श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 471–480
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 471–480
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अ ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८७ ( २ ) अति मैथुन से क्षीण पुरुष विदारी और गन्ने के रस मे पका कर, घी में भून कर ( घी का बघार देकर ), अनार या आवले से खट्टा करके मुद्रादि यूष पीवे, यह यूत्र अतिशय बृहण ( वृष्य ) है ॥ ८० ॥
शक्तूनां वस्त्रपूताना मन्थं क्षोद्रघृतान्वितम् ।
यवान्नसाम्यो ' दिप्ताग्निः क्षतक्षीणः पिबेन्नरः ॥ ८१ ॥
( ३ ) क्षीण व्यक्ति जिसको जो अनुकूल हो और जिसकी जाठर अनि प्रदीत हा वह जौ के सन्तु को पानी में घोलकर मन्थ बना लेवे । इस मन्थ को कपड़े से छान कर इसमे घी और मधु मिला कर पीवे ॥ ८१ ॥
जीवनीयोपसिद्धं वा घृतभृष्टं तु जाङ्गलम् ।
रसं प्रयोजयेत् क्षीणे व्यञ्जनार्थे सशर्करम् ॥। ८२ ॥
( ४ ) क्षतक्षीण व्यक्ति के व्यजन के लिये जीवक, ऋषभक आदि जीव-नीय गण की ओषधिय । के साथ वी मे भूने जागल पशुआ के मास रस को शर्करा मिला कर देव । [ उसके साथ वे चावल, रोटो आदि खावे ] ॥८२ ॥
गोमहिगाश्वनागाजः क्षीरर्मासरसस्तथा ।
यथानि भोजयेद्यूषैः फलाम्लंघृतसंस्कृतेः ८३ ॥
( ५ ) बैल, मैस, घोड़ा, हाथा और बकरा इनके मास - रस तथा दूधों के साथ अनार, आवले आदि फलो से खड्डा बना कर घी से संस्कृत कर मुद्गादि यूषो के साथ यवान्न खिलावे ॥ ८३ ॥
दीप्तेन विधिरेषः स्यान्मन्दे दीपनपाचनः ।
यक्ष्मणा विहितो ग्राही भिन्ने शकृति चेष्यते ॥ ८४ ॥
क्षतक्षीण व्यक्ति की यदि अग्नि दीत हो तो उपराक्त विधि बरते । अग्निमन्द हाता दीपन पाचन विधि बरते । यदि अतीसार हो तो यक्ष्मा
ग्राही विधि का प्रयोग करे । जैसे ---- -- ॥ ८४ ॥
पलिकं सैन्धवं शुण्ठी द्वे च सोवचलात्पले ।
कुडवाशानि वृक्षाम्लं दाडिम पत्रमर्जकात् ॥ ८५
एकैक मरिचाजाज्योर्धान्यकाद् द्वे चतुर्थिके ।
शर्करायाः पलान्यत्र दश द्वे च प्रदापयेत् ॥ ८६
कृत्वा चूर्णमतो मात्रामन्नपाने प्रयोजयेत् ।
रोचनं दीपनं बल्य पार्श्वार्त्तिश्वासकासनुत् ॥ ८७
रोग मे वर्णित ॥ ॥ ॥ इति सैन्धवादिचूर्णम् । ‘ यावन्नसात्म्यो ' इति । २ ' गोमहिष्यविनागाजैरिति च पाठः ।
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चरकसहिता [ अ ० ११ wwwm ( १ ) सैन्धवादि चूर्ण - सैन्धव एक पल, सोठ दो पल, सचल नमक दो पल, वृक्षाम्ल ( समगदाना या पकी इमली ) चार पल, अनारदाना चार पल, अर्जक ( तुलसी ) पत्र चार पल, मरिच एक पल, अजाजी ( जीरा ) १ पल, धनिया दो पल, गर्करा बारह पल इन सबका चूर्ण करले । फिर अनि के अनु-सार इसकी मात्रा खान - पान में बरते । यह चूर्ण रोचक, जनिदीपक, बलकारक पार्श्वशूल, कास और श्वास रोगो का नाशक है ॥ ८५ ८७ ॥
एका षोडशिका धान्याद् द्वे द्वेऽजाज्यजमोदयोः ।
ताभ्या दाडिमवृक्षाम्लाद् द्विद्विः सौवर्चलात्पलम् ॥ ८८ ॥
शुण्ठ्याः कर्प दधित्थस्य मध्यात्पच पलानि च ।
तचूर्ण षोडशपले शर्कराया विमिश्रयेत् ॥ ८६ ॥
मन्दानले शकृद्भेदे यक्ष्मिणामग्निवर्धनः ।
पाडवोऽयं प्रदेयः स्यादपानेषु पूवित् ॥ ६० ॥
इति षाडवः । ( २ ) षाडव - धनिया, एक पोडशिका ( पल ' ), अजाजी ( जीरा ) दो पल, अजवायन दो पल, अनारदाना चार पल, वृक्षाम्ल चार पल, सौवर्चल ( मन्चल नमक ) एक पल, सोठ एक कर्प, कपित्थ ( कैथ ) की मज्जा पाच पल, इन सब को चूर्ण करके सोलह पल शर्करा मे मिलावे | यह षाडव अग्नि-वर्धक है, मन्दाग्नि और अतिसार मे पूर्व की भाति मात्रानुसार देवे । यह रोचक, दीपक, बलवर्धक और कामनाशक है ॥ ८८-६० ॥
पिवेन्नागबलामूलमर्धकर्षविवर्धनम् ।
पलं क्षीरयुतं मास क्षीरवृत्तिरनन्नभुक् ॥ ६१ ॥
एष प्रयोगः पुष्ट चायुर्बलारोग्यकरः परः ।
मण्डूकपर्ण्याः कल्पोऽयं शुण्ठीमधुकयोस्तथा । ह २ ॥
नागबला मूल की छाल का चूर्ण आवा कर्ष लेकर प्रतिदिन आधा कर्ष बढाते हुए एक पल की मात्रा तक बढा कर सेवन करावे । प्रथम दिन आधा कर्ष, दूसरे दिन एक कर्ष, तीसरे दिन डेढ कर्ष, चौथे दिन दो कर्ष इसी प्रकार से आठवे दिन चार कर्ष या एक पल खावे I । चूर्ण को दूध के साथ सेवन करावे । आठ दिन के पीछे एक पल, मात्रा मे चूर्ण खावे । एक मास तक अन्न न खाकर केवल दूध ही पीना चाहिये, यह प्रयोग श्रेष्ठ है । यह योग पुष्टि, आयु, बल और आरोग्य को देता है । इसी प्रकार से मण्डूकपर्णी, सोठ और मुलहठी की भी नागवला चूर्ण के समान प्रयोगविधि है ॥ ६१-६२ ॥ १ पल मुष्टि. प्रकुचोऽथ चतुर्थिका बिल्व षोडशिका चाम्रमिति ( च ० क ०१२ )
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४८६
यद्यत्संतपणं शीतमविदाहि हितं लघु ।
अन्नपानं निषेव्यं तत्क्षतक्षीणः सुखाथिभिः ॥ ६३ ॥
योक्तं यक्ष्मिणा पथ्यं कासिना रक्तपित्तनाम् ।
तच्च कुर्यादवेक्ष्यामि व्याधि सात्म्यबलं तथा ॥ ६४ ॥
जो जो अन्न सन्तर्पण करने वाला, शीत परन्तु विदाही नही, हितकारी लघु हे वह सब सुखार्थी क्षतक्षीण रोगियों को सेवन करना चाहिये । राजयक्ष्मा के रोगी, कास - रोगी और रक्तपित्त रोगी के लिये जो पृथ्य कहा है. वह सब क्षतक्षीण- रोगी के लिये अमिबल, रोगबल और मात्म्य तथा शरीर का बल देख कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥
उपेक्षिते भवेत्तिस्मिन्ननुबन्धो हि यक्ष्मणः ।
प्रागेवाऽऽगमनात्तस्य तस्मात त्वरया जयेत् ॥ ६५ ॥
क्षतक्षय राग की उपेक्षा करने मे यह यक्ष्मा - रोग का कारण हो जाता है । इसलिये यक्ष्मा रोग के होने से पूर्व ही क्षतक्षीण रोग की चिकित्सा शीघ्र करनी चाहिये ॥ ६ ॥
तत्र लोकौ - क्षतदायसमुत्थान सामान्यपृथगाकृतिम् ।
असाध्ययाप्यसाध्यत्वं साध्याना सिद्धिमेव च ॥ ६६ ॥
उक्तवान ज्येष्ठशिष्याय क्षतक्षीणचिकित्सिते ।
तत्वार्थविद्वीतरजस्तमोमोहः पुनः ॥ ६७ ॥
उपसंहार - अतक्षीण रोग का कारण, सामान्य लक्षण, विशेष लक्षण, साध्य, यान्य, असान्य, साव्य रोग की चिकित्सा ये मव विषय क्षतक्षीण चिकित्सा मे तत्त्वज्ञानी, रज, तम और मोह से रहित भगवान् आत्रेय ने अपने ज्येष्ठ शिष्य अग्निवेश को उपदेश किया ॥ ६६-६७ ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने क्षतक्षीण चिकित्सित नामैकादशोऽव्याय ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः अथातः श्वयथुचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे श्वयथु ( शोथ ) रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ १. ' उपेक्षितो ' इति । २ ' तमोदोषः ' इति च पाठः ।
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४६० चरकसंहिता [ अ ० १२
भिपग्वरिष्ठ सुरद्विजुष्ट मुनीन्द्रमत्र्यात्मजमग्निवेशः ।
महागदस्य श्वयथोर्यथावत्प्रकोप रूपप्रशमानपृच्छत् ॥ ३ ॥
वैद्यो मे श्रेष्ठ, देवा और सिद्वजनो से सेवित, अत्रि के पुत्र मुनिश्रेष्ठ नर्वसु से अग्निवेश ने साथ नामक महाराग के यथावत् प्रकोपक कारण, aar ओर चिकित्सा विषयक प्रश्न किया ॥ ३ ॥
तस्मै जगादागदवेद सिन्धुप्रवतनाद्विप्रवरोऽत्रिजस्तान् ।
वातादिभेदान्त्रिविधस्य सम्यक निजानिजे कागजराजस्य ॥ ४ ॥
अगद ( जाराग्य ) को बतलाने वाले आयुर्वेद रूप महाना हाने वाले श्रेणपर्वत भगवान् आत्रेय ने अनिवेश का निज ( गारगर ) आर नाग-न्तुज, एकागज तथा ननागज शाय तथा वातादि भेद से नेत्र तीन प्रकार के शारीरिक शाथा का उपदेश किया ॥ ४ ॥
शुद्धयामयाभक्तकुरावलानी क्षारा लक्ष्णिोष्णगुरूपसेवा ।
दव्यामपृच्छाफविराविदुष्टारा सृष्टान्ननिषेवण च ॥ ५ ॥
अशान्यचेष्टा न च देहगुद्धिगमोपघातो ' विषमा प्रसूतिः ।
मिथ्योपचारः प्रतिकसणा च निजस्य हेतुः यथाः प्रदिष्टः ॥ ६ ॥
कारण-- शाधन ( वमन आदि कर्म ), आमय ( रागज्वर आदि ), अभक्त ( उपवास ) स कृश हुए और बलसहित पुरुषा का क्षार, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, भारी पदायों का सवन, दहा, आम ( कच्च फल आदि ), मिट्टी, शाक, विरोधी आर दूषित अन्न ( जैसे - मन्दक दही ) ओर गर अथात् विप्रयुक्त भाजन का सेवन, अर्श राग, जचष्टा अथात् शारीरिक व्यायाम आदि क्रिया का न करना, आलस्य मे पडे रहना, शावन योग्य शरीर का शावन न करना, गर्भ का निष्पा-ड़न, विषम प्रसव ( आम - गर्भपात आदि ) और वमन आदि कार्यों का मिथ्या आचरण ये सब शरोरजन्य शाथ के कारण है ॥ ५-६ ॥ बाह्यत्वचो दूपयिताऽभिघातः काष्ठाश्मशस्त्राग्न्यशनीविपाद्यैः । आगन्तुहेतुः । बाह्य त्वचा को दूषित करने वाले, काष्ठ, आग, शल्य ( काटा आदि ) पत्थर,
विप, लोह आदि से अभिघात ( चाट ) लगने से उत्पन्न शोथ आगन्तुज होते है ।
त्रिविधो निजश्च सर्वार्धगात्रावयवाश्रितत्वात् ॥७ ॥
निज शोथके भेदः — निज शोथ तीन प्रकार का होता है । ( १ ) सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त, ( २ ) आधे शरीर मे व्याप्त और ( ३ ) एक अवयव मे व्याप्त ॥ ७ ॥
१ ' मर्मोपधातो ' इति च पाठः । वहा पर मर्मस्थान पर चोट लगना अर्थ करना चाहिये । २ ' श्वयथौ ' इति च पाठ. ।
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१
बाह्याः सिराः प्राप्य यदा कफासृपित्तानि सदूषयतीह वायुः ।
तैर्बद्धमार्गः स तदा विसर्पन्नुत्सेधलिङ्गं श्वयथुं करोति ॥ ८ ॥
सम्प्राप्ति – उपरोक्त कारणो से कुपित वायु जिस समय इस शरीर मे बाह्य सिराओ मे पहुच कर कफ, रक्त और पित्तको दूषित कर देता है, तब दूषित कफ, रक्त और पित्त से मागो के रुक जाने पर वायु इधर - उधर न जाकर, वही पर फैल कर सूजन रूप में शोथ को उत्पन्न कर देता है ॥ ८ ॥
sardaar वायोः स्थानस्थितैर्मध्यगतैश्च मध्ये ।
सर्वाङ्गगैः सर्वगतेः कचित्स्थेदोषः कचित्स्याश्वयथुस्तदाख्यः ॥६ ॥
शाथारम्भक दोष जब श्लेष्मा के स्थान आमाशय में स्थित होते हैं, तब शरीर के ऊपर के भाग में गोग होता है । आर जब वायु के स्थान पक्काशय ने दात्र स्थित होत है, तत्र शरीर के निचले भाग मे शाथ होता है । जब पित के स्थान मे मध्य भाग मे दोष स्थित होते हैं, तब मध्य मे शाथ होता ह " । समस्त शरीर मे व्याप्त दाष समरत शरीर मे शोथ उत्पन्न करते है और शरीर के एक दश ( कण्ठ, तालु आदि ) मे स्थित दोष एक अग मे शोथ करते है ॥ ६ ॥
ऊष्मा तथा स्याद्दवथुः सिराणामायाम इत्येव च पूर्वरूपम् ।
सर्व स्त्रिदोषोऽधिकदोषलिङ्गस्तत्संज्ञमभ्येति भिपग्जित च ॥ १० ॥
पूर्वरूप - अगो मे उष्णिमा, दवथु ( दाह, उपताप ), सिराओं का निस्तार ( तनावा ), ये शोथ रोग के पूर्वरूप है । सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त शोथ सन्निपात-जन्य होता है । इस शाथ मे जो दोष अधिक होता है उसी के नाम से वह कहा जाता है ओर उसी दाष के अनुसार चिकित्सा हाता है । [ वात दोष की अि कता हाने पर वातिक आर पित्त और कफ की अधिकता से पैत्तिक आर श्लैष्मिक कहा जाता है ] ॥ १० ॥
१ मुश्रुत में कहा है--“ दषा. श्वयथुमूर्ध्व हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिता ।
पक्वाशयस्था म ये च वर्च स्थानगतारत्ववः ।
कृत्स्नदेहमनुप्राप्ता. कुर्यु. सर्वसर तथा ॥
आमाशयगत दोष ऊपर की ओर शोथ पैदा करते है, पक्काशयगत दक्षेत्र मध्य मे और मलस्थान मे स्थित दोष नीचे के अगो ने शोथ उत्पन्न करते है । सारे देह मे व्याप्त दोष समस्त देह में शोथ पैदा कर देते हैं ।
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४६२ चरकसंहिता अ ० १२ ~
सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमुष्माऽथ सिरातनुत्वम् ।
' सलोमहर्षाविवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम् ॥ ११ ॥
सामान्य लक्षण – अगो मे भारीपन, सूजन, शोथ की चचलता, अस्थिरता ( वायु के कारण ), सूजन, उष्णिमा और शिराओ का पतलापन, रोमहर्प, अग को विवर्णता ये शोथ के सामान्य लक्षण है ॥ ११ ॥
चलस्तनुस्त्वक्परुषोऽरुणोऽनितः प्रसुप्तिहर्षातियुतोऽनिमित्ततः ।
प्रशाम्यति प्रोनमति प्रपीडितो दिवा बली च श्वयथुः समीरणात् ॥ १२ ॥
वातिक गोथ — वह शोथ अस्थिर धर - उधर चलता रहता है, त्वचा पतली हो जाती है, कर्कश, लाल काला वर्ण, प्रसुति ( स्पर्श की अज्ञता ), हर्ष ( चिनचिन् वेदना या रोमहर्ष ), विना कारण के ही पीडा होना ( कभी दर्द होना और कभी रुक जाना ), दबाने से शोथ शान्त हो जाता है, परन्तु दबाव
हटा लेने पर फिर उठ जाता है, शोथ का जोर दिन के समय अधिक रहता है ।
यह शोथ जल्दी उठता और जल्दी शान्त हो जाता हे ॥ १२ ॥
मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान्भ्रमज्वरस्वेदतृपामदान्वितः ।
य उप्यते स्पर्शरुग ' क्षिरागकृत्सपित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ॥ १३ ॥
पत्तिक शोथ- कोमल, गन्वयुक्त, इसका रंग काला, पीला या लाल होता हे । इसके साथ रोगी मे भ्रम ( चक्कर जाना ), ज्वर, पसीना, प्यास और नूच्छा रहतो है | इसमे तीव्र दाह रहता है, छूने मात्र से दर्द होतो है, आखो मे भो लाली दौड़ जाती है, इस पित्तजन्य शोध मे अतिशय दाह ( जलन ) और पाक होता है ॥ १३ ॥
गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्धकृत् ।
स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ॥ १४ ॥
कफजन्य शोथ - भारी और स्थिर होता है, इस शोथ का रंग भूरा, धूसर रहता है । रागी को अरोचकता, मुख से लाल स्राव, निद्रा, वमन और अग्नि-मान्य होता है । यह सूजन देर मे उत्पन्न होता है और देर मे ही शान्त होता है | दबाने से दब जाता है और फिर ऊपर नही उठना, इसका रात्रि मे बल अधिक होता है ॥ १४ ॥
कृशस्य रोगैरबलस्य यो भवेदुपद्रवैर्वा वमिपूर्वकैर्युतः ।
सहन्ति र्मानुगतोऽथ राजिमान्परिस्रवेद्धीनबलस्य सर्वगः ॥१५ ॥
१ ' स्पर्शस हो ' इति पाठान्तरम् । २ ' महातिमर्मा ' इति पाठान्तरम् ।
३ ' परिस्रवन् भीमबलश्च सर्वशः ' इति च पाठ. ॥।
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम ४६३ असाध्य शोथ - रोगों में कुश हुए, निर्बल व्यक्ति का, वमन, व आदि उपद्रवो से युक्त गाथ और मर्म स्थान का शोथ, जिस शोथ में रेखाये पड गई हो, निर्बल व्यक्ति में जिस शोथ से स्राव बहता हो और जो शोथ सर्वाग मे व्यात हा वह असाध्य है । शोथ के उपद्रव -- वमन, श्वास, अरुचि, तृष्णा, ज्वर, अतीसार गोय के ये सात उपद्रव है ॥ १५ ॥
अहो मासस्य य एकदोपजो नवोऽवलस्तस्य सुखः स माधने ।
निदानदोषर्तुविपर्ययक्रमैरुपाचरेत् त बलदोषकालवित् ॥ १६ ॥
साध्य शोथ - जिसका मास हीन न हो, कृश न हो ऐसे बलवान् व्यक्ति का, शरीर के एक भाग मे उत्पन्न, नवीन शाथ ( जा देर का उत्पन्न न हुआ द्दा ), सुखसाध्य हैं । रोगी और रोग के बल, दोष तथा काल को समझने वाले वैद्य का चाहिये कि वह कारण, दाष, ऋतु ( काल ) के विपरीत क्रम से चिकित्सा करे ॥१३ ॥
अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्बणदोपमादितः ।
झिरोगतं शीर्षविरेचनरधोविरेचनैरूर्ध्व हरेस्तथोजम् ॥ १७ ॥
उपाचरेत् स्नेहकृतं विरूक्षणः प्रकल्पयेत्स्नेहविधि च रूक्षजे ।
विबद्धविकेऽनिलजे निरूहणं घृतं तु पित्तानिलजे सतिक्तकम् ॥ १८ ॥
पयश्च मूर्छारतिदाहतर्षिते विशोधनीये तु समूत्रमिष्यते ।
कफोत्थितं क्षारकटूष्णसंयुतैः समूत्रतत्रासवयुक्तिभिर्जयेत् ॥ १६ ॥
आमजन्य सर्व शरीर मे व्याप्त शोथ से यदि दोष अल्प हो तो लघन और पाचन क्रम से चिकित्सा करे । यदि दोषो की प्रबलता हो तो शोधन द्वारा दोषों को निकाल दे । शिरोगत शोथ मे शीर्ष विरेचन, अवोभाग मे स्थित शोथ मे विरेचन, ऊर्ध्व भाग मे स्थित शोथ में वमन देवे, स्नेहजन्य शोथ में विरूक्षण क्रिया और रूक्षजन्य शोथ मे स्नेहन क्रिया करे । वातजन्य शोथ में मलावरोध हो तो निरूहण- बस्ति दे पित्तजन्य और वातजन्य शोथो मे तिक्तक वृत दे । पित्तजन्य शोथ मे यदि मूर्च्छा, बेचैनी, दाह और प्यास हो तो दूध पीवे । यदि रोगी शोधन के योग्य हो तो दूध को मूत्र के साथ देवे । कफजन्य शोथ मे क्षार, कटु, उष्ण वस्तुओ से मिला कर मूत्र, तक्र ( छाछ ) और आसवो का उप-योग करे || १७ - १६ ॥ १ उपद्रवो के लिये देखिये ( चरक ० सू ० अ ० १८ ) । २ ' रूर्ध्वमधस्तथोर्ध्वगम् ' इति च पाठ ।
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४६४ चरकसंहिता [ अ ० १२ ग्राम्यानूपं पिशितलवणं ' शुष्कशाकं नवान्नं गौड पिष्टं धि तिलकृत विज्जल मद्यमम्लम् । धाना वल्लूरमशनमथो गुर्वसात्म्य विदाहि स्वप्नं रात्रो वयथुगढवान् वर्जयेन्मैथुन च ॥ २० ॥
अपथ्य - शोध रोगी को चाहिये कि ग्राम्य पशुजी ( बकरी, गाय आदि ) वा मास जलचर प्राणियो ओर अनूप स्थान मे रहने वाले मैस, सूअर आदि का मास, नमक, शुष्क शाह, नूतन अन्न, गुड से बनी वस्तुएँ, पिष्टान्न, दाध, कृशरा ( तिल - तण्डुल ), पिच्छिल द्रव्य, मय, अम्ल, धान ( खिले भूने जा ), शुक्क मास, गुरु, अमात्म्य भोजन, विदाहकारक खानपान, दिन में सोना और मैथुन इन सब का परित्याग करे ॥ २० ॥
चिकित्सा --व्योषं त्रिवृत्तितकरोहिणी च सायोरजस्का त्रिफलारसेन ।
पीता कफोत्थं शमयेत् शोकं सूत्रेण गव्येन हरीतकी वा ॥
( १ ) त्रिकटु ( मोठ, मरिच, पिप्पली ), निशोथ, कुटकी लोह भस्म और त्रिफला क्वाथ के साथ पीत्र, अथवा गोमूत्र के से कफजन्य शोथ शान्त होता है ॥ २१ ॥
हरीतकीनागरदेवदारुसुखाम्बुयुक्तं सपुनर्नवं वा ।
२१ ॥
इनके चूर्ण का साथ हरड लेने सर्वं पिबेत् त्रिष्वपि मूत्रयुक्तं स्नातच जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात् ॥ २२ ॥
( २ ) हरड, सांठ, देवदारु और पुनर्नवा इनके चूर्ण को गरम पानी से पीवे । यह योग वात आदि तोनो शाथो मे उपयुक्त है । अथवा इन सब चूर्ण को गोमूत्र के साथ पीवे 1 । औषध के जीर्ण होने पर गरम पानी से स्नान करके दूध के साथ अन्न खावे ॥ २२ ॥
पुनर्नवानागरमुस्तकल्कान्प्रम्थेन धीरः पयसोऽक्षमात्रान् ।
मयूरकं मागधिका समूलां सनागरा वा प्रपिबेत्सवाते ॥ २३ ॥
( ३ ) धीर अर्थात् निवृत्त आम दोष वाला शोथ - रोगी वातजन्य शोथ मे पुनर्नवा, सोठ, मोथा इनके चूर्ण की एक कर्प माना दूध के साथ लेवे । अथवा मयूरक ( अपामार्ग ), माविका ( पिप्पली ), पिप्पलीमूल और सोठ इनके चूर्ण की एक कर्ष- मात्रा को दूध के साथ पीवे ॥ २३ ॥
१ लवण के स्थान पर ' अबलम् ' पाठ भी है । वहॉ पर निर्बल प्राणि का मास त्याज्य समझना चाहिये ।
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम ४६५
दन्तीत्रिवृत्त्र्यूषणचित्रकैर्वा पयः शृतं दोषहरं पिवेन्ना ।
द्विप्रस्थमात्रं च पलार्धिकैस्तैरर्धावशिष्टं पवने सपित्ते ॥ २४ ॥
( ४ ) वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे - दन्ती, निशोथ, सोठ, मरिच, पिप्पली और चीता इनके चूर्ण के साथ दूध पका कर पीवे । दन्ती आदि प्रत्येक का आधा २ पल लेकर दूध दो प्रस्थ पकावे । जब आधा रह जाये तत्र इस दूध को पिये यह दूध दोषनाशक है ॥ २४ ॥
शुण्ठि पीतदुरसं प्रयोज्यं श्यामोरुबूकोपणसाधितं वा ।
त्वग्दारुवर्पाभुमहौषधेवा गुडूचिकानागरदन्तिभिर्वा ॥ २५ ॥
( ५ ) चार योग - ( १ ) साठ, पीतद्रु ( हल्दू ) इनके क्वाथ से साधित दूध । ( २ ) श्यामा ( निशोथ ), एरण्ड इनको मूल और ऊपण ( मरिच ) इनसे साधित । ( १ ) दालचीनी, देवदार ( या दारूहल्दी ), पुनर्नवा और सोठ इनसे साधित दूध । ( ४ ) गिलाय, मोठ और दन्ती इनसे साबित दूध वातजन्य और पित्तजन्य शोथ में पीना चाहिये! प्रत्येक द्रव्य आधा पल, दूध दो प्रस्थ जब आधा रह जाये तन प्रयोग कर ॥ २५ ॥
सप्ताहमोष्ट त्वध्वाऽपि मानं पयः पिबेद्भोजनवारिवर्जी ।
गव्य समूत्र महिपीपयो वा क्षीराशनं सूत्रमथो गवा वा ॥ २६ ॥
( ६ ) मोजन और पानी छोड़ कर सात दिन तक अथवा एक मास तक केवल ऊटनी का दूध पीवे । अथवा गाय का मूत्र और भैस का दूध पीवे अथवा केवल गाय या भैस के दूध वा मूत्र पर ही गुजारा करे ॥ २६ ॥
तक्रं पिबेद्वा गुरुभिन्नवर्चाः सव्योषसौवर्चलमाक्षिकं वा ।
गुडाभया वा गुडनागरां वा सदोपभिन्नामविबद्धवर्चाः ॥ २७ ॥
( ७ ) शोथ रोगी को अतिसार और भारीपन हा तो सोठ, मरिच, पिप्पली, सचल नमक और शहद के साथ तक्र ( मठा ) पीवे । यदि रोगी का दोष के कारण या आम से युक्त मल आता हो ता हरड़ और गुड को समान मात्रा मे अथवा मोठ और गुड को समान भाग मे लेकर ग्वावे ॥ २७ ॥
विड्वातसङ्गे पयसा रसैर्वा प्राग्भुक्तमद्यादुरुबूकतैलम् ।
स्रोतोविबन्धेऽग्निरुचिप्रणाशे मद्यान्यरिष्टाश्च पिबेत्सुजातान् ॥ २८ ॥
( ८ ) यदि वायु और मल का अवरोध हो तो भोजन से पूर्व मास रस या दूब के साथ एरण्ड तैल पीवे 1 । स्रोतो के रुकने पर, जाठराग्नि मन्द और भाजन की इच्छा न हो तो अच्छी प्रकार बने अरिष्टो का पान करे ॥ २८ ॥
गण्डीर भल्लातकचित्रकाच व्योषं विडङ्गं बृहतीद्वयं च ।
द्विप्रस्थिकं गोमयपावकेन द्रोणे पचेत्कूर्चिकमस्तुनस्तु ॥ २६ ॥
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४६६ चरकसंहिता [ अ ० १२
त्रिभागशेष तु सुप्तशीतं द्रोणेन तत्प्राकृतमस्तुना च ।
सितोपलायाश्च शतेन युक्तं लिप्ते घटे चित्रक पिपलीभ्याम् ॥ ३० ॥
वैहायसे स्थापितमादशाहात्प्रयोजयस्तद्विनिहन्ति शोफान् ।
भगन्दराशैः क्रमिकुष्ठमेहान्वे वर्ण्य कायनिलधिनं च ॥ ३१ ॥
इति गण्डीराद्यरिष्टः । ( १ ) गण्डीरारिष्ट – गण्डीर ( रामठ ), भलावा, चित्रक, सोठ, मरिच, पिप्पली, डी आर छोटी कटेरी के फल प्रत्येक दो प्रस्थ काटकर छोटे २ टुकडे कर लेवे । काजी और मस्तु का एक द्रग लेकर उपलो की आग पर पकावे । जब एक तृतीयांश रह जाय तब तन्त्र में कान कर शीतल कर ले | इसमे प्राकृत मस्तु ( दवि मस्तु ) का एक द्रोण और मिश्री १०० पल मिला देवे । फिर चित्रक और पिप्पली का बडे पेलेप करके उ घर मे इसको रख दे । फिर इस घड़े का दन दिन तक खुले आकाश से लटकते हुए छिवे पर रख देवे । पीछे से जब इसमे गन्ध आ जाये तब इस बरते । इस अरिष्ट के प्रयोग में भगन्दर, शाफ अर्ग, कृमि, कुष्ठ, प्रमेह, विवणता, कुगता ओर वातज हिचकी नष्ट होती है ' ॥ २६-३१ ॥
काश्मर्यधात्री मरिचाभयाना द्राक्षाफलाना च सपिप्पलीनाम् ।
शत शतं क्षौद्रगुडात्पुराणात्तुला तु कुम्भे मधुना प्रलिप्ते ॥ ३२ ॥
सप्ताहमुष्णे द्विगुणं तु शीते स्थितं जलद्रोणयुतं पिबेन्ना ।
शोफान्विबन्धान्कफवातजाश्च स हन्त्यरिष्टोऽष्टशतोऽमिव ॥ ३३ ॥
इत्यष्टशतोऽरिष्टः । ( १० ) अष्टशतारिष्ट —– गम्भारी, आवला, मरिच, हरड़, बहेड़ा, द्राक्षा इनके फल और पिप्पली प्रत्येक सो, पुराना क्षुद्रगुड़ ( रा ) १ तुला ( १०० पल ) इनको एक द्रोण पानी मे मिलाकर मधु से लिपे हुए घडे मे डाल कर ग्रीष्म ऋतु मे सात दिनों तक और शीत ऋतु मे १५ दिन तक रख देवे । १ अष्टागसंग्रह मे यही योग भल्लातकारिष्ट के नाम से दिया है उसमे गण्डीर का योग नही है । ' भल्लातकचित्रकविडगबृहतीफलानि पृथग् द्विप्रस्थाशान्यच्छधान्याम्लद्रोणे गोमयाग्निना पक्कमित्यादि । २ ' जीर्णगुड़ा तुलाच सक्षुद्य ' इति पाठः । ३ वाग्भट में — त्रिफलामरिचद्राक्षापिप्पलीकाश्मर्यफलानां प्रत्येक शतं गुड-तुलामुदकद्रोण च मधुलिप्तभाजनस्थ सप्ताहमुष्णे काले धारयेत् ॥ ( अष्टांगसंग्रह, चिकि ० १ ९ ) ।