श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 491–500

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 491 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०७

विपाट्य चोद्धृत्य भिषक् सकोपं ' शस्त्रेण दग्ध्वा व्रणव चिकित्सेत् ।

अदग्ध ईषत् परिशोषितश्च प्रयाति भूयोऽपि शनैर्विवृद्धिम् ॥ ८१ ॥

तस्मादशेषः कुशलैः समन्ताच्छेद्यो भवेद्वीक्ष्य शरीरदेशान् । चिकित्सा - ग्रन्थि रागी पुरुष को वमनादि से गोधन करके अपक्क ग्रन्थि को स्वेदन द्वारा ढीला करके पत्थर, लकडी, अगूठा, दण्डे आदि मे विलीन करना चाहिये और यदि इस प्रकार से शान्त न हो तो शस्त्र से चीरकर सम्पूर्ण कोष ( वास्तु ग्रन्थि ) को निकाल कर अग्नि से जलावे और फिर मधु, वृतादि मे व्रण के समान चिकित्सा करे | यदि ग्रन्थि को जलाया न जाये अथवा इसका कुछ भाग शेष रह जाये ता फिर से यह ग्रन्थि धीरे वीरे बढ जाती है । इसलिये कुशल वैद्यों को चाहिये कि चारो ओर से शरीर भागा को भली प्रकार से देख कर इसका सम्पूर्ण रूप मे छेदन करे जिससे कदी पर कोई भाग शेप न रह जाये ॥ ८०-८१- ॥ शेषे कृते पाकवशेन शीर्येत्ततः क्षतोत्थः प्रसरेद्विसर्पः ॥ ८२ ॥

उपद्रवं तं प्रविचार्य तज्ज्ञः स्पैर्भेपजेः पूर्वतरैयथोक्तः ।

ततः क्रमेणास्य यथाविधानं व्रणं त्रणज्ञस्त्वरया चिकित्सेत् ॥ ८३ ॥

ग्रन्थि के सम्पूर्ण बाहर न निकलने पर यदि कुछ भाग शेष रह जाये और भाग्य से वह पक जावे तब अतजन्य विसर्प ( रोग ) फैलने लगता है । उस समय व्रण के उपद्रव तथा इसकी चिकित्सा को समझने वाला वैद्य भिन्न २ रोग की अपनी २ चिकित्सा अर्थात् विसर्प राग की विसर्प- चिकित्सा ओर ब्रण की व्रण - चिकित्सा प्रारम्भ मे करे | व्रण - चिकित्सा - विधि को जानने वाला वैद्य १ ' सकोप ' इति च पाठ । २ सुश्रुत भ भी कहा है-अमर्मजात शममप्रयातमपक्कमवापहरेद् विदार्थ | दहेत् स्थिते वासृजि सिद्धकर्मा सद्य क्षतोक्त च विधि विदध्यात् ॥

सम्प्राप्ति-व्यायामजातैरबलस्य तैस्तेराक्षिप्य वायुर्हि सिराप्रतानम् ।

सपीड्य सकाच्य विशोर्य चापि ग्रन्थि करात्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥

सु ० नि ० ११ ॥

३ व्रण के सोलह उपद्रव - विसर्प पक्षघातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः ।

मोहोन्मादव्रणरुजो ज्वरस्तृष्णा हनुग्रह ॥

कासछर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथु. ।

षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणाना व्रणचिन्तकै ॥

पृष्ठ 492

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 492 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५०८ चरकसहिता [ अ ० १२ इस व्रणभूत क्षत की शीघ्रता से चिकित्सा करे और औषव द्वारा उपद्रवों मे व्रण को बचावे ॥ ८२-८३ ॥

विवर्जयेत्कुक्ष्युदराश्रितं च तथा गले मर्मणि संश्रितं च ।

स्थूलः खरश्चापि भवेद्विवज्यों यश्चापि बालस्थविराबलानाम् ॥ ८४ ॥

ग्रन्यर्बुदाना च यतोऽविशेषः प्रदेशहेत्वाकृतिदोषदृष्यैः ।

ततश्चिकिमेद्भिर्बुदानि विधानविद् ग्रन्थिचिकित्सितेन ॥ ८५ ॥

असाध्य प्रन्थि — कुक्षि, उदर, गले ओर हृदय आदि मर्म स्थानो मे आश्रित ग्रन्थि की चिकित्सा न करे । जो ग्रन्थि स्थूल और खर हो वह भी त्याज्य है । बालक, वृद्ध, नारी अथवा निर्बल मे उत्पन्न ग्रन्थि भो असाध्य है । क्योकि ग्रन्थि और अर्बुद में प्रदेश ( स्थान ), हेतु ( निदान ), आकृति ( लक्षण ), दोष ( वातादि ), दूष्य ( रक्त, मास और मेद ) की समानता है, इसलिये चिकित्सा विधि को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि ग्रन्थि की विधि मे ही अर्बुद रोग की चिकित्सा करे ' ॥ ८४-८५ ॥

ताम्रा सशूला पिडका भवेद्या सार चालजी नाम परिस्रुताया ।

रोगे ऽक्षतश्चनखान्तरे स्यान्मासास्रदूषी भृशशीघ्रपाकः ॥ ८६ ॥

जिस पिडका का रंग ताम्र के समान हा, जिसमे बहुत वेदना होती हो तथा जिसमे से लसीका ( लस ) का स्राव होता हो उसको ' अलजी ' पिडका कहते हे । त्वचा और नख की सन्धि मे मास और रक्त को दूषित करने वाला ओर अति शीघ्र पकने वाला ' अक्षत ' नाम का शोथ होता है । [ सुश्रुत में भी इसी को ' चिप्य ' नाम से कहा हे " ॥ ८६ ॥

ज्वरान्विता वङ्क्षणकक्षगा या वर्तिर्निरर्तिः कठिनाऽऽयता च ।

विदारिका सा कफमारुताभ्या तेषा यथादोषमुपक्रमः स्यात् ॥ ८७ ॥

१ सुश्रुत ने भी कहा-वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मासेन च मेदसा च ।

तजायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति ॥

२ ' सात्वालजी ' इति । ३ ' शोफेऽक्षत ' इति च पाठः ।

४ अलजी - ददती त्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा ।

विसर्पत्यनिश दुःखा दहत्यग्निरिवालजी ॥

चिप्य - नखमासमधिष्ठाय पित्त वातश्च वेदनाम् ।

करोति दाहपाकौ च त व्याधिं चिप्यमादिशेत् ॥

अक्षत —तदेवाक्षतरोगाख्यं तथोपनखमित्यपि ॥

पृष्ठ 493

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 493 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०६ A ^ N ( ७ ) विदारिका - जो शोथ बत्ती के समान वचण या कक्षा प्रदेश मे उत्पन्न होता है, जिसके कारण रोगी को ज्वर रहता है, शोथ कठिन और फैला रहता है, उसको ' विदारिका ' कहते है । यह कफ और वायु को प्रधानता तथा निर्बल पित्त के कारण उत्पन्न होती है ॥ ८७ ॥

विस्रावणं पिण्डकयोपनाहः पक्केषु चैव व्रणवश्चिकित्सा । इन अलजी आदि पिडकाओ की दोषानुसार शोवनरूप, विस्रावण, रक्त-मोक्षण आदि तथा उपनाह, पिण्ड - स्वेद, या पकने पर व्रण के समान चिकित्सा

करनी चाहिये ।

विस्फोटकाः सर्वशरीरगास्तु स्फोटाः सदाहज्वरतर्षयुक्ताः ॥८८ ॥

विस्फोटक – सम्पूर्ण शरीर मे या एक भाग मे दाह, ज्वर और प्यास से युक्त छाले उत्पन्न हो जाते है, उनको ' विस्फोटक ' कहते है ॥ ८८ ॥

यज्ञोपवीतप्रतिमाः प्रभूताः पित्तानिलाभ्या जनितास्तु २ कक्षाः ।

यश्चापराः स्युः पिडकाः प्रकीर्णाः स्थूलाणुमध्या अपि पित्तजास्ताः ॥ ८६ ।

( ८ ) कक्षा - पित्त और वायु के कारण उत्पन्न बहुत से स्फोट मिल कर जब यज्ञोपवीत के समान हो जाते है, तब इसको ' कक्षा ' कहते है और जो पिड़काये इधर - उधर बिखरी रहती है, तथा कोई स्थूल, कोई सूक्ष्म और कोई मध्यम आकार की होती है, वे सब पित्त प्रकोप से उत्पन्न समझनी चाहिये ॥ ८ ॥

सर्वत्र गात्रेषु मसूरमात्र्यो मसूरिका: पित्तकफात्प्रदिष्टाः ।

विसर्पशान्त्यै विहिताः क्रिया या ता तासु कुष्ठे च हिता विदध्यात् ॥१० ॥

( ६ ) रोमान्तिका – सम्पूर्ण शरीर पर छोटी छोटी पिड़काये हो जाये जिन से रोगी को ज्वर, दाह और प्यास रहे, इन पिड़काओं मे खाज होती हो, रोगी को अरुचि तथा मुख से पानी आता हो तो इनको ' रोमान्तिका ' कहते है ये पित्त और कफ से होती है ( १० ) मसूरिका – सम्पूर्ण शरीर मे मसूर के दाने के समान उत्पन्न पिड-काओ को ' मसूरिका ' कहते है, ये पित्त और कफ से होती है । मसूरिका और रोमान्तिका के लिये विसर्प तथा कुष्ठ रोग मे कथित चि-कित्सा - विधि बरतनी चाहिये ॥ ६० ॥

१. विदारीकन्दवद् वृत्ता कक्षावक्षणसन्धिषु ।

रक्ता विदारिका विद्यात् सर्वजा सर्वलक्षणाम् ॥

२ ' पत्तानिलाल्लाननिभास्तु ' इति च पाठः । ३ विस्फोटक और कक्षा के लिये सुश्रुतनिदान अ ० १३ देखिये ।

पृष्ठ 494

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 494 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१० चरकसंहिता [ अ ० १२

नोऽनिलाद्यैर्वृपणे स्वलिङ्गैरन्त्रं निरेति प्रविशेन्मुहुश्च ।

मूत्रेण पूर्ण मृदु मेदसा तु स्निग्ध व विद्यात्कठिन च शोथम् ॥१ ॥

( ११ ) वृद्धिरोग – वृद्विरोग मात प्रकार का है । जैसे — वातजन्य, पित्त-जन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, मूत्रजन्य, मेदोजन्य और आमजन्य | इनमे दोप-जन्य वृद्धि मे दानों के अपने - अपने लक्ष होते हैं " । अत्रवृद्धि मे आत वृषणो मे उतर आती हे आर दवाने उ फिर चढ जाती है । मूत्रजन्य वृद्धि मे कोम-लता रहता है । मेदजन्यवृद्धि मे वृषण ( अण्डकोश ) का शोथ स्निग्ध और कठिन रहता है || ६१ ॥

विरेचनाभ्यङ्गनिरूलेपाः पक्केषु चैव प्रणवचिकित्सा ।

स्यान्मूत्रसेकः कफजं विपाट्य विशोध्य सीव्यं व्रणवञ्च पक्कम् ॥ २ ॥

वृद्धिजन्य शोथ में यदि आमावस्था ( कचाई ) हो ता पित्तजन्य वृद्धि में विरेचन, वातजन्य मे अभ्यय, निरूह, लेप करना चाहिये और पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये । मूत्रजन्य, मदजन्य और कफजन्य वृद्धि को

आमावस्था मे शस्त्र से चोर कर, दोषों का शावन कर पुन. सी देना चाहिये ।

पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६२ ॥

क्रिमेस्तृणादि क्षणनव्यवायप्रवाहणात्तु त्कटकाश्वपृष्ठैः ।

गुदस्य पार्श्व पिडका भृशातिः पक्रप्रभिन्ना तु भगन्दरः स्यात् ॥६३ ॥

( १२ ) भगन्दर – कृमि ( चिउटी ) आदि के काटने से, तृणादि के क्षणन ( खरेचने ) से, गुदा मैथुन से, वेगपूर्वक प्रवाहन ( कुन्थन ) मे, उत्कट आसन से, घोडे की पीठ पर बैठने से गुदा के एक दो अगुल की दूरी पर जा अति वेदनायुक्त पिडका उत्पन्न होती है और जिसके पकने पर स्राव बहता है, उसको ' भगन्दर ' कहते है ४ ।

१ दानानुसार लक्षण -----वातपूणो दृतिरपशो राजा वातादेिहेतुरुक् ।

पक्कोडुम्बरसकाश. पित्तावाहीष्मपाकवान् ॥

कफाच्छीता गुरु • स्निग्ध ' कण्डूमान् कठिनोऽल्परुक् । सुश्रुत में अवृद्धि का असाध्य बतलाया है । २ ' क्विम्यस्थिसूक्ष्म ' इति । ३ ' प्रवाहनान्यु ' इति च पाठः । ४ ' अपक्का पिडकापक्कास्तु भगदरा । भग दारयतीति भगदरः । ते तु भगगुदबस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरा उच्यन्ते ' । सुश्रुत मे पाच प्रकार के ‘ भगन्दर ' कहे है । अष्टाग - सग्रह मे द्वन्द्वज अधिक मानकर आठ प्रकार के भगन्दर माने गये हैं ।

पृष्ठ 495

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 495 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५११

विरेचन चषणपाटनं च विशुद्धमार्गस्य च तैलदाहः ।

स्यात्क्षारसूत्रेण सुपाचितस्य भिन्नस्य चास्य व्रणव चिकित्सा ॥ ४ ॥

चिकित्सा — विरेचन, ऐषणी से मार्ग पता लगा करके शस्त्र द्वारा विपाटन कर मार्ग शोधन करना चाहिये, फिर गरम तैल से दाह ( सेक ) करना चाहिये | अथवा क्षारसूत्र द्वारा भली प्रकार विदीर्ण करके व्रण की भानि इसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६४ ॥

जङ्घासु पिण्डीप्रपदोपरिष्टात्स्यात् श्रीपदं मासकफास्रदोषान् ।

शिराकफनश्च विधिः समग्रस्तत्रेष्यते सर्वपलेपनं च ॥ ६५ ॥

( १३ ) श्लीपद - जघा और पिण्डलियो मे आश्रित्य मास और रक्त मे स्थित तीव्र कफ दोष, पाव से आकर श्लीपद नामक शोथ को उत्पन्न करता है । यह शोथ मास रक्त और कफजन्य है । इसके लिये शिरामोक्षण और कफनाशक सम्पूर्ण विधि बरतनी चाहिये और सरसो का लेप करना चाहिये ॥ १५ ॥

मन्दास्तु पित्तप्रबलाः प्रदुष्टा ' दोपाः सुतीव्रं ननुरक्तपाकम् ।

कुवन्ति शोथ ज्वरतपेयुक्तं विसर्पिणं जालकगर्दभाख्यम् ॥ ६६ ॥

( १४ ) जालगर्दभ — अपने कारणो से कुपित वातादि दोप, पित्तोल्वण और मन्द वात कफ की अवस्था में अति दाहकारक, अल्प, लालरंग के शोथ को उत्पन्न करते हे, यह शोथ थाडा पकता है । इसके कारण रोगी को ज्वर और प्यास रहता है, यह शोथ विसर्प के समान फैलता है इसको ' जालगर्दभ’कहते है ॥६६ ॥

विलंघनं ' रक्तविमोक्षणं च विरूक्षणं कायविशोधनं ४ च ।

धात्रीप्रयोगाश्छिशिरान् प्रदेहान् कुर्यात्सदा जालकगर्दभस्य ॥ ७ ॥

चिकित्सा — वैद्य को चाहिये कि जालगर्दभ - रोग मे लघन, रक्तमोक्षण, रूक्ष-क्रिया, वमन विरेचन, तथा आवले का स्वरस, कल्कादि रूप मे प्रयोग करे, तथा शीतवीर्य द्रव्यों को बारीक पीसकर उनका लेप करे ॥ ६७ ॥

एवंविधाश्चाप्यपरा परीक्ष्य " शोधप्रकाराननिलादिलिङ्गः ।

शान्ति नयेद्दोषहरैर्यथास्वमालेपनच्छेदनभेददाहैः ॥ ६८ ॥

उपहार - इसी प्रकार यहा पर न कहे शोथ के अन्य भेदों की वायु आदि १ कुपितास्तु दोषा वातपित्तश्लेष्माणोऽध प्रपन्नवक्षणोरुजानुजघास्ववतिष्ठ-माना. कालान्तरेण पादमाश्रित्य शनै शोफभ्रम जनयन्ति । तत् श्लीपदमाचक्षते सु ० नि ० १२ ॥ २ ' प्रदिष्टा ' इति । ३ ' विलेपन ' इति वा पाठः । ४. ' कायविरेचन च ' इति वा पाठः । ५. ' निशम्य ' इति वा पाठः ।

पृष्ठ 496

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 496 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१२ चरकसंहिता [ अ ० १३ दोषो के लक्षणो से पहिचान करके दोषनाशक वमनादि कार्यों द्वारा तथा आलेपन ( आपधिया के लेप ), छेदन ( शस्त्र द्वारा ), भेदन ( पकने पर चीरना ), और दाह - कर्म ( अग्नि और क्षार से जलाना ) से चिकित्सा करना चाहिये ॥ १८ ॥

प्रायोऽभिघातादनिलः सरक्तः शोथ सराग प्रकरोति तत्र ।

' सर्पनुन्मारुतरनुच्च कार्य विषन्न विषजे च कर्म ॥ ६६ ॥

आगन्तुज शाथ – प्राय. अभिघात के कारण कुपित वायु रक्त के साथ मिलकर लाल वर्ण का शाथ उत्पन्न करती है । इसके लिये विसर्पनाशक तथा वातरक्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । विषयुक्त प्राणियों के परिसर्पण, नख, मूत्रादि से जा शाथ उत्पन्न हो, उसमे विपनाशक कार्य करना चाहिये ॥ १६ ॥

भवति चात्र — त्रिविधस्य दोषभेदात्सर्वार्धावयवगात्रभेदाच्च ।

वयथोद्विविधस्य तथा लिङ्गानि चिकित्सित चोक्तम् ॥१०० ॥

उपसहार - वातादि दाष भेद से, सम्पूर्ण आधे और एकदेशीय भेद से तीन प्रकार के तथा शालूक आदि भेद के कारण नाना प्रकार के शोथ के लक्षण, चिकित्सा को इस ' वयथु चिकित्सित ' अध्याय मे भगवान् आत्रेय ने कह दिया है ॥ १०० ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने चिकित्सितनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

10

त्रयोदशोऽध्यायः ।

अथात उदरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे उदर - चिकित्सा रोग की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥

सिद्धविद्याधराकीर्णे कैलासे नन्दनोपमे ।

तप्यमानं तपस्तीव्रं साक्षाद्धममिव स्थितम् ॥ ३ ॥

आयुर्वेदविदां श्रेष्ठं भिषग्विद्याप्रवर्तकम् ।

पुनर्वसुं जितात्मानमग्निवेशोऽब्रवीद्वचः ॥ ४ ॥

सिद्ध और विद्याधर ( देवयोनि ) गण से व्याप्त, नन्दन वन के समान कैलास पर्वत पर कठोर तप करते हुए, साक्षात् धर्म के समान स्थित, आयुर्वेद को जानने वालों मे श्रेष्ठ, मर्त्यलोक मे भिषग - विद्या के प्रवर्त्तक, जितात्मा भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने निवेदन किया ॥ ३-४ ॥

पृष्ठ 497

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 497 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] ३३ चिकित्सितस्थानम्

भगवन्नुदरदुःखैर्दृश्यन्ते ह्यर्दिता नराः ।

शुष्कवक्त्राः कृशैर्गात्रैराध्मातोदरकुक्षयः ॥ ५ ॥

प्रनष्टाग्निबलाहाराः सर्वचेष्टास्वनीश्वराः ।

दीनाः प्रतिक्रियाभावाज्जहतोऽसूननाथवत् ॥ ६ ॥

भगवन् 1 | बहुत से लोग दुखदायी उदर रोगो से पीड़ित सूखे हुए मुख, शरीर निर्बल, पेट और कोख फूले हुए दीखते रोगियो की अग्नि, बल और आहार ( भूख ) नष्ट हो जाते हैं । ५१३ होते हैं, उनके है । इन उदर वे किसी काम को करने मे भी समर्थ नही होते, ये दीन हुए, उचित चिकित्सा न करने पर अनाथों के समान प्राणो को त्याग देते हैं । ५-६ ॥

तेषामायतनं संख्या प्राग्रूपाकृतिभेषजम् ।

यथावज्ज्ञातुमिच्छामि गुरुणा सम्यगीरितम् ॥ ७ ॥

सर्वभूतहितायर्षिः शिष्येणवं प्रचोदितः ।

सर्वभूतहितं वाक्यं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ८ ॥

इन उदर रोगो के कारण, संख्या, प्रारूप ( पूर्वरूप ), आकृति ( रूप ) और भेषज ( औषध ) के विषय मे आपका भली प्रकार उपदेश सुनना चाहता हॅू । अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर सब प्राणियो के लिये आत्रेय ऋषि ने सब प्राणियो को हितकारी वाक्य कहना आरम्भ किया ॥ ७-८ ॥

अग्निदोषान्मनुष्याणा रोगसङ्घाः पृथग्विधाः ।

मलवृद्धचा प्रवर्तन्ते विशेपेणोदराणि तु ॥ ६ ॥

मन्देऽग्नौ मलिनैर्भुक्तैरपाकाद्दोषसंचयः ।

प्राणाग्न्यपानान्संदृष्य मार्गान् रुद्ध्वाऽधरोत्तरान् ॥ १० ॥

त्वङ्मांसान्तरमागत्य कुक्षिमाध्मापयन्भृशम् ।

जनयत्युदरं, तस्य हेतुं शृणु सलक्षणम् ॥ ११ ॥

अनि के मन्द होने से, मल की वृद्धि होने पर मनुष्यों मे नाना प्रकार के रोग समूह उत्पन्न होते है, और उदर राग विशेष रूप से उत्पन्न होते है । अग्नि के मन्द होने पर, अन्न के पचन न होने पर, मलिन, मलकारक अपथ्य आहार के सेवन से दोष सचित होने पर प्राण, अग्नि ( जाठराग्नि ), और अपान वायु को दूषित करके अधर और उत्तर ( ऊपर और नीचे के ) दोनो मार्गों को रोक देते है । यह दोष -समूह त्वचा और मास के बीच मे आकर कुक्षि ( उदर, कोख ) को बहुत अधिक फुला करके उदर रोग को उत्पन्न करते हैं उसके कारण और लक्षणों को सुनो ॥ ६-११ ॥

पृष्ठ 498

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 498 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१४ चरकसंहिता [ अ ० १३ www

अत्युष्ण ' -लवणक्षारविदाम्लगराशनात् ।

मिथ्यासंसर्जनाद्रक्षविरुद्धाशुचिभोजनात् ॥ १२ ॥

महाशग्रहणीदोषकर्पणात्कर्मविभ्रमात् ।

क्लिष्टानामप्रतीकाराद्रौक्ष्याद्वेगविधारणात् ॥ १३ ॥

स्रोतसां दूषणादामात्संक्षोभादतिपूरणात् ।

अर्शोवलिशकृद्रोधादन्त्रस्फुटनभेदनात् ॥ १४ ॥

अतिसंचितदोषाणा पाप कर्म च कुर्वताम् ।

उदराण्युपजायन्ते मन्दानीना विशेषतः ॥ १५ ॥

सामान्य कारण - अति ष्ण, लवण, क्षार, विदाही, अम्ल और सयोगजन्य विष के सेवन से, पेयादि अन्न कर्म के मिथ्या आचरण से, रूक्ष, विरुद्ध और अपवित्र भोजन के करने से, प्लीहा, अर्श ( बवासीर ) ग्रहणी रोग तथा यात्रा और भार आदि से कृश होने पर, वमन आदि कार्यों के मिथ्या आचरण से, रोगों से पीडित होने पर, चिकित्सा न करने पर, रूक्षता से, मल - मूत्र आदि के उपस्थित वेगों के रोकने से, मल और मूत्र के वाहक स्रोतसो के दूपित होने से, आम ( अपक्क आहार ) रस से, यान, वाहन ( सवारी ), आदि के सक्षोभ से, कुक्षि ( पेट ) के बहुत भर लेने ( अति भोजन ) से, अर्श ( बवासीर ) रोग से, बाल आदि को अन्न के माथ खाने से, मार्ग के अवरुद्ध होने पर, शर्करा, तृण आदि द्वारा आतो के फटने या चिर जाने पर, दोषों के बहुत अधिक सञ्चित होने से, ओर पाप कर्म के करने से, विशेष रूप से मन्दाग्नि वाले पुरुषों मे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥१२- १५ ॥

क्षुन्नाशः स्वाद्वतिस्निग्धगुर्वन्नं पच्यते चिरात ।

भुक्तं विदह्यते सर्व जीर्णाजीर्णं न वेत्ति च ॥ १६ ॥

सहते नातिसौहित्यमीषच्छोपश्च पादयोः ।

शश्वद् बलक्षयोऽल्पेऽपि व्यायामे श्वासमृच्छति ॥ १७ ॥

पुरीषनिचयो वृद्धिरुदावर्तकृता च रुक् ।

बस्तिसन्धौ रुगाध्मानं वर्धते पाठ्यतेऽपि च ॥ १८ ॥

आतन्यते च जठरमपि लघ्वल्पभोजनैः ।

राजीजन्म वलीनाश इति लिङ्गं भविष्यताम् ॥ १६ ॥

उदररोग के पूर्वरूप - भूख का नाश, स्वादु ( मधुर ), अतिस्निग्ध और गुरु ( भारी ) अन्न खा लेने पर देर से पचता है । सब प्रकार का अन्न विदाह

१. ' अत्यम्ल ' इति । २ ' अम्लरसा ' इति च पाठः ॥

पृष्ठ 499

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 499 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१५ AWW NAM AAAAA उत्पन्न करता है, रोगी को जीर्ण ( पचा ) या अजीर्ण ( अनपचा ) का ज्ञान नही होता । अनि तृप्तिपूर्वक खाये अन्न को सहन नही करता, पाव पर थोड़ी सूजन हो जाती है । निरन्तर बल का ह्रास होता रहता है, थोडी सी भी मेहनत से श्वास चढ जाता है । मल बढ जाता है और सचित हो जाता है । बस्ति -सन्धि मे उदावर्त्त के कारण वेदना, पेट मे आध्मान ( अफारा ), थोडे से भी भाजन से पेट ऊपर को बढता है, तन जाता है, फटता हुआ प्रतीत होता है, पेट पर नाड़ियो की रेखाये उत्पन्न हो जाती है और पेट की वलिया का नाश हा जाता है, ये उदर रोग के पूर्वरूप है ॥१६ - १६ ॥

रुद्ध्वा स्वेदाम्बुवाहानि दोपाः स्त्रोतांसि संचिताः ।

प्राणाग्न्यपानान् सदृष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥। २० ॥

सचित दोष प्राण वायु अग्नि और अनान वायु को दूपित करके स्वेद और अम्बु ( लसीका ) का ले जाने वाले ( त्वचा और मास के मध्य मे आश्रित ) स्रांतो को रोक कर उदर - राग उत्पन्न करते है ॥ २० ॥

कुक्षेरा मानमाटोपः शोफः पादकरस्य च ।

मन्दोऽग्निः श्लक्ष्णगण्डत्यं कार्य चोदरलक्षणम् ॥ २१ ॥

रूप - पेट मे अफारा और गुडगुडाहट, हाथ और पाव पर सूजन, अग्नि का मन्द होना, गालो पर चिकनापन ( तेल के से पदार्थ का चमकना ), शरीर मे कृशता य उदर रोग के लक्षण हैं ॥ २१ ॥

पृथग्दोषैः समस्तैश्च मीहबद्धक्षतोदकैः ।

संभवन्त्युदराण्यष्टौ तेषा लिङ्गं पृथक शृणु ॥ २२ ॥

उदर रोग आठ प्रकार का होता है । पृथक् पृथक् दाषो से तीन प्रकार का ( १ ) वातिक, ( २ ) पैत्तिक, ( ३ ) लैष्मिक, ( ४ ) सन्निपातजन्य, ( ५ ) प्लीहोदर, ( ६ ) बद्धोदर, ( ७ ) क्षतोदर और ( ८ ) उदकादर । [ इनमे से क्षतोदर को हो अन्य ग्रन्थों मे ' परिस्रावी उदर ' कहा है ] अब इनके पृथक् लक्षण सुनो ॥२२ ॥

रूक्षाल्पभोजनायासवेगोदावर्त कर्शनैः ।

वायुः प्रकुपितः कुक्षिहृद्व स्तिगुदमार्गगः ॥ २३ ॥

हत्वाऽग्नि कफमुद्भूय तेन रुद्धगतिस्तथा । आचिनोत्युदर जन्तोस्त्व मांसान्तरमाश्रितः ॥ २४ ॥ "

१ पूर्वरूप -- बलवर्णकाक्षा बलीविनाशो जठरे च राजयः ।

जीर्णापरिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुज पादगतश्च शोफ. ॥

सु ० नि ० ७ ॥

२ ' प्राणापानान् हि ' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठ 500

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 500 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१६ चरकसंहिता [ अ ० १३ वातादर के कारण - रूक्ष, अन ( हीन मात्रा ) मे भोजन करने से, परि-श्रम से, उपस्थित वेगो का रोकने से, उदावर्त्त से, मुसाफिरी, भार आदि द्वारा कृशता से, वायु कुपित होकर कुक्षि, हृदय बस्ति और गुदा के मार्ग में पहुँच कर अग्नि का नाश करके और कफ को उसके स्थान ( आमाशय ) से लेकर, कफ के कारण माग के रुक जाने से, त्वचा और मास के मव्य मे आश्रित होकर प्राणियों मे उदर रोग का उत्पन्न करती है ॥ २३-२४ ॥ तस्य रूपाणि - कुक्षि - पाणि - पाद - वृषण - श्वयथूदर - विपाटनमनियतौ च वृद्धिहासौ कुक्षि - पार्श्व - शूलोदावर्ताङ्गमर्द - पर्व भेद- शुष्क - कास - कार्य - दौ-बल्यारोचकाविपाका अधोगुरुत्वं वातवचामूत्रसङ्गः श्यावारुणलं च नख - नयन - वदन - त्वड् - मूत्र - वर्चसामपि चोदरं तन्वसित -राजीसिरा-सन्ततमाहत्माध्मा॒तद्यतिशब्दवद्भवति, वायुश्चोर्ध्वमधस्तिर्यक् च सशू-लशब्दश्वरत्येतद्वातोदरं विद्यात् ॥ २५ ॥

वातोदर के लक्षण - - कुक्षि ( कोख ) पाव और अण्डकोशो मे शाथ होना, उदर फटता प्रतीत होना, विना कारण के ही उदर का बढ़ना और घटना, कुक्षि मे शूल, पार्श्वशूल, उदावत, अगो मे वेदना, पर्व - सन्धियों का टूटना, सूखी खासी, शरीर मे कृशता, निबलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, उदर के निचले भाग पेडू में भारीपन,, वायु, मल और मूत्र का अवरोध, नख, आख, मुख, त्वचा, मल और मूत्र का श्याव ( काला ) या अरुण ( लाल ) रग होना, पेट पर पतली काली रेखाये और सिराये दीखना, टकारने पर वायु से भरे, मशक के समान शब्द होना, पेट मे जब वायु ऊपर, नीचे या तिरछी चले तो दर्द और शब्द होना, ये वातोदर के लक्षण हे ॥ २५ ॥

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णाग्न्यातपसेवनैः ।

विदाह्यध्यशनाजीर्णैश्वाशु पित्तं समाचितम् ॥ २६ ॥

प्राप्यानिलकफौ रुद्ध्वा मार्गमुन्मार्गमास्थितम् ।

निहन्त्यामाशये वह्निं जनयत्युदरं ततः ॥ २७ ॥

पित्तोदर के कारण कटु, अम्ल, लवण, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण पदार्थों ' के सेवन से, अग्नि और धूप के सेवन से, विदाहकारक भोजनो से, अजीर्ण से तथा अव्यशन से ( भोजन के ऊपर भोजन करने से ) पित्त शीघ्र सचित हो जाता है । यह सचित पित्त वायु और कफ को साथ मे लेकर इनके द्वारा मार्ग को रोक कर, उन्मार्ग में गमन करके आमाशन मे अग्नि का नाश करता है, इससे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ तस्य रूपाणि – दाह ज्वर- तृष्णा मूर्च्छातीसार - - भ्रमाः कटुकास्यत्वं