्ध की गई मृतयुक्त यवागू द्वारा रोगी को वमन करावे । ( १३ ) वमन हाने के पीछे भोजन के समय अग्नि-दीपक लघु अन्न खिलावे | ( १४ ) जौ, गेहूँ, माध्वीक मद्य, शीधु, अरिष्ट, मुरा, आसव, जागल मास को शूलाकृत कर अर्थात् शलाका पर भूनकर उस मास से कफ को नष्ट करे । ( १५ ) फेफड़ो मे कफ के अधिक होने से वायु इस कफ को बाहर करता है, इसको कफ - प्रसेक कहते है । इसको स्निग्ध और उष्ण चिकित्सा से शान्त करे । हृदय के लिये प्रिय वातनाशक और लघु खान - पान पथ्य है । जो चिकित्सा कफ प्रसेक की है, वही वमन मे भी प्रशस्त है ॥ ११६ - १२२ ॥ १ ' सवान्तोऽद्याच्च लघ्वन्नमन्नकाले सदीपनम् ' इति च ।
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अ ०८ = ] २८ चिकित्सितस्थानम् ४३३
प्रायेणोपहताग्नित्वात्सपिच्छमतिसार्यते ।
प्राप्नोत्यास्यस्य वैरस्यं न चान्नमभिनन्दति ॥। १२३ ॥
तस्याग्निदीपनान योगानतीसारनिबर्हणान् ।
वक्त्रशुद्धिकरान्कुर्यादरुचिप्रतिबाधकान् ॥ १२४ ॥
सनागरानिन्द्रयवान्पिवेद्वा तण्डुलाम्बुना ।
सिद्धां यवागूं जीर्णे च चरीतक्रदाडिमैः ॥ १२५ ॥
पाठ बिल्व यवानी च पातव्यं तक्रसंयुतम् ।
दुरालभा शृङ्गवेर पाठा च सुरया सह ॥ १२६
जम्ब्वाम्रमध्यं बिल्वं च सकपित्थ सनागरम् ।
पेयामण्डन पातव्यमतीसारनिवृत्तये ॥ १२७ ॥
एतानेव च योगात्रान्पाठ दीन्कारयेत्खडान् । स ' सूपधान्यान्सस्नेहान्साम्लान्सग्रहणान्परान्
वेतसार्जुनजम्बूना मृणालीकृष्णगन्धयोः ।
श्रीपय मदयन्त्याश्च यूथिकायाश्च पल्लवान् ॥
मातुलुङ्गस्य धातक्या दाडिमस्य च कारयेत् ॥।
॥ १२८ ॥
१२६ ॥
स्नेहाम्ललवणोपेतान् खडान् साग्राहिकान् परान् ॥ १३० ॥
चारचुक्रिकायाश्च दुग्धिकायाश्च कारयेत् ।
खडान्दधिसरोपेतान्सर्सापष्कान्सदाडिमान् ॥ १३१ ॥
मासाना लघुपाकाना रसाः साग्राहिकैर्युताः ।
व्यञ्जनार्थ प्रशस्यन्ते भोज्यार्थ रक्तशालयः ॥ १३२ ॥
स्थिरादिपञ्चमूलेन पाने शस्तं शृतं जलम् ।
तक्रं सुरा सचुक्रिका दाडिमस्याथवा रसः ॥ १३३ ॥
दीप ग्राहि निट भेषज भिन्नवर्चसे । ( १६ ) अग्नि के मन्द होने से प्राय. ऑव से युक्त अतिसार हो जाता है, मुख का स्वाद बदल जाता है, भोजन भी अच्छा नहीं लगता । इसके लिये अग्नि को बढाने वाले ओर अतिसार नाशक तथा मुख को शुद्ध करने वाले और अरुचि को नष्ट करने वाले प्रयोगों का व्यवहार करे । ( १ ) सोठ ओर इन्द्रजौ के चूर्ण का चावलों के मण्ड के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर चागेरी ( तिपतिया ), छाछ और अनारदाना से सिद्ध यवागू को पीवे । ( २ ) पाठा, बेलगिरी, अजवायन इनको सम परिमाण मे १. ' सचुक्र धान्यान् ' इति पाठः । २ ' अय श्लोकः क्वचिद् न पठ्यते ' ।
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४३४ चरकसंहिता [ अ ० ८ ww ^ VALAM लेकर छाछ के साथ पीवे । दुरालभा, अदरक और पाठा इनको सम परिमाण मैं लेकर सुरा के साथ पीवे । ( ३ ) जामुन की गुठली, आम की गुठली, बेलगिरी, कैथ और सोठ इनको समान भाग लेकर पेया ( यवागू ) के मण्ड के साथ पिलाने से अतिसार शान्त होता है । ( ४ ) ऊपर कहे पाठा आदि तीन योगो से खड्यूत्र बनावे | इन खडयूषो को मसूर आदि दाल के योग्य, धान्य, घी आदि स्नेह से युक्त, चागेरी छाछ और अनारदाने से खट्टे कर ले । ये अत्यन्त साग्राहिक ( मल को बाधनेवाले ) है । ( ५ ) वेतस ( अम्ल-वेतस ), अर्जुन, जामुन, मृणाली ( वीरणमूल या लामजक ), सहजन, श्रीपर्णी ( गम्भारी ), मदयन्ती ( नवमल्लिका या मेहदी ), यूथिका ( जही ), बिजौरा, धातकी, अनार इनके पत्तो से, घी आदि स्नेह से, कपित्थ आदि अम्ल, लवण से युक्त खडों को बनावे । ये पदा ९ अत्यन्त सग्राही है ' । ( ६ ) चागेरी, चुक्रिका ( इमली ) और दुग्धिका ( गुजराती मे नागला दूधेली ) इनसे पृथक् २, दही का सर भाग ( मलाई ), घी और अनारदाने से यथाविधि खड बनावे | व्यजन के लिये शीघ्र पचाने वाले मासरसो को बेलगिरी आदि ग्राही वस्तुओ से सिद्ध करके दे े । भोजन के लिये लाल चावल उत्तम हैं । ( ७ ) पीने के लिये स्थिरा, पचमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी, गोखरू ) से सिद्ध जल, छाछ, सुरा, सिरका और अनार का रस दे । अतिसार से पीड़ित यक्ष्मा रोगी के लिये दीपन और ग्राही औषध कह दी है ॥ १२३ -१३३- ॥ परं मुखस्य वैरस्यनाशनं रोचनं शृणु ॥ १३४ ॥
द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम् ।
तद्वत्प्रक्षालयेदास्यं धारयेत्कवलग्रहान् ॥ १३५ ॥
पिबेद् धूमं ततो मृष्टमद्याद्दीपनपाचनम् ।
भेषजं पानमा च हितमिष्टोपकल्पितम् ॥ १३६ ॥
त्वमुस्तमेला धान्यानि मुस्तमामलकं त्वचम् ।
दाव त्वचो यवानी च पिप्पल्यस्तेजवत्यपि ॥ १३७ ॥
यवानी तिन्तिडीकं च पञ्चैते मुखधावनाः ।
श्लोकपादेष्वभिहिता रोचना मुखशोधनाः ॥ १३८ ॥
गुलिकां धारयेदास्ये चूर्णैर्वा शोधयेन्मुखम् । I
एषामालोडिताना वा धावयेत्कवलग्रहाम् ॥ १३६ ॥
१ वेतस, अर्जुन, जामुन, एक योग, मृणाली, सहजन दूसरा योग और श्रीपर्णी आदि को पृथक् २ बरते । यह कविराज श्रीजयदेव की सम्मति है ।
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अ ०८ 1 चिकित्सितस्थानम ४३५
सुरामाध्वीकसीधूना तैलस्य मधुसर्पिषोः ।
कवलान्धारयेदिष्टान्क्षीरस्येक्षुरसस्य च ॥ १४० ॥
( १७ ) मुख की विरसता को नष्ट करने वाली और रुचिकारक ओषवियो की सुनो-( १ ) दोनो समय प्रात साय ( भोजन से पूर्व प्रात: और सायं भोजन के पीछे, सोते समय ) सुख को साफ करने के लिये दातुन करे । ( २ ) कषायो से सुख का प्रक्षालन करे, ( ३ ) मुख म कवल धारण करे । पीछे से प्रायोगिक धूम पान करे । दीपक - पाचक औपध और हितकारी, मन लुभाता खान - पान खावे । ( ४ ) पाच योग - ( १ ) दालचीनी, मोथा, इलायची, धनिया, ( २ ) मोथा, आवला, दालचीनी, ( ३ ) दारूहल्दी, दालचीनी, अजवायन, ( ४ ) पिप्पली, तेजबल, ( ५ ) अजवायन और तिन्तिडीक ( वृक्षाम्ल या इमली ) ये पाच योग श्लोक के एक २ चरण मे कहे हैं, ये रोचक और मुख को शोधन करते है । इनकी गोलिया बना कर मुख मे रक्खे, इनके चूर्णो से मुख को साफ करे | इनको पानी में घोल कर ( या छाछ आदि मे भी ) मुख मे कवल धारण करे । ( ५ ) सुरा, माध्वीक, सीधु, तेल, घी, मधु, दूध और गन्ने का रस इनमे से जो अभीष्ट हो, उसका कवल मुख मे धारण करे यवानी तिन्तिडीकं च नागरं साम्लवेतसम् । दाडिम बदर चाम्लं कार्षिकं चोपकल्पयेत्
धान्यसौवर्चलाजाजीवराङ्गं चार्धकार्षिकम् ।
पिप्पलीना शतं चैकं द्वे शते मरिचस्य च ॥
शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत् ।
जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम् ॥
हृत्सीपार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम् ।
कासश्वासहरं प्राहि ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ॥
|| १३४ - १४० || ॥ १४१ ॥
१४२ ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ इति यवानीपाडवम् । ( १८ ) यवानीषाडव - अजवायन, तिन्तिडीक, सोठ, अम्लवेतस, अनार-दाना, खट्टे बेर प्रत्येक एक कर्ष, धनिया, सचल नमक, जीरा, दालचीनी प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली १०० ( सख्या मे ), मरिच काली २००, खाण्ड ४ पल लेकर मिलावे | यह चूर्ण जिह्वा का विशोधक, भोजन मे रुचि करने वाला हृदयशूल, प्लीहा, पार्श्वशूल विबन्ध, आनाह, कास, श्वास, ग्रहणी और अर्शरोग को नष्ट करता और सग्राहक है ॥ १४१ - १४४ ॥
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४३६ चरकसंहिता [ अ ० ८
तालीशपत्र मारचं नागरं पिप्पली शुभा ।
यथोत्तरं भागवृद्धया त्वगेले चार्धभागिके ॥ १४५ ॥
पिप्पल्यष्टगुणा चात्र प्रदेया सितशर्करा ।
कासश्वासारुचिहरं तच्चूर्ण दीपन परम् ॥ १४६ ॥
हृत्पाण्डुग्रहणदोषशोत्रीहज्वरापहम् ।
वम्यतीसारशूलन्न मूर्ध्व वातानुलोमनम् ॥ १४७ ॥
कल्पयेद् गुटिका चैव चूर्ण पक्त्वा सितोपलेः ।
गुटिका ह्यग्निसंयोगाच्चूर्णाल्लघुतराः स्मृताः । १४८ ॥
इति तालीशाचं चूर्ण गुटिकाश्च । ( १७ ) तालीशाद्य चूर्ण - तालीशपत्र १ भाग, काली मिरिच २ भाग, सोठ ३ भाग, पिप्पली ४ भाग, बशलाचन ५ भाग, दालचीनी ॥ भाग, छोटी इला यची || भाग, खाण्ड पिप्पली से आठगुणा ( ३२ भाग ) मिलावे, यह चूर्ण कास, श्वास, अरुचि को नष्ट करता है, अग्निदीपक है । हृदय रोग, पाण्डु, ग्रहणी, गोष, प्लीहा, ज्वर, वमन, अतिसार और शूल को न करता है और ऊर्ध्ववात का अनुलोमन करता है । खाड की चासनी करके उसमे ये वस्तुये मिला कर गुाटकाये भी बना सकते है 1 । ये गुटिकाये चूर्ण की अपेक्षा अधिक लघु है, क्योंकि इनका पाक आग पर होता है ॥ १४५-१४८ ॥
शुष्यते क्षीणमासाय कल्पितानि विधानवित् ।
दद्यान्मासादमासानि गृहणानि विशेषतः ॥ १४६ ॥
शोपिणे बार्हिणं दद्याद् बहिशब्देन चापरान् ।
गृध्रानुलूकाश्चाषाश्च विधिवत्सूपकल्पितान् ॥ १५० ॥
काकास्तित्तिरिशब्देन वामशब्देन चोरगान् ।
भृष्टान्मत्स्यान्त्रशब्देन दद्याद् गण्डूपदानपि ॥ १५१ ॥
लोमशान्स्थूलनकुलान्बिडाला वोपकल्पितान् ।
शृगालयावाश्च भपक् शशशब्देन दापयेत् ॥ १५२ ॥
सिहानृक्षास्तरश्च व्याघ्राने: विधास्तथा ।
मामादान मृगशब्देन दद्यान्मासाभिवृद्धये ॥ १५३ ॥
गजखङ्गितुरङ्गाणा वेशवारीकृत ' मिपकू ।
दद्यान्महिषशब्देन मासं मासाभिवृद्धये ॥ १५४ ॥
पथ्य- कल्पना प्रकार को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि जो यक्ष्मा क १ ' वेशवारकृतान् ' इति पाठः ।