श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 61–70
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 61–70
पृष्ठ 61
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चरकसंहिता [ अ ० ३ सात्म्य से गर्भ उत्पन्न होता है । असात्म्य सेवन के बिना स्त्री पुरुष मे बाझ पन या नपुसकता नहीं आती, अथवा गर्भ मे अनिष्ट दोष उत्पन्न नही होता ॥ असात्म्यसेवी स्त्री पुरुषों में कुपित हुए तीनों वात आदि दोष जब तक शरीर में फैल कर शुक्र आत्तव और गर्भाशय के नाश का कारण नहीं बनते, तब तक ये स्त्री पुरुष गर्म उत्पन्न करने में समर्थ रहते हैं । सात्म्यसेवी स्त्री पुरुषो के शुद्ध शुक्र और आर्चव तथा गर्भाशय के शुद्ध होने पर ऋतुकाल में सभोग द्वारा परस्पर मिल जाने पर भी जीव के प्रवेश न होने से गर्भ उत्पन्न नहीं होता । क्याकि गर्म की उत्पत्ति केवल सात्म्य पर ही निर्भर नही करती । गर्भोत्पत्ति में समुदाय कारण है । गर्भ की जो बाते सात्म्य से उत्पन्न होती हैं या सात्म्य के होने पर ही जिनका होना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे - आरोग्य, अप्रमाद, लोभ का न होना, इन्द्रियों का सौम्य भाव, प्रसन्नता, उत्तम स्वर, उत्तम वर्ण, उत्तम बीज ( शुक्र ) और मैथुन मे हर्ष की अधिकता ये सात्म्य मे उत्पन्न होने वाले अथ हैं ॥ १८ ॥
रसजश्चाय गर्भः । न हि रसाते मातुः प्राणयात्राऽपि स्यात्कि पुनर्गर्भजन्म, न चैवमसम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भमभिनिर्वर्तयन्ति, न च केवल सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभिनिर्वृत्तिर्भवति, समु-दायोऽप्यत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसतः सभवतः सभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्याम, तद्यथा— शरीरस्याभिनिर्वृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि ॥ १६ ॥
यह ' गर्भ रस से उत्पन्न होता है । रस के विना तो माता की भी जीवन-यात्रा नहीं चल सकती, फिर गर्भ के जन्म की तो बात ही क्या? गर्भिणी के रसों को अनुचित रीति में सेवन करने से भी गर्भ नही बनता और रसो के सम्यग् उपयोग मात्र से भी गर्भ नहीं बनता । गर्भोत्पत्ति मे माता आदि का समुदाय भी कारण है । इस गर्भ के जो अश रस से उत्पन्न होते हैं, या जिन अशो का रस के रहते हुए ही बनना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे— शरीर के प्रत्येक अग की पृथक् २ स्पष्टता, वृद्धि, प्राणों का, बल का अनुबन्ध अर्थात् स्थिर रहना, तृप्ति, पुष्टि, अचय और उत्साह । ये अथ रस से उत्पन्न होते हैं ॥ १ ९ ॥ अस्ति खल्वपि समुपपादुक यज्जोव स्पृक् शरीरेणाभिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रि
पृष्ठ 62
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ४७ याण्युपतप्यन्ते, बल हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीन प्राणाज-हाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहक च मन इत्यभिधीयते, तत् त्रिविध-माख्यायते - शुद्ध राजसं तामसं चेति । येनास्य खलु प्रयतो भूयिष्ट, तेन द्वितीयाया वाजातौ सप्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन सयुज्यते वदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्त हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्त्तते, यस्यानुवृत्ति पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर इत्युच्यते इति सत्त्वमुक्तम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य सन्वजानि यानि चास्य सत्त्वतः सभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा-भक्तिः शील शौच द्वेष स्मृति मोहस्त्यागो मात्सर्य शौर्य भयं क्रोधस्त-न्द्रोत्सहस्य मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येवमादयश्चान्ये, ते सवजा विकाराः, तानुत्तरकालं सत्त्वभेदमधिकृत्य उपदेक्ष्याम इति मत्त्वजानि । नानाविधानि खलु सत्त्वानि तानि सर्वाण्येकपुरुषे भवन्ति,
न च भवन्त्येककालम् । एकं तु प्रायोवृत्त्याऽऽह ॥ २० ॥
सचव भी गर्म की उत्पत्ति का एक घटक है । शुक्र शोणित से बने गर्भ-शरीर में सब से प्रथम जीव का स्पर्श होता है । वहा सच ( मन ) ही स्पृक्-शरीर के साथ आत्मा को जोडता है । आत्मा तो निष्क्रिय है, वह ' ' ( मन ) द्वारा ही देह में प्रवेश करता है । जिस के दूसरे देह में जाने के समय मरणासन्न रागी के स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है, इच्छा बदल जाती हैं, सब इन्द्रिया पीड़ित होती हैं, बल क्षीण हो जाता है, रोग बढ़ते है, जिनसे हीन होने पर पुरुष प्राणों को छोड़ देता है, जा इन्द्रियो को अपने अपने विषयो में प्रेरित करता है, उसीको ' मन ' अर्थात् सत्त्व कहते हैं । [ जो शरीर आत्मा को नित्य स्पर्श किये रहता है वह शरीर ' स्पृक् ' शरीर कहाता है । जिस सूक्ष्म देह में आत्मा एक देह से निकल कर दूसरे देह में प्रवेश करता है वह देह आत्मा का निरन्तर स्पर्श किये रहने से ' स्पृक्शरीर ' कहाता है । उसका दूसरा नाम आतिवाहिक शरीर या कारण शरीर है । उस कारण शरीर द्वारा ही मन भोग पतन शरीर से आत्मा को बाधता अथवा स्टक् शरीर स्पर्शवान् त्वचा से मढा यह स्थूल शरीर ही माना जाये । उसमें मन ही आत्मा से उस शरीर का सम्बन्ध बनाता है । यदि मन की इस आत्मा के शरीर से सम्बन्ध करने में कारण न माना जाये, तो आत्मा के व्यापक होने से सर्वत्र ही ज्ञान की उपलब्धि होनी चाहिये । परन्तु नहीं होती तो स्पर्शवाले शरीर में भी जिस जगह मन जुड़ता है वहा सुख दुःखादि की उपलब्धि होती
पृष्ठ 63
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ चरकसंहिता [ अ ० ३ है, अन्यत्र नहीं । ' स्पृक् ' इस विशेषण से मूत्र, नख, केश आदि में मन को गति नहीं होने से आत्मा को ज्ञान नहीं होता ] । यह सत्व तीन प्रकार का बतलाया जाता है । शुद्ध, राजस और तामस । इस जन्म से देहान्तर में जाते समय मन के साथ से जो गुण अधिक मात्रा में होगा, दूसरे जन्म में भी वही गुण अधिक मात्रा मे रहेगा । जिस समय मन में शुद्धसत्व की प्रधानता रहती है उस समय जीव अतीत जाति का भी स्मरण करता है । आत्मा का यह स्मृति के याग्य ज्ञान शुद्ध सात्त्विक मन के योग से होता है । जिस ज्ञान को मान कर पुरुष ' जातिस्मर ' अर्थात् पूर्वजन्म को स्मरण करने वाला कहा जाता है । इस प्रकार मन का विवेचन किया । गर्भ के जा अग सत्त्व ( मन ) से उत्पन्न होते हैं या जो सत्त्व ( मन ) के होने पर ही होना सम्भव हैं, उनका वर्णन करते हैं । जैसे -भक्ति, शील, पतिव्रता, द्वेप, स्मृति, मोह, त्याग, मत्सरता, शूरता, भय, क्रोध, तन्द्रा, उत्साह, तीक्ष्णता, मृदुता, गम्भीरता, मन की अस्थिरता, आदि तथा अन्य अनेक सत्त्व से उत्पन्न होने वाले विकार हैं जिनका सत्र का भेद वर्णन करने वाले प्रकरण में करेगे । यह सच्च से उत्पन्न होने वाले अशों का विषय समाप्त हुआ । ये नाना प्रकार के हैं । ये सब एक पुरुष में रहते हैं, परन्तु वे सब समय में नहीं रहते । प्राय सत्व एक ही रहता है इसलिये मन एक ही प्रकार का कहा जाता है । इनमे जिस एक को प्रधानता रहती है, उसी गुण से वह कहा जाता है । की अधिकता से सात्विक, रज की अधिकता से राजस, तम की अधिकता से तामस कहा जाता है ॥ २० ॥
एवमय नानाविधानामेषा गर्भकराणा भावाना समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः, यथा कूटागार नानाद्रव्यसमुदायात्, यथा वा रथो नानारथाङ्ग-समुदायात्, तस्मादेतदवोचाम - मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ २१ ॥
इस प्रकार से इन नाना प्रकार के गर्भ के उत्पादक पदार्थों ( भाबो ) के मिलने से गर्भ बनता है । जिस प्रकार जेन्ताक स्वेद में कहे नाना द्रव्यों के समूह से कूटागार बनता है, जिस प्रकार रथ के नाना अगों के समुदाय से रथ बनता है, उसी प्रकार माता आदि सब छ पदार्थों के मिलने से गर्भ बनता है । इसीलिये हम कहते हैं गर्भ माता से उत्पन्न होता है, पिता से उत्पन्न होता है, देखिये सुश्रुत, शारीर स्थान, अध्याय २ ।
पृष्ठ 64
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] शारीरस्थानम् ४६ आत्मा से उत्पन्न होता है, सात्म्य से उत्पन्न होता है, रस से उत्पन्न होता है और सत्व भी गर्भ की उत्पत्ति मे एक घटक है ॥ २१ ॥
भरद्वाज उवाच --- यद्ययमेषां नानाविधाना गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिवर्तते गर्भः, कथमयं सधीयते, यदि चापि संधीयते कस्मात् समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते । तत्र चेदिष्टमेतद्यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवस्तस्मा-देव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा- गोर्गोप्रभवः, यथा - चाश्वोऽश्वप्रभवः इत्येवं सति यदुक्तमग्रे समुदायात्मक इति तदयुक्त, यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभव, कस्माज्जडान्ध- कुब्ज- मूक - वामन - मिन्मिन- व्यङ्गोन्मत्त - कुष्ठ-किलासिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा न भवन्ति । अथाऽत्रापि बुद्धिरेवं स्यात् - स्वेनैवायमात्मा चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान् घ्राणेन गन्धान्, रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान, बुद्धया बाद्धव्यमित्यनेन हेतुना न जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशा भवन्ति । अत्रापि प्रतिज्ञाहानिदोषः स्यात्, एवमुक्ते ह्यात्मा सत्स्विन्द्रियेषु ज्ञः स्यादसत्स्वज्ञः । यत्र चैतदुभयं सभ-वति ज्ञत्वमज्ञत्व च सविकारश्रात्मा । यदि च दशनादिभिरात्मा विषयान्वेत्ति, निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहादज्ञः स्यात्, अज्ञत्वादकारणं, अकारणत्वाच्च नात्मेति वाग्वस्तुमात्रमेतद्वचनमनर्थक स्यादिति होवाच भरद्वाजः ॥ २२ ॥
इस पर भरद्वाज मुनि फिर शका करते है -- यदि इन गर्भकारक भिन्न २ अनेक प्रकार के पदाथो के समुदाय से गर्भ बनता है, तो यह गर्भ ( शुक्र-शोणित ) जीव रूप से किस प्रकार से सम्बन्धित होता है । यह भी मान ले कि सम्बन्धित हो जाता है, तो समुदाय के कारण उत्पन्न होने वाला गर्भ किस प्रकार से मनुष्य रूप में हो जाता है? यदि यह भी मान लिया जाय कि मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न हुआ है इसलिये वह मनुष्य रूप से उत्पन्न होता कहा जाता है? जिस प्रकार गाय मे गाय उत्पन्न होता है और घोड़े से घोड़ा उसन्न होता है, तो पहिले जो यह कहा है कि माता आदि के समुदाय से गर्भ उत्पन्न होता है, यह ठीक नही । और यदि मनुष्य से मनुष्य की उत्पत्ति मानोगे तो जड़बुद्धि अधे, कुबडे, गूंगे, नाटे, मिन्मिने, श्याममण्डल, पागल, कोढ़ी, किलास आदि के रोगी मनुष्यों से उत्पन्न सतान पिता के समान क्यों नही होतो? अन्धे से अन्वा जड़ से जड़बुद्धि होना चाहिये । परन्तु ऐसा सर्वत्र नहीं होता । इस पर भी यदि इस प्रकार से मानें कि आत्मा अपने आप चतु से रूपो को जानता है, अपने
पृष्ठ 65
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५० चरकसहिता [ अ ० ३ V कानों से ही शब्दों को सुनता है, अपनी नासिका से गन्धों को पहिचानता है, अपनी ही रसना से रसों को पहिचानता है, अपनी ही त्वचा से स्पर्श करता है, अपनी बुद्धि से जानने योग्य बातों को जानता है, इस कारण मे जड़ आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान पूर्ण रूप से पिता के समान नहीं होती तो प्रतिज्ञा-हानि दोष आता है । क्योंकि ऐसा मानने से आत्मा इन्द्रियों के रहते ज्ञानी और न रहते अज्ञानी हो जाता है । इस प्रकार आत्मा में ज्ञानी और अज्ञानी ये दोनों गुण होने सम्भव हो वह आत्मा विकार प्रकृतिवाला हो जायेगा, परन्तु आत्मा ' निर्विकार ' कहा जाता है । यदि चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त होने पर आत्मा विषयों को जानता है, तो वह निरिन्द्रिय अवस्था में ( चक्षु आदि के अभाव में ) अज्ञानी बनेगा । अज्ञ होने से अपने उत्पत्ति का कारण भी नहीं हो सकेगा । कारण न होने से आत्मा की सत्ता भी नहीं रही । इसलिये ' आत्मा ' यह वचन कहना अर्थरहित शब्दमात्र ही रह जाता है ॥ २२ ॥
आत्रेय उवाच - पुरस्तादेतत्प्रतिज्ञातं - सत्त्वं जीवस्पृक् शरीरेणा-भिसंबध्नातीति, तस्मात्तु समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण
जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते । तद्वक्ष्यामः ॥ २३ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा - प्रथम यह कहा है कि सरवसंज्ञक मन जीव आत्मा को स्पृक्शरीर के साथ का सम्बन्ध कराता है, क्योंकि समुदाय द्वारा उत्पन्न गर्भ मनुष्य रूप से बनता है, मनुष्य से मनुष्य ही उत्पन्न होता कहा जाता है, उसकी व्याख्या करते हैं ॥ २३ ॥
भूताना चतुर्विधा योनिर्भवति - जरावण्डस्वेदोद्भिदः । तासा खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूता-नामाकृतिविशेषापरिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामण्डजाना च प्राणि-नामेते गर्भकरा भावा यां या योनिमापद्यन्ते तस्यां तस्यां योनौ तथा-तथारूपा भवन्ति, तद्यथा कनक- रजत ताम्र - त्रपु - सीसकान्यासिच्यमा-नानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु । ते यदा मनुष्य बिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात्समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्र-हेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तद्योनित्वात् ॥ २४ ॥
प्राणियों की योनि चार प्रकार की है । जरायु, अण्ड, स्वेद और उद्भिद् इन चारों प्रकार की योनियों में एक एक योनि के असख्य भेद है, क्योंकि प्राणी की आकृतियों के भेद असख्य हैं । इन में जरायुज तथा अण्डज प्राणियों के गर्भोत्पादक शुक्र, शोणित आदि पदार्थ जिस जिस योनि में पहुचते हैं, उसी उसी योनि में उसी उसी रूप के हो
पृष्ठ 66
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] शारीरस्थानम ५१ जाते हैं । जिस प्रकार पियल हुए सोना, चादो, ताम्बा, सोखा आदि मोम से लिप्त मिट्टी के सांचे में डालने पर उसी मोम के आकार के पदार्थ बन जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के साचे में ढल कर वह मनुष्य रूप के होजाते हैं । इस
कारण से समुदाय से उत्पन्न होने वाला गर्भ मनुष्य रूप में उत्पन्न होता है ।
मनुष्य योनि से उत्पन्न होने से मनुष्य को मनुष्यसे उत्पन्न हुआ कहते हैं ॥२४ ॥
यच्चोक्तं- यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभव. कस्मान्न जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्तीति, तत्रोच्यते - यस्य यस्य ह्यङ्गावयवस्य बीजे बीजभाग उपतप्तो भवति तस्य तस्याङ्गावयवस्य विकृतिरुपजायते, नोपजायते चानुपतापात् तस्मादुभयोपपत्तिरप्यत्र, सर्वस्य चात्मजानी-न्द्रियाणि तेषां भावाभावहेतुदैव तस्मान्नैकान्तता जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्ति ॥ ६५ ॥
और जो यह कहा है कि यदि मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होता है, तो जड़ बुद्धि माता पिता की सन्तान इनके समान जड़बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका उत्तर यह है -शुक्र- शोणित रूप बीज में जिस जिस अवयव का बीज भाग दूषित रहता है, उसी उसी अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाती है । बीज भाग के दूषित न होने से नहीं होती । इसलिये जड़त्व और अजड़त्व अन्धत्व और अनन्यत्व दोनों ही बातों का होना सम्भव है । सब प्राणियों की इन्द्रिया आत्म-कर्म से बनती हैं । इन इन्द्रियों के होने से भाव और न होने से अभाव में दैव कारण होता है । इस कारण से जड़बुद्धि आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान अवश्य ही पिता के समान हो, यह आवश्यक नहीं । वे कभी सदृश होते और कभी नहीं होते हैं ॥ २५ ॥
न चात्मा सत्स्विन्द्रियेष्वसत्सु वा भवत्यज्ञः, न ह्यसत्त्वः कदाचि-दात्मा; सत्त्वविशेषाञ्चोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति ॥ २६ ॥
इन्द्रियों के होने पर आत्मा ज्ञानी होता है, यह भी ठीक नहीं है अथवा इन्द्रियों के न होने पर अज्ञानी रहता है, यह भी नहीं । क्योंकि आत्मा कभी भी सत्त्वरहित नहीं रहता । सत्त्व ( मन ) की विशेषता से ज्ञान विशेष प्राप्त होता है । इसलिये आत्मा का मन के साथ सदा सम्बन्ध रहने पर बाह्य इन्द्रियों
के अभाव में भी नित्य ज्ञान होता रहता है । यही आत्म - ज्ञान है ॥ २६ ॥
भवन्ति चात्र ।
न कर्तुरिन्द्रियाभावात्कार्यज्ञानं प्रवर्तते ।
यः क्रिया वर्तते या तु सा बिना तैर्न वर्तते ॥ २७ ॥
पृष्ठ 67
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२ चरकसंहिता [ अ ० ३
जानन्नपि मृदोऽभावात्कुम्भकृन्न प्रवर्तते ।
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥ २८ ॥
कर्त्ता को इन्द्रियों के अभाव से बाह्य विषयों का ज्ञान नहीं होता । जो क्रिया जिन भावों के द्वारा उत्पन्न होती है, उन भावों के विना वह क्रिया भी नही होती । जिस प्रकार घड़े को बनाने की विधि जानने वाला कुम्हार भी, मिट्टी न हो तो घड़ा नहीं बना सकता, इसी प्रकार बाह्य विषय का ज्ञान भी, इन्द्रियों म हों तो नहीं होता । इसलिये इन्द्रियों के न होने से आत्मा का ज्ञानी होने का गुण नष्ट नही होता । इस महान् आत्मज्ञान के महान् बळ रूप अध्यात्म ज्ञान को सुबो ॥ २७-२८ ॥
इन्द्रियाणि च सक्षिष्य मनः संगृह्य चञ्चलम् ।
प्रविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञाने पर्यवस्थितः ॥
सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते ।
गृह्णीष्व चेदमपर भरद्वाज विनिर्णयम् ॥ ३० ॥
निवृत्तेन्द्रियवाक्चेष्ट. सुप्तः स्वप्नगतान् यदा । विषयान् सुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यत. स्मृत इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटा कर, चचल स्वभाव वाले २६ ॥ ॥ ३१ ॥
मन को आत्मा से अतिरिक्त विषयों से खींच कर आत्मा में प्रविष्ट करने पर आत्मा आत्मज्ञान में स्थित होता है । इस अवस्था में वह सब प्रकार के ज्ञान में बे - रोकटोक जा सकता है, इसी से विना इन्द्रियों के भी सब विषयों को देख लेता है । हे भरद्वाज! इसलिये इस तत्त्व को भी निश्चय रूप से ग्रहण करो । जिस समय इन्द्रिया, वाणी, चेष्टायें आदि सब शान्त होती हैं, और सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्था में बाह्य सुख दुःखों को जानता है, तो भी आत्मा को अज्ञ नहीं कहते । तब भी वह
ज्ञानवान् ही रहता है । २ ९ -३१ ॥
आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते ।
नको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ॥ ३२ ॥
तस्माज्ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च ।
सर्वमेतद्भरद्वाज । निर्णीतं जहि संशयम् ॥ ३३ ॥ इति ॥ ३
आत्म - ज्ञान - आत्मा को छोड़ कर मनोजन्य या इन्द्रियजन्य ज्ञान अकेला उत्पन्न नहीं हो सकता । सब अवस्थाओं मे ज्ञान का कारण आत्मा ही है, क्योंकि असहाय वस्तु अकेली नहीं रह सकती और न विना कारण के उत्पन्न हो सकती है । समाधि और स्वप्नावस्था दोनों मे आत्मा ही ज्ञान का कारण
पृष्ठ 68
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४ ] शारीरस्थानम् ५३ N है । इसलिये आत्मा ज्ञानी है, आत्मा ही प्रकृति ( विकार नहीं ) है, वही सब कार्यों का देखनेवाला और कारण है । हे भरद्वाज! आत्मा का ज्ञानी होना
आदि सब बातों का निर्णय कर दिया । अब सशय को छोड़ दो ॥ ३२-३३ ॥
तत्र श्लोकौ - हेतुर्गर्भस्य निर्वृत्तौ वृद्धौ जन्मनि चैव यः ।
पुनर्वसुमतिर्या च भरद्वाजमतिश्च या ॥ ३४ ॥
प्रतिज्ञाप्रतिषेधश्व विशदवाऽऽत्मनिर्णयः ।
गर्भावक्रान्तिमुद्दिश्य खुड्डीकां तत् प्रकाशितम् ॥ ३५ ॥
गर्भ के जन्म, निवृत्ति और वृद्धि में जो कारण हैं, उस सम्बन्ध में भगवान् आत्रेय का जो मत है और जो भरद्वाज मुनि का मत हैं, भरद्वाज की प्रतिज्ञा का दोष आदि पुनर्वसु कृत स्थित आत्म - निर्णय, ये सब बातें इस खुड्डीका गर्भावक्रान्ति नामक अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ३४-३५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने खुड्डीकागर्भावकान्ति-शारीर नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो महती गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' महती गर्भावक्रान्ति ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
यतश्च गर्भः संभवति, यस्मिन गर्भसंज्ञा, यद्विकारश्च गर्भो, यया चानुपूर्व्याभिनिर्वर्त्तते कुक्षौ यश्चास्य वृद्धिहेतुः, यतश्चास्याऽजन्म भवति, यतश्च जायमानः कुक्षौ विनाशं प्राप्नोति, यतश्च कार्त्स्न्येनाविनश्यन्वि-कृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
जिन कारणों से गर्भ होता है, जिनसे कि इसकी गर्भ सज्ञा होती है, जिन विकारों का परिणाम गर्भ है, जिस अनुक्रम से गर्भाशय या माता के कोख में गर्भ बनता है, जो इस गर्भ की वृद्धि के कारण हैं, जिन कारणों से इसका जन्म नहीं होता, जिन कारणों से कोख में उत्पन्न होकर भी नष्ट हो जाता है और जिन कारणों से गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है, अब उनका वर्णन करेगे ॥ ३ ॥
पृष्ठ 69
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५४ चरकसहिता [ अ ० ४ मातृतः पितृत आत्मतः सात्म्यतो रसतः सत्त्वत इत्येतेभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भः संभवति । तस्य ये येऽवयवा यतो यतः संभवतः संभवन्ति तान्विभज्य मातृजादीनवयवान् पृथक्पृथगुक्तमग्रे ॥ ४ ॥
माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस, सत्व इन छ भावों के समुदाय से गर्भ बनता है । इस गर्भ के जो जो अवयव जिस जिस पदार्थ से उत्पन्न होते हैं, उन सब माता आदि पदार्थों को पृथक् पृथक् रूप मे विभाग करके प्रथम कह चुके हैं ॥ ४ ॥
शुक्रशोणितजीव संयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति ॥ ५ ॥
जिस समय गर्भाशय में शुक्र, शोणित और जीव ( आत्मा ) का संयोग होता है, उस समय इनकी ' गर्भ ' सज्ञा होता है ॥ ५ ॥
गर्भस्तु खल्वन्तरिक्ष- वाय्वग्नि - तोय - भूमि विकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः । एवमनयेव युक्त्या पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मका गर्भश्चेत-नाधात्वधिष्ठानभूतः, स ह्यस्य षष्ठो धातुरुक्तः ॥ ६ ॥
गर्भ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी इन पच महाभूतों के विकार तथा चेतना इन छ घातुओं का अधिष्ठान अर्थात् आश्रय है । इस प्रकार से यह पच महाभूतो के विकार से बना गर्भ चेतना ( आत्मा ) धातु का आश्रय होता है । यही चेतना ( आत्मा ) इस गर्भ का छठा धातु कहाता है । [ धारण करने से ' धातु ' कहता है । आत्मा गर्भ को धारण करता है, इसलिये इसे भी ' धातु ' शब्द से कहा है । ] ॥ ६ ॥
यथा चाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ तदनुव्याख्यास्यामः गते पुराणे रजसि नवे चावस्थिते, पुनः शुद्धस्नातां स्त्रियमव्यापन्न- योनि शोणित- - गर्भा श्यामृतुमतीमाचक्ष्महे, तया सह तथाभूतया यदा पुमानव्यापन्नबीजो मिश्रीभाव गच्छति तस्य हर्षोदीरितः पर शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतोऽ-ङ्गादङ्गात्सभवात, स तथा हर्ष भूतेनात्मनोदीरितश्चाधिष्ठितश्च बीजरूपो धातुः पुरुषशरीरादभिनिष्पत्योचितेन पथा गर्भाशयमनुप्रविश्याऽऽर्तवे-नाभिसंखर्गमेति || ७ || गर्भाशय में जिस क्रम से गर्भ का विकास होता है उसका वर्णन करते हैं-पुराने ऋतुकाल के क्रम से सचित रज के निवृत्त हाने और नये रज के उप-स्थित होने पर स्नान क्रिया द्वारा शुद्ध हुई, रोग रहित योनि, आर्त्तव और गर्भा-शयवाली स्त्री को हम ' ऋतुमती ' कहते हैं । इस ऋतुमती स्त्री के साथ रोग-रहित बीजवाला पुरुष जिस समय सयोग करता है, उस समय हर्ष के कारण
पृष्ठ 70
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४ ] शारीरस्थानम् ५५ शरीर का श्रेष्ठ धातुस्वरूप शुक्र शरीर के प्रत्येक अग से उत्पन्न होता है । वह हर्ष के कारण उत्पन्न तथा हर्ष के ही द्वारा प्रेरित होकर आत्मा का आश्रय भूत यह बीज रूप धातु पुरुष के शरीर से बाहर आकर उचित मार्ग से गर्भाशय में प्रवेश करके आर्त्तव के साथ मिलता है ॥ ७ ॥
तत्र पूर्व चेतनाधातुः सवकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते । स हि हेतु: कारण निमित्तमक्षर कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुगी ग्रहण प्रधान-मव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान्विसुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा चान्तरात्मा चेति ॥ ८ ॥
सबसे प्रथम मन के सावनवाला चेतना- धातु गुण को ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त होता है । उसी चेतना धातु को हेनु, कारण, निमित्त, अक्षर, कर्चा, मन्ता, वेदिता, बोद्धा, द्रष्टा, धाता, ब्रह्मा, विश्वकमा, विश्वरूप, पुरुष, प्रभव, अव्यय, नित्य, गुणी ( गुणवान् ), ग्रहण ( भूतों को ग्रहण करने वाला ), प्रधान, अव्यक्त, जीव, ज्ञ, पुद्गल, चेतनावान्, विभु, भूतात्मा, इन्द्रियात्मा और अन्त-रामा इन पर्यायों से कहते हैं ॥ ८ ॥
सगुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्त; यथा प्रयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूतः सत्वापादानः पूर्वतरमाकाशं. सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान्धातून्वाय्वादश्चतुरः, तथा देह-ग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्त े , ततः क्रमेण व्यक्ततर-गुणान्धातून्वाय्वादश्चतुरः, सर्वमपि तु खल्वेतद् गुणोपादानमणुना कालेन भवति ॥ ६ ॥
वह चेतना धातु गुणों के उत्पत्ति काल में अन्य वायु आदि गुणों से पूर्व, सब से प्रथम अन्तरिक्ष का ग्रहण करता है । क्योकि प्रलय के अनन्तर सृष्टि के प्रारम्भ में सृष्टि को बनाने की इच्छा वाला प्रधान, अञ्चर, पुरुष, सत्त्व को लेकर सब से प्रथम आकाश को बनाता है । इसके बाद क्रम से अधिक व्यक्त गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को उत्पन्न करता है । उसी प्रकार देह के ग्रहण करने के अवसर में भी प्रवृत्त हुआ आत्मा सबसे पूर्व आकाश को ही ग्रहण करता है, फिर क्रम से उससे अधिक स्पष्ट गुणों वाले वायु आदि चार धातुओं को लेता है । इनके गुणों का पूर्ण रीति से ग्रहण करना बहुत थोड़े समय मे ही हो जाता है । [ इस प्रकार आकाश में एक गुण, वायु में दो गुण ( शब्द, स्पर्श ), अग्नि में तीन गुण