श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 441–450

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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अ ० है ] चिकित्सितस्थानम् ४५७

तद्वद् व्योषं हरिद्वे द्वे मञ्जिष्ठाहिडुसर्षपाः ।

शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ७२ ॥

इति नस्यमञ्जनम् । ( ८ ) यदि उन्माद रोगी उपरोक्त ओषधि समूहों से वश मे न आवे, वह कहा न माने, तब ( १ ) हिंगु, कल्याणक आदि घृतो मे वर्णित ओषधियों से अजन, उत्सादन ( उबटन ), आलेप और नस्य करे । ( २ ) शिरीष के बीज, मुलहठी, हीग, लहसुन, तगर, वच, कूठ, इन सब को बकरी के मूत्र मे पीस कर इसका नस्य और अजन दे । ( ३ ) इसी प्रकार से व्योष ( त्रिकटु, सोंठ, मरिच, पिप्पली ), हल्दी, दारु - हल्दी, मजीठ, हीग, सरसो, सिरस के बीज इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर नस्य और अजन करे यह उन्माद, ग्रह और अपस्मार रोगो को नष्ट करता है ॥ ७०-७२ ॥

पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गहिङ्गुनी ' हिपत्रिकाम् ।

वत्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्या गोशृगालयोः ॥ ७३ ॥

तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान् ।

भूतार्तानमरातश्च नरातश्चैव गोमये ॥ ७४ ॥

मरिचं चाऽऽतपे मास सपित्त स्थितमञ्जनम् ।

वैकृतं पश्यतः कार्य दोषभूतहतस्मृतेः ॥ ७५ ॥

इत्यञ्जनम् । ( ४ ) अपामार्ग ( चिरचिटा ) के बीज, हीग ओर हीगुपत्र प्रत्येक एक एक भाग, काली मिर्च आधा भाग, इनको गाय और गीदड के पित्त के साथ पीस कर वर्त्ती बनावे | इस वत्ती को अपस्मार, उन्माद तथा ज्वर रोगी, भूत और देवताओ से पीडित व्यक्तियो मे तथा नेत्र रोगो मे प्रयोग करे । ( ५ ) वात आदि दोष के कारण से अथवा भूतो के कारण से यदि दृष्टि विकृत हो गई हो तो काली मिरच को गाय और शृगाल के पित्त में एक मास धूप मे रखे, फिर इसका अजन करे ॥ ७३-७५ ॥

सिद्धार्थको बचा हिङ्गकरओ देवदारु च ।

मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक कटुत्रिकम् ॥

समांशानि प्रियंगु शिरीषो रजनीद्वयम् ।

बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम् ॥ ७७ ॥

नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा । १. ‘ अपामार्ग हिड्डुल ' इति वा पाठः । तक व्याप्त करके ७६ ॥

पृष्ठ 442

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४५८ चरकसंहिता [ अ ० ह wwwwnn अपस्मार - विषोन्माद - कृत्यालक्ष्मीज्वरापहः ॥ ७८ ॥

भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते । ( ६ ) सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), वच, हींग, करञ्ज, देवदारु, मजीठ, त्रिफला, श्वेता ( श्वेत अपराजिता ), कटभी ( वापुभा ), त्वक् ( दालचीनी ), त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), प्रियङ्गु, शिरीष के बीज, हल्दी, दारूहल्दी इन सबका समान भाग लेकर बकरी के मूत्र में पीस ले । यह अगद पान, नस्य, आलेपन, अजन, उद्वत्तन ओर स्नान में प्रयोग करने पर अपस्मार, विष, उन्माद, कृत्या ( मारण क्रिया ), अलक्ष्मा और ज्वर को नष्ट करता है । इस अगद के पानादि से भूतों से भय नही रहता । राजसभा में सफलता मिलता है || ७६-७८ ॥ सपिरेतेन सिद्ध वा सगोमूत्रं तदर्थकृत् ॥ ७६ ॥

प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्ति कृता पिबेत् ।

वैरेचनिकधूमोक्तः श्वेताद्येर्वा सहिगुभिः ॥ ८० ॥

( १० ) सिद्धार्थक आदि वस्तुओ द्वारा गोमूत्र मे सिद्ध किया घृत भी यही फल देता है, मुख से पानो बहने पर, पीनस मे, उन्माद मे गन्ध - वस्तुओं ( दाह ज्वर चिकित्सा मे कथित अगरु आदि वस्तुओ ) से बनी धूमवर्त्ति तथा सूत्र-स्थान मे काथेत श्वेता, ज्यातिष्मती आदि वैरेचनिक वस्तुओ को हीग के साथ धूमवर्त्ती करके प्रायोगिक धूम विधि से पीवे ॥ ७६–८० ॥

शल्लकालूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजेंः ।

मूत्र - पित्तःशकृल्लोम - नखेश्वमभिरेव च ॥ ८१ ॥

सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत् । वातश्लेष्मात्मके प्राय: -( ११ ) शल्लक ( शजार ), उल्लू, बिल्ली, गीदड, भेडिया, बकरा इन पशुओ के मूत्र, पित्त, शकृत् ( मल ), लोम, नख, चमटे से परिषेक, अजन, प्रधमन ( विरेचन चूर्ण रूप नस्य ), नस्य, धूम, वातजन्य और कफजन्य उन्माद मे प्रायः करके करना चाहिये ॥ ८१ ॥

पैत्तिके च प्रशस्यते ॥ ८२ ॥

तिक्तकं जीवनीय च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः ।

शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च ॥ ८३ ॥

१ वैरेचनिक धूम - ' श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालमन शिला ।

गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमो मूर्धविरेचने ' ॥

पृष्ठ 443

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अ ० [ ] चिकित्सितस्थानम् ४५ ह ww ~ ( १२ ) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओं से तथा जीवनीय गण की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह ( यमक ) का प्रयोग करे 1 । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान - पान देने चाहिये ॥ ८२-८३ ॥

शो केशान्तसन्धौ वा मोक्षये जो भिषक् सिराम् ।

उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥

( १३ ) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य का चाहिये कि उन्माद, अपस्मार आर विषम ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य में ओर केशो के अन्तिम भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेवन करे ५ ॥ ८४ ॥

घृतमासवितृप्त वा निवाते स्थापयेत्सुखम् ।

त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥

( १४ ) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृत कराके सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा ( चेतना ) को प्राप्त कर लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हो जाता है ॥ ८५ ॥

आश्वासयेत्सुहृद्वात वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।

ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥

( १५ ) मित्र लोग धर्म, अथयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के नाय को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥

बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्वोत्तानमातपे ।

कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलेः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥

कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्ध विजने गृहे ।

रुन्ध्याचेो हि विभ्रान्त व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥

( १६ ) शरीर पर सरसो का तेल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लाहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श करे । कशा ( कोडो ) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार करने से रागी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७ ८८ ॥

सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिहैर्गजैश्च तम् ।

त्रासयेच्छत्रहस्तैर्वा तस्करः शत्रुभिस्तथा ॥ ८६ ॥

अथवा राजपुरुषा बहित्वा सुसंयतम् ।

त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ६० ॥

१ सुश्रुते - गखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।

पृष्ठ 444

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४६० चरकसंहिता [ अ ० ह 5

देवदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत् ।

तेन याति शमं तस्य सर्वता विप्लुतं मनः ॥ ६१ ॥

( १७ ) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त ( पले हुए, नम्र ) सिंह और हाथी अथवा हाथ से शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे । अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वव की आज्ञा दी है । क्योकि कादि के ताडन रूपी शरीर - क्लेश से प्राणो का नय कही अधिक होता है, इस कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है ॥ ८६-६१ ॥

इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते ।

तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ६२ ॥

काम शोक

- - भय - क्रोध- हर्षेर्ष्या - लोभ - सभवान् ।

परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत् ॥ ३ ॥

इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे । काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है । कामजन्य उन्माद क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध और काम से, शान्त हो जाते है ॥ ६२६३ ॥

बुद्धवा देशं वयःसात्म्य दोपं कालं बलाबले ।

चिकित्सितमिद कुर्यादुन्माद भूतदोषजे ॥ ६४ ॥

देवर्षिपितृगन्धबैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान् ।

वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च ॥ ६५ ॥

सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत् ।

पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधीस्तथा ॥ ६६ ॥

शान्तिकर्मेष्टिहोमाञ्च जपस्वस्त्ययनानि च ।

वेदोक्तान् नियमाश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ६७ ॥

दोषजन्य ( निज ) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष, काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे । बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद रोगी मे तीक्ष्ण अजन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे । इनकेलिये घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे ।

१ सुश्रुत में भी कहा है - न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे ।

त्र ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥

पृष्ठ 445

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अ ० [ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१ www V देवव्यपाश्रय चिकित्सा - पूजा, बलि कर्म, उपहार कर्म, मत्र, अजनविधि, शान्ति कर्म, यज्ञ, होम, जप, मगलकर्म, वेदोक्त नियम, सेवन करे || ६४-६७ ॥ भूतानामधिप देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् । पूजयन् प्रयतो नित्य जयत्युन्मादजं भयम् रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये । तेपा पूजा च कुर्वाण उन्मादेभ्यो विमुच्यते

बलिभिर्म हो मेरोषध्यगदधारणैः ।

सत्याचारतपोज्ञानप्रजाननियमत्रतैः ॥ १००

देवगुह्यकविप्राणा गुरुणा पूजनेन च । आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा नित्य प्रति भूतो ( प्रणियो ) के अधिपति, जगत् के प्रायश्चित्त आदि ॥ ६८ ॥

॥ ६६ ॥

॥ ॥ १०१ ॥

ईश्वर - महेश्वर का पूजन करने से उन्माद का भय नही रहता । रुद्र के ' म ' नामक जो गण लोक मे विचरते है, उनकी प्रतिदिन पूजा करने से आगन्तुज उन्माद से मनुष्य मुक्त हो जाता है । बलि कर्म से, भागलिक कायो से, होम से, ओषधियों और अगदी के धारण करने से, सत्य आचार से, तप से, ज्ञान से, दान से, नियम, व्रत के पालन से, देवता, गाय, ( ' गुह्यक ', पाठ हो तो यक्ष ), ब्राह्मण, गुरु - जनो के पूजन से, सिद्ध फलदायक मन्त्र तथा ओषधिया से आगन्तुज उन्माद शान्त होता है ॥ ६८-१०१ ॥

यच्चोपदेक्ष्यते किचिदपस्मारचिकित्सिते ।

उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदृष्ययोः ॥। १०२ ॥

निवृत्ताभिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः ।

निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥१०३ ॥

उन्माद और अपस्मार रोग मे हेतु और दूष्य की समानता है । इसलिये अपस्मार चिकित्सा मे जो कुछ विशेष कहेंगे वह सब इस उन्माद मे भी बर-तना चाहिये । मास और मद्य के सेवन से पृथक्, पथ्यभोजो, अन्दर और बाहर से पवित्र तथा सत्त्वगुण से युक्त और जो जितेन्द्रिय व्यक्ति हाता है, वह निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो से मुक्त रहता है ॥ १०२-१०३ ॥

प्रसादश्चेन्द्रियार्थाना बुद्धधात्ममनसा तथा ।

धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ १०४ ॥

उन्माद से छूटने के लक्षण – इन्द्रियों तथा इनके विषयो मे निर्मलता, बुद्धि, आत्मा और मन की प्रसन्नता, बात आदि धातुओ का अपनी स्वाभाविक

पृष्ठ 446

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४६२ चरकसंहिता [ अ ० १० AM ^^^ स्थिति मे आ जाना, ये उन्माद से मुक्त ( प्राय सब रोगो से मुक्त ) व्यक्ति के लक्षण हैं ॥ १०४ ॥

तत्र श्लोकः - उन्मादाना समुत्थाना लक्षणं सचिकित्सितम् ।

निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिपगुत्तमः ॥। १०५ ॥

उपसहार — निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा को वैद्यो मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने इस अध्याय में कह दिया ॥ १०५ ॥

इत्यमिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रति सस्कृते चिकित्सास्थाने उन्मादचिकित्सितनाम नवमाऽध्यायः ॥ ६ ॥

दशमोऽध्यायः ।

अथातोऽपस्मारचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे अपस्मार - रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥

स्मृतेरपगमं प्राहरपस्मारं भिषग्विदः ।

तमःप्रवेशं बीभत्सचेष्टं धीसत्त्वसंलवात् ॥ ३ ॥

वैद्यों मे ज्ञानी अथवा भेषज को जानने वाले विद्वान् स्मृति के नष्ट होने को ही अपस्मार कहते है ' । इसमे बुद्धि और सत्त्व ( मन ) के विभ्रश होने से अन्धकार मे घुसने के समान प्रतीति अर्थात् ज्ञान का अभाव या मोह और शरीर की चेष्टाये बीभत्स हो जाती हैं ॥ ३ ॥

विभ्रान्तबहुदोषाणामहिताशुचिभोजिनाम् ।

रजस्तमोभ्या विहते सत्त्वे दोषावृते हृदि ॥ ४ ॥

चिन्ताकामभयक्रोधशोकोद्वेगादिभिस्तथा ।

मनस्यभिहते नृणामपस्मारः प्रवर्त्तते ॥ ५ ॥

१ सुश्रुत में अपस्मार -सज्ञा की व्याख्या इस प्रकार की है

स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने ।

अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽय व्याधिग्न्तकृत् ॥ सुश्रुते ॥

। अपगतः स्मारः स्मरण! अनुभूतार्थविज्ञानं यस्मिन् रोगे सोऽपस्मार । जिस रोग मे स्मृति अर्थात् अनुभूत पदार्थ का ज्ञान नष्ट हो जाता है वह ' अपस्मार कहाता है । यह रोग रोगी का मृत्युकारक होता है ।

पृष्ठ 447

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अ ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६३ निदानपूर्वक सम्प्राप्ति – अपथ्यसेवी और अपवित्र भोजन करने वालो मे तथा जिन पुरुषो मे शरीर दोष अस्थिर तथा बहुत होते है, उनमे सत्त्वगुण वाले मन मे रज और तम के बढ़ने से तथा चिन्ता, काम, मय, क्रोध, शोक, उद्वेग आदि मानसिक विकारो से मन पर आघात होने पर ( इन मानसिक कारणो से रज और तम बढते है ) और चेतना स्थान हृदय के शारीरिक वातादि दोषो से व्याप्त हो जाने पर अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ४-५ ॥

धमनीभिः श्रिता ' दोपाहृदय पीडयन्ति हि ।

सपीड्यमानो व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥ ६ ॥

जिस समय आश्रित ( वात आदि शारीरिक ) दोष वेग को उत्पन्न करके हृदयमूल वाली धमनियो द्वारा हृदय मे पहुच जाते है, उस समय चेतना - स्थान हृदय के पीडित होने से पुरुष भ्रान्तचित्त और मोह को प्राप्त होकर दुखी होता है || ६ ||

पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि ।

जिह्माक्षिभ्रूः स्रवल्लालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन् ॥ ७ ॥

दोषवेगे च विगते सुप्तवत्प्रतिबुद्धयते । सामान्य लक्षण – अपस्मार रोगी असत् ( अविद्यमान ) रूपो को भी देखत है, भूमि पर गिरता है, कापता है । आख और भौहे टेढी ( कुटिल ) हो जाती है, मुख से लार बहती है, हाथ और पाव को इधर - उधर फेकता है, इस प्रकार से बीभत्स चेष्टा करता है । दोष के वेग के शान्त होने पर रोगी सो कर उठने के समान जागता है २ ॥ ७ ॥

पृथग्दोषैः समस्तैश्च वक्ष्यते स दोषो के पृथक् पृथक् तथा समस्त है । ( १ ) वातिक, ( २ ) पैत्तिक, ( ३ ) चारों के लक्षण कहते है ॥ ८ ॥

१ ' धमनीभिश्चिता ' इति वा पाठ. । २ सुश्रुत मे भी कहा है-सज्ञावहेषु स्रोतस्तु दोषव्यातेषु चतुर्विधः ॥ ८ ॥

होने से अपस्मार लैष्मिक और ( ४

मानव ' ।

रजस्तम परीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥

विक्षिपन् हस्तपादौ च विजित भ्रूविलोचनः ।

दन्तान् खादन् वमन्फेन विवृताक्षः पतेत् क्षितौ ॥

चार प्रकार का ) सन्निपातजन्य,

पृष्ठ 448

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४६४ चरकसंहिता [ अ ० १०

कम्पते प्रदशेन्तान् फेनोद्वामी श्वसित्यपि ।

परुषाणि च कृष्णानि पश्येद्रपाणि चानिलात् ॥ ६ ॥

( १ ) वातिक - अपस्मार के लक्षण – वायु के कारण उत्पन्न अपस्मार का रागी कापता हे, दाता का काटता है, मुख से झाग उगलता है, जोर जोर से सास लेता है, कठार तथा काले रंग के रूपो को देखता है । [ इसमे बार बार प्रबोध ओर बार बार अपस्मार होता है ] ॥ ६ ॥

पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।

सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ १० ॥

( २ ) पैत्तिक अपस्मार के लक्षण – रोगी के मुख से निकला झाग, नख आदि अग, मुख और आखे पीली होती है, पोले, लाल रूपों को देखता है, रोगी को प्यास और गरमी अनुभव होती है, शरीर गरम रहता है, सब जगत् को आग से व्याप्त अथात् चारा ओर आग ही आग देखता है ॥ १० ॥

शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।

पश्यच्छुक्लानि रूपाणि लैष्मिको मुच्यते चिरात् ॥ ११ ॥

( ३ ) कफजन्य अपस्मार के लक्षण - रागी के मुख से निकली झाग, नख आदि अग, मुख और आखे श्वेत होती है, शरीर ठण्डा, रोमाचित और भारी होता है, रोगी श्वेत रूपो को देखता है, यह रोगी देर मे सज्ञा ( चेतना ) प्राप्त करता है ॥ ११ ॥

सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गे ज्ञेय त्रिदोषजः ।

अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ १२ ॥

( ४ ) त्रिदोषजन्य अपस्मार मे इन तीनों दोषो के लक्षण मिले रहते हैं । यह सन्निपातजन्य अपस्मार असाव्य होता है, इसी प्रकार क्षीण पुरुष मे हुआ तथा पुराना अपस्मार असाध्य होता है ॥ १२ ॥

पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।

अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किचिदथान्तरम् ॥ १३ ॥

मल ( अपस्मार के प्रारम्भिक दोष ) बारह दिन, पन्द्रह दिन या एक मास मे अथवा कुछ कम या अधिक समय मे [ जब काल, प्रकृति, दूष्य आदि

से ] बलवान् हो जाते है । तब अपस्मार रोग को उत्पन्न करते है ॥ १३ ॥

तैरावृताना हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् ।

तीक्ष्णैरादा भिषक कुर्यात्कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ १४ ॥

१. ' दशते दन्तान् ' इति वा पाठ • ।

पृष्ठ 449

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अ ० १० ] ३० चिकित्सितस्थानम् ४६५

वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।

श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ' ॥ १५ ॥

चिकित्सा — वैद्य को चाहिये कि प्रथम अपस्मार के उत्पन्न होने पर ही तीक्ष्ण वमन आदि कार्यों द्वारा हृदयवह तथा मनोवह स्रोतों को रोकने वाले शारीरिक तथा मानसिक दोषो को निकाल कर हृदयवह और मनोवह स्रोतों का प्रबोधन करे । वातिक अपस्मार मे बस्ति कर्म, पैत्तिक में विरेचन कर्म और श्लैष्मिक अपस्मार मे वमन कर्म प्रधानत करने चाहियें, और शेष कर्म भी करने चाहिये || १४–१५ ॥

सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च ।

अपस्मारविमोक्षार्थं योगान्संशमनाञ्छृणु ॥ १६

जिस समय ऊर्ध्व ( ऊपर के ) और अध ( नीचे के शोवन हो जाये, और भली प्रकार अन्न सेवन आदि से शरीर तब अपस्मार को शान्त करने के लिये जिन निम्नलिखित चाहिये उनको सुनो ॥ १६ ॥

गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्धृतम् ।

सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् ॥ १७ ॥

॥

) सब मार्गों का मे बल आ जावे, योगों को बरतना इति पञ्चगव्यं घृतम् । ( १ ) पचगव्य घृत —– गाय के गोबर का रस, गाय का दही, गाय का दूध, गाय का मूत्र इनके बराबर गाय का घृत लेकर घृतपाक विधि से सिद्ध करे । यह घृत अपस्मार, कामला आर ज्वर को नष्ट करता है ॥ १७ ॥

द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम् ।

सप्तपर्णमपामार्ग नीलिनी कटुरोहिणीम् ॥ १८ ॥

सम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।

द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते ॥ १६ ॥

भार्गी पाठां त्रिकटुका त्रिवृता निचुलानि च ।

श्रेयसीमाढकीं मूव दन्ती भूनिम्बचित्रकौ ॥ २० ॥

द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम् ।

क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ॥ २१ ॥

गोशकृद्रसद्ध्यम्लक्षीर मूत्रैश्च तत्समैः ।

पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ २२ ॥

१ ' समाचरेत् ' इति च

पृष्ठ 450

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४६६ चरकसंहिता [ अ ० १० अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च ।

गुल्मार्शः पाण्डुरोगेषु कामलासु भगन्दरे ।

अलक्ष्मीग्रहरोगनं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ २३ ॥

इति महापञ्चगव्यं घृतम ॥

( २ ) महापचगव्य घृत - क्षुद्र और लघु दोनो पचमूल ( दशमूल ), त्रिफला ( हरड़, बहेडा, आवला ), हल्दी, दारूहल्दी, कडे की छाल, सतवन की छाल, चिरचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, काकोडुम्बरिका ( छठ गूलर ) की जड, पोहकरमूल, दुरालभा प्रत्येक वस्तु दो पल, पानी एक द्रोण इनका क्वाथ-विधि से क्वाथ करे । जव चतुर्थाश रह जाये तब छान ले | इसमे भाग, पाठा, त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), निशोथ, निचुल ( जलवेतस या समुद्रफल ) के फल, श्रेयसी ( गजपिप्पली ), आढकी ( तुवर ), म्वा, दन्तीमुल, चिरायता, चीता, श्वेत सारिवा और कृष्ण सारिवा, रोहिप तृण, भूतीक ( अजवायन ), मदयन्तिका ( नवमल्लिका ) ये द्रव्य प्रत्यक एक कर्प ले, इनको बारीक पीस कर क्वाथ मे डाले | गाय का घी एक प्रस्थ और घी के बराबर गाबर का रस और गौ के ही दही, दूध और मूत्र लेकर घृत सिद्ध करे । इस घृत का नाम ' महापचगव्य ' घृत है । यह घृत अपस्मार, उन्माद ज्वर, कास, शोथ, उदररोग, गुल्म, अर्श, पाण्डु, कामला और हलीमक रोगो मे अमृत के समान है, यह घृत अलक्ष्मी ( दुभगता ), ग्रह रोगों और चातुर्थिक ज्वर का विनाश करता है १८ - २३

ब्राह्मीरसवचाकुष्टशङ्खपुष्पीभिरेव च ।

पुराण धृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ॥ २४ ॥

( ३ ) ब्राह्मी घृत — ब्राह्मी का स्वरस, वच, कूठ और शखपुष्पी इन से पुरातन गो - घृत सिद्ध करे । यह घृत उन्माद, अलक्ष्मी, अपस्मार और पाप को न करता है || २४ ॥

घृतं सैन्धवहिङ्गभ्या वर्षे बास्ते चतुर्गुणे ।

मूत्रे सिद्धमपस्मारहृमहामयानाशनम् ॥ २५ ॥

( ४ ) बैल और बकरे का मूत्र चार भाग, सैन्धव और हीग का कल्क एक भाग, इनसे सिद्ध किया घृत अपस्मार, हृदय रोग, ग्रह रोगो को नष्ट करता है । [ यहा पर गौ और बकरी स्त्री जाति का मूत्र न लेकर नर बैल और बकरे काही मूत्र लेना चाहिये ' ] ॥ २५ ॥

१ यद्यपि चतुष्पाद मे स्त्रीलिंग ही प्रशस्त है, तथापि यहा पर पुल्लिंग ही

लेना चाहिये । कहा भी है - स्त्रीणा गुरु च तीक्ष्ण च न तु पुंसा तथाविधम् ।

पित्ताशिका. स्त्रियो यस्मात् सौम्यास्तु पुरुषाः स्मृताः ॥