श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 571–580
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 571–580
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०१४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८७ अग्निमान्द्य मे और अरुचि मे इसका प्रयोग करना चाहिये । यह घृत बल, वर्ण और अग्नि को बढाता है । इस घृत को स्वतंत्र रूप से या नाना प्रकार के खान - पानो से मिला कर देना चाहिये । इस घृत - साधन मे प्रस्थ का परिमाण ३२ पल समझना चाहिये ' || २३५-२४३ ॥
भवन्ति चात्र — व्यत्यासान्मधुराम्लानि शीतोष्णानि च योजयेत् ।
नित्यमग्निबलापेक्षी जयत्यर्शःकृतान् गदान् ॥ २४४ ॥
अग्नि, बल की अपेक्षा से अभि बल को बढाने के लिये परस्पर अदल-बदल से मधुर और अम्ल तथा शीत और उष्ण क्रिया का प्रयोग करना चाहिये । एक वार मधुर रस फिर अम्ल, एक वार शीतक्रिया फिर उष्णक्रिया करनी चाहिये । इस प्रकार से अर्शजन्य रोग शान्त होते है ॥ २४४ ॥
यो विकाराः प्रायेण ये परस्परहेतवः ।
अर्शांसि चातिसारश्च ग्रहणीदोष एव च ॥ २४५ ॥
एषामभिबले होने वृद्धवृद्धे परिक्षयः ।
तस्मादग्निबलं रक्ष्यमेषु त्रिषु विशेषतः ॥ २४६ ॥
अर्श ',, अतीसार और ग्रहणी ये तीन राग परस्पर एक दूसरे रोग की उत्पत्ति में कारण है । इन तीनो रोगों मे अग्नि बल के घटने से रोग बढता है और अ - बल के बढ़ने पर रोग घटता । इसलिये इन तीन रोगो मे के बल की रक्षा करनी चाहिये ॥ २४५ - २४६ ॥
भृष्टैः शाकैर्यवागूभिषैर्मासरसैः खर्डेः ।
क्षीरतऋप्रयोगैश्च विचित्रैर्गुदजाञ्जयेत् ॥ २४७ ॥
भूने हुए शाको से ( तेल, घी मे बने पत्तो के थाको से ), यूषा से, मास रसो से, खड से तथा नाना प्रकार से दूध या करने से अर्श - रोग की शान्ति करनी चाहिये ॥ २४७ ॥
यद्वायोरानुलोम्याय यदग्निबलवृद्धये ।
अन्नपानीपधद्रव्यं तत्सेव्यं नित्यमर्शसः ॥ २४८ ॥
खास कर अग्नि यवागुओं से, तक्र का प्रयोग जो औषध वायु का अनुलोमन करे, जो खान - पान अग्नि को बढ़ाये, ये सब खान - पान तथा औषध प्रतिदिन अर्श रोगियो को सेवन करनी चाहिये ॥ २४८ ॥
तो विपरीतं स्यान्निदाने यत्प्रदर्शितम् ।
गुदजाभिपरीतेन तत्सेव्यं न कदाचन ॥ २४६ ॥
१. इस वृत को गदनिग्रह मे ' अवाक्पुष्पादि घृत ' कहा है । २ ' कथचन ' इति वा पाठ ' ।
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पुद चरकसहिता [ अ ० १४ जो खान पान वायु का अनुलोमन न करे, अनि को न बढाये तथा निदान
कारणों मे जिसकी गणना की गई है, वह सब अर्ग - रोगी के लिये अपथ्य है ।
वह उनका सेवन कदापि न करे ॥ २४६ ॥
तत्र श्लोकाः - अर्शसा द्विविधं जन्म पृथगायतनानि च ।
स्त्यानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥
अभ्यङ्गाः स्वेदनं धूमाः सावगाहाः प्रलेपनाः ।
शोणितस्यावसेक योगा दीपनपाचनाः ॥ २५१ ॥
पानान्नविधिरयश्च वातवर्चोऽनुलोमनः ।
योगाः संशमनीयाश्च सर्पापि विविधानि च ॥ २५२ ॥
बस्तयस्तयोगाश्च वरारिष्टाः सशर्कराः ।
शुष्काणामर्शसा शस्ताः स्राविणा लक्षणानि च ॥ २५३ ॥
द्विविधं सानुबन्धाना तेषा चेष्ट यदौषधम् ।
रक्तसंग्रहणाः क्वाथाः पेष्याश्च विविधात्मकाः ॥ २५४ ॥
स्नेहाहारविधिश्वायो योगाश्च प्रतिसारणाः ।
प्रक्षालनावगाहाच प्रदेहाः सेचनानि च ॥ २५५ ॥
अतिवृत्तस्य: रक्तस्य विधातव्यं यदौषधम् ।
तत्सर्वमिह निर्दिष्टं गुदजानां चिकित्सिते ॥ २५६ ॥
उपसहार - दो प्रकार के अर्श - रोग की उत्पत्ति, पृथक् पृथक् इनके कारण, स्थान, आकृति, लक्षण, साध्य- असाध्य, अभ्यग, स्वेदन, धूम प्रयोग, अवगाहन, प्रलेप, रक्त का अवसेक, दीपन - पाचन याग, वायु और मल की अनुलोमक खान पान विधि, सशमनीय योग, नाना प्रकार के वृत, बस्तिया, तक्र - प्रयोग, शुष्क अर्श रोगियो के लिये हितकारी शर्करारिष्ट, अरिष्ट, रक्तस्राव रोगियो के लक्षण, दो प्रकार का ( वायु ओर कफ का ) अनुबन्ध इनमे जो चिकित्सा योग्य नहीं है, रक्तसंग्राहक प्रयाग, नाना प्रकार की पेया, स्नेहपान विधि, खान-पान की श्रेष्ठ विधि, परिपेक, अवगाहन, प्रदेह, प्रतिसारण, रक्त के अ खाव होने पर जो क्रिया करनी चाहिये, यह सब इस अर्श - रोग - चिकित्सा मे कह दिया है ॥ २५० - २५६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थानेऽ-शश्चिकित्सितनाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् पूह AAA पञ्चदशोऽध्यायः अथातो ग्रहणीचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ग्रहणी - चिकित्सा की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया हे ॥ १-२ ॥
आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा ।
ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहामिहेतुकाः ॥३ ॥
आयु, वर्ण, बल, स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय ( पुष्टि ), प्रभा, ओज, तेज, नया और प्राण इन सब की स्थिति का कारण देह की जाठर अग्नि ही है ' ॥ ३ ॥
शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ४ ॥
अग्नि के शान्त होने पर प्राणी मर जाता है और अग्नि के युक्त अर्थात् समभाव में रहने पर प्राणी देर तक नीरोग रह कर जीता है । अनि के विकृत
होने ( मन्द या तीक्ष्ण अथवा विषम हो जाने ) पर मनुष्य रोगी हो जाता है ।
इसलिये देहाग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का प्रधान कारण कहा जाता है ॥ ४ ॥
यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादिपोषकम् ।
तत्राग्मितुराहारान्न पक्वाद्रसादयः ॥ ५ ॥
जो अन्न ( भुक्त द्रव्य ) देह के धातु, ओज, बल, वर्ण आदि का पोषक है, वहा पर भी यही अग्नि कारण है । क्योकि विना पचे आहार से रस- आदि धातुओं की उत्पत्ति नही होती ॥ ५ ॥
अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति ।
तद्द्रवैर्भिन्नसंघात स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥
समानेनावधूतोऽग्निरुदयः पवनेन तु ।
काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥
आहार की परिपाक विधि - आदान ( ग्रहण करना ) वायु अन्न को कोष्ठ ( आमाशय ) मे ले जाता है । यह ६ ॥ ७ ॥ कर्म वाला प्राण अन्न द्रव समूहों से ( क्लेदक कफ के द्रव भाग से ) मिल कर छिन्न भिन्न होकर टुकड़े २ हो जाता
१. गीता - अह वैश्वानरो भूत्वा प्राणिना देहमाश्रित ।
प्राणापानसमायुक्त पचाम्यन्न चतुर्विधम् ॥
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चरकसंहिता [ अ ० १५ I AMA है और स्नेह द्वारा ( क्लेदक- कफ के स्निग्ध भाग के कारण ) यह अन्न कोमल हो जाता है । उचित काल मे समयोग अर्थात् उचित मात्रा मृदु आहार को समान नामक वायु से प्रज्वलित जाठर अग्नि लिये भली प्रकार से पचाता है १ ॥ ६-७ ॥ एवं रसमलायान्नमाशयस्थमधःस्थितः । पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम्
अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षडूरसस्य प्रपाकतः ।
मधुरात्प्राक् कफोद्भावात्फेनभूत उदीर्यते ॥
परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः । मे खाये हुए इरा आयु की वृद्धि के ॥ ८ ॥
६ ॥ आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ १० ॥
जिस प्रकार पतीली मे रक्खे जल और चावलो को नीचे जलती हुई अग्नि पका कर भात मे बदल देती है, उसी प्रकार यह जाठराग्नि आमाशय मे स्थित आहार को पका कर ( जीर्ण करके ) रस और मल में बदल देती है । आहार के प्रसाद भाग से रस बनता और शेष मल बन जाता है । खाते समय ही छ. रस वाले अन्न के प्रथम पाक काल मे सबसे पूर्व मधुर रस ( माधुर्य ) उत्पन्न होता है । [ थूक का ' टाईलीन ' भोजन के निशास्ता भाग को शर्करा मे बदल देता है ] । इससे झाग के समान कफ उत्पन्न होता है । पीछे से पचता हुआ यह अन्न विदग्ध होकर ( आमाशय मे पहुच कर आमाशयिक रस की क्रिया होने पर ) अम्ल - भाव मे परिणत हो जाता है । यह अम्लभूत अन्न जब आमाशय से निकल कर पच्यमानाशय ( ग्रहणी के आन भाग ) में आता है तब स्वच्छ पित्त बढता है 3 ॥ ८-१० ॥ १. आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा ऊष्मा वायुः क्लेद स्नेहः काल. समयोगश्चेति ( चक्र ० ) । २. कई आचार्य अन्न के पाक से तीन भागों की उत्पत्ति मानते हैं, स्थूल, सूक्ष्म और मल - भाग | जिस प्रकार गन्ने के रस को पकाने से उस पर बार - बार मलाई आती है, इसी प्रकार धातुओं के अनि द्वारा परिपाक होने पर अन्न के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) सूक्ष्म भाग अगली धातु मे जाता है और ( २ ) स्थूल भाग उसी धातु का पोषण करता है । ( ३ ) मल भाग बाहर हो जाता है । अन्त मे शुक्रानि के पाक से स्थूल और सूक्ष्म दो ही भाग बनते हैं मल भाग नही रहता है । ३. पच्यमानाशय में आहार रस की क्रिया क्षारीय बन जाती है । इसमे
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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६१
पकाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वह्निना ।
परिपिण्डितपक्कस्य वायुः स्यात्कटुभावतः ॥ ११ ॥
जिस समय भुक्त आहार पित्ताशय मे पहुचता है और वहा पर अग्नि के द्वारा सुखाया जाता है तब पानी ( द्रव ) के सूख जाने से यह पक कर पिण्डित बन जाता है । इसके कटु - भाव से इस समय वायु की वृद्धि होती है । क्योकि पच्यमानाशय में आहार रस, आत्र रस, क्लोमरस तथा पित्ताशय के पित्त के मिलने से कटु बन जाता है, इसलिये अब वायु की वृद्धि होती है ( क्योंकि कटु र वायु को बढाता है ) ॥ ११ ॥
अन्नमिष्टं पकृतमिष्टैर्गन्धादिभिः पृथक् ।
देहे प्रीणाति गन्धादीन् प्राणादीनिन्द्रियाणि च ॥
इष्ट गन्ध आदि से युक्त प्रिय और हितकर अन्न शरीर मे आदि गुण घ्राण आदि इन्द्रियों को पृथक् २ तर्पण करता है । और हितकर अन्न के पार्थिव आदि भाग अपने अपने गुणों से इन्द्रियो का तर्पण करते हैं ॥ १२ ॥
भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः । पश्चाहारगुणान्स्वान् स्वान्पार्थिवादीन्पचन्ति हि १२ ॥ पृथक् २ गन्ध अर्थात् स्वादु अपनी अपनी ॥ १३ ॥
भौम, आप्य, आग्नेय, वायव्य और नाभस से पाच प्रकार की ऊष्माए आहार के अपने अपने पार्थिव आदि पाच प्रकार के गुणो का पाक करती है ( पार्थिव आदि अपने अपने गुणों को बढ़ाती है ) ॥ १३ ॥
यथास्वैरेव पुष्यन्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथकू ' ।
पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषाश्च कृत्स्नशः ॥ १४ ॥
अन्न भी पाचभौतिक है, शरीर भी पाचभौतिक है । जाठराग्नि के द्वारा जब अन्न का पाक होता है उस समय भौम अग्नि अपने पार्थिव गुण को बढाती है, आप्य अग्नि जलीय गुण को, वायव्य अग्नि वायु गुण को, आग्नेय अग्नि अग्नि गुण का और नाभस्य अग्नि आकाश गुण को बढाती है । क्योकि शरीर मे द्रव्यों के गुण पृथक् २ अपने २ अंशो से ही पुष्ट होते हैं । पार्थिव गुण पा-र्थिव गुणों को ही सम्पूर्ण रूप मे पुष्ट करते हैं और आप्य आदि शेष अश अपने अम्ली- क्रिया नही रहती क्योंकि पित्त, क्लोम रस, आत्र रस इसको क्षारीय बना देते हैं इससे कटु हो जाता है । बृहदात्र मे पानी का शोषण होने से मल कठोर हो जाता है । १ ' यथास्वं स्व च पुष्यन्ति देहद्रव्यगुणाः पृथक् ' इति ।
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रहर चरकसंहिता [ अ ० १५ अपने आय आदि गुणो को ही पोषण देते है । यथा - गुरु, खर, कठिन आदि पार्थिव गुण है, ये गुण शरीर के गुरु, खर, कठिन आदि भावो को ही बढाएगे गुरु आहार से शरीर मे गुरुता ही आयगी, खर आहार से शरीर मे खरता की ही वृद्धि होगी ॥ १४ ॥
सप्तभिर्दहवातरो धातवो द्विविधं पुनः 1 ।
यथास्वमग्निभिः पाक यान्ति किट्टप्रसादतः ॥ १५ ॥
देह का धारण करने वाले सात वातु अपनी २ अग्नियो द्वारा दो प्रकार के
पाक की प्राप्त हाते है । ( १ ) किट्ट और ( २ ) प्रसाद ॥ १५ ॥
रसाद्रक्तं ततो मासं मासान्मेदस्ततोऽस्थि च ।
अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं शुक्राद् गर्भः प्रसादजः २ ॥ १६ ॥
प्रसादज धातु —-रस से रक्त, रक्त से मास, मास से मेद, मेद से आस्थ अस्थि से मजा, मज्जा से शुक्र और शुक्र से गर्भ को उत्पत्ति होती है । ( १ ) खलेकपातन्याय — दाना बिखेर देने पर जिस प्रकार से बहुत कबूतर आकर बेठते हे और दूर या निकट जाने की अपेक्षा स्वय चुग कर चल पड़ते है उसी प्रकार से एक हा काल मे सब धातुओ का पोषण आहार रस से होता है । ( २ ) केदार - कुल्या- न्याय -- अर्थात् रस ही उत्तरोत्तर धातुआ को आप्लावित करता है 1 । जिस प्रकार कुल्या ( खेत की नाली ), प्रथम क्यारी को सींच कर अगली क्यारो मे चली जाती है इसी प्रकार से रस भी आगे जाता है । ( ३ ) क्षीर - दविन्याय - जिस प्रकार से सम्पूर्ण दूध दही मे बदल जाता है, इसी प्रकार से सम्पूर्ण रस रक्त रूप में परिणत होता है, रक्त मास में इसो तरह । ( ४ ) उत्तरोत्तर धातुओ की वृद्धि - पूर्व धातु रस उत्तर धातु रक्त का बढ़ाता है । रस का प्रसाद भाग ( सूक्ष्म भाग ) रक्त को बढ़ाता है, रक्त का प्रसाद ( सूक्ष्म भाग ) मास को बढाता है इसी प्रकार मे आगे ॥१६ ॥
रसात्स्तन्यं स्त्रिया रक्तमसृजः कण्डराः सिराः ।
मासाद्वसा त्वचः षट् च मेदसः स्नायुसंभवः ॥ १७ ॥
उपधातु — रस से स्त्रियों मे स्तन्य ( दूध ) और आर्त्तव तथा रक्त से कण्ड-राये और शिराये ( नाड़िया ), मास से वसा और छ ' त्वचाये और मेद से स्नायु की उत्पत्ति होती है ॥ १७ ॥
१ ' द्विविधाश्च पुनः पुनः ' इति । २ ' प्रजापते ' इति च पाठः । ३. धातुओं की उत्पत्ति प्रसाद भाग से ही है । रस से अगले वातु किस प्रकार बनते हैं, इसमें तीन मत हैं ।
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अ ० १५ ] ३८ चिकित्सितस्थानम् ५६३
किट्टमन्नस्य विण्मूत्रं रसस्य तु कफोऽसृजः ।
पित्तं मासस्य खमला मलः स्वेदस्तु मेदसः ॥ १८ ॥
स्यात्किटं केशलोमाऽस्थ्नो मज्ज्ञः स्नेहोऽक्षिविदूत्वचाम् ।
प्रसाद कट्टे धातूनां पाकादेवं द्विधच्र्च्छतः ॥ १६ ॥
भुक्त अन्न का किट्ट ( सल ) मल और मूत्र है । रस का कि कफ, रक्त का किट्ट पित्त, मास का कि कान आदि इन्द्रियो का मैल, मेद का किट्ट स्वेद, अस्यो का कि केश ओर लोम, मजा का किट्ट त्वचा का स्नेह भाग और आखों का मैल । शुक्र से मलिन भाग नही बनता । इस प्रकार धातुओ का पाक दो प्रकार का होता है एक प्रसाद रूप में और दूसरा किट्ट रूप मे ॥ १८-१६ ॥
परस्परोपसंस्तम्भा धातुस्नेहपरम्परा ।
वृष्यादीना प्रभावस्तु पुष्णाति बलमाशु हि ॥ २० ॥
प्रसाद और कि ये दोना परस्पर एक दूसर के स्तम्भक हैं, इसी लिये पातु - समता को परम्परा चलती जाती है वृष्य आदि पदार्थों का प्रभाव तो शीघ्र ही शरीर मे बल का पोषण करता है ॥ २० ॥
पढभिः केचिदहोरात्रैरिच्छन्ति परिवर्तनम् ।
संतत्या भोज्यधातूनां परिवृत्तिस्तु चक्रवत् ॥ २१ ॥
कई आचार्य छः अहोरात्र ( २४ X ६ = १४४ घण्टों ) मे धातुओं का परि-वर्त्तन मानते है 1 । अर्थात् रस धातु छ. दिन मे वीर्य रूप में बदलता है । पोष्य रस आदि धातुओ का चक्र के समान निरन्तर परिवर्तन होता रहता है ४ । १. ' पाकादेव विधः स्मृतः " इति वा पाठः । २ देखिये सूत्रस्थान अ ० २८ मे - " ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसा-दाख्याश्च रसमलाभ्या पुष्यन्तः स्वमानमनुवर्त्तन्ते इत्यादि । ” ( क ) वृष्य वाजी-करण द्रव्य अपने प्रभाव से शीघ्र बल, ध्वज प्रहर्ष उत्पन्न करते हैं । जैसे कि कहा भी है- " वाजीकरणास्त्वोषधयः स्वबलगुणोत्कर्षाद् विरेचनवदुपयुक्ताः शुक्रं शीघ्रं विरेचयन्ति ॥ ३ अतः पर क्वचित् पुस्तकेषु २२ - ३५ श्लोकाः पठ्यन्ते । ४. कई आचार्य ( पराशर आदि ) आठवे दिन शुक्र की उत्पत्ति मानते हैं । यथा - आहारोपभोगदिनात् श्व रसत्वं तृतीयेऽह्नि रक्तत्वं चतुर्थेऽह्नि मासता, मेदस्त्वं पञ्चमे षष्ठे त्वस्थित्वं, सप्तमे मज्जता, अष्टमे शुक्रता नियमेन भवति । ( क ) सुश्रुत में एक मास के अन्दर शुक्रोत्पत्ति मानी है । यथा— ' तत्र रसगतो धातु अहरहॠच्छतीत्यतो रसः । स खलु त्रीणि त्रीणि कला-
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५६४ चरकसंहिता [ अ ० १५ ww [ चक्रपाणि की मान्यता है कि धातुओ के परिवर्तन का कोई समय निश्चित नही है । जिस प्रकार एक बलवान् पुरुष यदि जल चक्र को घुमाये तो पानी जल्दी निकल आता है और कमजोर घुमावे तो देर मे निकलता है । इसी प्रकार से तीव्र अग्नि दूध आदि वृष्य पदार्थ शीघ्रता से बल को उत्पन्न कर देते है । मन्दाग्नि हो तो देर मे शुक्रादि ननते है । सुश्रुत ने भी शब्द सन्तान, अर्चिः सन्तान और जल सन्तान का उदाहरण देकर इसको स्पष्ट किया है " । जिस प्रकार शब्द - परम्परा, जल परम्परा और अर्चि. ( प्रभा ) परम्परा क्रमश मध्य, मन्द, तीक्ष्ण रूप में बहती है, इसी प्रकार से धातु परिवत्तन भी न्यूना-धिक काल मे होता रहता है । जल - सन्तान के दृान्त से कभी एक मास तक भीरम का शुक्र बनना कहा है । शब्द के दृष्टान्त से न अतिशीघ्र और न अति-विलम्ब से शुक्रोत्पत्ति होती हे । ये सब दृष्टान्त चक्रदृष्टान्त से ही गतार्थ हो जाते है २ ] ॥ २१ ॥
इत्युक्तवन्तमाचार्य शिष्यस्त्विदमचोदयत् ।
रसाद्रक्तं विसदृशात्कथं देहेऽभिजायते ॥ २२ ॥
रसस्य च न रागोऽस्ति स कथं याति रक्तताम् । सहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताववतिष्ठन्ते, एवं मासेन रसः शुक्री-भवति, स्त्रीणा चार्त्तवम् ।
इसलिये किसी ने कहा है-' केचिदाहुरहोरात्रात् षड्रात्रादपरे परे ।
मासेन याति शुक्रत्वमन्न पाकक्रमादिति ॥
१. सुश्रुत मे -- स शब्दार्चिर्जलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधावत्येव शरीरं केवलम् | २ तत्र दृष्टान्तेन तु परिवृत्तिः कालानियम दर्शयति । तथा चक्र पानीयोद्ध-रणार्थ नियुक्त वाह्यमान बाहुबलप्रकर्षात् कदाचिद् आश्वेव प्रवर्त्तते कदाचिद् बाहुबलप्रकर्षात् चिरेण । एव धातवोऽपि अग्न्यादिसौष्ठवात् शीघ्रमेव परिवर्त्तन्ते । अग्न्यादिवैगुण्ये चिरेण वर्त्तन्ते इति । एव सुश्रुतेनापि ' स शब्दार्चिर्जलसतान-वदणुविशेषेणानुधावत्येव शरीर केवलम् । इत्यत्र कृष्णात्रेयेण रसपरिणामोऽपि अग्न्यादिभेदेन प्रकृष्टाप्रकृष्टकालज उक्त एव । तत्रहि जलसतानदृष्टान्तेन चिरेण मासपर्यन्तेन शुक्रतापत्ती रसस्योक्ता । शब्दसतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्र नाति-चिराच्च शुक्रोत्पत्तिरुक्ता । अर्चिः सतानदृष्टान्तेन तु नातिशीघ्रं नचिराच्च शुक्रोत्पत्ति-र्भवति । तदेतत् सकलं चक्रदृष्टान्तेन गृहीतं ज्ञेयम् ॥ ] ३. ' रगोऽस्ति ' इति वा ।
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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५ ww ~ ^ द्रवाद्रक्तात्स्थिरं मांसं कथं तज्जायते नृणाम् ॥ २३ ॥
द्रवधातोः स्थिरान मांसान्मेदसः संभवः कथम् ' ।
ऋक्ष्णाभ्या मासमेदोभ्यां खरत्वं कथमस्थिषु ॥ २४ ॥
खरेष्वस्थिषु मज्जा च केन स्निग्धो मृदुस्तथा ।
मज्जश्च परिणामेन यदि शुक्रं प्रवर्तते ॥ २५ ॥
सर्वगतं शक्रं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
तथाऽस्थिमध्ये मज्ज्ञश्च शुक्रं भवति देहिनाम् ॥ २६ ॥
छिद्रं न दृश्यतेऽस्थ्नां च तन्निःसरति वा कथम् । जब भगवान् आचार्य इस प्रकार से कह चुके तब शिष्य अग्निवेश ने पूछा हे भगवन्! इस शरीर में रक्त के समान रस नही होता, फिर रस से रक्त बनता है यह कैसे? रस मे कोई रग या लालिमा नही है, फिर वह लाल कैसे हो जाता है । द्रवरूप रक्त से कठिन मास वस्तु किस प्रकार से पुरुषों मे बन जाती है | स्निग्ध चिकने मास और मेद से अस्थियों मे खरता कैसे उत्पन्न हो जाती हे? खुरदरी अस्थियों मे स्निग्ध और कोमल मज्जा कैसे आ जाती है? और यदि • मजा के परिणाम से ही शुक्र बनता है, तो बुद्धिमान लोग शुक्र को सम्पूर्ण देह में व्याप्त क्यो कर बतलाते है? अस्थियो के मध्य मे और मज्जा मे भी शुक्र रहता है, परन्तु अस्थियो में कोई छिद्र दिखाई नही देता, फिर वह उनसे कैसे निकलता है ॥ २२-२६- ॥ एवमुक्तस्तु शिष्येण गुरुः प्राहेदमुत्तरम् ॥ २७ ॥
तेजो रसानां सर्वेषा मनुजानां यदुच्यते ।
पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ॥ २८ ॥
शिष्य अनिवेश के इस प्रकार पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया कि सब मनुष्यों मे जो रसों का तेज है, उससे तथा पित्त की उष्णिमा के राग के कारण यह रस रक्तता को प्राप्त करता है । [ रसों का तेज ही पित्त है । क्योकि सुश्रुत में कहा है- पित्त से अतिरिक्त और कोई अभि इस शरीर मे उपलब्ध नही होती । इसलिये रस रक्त की अनि से ही परिपाक होने पर रक्तवर्ण हो जाता है । जैसा कि सुश्रुत में कहा है- --यकृत और प्लीहा में पहुंच कर यह रस रक्तवर्ण हो जाता है ] ॥ २७-२८ ॥
वाय्वम्बु र तेजसा रक्तमूष्मणा चाभिसंयुतम् ।
स्थिरतां प्राप्य मासं स्यात्स्वोष्मणा पक्कमेव तत् ॥ २६ ॥
१. ' रसात् रक्तात् तथा मासान्मेदस श्वेतता कथम् ' इति च । २. ' वाय्वग्नि-तेजसा ' इति च । ३ ' स्थिरतो प्राप्य शौक्ल्य च मेदो देहेऽभिजायते ' इति च ।
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५६६ चरकसंहिता [ अ ० १५
स्वतेजोऽम्बुगुणस्निग्धोद्रिक्तं मेदोऽभिजायते ।
पृथिव्यग्न्यनिलादीना संघातः स्वोष्मणा ' कृतः ॥ ३० ॥
खरत्वं प्रकरोत्यस्य जायतेऽस्थि ततो नृणाम् ।
करोति तत्र सौषियमस्थ्ना मध्ये समीरणः ॥ ३१ ॥
मेदसस्तानि पूर्यन्ते स्नेहो मज्जा ततः स्मृतः ।
यस्मान्मज्ज्ञस्तु यः स्नेहः शुक्रं सजायते ततः ॥ ३२ ॥
यह रक्त वायु, जल, तेज और अष्णमा से मिल कर स्थिरता को प्राप्त करके मास रूप हो जाता है । यही मास अपनी उष्णिमा से पक कर अपने मास के तेजोगुण और जलीय गुण की स्निग्धता के बढ़ने पर मेदोरूप हो जाता है । इसी मेद की उष्णिमा से पृथिवी, अग्नि, वायु आदि का सघात होकर यह मेद खर ( कठिन ) हो जाता है, जिससे मनुष्या की अस्थिया बनती है । इन अस्थियो के मध्य मे वायु छिद्र उत्पन्न कर देता है । यह छिद्र भाग मेद से भर जाते है । उससे स्नेह रूप मजा उत्पन्न होती है । इस मजा का जो स्नेह-भाग है, उससे शुक्र की उत्पत्ति होती है ॥ २६-३२ ॥
वाकाशादिभिर्भावैः सौपिर्य जायतेऽस्थिषु ।
तेन स्रवति तच्छुक नवात्कुम्भादिवोदकम् ॥ ३३ ॥
स्रोतोभिः स्यन्दते देहात्समन्ताच्छुक्रवाहिभिः । वायु, आकाश आदि के कारण अस्थियों में सच्छिद्रता होती है । इन छिद्रा से शुक्र ऐसे हा टपकता है, जैसे नये घड़े से जल टपकता है ॥ ३३ ॥
हर्षेणोदारितं वेगात्सङ्कल्पाच्च मनोभवात् ॥ ३४ ॥
विलीनं घृतवद् व्यायामोष्मणा स्थानविच्युतम् ।
बस्तो संभृत्य निर्याति स्थलान्निम्नमिवोदकम् ॥ ३५ ॥
यह उत्पन्न शुक्र इन्द्रिय की उत्तेजना और काम सकल्प के कारण उत्पन्न हुए प्रहर्ष ( उत्तेजना ) से प्रेरित होकर सम्पूर्ण शरोर से शुक्रवाही स्रोतों द्वारा वेग से आता है 1 । जिस प्रकार ऊचे स्थान से जल नीचे की ओर बहकर निकल जाता है, उसी प्रकार ( योनि सर्घष आदि रूप ) व्यायाम से उत्पन्न उष्णिमा से घी के समान द्रवीभूत होकर तथा अपने स्वाभाविक स्थान से खिसक कर वीर्य बस्तिदेश मे एकत्र होकर मूत्रमार्ग से निकल जाता है ॥ ३४-३५ ॥ १. ' श्लेष्मणा ' इति च । २. सुश्रुत में भी कहा है-' जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने के रस में गुड़ छिपा रहता है इसी प्रकार पुरुषों के शरीर में शुक्र को समझे, वह सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त रहता है । "