श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 461–470

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७ ( मन्दाग्नि ) हो तो लाख का सुरा के साथ पीवे । यदि रोगी को अतीसार हो तो लाख को मोथा, अतीस, पाठा और इन्द्रजौ के क्वाथ ( काढे ) के साथ पीवे ॥ १६ ॥।

लाक्षा सर्पिर्मधूच्छिष्ट जीवनीयगण सिताम् ।

त्वकुक्षीरीसंमित क्षीरे पक्त्वा दीप्तानलः पिबेत् ॥ १७ ॥

( ३ ) दीप्ताग्नि रोगी लाख, घो, माम, जोवनीय गण की औषधिया, मिश्री त्यक्क्षीरी ( वशलोचन ) और समिता ( गोधूम, गेहूँ का चूर्ण ) को दूध से पका कर पीये ॥ १७ ॥

इक्ष्वालिकविसग्रन्थिपद्मकेशरचन्दनैः ।

शृतं पयो मधुयुतसन्धानार्थ पिबेत्क्षती ॥ १८ ॥

( ४ ) उर.क्षत रोगी सन्धान के लिये इक्षुवालिका, बिस ग्रन्थि ( पिप्पली मूल ), पद्मकेसर और चन्दन इनसे पकाये कर पिये ॥ १८ ॥

यवानां चूर्णमादाय क्षीरसिद्धं घृतप्लुतम् ।

ज्वरे दाहे सिताक्षौद्रसक्तून् वा पयसा पिबेत् ॥

( मृणाल की जड ) दूध मे मधु मिला १६ ॥ ( ५ ) उरःक्षत मे ज्वर और दाह होने पर आम ( अग्नि पर न सुने, कच्चे ) जौ के चूर्ण को चौगुने दूध मे पका कर घी मे मिला कर शर्करा ( शक्कर ) और मधु के साथ खावे । अथवा शक्कर और मधु से मिले जौ के सत्तुओ को दूध में मिला कर खावे ॥ १६ ॥

कासी पर्वास्थिशूली च लिह्यात्सघृतमाक्षिकाः ।

मधूकमधुकद्राक्षात्वकक्षीरीपिप्पलीवलाः ॥ २० ॥

( ६ ) कास, पार्श्वशूल, पोरुओ मे पीडा और अस्थिशूल होने पर महुए के फूल, मुलहठी, द्राक्षा, वसलोचन, पिप्पली और बला इनके शहद में मिला कर चाटे ॥ २० ॥

एलापत्रत्वचोऽर्धाक्षाः पिप्पल्यर्धपलं तथा ।

सितामधुकखर्जूरमृद्वीका पलोन्मिताः ॥ २१

संचूर्ण्य मधुना युक्ता गुलिकाः संप्रकल्पयेत् ।

अक्षमात्रा ततश्चेका भक्षयेन्ना दिने दिने ॥ २२

कासं श्वास ज्वर हिक्का छर्दिमूर्च्छा मदं भ्रमम् रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ २३ शोषलीहाट्यवातांश्च स्वरभेदं क्षतं क्षयम् । चूर्ण को घी और ॥ ॥

।

॥

पृष्ठ 462

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2008 चरकसंहिता [ अ ० ११ गुलिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ २४ ॥

इत्येलादिगुटिका । ( ७ ) एलादि गुटिका - छोटी इलायची, पत्र ( तेजपात ), त्वच ( दाल-चीनी ) ये प्रत्येक आवा कर्प, पिपली आना पल, शर्करा, मुलहठी, खजूर, द्राक्षा ( दाख ) प्रत्येक एक - एक पल इन सब का चूर्ण करके मधु के साथ गोलिया बनावे । रोगी को चाहिये कि प्रतिदिन एक कर्प परिमित गुटिका खाये । ये गुटका तर्पणी ( वृष्य ) है । कास, सास, ज्वर, हिचकी, वमन, मूच्छा, मद श्रम, रक्तचमन, ग्यास, पार्श्वशूल, अरोचक, शोप, प्लीहा, आढ्यवात, स्वरभेद, क्षत, क्षय और रक्तपित्त को नष्ट करती है ॥ २१-२४ ॥

रक्तेऽतिवृत्ते दक्षाण्ड यूपेस्तोयेन वा पिबेत् ।

चटकाण्डरसं वाऽपि रक्त वा छागजाङ्गलम् ॥ २५ ॥

( ८ ) रक्त के अधिक आने पर कुक्कुट के अण्डों को मूंग आदि के यूष ( रस ) के साथ अथवा जल के साथ पोवे । अथवा चटक ( चिडिया ) के अण्डे के रस को यूप के साथ पीवे, बकरी या हरिण आदि जंगली पशुओ के रक्त को पीवे ॥ २५ ॥

चूर्ण पौनर्नवं रक्तशालितण्डुलशर्करम् ।

रक्तष्टीवी पिवेत्सिद्ध द्राक्षारसपयोघृतैः ॥ २६ ॥

मधूकमधुकक्षीरसिद्ध वा तण्डुलीयकम् । ( ६ ) रक्त मिश्रित थूक आने पर - शर्करा, पुनर्नवा और लाल चावलो का चूर्ण मिला कर खावे । द्राक्षा रस, दूध, घी इनके साथ सिद्ध करके पीवे । अथवा महुवे का फूल, गुलहठी, इनका क्काय, क्वाथ के समान दूध, इनमे तण्डु-लीयक ( चौलाई ) सिद्ध करके पीवे ॥ २६ ॥

मूढवातस्त्वजामेदः सुराभृष्ट ससैन्धवम् ॥ २७ ॥।

क्षामः क्षीणः क्षतोरस्कस्त्वनिद्रः सबलेऽनले ।

शृवक्षोरसरेणाद्यात्सक्षाद्रधृतशर्करम् ॥ २८ ॥

( १० ) उर क्षत रोगी में यदि वायु अनुलोम - मार्ग से प्रवृत्त न हो तो सुरा मे सुनी अजा की वसा ( चर्बी ) को सैन्धे नमक के साथ सेवन करे । यदि उरःक्षत - रोगी क्षाम ( क्लान्त ) और क्षीण शरीर हो, अग्नि प्रबल हो और नीद न आती हो तो अजा - मेद ( बकरे की चर्बी ) को पके हुए दूध के सर भाग ( मलाई ) के साथ मिला कर घी, मधु, शर्करा के साथ खावे ॥२७-२८ ॥ शर्करा च यवक्षौद्रजीवकर्षभको मधु ।

पृष्ठ 463

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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७६ AAMANA क्षीरानुपानं वा लिह्यात्क्षीणः क्षतः कृशः ॥ २६ ॥

क्रव्यादमासनिर्यूहं घृतभृष्टं पिवेच्च सः ।

पिपलीक्षौद्रसंयुक्तं मासशोणितवर्धनम् ॥ ३० ॥

( ११ ) कुश और क्षोण उर क्षत - रोगी जो, गेहूँ, जीवक, ऋषभक इन चूर्ण को गर्दाग के समान भाग लेकर मनु के साथ चाटे । ऊपर ले गरम दूध पीने, मास और रक्त बढाने वाले मासभक्षी पशु - पक्षियो के मास के रस को भून कर पिप्पली चूर्ण और मनु के साथ मिला कर ग्वावे ॥२६-३० ॥

न्योवोदुम्बराश्रत्थसक्षशालप्रियङ्गभिः ।

तालमस्तक जम्बूत्वकप्रियालंश्च सपद्मकैः ॥ ३१ ॥

साश्वकर्णेः शृतात्क्षीराद्याज्जातेन सपिपा ।

शाल्योदनं क्षतोरस्कः क्षीणशुकच मानवः ॥ ३२ ॥

( १२ ) उरक्षत और क्षीणशुक्र पुरुष बट, गूलर, पीपल, पिलखन, साल प्रियडु, ताड का मस्तक, जामुन की छा, पियाल, राख, इनका समान भाग लेकर उनके कल्क के साथ पके दूध साथ चावल खाये ॥ ३१-३२ ॥

यष्ट चाहानागबलयोः का क्षीरसम घृतम् ।

पयस्यापिपलीवाशीकल्कसिद्धं क्षते शुभम् ॥

( १३ ) मुलहठी और नागबला का क्वाथ ( एक दूध, घी के समान, कल्कार्य, पयस्था ( क्षीरकाकोला ), अश्वकर्ण ( पीतशाल ) से से निकले घी के ३३ ॥ तृतीयाश रहने पर ), पिप्पली, वंशलाचन इनके कल्क से दूध के समान घृत ( एक भाग ) सिद्ध करे । यह घृत उर क्षत में उपयोगी है ॥ ३३ ॥

कोललाक्षारसे तद्वत्क्षीराष्ट्रगुणसाधितम् ।

कल्कैः कट्वङ्गढावत्वग्बत्सकत्वकूफलैर्धृतम् ॥ ३४ ॥

( १४ ) कोल ( सूखे बेर ) और लाक्षा रस ( अथना क्वाथ ) और घी से आठ गुणे दूध में, कटूवग ( श्यानाक ), दारूहल्दी की छाल, कूडे की छाल, इन्द्रजौ

इनके कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत उरक्षत मे हितकारी है ' ॥ ३४ ॥

जीवकर्षभकौ वीरा जीवन्ती नागरं शटीम् ।

चतस्रः पणिनीमैदे काकोल्यौ द्वे निदिग्धिके ॥ ३५ ॥

पुनर्नवे द्वे मधुकमात्मगुप्ता शतावरीम् । १ अष्टागमंग्रह मे अष्टगुण दूध का ही विधान है । यथा-घृतं वाष्टगुणे क्षीरे कोललाक्षारसान्वितम् ॥

पृष्ठ 464

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४८० चरकसंहिता [ अ ० ११ ऋद्धि परूपकं भाङ्गीं मृद्वीका बृहती तथा ॥ ३६ ॥

शृङ्गाटकं तामलकी पयस्या पिप्पली बलाम् ।

बदराक्षोटखर्जूरवातामाभिपुकाण्यपि ॥ ३७ ॥

फलानि चैवमादीनि कल्कान् कुर्वीत कार्षिकान् ।

धात्री रसविदारीक्षुच्छागमा सरसं पयः ॥ ३८ ॥

एपा प्रस्थोन्मितान् भागान घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।

प्रस्थार्ध मधुनः शीते शर्करार्धतुला तथा ॥ ३६ ॥

द्विकार्षिकाणि पत्रेलामत्वड् मरिचानि च ।

चूर्णितानि विनीयास्माल्लिह्यान्मात्रा सदा नरः ॥

अमृतप्राशमित्येतन्नराणाममृतं घृतम् ।

सुधामृतरस प्राश्य क्षीरमासरसाशिना ॥ ४१ ॥

नष्टशुक्रक्षतक्षीणदुर्बलव्याधिकपितान् ।

स्त्रीप्रसक्तान्कुशान्वर्णस्वरहीनाश्च गृहयेत् ॥ ४२ ॥

कासहिकाज्वरश्वासदाहतृष्णास्रपित्तनुत् ।

पुत्रद् वमिमूर्च्छाहृद्योनिमूत्रामयापहम् ॥ ४३ ॥

इत्यमृतप्राशघृतम् ।

४० ॥

( १५ ) अमृतप्राश - घृत — कल्कार्थ – जीवक, ऋषभक, शतावरी, जीवन्ती, सोठ, कचूर, मूगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मेदा, महामंदा, का-काली, क्षीरकाकाली, छाटो कटेरी, बड़ी कटेरी, श्वेत और लाल दोना पुनर्नवा, मुलहठी, कौच, शतावरी, ऋद्धि, फालसा, भार्गी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, सिंघाढ़ा, तामलकी ( भूई आवला ), पयस्या ( बिदारी ), पिप्पली, खरैटी, बदर ( बेर ), अक्षोट अखराट ), खजूर, बाताम ( बादाम ), अभिषेक ( पिस्ता ) इसी प्रकार के अन्य मधुर, स्निग्ध और बृहण फल प्रत्येक एक - एक कर्ष, आवले का स्वरस, विदारी का रस, गन्ने का रस, बकरे के मास का रस और गाय का दूध प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर इनके साथ घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । सिद्ध होकर शीतल हा जाने पर मधु आधा प्रस्थ ( आठ पल ), शर्करा पचास पल, मरिन्च, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर प्रत्येक आधा पल लेकर इनका चूर्ण इसमे मिला देवे | यह घृत क्षतक्षीण व्यक्तियों के लिये अमृत के समान है । सुधा और अमृत के समान है ', इस घी को खाकर पीछे से दूध और मास रस के साथ अन्न खावे । १ खुवा और अमृत दोनो पर्याय है तथापि इतना विवेक है कि नागों ने-

पृष्ठ 465

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अ ० ११ ] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१ यह अमृतप्राश वृत नष्टशुक्र, क्षतक्षीण, दुर्बल, रोगो से कुश हुए, अति-मैथुनशील, हीनमास, वर्ण, स्वर से हीन व्यक्तियो को पुष्टकरता है । यह ' नृत कास, हित्तकी, ज्वर, श्वास, दाह, प्यास, रक्तपित्त, वमि, मूर्च्छा, हृदय रोग, योनिरोग और मूत्ररोग को नष्ट करता है, यह घृत पुत्रदायक अर्थात् वीर्यवर्धक है ॥ ३५-४३ ॥

श्वदंष्ट्रीशीरमञ्जिष्ठाबलाकामर्यकत्तृणम् ।

दर्भमूलं पृथकपर्णा पलाशर्षभको स्थिराम ॥ ४४ ॥

पलिकान् साधयेत्तेपां रसे क्षीरचतुर्गुणे ।

कल्कैः स्वगुप्ताजीवन्तीमेदर्षभकजीवकैः ॥ ४५ ॥

शतावर्य द्धिमृद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसः ।

प्रस्थः सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्भव ' शूलनुत् ॥ ४६ ॥

मूत्रकृच्छ्रप्रमेहाशः कास शोपक्षयापहः ।

धनुः स्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नाना बलमासदः ॥ ४७ ॥

इति श्वष्ट्रादिघृतम् । ( १६ ( श्वादि घृत - गोखरू, खस, मजीठ, खरैटी, गम्भारी, रोहिषतॄण, मूल, निपणा, ढाक, ऋषभक, शालपणी प्रत्येक एक एक पल लेकर आठ गुणे जल मे पकावे । चतुर्थाश रहने पर इसमे घी से चौगुना दूध मिलावे । कल्कार्थ — कोच, जीवन्ती, मेदा, ऋषभक, जोवक, शतावरी, ऋद्धि, द्राक्षा, शर्करा, श्रावणी ( गोरखमुण्डी ), बिस ( मृणाल ) इनका घी से एक चतुर्थांश कल्क लेकर उसके द्वारा घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । यह घृत वातजन्य आर पित्तजन्य हृदयशूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अर्श, कास, शोष ओर क्षय का नष्ट करता है, वनुप, मार, स्त्री, मद्य, यात्रा से क्षीण व्यक्तियों का बल आर मास देता है ॥ ४४–४७ ॥

मधुकाष्टपलं द्राक्षाप्रस्थक्काथे घृतं पचेत् ।

पिप्पल्यष्टपले कल्के प्रस्थं सिद्धे च शीतले ॥ ४८ ॥

पृथगटपलं क्षोद्रशर्कराभ्यां विमिश्रयेत् ।

समं शक्तु क्षतक्षीणे रक्तगुल्मे च तद्धितम् ॥ ४६ ॥

इति शक्तप्रयोगः । जिसको खाया था वह सुधा और देवों ने जिसका पान किया था वह अमृत कहाया था । नाग और देव दोनो उनको सेवन कर दीर्घजीवी और अमर हुए ऐसी प्रसिद्धि है । इन दोनों के ही तुल्य यह अमृतप्राश घृत समझना चाहिये । चक्र ० १ ' हृद्भव ' इति । २ ' काम ' इति च पाठ. ।

पृष्ठ 466

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४८२ चरकसंहिता [ अ ० ११ ( १७ ) सक्तु प्रयोग - मुलहठी आठ पल, सूखी दाख एक प्रस्थ इनके क्वाथ मे पिप्पली का कल्क आठ पल मिला कर घी का एक प्रस्थ ( १६ पल ) सिद्ध करे । सिद्ध होने पर जब ठण्डा हो जाये तब मधु आठ पल, शर्करा ( खाण्ड ) आठ पल मिलावे । इस घी को सत्तू के समान भाग मे मिला कर खावें । यह घृत क्षतक्षीण और रक्तगुल्म रोगो मे हितकारी है ॥

धात्रीफल विदारीजीवनीयरसाद् घृतात् ।

अपसोचैव सप्त प्रम्थान्पचेद्भिषग् ॥ ५० ॥

सिद्धशीते सिताक्षौद्र द्विग्रस्थं विनयेन्त्ततः ।

यक्ष्मापस्मारपित्तासृक्कासमेहक्षयापहम् ॥ ५१ ॥

वयःस्थापनमायुष्यं मांसशुक्रबलप्रदम् । ( १८ ) आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक ४८-४६ ॥ प्रस्थ, गन्ने का रस एक प्रस्थ, जीवनीय गण का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध एक प्रस्थ, गाय का दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, इन सात वस्तुओ को पकावे । इस त के शीतल होने पर शर्करा एक प्रभ्थ ( १६ पल ) और मधु एक प्रस्थ मिलावे । यह घृत यक्ष्मा, अपम्मार, रक्तपित्त, कास, प्रमेह और क्षय को नष्ट करता है, यौवन को बनाये रखने और बुढापे को दूर करने वाला, आयुर्वर्धक और मास शुक्र तथा बल को बढाता है ॥ ५०-५१ ॥ घृतं तु पित्तेऽभ्यधिके लिह्याद्वातेऽधिके पिबेत् ॥ ५२ ॥

लीढं निर्वापयेत्पित्तमल्पत्वाद्धन्ति नानलम् ।

आक्रामत्यनिलं पीतमूष्माणं निरुणद्धि च ॥ ५३ ॥

( १६ ) पित्त के प्रबल होने पर घी चाटे, वायु के अधिक होने पर घृतका पान करे । पित्त के अधिक होने पर चाटा हुआ घृत पित्त को तो शान्त करता है और मात्रा में थोड़ा होने से जाठर अग्नि का नाश नही करता । वायु के अधिकता मे पिया हुआ घृत स्निग्ध और गुरु होने से वायु को वायु रूक्ष और लघु होता है । बलवान् वायु पक्वाशय से जिस जा रहा हो, उसको शान्त करता है ॥ ५२-५३ ॥

क्षामक्षीणकृशाङ्गानामेतान्येव घृतानि च ।

त्वकक्षी शर्करालाजचूर्णेः स्त्यानानि ' योजयेत् ॥

क्षाम ( क्लान्त शरीर ), क्षीण और कृश अगो - वाले व्यक्तियों १ ' पानानि च पाठः । शमन करता है उष्णिमा को ले ५४ ॥ मे उपरोक्त घृत

पृष्ठ 467

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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८३ VAAN वशलोचन, पिप्पला, लाजा इनके चूणो से गाढा ( घन ) पान बना कर सेवन करावे ॥ ५४ ॥

सर्पिर्गुडान् समभ्वशाञ्जग्ध्वा चानु पयः पिबेत् ।

रेतो वीर्य बलं पुष्टि तैराशुतरमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥

( २० ) सर्पिर्गुड – ( १ ) वालोचन, पिप्पली और लाजा चूर्ण से बने बनाये घृतो को मधु के साथ सेवन करे पीछे से दूध पीव । इस प्रकार करने मे शुक्र, सामर्थ्य, बल और पुष्टि शीघ्र प्राप्त होती हैं ॥ ५५ ॥

बला विदारी हम्बा च पञ्चमूली पुनर्नवा ।

पञ्चाना क्षीरिवृक्षाणा शुद्धा मुख्यशका अपि ॥। ५६ ॥

एषा कषाये द्विक्षीरे विदार्याजरकाशिके ।

जीवनीयैः पचेत्कल्केर क्षमात्रेर्वृताढकम् ॥ ५७ ॥

सितापलानि पूतेऽस्मिन् शीते द्वात्रिशदावपेत् ।

गोधूमपिप्पलीबाशीचूर्ण शृङ्गाटकस्य च ॥ ५८ ॥

सक्षौद्रं कुडवाशेन तत्स खजमूच्छितम् ।

स्त्यानं सर्पिर्गुडान कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ५६

ताञ्जग्ध्वा पलिकान् क्षीरं मद्य चानुपिवेत्कफे ।

शोषे कासे ते क्षीणे श्रमस्त्रीभारकार्पते ॥ ६० ॥

रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि स्थिते ।

शस्ताः पार्श्वशिरःशूले विभेदे स्वरवर्णयोः ॥ ६१ ॥

॥

इति द्वितीयसर्पिर्गुडाः । ( २१ ) सर्पिर्गुड़ ( २ ) –— क्वाथ के लिये खरैटी, विदारीकन्द, लघुपच मूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी व टेरी ओर गोखरू ) पाचो क्षीरी वृक्षो ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, अश्वत्थ ) के नवीन कोमल पत्ते प्रत्येक एक मुष्टि ( पल ) लेकर आठ गुणे जल मे क्वाथ करे । चतुर्थाश रहने पर उतार ले । कषाय से दुगुना दूध, विदारी का स्वरस तथा बकरे का मास रस प्रत्येक कषाय के समान, अथवा एक एक आढक, कल्कार्थ - जीवक, ऋषभक आदि जीवनीय गण की दस ओषधिया प्रत्येक एक एक कर्ष, घृत एक आढ़क ( चार प्रस्थ ) लेकर यथाविधि घृतपाक करे । सिद्ध होने पर छान कर इस घृत मे मिश्री बत्तीस पल, गेहॅू, पिप्पली, वशलोचन, सिंघाड़ा इनमे से प्रत्येक का चूर्ण और शहद प्रत्येक एक एक कुडव ( चार पल ) मिला कर खौचे से भली प्रकार चलावे, जिससे गाढा हो जाये । फिर इनकी एक एक पल की गुटिकाये

पृष्ठ 468

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४८४ चरकसंहिता [ अ ० ११ बाध कर शक्ति बढाने के लिये भूर्जपत्र ( भाजपत्र ) से लपेट दे । इन गुटि-काओ का एक पल परिमित मात्रा मे खाकर, यदि वायु और पित्त की अधिकता हो तो ऊपर से दूध पीवे, कफ की प्रबलता हा तो मन्त्र का अनुपान करे । ये सार्पगुड़ शाप, क्षत, कास क्षीण, श्रम, भार जोर स्त्री- प्रसग से कृश हुए व्यक्तियो के लिये, रक्तवमन, पीनस, उरादाह, पार्श्वशूल, शिर शूल स्वरभेद और विवर्णता मे हितकारी हे ॥ ५६-६१ ॥

त्वकक्षीरीश्रावणीद्राक्षामूर्वषेभकजीवकैः ।

वीरर्धिक्षीरकाकोली बृहतीकपिकच्छुभिः ॥ ६२ ॥

खर्जूरफलमेदाभिः क्षीरपिष्टेः पलोन्मितैः ।

धात्रीविदारीक्षुरसप्रस्थः प्रस्थं घृतात्पचेत् ॥ ६३ ॥

शर्करार्धतुला शीते क्षौद्रार्धप्रस्थमेव च ।

क्षिप्त्वा सर्पिर्गुडान्कुर्यात्कासहिक्काज्वरापहान् ॥ ६४ ॥

यक्ष्माणं तमकं श्वासं रक्तपित्त हलीमकम् ।

शुक्रनिद्राक्षयं तृष्णा हन्युः कार्य सकामलम् ॥ ६५ ॥

इति तृतीयसर्पिर्गुडकाः । सर्पिर्गुड ( ३ ) – वशलोचन, श्रावणी ( गोरखमुण्डी ), द्राक्षा, मूर्वा, जीवक, ऋषभक, वोरा ( पृश्निपर्णी या शतावरी ), ऋद्धि, क्षीरकाकोली, बड़ी कटेरी, कोच, खजूर, मेदा प्रत्येक द्रव्य एक एक पल लेकर दूध के साथ खूब बारीक पास ले 1 । आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का रस एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ लेकर उपराक्त कल्क के साथ घृत सिद्ध करे । घी के शीतल हाने पर शर्करा पचास पल, मधु आठ पल मिला कर घृतपिण्ड बना लेवे | ये घृतपिण्ड कास, हिचकी, ज्वर, यक्ष्मा, तमक श्वास, रक्तपित्त, हलीमक, शुक्रक्षय, निद्राक्षय, तृष्णा, कृशता और कामला का नष्ट करते हे ॥६२-६५ ॥

नवमामलकं द्राक्षा'मात्मगुप्ता पुनर्नवाम् ।

शतावरी विदारी च सभागा पिप्पली तथा ॥ ६६ ॥

पृथग्दशपलान् भागान् पलान्यष्टौ च नागरात् ।

यष्टयाह्नसौवर्चलयोर्द्विपलं मरिचस्य च ॥ ६७ ॥

क्षीरतैलघृताना च त्र्याढकं शर्कराशृते ।

कथिते तानि चूर्णानि दत्त्वा बिल्वसमान् गुडान् ॥ ६८ ॥

कुर्यात्तान्भक्षयेत्क्षीणः क्षतशुष्कञ्च मानवः । १ ' द्राक्षा नवामामलकी ' इति वा पाठ ।

पृष्ठ 469

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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८५ तेन सद्यो रसादीना वृद्ध्या पुष्टि स विन्दति ॥। ६ ९ ॥ इति चतुर्थसपिडकाः । सर्पिर्गुड ( ४ ) –नृतन् आपले, द्राक्षा, कोच, पुनर्नवा, शतावरी, विदारी-कन्द, मजीठ, पिप्पली प्रत्येक द्रव्य दस पल, साठ आठ पत्र, मुलहठी, सुवर्चल ( गचल नमक ) प्रत्येक दो पल, मरिच तो पल इन सब को मिला कर चूर्ण कर ले | फिर दूध, घी और तैल प्रत्येक को एक एक आढक लेकर शर्करा के साथ पकावे । जब गाढा हो जाये तब इससे आनले जादि सब वस्तुओ का चूर्ण मिला कर बिल्व अर्थात् एक एक पल के गुड ( गोले ) बाध ले । यह गुड क्षीण, उर क्षत तथा कृश रोगी को खाने चाहिये । इमसे रसादि की वृद्धि होकर शीघ्र पुष्टि प्राप्त होती है ॥। ६६-६६ ॥ गोक्षीराद्द्द्वयाढक सर्पिः प्रस्थमिक्षुरसाढकम् । विदार्याः स्वरमात्प्रस्थं रसात्प्रस्थ च तेत्तिरात्

दद्यात्सिध्यति तम्मिस्तु पिप्रानिक्षुरसैरिमान् ।

मधूकपुष्पं कुडवं प्रियालकुड तथा ॥ ७१ ॥

कुडवा गाक्षीर्या * खर्जूराणा च विंशतिम् ।

पृथग्विभीतकानां च पिप्प - याश्च चतुर्थिकाम् ॥

त्रिात्पलानि खण्डाश्च मधुकात्कर्षमेव च ।

तथाऽर्धपलिकान्यत्र जीवनीयानि दापयेत् ॥ ७३

॥ ७० ॥

७२ ॥

॥

सिद्धेऽस्मिन्कुडः क्षौद्र शीते क्षिप्त्वाऽथ मोदकान् ।

कारयेन्मरिचाजाजीपलचूर्णावचूर्णितान् ॥ ७४ ॥

वातापित्तरोगेषु क्षतकासक्षयेषु च ।

शुष्यता क्षीणशुक्राणा रक्ते चोरसि सस्थिते ॥ ७५ ॥

कृशदुर्बलवृद्धानां पुष्टिवर्णबलार्थिनाम् । ( १ ) अष्टागसग्रह मे थोडा पाठभेद है । यथा—

' सशर्करा ते क्षीरघृततैलाढकत्रये ।

चूर्णीकृत्य क्षिपेत् पक्वसान्द्रे दशपलाः पृथक् ॥

द्राक्षात्मगुप्ता वर्षाभूसमगा भीरुपिप्पली ।

तद्वद् विदार्यांमलके प्रस्थार्ध विश्वभेपजम् ॥

( क ) ‘ जल्पकल्पतरु ' मे ' समगा ' के स्थान पर ' समाशा' और ' शर्कराश्टते ' के स्थान पर ' शर्कराशते ' पाठ है । २ ' तुगाक्षीर्यार्धकुडवा खजूराणिच विशतिम् ' इति । ३ पृथग् बिभीतकानक्ष. च पाठः ।

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४८६ चरकसंहिता [ अ ० ११ योनिदोषक्षतस्रावहताना चापि योषिताम् ॥ ७६ ॥

गर्भार्थिनीनां गर्भश्व स्त्रवेद् यासा स्त्रियेत वा ।

धन्या बल्या हितास्ताभ्यः शुक्रशोणितवर्धनाः ॥ ७७ ॥

इति सर्पिर्मोदकः । सर्पिर्मोदक - गाय का दूध आवा आढक, घी एक प्रस्थ, गन्ने का रस एक आढक, विदारी का स्वरस एक नस्थ, तीतर का मास रस एक प्रस्थ इन सब को मिला कर पका । जब यह सिद्वहा जाय तब इसमे महुए का फूल चारपल, पियाल चार पल, वशलाचन दो पल, खजूर बास पल, बिभीतक की मजा बीस पल, पिप्पली चार पल, साण्ड ( गुड ) तीस पल, मुलहठी एक कर्ष जीवनीय गण की प्रत्येक आपधि आवा पल लेकर इन सब को गन्ने के रस मे बारीक पीस कर सिद्ध किय घृत में मिला दव । [ अथवा महुए के फूल आदि वस्तुओ को गन्ने के रस मे पीस कर इनका कल्क बनाले, फिर गाय का दूध आदि व-स्तुओ मे इसको मिला कर तपाक विधि से घृत बनाले ] | इस प्रकार से घृत के सिद्धहोने पर मधु एक कुडव, मरिच, अजाजी ( कृष्ण जीरा ) प्रत्येक एक एक पल मिला कर मादक ( लड्डू ) बनवाले | ये मोदक वात रक्त, रक्तपित्त, उरःक्षत, कास, क्षय, छाती मे स्थित रक्त में, शोषरोगी, क्षीणशुक्र, कुश, दुर्बल, वृद्ध, पुष्टि, बल, वर्ण का चाहने वालो के लिये, योनि दोष और रक्तस्राव से पीड़ित स्त्रियो और बन्ध्या स्त्रियो वा जिनका गर्भ गिर जाता या मर जाता हो उनके लिये हितकारी है । ये मोदक धन्य, बलवर्धक, वीर्य और रक्त को बढ़ाते है ॥ ७०–७७ ॥

बस्तिदेशे विकुर्वाणे स्त्रीप्रसक्तस्य मारुते ।

वातघ्नान् बृहणान् बृष्यान् योगास्तस्य प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥

स्त्रीसेवी अतिकामी पुरुष के बस्ति प्रदेश से यदि बायु शूलादि विकार उत्पन्न करे, तब बातनाशक, वृ हण वृष्य योगो का प्रयोग करे ॥ ७८ ॥

शर्करापिप्पलीचूर्णैः सर्पिषा माक्षिकेण वा ।

संयुक्त वा शृतं क्षीरं पिबेत्कासज्वरापहम् ॥ ७६ ॥

( १ ) गरम दूध के साथ शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को अथवा ( २ ) शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को घी वा मधु के साथ लेने से कासज्वर होता है ॥ ७६ ॥

फलाम्लं सर्पिषा भृष्टं विदारीक्षुरसे शृतम् ।

स्त्रीषु क्षीणः पिबेद्यूष जीवनं बृंहणं परम् ॥ ८० ॥