श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 511–520

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 511 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२७ wwwwww

पिप्पली नागरं दन्ती चित्रक द्विगुणाभयम् ।

विडङ्गांशयुतं चूर्णमेतदुष्णाम्बुना पिबेत् ॥ ७६ ॥

( १ ) पिप्पली, सोठ, दन्ती, चीता और बायविडंग प्रत्येक द्रव्य एक - एक भाग और हरड दो भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को गरम पानी से पीवे ॥ ७६ ॥

विडङ्गं चित्रकं शुण्ठीं सघृतां सैन्धवं वचाम् ।

दग्ध्वा कपाले पयसा गुल्मलीहापहं पिबेत् ॥ ८० ॥

( २ ) बायविडंग, चीता, सोठ, सैन्धा नमक और वच इनको शरावे मे जला कर भस्म कर ले | इस भस्म को घी में मिलाकर दूध के साथ पीने से गुल्म और प्लीहा रोग नष्ट होते है ॥ ८० ॥

रोहीतकलतानां तु काण्डकानभयाजले २ ।

मूत्रे वा सुनुयात्तच्च सप्तरात्रस्थित पिबेत् ॥ ८१ ॥

कामलागुल्ममेहाशेःसीहसर्वोटरक्रिमीन् ।

तद्धन्याज्जाद्गलरसैर्जीर्णे स्याच्चात्र भोजनम् ॥ ८२ ॥

( ३ ) रोहितक ( रोहेडा ) के टुकडो को कूट कर तथा हरडों को गोमूत्र मे या जल में भिगो कर रख दे । सात दिन के पीछे इस पानी को छान कर पीने से कामला, गुल्म, प्रमेह, अर्श, प्लीहा सब प्रकार के उदर रोग और कृमि नष्ट होते है । आषव के जीर्ण होने पर जागल मासरस के साथ भोजन खाना चाहिये ॥ ८१-८२ ॥

रोहीतकत्वचः कृत्वा पलानां पञ्चविशतिम् ।

कोलद्विप्रस्थसंयुक्तं कषायमुपकल्पयेत् ॥ ८३ ॥

पालिकैः पञ्चकौलैस्तु तैः सर्वैश्चापि तुल्यया ।

रोहीतकत्वचा पिष्ठैर्धृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ८४ ॥

सीहाभिवृद्धि शमयत्येतदाशु प्रयोजितम् ।

तथा गुल्मोदरश्वासक्रिमिपाण्डुत्वकामलाः ॥ ८५

( ४ ) रोहितक घृत —– रोहेडे की छाल २५ पल, कोल ( ॥ बेर ) दो प्रस्थ लेकर आठ गुणे पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थाश रहने पर छान ले । इसमे पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य चित्रक और सोठ प्रत्येक एक - एक पल और रोहेड़े की छाल का चूर्ण ५ पल लेकर इस कल्क द्वारा घृत का एक प्रस्थ सिद्ध, १. ' भवेत् ' इति पाठान्तरम् । २. ' काण्डका साभया जले ' इति । ३. ' मूत्रे वा शृतमेतच्च ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 512

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 512 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

VE चरकसंहिता [ अ ० १३ करे । इस सिद्ध घृत का नित्य प्रति उपयोग करने से प्लीहा रोग, गुल्म, उदर, वास, कृमि, पाण्डुरोग और कामला शीघ्र शान्त होते है ॥ ८३-८५ ॥

अभिकम च कुर्वीत भिपग्वातकफोल्बणे ।

पैत्तिके जीवनीयानि सर्पापि क्षीरबस्तयः ॥ ८६ ॥

रक्तावसेकः संशुद्धिः क्षीरपान चशस्यते ।

यूपैर्मासरसैश्चापि दीपनीयसमायुतेः ॥ ८७ ॥

लघून्यान्नानि ससृज्य भजेत्मीहोदरी नरः । ( ५ ) नादे लीहावर इस चिकित्सा से शान्त न हो ओर वात - कफ की प्रधानता हो तो गुल्म के समान अनि कर्म करना चाहिये । पित्तजन्य प्लीहोदर मे जीवनीयगण से सिद्ध घृत तथा दून की बम्तियो का उपयोग करना चाहिये । साथ ही रक्तमोक्षण, विरेचन और दूध पान कराना उत्तम है । प्लीहोदर में पेयादि क्रम करने के उपरान्त दीपनीय द्रव्यो से सस्कृत यूष, मास रस और लघु अन्न देने चाहिये । यका- उदर पे लीहोदर के समान ही औषध का प्रयोग करना चाहिये ॥ ८६-८७- ॥ स्विन्नाय बद्धोदरिणे मूत्रतीक्ष्णौपधान्वितम् ॥ ८८ ॥

सतैललवणं दद्यान्निरूह सानुवासनम् ।

परिस्रंसीनि चान्नानि तीक्ष्णं चेव विरेचनम् ॥ ८६ ॥

उदावर्तहरं कर्म कार्य वातन्नमेव च । ( ६ ) बद्ध गुदोदर की चिकित्सा -- रोगी को स्वेदन कराके तीक्ष्ण ओष-धियो से युक्त मूत्र, तैल, लवण मिश्रित निरूह और अनुवासन देना चाहिये । विरेचक गुण वाले अन्न और तीक्ष्ण विरेचन देने चाहियें । उदावर्त्त नाशक तथा वातनाशक कर्म सब इसमे बरतने चाहिये ॥ ८८-८९ ॥ छिद्रोदरमृते स्वेदाच्छलेष्मोदरवदाचरेत् ॥ ६० ॥

जातं जातं जलं स्राव्यमेवं तत्पातयेद्भिषक् । ( ७ ) छिद्रोदर की चिकित्सा - छिद्रोदर मे स्वेदन को छोड़ कर शेत्र चिकित्सा कफोदर के समान करनी चाहिये । इस प्रकार से जब २ जल उत्पन्न हो तब २ उसको बार बार निकालते रहना चाहिये । [ जब तक उपद्रव उत्पन्न न

हो तब तक यह रोग याप्य है । उपद्रव उत्पन्न होनेपर असाध्य हो जाता है ] ॥ ६० ॥

तृष्णाकासज्वरातं तु क्षीणमांसाग्निभोजनम् ॥ ६१ ॥

वर्जयेच्छ्वासिनं तद्वच्छूलिनं दुर्बलेन्द्रियम् । असाध्य छिद्रोदर - रोगी को प्यास, कास, ज्वर हो, रोगी की अग्नि, मास

पृष्ठ 513

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 513 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] ३४ चिकित्सितस्थानम ५२६ और भोजन घट जाये, श्वास रोग, शूल तथा इन्द्रिया निर्बल हो जाये तो असाध्य समझना चाहिये ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे ॥ १६- ॥ अपां दोषे ग्रहण्यादौ विदध्यादुदकोदरे ॥ १२ ॥

मूत्रयुक्तानि तीक्ष्णानि विविधक्षारवन्ति च ।

दीपनीयैः कफघ्नेश्च तमाहारैरुपाचरेत् ॥ १३ ॥

द्रवेभ्यश्वोदकादिभ्यो नियच्छेदनुपूर्वशः ।

सर्वमेवोदर प्रायो दोषसंघातजं मतम् ॥ ६४ ॥

तस्मात्त्रिदोषशमनी क्रिया स ेषु कारयेत् । ( ८ ) उदकोदर की चिकित्मा - उदकोदर मे प्रथमजलीय दोषों को निकालने के लिये मूत्र और क्षीरयुक्त तीक्ष्ण ओषविया देनी चाहिये । भोजन मे अनि दीपक और कफनाशक भाजन देने चाहिये । वीरे - धीरे पानो आदि द्रव वस्तुओं से रोगी का हटाना चाहिये । प्राय सब उदर रागो मे वातादि तोना दोषो का मिश्रण रहता है । इसलिये सब उदरो मे तीनों दोषो की सशमनी - क्रिया करनी चाहिये ॥ ६२-६४ ॥ दोषैः कुक्षो हि संपूर्ण वह्निर्मन्दत्वमृच्छति ॥ ५ ॥

तस्माद्भोज्यानि योज्यानि दीपनानि लघूनि च ।

रक्तशालीन्यवान्मुद्गाञ्जाङ्गलांश्च मृगद्विजान् ॥ ६६ ॥

पयोमूत्रासवारिष्टान्मधुशीधूंस्तथा सुराम् ।

यवागूमोदनं वापि यूषैरद्याद्रसैरपि ॥ ६७ ॥

मन्दाम्लस्नेहकटुभिः पच ' मूलोपसाधितैः । उदर मे दापो के भर जाने से अनि मन्द पड़ जाती है । इसलिये दीपनीय और लघु भोजन रोगी को देने चाहिये । इसके लिये लाल चावल, जौ, मृग, जागल पशु पक्षियों का मास, दूध, मूत्र, आसव - अरिष्ट, मधु, सीधु ( गन्ने के रस को पका कर बनाया ), सुरा ( मद्य ), यवागू, ओदन को अल्प स्नेह तथा अल्प खटाई वाले, कटु रस तथा पचमूल क्वाथ से साधित भूग आदि के यूष तथा माम - रस के साथ देना चाहिये ॥ ६५ - ६७ ॥ औदकानूपज मांसं शाकं पिष्टकृतं तिलान् ॥ ६८ ॥

व्यायामाध्वदिवास्वप्नं यानयानं च वर्जयेत् ।

तथोष्णलवणाम्लानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ ६६ ॥

नाद्यादन्नानि जठरी तोयपानं च वर्जयेत् । १. ' च ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 514

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 514 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३० चरकसंहिता [ अ ० १३ www AMAVA MAAA इसमें अपथ्य – जलचर तथा जलमय प्रदेश के जन्तुओं का मास, शाक ( पत्ते आदि ), पिट्टी से बने पदार्थ, तिल, व्यायाम, पैदल, यात्रा, दिन मे सोना, सवारी पर चढ़ कर यात्रा करना इन सब बातों को छोड़ दे । इसी प्रकार से उदर रोगी उष्ण, खट्टे, लवणयुक्त, विदाही और भारी पदार्थों का सेवन तथा पानी का पीना त्याग कर दे ॥ ६८-६६ ॥ नातिसान्द्रं मतं पाने स्वादु तक्रमपेलवम् ॥ १००

त्र्यूषणक्षारलवणैर्युक्तं तु निचयोदरी ।

वातोदरी पिबेत्तकं पिप्पलीलवणान्वितम् ॥ १०१

शर्करामधुकोपेत स्वादु पित्तोदरी पिबेत् ।

यवानीसैन्धवाजाजीव्योषयुक्तं कफोदरी ॥ १०२

पिवेन्मधुयुतं तर्क व्यक्ताम्लं नातिपेलवम् ।

मधुतैलव चाशुण्ठीशताह्वाकुष्ठसैन्धवैः ॥ १०३ ॥

युक्तं महोदरी जातं सव्योपं दकोदरी ।

यवानी हपुषाजाजीसैन्धवैर्ग्रथितोदरी ॥ १०४ ॥

पिबेच्छिद्रोदरी तक्रं पिप्पलीक्षौद्रसंयुतम् । उदर रोगी को चाहिये कि पीने के लिये न तो बहुत घना ॥ ॥ ॥ ( थोड़ा गाढ़ा ), मधुर, तुरन्त का तैय्यार किया, अपेल्व अर्थात् मक्खन निकाला तक्र पीये । सन्निपातोदरी - रोगी को चाहिये कि तक्र मे सोठ, मरिच, पिप्पली, क्षार और नमक मिलाकर पीये । वातोदरी - रोगी तक्र मे पिप्पली और लवण मिलाकर पीये । पित्तोदरी - रोगी शर्करा और मरिच से युक्त तक्र पीये । कफोदरी - रोगी यवानी ( अजवायन ), सैन्धव और जीरा तथा सोठ, मरिच, पिप्पली से युक्त तक्र पिये । प्लीहोदर रोगी को चाहिये कि मधु युक्त, अम्ल रस बहुत मक्खन वाला नहीं ( साधारण चिकास वाला ) तक्र पिये । इस तक्र में मधु, तैल, वन्च, सोंठ, सौफ, कूठ, सैन्धा नमक मिलाकर पीये । दकोदर - रोगी सोंठ, मरिच, पिप्पली से युक्त छाछ पीये । ग्रथितोदर - रोगी यवानी ( अजवायन ), हऊबेर, जीरा और नमक से मिश्रित तक्र पिये । छिद्रोदर - रोगी पिप्पली और मधु से मिश्रित छाछ पीये ॥ १००–१०४ ॥ गौरवारोचकार्तानां समन्दाग्न्यतिसारिणाम् ॥ १०५ ॥

त वातकफार्तानाममृतत्वाय कल्पते । भारीपन तथा अरुचि के साथ जिन लोगों को मन्दानि रहती हो, अतिसार हो तथा वातजन्य, कफजन्य उदर रोग मे तक्र अमृत के समान गुणकारी है ॥ १०५ ॥

पृष्ठ 515

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 515 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम ५३१ शोफानाहार्तितृण्मूर्च्छापीडिते कारभं पयः ॥ १०६ ॥

शुद्धाना क्षामदेहानां गव्य छागं समाहिषम् । शोफ, आनाह, प्यास, मूच्छा से यदि उदर रोगी पीड़ित हो तो उसको ऊटनी का दूध पीना चाहिये । विरेचन से शुद्ध हुए, निर्बल शरीर वालों के लिये गाय, बकरी और भैस का दूध अमृत के समान है ॥ १०६ ॥

देवदारुपलाशार्कहस्तिपिप्पलिशियकैः ॥ १०७ ॥

साश्वगन्धः सगोमूत्रैः प्रदिह्यादुदरं समैः । उदर रोगी के पेट पर देवदारू, ढाक, आक, गजपिप्पली, सहजन, अश्व-कर्ण ( पीत साल ) इनको समान भाग लेकर चूर्ण करके गोमूत्र मे पीस कर लेप करना चाहिये । [ इनको थोडा गरम करके लेप करना चाहिये ] ॥ १०७ ॥

वृश्चिकाली वचा कुष्ठ पञ्चमूली पुनर्नवाम् ॥ १० = ॥ भूतीका नागरं धान्य जले पक्त्वाऽवसेचयेत् । वृश्चिकाली ( बिच्छू बूटी ), वच, कूठ, बिल्व, श्योनाक, गम्भारी, अरणी, पाढल, रक्त पुनर्नवा, वेत पुनर्नवा, सोठ, धनिया इनका क्वाथ करके इससे परिषेचन करना चाहिये [ क्वाथ गोमूत्र मे करना श्रेयरकार रहेगा ] ॥ १०८ ॥

पलाशं कत्तृण रास्ना तद्वत्पक्त्वाऽवसेचयेत् ॥ १०६ ॥

इसी प्रकार मे पलाश, कतृण ( राहिष घास ), रास्ना अवसेचन करना चाहिये ॥ १०६ ॥

मूत्राण्यष्टावुढरिणा सेके पाने च योजयेत् । उदर रोगी के सेक और पीने के लिये आठो सूत्र (

भैस, हाथी, ऊठ, गधी और घोडे का ) प्रशस्त है ।

रूक्षाणा बहुवातानां तथा संशोधनार्थिनाम् ॥

दीपनीयानि सर्पषि जठरन्नानि वक्ष्यते । इनका क्वाथ करके बकरी, भेड़, गाय, ११० ॥ जो उदर रोगी रूक्ष, प्रबल वात वाले और सशोधन के योग्य हैं, उनके लिये दीपनीय घृनो का उपदेश करते है ॥ ११० ॥

पित्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ १११ ॥

सक्षारैरर्धपलिकैर्द्विप्रस्थं सर्पिषः पचेत् ।

कल्कैर्द्विपञ्चमूलस्य तुलार्धस्य रसेन च ॥ ११२

दधिमण्डाढकोपेतं तत्सर्पिर्जठरापहम् ।

श्वयथुं वातविष्टम्भं गुल्माशसि च नाशयेत् ॥

इति

१ ' मण्डातकोपेत ' इति च पाठ. ।

॥

११३ ॥

पञ्चकोलघृतम् ।

पृष्ठ 516

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 516 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३२ चरकसंहिता [ अ ० १३ ( १ ) पन्चकोल घृत – पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोठ तथा यवक्षार प्रत्येक एक - एक पल मिलित छ पल, दशमूल का क्वाथ ५० पल ( वृद्ध वाग्भट के वचन से ६४ पल ), दधि का मण्ड ( मस्तु ) भाग १ आढक ( ६४ पल ), इनके साथ एक प्रस्थ घी सिद्ध करे । यह घृत उदर राग, शाथ, वातावरोध, गुल्म और अर्श का नष्ट करता है ' ॥ १११-११३ ॥

नागरत्रिफलाप्रस्थं घृतं तैलं तथाऽऽढकम् ।

मस्तुनः साधयितत्पिबेत्सवोदरापहम् ॥ ११४ ॥

कफमारुतसंभूते गुल्मे चैतत्प्रशस्यते । इति नागरघृतम् । ( २ ) नागराद्य वृत - सोठ ओर त्रिफला प्रत्येक एक - एक प्रस्थ, घी और तैल मिलित यमक एक आढक, मस्तु एक आढक इनको मिला कर घृत सिद्ध करे । यह धृत सब उदर रोगो को नष्ट करता है । कफ और वायु से उत्पन्न गुल्म- रोग मे भी यह घृत उत्तम है ॥ ११४ ॥

चतुर्गुणे जले मूत्रे द्विगुणे चित्रकात्पले ॥ ११५ ॥

कल्के सिद्धं घृतप्रस्थं सक्षारं जठरी पिबेत् । इति चित्रकघृतम् । ( ३ ) चित्रक घृत — घी एक प्रस्थ, जल चार प्रस्थ, गोमूत्र दो प्रस्थ, चित्रक का कल्क १ पल, यवक्षार १ पल मिला कर घृत सिद्ध करे । इस घृत का उदर रोगी पान करे ॥ ११५ ॥

यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलरसेन च ॥ ११६ ॥

सुरासौवीरकाभ्या च सिद्धं वापि पिबेद् घृतम् । इति यवाद्यं घृतम् । ( ४ ) यवाद्य - धृत — धृत एक सेर, जो, बेर और कुलत्थी का क्वाथ ४ सेर, बिल्वादि पचमूल का क्वाथ ४ सेर, सुरा ४ सर, सावारक ( काजी ) ४ सेर लेकर घृत सिद्ध करे यह घृत उदर रोग नाशक है । उपरोक्त घृतो से जब उदर रोगा स्निग्ध हो जाये, शरीर में बल आ जाये और वायु शान्त हो जाये तो दोष समूह के स्नेह से शिथिल होने पर कल्पस्थान मे वर्णित विरेचन देने चाहिये ॥ ११६ ॥

१. वाग्भट मे पाठ इस प्रकार से है – ' यावशूकप चकोलषट्पलेन वा मस्तु दशमूलक्काथाकद्वयेन च सिद्ध सपि प्रस्थ प्रयोजयेत् । चक्रपाणि के मत से घी - दो प्रस्थ लेना चाहिये । वह ' द्वि ' शब्द की योजना दोनो ओर करते हैं ।

पृष्ठ 517

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 517 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३३ AANA एभिः स्निग्धाय संजाते बले शान्ते च मारुते ॥ ११७ ॥

त्रस्ते दोषाशये दद्यात्कम्पदृष्टं विरेचनम् ।

पटोलमूलरजनी विडङ्गत्रिफलात्वचम् ॥ ११८ ॥

कम्पिल्लको नीलिनी च त्रिवृता चेति चूर्णयेत् ।

पडघान्का पिकानन्त्यॉत्रीश्च द्वित्रिचतुर्गुणान् ॥। ११६ ॥

कृत्वा चूर्णमतो मुष्टि गवा मूत्रेण वा पिवेत् ।

विरिक्तो मृदु भुञ्जीत भोजनं जागलै रसैः ॥ १२० ॥

मण्डं पेयाच पीपा या सव्योपं पडहं पयः ।

शृतं पिबेत्ततश्चूर्ण पिबेदेयं पुनः पुनः ॥ १२१ ॥

हन्ति सर्वाण्येतच्चूर्ण जातोदकान्यपि ।

कामला पाण्डुरोग च श्वयथु चापकर्पति ॥ १२२ ॥

पटोलाद्यमिदं चूर्णमुदरेषु प्रपूजितम् । इति पटोलाद्यं चूर्णम् । ( १ ) पटोलमूलाादे चूर्ण - टोलमूल, हल्दी, बायविडंग, हरड बहेडा, आवले की छाल, कमीला, नोल, निशाय न सब का चूर्ण करले । इनमे पटोल-मूल, हल्दी विडग और त्रिफला की छाल प्रत्येक द्रव्य एक एक कर्प, कमीला दो कर्ण, नील तीन कर्म और निशांथ चार का ले इस चूर्ण की एक पल मात्रा को गामूत्र के साथ पीपे । इससे नली पकार विरेचन होने पर जागल पशुओ के मास - रस के साथ भोजन करे । पेया और मण्ड को पीकर सोठ, के साथ पकाना दूव छ दिन तक पीये । सातवे दिन फिर चूर्ण प्रकार से बार - बार करना चाहिये । यह चूर्ण सब प्रकार के उदकोदर को, कामला, पाण्डु और शाय राग को नष्ट करता है पटोला चूर्ण की अति प्रति है ॥ ११७- १२२ ॥ गवाक्ष शङ्खिनी दन्ती तिल्वकस्य त्वचं वचाम् ॥ पिबेद् द्राक्षाम्बुगोमूत्रको लकर्कन्धुशीधुभिः । मरिच, पिप्पली को पीये । इस उदर रोगो को, । उदर रोगों मे १२३ ॥ ( २ ) गवाक्षी ( इन्द्रायण ), शखिनी, दन्ती, तिल्वक की छाल, वच इनका चूर्ण करले । इस चूर्ण को द्राक्षा क्वाथ, गोमूत्र, बड़े और छोटे बेर के काथ अथवा सीधु इनमे से किसी एक के साथ पीना चाहिये ॥ १२३ ॥

१ अष्टागसग्रह मे भी - पटोलमूलरजनीविडगत्रिफला कर्षाशा, कम्पिल्लक-नीलिनीफल त्रिवृताना क्रमाद् द्वित्रिचतुर्भि कर्णैर्युक्ताश्वर्णयित्वा मूत्रेण पिबेत् । जीर्णे च पेयामण्डपो रसौदनाशी वा स्यात् । ततः षड्रात्रमित्यादि । सग्रह अ ० चि ०१७ ।

पृष्ठ 518

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 518 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३४ चरकसंहिता [ अ ० १३ यवानी हवुषा धान्यं त्रिफला चोपकुञ्जिका ॥ १२४ ॥

कारवी पिप्पलीमूलमजगन्धा शटी वचा ।

शताह्वा जीरकं व्योपं स्वर्णक्षीरी सचित्रका ॥। १२५ ॥

क्षारौ पौष्करं मूल कुष्ठं लवणपञ्चकम् ।

विडङ्गं च ममाशानि दन्त्या भागत्रयं तथा ॥ १२६ ॥

त्रिवृद्विशाल्योद्वौ द्वौ सातला स्याच्चतुर्गुणा ।

एतन्नारायणं नाम चूर्ण रोगगणापहम् ॥ १२७ ॥

नैतत्प्राप्यातिवर्तन्ते रोगा विष्णुमिवासुराः । ( ३ ) नारायण चूर्ण - अजवायन, हऊबेर, धनिया, त्रिफला, उपकुञ्चिका ( काला जीरा ) कारवी ( छोटा जीरा ), पिप्पलीमूल, अजगन्धा ( अजवायन ), सोंठ, वन्च, सोफ, जीरा, त्रिकटु, स्वर्णक्षीरी ( हैमवती ), चीता, यवक्षार, सर्ज क्षार, पुष्करमूल, कूठ, सेन्धा नमक, सामुद्रक, सचल, विड् और उद्भिद् नमक बायविडग ये सब द्रव्य समभाग, दन्ती तीन भाग, निशोथ और विशाला ये दो-दो भाग, सातला चार भाग मिला कर चूर्ण कर लेना चाहिये । यह नारायण-चूर्ण सब रोगो का नाशक है । जिस प्रकार से विष्णु भगवान् के सामने असुर नहीं खड़े रहते हैं, उसी प्रकार से इसके सामने रोग नही ठहरते, इसलिये इसका नाम नारायण - चूर्ण है ॥१२४ - १२७ ॥ तक्रेणोदरिभिः पेयं गुल्मिभिर्बंदराम्बुना ॥ १२८ ॥

आनद्धवाते सुरया वातरोगे प्रसन्नया ।

दधिमण्डेन विस दाडिमाम्बुभिरर्शसः । १२६ ॥

परिकर्ते सवृक्षाम्लमुष्णाम्बुभिरजीर्णके । उदर रोगी को यह चूर्ण तक्र के साथ, गुल्म- रोगी को बदर ( बेर ) के क्वाथ के साथ, वात - विबन्ध मे सुरा के साथ, वात रोग मे प्रसन्ना ( मद्य के ऊपर के स्वच्छ भाग ) के साथ, मलावरोव मे दधि - मण्ड के साथ, अर्श रोग में अनार के रस के साथ, परिकर्त्तिका रोग मे वृक्षाम्ल क्वाथ के साथ, अजीर्ण मे गरम पानी के साथ पीना चाहिये ॥ १२८ - १२ ९ ॥ भगन्दरे पाण्डुरोगे श्वासे कासे गलग्रहे ॥ १३० ॥

हृद्रोगे ग्रहणीदोषे कुष्ठे मन्देऽनले ज्वरे ।

ष्ट्राविषे मूल बिषे सगरे कृत्रिमे विषे ॥ १३१ ॥

१. ' विडङ्गस्य समाशानि दन्त्या भागास्त्रयस्तथा ' इति वा पाठः ।

पृष्ठ 519

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 519 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३५ www Vvv यथाई ' स्निग्धकोष्ठेन पेयमेतद्विरेचनम् । इति नारायणचूर्णम् । भगन्दर, पाण्डुरोग, श्वास, कास, गलग्रह, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, कूठ, अग्निमान्द्य, ज्वर, दष्ट्रा विष ( जागम विष ), मूल विष ( स्थावर विष ), सगर ( निर्विष द्रव्य सयोगज विष ) मे और कत्रिम ( विष द्रव्य सयोगज विष ) मे यथायोग अनुपान के साथ पीना चाहिये ॥ १३०-१३१ ॥ ह y पा काञ्चनक्षीरी त्रिफला कटुरोहिणी ॥। १३२ ॥

नीलिनी त्रायमाणा च शातला त्रिवृता वचा ।

सैन्धवं काललवणं पिप्पली चेति चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥

दाडिमत्रिफलामासरसमूत्र सुखोदकैः ।

पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु लीह्नि सर्वोदरेषु च ॥ १३४ ॥

कुष्ठे श्वित्रे सरुजके सवाते विषमानिषु ।

शोथाः पाण्डुरोगेषु कामलाया हलीमके ॥ १३५ ॥

वातं पित्त कफ चाऽऽशुविरेकात्सप्रसाधयेत् । इति पुषाद्य चूर्णम् । ( ४ ) हपुषाद्य - चूर्ण - हपुषा ( हऊबेर ), स्वर्ण क्षारी, त्रिफला, कुटकी, नीलिनी, त्रायमाणा, सातला, निशोय, वच, सैन्वा नमक, काला लवण ( सचल या बिड् नमक ), पिप्पली ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । इस चूर्ण को सब प्रकार के गुल्मो मे, प्लीहा मे उदर रोगो में, कुष्ठ मे, श्वित्र रोग में, दर्द युक्त उदर रोग में, वातयुक्त उदर विकार में, अग्नि के विषम होने पर, शोथ, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलोमक- राग मे, अनार, त्रिफला, मास रस, मूत्र और गरम पानी जो योग्य अनुपान इनमे से दीखे उसके साथ लेना चाहिये । अनार का रस ओर त्रिफला का क्वाथ बरतना चाहिये । इस प्रकार लेने से यह चूर्ण विरेचन द्वारा वात, पित्त, कफ का शाधन कर देता है ॥१३२-१३५ ॥ for frist क्षारौ लवणानि च ॥ १३६ ॥

चित्रक च पिबेच्चूर्णं सर्पिषोद्रगुन्मनुत् । इति नीलिन्याद्यं चूर्णम् । १ ' यथार्थ ' इति वा पाठ. ।

२ स्थावर जागमं चेति विष प्रोक्तम कृत्रिमम् ।

कृत्रिम रसज्ञन्तु क्रियते विविधौषधै. ॥

योगे द्विविध प्रोक्तं तृतीय विषमुच्यते ।

गरं स्यादविषं तत्र सविष कृत्रिमं मतम् ॥

पृष्ठ 520

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५३६ चरकसंहिता [ अ ० १३ ^ ( ५ ) नीलिन्याय - चूर्ण - नीलिनी, निचुल ( जलवेतस ), सर्जक्षार और यवक्षार, सैन्धव, सामुद्र, विङ्, सवल और उद्भिद्, चित्रक ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर लेने चाहिये । इस चूर्ण को घो के साथ पीने से उदर और गुल्म - रोग शान्त होते है ॥ १३६ ॥

क्षीरद्रोणं सुधाजीरप्रस्थासहिनं दधि ॥ १३७ ॥

जातं विमथ्य तद्युक्त्या त्रिवृत्सिद्ध पिनेद् कृतम् ।

तथा सिद्धं घृतप्रस् ं पयस्यष्टगुणे पिबेत् ॥ १३८ ॥

( ६ ) स्नुही क्षीर -- - तूच एक द्राण ( चार आठ ), स्नुहो ( थोर ) का दूध आधा प्रस्थ ८ ) मिलाकर इहो जानी चाहिये । इस दही का मथ कर घी निकालना चाहिये । फिर त्रिटर का कल्क चोथाई भाग ओर जल चार भाग और यह तैय्यार वृत १ भाग लेका त सिद्ध करना चाहिये । इस घी का उचित मात्रा मे पीना चाहि ये ॥ १३७-१३८ ॥

स्तुकक्षीरपलकल्केन त्रिवृता षट्पलेन च ।

गुल्मानां गरदोषाणामुदराणा च शान्तये ॥ १३६ ॥

इति स्नुही क्षीरघृतम् । ( ७ ) उपरोक्त सुधाक्षीर - विधि से बनाये घृत को, आठ गुणे दूध में, थोर का दूध १ पल ओर निशोथ का चूर्ण छ पल एनके कल्क के साथ सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ १३६ ॥

दधिमण्डाढके सिद्धात्स्नुकुक्षीरपलकल्कितात् ।

घृतप्रस्थात्पिवेन्मात्रा तद्वज्जठरशान्तये ॥ १४० ॥

( ८ ) दधिमण्ड ( दही का मस्तु ) १ आढक, स्नुही घृत ९ प्रस्थ इनको यथाविधि पाक करके कोष्ठापेक्षी मात्रा में शान्त होते है || १४०

एषां चानुपिवेत्पेयां पयो वा स्वादु वा रसम् ।

घृते जीर्णे विरिक्तस्तु कोष्ण नागरकैः शृतम् ॥

पिबेदम्बु ततः पेयां यूष कोलत्थक ततः ।

पिबेद् रूक्षस्त्र्यह त्वेव पयोऽन्नं प्रतिभोजितः ॥

पुनः पुनः पिबेत्सर्पिरानुपूर्व्या तथैव च ।

घृतान्येतानि सिद्धानि विदध्यात्कुशलो भिषक् ॥

गुल्मानां गरदोषाणामुदराणा च शान्तये । १ ' घृते जीर्णे विरिक्त तु काष्णनागरकैः " इति । का दूध १ पल, पीने से उदर रोग १४१ ॥ १४२ ॥ १४३ ॥ २. ' शुण्ठ्या पिबेत् ततः ' इति च । ३ ' पयो वा ' इति पाठान्तरम् ।