श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 501–510
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 501–510
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१७ ^^ AV AA wwwwwww हरितहारिद्रत्वं च नख - नयन - बदन - खड - मूत्र वर्चसामपि चोदरं नील-पीत -हारिद्र - हरित ताम्र - राजी - सिरावनद्धं दह्यते दूष्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यते क्रियते मृदुस्पर्श क्षिप्रपार्क च भवत्येतत् पित्तोदर विद्यात् ॥ २८ ॥
लक्षण – दाह, ज्वर, प्याम, मूच्छा, अतीसार और श्रम, मुख का स्वाद कडुवा हो, नख, आख, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का हा या पीला ( हल्दी के समान ) वर्ण हो, उदर के ऊपर नीली पीली, हल्दी के समान ( गहरी पीली ), ताम्बे के रंग की रेखाऍ और सिराऍ दिखाई दे, जलन हो, तपे, सन्तपित हो, ऊष्मा गरम बाष्प निकलते प्रतीत हा । पसीना आना, क्लिनता प्रतीत हो । स्पर्श मे कामल और शीघ्र पकने के स्वभाव का हो, ये पित्तादर के लक्षण है ॥ २८ ॥
अव्यायामदिवास्वप्नस्वाद्वतिस्निग्धपिच्छिलः ।
दधिदुग्धोदकानूपमाश्चात्युपसेवितैः ॥ २६ ॥
क्रुद्धेन उष्मणा स्रोतः स्वावृते ' ष्वावृतोऽनिलः ।
तमेव पीडयन् कुर्यादुदर बहिरन्तरम् ॥ ३० ॥
कफोदर के कारण - परिश्रम न करने से, दिन मे सोने से, मधुर, अति-स्निग्ध, पिच्छिल भोजनो से, दही, दूध, जलचर तथा आनूप मास के अति सेवन से कुपित हुई मा स्रोतो को गक देती है । स्रोतों के रुकने से उनमे घिरा वायु त्वचा और मास के बीच मे पहुच कर आतो का आश्रय लेकर कफ को ही पीड़ित करके उदर - राग को उत्पन्न कर देता है ॥ २६-३० ॥ तस्य रूपाणि - गोरवारोचकाविपाकाङ्गमर्द - सुप्ति - पाणि - पाद - मुष्को-रु - शोफोत्क्लेश निद्रा - - कास - श्वासाः शुक्लत्वं च नख- नयन - वदन - त्वड-मूत्र - वर्चसामपि चोदरं शुक्लराजीसिरासन्ततं गुरु स्तिमितं स्थिरं कठिनं च भवत्येतच्छूलेष्मोदर विद्यात् ॥ ३१ ॥
उसके लक्षण — मारीपन, भोजन मे अरुचि, अविपाक ( अजीर्ण ), अगो मे वेदना, स्पर्शज्ञान का अभाव, हाथ पाव और अण्डकोशो पर शोथ, जीमच-लाना, नीद का अधिक आना, कास और श्वास, नख, आख, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का श्वेत वर्ण होना, उदर का श्वेत रेखाओ तथा सिराओ मे भरा रहना । पेट भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र मे ढपा सा ) प्रतीत होना, स्थिर और कठिन होना ये कफोदर के लक्षण है ॥ ३१ ॥
दुर्बलाग्नेरपथ्यादिविरोधिगुरुभोजनात् ।
स्त्रीदत्तैश्व रजोरोमविण्मूत्रास्थिनखादिभिः ॥ ३२ ॥
१ ' स्वाहतेष्वा ' इति पाठान्तरम् ।
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५१८ चरकसंहिता [ अ ० १३
विषेश्व मन्देवताद्याः कुपिताः संचितात्रयः ।
शनैः कोष्ठे प्रकुर्वन्तो जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ ३३ ॥
सन्निपातोदर के कारण — दुर्बल अग्नि पाला पुरुष जब अपथ्य ( अहित, अव्यशन या विषमाशन ) आदि सेवन करे या आम ( अपक्क आहार रस ) अथवा विरोधि अन्न या गुरु भोजन का सेवन करे वा दुष्ट स्त्रियो द्वारा दिये रज, रोम, मल, मूत्र, आस्थ, नख आदि से मिले, अन्न को खावे, वा मन्द विषो ( दूषीविष आदि ) से, वातादि तीना दोप कुपित होकर धीरे - धीरे काष्ठ मे सचित होकर उदर रोग को उत्पन्न करते है I ॥ ३२-३३ ॥ तस्य रूपाणि – सर्वेषामेव दोषाणा समस्तानि लिङ्गान्युपल-भ्यन्ते वर्णाश्च नखादिषु, उदरमपि नानावर्णराजीसिरासन्ततं भव-त्येतत्सन्निपातोदरं विद्यात् ॥ ३४ ॥
सन्निपातादर के लक्षण - इस सन्निपातादर मे सब दोषा के मिलित लक्षण मिलते हे । नख, आख, त्वचा आदि में सब दखाई देते है । पेट पर भो नाना प्रकार की रेखाये आर सराये फेलो होती है । इसको सन्निपातोदर कहते है । [ सुश्रुत में इसको दूष्योदर कहा है, यह असाध्य है ] ॥ ३४ ॥
अशितस्यातिसक्षोभाद्यानयानातिचेष्टितैः ।
अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः ॥ ३५ ॥
वामपार्श्वाश्रितः सीहा च्युतः स्थानात्प्रवर्धते ।
शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत् ॥ ३६ ॥ इति ॥
लीहोदर - अति भोजन करने वाले पुरुष मे घोड़ा, गाड़ी की सवारी अथवा अति घूमने के कारण सक्षोभ उत्पन्न होने से, अति मैथुन से भार उठाने, अधिक मुसाफिरी से, वमन से, रोगजन्य कृशता से, बायें पार्श्व में स्थित लाहा अपने स्थान से खिसक कर बढने लगती है । इनकी वृद्धि मे कारण बढे हुए रक्त ओर रस आदि है, जो कि अपने आश्रय को बढ़ाते हैं ॥ ३५-३६ ॥ तस्य सीहा कठिनोष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते,
१ सुश्रुत में कहा है-स्त्रियोऽन्नपान नखरोममूत्रविडार्त्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः ।
यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गराश्च दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद् वा ॥
तेनाशु रक्त कुपिताश्च दोषा कुर्वन्ति घोर जठर त्रिलिंगम् ।
प्रकीर्त्तित दूष्योदरम् ॥ सु ० नि ० ७ वा ॥
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१६ .wwwww स चोपेक्षितः क्रमेण कुक्षि जठरमग्न्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभि-निर्वर्तयति ॥ ३७ ॥
रोगी की प्लीहा ( तिल्ली ) प्रथम कठिन और अष्ठीला ( लोहे का गोला या छोटा पत्थर ) के समान होती है, पीछे से बढ कर कछुए के बराबर हो जाती है । इसकी भी उपेक्षा करने पर प्लीहा धीरे - धीरे बढ कर कुक्षि ( पार्श्व ), उदर, अग्नि के स्थान ( ग्रहणी ) के चारो ओर बढ कर उदर रोग को उत्पन्न करती है ॥ ३७ ॥
तस्य रूपाणि – दौर्बल्यारोचकाविपाक वर्चोमूत्र प्रह- तमः प्रवेश - पिपा साङ्ग - मर्द - च्छर्दि - मूर्च्छाङ्गसाद कास - श्वास - मृदु ज्वरानाहाग्नि- - नाशका-यस्यवैरस्य पर्व भेदाः कोष्ठे वातशूलं चापि चोदरमरुणवर्ण विवर्ण वा नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति । एवमेव यकृदपि दक्षिणपार्श्वस्थं कुर्यात् तुल्य हेतु - लिङ्गौषधत्वात्तस्य सीहजठर एवावरोध इत्येतद्यकृत्मीहोदरं विद्यात् ॥ ३८ ॥
उसके लक्षण – दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, मल और मूत्र का अवरोध, तम. प्रवेश ( ज्ञान का अभाव ), पिपासा ( प्यास ), अगो मे वेदना, वमन, मूर्च्छा, अगो का टूटना, कास, श्वास, थोड़ा ज्वर रहना, आनाह ( अफारा ), अग्निनाश, कृशता, मुख की विरसता ( फीकापन ), पर्वो का टूटना ( वेदना ), कोष्ठ मे वायु और शूल होता है । उदर का रंग लाल या विवर्ण ( प्रकृतिस्थ वर्ण से रहित ) होता है । उदर लाल वा फीके रंग का, उस पर नीली, पीली, हरी रेखाये दीखती है । प्लीहोदर की भाति यकृत् भी दक्षिण पार्श्व मे बढ कर उपरोक्त लक्षणो को उत्पन्न कर सकता है | इसके कारण और लक्षण तथा औषध प्लीहोदर के समान छाने से इसका प्लीहोदर मे ही अन्तभाव हाता है । इसको यकृतोदर जाने, इस प्रकार यकृत् - उदर, प्लीहोदर कह दिये ॥ ३८ ॥
पक्ष्मबालेंः सहान्नेन भुक्तैर्बद्धायने गुदे ।
उदावर्तैस्तथाऽशभिरन्त्रसंमूर्च्छनेन वा ॥ ३६ ॥
अपानो मार्गसंरोधाद्धत्वाऽभि कुपितोऽनिलः ।
वर्चः पित्तकफान् रुद्ध्वा जनयत्युदरं ततः ॥ ४० ॥
बद्धगुदोदर — पलको के बालो को भोजन के साथ खाने से, उदावर्त्त या अर्श - रोग के कारण, पिच्छिलादि अन्न से आतों के मूर्छित होने ( परस्पर चिपक जाने ) के कारण, गुदमार्ग के रुक जाने से अपान वायु मार्ग के न
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५२० चरकसंहिता [ अ ० १३ मिलने के कारण अग्नि का नाश कर देता है, इससे उदर रोग उत्पन्न होता है ' ॥ ३६-४० || तस्य रूपाणि - तृष्णा- दाह ज्वर- मुख - तालु - शोषोरुसाद -कास- श्वास दौर्ब-ल्यारोचकाविपाक- वचो मूत्र - सङ्गाध्मान - च्छदि - क्षवथु - शिरो - हृन्नाभिगुद-शूलान्यपि चोदरं मूढवातं स्थिरमरुण - नील - राजि - सिरावनद्धमराजिकं वा प्रायो नाभ्युपरि गोपुच्छवदभिनितत इत्येतद् बद्धगुदोदर विद्यात् ॥४१ ॥
बद्धगुदोदर के लक्षण – तृष्णा, जलन, ज्वर, मुख और तालु मे शुष्कता, जघाओ मे पोड़ा, कास, श्वास, दुर्बलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, मल और मूत्र का अवरोध आम्मान, वमन, लीक का आना, शिरःशूल, हृदयशूल, नाभिशूल, और गुदा मे वेदना रहती है । पेट मे वायु मूच्छित रहता है, बाहर नही निकलता । पेट कठोर ( कड़ा ), लाल रंग का, नीली रेखाओं और सिराओं से ढका होता है । अथवा उस पर राजि ( रेखाये ) बिलकुल नही होती । यह प्राय. नाभि से ऊपर गोपुच्छाकार होता है इसको ' बद्धगुदाद ' जाने ॥ ४१ ॥
शर्करातृणकाष्ठास्थिकण्टकैरन्नसंयुतैः ।
भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैज़ म्भयाऽत्यशनेन वा ॥ ४२ ॥
इयात्पाकं रसस्तेभ्यश्छिद्रेभ्यः प्रस्रवेद्बहिः ।
पूरयन् गुदमन्त्रं च जनयत्युदर ततः ॥ ४३ ॥।
छिद्रोदर – शर्करा ( बालुका ), तिनके, काष्ठ, अस्थि और काटे इनको अन्न के साथ खाने से, जृम्भा ( जभाई ) से अथवा अति भोजन से भीतर आतें चि जाती है और अन्दर अन्दर पक जाती है । इन पकी आतों से जो रस बाहर निकलता है, वह गुदा, आत्र और उदर मे एकत्र होकर उदर रोगको उत्पन्न कर देता है ॥ ४२-४३ ॥ तस्य रूपाणि - तदधो नाभ्याः प्रायोऽभिनिर्वर्तमानमुदकोदरस्य च यथाबलं च दोषाणा रूपाणि दर्शयत्यपि चाऽऽतुरः स लोहित - नील - पीत-१ सुश्रुत मे — यस्यात्रमन्नमुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा सहितै पृथग्वा । सचीयते तत्र मल. स दोष क्रमेण नाड्यामिव सकरो हि ॥ निरुध्यते तस्य गुदे पुरीष निरेचि कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति यच्चोदर विट्समगन्धिक च ।
प्रच्छर्दयन् बद्धगुदो विभाव्यः ॥ सु ० नि ० ७ ॥
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२१ AAAAAA पिच्छिल - कुणप - गन्ध्यामवर्च उपवेशते । हिक्का श्वास -कास - तृष्णा - प्रमेहारो-चकाविपाक - दौर्बल्य - परीतश्च भवति । एतच्छिद्रोदरं विद्यात् ॥ ४४ ॥
छिद्रोदर के लक्षण -- यह छिद्रोदर प्राय नाभि के नीचे बढ कर शीघ्र ही जलोदर के लक्षणों को प्रकट करता है । छिद्रोदर में दोषो के अनुसार ही लक्षण होते है । रोगी का मल लाल, नीला, पीला, पिच्छिल, मुर्दे की गन्ध के समान कच्चा होता है । रोगी को हिचकी, श्वास, कास, प्यास, प्रमेह, अरुचि, अविपाक और दुर्बलता रहती है इसको ' छिद्रोदर ' जाने ॥ ४४ ॥
स्नेहपीतस्य मन्दाग्नेः क्षीणस्यातिकृशस्य वा ।
अत्यम्बुपानान्नष्टेऽसौ मारुतः क्लोनि संस्थितः ॥ ४५ ॥
स्रोतःसु रुद्धमार्गेषु कफःश्वोदकमूच्छितः ।
वर्धयेता तदेवाम्बु स्वस्थानादुदराय तौ ॥ ४६ ॥
उदकोदर --- मन्दाग्नि वाला व्यक्ति स्नेहपान करले वा क्षीण और अति कृश व्यक्ति की अभि बहुत अधिक पानी पीने से नष्ट हो जाये तो स्रोतो के भागों के बन्द हो जाने पर, कफ और जल से मिश्रित क्लोम में स्थित वायु वही पर पानी को बढा कर अपने स्वाभाविक स्थान से उदर मे लाकर उदर रोग को उत्पन्न करते है || ४५-४६ ॥ तस्य रूपाणि – अनन्नकाङ्क्षा - पिपासा -गुदस्राव - शूल- श्वास - कास-दौर्बल्यान्यपि चोदरं नानावर्णराजिसिरासन्ततमुदकपूर्णदृतिक्षोभसंस्पर्श भवति, एतदुदकोदरं विद्यात् ॥ ४७ ॥
दकोदर के लक्षण --- भोजन की इच्छा न होना, प्यास, गुदा से स्राव बहना, शूल, श्वास, कास और निर्बलता रहती है । उदर पर नाना प्रकार की रेखाये दिखाई देती है | पानी से भरी मशक के समान उदर का स्पर्श होता है । [ एक तरफ टकोरने से तरंग दूसरे पार्श्व मे आती है ] इसको ' दकोदर ' जाने || ४७ ॥ तत्र, अचिरोत्पन्नमनुपद्रवमनुदकमुदर त्वरमाणश्चिकित्सेत् । उपे-क्षिताना ह्येषा दोषाः स्वस्थानादपावृत्ता अपरिपाकाद् द्रवीभूताः सन्धीन् स्रोतासि चोपक्लेदयन्ति, स्वेदश्च बाह्येषु स्रोतःसु प्रतिहतगतिस्तिर्यगव-तिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्याययति ॥ ४८ ॥
कोदर के उत्पन्न होने के साथ ही, छर्दि ( वमन ) अतिसार आदि उप-द्रव उत्पन्न होने और जल भरने से पूर्व ही जल्दी से चिकित्सा करनी चाहिये । चूकि इन रोगियों की उपेक्षा करने से वातादि दोष अपने स्थान से च्युत
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५२२ चरकसंहिता [ अ ० १३ होकर परिपाक के कारण द्रव बनकर सन्धि ओर स्रांतो को क्लिन्न ( आर्द्र ) कर देते है । पसीना भी बाह्य खातो के बन्द होने से बाहर न निकल कर तिरछा अन्दर ही जाकर इस जलको बढाता है । जिससे पिच्छा ( सिम्बल की गांद के समान लेस ) उत्पन्न हो जाती है । पिच्छा उत्पन्न हाने पर पेट गोल, भारी, स्तिमित, तथा टकारने पर कामल शब्द वाला, कोमल स्पर्शयुक्त होता है । रेखाये सब नष्ट हो जाती है, नाभि पर छूने से ही फैलने लगता ( तरंग चल जाती हे " ) ॥ ४८ ॥
तत्र पिछोत्पत्ती मण्डलमुदर गुरु स्तिमितमाकोठित मगब्दं मृदु-स्पर्शमपगतराजीकमाक्रान्तं नाभ्यामेवोपसर्पतीति । ततोऽनन्तरमुदकपा-दुर्भावः । तस्य रूपाणि - कुक्षैरतिमात्रवृद्धिः सिरान्तर्धान - गमनमुदक - पुणे-दृतिसंक्षोभस्पर्शत्व च, तदातुरसुन्द्रवाः स्पृशन्ति छद्यतीसार - तमक - तृष्णा-श्वास - कास - हिका दौर्बल्य - पार्श्व - शूलारुचि स्वर भेद - मूत्रसङ्गादयः, तथा-विधमचिकित्स्यं विद्यादिति ॥ ४६ ॥
पिच्छा के उत्पन्न होने के पीछे उदक ( पानी ) पैदा होता हे । लक्षण – पाश्वो मे बहुत वृद्धि हो जाती है । सिराये नही दीखती । पानी से भरी मशक के समान स्पर्श और मंक्षोभ ( गति ) होता है । इसके आगे रोगी का वमन, अतिसार, तमक श्वास, प्यास, कास, हिचकी, दुर्बलता, पार्श्वशूल, अरुचि, स्वर-भेद, मूत्रावरोध आदि अनेक उपद्रव होने प्रारम्भ हो जाते है, इन उपद्रवो के होने पर रोगी असाव्य हो जाता है । ४६ ॥ इस प्रसङ्ग मे—
भवति चात्र - वातात्पित्तात्कफात्सीह्नः सन्निपातात्तथोदकात् ।
परं परं कृच्छ्रतरमुदरं भिषगादिशेत् ॥ ५० ॥
वैद्य वायु से पित्तजन्य, पित्त से कफजन्य, कफ से प्लीहोदर, लोहोदर से सन्निपातोदर, सन्निपातोदर से दकोदर को कष्टसाध्य समझे ॥ ५० ॥
१ अष्टागसग्रह मे कहा भी है-उपेक्षया च सर्वेषु दोषा स्वस्थानतरच्युता ।
पाकाद् द्रवा द्रवोकुर्युः सन्धीन् स्रोतोमुखान्यपि ॥
स्वेदस्तु बाह्यस्रोतःसु विहतस्तिर्यगास्थित. ।
तदेवोदकमाप्याय पिच्छा कुर्यात्तदा भवेत् ।
गुरूदर स्थिर वृत्तमाहत च सशब्दवत् ॥
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२३ vv
पक्षाद् बद्धगुदं तूर्ध्वं सर्व जातोदकं तथा ।
प्रायो भवत्यभावाय छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ॥। ५१ ॥
बद्धगुदोदर और छिद्रान्त्रोदर दोनो पन्द्रह दिन के पीछे और दकोदर उत्पन्न होने के साथ ही प्राय नाश का कारण होता है । [ दकोदर, छिद्रादर और बद्धगुदोदर ये अनुकूल चिकित्सा से कभी अच्छे भी हो जाते है । चक्र 50 ० ] ५१
शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् ।
बलशोणितमासाग्निपरिक्षीणं च सत्यजेत् ॥ ५२ ॥।
श्वयथुः सर्वममोत्थः श्वासो हिच्काऽरुचिः सतृट् ।
मूर्च्छा छतिसारो च निहन्त्युदरिण नरम् ॥ ५३ ॥
असाध्य रोगी - जिस रोगी को आखे सूज जाये इन्द्रिय ( लिङ्ग ) कुटिल ( टेड़ा ) हो जाये, रागी की त्वचा किन्न ( विकासयुक्त ) और पतली हा, बल, रक्त, मास जोर अनि क्षीण हो जाये, ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे । यदि हृदय आदि सब मर्म स्थानो पर गोथ हो जाये, रोगी को श्वास, हिचकी और मूर्च्छा, अरुचि, वमन तथा अतिसार हो उस रोगी को उदर रोग मार ही देता है । वैद्य उसको असाध्य समझे और छोड दे ॥ ५२-५३ ॥
जन्मनैवोदरं सर्व प्रायः कृच्छ्रतमं मतम् ।
बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम् ॥ ५४ ॥
प्राय सब उदर- राग उत्पन्न होने के साथ ही कष्टसाध्य होते है । यदि रोगी बलवान् हो तो पानी उत्पन्न हाने के पूर्व ही तथा राग नया हो तो यत्नपूर्वक चिकित्सा करने मे साध्य है ॥ ५४ ॥
अशोथमरुणाभासं सशब्दं नातिभारिकम् ।
सदा गुडगुडायन्तं सिराजालगवाक्षितम् ॥ ५५ ॥
नाभि विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति ।
हृन्नाभिवंक्षणकटीगुदप्रत्येकशूलिनः ॥ ५६ ॥
कर्कशं सृजतो बात नातिमन्दे च पावके ।
लालया विरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विषि ॥ ५७ ॥
अजातोदकमित्येतैर्लिङ्गविज्ञाय तत्त्वतः ।
उपक्रमेद्भिषग्दोषबलकालविशेषवित् ॥ ५८ ॥
अजातोदक के लक्षण- उदर मे गोथ न हो, लाल वर्ण हलका सा दीखे, शब्द युक्त हा, बहुत अधिक भारीपन न हो, सदा गुडगुड शब्द आता हो, सिरा जाल दिखाई देता हो, वायु नाभि और आतो मे वेग करके छिप जाती हो, हृदय, नाभि, वक्षण, कटि, गुदा मे शूल रहता हो, कर्कश वायु बाहर
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५२४ चरकसंहिता [ अ ० १३ आती हो ( रुक - रुक कर या अपान वायु बाहर आये ), अनि बहुत मन्द न हो, सब रसो के खाने की इच्छा ( लालन ) हो, मुख मे विरसता न हो, मूत्र थोड़ा और मल बधा हुआ हो तो इन लक्षणो से पानी उत्पन्न नही हुआ, ऐसा जानकर दोष, बल, काल को समझनेवाला वैद्य इसकी चिकित्सा आरम्भ करे ॥ १८ ॥
बातोदरं बलवतः पूर्वं पाचरेत् ।
स्निग्धाय स्वेदिताङ्गाय दद्यात्स्नेहविरेचनम् ॥ ५६ ॥
हृते दोषे परिग्लानं वेष्टयेद्वाससोदरम् ।
तथाऽस्यानवकाशत्वाद्वायुर्ना ss ध्मापयेत्पुनः ॥ ६० ॥
दोषातिमात्रोपचयात्त्रोतसा सन्निरोधनात् ।
संभवन्त्युदराण्येवमतो नित्यं विशोधयेत् ॥ ६१ ॥
वातोदर की चिकित्सा —— यदि रोगी बलवान् ( शोधन के योग्य हो ) ता प्रथम स्नेहन करना चाहिये । स्निग्ध तथा स्वेदन होने पर पीछे से स्नेहयुक्त विरेचन देना चाहिये | विरेचन द्वारा दोष के निकल जाने से क्षीण उदर को कपडे से लपेट देना चाहिये । इस प्रकार बाधने से वायु को जगह नही मिलती, जिससे कि पुन आध्मान ( फुलाव ) नही कर सकती । शरीर मे दोषो के अति-मात्र सचित होने से खातो का निरोध होता है, इसलिये उदर रोगी को प्रतिदिन विरेचन देना चाहिये ॥ ५६-६१ ॥
शुद्धं संसृज्य च क्षीरं बलार्थ पाययेत्तु तम् ।
प्रागुत्क्लेशान्निवर्त्य च बले लब्धे क्रमात्पय ॥ ६२ ॥
शुद्ध होने पर पेयादि क्रम पर रख कर बल के लिये रोगी को दूध पिलाना चाहिये । उत्क्लेश ( कफ - सचय ) के हाने से पूर्व बल प्राप्त होने पर धीरे - धीरे दूध बन्द कर देना चाहिये ॥ ६२ ॥
यू रसैर्वा मन्दाम्ललवणैरेधितानलम् ।
सोदावर्त पुनः स्निग्ध स्विन्नमास्थापयेन्नरम् ॥ ६३ ॥
अल्प अम्ल और लवण से साधित मूग आदि के यूषो से अथवा मास रसो से रोगी की अग्नि को बढ़ाना चाहिये । यदि रोगी को फिर से उदावर्त्त हो जाये तो स्नेहन और स्वेदन कार्य करके आस्थापन बस्ति देनी चाहिये ॥ ६३ ॥
स्फुरणाक्षेपसन्ध्यस्थिपार्श्वपृष्ठत्रिकार्तिषु ।
दीप्ताग्नि बद्धविवातं रूक्षमप्यनुवासयेत् ॥ ६४ ॥
रोगी की सन्धि और अस्थियो में स्फुरण और आक्षेप हा, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल तथा कटिशूल हो, अनि प्रदीप्त हो, मल और वायु का अवरोधो, रोगी रूक्ष हो तो अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥ ६४ ॥
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२५
तीक्ष्णाधोभागयुक्तः स्यान्निरूहो दाशमूलिकः ।
वातन्नाम्लशृतैरण्डतिलतैलानुवासनः ॥ ६५ ॥
तीक्ष्ण और अधो - दोष नाशक द्रव्यों से युक्त दशमूल के काथ से उदर-रोगी को निरूह और आस्थापन देना चाहिये । वातनाशक अम्ल द्रव्यो से एरण्ड तैल और तिल - तैल पकाकर इनसे अनुवासन देना चाहिये ॥ ६५ ॥
अविरेच्य तु यं विद्याद् दुर्बलं स्थविर शिशुम् ।
सुकुमारं प्रकृत्याऽल्पदोप वाऽथोल्बणानिलम् ॥ ६६ ॥
त भिषक् शमनेः सपथूपमा सरसौदनैः ।
बस्त्यभ्यङ्गानुयासश्च क्षीरैश्चोपाचरेद् बुधः ॥ ६७ ॥
जो रोगी निर्बल, वृद्व, बालक, कोमल प्रकृति, अल्पदोप, प्रबलवायु होने से विरेचन के अयोग्य हो, उसकी घी, यूप, मास रस, रसौदन ( मास रस से सिद्ध चावल ) से, बस्ति, अभ्यग, अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६६–६७ ॥
पित्तोदरे तु बलिनं पूर्वमेव विरेचयेत् ।
दुर्बलं त्वनुवास्याऽऽदौ शोधयेत् क्षीरबस्तिना ॥ ६८ ॥
संजातबलकायानि पुनः स्निग्धं विरेचयेत् ।
पयसा सत्रिवृत्कल्केनोरुबूकभृतेन वा ॥ ६६ ॥
सातलात्रायमाणाभ्या श्रुतेनाऽऽरग्वधेन वा । पित्तोदर की चिकित्सा - यदि रोगी बलवान् हो ता रोग के प्रारम्भ मे प्रथम विरेचन देना चाहिये । रोगी निर्बल हा तो प्रथम अनुवासन देकर पीछे सेक्षी बस्ति द्वारा शोधन करना चाहिये । रोगी मे बल आने पर तथा अग्नि के प्रदीप्त होने पर पुनः रोगी को स्निग्ध करके विरेचन देना चाहिये । इसके लिय निशांथ के कल्क से अथवा एरण्ड के कल्क ( या तैल ) से या सातला और त्रायमाणा के कल्क द्वारा अथवा अमलतास के साथ दूध पका कर देना चाहिये ॥ ६६- ॥ सकफे वा समूत्रेण सवाते तिक्तसर्पिषा ॥ ७० ॥
पुनःक्षीरप्रयोगं च बस्तिकर्म विरेचनम् ।
क्रमेण ध्रुवमातिष्ठन् युक्तः पित्तोदरं जयेत् ॥ ७१ ॥
पित्तोदर मे यदि पित्त के साथ कफ मिश्रित हो तो मूत्रयुक्त दूध से, वायु का मिश्रण होने पर तिक्त घृत मिश्रित दूध से विरेचन देना चाहिये । इस प्रकार आनुपूर्व कर्म द्वारा बार - बार क्षीर प्रयोग से विरेचन और बस्ति कर्म करने पर निश्चित रूप से रोगी का पित्तोदर शान्त हो जाता है ' ॥ ७०-७१ ॥ १ अष्टागसग्रह मे कहा है-सजातबलानिं च पुन. क्षीरेण सत्रिवृत्कल्केन, ऊरूबकश्वतेन, सातलात्राय-माणाभ्यां वा, आरग्वधेन वा सश्लेष्मणि पित्ते समूत्रेण पयसा पुन: पुन विरेचयेत् ॥
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५२६ चरकसंहिता [ अ ० १३
स्निग्धं स्विन्नं विशुद्ध तु कफोदरिणमातुरम् ।
संसर्जयेत्कटुक्षारयुक्तेरन्नेः कफापहैः ॥ ७२ ॥
गोमूत्रारिष्टपानश्च चूर्णायस्कृतिभिस्तथा ।
सक्षारस्तेलपानैश्च शमयेत्तु कफोदरम् ॥ ७३ ॥
कफोदर की चिकित्मा – रोगी को रनेहन ओर स्वेदन करवाके सशोधन करना चाहिये । फिर कफनाशक, कटुरस तथा क्षारयुक्त पेयादि अन्न द्वारा ससर्जन ( भाजन ) करना चाहिये । गोमूत्र, अरिष्ट का पान, लाह भस्म का नयोग और क्षार सिद्ध तेल के प्रयोगों से कफोदर को शान्त करना चाहिये ॥७२-७३ ॥
सन्निपातोदरे मर्वा यथोक्ताः कारयेत्क्रियाः ।
सोपद्र तु निर्वृत्त प्रत्याख्येय विजानता ॥ ७४
उदावर्तरुजाना हेर्दाहमोहतृषाज्वरैः ।
गौरवारुचिकाठिन्यैश्चानिलादीन् यथाक्रमम् ॥
लिङ्गैः सीहोदरान् दृष्ट्वा रक्तं वापि स्वलक्षणैः । सन्निपातोदर मे सब दोपो की चिकित्सा करनी चाहिये । मे छर्दि ( वमन ), अतीसार आदि उपद्रव आ जायें तो समझना चाहिये । वैद्य को चाहिये कि प्लीहोदर मे उदावर्त्त, वायु को, दाह, प्यास, मूच्छा और ज्वर से पित्त को, भारापन, से कफ को तथा सब दाषो के मिलित लक्षणो से सन्निपात को ॥ ७५ ॥ यदि सन्निपातोदर उसको अमाध्य शूल, आनाह से अरुचि, कठिनता समझे । प्यास की अधिकता तथा पित्त के अन्य लक्षणो से रक्त को समझना चाहिये ॥ ७४–७५- ॥ चिकित्सा संप्रकुर्वीत यथादोषं यथाबलम् ॥ ७६ ॥
स्नेहं स्वेदं विरेकं च निरूहमनुवासनम् ।
समीक्ष्य कारयेद् बाहौ वामे वा व्यधयेत् सिराम् ॥ ७७ ॥
षट्पलं पाययेत्सर्पिः पिप्पलीर्वा प्रयोजयेत् ।
सगुडामभयां वाऽपि क्षारारिष्टगणास्तथा ॥ ७८ ॥
वैद्य को चाहिये कि दोपानुसार और बलानुसार प्लीहोदर में चिकित्सा करे । इसके लिये स्नेहन, स्वेदन, विरेचन, निरूह बस्ति और अनुवासन बस्ति का विचारपूर्वक प्रयोग करना चाहिये । प्यास की अधिकता आदि से रक्त की वृद्धि को समझ कर बाई बाहु में सिरावेध द्वारा रक्तमोक्षण करे । षट्पल या महाषट्पल घृत पिलाना चाहिये । रसायन विधि से वर्धमान - पिप्पली खिलानी चाहिये । गुड के साथ हरड देनी चाहिये । क्षार - अरिष्टो को बरतना चाहिये, यह चिकित्सा क्रम कह दिया अब प्रयोगों को सुनो ॥७६-७८ ॥