श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 481–490
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 481–490
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अ ० १२ ] ३२ चिकित्सितस्थानम् ४६७ इसके बन जाने पर इसके पीने से शोफ, कफ और वातजन्य विबन्ध ( कब्ज ) नष्ट होते हैं, तथा यह अष्टशत - अरिष्ट अग्निवर्धक है ॥ ३२-३३ ॥
पुनर्नवे द्वे च बले सपाठे दन्ती गुडूचीमथ चित्रकं च ।
निदिग्धिकां च त्रिपलानि पक्त्वा द्रोणावशेपे सलिले ततस्तम् ॥ ३४ ॥
पूत्वा रसं द्वे च गुडात्पुराणात्तुले मधुप्रस्थयुत सुशीतम् ।
मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं पलो यवाना परतस्तु मासात् ॥ ३५ ॥
चूर्णीकृतैरर्धपलाशिकैस्तं पत्रत्वगेलामरिचाम्बुलोहेः ।
गन्धान्वितं क्षौद्रघृतदिग्धं जीणे पिबेद् व्याधिबलं समीक्ष्य ॥३६ ॥
हृत्पाण्डुरोगं श्वयथुं प्रवृद्धं मीहभ्रमारोचकमेहगुल्मान् ।
भगन्दरं षड्जठराणि कासं श्वासं ग्रहण्यामयकुष्ठकण्डूः ॥ ३७ ॥
शाखानिलं बद्धपुरीषता च हिक्कां किलासं च हलीमकं च ।
क्षिप्रं जयेद् वर्णबलायुरोजस्तेजोन्वितो मासरसान्नभोजी ॥ ३८ ॥
इति पुनर्नवाद्यरिष्टः । ( ११ ) पुनर्नवाद्यरिष्ट - श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा, बला और अति-बला, पाठा, वासा, गिलोय, चीता, छोटी कटेरी ओर आवला, बहेड़ा, हरड़ प्रत्येक तीन पल लेकर चार द्रोण पानी मे क्वाथ करे । एक द्रोण रहने पर इसको छान लेवे । इसमे पुराना गुड़ २०० पल, ठण्डा होने पर मधु ९ प्रस्थ, नाग-केसर, दालचीनी, इलायची, मरिच, बालक और तेजपात प्रत्येक आधा पल मिलाकर, घी और मधु से लिप्त घड़े मे डालकर जौ के ढेर मे एक मास तक दबा कर रख दे | एक मास के पोछे जब गन्ध रसादि उत्पन्न हो जायें तो प्रातः काल ( प्रथम दिन के भोजन जीर्ण होने पर ) पीवे । इसकी मात्रा रोग और बल के अनुसार लेवे । इस अरिष्ट के जीर्ण होने पर मास - रस के साथ अन्न खाने वाले व्यक्ति के हृदयरोग, पाण्डु, शोथ, प्लीहा, ज्वर, अरोचक, प्रमेह, गुल्म, भगन्दर, छ प्रकार के उदररोग, कास, श्वास, ग्रहणी, कुष्ठ, कण्डु, शाखा ( हाथ - पाव ) की वायु, विविबन्ध ( कब्ज ), हिचकी, किलास ( श्वेत कुष्ठ ), हलीमक - रोग शीघ्र नष्ट होते है, रोगी का वर्ण बल, आयु और तेज बढ़ते है ॥ ३४-३८ ॥ फलत्रिकं दीप्यकचित्रकौ च सपिप्पली लोहरजो विडङ्गम् । चूर्णीकृत कौडविकं द्विरंशं क्षौद्रं पुराणस्य तुलां गुडस्य ।
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४ ९ ८ चरकसंहिता [ अ ० १२ मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं यवेषु तानेव निहन्ति रोगान् ॥ ३६ ॥
इति फलत्रिकाद्यरिष्टः । ( १२ ) त्रिफलाद्यरिष्ट — त्रिफला दीप्यक ( अजवायन ), चीता, पिप्पली, लोह भस्म, वायविडंग प्रत्येक द्रव्य १ कुडव ( चार पल ), मधु ८ पल, पुराना गुड १०० पल, पानो एक द्रोण इन सब को घी से भावित घड मे डालकर एक मास तक जो की राशि से रख दे । इन अरिष्ट के बन जाने पर इसको पीवे । [ जीर्ण होने पर पूर्वपत् मास - रस के साथ अन्न भोजन करे ] । यह अरिष्ट भी उपरोक्त रोगो को नष्ट करता है ॥ ३६ ॥
पाण्डुविकारिणा च प्रोक्ताः शुभाः शोफिषु तेऽप्यरिष्टाः ।
कृष्णा सपाठा गजपिपली च निदिग्धिका चित्रकनागरे च ॥ ४० ॥
सपिप्पलीमूलरजन्यजाजी मुस्त च चूर्ण सुसतोयपीतम् । ( १३ ) जो आरेष्ट अर्शरोग और पाण्डुरोग मे कहे हैं, वे सब शोफ रानिय के लिये भी हितकारी है । पिप्पली, पाठा, गजपिप्पली, छाटी कटेरी, चीता, सोठ, पिप्पलीमूल, हल्दी, अजाजी ( जीरा ), मोथा इन सब का चूर्ण करके गरम पानी के साथ पीने से त्रिदोपजन्य और पुरातन शोफ नष्ट होता है ॥ ४० ॥
हन्यात् त्रिदोप चिरज च शोफं कल्कश्च भूनिम्बमहोधस्य ॥ ४१ ॥
अयोरजस्त्र्यूषणयावशूक चूर्ण च पीतं त्रिफलारसेन । ( १४ ) इसी प्रकार चिरायता, सोठ इनका चूर्ण भी गरम पानी के साथ पीने से पुरातन शाफ को नष्ट करता है । लोह भस्म, सोठ, मरिच, पिप्पली, यवक्षार इनका चूर्ण त्रिफला क्वाथ के साथ पीने से त्रिदोषजन्य और पुरातन शोथ नष्ट होता है ॥ ४१- ॥ क्षारद्वयं स्याल्लवणानि चत्वार्ययोरजो व्योपफलत्रिकं च ॥ ४२ ॥
सपिप्पलीमूलविडङ्गसार मुस्ताजमोदामरदारुबिल्वम् ।
कलिङ्गकाश्चित्रकमूलपाठ सयष्टिकं चातिविषं पलाशम् ॥ ४३ ॥
सहि कर्ष तु सुसूक्ष्मचूर्ण द्रोणं तथा मूलकशुण्ठकानाम् ।
स्याद्भस्मनस्तत् सलिलेन साध्यमालोड्य यावद् धनमप्रदग्धम् ॥४४ ॥
स्त्यानं ततः कोलसमां तु मात्रां कृत्वा सुशुष्कां विधिनोपयुंज्यात् ।
सीहोदरश्वित्रहलीमकार्शः पाण्ड्वामयारोचकशोषशोफान् ।
विसूचिकागुल्मगराश्मरीश्च सश्वासकासाः प्रणुदेत् सकुष्ठाः ॥४५ ॥
इति क्षारगुडिका । ( १५ ) क्षार गुड़िका - दो क्षार ( सजीखार और जौखार ), चारों नमक
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६६ ( सैन्धव, सचल, विड् और उद्भिद ), मोठ, मरिच, पिप्पली, हरड बहेडा, आवला, पिप्पली मूल, वायविडंग, तण्डुल, मोथा, अजवायन, देवदारु, बेलगिरी, इन्द्रजौ, चीतामूल, पाठा, मुलहठी, अतीस ये प्रत्येक एक - एक पल, हीग एक कर्ष इन सब का सूक्ष्म चूर्ण करले । शुष्क मूली और सोठ को जलाकर इनकी भस्म एक द्रोण लेकर चार द्रोण पानी मे घाल दे । फिर इसका वस्त्र मे छान कर इनमे उपरोक्त चूर्ण मिलाकर पकावे । जब गाढा हो जाये तव उसकी बेर के बराबर ( दो शाण ६ मापा ) = मात्रा बना ले | शुक होने पर प्रतिदिन मास रस के साथ अन्न को खाते हुए इसका उपयोग करे | इसके उपयोग से प्लीहारोग, उदररोग, श्वित्र, हलीमक, अर्ग, पाण्डुरोग, अरोचक, शोष, शोफ, विसूचिका, गुल्म, गर ( विप ), अश्मरी, श्वास, कास और कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हे । ' ४२–८५ ॥
प्रयोजपेदाकनागर वा तुल्य गुडेनार्धपलाभिवृद्धया ।
मात्रा परं पञ्चपलानि मासं जीर्णे पयो यूपरसान्नभोक्ता ॥ ४६ ॥
गुल्मोदरा थुप्रमेहान् श्वासप्रतिश्याललकाविष्णकान् ।
सकामलान् शोपमनोविकारान् कार्स कफं चैव जयेत्प्रयोगः ॥ २७ ॥
इति गुडाकप्रयोगः । ( १६ ) गुडाईक प्रयाग - आर्द्रक ( अदरक ) और गुड को समान मात्रा मे मिला कर आधे पल की मात्रा से आरम्भ करे । प्रतिदिन आधा पल बढाते हुए उत्कृष्ट मात्रा पाच पल तक लेजा कर इसको एक मास तक बरते । मात्रा के जीर्ण होने पर दूध, मूग, यूष और मास रस के साथ अन्न खावे । इसके प्रयोग से गुल्म, उदर, अर्श, शोथ, प्रमेह, श्वास, प्रतिश्याय, अलसक, अविपाक, कामला, शोष, मानसिक - रोग और कफजन्य कास - रोग नष्ट होता है ॥ ४६-४७ ॥
रसस्तथैवार्द्रकनागरस्य पयोऽथ जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात् ।
शिलाह्वयं I च त्रिफलारसेन हन्यात् त्रिदोषं वयथुं प्रसह्य ॥४८ ॥
इति शिलाजतुप्रयोगः । ( १७ ) शिलाजतु प्रयोग - आर्द्रक के रस मे समान भाग गुड मिलाकर पीवे । इसके जीर्ण होने पर दूध के साथ चावल खावे । त्रिफला क्वाथ के साथ शिलाजित सेवन करने से त्रिदोषजन्य शोथ नष्ट होता है ॥ ४८ ॥
द्विपञ्चमूल्यास्तु पचेत्कषाये कंसोऽभयाना च शतं गुडस्य ।
लेहे सुसिद्धे च विनीय चूर्णं व्योषं त्रिसौगन्ध्यमुषा स्थिते च ॥ ४ ॥
१. ' जत्वमज ' इति च ।
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५०० चरकसंहिता [ अ ० १२
प्रस्थार्धमात्रं मधुनः सुशीते किचिच चूर्णादपि यावशूकात् ।
एकाभया प्राश्य ततश्च लेहाच्छुक्ति निहन्ति श्वयथुं प्रवृद्धम् ॥ ५० ॥
श्वासज्वरारोचकमेहगुल्मसीह त्रिदोपोदर पाण्डुरोगान् ।
कार्यामवातावसृगम्लपित्तं व्वर्ण्यमूत्रानिलशुक्रढोपान ॥ ५१ ॥
इति सहरीतकी । ( १८ ) कस - हरीतकी - दशमूल का क्वाथ एक कस ( आढक ), गुठली रहित हरडे १००, गुड़ १०० पल लेकर पकावे । जब अवलेह सिद्ध हो जाये तो उतार ले ओर इसमे सोठ, मरिच, पिप्पली, दालचीनी, इलायची, तेजपात इनका चूर्ण मिला दे । खूब ठण्डा हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ओर जोखार १ कर्प मिला दे | इसमे से एक हरड खाकर ऊपर से आधा पल अवलेह चाट ले | इसके खाने से अत्यन्त बड़ा हुआ शोथ - रोग, श्वास, ज्वर, अरोचक, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा, सन्निपातजन्य उदर, पाण्डु - रोग, कृशता, आमवात, रक्तपित्त, अम्लपित्त, विवर्णता, मूत्र, वायु और शुक्र रोग नष्ट होते है ' ॥ ४६-५१ ॥
पटोलमूलासुरदारुदन्तीत्रायन्तिपिप्पल्यभयाविशालाः ।
यष्टयाह्वयं तिक्तकरोहिणी च सचन्दना स्यान्निचुलानि दावीं ॥५२ ॥
कर्षोत्थितैस्तैः क्वथितः कषायो घृतेन पेयः कुडवेन युक्तः ।
वीसर्पदाहज्वरसन्निपातांस्तृष्णां विषाणि श्वयथुं निहन्ति ॥ ५३ ॥
इति पटोलमूलादिघृतम् । ( १६ ) पटोलमूलाद्यबूत - पटोलमूल, देवदार, दन्ती, त्रायन्ती ( त्रायमाणा ), पिप्पली, हरड़, विशाला ( इन्द्रायण ), मुलहठी, कुटकी, चन्दन, निचुल ( जलवेतस, समुद्रफल ), दारूहल्दी प्रत्येक द्रव्य एक कर्ष इनको चौबीस पल जल मे क्वाथ करके चतुर्थाश करले । इस क्वाथ मे एक कुडव ( चार पल ) घी मिला कर पीवे | इस प्रकार से बना यह कषाय वीसर्प, दाह, सन्निपात ज्वर, तृष्णा, विष और शोथ को नष्ट करता है ॥ ५२-५३ ॥
सचित्रकं धान्ययवान्यजाजीसौवर्चलं त्र्यूषणवेतसाम्लम् ।
बिल्बात्फलं दाडिमयावशूकौ सपिप्पलीमूलमथोऽपि चव्यम् ॥५४ ॥
पिष्ट्राऽक्षमात्राणि जलाढकेन पक्त्वा घृतप्रस्थमथ प्रयुज्यात् । १ वृद्ध वाग्भट मे
' दशमूलक्काथकसे पथ्याशत गुड़तुलामिश्रमधिश्रयेत् ।
लेहीभूते तत्र त्रिकटुत्रिजातकयवक्षारचूर्ण प्रक्षिपेत् क्षौद्रार्धप्रस्थ च ॥
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०१ AAAAAA अर्शासि गुल्मं श्वयथुं च कृच्छ्रं निहन्ति वह्निच करोति दीप्तम् ॥ ५५ ॥
इति चित्रकादिघृतम् । ( २० ) चित्रकाद्य घृत – यवानिका ( अजवायन ), चीता, धनिया, पाठा, दीपक ( यवानी ), सोठ, मरिच, पिप्पली, अम्लवेतस, बेलगिरी, अनार, यव-क्षार, पिप्पलीमूल, चव्य प्रत्येक द्रव्य को अक्षमात्र ( कर्प प्रमित ) लेकर पीस कर एक आढक जल मे पकावे । चतुर्थाश क्वाथ रहने पर इसमे एक प्रस्थ घी मिला कर सिद्व करे | यह घृत गुल्म, अर्थ, कष्टमा य शोथ को भी नष्ट करता और अग्नि को बढाता हे ' ॥ ५४-५५ ॥
पिबेद् घृतं वाऽष्टगुणाम्बुसिद्ध सचित्रकक्षारमुदारवीर्यम् ।
कल्याणक वाऽपि सपञ्चगव्यं तिक्त महद्वाऽप्यथ तिक्तक वा ॥ २६ ॥
इति चित्रकादिवृतम् । ( २१ ) शोथ - रोगी को चाहिये कि चित्रक और यवक्षार से आठ गुणे पानी मे मिद महावीर्य घृत को पीवे । वह कल्याणक - घृत या अपस्मारोक्त पचगव्य घृत, वा कुष्ठ रोग मे कहे तिक्तघृत या महातिक्त घृत का पान करे ॥ ५६ ॥
क्षीरं घटे चित्रककल्कलिप्ते दध्यागतं साधु विमथ्य तेन ।
तज्जं घृत चित्रकमूलगर्भ नक्रेण सिद्धं श्वयथुत्रमत्रयम् ॥ ५७ ॥
अर्शासि शोफानिल ' गुल्ममेहाश्चैतन्निहन्त्यग्निबलप्रदं च ।
तक्रेण वाद्यात्सघृतेन तेन भोज्यानि सिद्धामथवा यवागूम् ॥ १८ ॥
इति चित्रकघृतम् । ( २२ ) चित्रक- घृत -- एक घडे मे चीते की जड़ की त्वचा को पीस कर लेप करे । जब सूख जाये तब इसमे दूध डाल कर दही जमावे । इस दही को मथानी से मथ कर घुत ( मक्खन ) को पृथक् कर ले | इस घी को चित्रक - मूल की त्वचा के कल्क द्वारा घड़े के अन्दर की छाल के साथ सिद्ध करे | यह सिद्ध घृत अर्श, शोथ, अतिसार, वातजन्य गुल्म प्रमेह को नष्ट करता है, अनि को बढाता है । इस तक्र के साथ या इस घी के साथ अन्न खावे अथवा इस तक्र के साथ सिद्ध यवागू पीवे ॥ ५७-५८ ॥
जीवन्त्यजाजीशटिपुष्कराः सकारवीचित्रकबिल्वमध्यैः ।
सयावशकैर्बदरप्रमाणैर्वृक्षाम्लयुक्ता घृततैलभृष्टाः ॥ ५६ ॥
१ अष्टाग - सग्रह मे – दाड़िमयवानीयवानकधनिक्कापाठाम्लवेतसमरिचपचका-लबिल्वफलयावशूकानक्षमात्रान् सलिलाढके विपाच्य तत्कषायेण घृतप्रस्थ साधयेत्! २ ' अशसि सामानिल ' ' अर्थोतिसारानिल ' इति च पाठौ ।
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५०२ चरकसंहिता [ अ ० १२
अर्शोतिमारानिलगुल्मशोफहृद्रोगमन्दाग्निहिता यवागूः ।
या पञ्चकोलैर्विधिनैव तेन सिद्धा भवेत् सा च समा तयैव ॥ ६० ॥
( २३ ) जीवन्त्यादि - जीवन्ती, अजाजी ( जीरक ), कचूर, पोहकरमूल, कारवी ( अजमोदा ), चित्रक, बेलगिरी, यवक्षार प्रत्येक द्रव्य १ बेर भर ( दो शाण ६ मासा ) वृनाम्ल ( समगदाना ) दो शाण लेकर इनके क्वाथ मे यवागू सिद्ध करे, इसमे घी ओर तैल का छौंक लगावे | यह यवागू अर्श, अतिसार, वात-गुल्म, शोफ हृदयरोग, मन्दानि को नष्ट करती है । इसी प्रकार से दशमूल की प्रत्येक वस्तु दो शाण लेकर इनके क्वाथ में सिद्ध यवागू को घी ओर तैल मे भून कर सेवन करने से अर्श, अतिसार आदि में समान फल होता है ' ॥ ५६-६० ॥
कुलत्थयूषञ्च सपिालीको मौद्गश्च सत्र्यूषणयावशूकः ।
रसस्तथा विष्किरजाङ्गलाना सकूर्मगोवाशिखिशल्लकानाम् ॥ ६१ ॥
( २४ ) दिग्पली काथ या चूर्ण से साधित कुलत्थी का यूष, सोठ, मरिच, पिप्पली ओर जौखार से सिद्ध मूग का यूष ( रम ) और वष्किर ( बटेर आदि पक्षी ) तथा जागल ( हरिण आदि ) पशुओं का मास, कछुआ, गोह, मोर, शल्लक ( भूमि मे रहने वाले ) पशुओ का मास रस, सोठ आदि से संस्कृत करके देवे ॥ ६१ ॥
सुवचिका गृञ्जनकं पटोलं सवायसीमूलकवेत्रनिम्बम् ।
शाकार्थिना शाकमतिप्रशस्तं भोज्ये पुराणश्च यवः सशालिः ॥ ६२ ॥
शाक - सुवर्चला ( हुलहुल ), गुञ्जनक ( ग्याज या गाजर ), परवल, वायसी ( मकोय ), मूली, बेत और नीम ये शोथरोगिया के लिये उत्तम शाक है । भोजन मे पुराने जौ और चावल उत्तम है ॥ ६२ ॥
अभ्यन्तर भेषजमुक्तमेतद् बहिर्हित यच्छृणु तद्यथावत् । इस प्रकार से ये अन्त औषध कह दिये, अब बाह्य औषधों को भली प्रकार सुना-स्नेहान्प्रदेहान्परिषेचनानि स्वेदांश्च वातप्रबलस्य कुर्यात् ॥ ( १ ) यदि वायु की प्रबलता हो तो स्नेहन, प्रदेह, रिपेचन करे || ६३ ॥
शैलेयकुष्ठा गुरुदारुकौन्तीत्वक् पद्मकैलाम्बुपलाशमुस्तैः ।
प्रियङ्गुथौणेयकहेममांसीतालीशपत्र लवपुत्रधान्यैः ॥ ६४ ॥
श्रीवेष्टकध्यामकपिप्पलीभिः स्पृकानखैश्चैव यथोपलाभम् ।
६३ ॥
स्वेदन और १ वृद्ध वाग्भट मे - शटीपुष्करमूलककारवीचित्रकाजाजीजीवन्तीबिल्वमध्यक्षारवृक्षाम्लै-र्दशमूलेन च परीगृहीतानि घृततैलभृष्टानि पेयादीन्यन्यान्यल्पस्नेहलवणान्युपकल्पयेत् ॥
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०३ वातान्वितेऽभ्यङ्गमुषन्ति तैलं सिद्ध सुपिष्टैरपि च प्रदेहम् ॥ ६५ ॥
इति शैलेयादितैलप्रदेहौ । ( २ ) शैलेय आदि तैल और प्रलेप - शैलेय ( शिला रस ), कूठ, अगरु, देवदारू, कौन्ती ( रेणुका ), दालचीनी, पद्माख, इलायची, मोथा, बालक, पलाश, प्रियगु, स्थौणेयक ( ग्रन्थिपर्ण, सुगन्धित द्रव्य ), नागकेसर, जटामासी, तालीशपत्र, कैवर्ह मुस्ता, तेजपत्र, धनिया, श्रीवेष्टक ( धूप ), व्यामक ( गन्ध-तृण ), पिप्पली, स्पृक्का, नख ( व्याघ्रनख ) इन द्रव्यो में से जो भी मिल जायें उनके क्वाथ और कल्क से ( क्वाथ तेल से चतुर्गुण और कल्क चतुर्थाश ) तैल सिद्व करे । इस तैल की वातजन्य शोथ में मालिश करे और इन द्रव्यों को सूक्ष्म पीस कर इनसे प्रलेप करे ॥ ६५ ॥
जलैश्च वासार्ककरञ्जशिका मर्य पचार्ज कजैश्च सिद्धः ।
स्विन्नः कबोष्णं रवितप्ततोयः स्नातच गन्धेरनुलेपनीयः ॥६६ ॥
( ३ ) एरण्ड, बासा, आक, सहजन, गम्भारी, तेजपात, अर्जक ( तुलसी भेद ) इनसे तैयार किने कोसे पानी में अवगाहन करने पर अथवा सूर्य की किरणों से गरम हुए पानी के स्नान करके सस आदि सुगन्धित द्रव्या से लेप करे ॥ ६६ ॥
सवेतसाः क्षीरवता दुमाणा त्वचः समाञ्जिष्टलतामृणालाः ।
सचन्दनाः पद्मकबालकौ च पैत्ते प्रदेहस्तु सतैलपाकः ॥ ६७ ॥
आक्तस्य तेनाम्बु रविप्रतप्त सचन्दनं सामयपद्मकं च ।
स्नाने हितं क्षीरवता कपायः क्षीरोदकं चन्दनलेपनं च ॥ ६८ ॥
( ४ ) पैत्तिक शोथ मे —- वट, गूलर, पीपल, पारस पापल, पिलखन इन दूधवाले वृक्षो को छाले, मजीठ, सारिवा, मृणाल ( बिस ), अम्लवेतस ( या जलवेतस ), चन्दन, पद्माख, खस इनके क्वाथ और कल्क से सिद्ध तैल की मालिश और इनको बारीक पोस कर इनसे प्रलेप करे । शरीर पर तैल की मालिश करके सूर्य की किरणों से गरम पानी मे स्नान करे । अथवा चन्दन, हरड और पद्माख का क्वाथ हितकारी है, या बड, गूलर, पीपल, पारस पीपल इन दूधिया वृक्षो का कषाय श्रेष्ठ है, या दूव मिला पानी स्नान के लिये उत्तम है । स्नान करने पर चन्दन का लेप करे ॥ ६७-६८ ॥
कफे तु कृष्णासिकतापुराणपिण्याकशित्रुत्व गुमाप्रलेपः ।
कुलत्थशुण्ठीजलमूत्र सेकश्चण्डागुरुभ्यामनुलेपनं च ॥ ६६ ॥
( ५ ) कफजन्य शोथ मे पिप्पली, सिकता ( बालू ), पुराण पिण्याक ( तिल की पुरानी खली ), सहजन की छाल, अलसी इनका लेप करे । कुलत्थी
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५०४ चरकसंहिता [ अ ० १२ सोंठ इनके क्वाथ से ओर गोमूत्र से स्नान करे । स्नान करने के पीछे चण्डा ( चोरपुष्पी ), अगरु का लेप करे ॥ ६६ ॥
बिभीतकानां गलमध्यलेपः सर्वेषु दाहार्तिहरः प्रलेपः ।
यष्ट्याहृमुस्तैः सकपित्थपत्रैः सचन्दनैस्तत्पिडकासु लेपः ॥७० ॥
रास्नावृषार्कत्रिफलाविडङ्गशिपुत्वचो मूषिकपर्णिका च ।
निम्बार्जको व्याघ्रनखाः सदूर्वा सुवचेला तिक्तकरोहिणी च ॥७१ ॥
सकाकमाची बृहती सकुष्ठा पुनर्नवा चित्रकनागरे च । उन्मर्दनं शोफिषु मूत्रपिष्ट ( ६ ) वातादि सब प्रकार के करने से दाह मिटता है । शोथजन्य और चन्दन का लेप करे । ( ७ ) शोफ रोगी को — रास्ना, की छाल, मूषिकपर्णी ( पूजीपत्रा ), ( सुगन्धित द्रव्य ), सूर्वा, सुवर्चला कूठ, पुनर्नवा, चीता, मोठ इनमे से शस्तस्तथा मूलकतोयसेकः ॥७२ ॥
दाहो मे बहेडे के फल की मीगी का लेप पिकाओ पर मुलहठी, मोथा, कैथ के पत्ते बासा, आक, त्रिफला, वायविडंग, सहजन नीम, अर्जक ( तुलसी भेद ), व्याघनखा ( हुलहुल ), कुटकी, मकोय, बड़ी कटेरी, जो भी मिल सके उनको गोमूत्र मे पीस कर उबटन करे । मूली के जल से सेचन करे ॥ ७०-७२ ॥
शोफास्तु गात्रावयवाश्रिता ये ते स्थानदूष्याकृतिनामभेदात् ।
अनेकसंख्याः कतिचिच्च तेषां निदर्शनार्थं शृणु चोच्यमानान् ॥७३ ॥
जो शोफ शरीर के भिन्न २ अवयवों मे उत्पन्न होते है, उनका स्थान, दूष्य, आकृति और नाम भेद से अनेक भेद हो जाते है 1 । उनमें से कुछ एक उदाहरण के लिये कहे जाते है उनका सुनो ' ॥ ७३ ॥
दोषास्त्रयः स्वः कुपिता निदानैः कुर्वन्ति शोफं शिरसः सुघोरम् ।
अन्तर्गले घुघुरिकान्वितं च शालूकमुच्छ्रवासनिरोधकारि ॥ ७४ ॥
( १ ) जिस समय वातादि तीनो दाष अपने कारणो से कुपित होकर शिर में भयानक शोथ उत्पन्न करते है और गले के अन्दर घुरघर शब्द उत्पन्न कर ' देते हैं, तब इसका ' शालूक ' कहते है, इस शोथ के कारण श्वास मार्ग रुक जाता है? ॥ ७४ ॥
१ देखिये चरक सूत्रस्थान अ ०१८ मे - विशिष्टा नामरूपाभ्या निर्देश्याः शोथसग्रहे ।
२ सुश्रुत मे— कोलास्थिमात्र. कफसभवो यो ग्रन्थिर्गले कण्टकशूकभूतः ।
खर स्थिर शस्त्रनिपातसाव्य त कण्टशालूकमिति ब्रुवन्ति ॥
कफ - दोष से उत्पन्न जो गॉठ बेर की गुठली के बराबर गले मे कॉटे के
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अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०५
गलस्य सन्धौ चिबुके गले वा सदाहरागः श्वसनासु चोत्रः ।
शोफो भृशार्तिस्तु बिडालिका स्याद्धन्याद् गले चेद्वलयीकृता सा ॥ ७५ ॥
( २ ) बिडालिकाले और मुख की सन्धि में, गले या चिबुक मे जो दाह और रक्तिमा से युक्त शोथ उत्पन्न होता है, जिससे श्वास - प्रश्वास मे भी कठिनाई और अत्यन्त पीड़ा होती है, उसको ' बिडालिका ' कहते है । यदि यह शोथ गले मे कडे के समान सम्पूर्ण गले मे फैल जाय तो रोगी को मार डालती है ' ॥७५ ॥
जिह्वोपरिष्टादुपजिह्विका स्यात् कफादधस्तावधिजिह्निका च । ( ३ ) तीनों दोषों के कारण तालु मे ' तालु विद्रवि ' हो जाती है, इसमे जलन, रक्तिमा और पाक हो जाता है । जिह्वा के ऊपर कफ के कारण ' उप-जिह्विका ' हो जाती है, जिह्वा के नोचे ' अविजिहिका ' हो जाती है २ । यो दन्तमासेषु तु रक्तपित्तात् पाको भवेत् सोपकुशः प्रदिष्टः ॥ ७६ ॥
स्यादन्तविद्रव्यपि दन्तमासे शोफः कफाच्छोणितसंचयोत्थः । ( ४ ) रक्त पित्त के कारण दाँतो के मासो अर्थात् मसूडों से जो पाक हो जाता है उसका नाम ' उपकुश ' है । मसूडो मे भी कफ के कारण रक्त का सचय होने से उत्पन्न शोथ ( सूजन ) को दन्तविद्रधि ' कहते है ॥ ७६ ॥
गलस्य पाश्वं गलगण्ड एकः स्याद् गण्डमाला बहुभिस्तु गण्डेः ॥ ७७ ॥
साध्याः स्मृताः पीनस पार्श्वशूलकासज्वरच्छर्दियुतास्त्वसाध्याः । ( ५ ) गले के बाहर की ओर में एक सूजन हो तो उसे ' गलगण्ड ' कहते हैं, यदि एक से अधिक कई सूजन हो तो उसे ' गण्डमाला ' कहते है । यदि इस गण्डमाला मे पीनस, पार्श्वशूल, कास, ज्वर, छर्दि ये उपद्रव हो तो असाव्य है, अन्यथा साध्य है ॥ ७७ ॥
तेषा सिराकायशिरोविरेका धूमः पुराणस्य घृतस्य पानम् ॥ ७८ ॥
सलङ्घनं वक्त्रभवेषु चापि प्रघर्षण " स्यात् कवलग्रहश्च । समान चुभती है, वह कड़ी और स्थिर हा तो शस्त्रद्वारा चीर कर ठीक होती है उसे ' कण्ठ- शालूक ' कहते है ।
९ बलास एवायतमुन्नत च शोफ करोत्यन्नगति निवार्य ।
त सर्वथैवाप्रतिवार्यवीर्य विवर्जनीय वलय वदन्ति ॥ सुश्रुत ॥
२ यस्य श्लेष्मा प्रकुपिता जिह्वामूलेऽवतिष्ठते ।
आगु सजनयेच्छोफ जायतेऽस्योपजिह्विका ॥
३ गले के अन्दर शोथ होने से गलग्रह होता है । विस्तार के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ ० १८ । ४. ' येषा सिराकायशिरोविरेको ' इति वा पाठ. । ५. ' प्रहर्षण ' इति च ।
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५०६ चरकसंहिता [ अ ० १२ चिकित्सा - गात्र के एक भाग में स्थित शोथो के लिये ( १ ) सिराविरेक ( नाडी से रक्त का निकाल देना ), ( २ ) काय विरेक ( वमन और विरेन्तन ), ( ३ ) शिरो - विरेक ( शिरोविरेचन ), ( ४ ) धूम का प्रयोग, ( ५ ) ओषधि-सावित पुरातन घृत का पान ( शोधन से पूर्व ), ( ६ ) लपन, ( ७ ) औप-धियो के कल्क में प्रघर्पण और सुख जन्य शोथो मे कवलग्रह ( गरारे ) कराने चाहिये || ७८ || अनेकदेशेष्यनिलानिभिः स्यात् स्वरूपधारी स्फुरण मिराभिः ॥ ७६ ॥!
ग्रन्थिर्महान्मासभवन्त्वनार्तिदोभवः त्रिग्धतमश्चलय । ( ६ ) धि - रीर के किसी एक भाग मे वायु आदि दोष मासादि को दूषित करके गोलाकार शोध उत्पन्न कर देते है, इसको ग्रन्थि कहते हैं । इसके प्रथित होने से उसका ग्रन्थि कहते है । इसमे गतादि दोपो के समान के अपने रहते है । मिराजन्य - ग्रन्थि मे स्फुरण / भडकन ) रहती है । मामजन्य - प्रन्थि बहुत बडी तथा अल्प वेदनाशील होती है । मेदोजन्य ग्रन्थि अति स्निग्ध ( चिकनी ) और चल ( हिलने - जुलने वाली होती है ' ) ॥७ ९ ॥ संशोधिते ± स्वेदितमश्मकाष्ठैः साडुष्टदण्डैविलयेट पक्कम् ॥ ८० ॥
१ सुश्रुत में ग्रन्थि के लक्षण और निदान विस्तार से दिये हैं-आयम्यते व्यथत एति तोद प्रत्यस्यते कृत्यत एति भेदम् । कृष्णोऽमृदुर्बस्तिरिवाततश्च भिन्न स्रवेच्चानिलजोऽखमच्छम् ॥
दन्दह्यते धूप्यति चोष्ममास पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः स पीतोऽप्यथवापि पित्ताद् भिन्न स्रवेदुष्णमतीव चास्रम् ॥
शीतो विवर्णोऽल्परुजोऽतिकण्डू पात्राणवत् सहननोपपन्नः ।
चिराभिवृद्धिश्च कफप्रकोपात् भिन्न स्रवेच्छुक्लघन च पूयम् ॥
( क ) दोषैर्दुष्टेऽसृजि ग्रन्थिर्भवेन्मूर्च्छत्सु जन्तुषु ।
सिरामास च संश्रित्य सस्वाप पैत्तलक्षणः ॥
मासलैदूषित मासमाहारैर्ग्रन्थिमावहेत् । स्निग्ध महान्त कठिन सिरानद्ध कफाकृतिम् प्रवृद्ध मेदुरैर्मेंदो नीत मा ेऽथवा त्वचि । वायुना कुरुते ग्रन्थि भृश स्निग्ध मृदु चलम्
श्लेष्मतुल्याकृति देहक्षयवृद्धिक्षयोदयम् ।
स विभिन्नो घन मेदस्ताम्रासितसित स्रवेत् ॥
२ ' त शोधित ' इति । ३. ' विनयेद् ' इति ।
॥
॥
अष्टागसग्रह ३-३४ ।