श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 51–60
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 51–60
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३६ चरकसंहिता [ अ ० २
स सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूप. ।
सचेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक् सानुशयः स एव ॥ ३२ ॥
वह आत्मा कमी के कारण सब स्थानों में गमन करता है, देवता मनुष्य, तिर्यगू आदि सब देहो को धारण करता है, यह सब कर्मों के करने में समर्थ होने से ' विश्वकर्मा ' है । यह आत्मा सर्व रूप होने से विश्वरूप है, यही चेतना धातु है, वह अनीन्द्रिय है । इसका कर्म आदि से नित्य सम्बन्ध है यही अनुशय ( राग और द्वेष आदि ) के साथ रहता है ॥ ३२ ॥
रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विद्याद्दश षटू च देहे ।
चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु ॥ ३३ ॥
भूतानि मातापितृसभवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे ।
आप्याय्यते शुक्रमसृक्च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥३४ ॥
आहार के ग्स, आत्मकृत कर्म, माता और पिता इनसे उत्पन्न ये चार २ गुण वाले चार भूत ( इस प्रकार से १६ भूत ) गर्भ के शरीर में रहते हैं । इन सोलह के बीच में चार सूक्ष्म लिंग - शरीर रूप से ( वायु, अग्नि, भूमि और जल तन्मात्रा रूप से ) आत्मा में और ये चारों आत्मा मे आश्रित है । गर्भ में माता से उत्पन्न चार भूत और पिता से उत्पन्न चार भूत और क्रम मे रज और शुक्र ये पदार्थ गर्भ में कहे जाते हैं । भूतों द्वारा शुक्र और रक्त दानों का पोषण होता है और उन रस से उत्पन्न भूतो का पोषण और वृद्धि होती है । इस प्रकार से गर्भ के शरीर में १६ भूतों का योग होता है ॥ ३३-३४ ॥
भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम् ।
स वीजधर्मा ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥ ३५ ॥
आत्मा में गुम रूप से विद्यमान कर्म से उत्पन्न जो चार सूक्ष्म भूत गर्भ मे प्रविष्ट होते हैं, वही सूक्ष्म शरीरी पुरुष बीज के समान वर्म वाला होकर एक के बाद दूसरे शरीरों में जाता रहता है । वह सूक्ष्म शरीर आत्मा पर आश्रित रहता है * ॥ ३५ ॥
रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्ध कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः ।
भवन्ति ये त्वाकृतिबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्महेतु ॥ ३६ ॥
गर्भ के शरीर को बनाने वाले कर्मात्मक भूतों के सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप तथा मन से मन की उत्पत्ति होती है यह बात प्रसिद्ध है । कारण के अनुसार कार्य होता है । [ पूर्व जन्म में जैसा मन होता है, वैसा इस जन्म में भी हो
* ससरति निरुपभोग भावैरधिवासित लिंगम् । सा ० का ० ४० ॥
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अ ० २ ] शारीरस्थानम् ३७ AAA जाता है ] | आकृति, बुद्धि और मन में जो भिन्नता होती है, वहा पर बलवान् रज, तम तथा पूर्वकर्म कारण होते हैं ॥ ३६ ॥
अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः ।
न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः ॥ ३७ ॥
रजस्तमोभ्यां तु मनोऽनुबद्ध ज्ञानं बिना तत्र हि सर्वदोषाः ।
गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्त मनः सदोष बलवच्च कर्म ॥ ३८ ॥
अतीन्द्रिय, अति सूक्ष्म रूपवाले वायु, अग्नि, भूमि और जल इन चार सूक्ष्म भूतो से आत्मा कभी भी वियुक्त नहीं होता । न कर्मों से, न मन में, न बुद्धि एव अहकार इन दोषों से भी कभी वह मुक्त होता है, प्रत्युत वह इन मे सदा सम्बद्ध रहता है । मन अर्थात् सत्त्व बलवान् रज तथा तम से सम्बद्ध होता है । तब तत्त्वज्ञान के विना मन में सब दोष रहते हैं । दोषयुक्त मन और पूर्वजन्मों के बलवान् कर्म ही अन्य देह में जाने तथा धर्माधर्म क्रिया में प्रवृत्ति के कारण हैं ॥ ३७-३८ ॥
रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च कि निमित्तम् ।
शरीरसस्वप्रभवा विकारा. कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः ॥ ३६ ॥
प्रश्न - ( १ ) रोग किस कारण से उत्पन्न होते हैं? ( २ ) इन रोगो की शान्ति का उपाय क्या है? ( ३ ) हर्ष का क्या कारण है? ( ४ ) शोक का क्या कारण है? ( ५ ) शरीर और मन से उत्पन्न विकार क्यों कर पूर्ण रूप से नष्ट नही होते? ( ६ ) वे फिर क्यों हो जाते हैं ॥ ३६ ॥
प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः ।
सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः ॥४० ॥
धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति ।
शरीरसत्त्वप्रभवास्तु दोषास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूय ॥ ४१ ॥
रूपस्य सत्त्वस्य च संततिर्या नोकस्तदादिर्न हि सोऽस्ति कश्चित् ।
तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्या धृतिस्मृतिभ्या परया धिया च ॥ ४२ ॥
सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्व गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् ।
जितेन्द्रियं नानुतपन्ति रोगास्तत्कालयुक्त यदि नास्ति दैवम् ॥ ४३ ॥
उत्तर—- रोगों का प्रथम कारण प्रज्ञापराध, दूसरा कारण अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग से इन्द्रियों के विषयों का उपभाग, तीसरा कारण परिणाम ( काल ) है । सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों की शान्ति तीन प्रकार से होती है । समयोग से, ज्ञान, अर्थ ( इन्द्रियों के विषय ) और काल इन तोन का उपयोग करने से । और धार्मिक क्रियायें हर्ष का कारण कही गयी हैं ।
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३८ चरकसहिता [ अ ० २ इसमे विपरीत अधार्मिक क्रियाये पुरुष को शोक के अवान कर देती हैं । शरीर और मन से उत्पन्न रोग जब तक शरीर और मन हैं, तब तक बार बार होते रहते हैं । शरीर और मन की चेटा न रहने पर ये रोग भी फिर नहीं होते । रूप ( शरीर ) और मत्र ( मन ) इनका जो नगइ है उसका आदि नही बतलाया अर्थात् वह अनादि है । आत्मा का शरीर और मन के साथ प्रथम सम्बन्ध कब हुआ, इमे कोई नही कह सकता । शरीर और मन की निवृत्ति श्रेष्ठ वृति ( धैर्य ) एव स्मृति तथा श्रेष्ठ बुद्धि मे होती है । शरीर और मन ये दो प्रकार के आश्रय होने मे रोगो की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रतिकार करना चाहिये । यदि रोगोत्पादक विपाक काल के साथ दैव सयुक्त नहीं है तो जितेन्द्रिय पुरुष का रोग नहीं सताते । पूर्व कर्म से उत्पन्न व्याधिया ता कर्म के क्षय के बिना शान्त नहीं होती ॥ ४०-४३ ॥
दैव पुरा यत्कृतमुच्यते तत्, तत्पौरुप यत्विह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुस्तु समः स एव ॥ ४४ ॥
पूर्वजन्म मे किये कम को ' देव ' कहा जाता है । इस जन्म मे जा कर्म किया जाता है, उसे ' पौरुष ' कहते हैं । ये दोनो कर्म अयोग, अतियोग और मिथ्यायोग से विषम हैं । ये विषम रूप से रोग की प्रवृत्ति या ससार की प्रवृत्ति में कारण हैं । इनका समान योग ' आरोग्य ' या ' ससार निवृत्ति ' अर्थात् मोक्ष मे कारण है || ४४ ||
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् मैष्मिकमभ्रकाले ।
घनात्यये वार्षिकमा सम्यक्प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४८ ॥
वात, पित्त, कफ का सचय क्रम से ग्रीष्म, वर्षा और शिशिर में होता है और इनका प्रकोप क्रम से वषा, शरद् और वसन्त में होता है । इन में ग्रीष्म में हुए दोष के सचय ( वात ) को बर्षा काल में, वर्षा काल मे सचित दोष ( पित्त ) को वर्षा काल के अनन्तर शरत् काल में तथा हेमन्त काल के सचित दोष ( कफ ) को वसन्त अर्थात् चैत्र मे भली प्रकार प्रवाहित करके देह से निकाल देवे तो मनुष्य को जन्य रोग नहीं होते । ॥ ४५ ॥
* देखिये चरक ० शारार, अ ० १ मे - क्रियान्नाः कर्मजा रागाः प्रथम यान्ति तत्क्षयात् । ' + दोष - प्रवाहण का नियम -- - प्रत्येक ऋतु के प्रथम मास में दोष प्रवाहण
करना चाहिये । यथा- ' माधवप्रथमे मासि नमस्य ' प्रथमे पुन ।
महस्य प्रथमे चैत्र हारयेद्दोषसचयम् ॥
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अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ३६
नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्त. ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ४६ ॥
हितकारी आहार और हितकारी विहार का सेवन करने तथा सोच विचार कर कार्य करने वाले, विषयों मे न फर्म, त्यागशील, दानी, सब प्राणियों मे समान भाव रखने वाले, सत्यपरायण, क्षमाशील, आस जन के सेवी, सत्संग करने वाले पुरुष का रोग नहीं सताते, वह सदा नोरोग रहता है ॥ ४६ ॥
मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धि सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः ।
ज्ञान तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुतपन्ति रोगाः ॥ ४७ ॥
जिसकी मति, ( मन ) कर्म और वचन सुख उत्पन्न करने वाले हो, जिसका मन, पापरहित और वश में है जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो, जो स्वय तप और याग में तत्पर होता है, उसका रोग नहीं सताते ॥ ४७ ॥
तत्र श्लोकाः ।
इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्त पट्त्रिंशक प्रश्नगणं महर्षिः ।
अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णीतवाज्ञानविवर्धनार्थम् ॥ ४८ ॥
भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने इस अतुल्य गोत्रीय शारीर में शिष्यों के ज्ञान बढाने के लिये बड़े अर्थयुक्त छत्तीस प्रश्नों का यथावत् निर्णय किया है । इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारारस्थाने अतुल्य-गोत्रीयशरोर नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथात खुड्डीकां गर्भावान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेय ॥ २ ॥
इसके आगे खुड्डीका गर्भावक्रान्ति ( गर्भाशय में जीव के आगमन ) नामक
शरीर का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्ट - योनि शोणित - गर्भाशयाया-यदा भवति संसगं ऋतुकाले यदा चानयोस्तथैव युक्ते च संसर्गे शुक्र-शोणित - संसर्गमन्तर्गर्भाशयगत जीवोऽवक्रामति सत्त्वसंप्रयोगात्तदा गर्भोऽभिनिर्वर्त्तते, स सात्म्यरसोपयोगादरोगोऽभिसवर्धते सम्यगुपचा-
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४० चरकसंहिता [ अ ० ३ रैश्चोपचर्यमाणस्ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णसर्वशरीरो बल-वर्ण - सत्त्व - सहनन - संपदुपेतः सुखेन जायते समुदायादेषा भावानाम् || ३ || दोष से रहित वीर्य वाला पुरुष, जब दोष से रहित योनि रक्त ( रज ) और गर्भाशय वाली स्त्री के साथ ऋतु समय में संसर्ग करता है और जब इनके ऋतु - काल में ससर्ग करने पर शुक्र गर्भाशय में पहुच कर शोणित ( रज ) के साथ मिलता है तब मन से युक्त जीव ( चेतन ) उसमें आ जाता है, तब गर्भ बनता है । और यह गर्म सात्म्य रसों के उपयोग से तथा गर्भिणी के गर्भाशय में हितकारक उपचारों से पोषित होकर नीरोग रह कर बढ़ता है । पीछे ठाक प्रसव काल ( नवम या दशम मास ) तक सब इन्द्रियों से युक्त पूर्ण शरोर वाला, बल, वर्ण, सत्त्व और शरीर रचना के उत्तम गुणों से युक्त होकर निम्न-लिखित माता आदि छ पदाथो के मयोग से सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाता है || ३ || मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ ४ ॥
इसलिये यह गर्भ माता से उत्पन्न अर्थात् ( गोणितजन्य ) है, पिता से उत्पन्न ( शुक्रजन्य ) है, आत्मा से उत्पन्न, सात्म्य से उत्पन्न, रम से उत्पन्न है और सत्वज्ञावाला मन भी इसकी उत्पत्ति में घटक है । [ क्योंकि शुक्र शोणित के
साथ ही यह मन आत्मा का सम्बन्ध कराता है, इसलिये गर्भ सत्वजन्य भी है ] ।
ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ ४ ॥
ति भरद्वाजः । किं कारणम् । न हि माता, न पिता, नात्मा, न सात्म्य, न पानाशन - भक्ष्य लेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोका-देत्य गर्भं सत्त्वमवक्रामति ॥ ५ ॥
विद्वान् भरद्वाज ने कहा- नही यह बात नहीं है । क्योंकि न माता, न पिता, न आत्मा, न सात्म्य, न पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य इन से उसन्न रस गर्भ को उत्पन्न करते हैं और न ' सच ' ( चित्त ) परलोक से आकर गर्भ मे प्रवेश करता है, अत गर्न माता आदि छः पदार्थों से उत्पन्न नही होता ॥ ५ ॥
यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेताम् भूयस्यः स्त्रियः पुमासश्च भूया. पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसंधाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युरॅपत्यकामा वा परिदेवेरन् ॥ ६ ॥
यदि गर्भ की उत्पत्ति मे माता पिता कारण हों तो बहुत सी स्त्रियों और बहुत से पुरुष पुत्रकामना और कन्याकामना वाले होते है । वे पुत्र की कामना से पुत्रों और कन्या की कामना से कन्याओं को उत्पन्न कर लिया करें । कोई
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अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ४१ भी स्त्री वा पुरुष विना सतान के न रहे । कोई सतान की इच्छा वाले स्त्री वा पुरुष सतान के लिये कभी दुःखी न हों और न विलाप किया करे ॥ ६ ॥
न चाऽऽत्माऽऽत्मानं जनयति । यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेज्जातो वा जनयेदात्मानमजातो वा? तच्चोभयथाऽप्ययुक्तं, न हि जातो जनयति, सवात, न चाजातो जनयति, असत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः, -तिष्ठतु तावदेतत्, यद्ययमात्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् नत्वेव मिष्टास्वेव कथ योनिषु जनयेद्वशिनमप्रतिहतगति कामरूपिण तेजो बल जव - वर्ण-सत्व - संहनन - समुदितमजर समरुजममरम् । एवविधं ह्यात्माऽऽत्मान-मिच्छत्यतो वा भूयः ॥ ७ ॥
आत्मा भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता । यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न करे तब तो क्या वह स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को उत्पन्न करता है या बिना उत्पन्न हुए ही दूसरे को पैदा करता है? दोनो प्रकार से सम्भव नही है । क्योंकि स्वय उत्पन्न होकर दूसरे आत्मा को पैदा नही करता, क्योंकि वह स्वयं ही अविद्यमान है? और उत्पन्न हुए बिना भी ( कारण का अभाव होने से ) वह उत्पन्न नहीं कर सकता । क्योंकि वह स्वयं नही है, इसलिये दोनों ही प्रकार से आत्मा की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अच्छा यही मान लेते हैं कि - आत्मा आत्मा को उत्पन्न करता है, तो फिर आत्मा इष्ट योनियों में ही जन्म क्यों न लेवे? अनिष्ट योनियों में क्यों जन्म लेवे १ यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न कर सके तो जिस के अधीन यह भूत - भौतिक सब ससार है ऐमे वशी, अप्रतिहत गति वाले ( बे - रोकटोक जाने वाले ), यथेच्छ रूपधारी, तेज, बल, वर्ण, सत्व, सहनन से युक्त अजर, अमर, नीरोग आत्मा को ही उत्पन्न करे । क्योंकि आत्मा अपनी आत्मा को इन उपरोक्त गुणों से युक्त अथवा इन से भी अधिक गुणो गल चाहता है ॥ ७ ॥
असात्म्यजश्चायं गर्भः । यदि हि सात्म्यज म्यात्, नहि सात्म्य -सेविनामेकान्तेन प्रजा स्यात्, असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याः स्युः, तञ्चोभयमुभयत्रेव दृश्यते ॥ ८ ॥
यह गर्भ सात्म्य से भी उत्पन्न नहीं होता है । यदि गर्भ की उत्पत्ति में साम्य ही कारण हो तो सात्म्यसेवियो के ही केवल सतान उत्पन्न होनी चाहिये और असा-यसेवी सब के सब बिना संतान के रहने चाहिये । परन्तु दोनों दोनों प्रकार के देखे जाते हैं ॥ ८ ॥
अरसजश्चायं गर्भ ', यदि हि रसजः स्यात्, न केचित्स्त्रीपुरुषेष्वन-पत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते । श्रेष्ठरखोपयोगिनां चेद्
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४२ चरकसंहिता [ अ ० ३ गर्भा जायन्ते इत्यतोऽभिप्रत, इत्येव सत्याजांरभ्र मार्ग मायूर - रस- गोक्षीर-दधि घृत घृत- - मधु- मधु - तेल - मैन्धवेक्षु - रस- मुद्ग - शालिभृतानामेवे कान्तेन प्रजा स्यात् श्यामाक वरको हाल कोरदूषक - कन्द - मूल - भक्ष्याश्च निखिलेनान-पत्याः स्युः, तच्चाभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ६ ॥
गर्भ रस से भी उत्पन्न नहीं होता । यदि रस से उत्पन्न होता तो कोई भी श्री वा पुरुष विना सतान के न रहते । ऐसा काई भी मनुष्य नहीं जो रसों का सेवन नहीं करता । यदि यह अभिनाय है कि श्रेष्ठ रस सेवन करने वालों के ही एतान होने हे तो बा, मेढ़ा, मृग, मार, इनके सास रस, गाय का दूध, दही, बी, शहद, तेल, नमक, गन्ने का रस, मूग, शालि धान्य आदि स पुष्ट व्यक्तियो के ही संतान होने और श्यामाक, वर, काद्दालक, कारदूपक, कन्द, मूल, फल आदि हीन धान्य खाने वाले सन विना सतान के रहने चाहिये । परन्तु दोना में दोनों बातें देखी जाती है ॥ ६ ॥
न खल्वपि परलाकादृत्य तत्त्व गर्भमवक्रामति । यदि ह्येनमवक्रामेत् नास्य किंचिदेव पोवदेहिकं स्यादविदितमदृष्टं वा, न च किचिदपि स्मरति ॥ १० ॥
तस्मादेतद् ब्रूमहे - अमातृजश्चाय गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्य-जश्चारसजश्च न चास्ति सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भरद्वाज. || ११ || सच्च भी परलोक से आकर भी गर्भ में नहीं आता । क्योंकि यदि सच्च पर-लोक से आकर जन्म ग्रहण करे तो इन गर्भ को पूर्व जन्म की कोई भी बात अज्ञात ओर न देखो होनी चाहिये, प्रत्युत उसे पिछले जन्म की सब बाते ज्ञात रहना चाहिये । परन्तु वह पूर्व जन्म की कोई भी बात स्मरण नही रखता । इस-लिये सत् भो कारण नहीं | इसी लिये हम कहते हैं कि गर्भ न माता से, न पिता से, न आत्मा से, नसात्म्य से, न रस से उत्पन्न होता है और न सत्य हो इसका उत्पत्ति कारण है ॥ ११ ॥
नेति भगवानात्रयः सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभि-निवर्त्तते ॥ १२ ॥
मातृचायं गर्भः । न हि मातुर्विना गर्भोपपत्तिः स्यान्न च जन्म-जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गभस्य मातृजानि यानि चास्य मातृतः सम्भवत सभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा - त्वक् च लाहित च मांस च मे नामिव हृदय च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधान चाऽऽमाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुद च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्र च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि ॥ १३ ॥
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अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ४३ ~~ भगवान् आत्रेय कहते हैं - भरद्वाज का ऐसा कथन ठीक नहीं है । क्योकि माता आदि इन सब पदार्थों के मिलने से ही गर्भ बनता है । यह सब गर्भ माता से उत्पन्न होता है । माता के बिना गर्म की उत्पत्ति सम्भव नहीं है । जरायु से उत्पन्न प्राणियों की उत्पति माता के बिना सम्भव ही नहीं । इस गर्भ के जा अवयव माता से उत्पन्न होते हैं, उनको विस्तार से कहते हैं । यथा स्वचा, रत माम, मेद, नाभि, हृदय, क्लोम, ( तिलक ), यक्कृत्, प्लीहा, दो वृक्क ( दो कुक्षि गोक, गुर्दे ), बस्ति, पक्वाशय, आमाशय, महाशय, ( बृहदान्त्र ), उत्तर गुदा वर गुदा, क्षुद्रात्र, स्थूलात्र और वपा ( हृदयस्थ मेद ), तथा बनावादी स्रोत ये सब मृदु भाग माना से उत्पन्न होते हैं ॥ १२-१३ ॥ पितृजश्चाय गर्भः, न हि पितुर्ऋते गर्भायत्तिः स्यान्न च जन्म जरायुजानाम् । यानि स्वत्वस्य गर्भस्य पितृजानि यानि चास्य पितृतः सभवतः सन्ति तान्यनुव्याख्यास्याम. तद्यथा - केश श्मश्रु - नख-लोम - दन्तास्थि - सिरा स्नायु - वमन्यः शुक्रमिति पितृजानि ॥ १४ ॥
यह गर्भ पिन से भी उत्पन्न होता है । पिता के बिना गर्भ की उत्पत्ति नहीं हो सकती ओर न जरायुज प्राणि हो उत्पन्न हो सकते है । इस गर्न के जो अवयव पिता से बनते है उनका अब वर्णन करते हैं । जैसे - केश, श्मश्रु, लाम, नख, दन्त, अस्थि ( हड्डी ) सिरा, स्नायु, धमनिया और शुक्र ॥ १४ ॥
आत्मजश्वाय गर्भः । गर्भात्मा ह्यन्तरात्मा यस्त जीव इत्याचक्षते शाश्वतमरुजमजरममर मक्षयनभेद्य मच्छेद्यमलोटच ' विश्वरूप विश्व -कर्माणमव्यक्तमनादिमनिधनमक्षरमपि । स गर्भाशयमनुप्रविश्य शुक्र-शोणिताभ्या सयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मान, आत्मसज्ञा हि गर्भे तस्य पुनरात्मनो जन्मानादित्वान्नोपपद्यते, तस्मादजात एवायं गर्भ जनर्यात, अजातो ह्ययमजात गर्भं जनयति । स चैव गर्भः कालान्तरेण बाल- युव- स्थविर - भावानवाप्नोति स यस्या यस्यामवस्थायां वर्तते तस्या तस्यां जातो भवति, या त्वस्य पुरस्कृता तस्यां जनिष्यमाणश्च, तस्मात्स एवं जातश्चाजातश्च युगपद्भवति यस्मिश्चंतदुभयं सभवति जातत्व जनिष्यमाणत्व च, स च जातो जन्यते स चैवानागतेष्ववस्था-न्तरेष्वजातो जनयत्यात्मनाऽऽत्मानं, सतो ह्यवस्थान्तरगमनमात्रमेव हि जन्म चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्या तस्यामवस्थाया, यथा सता-मेव शक्शोणितजीवाना प्राक्सयोगाद् गर्भत्व न भवति, तच्च सयोगा द्भवति, यथा सतस्तस्यैव च पुरुश्स्य प्रागपत्यात्पितृत्वं न भवति, तच्चा-पन्याद्भवति, तथा सतस्तस्यैव गर्भस्य तस्या तम्यामवस्थायां जातत्व-मजातत्वं चोच्यते ॥ १५ ॥
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४४ चरकसंहिता [ अ ० ३ यह गर्भ आत्मा से उत्पन्न है, गर्भ के आत्मा को ही अन्तरात्मा कहते हैं, यही जीव है । इसीको शाश्वत, अरुज, अमर, अक्षय, अभेद्य, अच्छेद्य, अलोट्य, विश्वरूप, विश्वकर्मा, अव्यक्त, अनादि, अनिधन, अक्षर आदि पर्य्यायो से कहते हैं । यह अन्तरात्मा जीव, गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्रशोणित के साथ मिलकर अपने आप को रूप मे उत्पन्न करता है । इसलिये गर्भ में इसका नाम ' आत्मा ' है । इस आत्मा के अनादि होने से इस का जन्म नहीं होता । इसलिये वह स्वयं उत्पन्न न होकर भी आत्मा गर्भ को ही उत्पन्न करता है, स्वयं उत्पन्न हुए बिना ही वढ् न उत्पन्न हुए गर्भ को उत्पन्न करता है । यह गर्भ कालक्रम से बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है । यह जिस जिस अवस्था में रहता है, उस उस अवस्था मे उत्पन्न हुआ कहा जाता है । जो अवस्था इसकी आगे भविष्य में आने को होती है उसमें यह अजात, अनुत्पन्न रहता है । इस लिये वह उत्पन्न और अनुसन्न एक समय में दोनों ही एक साथ रहता है । क्योकि उसमें उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होना यह दोनों धर्म रहते हैं । अत यह आत्मा उत्पन्न होकर भी अनुत्पन्न ही है और भविष्य में आनेवाली अवस्थाओं में न उत्पन्न हो कर ही अपने को अपने आप उत्पन्न करता है । सत् विद्यमान आत्मा का एक अवस्था से दूसरी अवस्था में विद्य मान रहते हुए भी उस उस आयु और उस उस अवस्था मे जाने का नाम ही ' जन्म ' है और शुक्र - आर्त्तत्र और जीव इनके सयोग होने से पूर्व गर्भ नही होता । इनके सयोग से ही गर्भ बनता है और जिस प्रकार पुरुष के रहते हुए भी पुत्र के विना हुए इसमें पितृभाव नहीं होता, पुत्र उत्पन्न होने से वह पिता हो जाता है, इसी प्रकार आत्मा के रहते हुए भी उस उस अवस्था में ' उत्पन्न ' होने से वह उत्पन्न और न होने से ' अनुत्पन्न ' हो जाता है ॥ १५ ॥
न तु खलु गर्भस्य मातुर्न पितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति । चित्कुर्वन्ति किचित् कर्मवशात् क्वचिचेषां करणशक्तेर्भ-वति क्वचिन्न भवति, यत्र सत्त्वादिकरणसपत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारि-त्वमतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषादकरणमात्मा संभवति गर्भ-जनने, दृष्टं चेष्टयोनिरैश्वर्यं मोक्षश्चात्मविद्धिरात्मायत्तं न हान्यः सुखदुःखयाः कर्ता, न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, न चाकु-रोत्पत्तिरबीजात् ॥ १६ ॥
गर्भ के बारे में माता, पिता और आत्मा अपनी इच्छा से सब कुछ नहीं कर सकते । वे कुछ अपनी इच्छा से करते हैं और कुछ कर्मों के वश से करते हैं । कहीं पर इनके साधन, उपाय आदि का शक्ति स कार्य होता है और कही
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अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ४५ www www पर नहीं होता । जहा पर सत्व आदि साधन उत्तम होते हैं, वहा पर साधनों के बल के अनुसार वे यथेष्ट कर सकते हैं । इस के विपरीत अर्थात् करण उत्तम न रहने पर वे यथेष्ट नही कर सकते । इस प्रकार ' साधन के दोष से आत्मा भोत्पत्ति में कारण नहीं ' यह कहना ठीक नहीं । देखा भी है कि इष्ट योनि, ऐश्वर्यं ( आवेश आदि ) और मोक्ष ये सब आत्मा के अधीन हैं, इसका आत्मविद् ज्ञानियों ने साक्षात् अनुभव किया है । अत्मा के सिवाय दूसरा कोई सुख दुख का कर्त्ता नही है । उत्पन्न होने वाला गर्भ आत्मा के सिवाय दूसरे से उत्पन्न नहीं होता । जैसे बीज के विना अकुर की उत्पत्ति नहीं हो सकती उसी प्रकार आत्मा के विना गर्भ उत्पन्न नहीं हो सकता ॥१६ ॥
यानि तु खल्वस्य गर्भस्याऽऽत्मजानि यानि चास्याऽऽत्मतः संभ-वत संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा - तासु तासु योनिपू-त्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वर-वर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धि स्मृतिरहङ्कारः प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि ॥ १७ ॥
गर्भ की जो बाते आत्मा से उत्पन्न होती है, या आत्मा के होने पर ही होनी संभव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे - मनुष्य, तिर्यगू आदि नाजा योनियों में जन्म, आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिया, प्राण और अपान, प्रेरण ( इन्द्रिय मन का विषयो मे प्रेरित करना ) शरीर का धारण करना आदि [ उन्भेष, निमेष प्रयत्न आदि कर्म भी ], नाना आकृतिया, नाना स्वर और नाना वर्ण आदि सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार और प्रयत्न । इतनी बातें आत्मा से उत्पन्न होती है ॥ १७ ॥
सात्म्यजश्चायं गर्भः । न ह्यसात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्व-न्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाऽप्यनिष्टो भावः यावत्खल्वसात्म्यसेविनां बी-पुरुषाणा त्रयो दोषाः प्रकुपिता. शरीरमुपसर्पन्तो न शुक्रशोणितगर्भा-शयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत्समर्था गभजननाय भवन्ति । सात्म्यसे-विनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहत - शुक्र- शोणित - गर्भाशयानामृतुकाले सनि-पतितानां जीवस्यानवक्रमणाद् गर्भा न प्रादुर्भवन्ति, न हि केवलं सात्म्यज एवायं गर्भ, समुदायोऽत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य गर्भस्य सात्म्यजानि यानि चास्य सात्म्यतः सभवतः संभवन्ति, तान्य-नुव्याख्यास्यामः, तद्यथा - आरोग्यमनालस्य मलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वर वर्ण - बीज संपत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि ॥ १८ ॥