श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 431–440
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 431–440
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अ ० [ ] चिकित्सितस्थानम् ४४७ थोडे पसीने हो, थोडे ही मूत्र और मल हो, थोड़ा बोले, शोभन गन्ध हो, खिले हुए कमल के समान विकसित मुख हो, ऐसे लक्षणों वाले पुरुष को देवग्रहो से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २० ॥
गुरुवृद्धसिद्धर्षीणामभिशापाभिचाराभिध्यानानुरूपाहारचेष्टाव्याहार तैरुन्मत्त विद्यात् ॥ २१ ॥
( २ ) गुरु वृद्ध आदि से उत्पन्न उन्माद - गुरु, वृद्ध, सिद्ध ( इन तीन ग्रहभेदो ) और ऋपियो के अभिशाप, अभिचार, और अभिव्यान के अनुकूल जिस रोगी की चेष्टा आदि हो, उसको गुरु, वृद्ध और सिद्ध ग्रहो से उन्मत्त आ जाने | २१ | अप्रसन्नदृष्टिमपश्यन्तं निद्रालु प्रतिहतवाचमनन्नाभिलाषिणमरोच-काविपाकपरीत पितृभिरुन्मत्तं विद्यात् ॥ २२ ॥
( ३ ) पित्तग्रह -- मलिन दृष्टि लोगो की ओर आख उठा कर न देखे, निद्राशील, निरुद्ववाक् ( रुक रुक कर बोले ), अन्न की चाह न रखे, परन्तु पितृभोज्य तिल गुड़ आदि की चाह करे, अरोचक, अविपाक ( मन्दानि ) युक्त हो, ऐसे पुरुष को पितृग्रहो से उन्मत्त समझे ॥ २२ ॥
चण्डं साहसिक तीक्ष्णं गम्भीरमप्रधृष्यं सुख - वाद्य - नृत्य - गीतान्न - पान-स्नान - माल्य - धूप - गन्ध - रति रक्त - वस्त्र- बलि - कर्म - हास्य- कथानुयोगप्रियं शुभ-गन्धं च गन्धर्वोन्मत्तं विद्यात् ॥ २३ ॥
( ४ ) गन्धर्व - ग्रह —मुख से बाजा बजावे, नाचे, गावे, खान - पान, स्नान, माला, धूप और सुगन्धित वस्तुओ की चाह करे, लाल वस्त्र, बलिकर्म, हास्य, कथा ( बातचीत ), अनुयोग ( पूछने की इच्छा ) करे और शुभ गन्ध युक्त हो, ऐसे मनुष्य को गन्धर्व - ग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २३ ॥
असकृत्स्वप्न - रोदन- हास्यं नृत्य - गीत वाद्य - पाठ कथान्न - पान -स्नान-माल्य- धूप- गन्ध - रति रक्त - विसुताक्ष द्विजाति - वैद्य परिवादिनं रहस्य-भाषिणमिति यक्षोन्मत्तं विद्यात् ॥ २४ ॥
( ५ ) यक्षोन्माद – बार - बार नीद ले, लेटे, रावे, हसे, नाचे, गावे - बजावे, पाठ करे, बातचीत, खानपान, स्नान, माला, धूप, गन्ध मे इच्छा रखे, आखे लाल और भय से चकित हो, ब्राह्मण आदि द्विजो तथा वैद्यो की निन्दा करे, १ अष्टाग - सग्रह मे १८ ग्रह गिने है । जैसे — सुर, असुर, गन्धर्व, उरग, यक्ष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, पिशाच, प्रेत, कूष्माण्डक, ककाल, दौर्किर, वेताल, पितृ, ऋषि, गुरु, सिद्ध और वृद्ध ।
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४४८ चरकसंहिता [ अ ० ह एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २४ ॥
नष्टनिद्रमन्न - पान - पिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र- शोणित - मांस- रक माल्याभिलाषिणं सन्तर्जक च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥
- ( ६ ) राक्षसोन्माद — रात का नीद न आये, रोगी रात को बिचरे, खान-पान से परखे विना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल माला की चाह करे ओर दूसरे का डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस-ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥
ग्रहास - नृत्य - प्रधानं देव विप्र - वेद्य - द्वेपावज्ञाभिः स्तुति -२ वेद - मन्त्र - शा-मोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्त विद्यात् ॥ २६ ॥
( ७ ) ब्रह्मराक्षस - हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मंत्र, धर्मशास्त्र इनके अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर का आघात पहुचावे, ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस में उन्मत समझे ॥ २६ ॥
अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य गीत - हासिनं बद्धाषद्धप्रलापिनं अ संकर - कूट - मलिन - रथ्याचेल - सृणाश्म - काष्ठाधिरोहणरति ४ संभिन्न रूक्ष-वर्ण - स्वरं नग्नं विधावन्तं नेकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृति च पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥
( ८ ) पिशाचोन्माद - अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और असम्बद्ध बातचीत करे, सकर ( झाड़ू से एकत्र किये धूल तिनके आदि ), कूट ( मिट्टी का ढेर ), मैले रास्ते, भलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने की प्रवृत्ति हो, जिसके वण मिलेजुले हा, पर रूखा ओर एक समान न रहता हो ( बदलता रहे ), नगा रहे, इधर - उवर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को पिशाचग्रह से उन्मत्त सनज्ञे ॥ २७ ॥
तत्र शौचाचारं तपःस्वा ० यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो-दश्या च देवाः, स्नान - शुचि - विविक्त सेविन धर्म - शास्त्र- श्रुति - काव्य- कुशलं प्रायः षष्टिनवम्योपयः, मातृ - पितृगुरु वृद्ध - सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममावस्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति गीत - -वादित्र - रति पर-१ ' प्रहासानृतवादिन ' इति । २ ' वज्ञाभिष्टुति- ' इति । ३. ' बद्धप्रभाषिण ' इति च । ४. ' तृणेषु आरोहण - ' इति च पाठः ।
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अ ० है ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६ दार - गंध - माल्य - प्रियं जो चाचारं द्वादश्या चतुर्दश्या च, सत्त्व - बल - रूप-गव शौर्य- - युक्त माल्यानुलेपनं हास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां सप्तम्या च यक्षाः, स्वाध्याय - तपो - नियमोपवासन्त्रतचर्या - देव - यति - गुरु - पू-जारति नष्टशौचं ब्रह्मवादिनं शूरमानिन देवतागार - सलिल - क्रीडनरति प्रायः शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षः पिशाचास्तु होन सत्त्व-पिशुन - ण - लुब्धं प्रायो द्वितीया तृतीयाष्टमीषु पुरुषं छिद्रमवेक्ष्याभिधर्ष-यन्ति १ । इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्या-ख्याताः ॥ २८ ॥
आगमन काल-- - इनमे शौच ( शुचि, पवित्र ) आचार वाले, तप और वेदाध्ययन मे पण्डित पुरुष के छिद्र ( त्रुटि अवकाश ) को ढूढकर प्रायः शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा या त्रयादशी के दिन उसको देवग्रह आक्रान्त करते हैं । ऋषि-ग्रह — स्नान, पवित्र द्रव्य, एकान्तस्थान सेवी, धर्मशास्त्र, वेद मे कुशल व्यक्ति को प्राय करके छठी या नवी तिथि के दिन आक्रान्त करते है । पितृग्रह -- प्रायः माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य की सेवा करने वाले में त्रुटि देखकर दशमी या अमावस्या तिथि मे आक्रमण करते है । गन्धर्वग्रह — स्तुति, गाने - बजाने मे रत, परस्त्री, गन्ध और माला के प्रिय, पवित्र आश्चार वाले व्यक्ति मे छिद्र देखकर प्राय बारहवी या चौदहवी तिथि मे आक्रमण करते है । यक्षग्रह —सत्त्व, बल, रूप, अहकार, शौर्य से युक्त माला, अगराग और हास्य के प्रिय, अतिवाक्पटु व्यक्ति मे छिद्र पाकर प्राय: करके शुक्लपक्ष को एकादशी या सप्तमी मे आक्रमण करते है । ब्रह्मराक्षस - स्वाध्याय, तप, नियम उपवास, ब्रह्मचर्य, देवता, सन्यासी और गुरुओ की पूजा न करने वाले, भ्रष्टा-चार, अपवित्र, अपने को ब्राह्मण और अब्राह्मण कहने वाले अर्थात् अब्राह्मण होने पर ब्राह्मण और ब्राह्मण होने पर अब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर गिनने वाले, मन्दिर और पानी मे क्रीडा करने वाले मे छिद्र देखकर पञ्चमी या पौर्णमासी के दिन आक्रमण करते है । राक्षस और पिशाच- - प्रायः दुर्बल, छली स्वभाववाले, चोर, लोभी, धूर्त्त पुरुष मे छिद्र पाकर द्वितीया, तृतीया और अष्टमी के दिन आक्रमण करते है । [ सुश्रुत में कहा है— देवग्रह पौर्णमासी मे, असुर सभ्याकालो मे, गन्धर्व प्राय अष्टमी मे यक्ष प्रतिप्रदा मे, पितृ - जन कृष्णपक्ष में, सर्प पञ्चमी में, राक्षस रात्रि मे और पिशाच चतुर्दशी मे आक्रमण करते हैं । ] २ प्रतिवाक्य ' धर्षयन्ति ' इति क्रियापद च पठ्यते क्वचित् ।
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चरकसंहिता [ अ ० ह ग्रह असख्य हैं, उनमे ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य है, इसलिये इन्ही आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥
सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसरम्भान्निःसंज्ञमन्येष्वा-पासाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढप्रवृत्तरतः क्षतजिह्नः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विकू -जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् || २ || इन सब भूतोन्मादो मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊ चा उठा कर बिना किसी शका या सकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस रोगी की आखो से आसू बहे, लिग इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये, नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसाथ उन्माद रोगी ( पागल ) समझे, वह रोगी असाव्य है । [ चरकोपस्कार मे साध्य - अमान्य के विषय मे लिखा है कि — इन सब भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है । ] ॥ २६ ॥
रत्यचनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद-पहार बलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो, उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि ( घृतपान आदि ) द्वारा चिकित्सा करे ॥ ३० ॥
तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां भेषज विधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥
इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और वस्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥
उन्मादे वातजे पूर्व स्नेहपानं विशेषवित् ।
कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥
कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् ।
स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥
वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की
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अ ० [ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१ www vv VV WW ww उत्पन्नावस्था घृत का पान करावे | क्योकि कफ पित्त द्वारा मार्ग के अवरुद्ध होने से प्रथम वमन, विरेचन रूपी शोधन करना उचित है । शोधन स्नेहयुक्त और मृदु हो इससे वायु का प्रकोप नही होता । कफ और पित्त से उत्पन्न उन्मादो मे भी रोगी का स्नेहन और स्वेदन करके वमन और विरेचन देना उचित है । रोगी के शुद्ध होने पर पेया विलेपी रूप से अन्न सेवन का क्रम चालू करे ॥ ३२–३३ ॥
निरूहान् स्नेहबस्तीच ' शिरस विरेचनम् ।
ततः कुर्याद्यथादोषं तेषा भूयस्त्वमाचरेत् ॥ ३४ ॥
हृदिन्द्रियशिरः कोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः ।
मनःप्रसादमाशोति स्मृति सज्ञा च विन्दति ॥। ३५ ॥
पीछे से निरूह ( आस्थापन ), स्नेह बस्ति ( अनुवासन ), शिरोविरेचन करावे । दोष के अधिक होने पर दोषानुसार बार बारव मन, विरेचन करावे । वमन आदि कार्यों से हृदय ( छाती ), चक्षु आदि इन्द्रियो के शिर, कोष्ठ ( आमाशय - पक्वाशय ) के शुद्ध होने पर रोगी का मन प्रसन्न हो जाता है, वह स्मृति और संज्ञा ( ज्ञान ) को प्राप्त करता है ॥ ३४–३५ ॥
शुद्धस्याऽऽचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम् ।
ताडनं च मनोबुद्धिदेह संतर्जनं हितम् ॥ ३६ ॥
शोधन करने पर भी यदि रोगी मे आचार की अपवित्रता हो तो तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण अजन, दण्ड आदि से पीटना, मन, बुद्धि और शरीर को उद्विभ करने वाले कार्य करने हितकारी हैं ॥ ३६ ॥
यः शक्तो विनयेत्पट्टेः संयम्य सुदृढैः सुखैः ।
अपेतलोष्ठकाष्ठाद्यैः संरोध्यश्च तमोगृहे ॥ ३७ ॥
तर्जनं त्रासनं दानं सान्त्वनं हर्षणं भयम् ।
विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृति मनः ३८ ॥
जो उन्माद रोगी नम्रता से वश मे आ सके उसको सुदृढ और सुखकारक जिनसे उसे देह मे पीड़ा या व्रण न हो ऐसे वस्त्रों से बाध कर अन्धकारयुक्त घर मे बन्द कर दे । घर मे से ढेले, लकड़ी आदि सब हटा देवे जिससे ये न चुभे न किसी प्रकार की चोट लगे । तर्जन ( डाट डपट ), करना, दान, हर्षोत्पादन, आश्वासन, भयदिखाना, विस्मय ( चकित करना ), आदि क्रियाओं से विस्मृत हुआ मन ( विमूढ चित्त ) पुनः प्रकृति में आ जाता है ॥ ३७-३८ ॥ १. ' निरूहणस्नेहबस्ती ' इति वा ।
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४५२ चरकसंहिता [ अ ० ह WAV
प्रदेहोत्सादनाभ्यङ्गधूमाः पानं च सर्पिषः ।
प्रयोक्तव्यं मनोबुद्धिस्मृतिसंज्ञाप्रबोधनम् ॥ ३६ ॥
प्रदेह, उत्सादन ( उबटन ), अभ्यग ( तैल मर्दन ), धूम और घृतपान ये सब वस्तुए मन, बुद्धि, स्मृति और सज्ञा को प्रबुद्ध करती है, इनका प्रयोग करना उचित है ॥ ३६ ॥
सर्पिः पानादिरागन्तोर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः । आगन्तुज उन्माद मे रति तथा अर्चना की कामना से उत्पन्न उन्मादो मे घृतपान आदि भेषजविधि तथा ओषधि, मणि, मंगल, बलि आदि मंत्र विधि का प्रयोग करे | अतः सिद्धतमान्योगाञ्छृणन्मादविनाशनान् ॥ ४० ॥
हिङ्गुसोवर्चलव्योषद्विपलाशैर्धृताढकम् ।
चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम् ॥। ४१ ॥
अब विस्तार से अति सिद्ध ( परीक्षित ) फलप्रद उन्मादनाशक योगों को सुनो-( १ ) हीग, सौवर्चल ( सचल ), व्योष ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), इनमे प्रत्यक दो पल परिमित लेकर इनके कल्क से, घी एक आढक और गाय का मूत्र चार आढ़क लेकर घृतपाक करे, यह घृत उन्माद का नाशक है ॥ ४०-४१ ॥
विशाला त्रिफला कौन्ती देवदावेलवालुकम् ।
स्थिराऽनन्ता रजन्यौ द्वे शारिवे द्व प्रियकम् ॥ ४२ ॥
नीलोत्पललामञ्जिष्ठादन्तीदाडिमकेशरम् ।
तालीशपत्र बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥
विडङ्गं पृश्निपणी च कुछ चन्दनपद्मौ ।
कल्कैः कर्षसमैरेतैविशत्यष्टाभिरेव च ॥ ४४
चतुर्गुणे जले सम्यकू ' घृतप्रस्थ विपाचयेत् अपस्मारे ज्वरे कासे वासे मन्देऽनले क्षये २
वातरक्ते ' प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थ के ।
छर्योमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ४६ ॥
कण्डू - पाण्डवामयोन्माद - विष - मेह -गदेषु च ।
भूतोपहतचित्ताना गद्गदानामरेतसाम् ४ ॥
१. ' पक्वा ' इति । २ ' मन्देऽनलक्षये ' इति ३ ' वातरोगे ' इति । ४ ' मचेतसाम् ' इति च ४३ ॥ ॥॥ ॥ ४५ ॥
४७ ॥ । पाठः ।
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ४५३ I
शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम् ।
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम् ॥ ४८ ॥
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इति कल्याणकं घृतम् । ( २ ) कल्याणक घृत - विशाला ( गवाक्षी ), त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, ऑवला ), कौन्ती ( रेणुका और ' कान्ता ' पाठ मे --मोटी इलायची ), देवदारु, एलवालुक ( एलुआ ), स्थिरा ( शालपर्णी ), नत ( तगर ), हल्दी, दारु - हल्दी, अनन्तमूल, कृष्णसारिवा, फूल प्रियगु, नीला कमल, छोटी इलायची, मजीठ, दन्तीमूल, अनार, नागकेसर, तालीशपत्र, बडी कटेरी, मालती ( चमेली के नये फूल ), वायबिडंग, पृश्निपर्णी, कूठ, लाल चन्दन, पद्माख इन अठ्ठाईस ओषधियां प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क द्वारा, घी एक पस्थ, पानी चार प्रस्थ लेकर घृत पाक करे " । यह कल्याणक नाम का घृत अपम्मार, ज्वर, कास, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तृतीयक, चतुर्थक ज्वर, छर्दि, अर्थ, मूत्रकृच्छ्र, वीसर्प, कण्डू, पाण्डु - रोग, उन्माद, विष और प्रमेह रोगो मे हितकारी है, भूतो से आक्रान्त चित्त वाले अव्यक्त वाणी वाले, अल्प शुक्र पुरुषो और वन्ध्या स्त्रियो के लिये प्रशस्त है । यह कल्याणक घृत धन के लिये हितकारी, कल्याणकारी, आयुप्रद, बलप्रद तथा सब प्रकार के का नाशक है ॥ ४२-४८ || एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ॥
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गृष्टिक्षीरे चतुर्गुणे ।
वीरा- द्विमाप- काकोली- स्वयंगुप्तर्षभकर्द्धिभिः ॥
मेदया च समैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणक महत् बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ५१ ॥
इति महाकल्याणक घृतम् । ग्रहो से उत्पन्न रोगो ४६ ॥ ५० ॥ । ( ३ ) महाकल्याणक घृत- इन विशाला आदि अट्ठाईस वस्तुओ आर स्थिरा आदि इक्कीस द्रव्यो से क्वाथ विधि से क्वाथ करे । इसमे पहिली बार ब्याई ( खारके की ) गाय का दूध, घी से चतुर्गुण मिलावे । फिर वीरा ( पृश्नि-पर्णी या शतावरी ), द्विमात्र ( मूगपर्णी और मात्रपर्णी ), काकोली, कौच, १. चरकोपस्कार मे— ' कान्ता ' पाठ है । अष्टाग संग्रह मे भी — बड़ी इलायची का ग्रहण है जैसे- ' बरा विशाला भद्रेला देवदावैलवालुकैरिति । ' कौन्ती ' पाठ निर्णयसागर की प्रति मे है ।
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४५४ चरकसंहिता wwwwwwww ऋषभ और ऋद्धि तथा मेदा इनको परस्पर सम भाग लेकर घृतपाक करे, यह महाकल्याणक घृत है ॥ ४६-५१ ॥
जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचाम् ।
त्रायमाणां जया वीरा चोरकं कटुरोहिणीम् ॥ ५२
कायस्था शूकरी छत्रामतिच्छत्रा पलङ्कषाम् ।
महापुरुषदन्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ५३ ॥
कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चाऽऽहृत्य तैर्धृतम् ।
सिद्धं चतुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ५४ ॥
महापैशाचिक नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ।
बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालाना चाह्नवर्धनम् ॥ ५५ ॥
इति महापैशाचिकं घृतम् । ( ४ ) महापैशाचिक घृत —-- जटिला ( जटामासी ), पूतना ( ( भूतकेशी ), चारटी ( पद्मचारिणी अथवा ब्रह्मयष्टि ), कर्कटी ( [ अ ० ह इनके कल्क से ॥ हरड ), केशी कौच ), वच, त्रायमाणा, जया ( अरणि ), वीरा ( पृश्निपर्णी या काकोली ), चोरक ( सुगन्धित द्रव्य, इसे भूटानी लोग बेचते है ) कुटकी, कायस्था ( सुरसा वा क्षीरकाकोली ), शूकरी ( वाराही कन्द या विधारा ), छत्रा ( धनिया ), अतिच्छत्रा ( सौफ ), पलकषा ( लाख या गुग्गुल ), महापुरुपदन्ता ( शतावरी ), वय स्था ( आवला ), नाकुली द्वय ( दोनो रास्ता अथवा सपाक्षी और सर्पगन्धा ), कटम्भरा ( कटभी ), वृश्चिकाली ( बिच्छू बूटी ), स्थिरा ( शालपर्णी ), इन को लाकर इनके क्वाथ और कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत चतुर्थक ज्वर उन्माद, ग्रह, अपस्मार को नष्ट करता है । यह महापैशाचिक नामक घृत अमृत के समान बुद्धि, स्मृति-कारक, तथा नालको के अगो को बढाने वाला है ॥ ५२-५५ ॥
लशुनाना शतं त्रिशदभया त्र्यूषणात्पलम् ।
गवा चर्ममसीप्रस्थमाढकं क्षीरमूत्रयोः ॥ ५६ ॥
पुराणसर्पिषः प्रस्थमेभिः सिद्धं प्रयोजयेत् ।
हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम् ॥ ५७ ॥
तद्दोषागन्तुसम्भूतानुन्मादान्विषमज्वरान् ।
अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः ॥ ५८ ॥
इति लशुनाद्यं घृतम् । ( ५ ) लशुनाद्य घृत -- लहसुन एक सौ, हरड़ तीस, मिलित सोठ, मरिच, पिप्पली एक पल, गाय का चमड़ा जलाकर तैयार की राख एक प्रस्थ, गाय
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अ ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ४५५ का दूध एक आढ़क, गाय का मूत्र एक आढक, पुरातन ( दस साल पुराना ) घृत एक प्रस्थ, इन सब से यथाविविघृत पाक करे । सिद्ध होने पर छान कर ठण्डा होने पर इसमे हीग का चूर्ण एक पल और शहद दो कुडव मिला देवे । यह घृत पान, अभ्यग, नस्य मे प्रयोग करने से दोषजन्य, आगन्तुज उन्माद रोग, विषमज्वर और अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ ५६-५८ ॥
लशुनस्याविनष्टस्य तुलार्ध निस्तुषीकृतम् ।
तद्र्व दशमूलस्य द्वयाढकेऽपा विपाचयेत् ॥ ५६ ॥
पादशेषे घृतप्रस्थ लशुनस्य रसं तथा ।
कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गाकै रसः ॥ ६० ॥
दाडिमाम्लसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदधिकैः ।
साधयेत् त्रिफलादारुलवणव्योषदीयकैः ॥ ६१
यवानीचव्यहिग्वम्लवेतसँश्च पलाधिकैः ।
सिद्धमेतत्पिबेच्छूल गुल्माशोजठरापहम् ॥ ६२ ॥
ब्रह्मपाण्ड्वामय प्लीहयोनिदोषज्वरकुमीन् ।
वातश्लेष्मामयान्सर्वानुन्माद चापकर्पति ॥ ६३
॥
॥
इति द्वितीय लशुनाद्य घृतम् । ( ६ ) लशुनाद्य घृत ( २ ) - रस, गन्ध आदि से युक्त लहसुन को छिलके रहित करके उसकी गिरी ५० पल, मिलित दशमूल २५ पल, इनको दो आढक जल मे पकावे । जब चौथाई रह जाये तो वस्त्र में छान ले । फिर पुरातन घृत एक प्रस्थ, लशुन का रस १ प्रस्थ, बेर मूली, वृक्षाम्ल ( समाक दान ), बिजौरा, अदरक, अनार का रस, सुरा, मस्तु, काजी ये प्रत्येक आधा प्रस्थ, त्रिफला, देवदारु, सैन्धानमक, त्रिकटु, अजमोदा, दीप्यक ( जीरा ), चव्य, हीग, अम्ल-वेत प्रत्येक आवा पल, लेकर घृत सिद्ध करे । यह सिद्ध हुआ घृत शूल, गुल्म, अर्श, उदर रोग, ब्रन्न, पाण्डु रोग, प्लीहा, योनि दोष, ज्वर, कृमि और वात - कफ रोगो और उन्माद को नष्ट करता है ॥ ५६-६३ ॥
हिङ्गुना हिङ्गुपर्ण्या च सकायस्थावयस्थया ।
सिद्धं सर्पिर्हित तद्वद्वयःस्थाहिङ्गुचौरकैः ॥ ६४ ॥
केवलं सिद्धमेभिर्वा पुराण पाययेद् घृतम् ।
पाययित्वोत्तमा यात्रा श्वभ्रे रुन्ध्याद् गृहेऽपि वा ॥ ६५ ॥
विशेषतः पुराणं च घृतं त पाययेद्भिषक् । ata, हिंगुपर्णी ( वेणुपत्री या डीकामारी ), कायस्था ( हरड़ ), वयस्था ( आवला ), इनके कल्क से सिद्ध घृत अथवा वयस्था ( आवला ), हीग, चोरक
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४५६ चरकसंहिता [ अ ० ह ( सुगन्धित द्रव्य ) इनसे सिद्ध घृत उन्माद रोग मे हितकारी है, ये दो योग हैं । अथवा हीग, सौवर्चल, त्रिकटु द्वारा पुरातन घृत को सिद्ध करके पिलावे उन्माद रोगी को घी की उत्तम मात्रा ( जो कि २४ घण्टे अर्थात् दिन - रात मे जीर्ण हो ) पिला कर पानी रहित गढे या घर मे बन्द कर देवे? ॥ ६४-६५ ॥ उग्रगन्धं पुराणं म्याहशवर्षस्थितं घनम् ॥ ६६ ॥
लाक्षारसनिभं शीत तद्धि सर्वप्रहापहम् ।
मेध्यं विरेचनेष्वयं प्रपुराणमतः परम् ॥ ६७ ॥
त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद् ग्रहमोक्षणम् ।
गुणकर्माधिकं स्थानादास्वादात्कटुतिक्तकम् ॥ ६८ ॥
नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत्स्याद्वर्षशतस्थितम् २ ।
दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्व ग्रहापहम् ।
अपस्मार होन्मादवतां शरतं विशेषतः ॥ ६६ ॥
( ७ ) पुरातन घृत — जो घी दस साल पुराना हो जाये, जिसमे कि तीव्र गन्ध आने लगे, जिसका रंग लाख के समान लाल हो जाये, वह शीतवीर्य होता है, उसका नाम पुराना घृत है । दस वर्ष के पीछे घृत अति पुरातन हो जाता है इसको ' प्र - पुराण ' कहते हैं । वह त्रिदोषनाशक पवित्र होने से खासकर ग्रह रोगो को नष्ट करता है, पीने से अधिक गुणशाली है, स्वाद मे कटुतिक्त रस है, कान, आख के रोगो को नष्ट करता, विषनाशक और पवित्र करने वाला है । और बारह साल पुराने घृत से कोई भी रोग असाध्य नही है । इसके देखने, छूने ओर सूघने से वीसर्प और ग्रह- रोग नष्ट होते है । वह अपस्मार, विष, उन्माद और वायु रोगों में अमृत के समान प्रशस्त है ॥ ६६–६६ ॥
तैरौषध aa विधेयत्वं न गच्छति ।
अञ्जनोत्सादनालेपान्नावनादींश्च योजयेत् ॥ ७० ॥
शिरीषो मधुकं हिङ्ग लशुनं तगरं वचा ।
कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम् ॥ ७१ ॥
इति नस्याञ्जनम् । १ उत्तम मात्रा का लक्षण - दिन रात्रि भर मे विना दोष उत्पन्न किये जो जीर्ण हो सके वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद ग्रह, अपस्मार को नाश करती है । एक दिन रात मे जीर्ण होने वाली स्नेह की उत्तमा मात्रा, पूरे दिन मे जीर्ण होने वाली मध्यमा और आधे दिन मे जीर्ण होनेवाली ह्रस्वमात्रा कहाती है । २. ‘ यत्स्याद् द्वादशवार्षिकम् ' इति च पाठः ।