श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 421–430

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अ ०८ 1 चिकित्सितस्थानम् ४३७ रोगी सूख रहा हो ओर जिसका मास क्षीण होता जा रहा हो, उसको मास खाने वाले प्राणियो का मास देवे । क्योकि इस प्रकार के प्राणियो का मास अति पुष्टिकारक होता है । ( १ ) यक्ष्मारोगी को मार का मास देवे । गीध, उल्लू, चापपक्षी के मास को विधिपूर्वक पकाकर रोगी का सोर का मास कहकर देवे । [ ज्ञात होने पर वह शायद घृणा से न खाये, इसलिये मोर के नाम से देवे ] । ( २ ) इसी प्रकार से कौआ का मास तीतर के नाम से, सापो का वर्मिं ( मछली विशेष ) के नाम से, भूने हुए गिण्डोयो को मछली की आते कहकर देवे । लोमड़ी, बडे नेवले, नल्ली, गीदड के बच्चो के मास को विधिवत् बनाकर शशक का मास कहकर देव | सिंह, भालू, तरक्षु, ( लकडबग्घा ), व्याघ्र ( बघेरा ), अन्य इसी प्रकार के मास खाने वाले प्राणियों के मासो को मृग का मास कहकर मास की वृद्धि के उद्देश्य से देवे । मास की वृद्धि के लिये हाथी, गैडा, घोडा, इनके मासा से वेशवार बनाकर उनको मैसे का मास बता कर देवे || १४६-१५४ ॥

मासेनोपचिताङ्गाना मासं मासकरं परम् ।

तीक्ष्णोष्णलाघवाच्छस्तं विशेषान्मृगपक्षिणाम् ॥ १५५ ॥

मासानि यान्यनभ्यासादनिष्टानि प्रयोजयेत् ।

तेषूपधा सुखं भोक्तुं तथा शक्यानि तानि हि ॥ १५६ ॥

जानञ्जगुप्सन्नैवाद्याज्जग्धं वा पुनरुल्लिखेत् ।

तस्माच्छद्मोपसिद्धानि मासान्येतानि दापयेत् ॥ १५७ ॥

बर्हितित्तिरिदक्षाणा हसाना शूकरोष्ट्रयोः ।

खरगोमहिपाणा च मास मासकरं परम् ॥ १५८ ॥

योनिरडविधा चोक्ता मांगनामन्नपानिके ।

ता परीक्ष्य भिपग्विद्वान्दद्यान्मासानि शोपिणे ॥ १५६ ॥

मास से पुष्ट अगो वाले प्राणियो का मास विशेषत मास को बढाता है । तीक्ष्ण, उष्ण और लघु होने से विशेषकर पशु - पक्षियों का मास श्रेष्ठ है । जिसने जो मास कभी प्रथम खाया नही इसलिये उसे वह अच्छा न लगे तो सुख से खिलाने के लिये छिपाकर देना होता है । क्योकि यदि रोगी जान जाये तो खाने से इन्कार कर देगा अथवा खाकर घृणा से वमन कर देगा । इसलिये धोखे से छिपाकर इन मासो को देवे । मांर, तीतर, मुर्गा, हस, सुअर, ऊट, गधा, गाय, और भैस इनका मास विशेषतः मास का बढाता है । अन्नपानाध्याय

पृष्ठ 422

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४३८ चरकसंहिता मे मासो के प्राप्तिस्थान ( योनि ) आठ प्रकार के बतलाए कि विवेचनापूर्वक यक्ष्मा के रोगी को उन मासो का प्रयोग

प्रसहा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ।

आहारार्थ प्रदातव्या मात्रया वातशोषिणे ॥

प्राविष्किराचैव धन्वजाश्च मृगद्विजाः ।

कफपित्तपरीताना प्रयोज्याः शोपरोगिणाम् ॥

विधिवत्सूपसिद्धानि मनोज्ञानि मृदूनि च । रसवन्ति सुगन्धीनि मांसान्येतानि भक्षयेत् [ अ ०८ हैं । वैद्य को चाहिये करावे ॥१५५-१५६ ॥ १६० ॥ १६१ ॥ ॥ १६२ ॥

मासमेवाश्नतः शोपो माध्वीकं पिबतोऽपि च ।

नियतानल्पचित्तस्य चिर काये न तिष्ठति ॥। १६३ ॥

जो यक्ष्मा का रागी वात- प्रधान हो उसको प्रसह, भूशन, आनूप, जलज और जलचर पशु - पक्षिया का मास मात्रा मे भाजन के लिये देना चाहिये । जिस यक्ष्मा - रोग में कफ और पित्त प्रवल हा उसका प्रतुद, विष्किर और धन्वज ( जागल ) पशु पक्षियों का मास देवे । विविपूर्वक तैयार किये, मन को लुभाने वाले मृदु, शुभ रस और सुगन्धि से युक्त इन मासो का रोगी खावे । मास का आहार करते हुए और माध्वोक को पीते हुए उदारचित्त [ जो चिन्ता नही करता ] रोगी के शरीर मे यक्ष्मा देर तक नहीं रहता ॥ १६०- १६३ ॥

वारुणीमण्डनित्यस्य बहिर्मार्जनसेविनः ।

अविवारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ १६४ ॥

प्रसन्ना वारुणी शीधुमरिष्टानासवान्मधु ।

यथाह मनुपानार्थ पिबेन्मासानि भक्षयेत् ॥ १६५ ॥

मद्यं तैक्ष्ण्योष्ण्य वैशद्यसूक्ष्मत्वात्स्रोतसा मुखम् ।

प्रमथ्य विवृणोत्याशु तन्मोक्षात्सप्त वातवः ॥ १६६ ॥

पुष्यन्ति धातुपोपाच्च शीघ्र शोषः प्रशाम्यति । जो मनुष्य प्रतिदिन वारुणी - मण्ड का सेवन करता है, शरीर का बहि -शोधन करता है, उपस्थित वेगो को नही रोकता उसको यक्ष्मा रोग पीडित नही कर सकता । प्रसन्ना, वारुणी, शीधु, अरिष्ट, आसव, मधु इनमे से जो पदार्थ रोगी को योग्य लगे उसे अनुपान के रूप मे पान करे ओर मास खावे । मय तीक्ष्ण, उष्ण, विशद और सूक्ष्म होने से बलात् खातों के मुखो को शीघ्र खोल

देता है, मुखों के खुल जाने से रस आदि सातो धातुओ का पोषण होता है ।

धातुओ के पोषण होने से यक्ष्मा रोग शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ १६४ - १६६ ॥

पृष्ठ 423

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अ ०८ चिकित्सितस्थानम् ४३६ मासादमासस्वरसे सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ॥ १६७ ॥

सक्षौद्रं पयसा सिद्धं सर्पिर्दशगुणेन वा । वृत - सेवन —–मासभोजी मनुष्य पशु - पक्षियों के मास रस [ घी से चौगुना ] से सिद्ध घृत का उपयोग करे और जो मासभोजी न हो गाय के दूध मेघा का सिद्ध करके शहद के साथ खाये ॥ सिद्धं मधुरकैद्रव्येर्देशमूलकषायिकैः ॥ १६८ क्षोरमासरसोपंतै I घृत शोषहरं परम् । ( १ ) दशमूलादि धृत — गाय का घृत २ प्रस्थ, ८ प्रस्थ, दशमूल काथ ८ प्रस्थ जीवनीय गण आदि शराव, इनसे यथाविधि घी पकावे, यह अति शापनाशक पिप्पलो - पिप्पलीमूल - चव्य- चित्रक - नागरेः ॥ सयावश्कैः सक्षीरेः स्रोतसा शोधनं घृतम् । वह घी से दश गुणे १६७ ॥ ॥ दूध २ प्रस्थ, मासरस मधुर द्रव्य मिलित १ हे ॥१६८ ॥

१६६ ॥ ( २ ) पचकालादि घृत - पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ, यवक्षार मिलित १ शराव इनका कल्क, घी २ प्रस्थ, दूब ८ प्रस्थ लेकर घृतपाक करना चाहिये । यह घृत स्रोतों का शोधक है ॥ १६६ ॥

रास्ना - बला -गोक्षुरक - स्थिरा वर्षा भु - साधितम् ॥ १७० ॥

जीवन्तीपिप्पलीगर्भ सक्षीरं शोषनुद् घृतम् । ( ३ ) रास्नादि घृत - रास्ना, बला, गोखरू, सालपर्णी, पुनर्नवा, इनके

क्वाथ मे, जीवन्ता आर पिप्पला इनका कल्क, दूध मिलाकर घृत सिद्ध कर लेवे ।

यह घी शोष को नष्ट करता है ॥१७० ॥

यवाग्वा वा पिवेन्मात्रा लिह्याद्वा मधुना सह ॥ १७१ ॥

सिद्धाना सर्पिषामेषामद्यादन्नेन वा सह ।

शुष्यतामेष निर्दिष्टो विधिराभ्यवहारिकः ॥ १७२ ॥

सेवन विधि – इन घृतो को यवागुओ के साथ मिलाकर पीना चाहिये, अथवा शहद के साथ चाटे अथवा इन घृतो को अन्न के साथ खावे । शोत्र-रोगिया केळलिये यह अन्न - पान विधि कह दी है ॥ १७१-१७२ ॥

बहिःस्पर्शनमाश्रित्य वक्ष्यतेऽतः परं विधिः ।

स्नेहक्षीराम्बुकोष्ठे त स्वभ्यक्तमवगाहयेत् ॥ १७३ ॥

स्रोतोविबन्धमोक्षार्थ बलपुष्ट्यर्थमेव च । १. ' रसोपेतं ' इति च ।

पृष्ठ 424

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४४० चरकसहिता [ अ ०८ उत्तीर्ण मिश्रकैः स्नेहैः पुनरुक्तः सुखैः करैः ॥ १७४ ॥

मृद्नीयात्सुखमासीनं सुख चोत्सादयेन्नरम् । इसके आगे बहि परिजार्जन विधि कहते हैं— ( १ ) यक्ष्मा के रोगी को चन्दनाद्य तैल आदि से अच्छी प्रकार मालिश करके तैल, दूध और पानी से भरे कोष्ठ मे बिठाना चाहिये । इससे स्रोंतो के मुख खुलते हैं, शरीर मे बल और पुष्टेि भाती है । ( २ ) इस मिश्रक स्नेह से बाहर निकल आने पर हाथों से घी या तेल लगाकर ( धूप मे ) सुख से बैठे रोगी के शरीर पर मालिश करे और मुख से उबटन करे ॥ १७३-१७४ ॥ जीवन्ती शतवीर्या च विकसा सपुनर्नवाम् ॥ १७५ ॥

अश्वगन्धामपामार्ग तर्कारी मधुक बलाम् ।

विदारी सर्षप कुछ तण्डुलानतसीफलम् ॥ १७६ ॥

माषास्तिलाच किण्व च सर्वमेकत्र चूर्णयेत ।

त्रिगुणं यवचूर्णेन दना युक्तं समाक्षिकम् ॥ १७७ ॥

एतदुत्सादनं कार्य पुष्टिवर्णबलप्रदम् । उत्सादन योग - ( १ ) जीवन्ती, शतवीर्या [ श्वेत तब अथवा शतावरी ], विकसा [ मजीठ ], पुनर्नवा, असगन्ध, अपामार्ग, तर्कारी [ जयन्ती ], मुलहठी, बला, विदारीकन्द, श्वेत सरसो, कूठ, चावल, अलसी, उड़द, तिल, किण्व ( सुराबीज ), इनको समभाग लेकर चूर्ण करे । इस चूर्ण मे तिगुना जौ का चून, दही और थोडा शहद मिलाकर उबटन करे यह उबटन पुष्टि, बल और वर्ण को देता है || १७५–१७७- ॥ गौरसर्षपकल्केन गन्धैश्चापि सुगन्धिभिः ॥ १७८ ॥

स्नायादृतुसुखैस्तोयेजवनीयौषधैः श्रुतेः । ( १ ) स्नानीय जल -- श्वेत सरसो के कल्क से साधित जल से ग्रीष्म काल में, सुगन्धित गन्ध द्रव्यो से साधित जल से शीन काल मे और जीवनीय गण से साधित जल से वर्षा ऋतु मे स्नान करे । [ अष्टाग सग्रहकार के मत से जीवनीय गण की औषधियों के क्वाथ मे सरसो और सुगन्धित द्रव्यों का कल्क डालकर स्नान करना चाहिये । शीतकाल मे उष्ण जल से और ग्रीष्मकाल मे शीत जल से स्नान करना चाहिये ] ॥ १७८- ॥ गन्धैः समायैर्वासोभिर्भूषणैश्च विभूषितः ॥ १७६ ॥

स्पृश्यान्संस्पृश्य संपूज्य देवताः सभिषद्विजाः । १. ' यवचूर्ण द्विगुणित ' इति वा पाठः ।

पृष्ठ 425

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अ ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४४१ ^^^ इष्टवर्णरसस्पर्शगन्धवत्पानभोजनम् ॥ १८० ॥

इष्टमिष्टैरुपहितं सुखमद्यात्सुखप्रदम् । ( १ ) पथ्य गन्ध पुष्पमाला, स्वच्छ वस्त्र, आभूषणो से शोभित रोगी गाय, देवता, स्वर्ण आदि मंगलकारक वस्तुओ का स्पर्श करके, देव, ब्राह्मण और वैद्या का पूजन करके, मनको पसन्द, वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध वाले, हितकारी, सुखदायक अन्न - पान को अभीष्ट व्यजनो के साथ खावे ॥ १७६-१८०- ॥ समातीतानि धान्यानि कल्पनीयानि शुष्यताम् ॥ १८१ ॥

लघून्यहीनवीर्याणि स्वादूनि गन्धवन्ति च ।

यानि ग्रहकारीणि तानि पथ्यतमानि हि ॥ १८२ ॥

यच्चोपदेक्ष्यते पथ्यं क्षतक्षोणचिकित्सिते ।

यक्ष्मिणस्तत्प्रयोक्तव्यं बलमांसाभिवृद्धये ॥ १८३ ॥

( २ ) शोष के रोगी को एक साल पुराने धान्य देने चाहिये । ये धान्य लनु, वीर्य से पूर्ण, स्वादु और गन्ध से युक्त, आनन्ददायक होने चाहिये, इस प्रकार के धान्य अतिथ्य अर्थात् हितकारक है जो पथ्य करेंगे, बल, मास की वृद्धि के लिये प्रयोग करे ॥ १८१-१८३ ॥ अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैरवगाहैर्विमार्जनैः बस्तिभिः क्षीरसर्पिर्भिर्मासैर्मासरसौदनैः इष्टधैर्मनोज्ञानां गन्धानामुपसेवनैः । यथर्तुविहितैः स्नानैर्वासोभिरहतैः प्रियैः

सुहृदा रमणीयानां प्रमदाना च दर्शनैः ।

गीतवादिशब्दैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च ॥

हर्षणाश्वासनैर्नित्यं गुरुणा समुपासनैः ॥ क्षतक्षीण चिकित्सा म उसका भी यक्ष्मा -रोग मे

।

॥ १८४ ॥

॥ १८५ ॥

१८६ ॥

ब्रह्मचयण दानेन तपसा देवतार्चनैः ॥ १८७ ॥

सत्येनाचारयोगेन मङ्गलैरप्यहिसया ' ।

वैद्यविप्रार्चनाचैव रोगराजो निवर्तते ॥ १८८ ॥

अभ्यग से ( तैल आदि की मालिश से ) उबटन से, स्नान से, अवगाहन से, शरीर का बहि परिमार्जन करने से, बस्तियो से, दूध - घी से, मास से, मास रस और भात से, मन के प्रिय मद्य से, मन को लुभाने वाले गन्वो के सेवन से, १ ' लघूनि हीनवीर्याणि तानि पथ्यतमानि हि ' इति च पाठ क्वचित् । ' रविहिसया ' इति वा ।

पृष्ठ 426

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४४२ चरकसहिता [ अ ० ह ऋतु के अनुकूल स्नानो से, नूतन स्वच्छ वस्त्रो के पहिनने से, सुन्दर मित्रो तथा स्त्रिया के दर्शन से, कर्णप्रिय गाने, बजाने की ध्वनि से, आनन्द और सान्त्वना से, गुरुओ के सत्सग से, ब्रह्मचर्य से, दान से, तप से, देवताओ की भक्ति से, सत्य से, शुभाचरण से, मगलकारी और अहिंसात्मक कार्यों से, वैद्य ओर ब्राह्मण की पूजा से ओर शुभ - कायो के करने से यक्ष्मा - रोग नष्ट हो जाता है || १८४ - १८८ ॥

यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः ।

ता वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८६ ॥

पुरातन काल में जिस यज्ञ क्रिया से यक्ष्मा रोग जीत लिया गया हो, उस वेदविहित यज्ञ को आरोग्य का इच्छुक पुस्प करे ॥ १८६ ॥

तत्र श्लोको – प्रागुत्पत्तिनिमित्तानि प्राग्रूप रूपसंग्रहः ।

समामाद् व्यासतश्चोक्त भेपजं राजयक्ष्मणः ॥ १६० ॥

नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता ।

इत्युक्तः संग्रहः कृत्स्नो राजयक्ष्मचिकित्सिते ॥ १६१ ॥

उपसहार —— राजयक्ष्मा - रोग की उत्पत्ति, कारण, प्रागू - रूप, रूप तथा चिकित्सा का सक्षेप और विस्तार से कह दिया है । राजयक्ष्मा नाम का कारण, साध्यता, असाध्यता, कष्टसाध्यता ये सब राजयक्ष्म - चिकित्सा मे सग्रह कर

दिये हैं । १६० - १६१ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने राजयक्ष्म चिकित्सितनामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥

नवमोऽध्यायः अथात उन्मादचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा SSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे उन्माद की चिकित्सा कहते है । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥

बुद्धिस्मृतिज्ञानतपोनिवासः पुनर्वसुः प्राणभृता शरण्यः ।

उन्मादहेत्वाकृतिभेषजानि कालेऽग्निवेशाय शशंस पृष्टः ॥ ३ ॥

बुद्धि ( अवबोध ), स्मृति ( स्मरण ), ज्ञान ( तत्त्वज्ञान ), तप ( द्वन्द्व सहिष्णुता व्रत, तपश्चरण आदि ) इनके निवास आश्रयभूत, प्राणियों की

पृष्ठ 427

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अ ० है ] चिकित्सितस्थानम् ४४३ रक्षा मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने उचित अवसर पर, अग्निवेश के प्रश्न करने पर उन्माद -रोग के कारण, लक्षण और चिकित्सा का अग्निवेश को उपदेश किया ॥३ ॥

विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् ।

उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वी मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥ ४ ॥

उन्माद के कारण और सामान्य लक्षण - विरुद्ध ( सयोग - विरुद्ध जैसे— मछली और दूध ), विष आदि से दूषित और अपवित्र खान - पान, देव, गुरु-जन, ( माता - पिता और आचार्य ) और द्विजो ( ब्राह्मणो ) का तिरस्कार, भय या हर्ष के कारण मन पर आघात होना, ( इसी प्रकार क्रोध, शोक, चिन्ता आदि से मन पर चोट पहुचना ) और शरीर की क्रियाओ का विषम होना, ये सब बाते उन्माद रोग के कारण है ॥ ४ ॥

तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदय प्रदूष्य ।

स्रोतास्यधिष्ठाय मनोवहान प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥

सम्प्राप्ति – उपरोक्त कारणों से अल्पसत्त्व अर्थात् दुर्बल व्यक्ति मे मल ( बात आदि दोप ) प्रकुपित होकर, बुद्धि ज्ञान और स्मृति के आश्रय स्थान हृदय को दूषित कर देते है ओर मनोवह स्रोता का आश्रय लेकर पुरुष के चित्त को शीघ्र ही माहित अर्थात् विपरीत ज्ञान वाला और विचलित कर देते है ॥ ५ ॥

धीविभ्रमः सत्त्वपरिसवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च ।

अबद्धवाक्त्वं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्माद्गदस्य लिङ्गम् ॥ ६ ॥

लक्षण – वी - विभ्रम ( बुद्धि का भ्रश ), सत्त्वपरिप्लव ( मन की अति चच-लता ), आखो मे व्याकुलता ( इधर - उधर देखना ), अधीरता, असम्बद्ध वाणी, हृदयशून्यता अर्थात् भाव से रहित हृदय होना, ये सब निज और आगन्तुज दानो प्रकार के उन्मादो के लक्षण है ॥ ६ ॥

स मूढचेता न सुख न दुःखं नाऽऽचारधर्मो कुत एव शान्तिम् ।

विन्दत्यपास्तस्मृतिबुद्धिसंज्ञो भ्रमत्यय चेत इतस्ततश्च ॥ ७ ॥

इस मूढ चित्तवाले पुरुष को न सुख का, न दुःख का और न आचार ( मर्यादा ) का, न धर्म का ज्ञान रहता है, इसलिये चित्त को कही भी शान्ति प्राप्त नही होती । इस व्यक्ति की स्मृति, बुद्धि और सज्ञा सत्र नष्ट हो जाती है, यह व्यक्ति चित्त को इधर - उधर डोलाता रहता है ॥ ७ ॥

समुद्भ्रमं बुद्धिमनःस्मृतीनामुन्मादमागन्तुनिजोत्थमाहुः ।

तस्योद्भवं पञ्चविधं पृथक तु वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥८ ॥

१ ' पञ्चविधस्य भूयो ' इति वा ।

पृष्ठ 428

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४४४ चरकसहिता [ अ ० बुद्धि, मन और स्मृति का भ्रश होना ही उन्माद का स्वरूप है । कारण-भेद से उन्माद रोग दो प्रकार का है । ( १ ) निज - शरीर के दोष से उत्पन्न ओर ( २ ) आगन्तुज । इस उन्माद की उत्पत्ति पाच प्रकार की है । ( १ वातज, २ पित्तज, ३ फज, ४ मनिपातज और ५ आगन्तुज १ ) प्रत्येक के उक्षण और चिकित्सा प्रशन् २ कहेगे ॥ ८ ॥

रूक्षात्पशीतान्नविरेकधातुभ्योपवास रनिलोऽतिवृद्धः ।

चिन्ताविजुट हृदय प्रदूष्य बुद्धि स्मृति चाप्युपहन्ति शीघ्रम् ॥ ६ ॥

अस्थानद । सस्तिनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि ।

पारुष्य काय रुगवणताच जीर्णे बलं चानिलजस्य रूपम् ॥। १० ॥

( १ ) वातजन्य उन्माद - अल्प ओर शीतल अन्न से, वमन या विरेचन - रूप मे दोपा का निकालने वाले कमो से रस - रक्त आदि धातुओ का क्षय होने से, उपवासों से, बढा हुआ वायु अल्पमत्त्व ( निर्बल ) व्यक्ति के चिन्ता, शोक क्रोध, लोन, काम आदि से युक्त हृदय को दूपित करके, बुद्धि स्मृति का भी शीघ्र ही नष्ट ( चचल, अस्थिर, बेचैन ) कर देता है । लक्षण - इसके कारण से व्यक्ति विना स्थान ( विना अवसर ) ही जार मे हसने लगता है, मुस्कराता है, नाचता है, रोता है, अगो का इधर - उधर चलाता है, रोता है । रोगी का शरीर कठार, कृश, अरुण ( लाल ) वर्ण का हो जाता है, आहार के जीर्ण होने पर रोग का बल बढ जाता है, ये वातजन्य उन्माद के लक्षण ॥ ६-१० ॥

अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भाज्येिश्चित पित्तमुदीर्णवेगम् ।

उन्मादमत्युग्रमनात्मकस्य हृदि श्रितं पूर्ववदा कुर्यात् ॥ ११ ॥

अमर्षसंरम्भविनन्नभावाः सन्तार्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः ।

प्रच्छायगीतान्नजलाभिलाषाः पीता च भाः पित्तकृतस्य लिङ्गम् ॥ १२ ॥

( २ ) पित्तज उन्माद - अजीर्ण, कटु, अम्ल, विदाही और उग्ण आहार मे कुपित हुआ पित्त अनात्मवान् ( अवीर, निर्वल ) पुरुष के हृदय में स्थित १ सुश्रुत और अष्टाग संग्रह मे विषजन्य उन्माद का मान कर छ प्रकार के उन्माद माने है । वहा कहा है- ' डुन्मादा भवन्ति । परन्तु क्योकि विप की मद - सज्ञा होने से इसका निजोन्माद मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये । जैगे— ' यथास्व तत्र भेपजम् ' ।

सुश्रुत - ' यश्च मन्यकृत प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च य ।

सर्व एव मदा नर्त्ते वातपित्तकफात् त्रयात् ॥

पृष्ठ 429

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अ ० [ ] चिकित्सितस्थानम् ४४५ होकर, हृदय को दूषित करके शीघ्र ही अति भयकर, तीव्र, उन्माद का उत्पन्न करता I लक्षण —— विना अवसर के ही अमर्प अर्थात् अक्षमा, क्रोध करना, मरम्भ ( किसी काम मे बहुत जल्दी करना ), नगा हो जाना, सतर्जन ( भर्त्सना ), अभिद्रवण ( भागना ), शरीर का उष्ण होना, क्रोध करना, छायायुक्त स्थान की चाह, शीतल खान पान - की इच्छा का हाना, शरीर मे पिलाई की झलक होना, ये सब पित्तजन्य उन्माद के लक्षण है । इस मे रोग का वल भाजन की जोर्ण-अवस्था में अधिक होता है ॥ ११-१२ ॥

संपूरणैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि सप्रवृद्धः ।

बुद्धि स्मृति चाप्युपहत्य चित्तं प्रमोहयन्संजनयेद्विकारम् ॥ १३ ॥

वाकचेष्टितं मन्दमरोचकच नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा ।

छर्दिश्व लाला च बलं च भुक्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मके स्यात् ॥ १४ ॥

( ३ ) कफज उन्माद – मन्द चेष्टाशील ( प्राय करके शयन, आस्न आदि पर रहने वाले ), व्यक्ति के अति भोजन करने से, ऊष्मा अर्थात् उष्णता की इच्छा सहित कफ, मर्म अर्थात् हृदय में बढ कर, बुद्धि और स्मृति का नाश करके चित्त को मोहित कर उन्माद रोग का उत्पन्न करता है " । लक्षण - वाणी और शरीर की चेष्टा का मन्द होना, अरोचक ( अरुचि ), स्त्रीग की चाह, एकान्त, निर्जन स्थान की अभिलाषा, नीद का अधिक आना, छर्दि और लाला- साव, आहार के खाने पर रोग का बल बढना, नख, त्वचा, मूत्र आदि का श्वेत होना कफोन्माद के लक्षण है ॥ १३-१४ ॥

यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैः स तु हेतुभिः स्यात् ।

सर्वाणि रूपाणि बिर्भात तादृग्विरुद्धमपज्यविधिर्विवर्ज्यः ॥ १५ ॥

( ४ ) सन्निपातजन्य उन्माद —- तीनो दोषा से मिलकर उत्पन्न हुआ उन्माद अति दारुण होता है । इसमे वात आदि तीनो दोग कारण रूप ले सम्मिलित रहते है, इसलिये इसमे सब दापो के लक्षण भी रहते हैं । इसमें चिकित्सा परस्पर विरोधिनी होने के कारण यह असाध्य है ॥ १५ ।

देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षः पितृणामभिधर्पणानि ।

आगन्तुहेतुर्नियमत्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे ॥ १६ ॥

१ कफान्माद मे उष्णता की अभिलाषा होती है । जैसा कि सुश्रुत में कहा है- -" निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पसुगुग्णसेवी-रात्रौ भृश भवति चापि कफप्रयोगात् । "

पृष्ठ 430

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४४६ चरकसंहिता [ अ ० ह

अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः ।

उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७ ॥

अदूषयन्तः पुरुपस्य देह देवादयः स्वेश्च गुणप्रभावैः ।

विशन्त्यहश्यास्तरसा यथैव च्छायातपो दर्पणसूर्यकान्तौ ॥ १८ ॥

( ५ ) आगन्तुज उन्माद — देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, राक्षस ( राक्षस और ब्रह्मराक्षस ) और पितर इन आठो ग्रहो का तिरस्कार करना, नियमपूर्वक व्रतादि का आचरण न करना और पूर्वजन्म मे उत्तम कर्म न होना ये आगन्तुज उन्माद रोग के कारण है । लक्षण– ( १ ) जिस उन्माद - रागी मे अमानुषीय ( दैवी ), वाणी, पराक्रम, शूरता, शरीर क्रियाये दिखाई दे, जिसका ज्ञान, बुद्धि, स्मृति, विज्ञान ( शिल्प सम्बन्वी ज्ञान ), और अमानुषी बल ( मनुष्य सीमा से अधिक ) प्रतीत हो, जिस उन्माद का काल निश्चय न हो ( कभी प्रात, कभी मध्याह्न और कभी सायकाल हो ), इस प्रकार के उन्माद को भूतोन्माद जानना चाहिये । जिस प्रकार अपने गुणो के प्रभाव से दर्पण मे छाया ( प्रतिबिम्ब ) और सूर्य कान्त-मणि मे सूर्य की किरणे प्रवेश करती हैं, परन्तु दिखाई नही देती, उसी प्रकार से देव आदि भी मनुष्य के शरीर को दूषित किये बिना ही अपने गुणों के प्रभाव से अतिवेग से प्रविष्ट हो जाते है । [ ये वात आदि दोषो के समान शरीर को दूषित नही करते ] ॥ १६-१८ ॥

आघातकालास्तु सपूर्वरूपाः प्रोक्ता निदानेऽथ सुरादिभिश्च ।

उन्मादरूपाणि प्रथनिबोध कालं च गम्यान्पुरुषाश्च तेषाम् ॥ १६ ॥

अभिगमनीय पुरुषो पर आघात ( आक्रमण ) के काल और आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप ये निदान स्थान मे प्रथम कह दिये है । अब देवता आदि आठो ग्रहो के द्वारा उत्पन्न उन्माद के लक्षण, अभिगमन - काल और यह रोग जिन पुरुषों को होता है यह सब पृथक २ सुनो । [ यद्यपि देव आदि का प्रवेश दिखाई नही देता तथापि ज्ञान, विज्ञान-शीलता आदि लक्षणो से इनका अनुमान करना चाहिये ] ॥ १६ ॥

तद्यथा - सौम्यदृष्टि गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनमस्व प्रम भोजनाभिला-षिणमल्पस्वेद - मूत्र - पुरीष - वाचं शुभगन्धं फुल्ल - पद्म - वदनमिति देवोन्मत्तं विद्यात् ॥ २० ॥

( १ ) देवोन्माद –दृष्टि प्रसन्न ( निर्मल आख ) हो, गम्भीर हो, लज्जाशील हो, क्रोध से रहित हो, निद्रा से रहित हो, भोजन की अभिलाषा से रहित हो,