श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 451–460

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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अ ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६७ wwwww

वचासम्पाककैटर्यवयःस्थाहिगुचोरकैः ।

सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वात श्लेष्मात्मके घृतम् ॥ २६ ॥

( ५ ) वचा, शम्पाक ( अमलतास ), कैटर्य ( कट्फल ), वयःस्था ( आवला या गिलोय ), हींग, चोरक ( चोरपुष्पी सुगन्धित द्रव्य ), पलकत्रा ( गुग्गुलु ), इनके कल्क से, चार गुणे पानी मे सिद्ध घृत वातिक, श्लैष्मिक अथवा गुल्म के समान वात, कफ दोनो से उत्पन्न अपस्मार मे हितकारी है ॥ २६ ॥

तैलप्रस्थ घृतप्रस्थ जीवनीयैः पलोन्मितैः ।

क्षीरद्रोणे पचेत्सिद्धमपस्मारविनाशनम् ॥ २७ ॥

( ६ ) तिल का तैल एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, जीवनीय गण की दस औषधियो मे से प्रत्येक एक - एक पल लेकर इनका कल्क, दूध एक द्रोण, इनमे घृत सिद्ध करे, यह घृत अपस्मार का नाशक है ॥ २७ ॥

कैसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे ।

कार्षिकैर्जीवनीयश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २८ ॥

वातपित्तोपं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति । ( ७ ) दूव एक जाढक, गन्ने का रस एक आढक, कामरी ( गम्भारी ) का क्वाथ घी से आठ गुणा, जीवनीय आदि ओषविया प्रत्येक एक कर्ष, इनके कल्क से एक प्रस्थ गो घृत सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य ( अथवा वात - पित्तजन्य ) अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ २८ ॥

तद्वत्काशविदारीक्षुकुशक्वाथश्शृतं घृतम् ॥ २६ ॥

( ८ ) इसी प्रकार से कास ( सरकण्डा ), विदारीकन्द, गन्ना, कुश, इनके क्वाथ मे सिद्ध घृत वातजन्य, पित्तजन्य अपस्मार को नष्ट करता है ॥२६ ॥

मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात् ।

तद्वत्सिद्धं घृतप्रस्थं पित्तापस्मारभेपजम् ॥ ३० ॥

( ६ ) आवले का रस एक द्रोण, मुलहठी का कल्क दो पल, घी एक प्रस्थ इनसे यथाविधि सिद्ध घृत पैत्तिक अपस्मार को नष्ट करता है ॥ ३० ॥

अभ्यङ्गः सार्षपं तैल बस्तसूत्रे चतुर्गुणे ।

सिद्धं स्याद् गोशकृन्मूत्रे स्नानोत्सादनमेव च ॥३१ ॥

अभ्यग- ( १ ) बकरे का मूत्र चार सेर, सरसो का तैल एक सेर, इनसे सिद्ध किये तैल का अभ्यग करे । इसी प्रकार गाय के गोबर से उबटन और गाय मूत्र से ' स्नान करे ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 452

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४६८ चरकसंहिता [ अ ० १० www

कटभीनिम्बकटूवङ्गमधुशित्वचा रसे ।

सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थे प्रशस्यते ॥ ३२ ॥

( २ ) कटभी ( वापुबा ) नीम की छाल, कट्वेंग ( श्योनाक ), म ुशि ( लाल शोभाजन की छाल ) इनके क्वाथ मे गोमूत्र के समान सरसो का तैल मिला कर तैल सिद्ध करे, यह तैल अभ्यग के लिये उत्तम है । [ इसमे क्वाथ चतुर्थीश के स्थान पर तृतीयाश करे तभी स्नेह से चतुर्गुण होगा ] ॥३२ ॥

। पळङ्कपावचापथ्यावृश्चिकाल्यर्कसर्पपैः जटिला पूतनाकेशीनाकुलीहिगुचोरकैः ॥ ३३ ॥

लशुनातिरसाचित्राकुष्ठैर्विभिश्च पक्षिणाम् मासाशिनां यथालाभ बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ॥ ३४ ॥

सिद्धमभ्यञ्जनं तैलमपस्मारविनाशनम् । ( ३ ) पलकषा ( गुग्गुलु ), वचा, पथ्या ( हरड़ ), वृश्चिकाली ( बिच्छू-बूटी ), सरसो, जटिला ( जटामासी ), पूतना ( हरड़ ), केशी ( भूत केशी ), नाकुली ( रास्ना या सर्पगन्धा ), हीग, चोरक ( चोर पुष्पी, सुगन्धित द्रव्य ), लसुन, अतिरसा ( शतावरी या जलज यष्टि मधु ), चित्रक, कूठ, मासाहारी पक्षियो ( गीध, चील आदि ) की बीठ इनमे से जो भी मिल सके उनका कल्क चतुर्थाश, सरसो का तैल एक भाग और बकरे का मूत्र चार भाग लेकर तैल सिद्ध करना चहिये, इससे अपस्मार - रोग शान्त हाता है ॥ ३३-३४ - ॥ एतैश्चैषधः कार्य धूपनं संप्रलेपनम् ॥ ३५ ॥

( ४ ) गुग्गुलु आदि औषधियोसे ही धूपन और चाहिये ॥३५ ॥

पिप्पली लवण शिशुं हिगु हिगुशिराटिकाम् ' ।

काकोली सर्पपान्काकनासा कैटर्चचन्दने ॥ ३६

शुनः स्कन्धास्थिनखरान्पशुक्राश्वति पेषयेत् ।

बस्त्रमूत्रेण पुष्पक्षे प्रदेहः स्यात्सधूपनः ॥ ३७ ॥

प्रलेप भी करना ॥ ( ५ ) पिप्पली, सैन्धा नमक, सहजन, हाग, हिगुशिराटिका ( वशपत्री या डीकामारी ), काकोली, सरसों, काकनासा ( कौआटूटी ), कैटर्य ( कट्फल ), चन्दन, कुत्ते के कधे की हड्डो, नख और पसलियों को बकरे के मूत्र के साथ षुष्य - नक्षत्र मे पीस कर उनका प्रलेप और धूप देना चाहिये ॥३६-३७ ॥ १ हिंगुशिवाटिकाम् ' इति वा पाठ ।

पृष्ठ 453

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अ ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६ ~ ^^ ^

अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोर कैः ।

उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ३८ ॥

( ६ ) अपेतराक्षसी ( कृष्ण तुलसी ), कूठ पूतना ( हरड ), भूतकेशी, चोरक इनको बकरे के मूत्र मे पीस कर उबटन करे और मूत्रों से अवसेचन ( स्नान ) करावे || ३८ ||

जलौकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।

खरास्थिभिर्हस्तिनखैस्तथा गोपुच्छलोमभिः ॥ ३६ ॥

( ७ ) इसी प्रकार जाक की विष्ठा से अथवा बकरे के बालों को जलाकर उनसे, या गधे की अस्थि से, अथवा हाथी के नखो के चूर्ण से, या गाय की पूछ के बालो को जला कर इनको बकरे के मूत्र मे पीसकर उबटन लगावे १ ॥ ३६ ॥

कपिलाना गवा मूत्रं नावनं परम हितम् ।

वशृगालबिडालाना सिंहादीना च शस्यते ॥। ४० ॥

नस्य– ( १ ) पिंगल वर्ण की ( कपिला ) गायो का मूत्र नस्य के लिये . अति उत्तम है | इसी प्रकार कुत्ते, गीदड, बिल्ली, सिंह आदि का मूत्र भी नस्य के लिये उत्तम है ॥ ४० ॥

भार्गी वचा नागदन्ती श्वेतश्वेता विषाणिका ।

ज्योतिष्मती नागदन्ती पादोक्ता मूत्रपेषिताः ॥। ४१ ॥

योगात्रयोऽतः षड बिन्दून् पञ्च वा नावयेद्भिषक् । ( २ ) तीन योग - ( १ ) भार्गी, वचा और नागदन्ती, ( २ ) श्वेतग्वेता ( श्वेत अपराजिता या दूविया वच ) और विषाणिका ( मेढासिंगी ), ( ३ ) ज्योतिष्मती ( मालकगनी ) और नागदन्ती ( बडी दन्ती, इनको मूत्र के साथ पीस ले । ये तीन योग है । इनके पाच या वैद्य अपस्मार रागी की नाक मे नस्य देवे ॥ ४१ ॥

त्रिफलाव्योषपीतद्रयवक्षारफणिज्जकैः ॥ ४२ ॥

श्यामापामार्गकारञ्जफलैर्मूत्रैश्च बस्तजैः ।

साधित नावनं तैलमपस्मारविनाशनम् ॥ ४३ ॥

( ३ ) त्रिफला, सोठ, मरिच, पिप्पली, पीतद्रु ( हलदू ), पर्व पुष्पिका ) छ बिन्दुओ से यवक्षार, फणि-ज्झक ( तुलसी भेद ), श्यामा, ( त्रिवृत् ), अपामार्ग, करजुवा इनका कल्क १ ' जलौका ' के स्थान पर ' जतुका ' पाठ हो तो मकडी का ग्रहण करना उचित है । २ ' शतश्वेता ' इति वा ।

पृष्ठ 454

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४७० चरकसंहिता [ अ ० १० www. m चतुर्थीश, सरसो या तिल का तैल एक भाग, बकरे का सूत्र चार भाग लेकर तैल सिद्ध करे । इसका नस्य लेने से अपस्मार - रोग नष्ट होता है ॥ ४२-४३ ॥

पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ट च लवणानि च ।

भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्य प्रधमन परम् ॥ ४४ ॥

( ४ ) पिप्पली, वृश्चिकाली ( बिच्छू बूटी ), कूठ ओर पाचो नमको मे से जो मिले और भार्गी इन सब का चूर्ण करके नाक मे फूक द्वारा नस्य देना चाहिये । यह एक उत्तम औपन है ॥ ४४ ॥

कायस्थाञ्छारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवास्तथा ।

सव्योषान् बम्तमूत्रण पिता वर्ती: प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥

अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्ट गरादिते ।

विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः ॥ ४६ ॥

अजन— ( १ ) कायस्था ( तुलसी या छोटी इलायची ), शरद् ऋतु मे उत्पन्न मूग ( हरे मूंग ), मोथा, उशीर ( खस ), जौ, त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिम्पली ) इन सब को बकरे के मूत्र मे पीस कर नेत्राजन वर्त्ती बनावे | अपस्मार, उन्माद, साप का काटा, अर्दित - वात, विषपान, गर ( सयोगज विष ) से पीडित और जलमृत अर्थात् जल मे डूबा पुरुष ( पेट मे बहुत पानी जाने से जो मृत के तुल्य हो ) ' उसके लिये ये वर्तिया अमृत के समान जीवनप्रद होती है ॥ ४५–४६ ॥

मुस्तं वयःस्था त्रिफला कायस्था हिगु शाद्वलम् ।

व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमेषपभस्त्रिभिः ॥ ४७ ॥

पिष्ट्वा कृत्वा च ता वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत् ।

किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च ॥ ४८ ॥

( २ ) मोथा, वयस्था ( गिलोय ), त्रिफला, कायस्था ( हरड़ ), हीग, शाइल ( दूब, नई घास ), सोठ, मरिच पीपल, उडद और जौ इनको बकरे, बैल और मेढे के मूत्र मे पीसकर ( तीना के मूत्र से ) नेत्राजन वर्त्ती बनावे ।

१ जलमग्न पुरुष के लक्षण--विष्टब्धपायुमूर्वाक्षमा मातोदरमेहनम् ।

विद्याज्जलमृत जन्तु शीतपादकराननम् ॥

गुदा, सिर, आखे अकड जावें, पेट और लिंग फूल जावे, पैर, हाथ और मुख ठण्डे पड जावे उसे जलमृत पुरुष जाने ।

पृष्ठ 455

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अ ० १० ] चिकित्सितस्थानम् इनका प्रयोग अपस्मार, उन्माद, किलास ( श्वेत कुष्ठ ) मे करे || ४७-४८ ॥ पुष्योद्धृतं शुनः पित्तमपस्मारन्नमञ्जनम् । ( ३ ) पुष्य नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त को लेकर उसका

अपस्मार नष्ट होता है ।

तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं मतम् ॥ ४६ ॥

धूपन – ( १ ) पुष्य नक्षत्र में कुत्ते के पित्त का लेकर ४७१ और विषम - ज्वर अजन करने से पुराने घृत के साथ मिलाकर वूपन देना भी अपस्मार की उत्तम ओषध है ॥ ४६ ॥

नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजेः ।

तुण्डः पक्षः पुरीपेच धूपन मारयेद्भिषक् ॥ ५० ॥

आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्हृदयं सप्रबुध्यते ।

स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति स्मृति संज्ञा स विन्दति ॥ ५१ ॥

( २ ) नेवला, उल्लू, बिल्ली, गीध, कीट ( बिच्छू ), साप और कौवा इनके मुख, पख ओर पुरीषो मे अपस्मार - रोगी को धूपन देवे । इन उपरोक्त सिद्द फलदायक कमो से अपस्मार - रोगी के हृदय और मनोवह स्रोत शुद्ध हो जाते है और रोगी को सज्ञा ( चेतना ) आ जाती है ॥ ५०-५१ ॥

यस्यानुबन्धस्त्वागन्तुदोंपलिङ्गाधिकाकृतिम् ।

पश्येत्तस्य भिषक्कुर्यादागन्तून्मादभेपजम् ॥ ५२ ॥

जिस अपस्मार मे वात आदि दोषो से अधिक लक्षण दिखाई देते हों, उसको आगन्तुज समझे । इस आगन्तुज - अपस्मार मे आगन्तुज - उन्माद की चिकित्सा करे अर्थात् वृतपान और मत्रादि- चिकित्सा करे ॥ ५२ ॥

अतत्वाभिनिवेश नामक महारोग का निदान और चिकित्सा

अनन्तरमुवाचेदमग्निवेशः कृताञ्जलिः ।

भगवान् प्राक् समुद्दिष्टः श्लोकस्थाने महागद: ॥ ५३ ॥

अत्तत्त्वाभिनिवेशो यस्तद्धेत्वाकृतिभेपजम् ।

तत्र नोक्तं ततः श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम् ।

शुश्रूषवे वचः श्रुत्वा शिष्यायाऽऽह पुनर्वसुः ॥ ५४ ॥

अपस्मार ' का हेतु, लक्षण, चिकित्सा सुनने के अनन्तर हाथ जोड़ कर अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से निवेदन किया- भगवन्! आपने सूत्रस्थान १. अतत्त्वाभिनिवेश - रोग का लक्षण और चिकित्सा का अंश आर्ष नही है, यह चक्रदत्त और उनके गुरु - जनो, का मत है ।

पृष्ठ 456

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४७२ चरकसहिता [ अ ० १० में ‘ अतत्त्वाभिनिवेश ' नामक जो महारोग कहा है, उसकी आकृति, लक्षण, हेतु वक्ष पर आपने नहीं कहे थे, उनको मैं सुनना चाहता हूँ । उसे आप यहा पर कहिये | सुनने की इच्छा वाले शिष्य के वचन को सुन कर भगवान् महर्षि ने कहा- ॥ ५३-५४ ॥ महागदं सौम्य शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम् ।

मलिनाहारशीलस्य वेगान्प्राप्तान्निगृहृतः ।

शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैहेतुभिश्चातिसेवितैः ॥ ५५ ॥

हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः ।

दोषाः संदृष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः ॥ ५६ ॥

हे सौम्य! महागद के हेतु, लक्षण और चिकित्सा को सुनो - जो व्यक्ति नित्यप्रति मलिन ( अपवित्र ) और अपश्य आहार का सेवन करता है, मून, पुरीष आदि के उपस्थित वेगो को रोकता है, शान्त, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष आदि कारणों को अति सेवन करता है रजोग्रस्त और मो. ( तम ) से आवृत उस पुरुष मे प्रकुपित शारीरिक वात आदि दोष हृदय मे पहुँच कर मनोवह और बुद्धि - वह ( सज्ञावह ), सिराओ ( स्रोतो ) को दूषित कर देते है ॥ ५५–५६ ॥

रजस्तमोभ्या वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चा ss वृते ।

हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढाल्पचेतसः ॥ ५७ ॥

करोति विषमां बुद्धि नित्यानित्ये हिताहिते ।

अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम् ॥ ५८ ॥

रज और तम रूपी मानस दोषो के अधिक बढने से सत्त्व- सज्ञक मन और बुद्धि घिर जाते है, ढप जाते है । शारीरिक दोषों के बढने से हृदय व्याकुल हो जाता है । इस अवस्था मे पुरुष को मोह ( मूर्च्छा ) आ जाती है, चेतना कम हो जाती है, नित्य, अनित्य और हित, अहित कार्यों मे विपरीत बुद्धि करने लगता है । आप्त विद्वान् इसको ' अतत्त्वाभिनिवेश ' नामक महाराग कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥

स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संसाध्य वमनादिभिः ।

कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत् ॥ ५६ ॥

चिकित्सा - रोगी को प्रथम स्नेहन और स्वेदन कराके वमन आदि क्रियाओ से शुद्ध करे । पीछे से अग्नि को बढाने के लिये पेया आदि कर्म तथा मेधावर्धक, पवित्र अन्नपानो से चिकित्सा करे ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 457

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अ ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३

ब्राह्मीस्वरसयुक्तं यत् ' पञ्चगव्यमुदाहृतम् ।

तत्सेव्यं शङ्खपुष्पी च यच्च मेध्यं * रसायनम् ॥ ६० ॥

ब्राह्मी के ( कूठ आदि से मिले ) स्वरस से युक्त जो पंचगव्य घृत प्रथम कहा है, उसका सेवन करना चाहिये । शखपुष्पी का स्वरस और जो मेधावर्धक रसायन प्रथम कहे है, उनका सेवन करना चाहिये ॥ ६० ॥

सुहृदश्चानुकूलास्तं स्वाप्तधर्मार्थवादिनः ।

संयोजयेयुर्विज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ६१ ॥

मन के अनुकूल अच्छे आप्त, धर्म और हित की बात कहने वाले मित्र लोग उस रागी को विज्ञान ( शिल्प - शास्त्र ), धैर्य ( चित्त की स्थिरता ), स्मृति ( भूतार्थ - विज्ञान ) और समाधि ( मन के नियमन ) मे लगावे ॥६१ ॥

प्रयुज्या तैललशुनं पयसा वा शतावरीम् ।

ब्राह्मरसं कुष्ठरसं वचा वा मधुसंयुताम् ॥। ६२ ॥

( १ ) तिल तैल के साथ मिला लहसुन का रस प्रतिदिन सेवन करें । ( २ ) शतावरी के रस का दूध के साथ ले, ( ३ ) ब्राह्मी स्वरस, ( ४ ) कूट के स्वरस, या ( ५ ) वच के चूर्ण को मधु के साथ प्रयोग करे ये पाच योग है ॥ ६२ ॥

दुश्चिकित्स्यो ह्यपस्मारश्चिरकारी कृतास्पदः ।

तस्माद्रसायनरेन प्रायशः समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥

अपस्मार रोग मे शारीरिक और मानसिक दोष एक साथ कुपित होते है और वह महाममों मे आश्रित होता है । और यदि यह रोग देह मे एक बार

स्थान पा जावे और चिरस्थायी हो जावे तो वह अति कष्टसाध्य हो जाता है ।

इसलिये इस अपस्मार की प्रायः अनेक रसायनो से चिकित्सा करे ॥ ६३ ॥

जलाभिद्रुमशैलेभ्यो विषमेभ्यश्च तं सदा ।

रक्षेदुन्मादिनं चैव सद्यः प्राणहरा हि ते ॥ ६४ ॥

अपस्मार और उन्माद के रोगियो की जल, अग्नि, वृक्ष, पर्वत और अन्य विपम स्थानो से सदा रक्षा करे । क्योकि इन का देखने मात्र से उत्पन्न हुआ वे प्राणघातक होता है ॥ ६४ ॥

तत्र श्लोकौ - हेतुः

---- कुर्वन्त्यपस्मारं दोषाः प्रकुपिता यथा ।

सामान्यतः पृथकूत्वाच्च लिङ्ग तेषां च भेषजम् ॥६५ ॥

१. ' स्वरसंयुक्त ' इति । २ ‘ सेव्यं ' इति वा ।

पृष्ठ 458

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४७४ चरकसंहिता [ अ ० ११

महागद्समुत्थानं लिङ्गं चोवाच सौषधम् ।

मुनिर्व्याससमासाभ्यामपस्मारचिकित्सिते ॥ ६६ ॥

उपसहार — अपस्मार- राग के कारण, प्रकुपित दोप जिस प्रकार से अप-म्मार - रोग का उत्पन्न करते है, सामान्य लक्षण तथा पृथक् - पृथक् लक्षण और चिकित्सा, अतत्त्वाभिनित्रश नामक महागद के कारण, लक्षण और चिकित्सा, यह सब विपय भगवान् आत्रेय ने प्रजा की हितकामना से ' अपस्मार - चिकित्सित ' अध्याय में कह दिये ॥ ६५-६६ ॥ इन्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रति सस्कृते ऽपरस्परचिकित्सित नाम दशमोऽध्याय ॥१० ॥

एकादशोऽध्यायः ।

अथातः क्षतक्षीणचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा SSE भगवानात्रयः ॥ २ ॥

इसके आगे क्षतक्षीण - चिकित्सा की व्यारया करते है, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥

उदारकी र्तिर्ब्रह्मषिरात्रेयः परमार्थवित् ।

क्षतक्षणचिकित्सार्थमिदमाह चिकित्सितम् ॥ ३ ॥

उदार कीर्त्ति, ब्रह्मर्षि तथा परमार्थ तत्त्व के जानने वाले, भगवान् पुनर्वसु ने उरःक्षत से क्षीण व्यक्ति की चिकित्सा के लिये निम्नलिखित चिकित्सा - विधि का उपदेश तिया है ॥ ३ ॥

धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थ भारमुद्वहतो गुरुम् ।

पततो विपमोच्चेभ्यो युध्यमानस्य चाधिकैः ॥ ४

वृषं हय वा धावन्त दयं वान्यं निगृहृतः ।

शिलाकष्ठाश्मनिर्घातान क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥

अधीयानस्य वाऽत्युच्चैदूर वा व्रजतो द्र तम् ।

महानदीं वा तरतो हयैर्वा सह धातवः ॥ ६ ॥

सहसोत्पततो दूरं तूर्णं चातिप्रनृत्यतः ।

तथाऽन्यैः कर्मभिः क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य वा ॥ ७

विक्षते वक्षसि व्याधिर्बलवान् समुदीर्यते । स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिताशिनः ॥ = ॥ ५ ॥ ॥

पृष्ठ 459

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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७५ ^ कारण और सम्प्राप्ति – धनुष को अधिक खीचते हुए, अति अधिक भारी भार को उठा कर ले जाते हुए, ऊची - नीची जगह से गिरने पर, अपने से अधिक बलवान् व्यक्तियो से युद्ध करते हुए, दौड़ते हुए घोडे या बैल को वा दम्य ( तरुण बैल, घोडे या भैसे ) को रोकते हुए, शिला, काष्ठ ( लकडी ), पत्थर, निर्घात ( मुद्गर ) आदि को दूर फेकते वा दूसरो पर मारते हुए, बहुत जोर - जोर से ऊचे स्वर से पढते हुए, दूर तक अति वेग से भागते हुए, बड़ी भारी नदी को तैरते हुए, घोड़ो के साथ - साथ दोड़ते हुए, एक दम अचानक कूदते हुए, बहुत तेजी के साथ नाचते हुए, तथा इसी प्रकार के अन्य क्रूर कायो से अथवा दूसरे व्यक्ति से वक्षस्थल पर जार से चोट लगने पर, स्त्रियों मे अतिप्रसङ्ग करनेवाले के, रूखा, अल्प ( हीन मात्रा मे ), वा प्रमित अथात् एक रस खानेवाले व्यक्ति के, वक्ष स्थल मे क्षत हो जाता है, इससे क्षतक्षीण नामक बलवान् रोग उत्पन्न होता है ' । [ जल्पकल्पतरुकार ने क्षतक्षीण को दो प्रकार का माना है । एक अति स्त्री-प्रसग, प्रमिताशन आदि से उत्पन्न और दूसरा क्रूरकायो से उत्पन्न । परन्तु परन्तु शुक्र - क्षय से क्षत - क्षय उत्पन्न नही होता, वह तो क्षयजन्य यक्ष्मा है उसको

प्रथम कह दिया है । ] ॥। ४–८ ॥

उरो विरुज्यते तस्य भिद्यतेऽथ विद्यते ।

प्रपीड्यते ततः पार्श्वे शुष्यत्यङ्ग प्रवेपते ॥ ९ ॥

क्रमाद्वीर्य बल वणों रुचिरग्नि हीयते । ज्वरो व्यथा मनोदय विभेदोऽग्निवधस्तथा दुष्टः श्यावः सदुर्गन्धिः पीतो विप्रथितो बहुः कासमानस्य चाभीक्ष्ण कफः सास्रः प्रवर्तते ॥ ॥ १० ॥

११ ॥ सक्षतः क्षीयतेऽत्यर्थ तथा शुक्रोजसोः क्षयात् । लक्षण- - उर स्थल ( छाती ) मे अत्यन्त वेदना या पीडा होती है, छाती फटती, दा टुकडे होतो प्रतीत होती है, जलन सी प्रतीत होती है, पार्श्व द प्रतीत हाते है, अग शुष्क हो जाते है, अग कापते है 1 । वीर्य ( सामर्थ्य ), बल, वर्ण ( कान्ति ), रुचि ( भोजन में इच्छा ) ओर अनि धीरे - वीरे घट जाती है । ज्वर, पीडा, मन की दीनता ( उदासी ), अतिसार, जाठर अग्नि का नाश १ राजयक्ष्मा और क्षतक्षीण मे भेद करना चाहिये । क्षतक्षीण की उपेक्षा से यक्ष्मा अनुबन्ध के रूप मे उत्पन्न हो जाता है । भेद कहा भी है-शोषप्लीहाढ्यवाताश्च स्वरमेदं क्षत क्षयम् ॥

पृष्ठ 460

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४७६ चरकसहिता [ अ ० ११ ( भोजन का अविपाक या न पचना ), उत्पन्न हो जाता है । बार बार खासी आती है, खासने मे दूषित, काला या पीला, दुर्गन्धयुक्त, बँधा हुआ ( ग्रथित ), मात्रा मे बहुत तथा रक्त मिश्रित कफ बाहर आता है । शुक्र और ओज के क्षीण होने से उर क्षत का रोगी अत्यन्त क्षीण ( दुर्बल ) हो जाता है ॥६- ११ ॥ अव्यक्त लक्षणं तस्य पूर्व रूपमिति स्मृतम् ॥ १२ ॥

छाती में दर्द आदि पूर्वोक्त लक्षण जब तक अव्यक्त या थोड़े से व्यक्त होते हैं, वही इस रोग के पूर्वरूप है ॥ १२ ॥

उरोरुक शोणितच्छर्दिः कामो वैशेषिकः क्षते ।

क्षीणे रक्तसूत्र पार्श्वपृष्टकटिग्रहः ॥ १३ ॥

उर॰क्षत होने पर — छाती में दर्द, रक्त का वमन ओर कास विशेष रूप से होता है | क्षतक्षीण अथात् शुक्र के क्षय से रक्तमिश्रित मूत्र तथा पार्श्व, पीठ और कटि मे जकडाहट, वेदना अथवा स्थिरता आ जाती है ॥ १३ ॥

अल्पलिङ्गस्य दीप्ताने साध्यो बलवतो नवः ।

परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्ग तु वर्जयेत् ॥ १४ ॥।

साध्य और असाध्य के रूप - यदि रोगी बलवान् हो, अग्नि भी प्रदीप्त हो, लक्षण थोडे हो और रोग नया ( एक साल से कम का ) हो तो वह साध्य होता है । जो रोग एक साल पुराना हो गया हो तो वह याप्य है, जिस रोगी मे सब लक्षण विद्यमान हो वह असाध्य है । वह चिकित्सा करने योग्य नहीं है ॥ १४ ॥

चिकित्सा-उरो मत्वा क्षतं लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् ।

सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽद्यात्सशर्करम् ॥ १५ ॥

( १ ) जब छाती में क्षत हुआ पता लगे तब लाख को मधु मे मिला कर दूध के साथ पी लेवे । इसके जीर्ण होने पर दूध और शर्करा के साथ अन्न खावे ' ॥ १५ ॥

पार्श्वबस्तिरुजश्चाल्पपित्ताग्निस्ता सुरायुताम् ।

भिन्नविट्कः समुस्तातिविषा पाठा सवत्सकाम् ॥ १६ ॥

( २ ) रोगी को पार्श्वशूल और बस्तिशूल हो तथा अल्पपित्त और अल्नाग्नि

१ अष्टागसग्रह में कहा है-उरस्यन्त क्षते सद्यो लाक्षा क्षौद्रयुता पिवेत् ।

क्षीरेण शालीन् जीर्णेऽद्यात् क्षीरेणैव सशर्करान् ॥