श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 71–80

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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५६ चरकसंहिता [ अ ० ४ ( शब्द, स्पर्श, रूप ), अल में चार गुण ( शब्द, स्पर्श, रूप और रस ) और पृथ्वी में पाच गुण ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) उत्पन्न करता है । ] इसी प्रकार शरीर में गुण उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने पर भी सब से प्रथम आकाश के गुण को ही उत्पन्न करता है, इसके पीछे क्रम से स्पष्ट गुणवाले वायु आदि भूतों को उत्पन्न करता है । भूतों के गुणों का ग्रहण बहुत ही थोड़े समय मे हो जाता है । [ जिस प्रकार सूर्य कान्तमणि में सूर्य की किरणें जाती हुई नही दीखतीं, परन्तु रूई तिनके के जलने से किरणो का आना प्रतीत होता है, उसी प्रकार शरीर के अन्दर भूतों के कार्य से इनके गुणों का तथा चेतना धातु का अनुमान होता है ] ॥ ६ ॥

स तु सर्व गुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि समूच्छितः सर्ववा तुकलनीकृतः खेट भूतो भवत्यव्यक्तविग्रह सदसद्भूताङ्गावयवः ॥ १० ॥

द्वितीये मासि घनः संपद्यते - पिण्ड पेश्यर्बुदं वा, तत्र घनः [ पिण्डः ] पुरुषः, स्त्री पेशी, अर्बुदं नपुंसकम् ॥ ११ ॥

तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च योगपद्येनाभिनिर्व र्तन्ते ॥ १२ ॥

गर्भ का प्रथम रूप खेट - सब गुणों वाला यह चेतना धातु गर्भ रूप में होकर प्रथम मास में मूर्च्छित, निश्श्रेष्ट, गतिरहित अव्यक्त, सम्पूर्ण धातुओं बाल्म, श्लेष्मा के पिण्ड के समान होता है, उस समय उसका शरीर अस्पष्ट रूप अग वाला होता है, उस समय उसके अग पृथक् २ नहीं बने होते । उस समय उसका नाम ' खेट ' होता है । घन - दूसरे मास में यह गर्भ रूप धातु कठिन, पिण्ड गोल माठ के आकार का वा पेशी —— हम्बो मास पेशी के समान वा अर्बुद - गोल और ऊची गाठ के समान बन जाता है | इन में से घन ( पिण्ड ) रूप हो तो पुरुष, पेशी हो तो स्त्री, अर्बुद हो तो नपुंसक होता है । तीसरे मास में सम्पूर्ण इन्द्रिया और शिर आदि सब अग तथा आमाशय आदि अवयव एक साथ बनने लगते हैं ॥ १२ ॥

तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता यथावत्, महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य ताचैवाङ्गावयवान् कांश्चित्पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः - मातृजादयोऽप्यस्य महा-भूतविकारा एव । तत्रास्याऽऽकाशात्मकं - शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं विवेकश्च । वाय्वात्मकं — स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च शारीर्यः । अग्न्यात्मकं - रूप दर्शन प्रकाश. पक्तिरौष्ण्य व । अबात्मक

पृष्ठ 72

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अ ० ४ ] शारीरस्थानम् L रसो रसन शत्य मार्दवः स्नेहः क्लेदश्च | पृथिव्यात्मक गन्धो ब्राण गौरवं स्थैर्य मूर्तिश्च ॥ १३ ॥

गर्भ के अंग और अवयवों में से कुछ अवयव जो कि माता आदि से उत्पन्न होते हैं, प्रथम कह चुके हैं । उन प्रथम कहे हुए अवयवों को भी अब दूसरे प्रकार से महाभूतों का प्रविभाग करते हुए क्रम से प्राप्त तथा अन्य न कहे हुए अगों ( अवयव ) का भी वर्णन करेंगे । माता आदि से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयत्र भी पाचों महाभूतों के विकार ही है । इनमें इस गर्भ के शब्द, श्रोत्र, लघुता, अति सूक्ष्मता और विवेक ये अश आकाश से उत्पन्न होते हैं । वायु से स्पर्श, त्वचा, रूक्षता, प्रेरण, धातु रचना और शारीरिक चेष्टायें उत्पन्न होती हैं । अग्नि से रूप, चक्षु, प्रकाश, पाचन और उष्णिमा ये अश उत्पन्न होते हैं । जल से रस, रसना, शीतलता, कोमलता, स्नेह और क्लेद ये अथ उत्पन्न होते है । पृथिवी से गन्ध, नासिका, भारीपन, स्थिरता ओर कठिनता ये अथ उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥

एवमयं लोकसमितः पुरुषः । यावन्तो हि लोके भावविशेषास्ता-वन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे, तावन्तो लोके, इति बुधारत्वेव द्रष्टु-मिच्छन्ति ॥ १४ ॥

पुरुष की लोकतुल्यता - इस प्रकार पाच महाभूतों के विकारो से बना होने के कारण यह पुरुष लोक समित अर्थात् लोक के तुल्य है । लोक में जितने भी आध्यात्मिक अथवा अहकार आदि भौतिक पदार्थ विशेष हैं, उतने ही सब पदार्थ इस पुरुष मे भी है और जितने भाव ( पदार्थ ) पुरुष में हैं, उतने ही इस लोक में हैं । इस प्रकार से लोक और पुरुष की समानता ज्ञानी पुरुष देखना चाहते है ॥ १४ ॥

एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते, अन्यत्र तेभ्यो भावेभ्यो ऽस्य जातस्योत्तरकाल जायन्ते, तद्यथा - दन्ता व्यञ्जनानि व्यक्तीभावः, तथायुक्तानि चापराणि, एषा प्रकृतिः, विकृति पुनरतो ऽ • न्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिच्च नित्या भावाः सन्ति चानित्याः केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सतिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुरुषलिङ्ग नपुंसकलिङ्ग वा बिभ्रति । ततः स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधान-संश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा-hai भीरुत्ववैशारद्य मनवस्थानम घोगुरुत्वमसहनन शैथिल्यं मार्दवं

पृष्ठ 73

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५८ चरकसंहिता [ अ ० ४ तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि उभ यभागावयवा नपुसककराणि ॥ १५ ॥

इस प्रकार से इस गभ की इन्द्रिया, अग और अवयव एक साथ बनने प्रारम्भ हो जाते है । परन्तु जो पदार्थ इस गर्भ की उत्पत्ति के पीछे बनते हैं, वे गर्भ में बनने आरम्भ नहीं होते । जैसे—- दात, व्यञ्जन, ( मूँछ, दाड़ी आदि ) शुक्र और रज की उत्पत्ति तथा स्थूल मास आदि ये देर में उत्पत्ति के पीछे बनने प्रारम्भ होते हैं । यह तो मनुष्य की प्रकृति अर्थात् स्वभाव है और इसके विपरीत जब कभी दात आदि गर्भ में ही बन जाते हैं, तब यह विकृति कहाती है । इस गर्भ में कुछ पदार्थ नित्य होते है । जो जब तक शरीर रहता है तब तक रहते हैं जमे— हाथ, पाव आदि और कुछ भाव अनित्य हैं जो शरीर के साथ सदा नहीं रहते जैसे - दान आदि । इस गर्भ मे शरीर के साथ जो अग या अवयत्र रहते हैं वे ही अवयव स्त्रीडिंग पुस्पकिंग या नपुपक-लिंग के लक्षणो को धारण करते हैं । इनमें स्त्री और पुरुष के लवणों से ज-विशेष लक्षण भेदक होते हैं, वे प्रधान या मुख्य होते हैं, जिन गुणों की प्रधा ता वा अधिकता रहती है, वही विशेष लिंग या चिह्न बनते हैं । अधिकता न रहने पर वे विपरीत होते हैं । जैसे - क्ली बता, भीरुत्व, मोह, चचलता, कटि से निचले भाग का भारी होना, शरीर का संगठित न होना, शिथिलता, कोमलता तथा स्तन आदि, अन्य जन्म के उपरान्त होने वाले लक्षणों का होना, स्त्रीलिंग की उत्पत्ति में कारण है । इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना पुरुष की उत्पत्ति में कारण है । दोनों प्रकार के अवयव वा लक्षण नपुंसक की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ १५ ॥

तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च तद्द्वै-हृदय्यमाचक्षते वृद्धा । मातृजं चास्य हृदय मातृहृदयेनाभिसबद्धं भवति रसवाहिनीभि संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संप-द्यते । तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वेहृदय्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति कर्तु विमानने हास्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु । तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणो-पचरन्ति कुशलाः ॥ १६ ॥

गर्भ की इन्द्रिया जिस समय बनती है, उसी समय चित्त में सुख दुःख के ज्ञान का सम्बन्ध भी हो जाता है । इसलिये तब से लेकर गर्भ स्पन्दन ( गति )

पृष्ठ 74

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अ ० ४ ] शारीरस्थानम् चूह किया करता है, वह नाना वस्तुओं की याचना करता है । अतः ज्ञानी पुरुष उस समय माता के शरीर में ' द्वैहृदय्य ' अर्थात् दो हृदय को बतलाते है । इस गर्भ का हृदय माता से बनता है, गर्भ का हृदय गर्भ का पोषण करने वान्दी रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा माता के हृदय के साथ सम्बन्धित रहता है । इसलिये माता और गर्भ की इच्छा रसवाहिनी नाड़ी द्वारा मिली रहती है । उस समय माता की इच्छा गर्भ की इच्छा होती है । इसी कारण को देख कर विद्वान् लोग गर्भवती माता की इच्छा का व्याघात करना उचित नहीं जानते । इम माता की इच्छा का विनाश करने मे गर्भ की मृत्यु अथवा गर्भ मे विकार आ जाता है । कुछ बातों में माता और गर्भ का योग और क्षेम ( सुख और रक्षा आदि ) समान होता है । इसलिये कुशल पुरुष प्रिय और हितकारक उपचारों से गर्भिणी का विशेष रूप में उपचार करते हैं ॥ १६ ॥

तस्या गर्भाने हृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदे-क्ष्यामः । उपचारसावन ह्यस्याज्ञाने दोषः । ज्ञानं च लिङ्गतः । तस्मा-दिष्टो लिङ्गोपदेशः । आर्तवादर्शनमास्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषश्छर्दिर-रोचको s स्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनं चोच्चावचेषु भावेषु गुरु-गात्रत्वं चक्षुपोग्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्र्ण्य-मन्यर्थ श्वयथुः पादयोरी पल्लोमराज्युद्गमा योन्याश्च चाटात्वमिति गर्भे पर्यागते रूपाणि भवन्ति ॥ १७ ॥

दो हृदयो के लक्षण - स्त्री के गर्भ स्थिर हो जाने और उसके द्वैहृदय्य अर्थात् दो हृदय हो जाने को पहचानने के लिये सक्षेप में लक्षण कहते हैं । लक्षणो का ज्ञान होने से हो परिचय ठीक २ प्रकार से होती है । विशेष लक्षणों से ही ज्ञान हो सकता है । इसलिये लक्षणों का उपदेश करना आवश्यक है । जैसे - आर्त्तव का दिखाई न देना, मुख से पानी बहना, भोजन में अनिच्छा, वमन ( प्रात काल मे विशेष ), अरुचि, खटाई की विशेष इच्छा, नाना खाद्य पदार्थों में इच्छा, शरीर में भारीपन, आँखों में ग्लानि, स्तनों में दूध, ओठ और चूचकों के चारों ओर खूब गहरे काले रंग का निक्षेप होना, पात्रो मे थोड़ा थाड़ा सूजन, शरीर में रोमाच, योनि में फैलाव ये गर्भ के आने के उपरान्त ( दो - हृदय होने ) के लक्षण हैं ॥१७ ॥

सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्य दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः । उस समय गर्भिणी जो जो वस्तु चाहे वह वह इसको देनी चाहिये, परन्तु गर्भ को हानि पहुचानेवाले कोई पदार्थ नहीं देना चाहिये ।

पृष्ठ 75

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६० चरकसंहिता [ अ ० ४ M WWW ~~ गर्भोपघातकरास्त्विमे भावाः । तद्यथा - सर्वमति गुरुष्णतीक्ष्णं दारुणाश्च चेष्टाः । इमाश्वान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः - देवतारक्षोऽनुचरपरि रक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि बिभृयान्न मदकराणि चाद्यान्यभ्यवहरेन यानमधिरोहेन मांसमश्नीयात्सर्वेन्द्रियप्रतिकूलांश्च भावान् दूरतः परि-वर्जयेद्यचान्यदपि किंचित्त्रियो विद्युः ॥ १८ ॥

ये नीचे लिखी बातें गर्भ का नाश करनेवाली हैं । जैसे- बहुत गुरु, बहुत गरम और बहुत तीक्ष्ण सब पदार्थ ओर दारुण दुखदायी चेष्टायें गर्भ को हानि पहुँचाने वाला हैं । वृद्ध, ज्ञानी पुरुष नीचे लिखी बातों को भी गर्भं को हानि करने वाली बतलाते हैं । जैसे - देवों और राक्षसों के भृत्यो से बचने के लिये गर्भिणी लाल वस्त्रों को न पहिने, मद करने वाले खाद्य पदार्थों को न खावे, सवारी पर न चढे, मास नही खावे, इन्द्रियों के प्रतिकूल सब बातो का दूर से ही छोड़ देवे । इनके अतिरिक्त और भी जिन २ बातो को वृद्ध स्त्रियों बतलावे उनको भी त्याग देव । [ जैसे - कुए में लॉकना, कोठे पर ऊँचा चढ़ना, नदी का तैरना आदि ] ॥ १८ ॥

तया तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्या-प्रार्थनाविनयनार्थमति । प्रार्थनासंधारणाद्धि वायु. कुपितोऽन्त. शरीर-मनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात् ॥ १६ ॥

ती माग होने पर अहितकारक वस्तु भी हितकारक पदार्थ के साथ गर्भिणी को देनी चाहिये । जिससे कि माग या इच्छा या वाह को आघात न पहुँचे । क्योंकि इच्छा का विघात होने से वायु कुपित होकर शरीर के अन्दर फिरता हुआ गर्भ को नाश वा विकृत कर देता है ॥ १६ ॥

चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्व-मधिकमापद्यते विशेषेण ॥ २० ॥

चतुर्थ मास मे गर्भ स्थिर हो जाता है । इसलिये तब से गर्भिणी का शरीर भारी हाने लगता है ॥२० ॥

पञ्चमे मासि गर्भस्य मासशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्यमापद्यते विशेषेण ॥ २१ ॥

पाचवे मास में गर्भ के अन्दर अन्य मासों की अपेक्षा मास और रक्त का अधिक सचय होता है । इसलिये इस मास में गर्भिणी विशेष कमजोर हा जाती है ॥ २१ ॥

पृष्ठ 76

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अ ० ४ ] शारीरस्थानम् ६१

मा गर्भस्य कर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः ।

तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण ॥ २२ ॥

छठे महिने में और मासों की अपेक्षा गर्भ में बल और वर्ण की वृद्धि विशेष रूप से होती है । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर बल और वर्ण की विशेष हानि होती है ॥ २२ ॥

सप्त मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तद्रा गर्भिणी सवी-कारैः क्लान्ततमा भवति ॥ २३ ॥

सातवें मास मे गर्भ मे मास, रक्त आदि सब पदार्थ एक साथ बढ़ते हैं । इसलिये इस मास में गर्भिणी के अन्दर मास, रक्त आदि सब प्रकार से घट जाते हैं, अतः वह सब प्रकार से कृश हो जाती है ॥ २३ ॥

अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भवश्च माता रसवाहिनीभिः संवा-हिनीभिर्मुहुरोजः परस्परत आददातेग र्भस्यासंपूर्णत्वात् तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदा युक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च ग्लाना तथा गर्भः, तस्मा-तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्यात्, त चैवमभि-समीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशला. ॥ २४ ॥

आठवे मास में रस को ले जाने वाली रसवाहिनी नाड़ियों द्वारा ओज माता से गर्भ में और गर्भ से माता मे बार बार कभी इधर कभी उधर परस्पर आता जाता रहता है । क्योंकि इस समय गर्भ असम्पूर्ण रहता है । इसलिये इस समय गर्भिणी बार बार प्रसन्न और बार बार म्लान होती है । इसी प्रकार गर्भ भी बार बार प्रसन्न और बार बार ग्लान होता है । जिस समय ओज माता मे रहता है तब माता प्रसन्न और गर्भ म्लान और जब ओज गर्भ में रहता है उस समय गर्भ प्रसन्न और माता म्लान रहती है । इसलिये ओज के स्थिर न होने से गर्भ का जन्म आपत्तिजनक होता है । इस मास में जन्मा हुआ गर्भ निश्चित रूप में जीवित उत्पन्न नही होता । गर्भ में ओज हा तत्र यदि गर्भ बाहर आये तो बालक जीवित बाहर आता है, परन्तु माता की मृत्यु होना सम्भव है । यदि ओज माता में हो तब गर्भ बाहर आये तो मृत बालक बाहर आता है । इस दृष्टि से ज्ञानी पुरुष आठवे मास को गर्भिणी के सामने नही गिनते । क्योंकि -यदि इसी मास की उत्पत्ति को गर्भिणी सुन ले तो सम्भवतः डर जाये । इस भय के कारण वायु कुपित होकर गर्भ का नाश कर सकता है ॥ २४ ॥

तस्मिन्नेकदिवसातिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकाल-मित्याहुरादशमान्मासात्, एताचान्कालः, परं कुक्षाच वस्थानं गर्भस्यं ॥ २५ ॥

पृष्ठ 77

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III चरकसहिता [ अ ० ४ एवमनयाऽऽनुपृर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ ॥ २६ ॥

आठवें मास के व्यतीत होने पर एक दिन चढने पर नवम मास से लेकर दस वें मास तक के समय तक ' प्रसव काल ' कहते हैं । [ सुश्रुत में बारहवें मास तक प्रसव काल माना है । साधारणतः २८० दिन के पश्चात् प्रसव काल होता हैं ] । इसके उपरान्त गर्भ का कुक्षि मे अधिक समय रहना दोषयुक्त, रोग आदि के कारण जानना चाहिये । इस प्रकार उपरोक्त क्रम से गर्भ कुश्चि भ बनता ओर वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ २५-२६ ॥ मात्रादीना तु खलु गर्भकराणा भावाना संदिस्तथा वृत्तस्य सांष्ठ-वान्मातृतश्चैवोपस्नेहोपस्वेदाभ्या कालपरिणामात्स्वभावसंसिद्धेश्व कुक्षों वृद्धि प्राप्नोति ॥ २७ ॥

गर्म की वृद्धि के कारण - गर्भ को बनाने वाले माता - पिता आदि कारणों के उत्तम होने से, आचार की श्रेष्ठता मे, उपस्नेह तथा उपस्वेद [ शरीर की गरमी जैसे की पक्षियों के शरोर की गरमी से अण्डे पोषित होते हैं ] इन गुणों से, काल के परिणाम से और स्वभाव से ही गर्भ गर्भाशय से बढता है ॥२७ ॥

मात्रादीनां तु खल गर्भकराणा भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्या जन्म भवति ॥ २८ ॥

ये त्वस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषा शमापद्यतेऽथवाऽप्यचिरजातः स्यात् ॥ २६ ॥

गर्भ को बनाने वाले माता पिता आदि कारणों के जन्म नहीं होता 1 । जो पदार्थ गर्भाशय मे गर्भ की वृद्धि में के विपरीत होने से गर्भ या तो पेट मे नष्ट हो जाता है उत्पन्न हो जाता है ॥ २८-२६ ॥ गर्भविकृति के कारण — विपर्ययादुदरे विना-दूषित होने से गर्भ का कारण बताये हैं, इन , अथवा समय से पूर्व यतस्तु कात्स्न्र्त्स्न्येनाविनश्यन्विकृतिमापद्यते तदनुव्याख्यास्यामः- -यदा स्त्रिया दोषप्रकोपणोक्तान्या सेवमानाया दोषाः प्रकुपिताः शरीरसु-पसर्पन्तः शोणितगर्भाशयानुपपद्यन्ते न तु कार्त्स्न्येन शोणितगर्भाशया दूषयन्ति तदेयं गर्भ ' लभते स्त्री । यदा गभस्य तस्य मातृजानामवय-वानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यते एकोऽथवाऽनेके । यस्य यस्य ह्यावयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयव विकृातराविशति यदा हास्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागः प्रदोषमाप-द्यते, तदा वन्ध्या जनयति । यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभा-

पृष्ठ 78

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अ ० ४ १ शारीरस्थानम् ६३ ~~ www गावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति । यदा त्वस्याः शोणिते गर्भाशय बीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः

प्रदोषमापद्यते, तदा स्याकृति भूयिष्ठामस्त्रियं रान्ता ' नाम जनयति ।

ता स्त्रीव्यापदमाचक्षते ॥ ३० ॥

जिम प्रकार गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है. उसका वर्णन करते हैं- जिस समय दोषो को प्रकुपित करने वाले कारणो का सेवन करती हुई स्त्री में प्रकुपित हुए दोप शरीर में फैल कर रक्त और गर्भाशय मे पहुच जाते हैं, परन्तु सम्पूर्ण रूप से रक्त और गर्भाशय को दूषित नहीं करते, उस समय यदि स्त्री को गर्भ रह जाये तो माता से उत्पन्न हाने वाले गर्भ के अवयवों में से किसी एक में अथवा बहुतों मे विकार उत्पन्न हो जाता है । जिस जिस अवयव के बीज मे अथवा बीज के एक भाग मे दोष प्रकुपित होत हैं, तब उस उस अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाता है । जिस समय स्त्री के रक्त में गर्भाशय का बीज ( उत्पत्ति कारण ) भाग दूषित हो जाता है, तब तब संतान वन्ध्या ( बोझ ) उत्पन्न होती हे और जब स्त्री का रक्त या गर्भाशय के बीज का एक भाग दूषित होता है, तब ' पूति प्रजा ' ( सडे अर्गो वाली ) सन्तान उत्पन्न होती है । जिस समय स्त्री का रक्त और गर्भाशय के बीज का एक भाग तथा स्त्री को बनाने वाले शरीर के बीजभागों का एक भाग दूषित हो जाता है, तब स्त्री के लक्षणों वाली ( उपस्थ, स्तन आदि लक्षणों से युक्त ) परन्तु अस-म्पूर्ण लक्षणों वाली ' रान्ता ' या वार्चा नाम की प्रजा को उत्पन्न करते हैं । इसको स्त्री व्यापत् अर्थात् स्त्री के आर्त्तव दोष से उत्पन्न व्यापत्ति वा स्त्री शरीर की रचना में होने वाली हानि कहते हें ॥ ३० ॥

एवमेव यदा पुरुषस्य बीजे बीजभाग प्रकोपमापद्यते, तदा वन्ध्य जनयति । यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा पूतिप्रजा जनयति । यदा त्वस्य बीजे बजभागावयवः पुरुषकराणां व शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदाषमापद्यते, तदा पुरुषाकृति भूयिष्ठमपु-रुप तृणपूलिक नाम जनयति, ता पुरुषव्यापदमाचक्षते ॥ ३१ ॥

इसी प्रकार पुरुष के बीज ने बोज का भाग दोष युक्त होता है, तब पुरुष बन्ध्य को उत्पन्न करता है और जब पुरुष के बीज में पुरुष का उत्पन्न करने वाले बीज का एकभाग दूषित होता है तब ' पूति प्रजा ' अर्थात् दुर्गन्धयुक्त अगो वाली सतान उत्पन्न होती है और जब पुरुष के बीज को १ ' वार्ता नाम ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 79

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६४ चरकसंहिता [ अ ० ४ उत्पन्न करने वाले बीज का कोई एक भाग का भी कोई अंध दूषित होता है, तथा पुरुष शरीर को बनाने वाले भागों का एक अश दूषित हो जाता है, तब पुरुष के समान बहुत सी आकृति वाला, जो वास्तव में पुरुष नहीं होता ऐसे ' तृण पूलिक ' नामक सतान को उत्पन्न करता है । इसको पुरुष व्यापत् कहते हैं, [ क्योकि यह पुरुष से प्राप्त होने वाले और पुरुष शरीर को बनाने वाले बीजाश-दोप से गर्भ में विघ्न आता है ] ॥ ३१ ॥

एतेन मातृजाना पितृजानां चावयवाना विकृतिव्याख्यानेन सात्म्य-जानां रसजाना सत्त्वजानां चावयवाना विकृतिर्व्याख्याता ॥ ३२ ॥

इस प्रकार माता पिता से उत्पन्न होने वाले अवयवों से सात्म्य, रस और सत्र इन से होने वाली अवयवों की हुआ जान लेना चाहिए ॥ ३२ ॥

निर्विकार. परस्त्वात्मा सर्वभूताना निर्विशेषः विशेषाद्विशेषोपलब्धिः ॥ ३३ ॥

गर्भ आत्मजन्य भी है, परन्तु इस कारण से गर्भ में होता । क्योकि श्रेष्ठ आत्मा निर्विकार ( विकार - रहित ) है । समान रूप से रहता है । मन और शरीर की विशेषता से का विशेष ज्ञान होता है ॥ ३३ ॥

तत्र त्रयस्तु शरीरदोषाः वातपित्तश्लेष्माणः, ते द्वौ पुनः सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तो सवं दूषयतः । की विकृति के वर्णन विकृति का भी वर्णन । सत्त्वशरीरयोस्तु विकार उत्पन्न नहीं वह सब प्राणियों में इसे सुख- दु.ख आदि शरीर दूषयन्ति । ताभ्यां च सत्व-शरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम् || ३४ || धरीर के तीन दोप होते हैं, वात, पित्त और कफ | ये दोष शरीर को दूषित करते हैं । मन के दो दोष हैं रज और तम । ये दोनों मन ( सत्त्व ) को दूषित

करते हैं । इन दोनों— मन और शरीर के दुष्ट होने से विकार उत्पन्न होता है ।

और इनके दूषित न होने से विकृति भी नहीं होता ॥ ३४ ॥

तत्र शरीर योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तम ॥ ३५ ॥

प्रथम ' खुड्डीका अध्याय ' में कह चुके हैं कि योनि भेद से यह शरीर चार प्रकार का ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज ) है ॥ ३५ ॥

त्रिविधं खल सच्यं - शुद्धं राजस, तामसमिति । तत्र शद्धमदोष-माख्यातं कल्याणाशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यात रोषांशत्वात्, तथा तामसमपि सदोषमाख्यात मोहांशत्वात् ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 80

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अ ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५ तेषा तु त्रयाणामपि सत्त्वानामेकैकस्य भेदाप्रमपरिसंख्येयं तरतम-योगाच्छरीर - योनि - विशेषेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च । शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते सत्वं च शरीरं । तस्मात्कतिचिच्च सत्वभेदाननू-कसादृश्याभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यामः ॥ ३७ ॥

सत्व ( मन ) तीन प्रकार का है । शुद्ध, राजस और तामस । इनमें शुद्ध ( सात्विक ) दोषरहित है, क्योंकि यह शुभ ( कल्याण ) कामना का अश है । राजस दोष युक्त है? क्योंकि वह रोष का अय है । तामस भी दोष युक्त है । क्योंकि वह मोह का अय है । इन तीनों सवों में से एक एक के भेद तर, तम, योग से शरीरविशेष, योनि विशेष और एक दूसरे में परस्पर में मिले होने से असख्य हा जाते है । शरीर भी सव ( मन ) के अनुसार होता है और मन शरीर के अनुसार होता है । इनमें से कुछ भेदों की तुल्यता दिखाते हुए यहाँ पर दृष्टान्त रूप में बतलाते है ॥ ३६-३७ ॥ तद्यथा - शुचिं सत्याभिसंवं जितात्मानं सविभागिनं ज्ञान - विज्ञा-न - वचन - प्रतिवचन - शक्ति- सपन्न स्मृतिमन्तं काम - क्रोध - लोभ - मान-मोहेर्ष्या - हर्षामर्षापेत सम सर्वभूतेषु ब्राह्म विद्यात् ॥ ३८ ॥

सात्त्विक चित्तो के सात भेद - ( १ ) ब्राह्म - पवित्र, सत्य प्रतिज्ञावाला, जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फल को अन्यों में बाटकर भोगने वाला, ज्ञान-विज्ञान, वचन - प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान्, काम, क्रोध, लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में सम बुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति जाने ॥ ३८ ॥

इज्याध्ययन - व्रत - होम - ब्रह्मचर्य - परमतिथिव्रतमुपशान्त - मद - मान-राग - द्वेष - मोह- लोभ - रोष प्रतिभा वचन - विज्ञानोपधारण - शक्ति - संपन्नमार्ष विद्यात् ॥ ३६ ॥

( २ ) आर्ष - जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक होम-शील ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथि का पूजक, मद, मान राग, द्वेष, मोह, लोभ और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारण इन शक्तियों से सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्ष चित्त वाला जाने ॥ ३६ ॥

ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्य यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतम क्लि-कर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरत मैन्द्र विद्यात् ॥ ४० ॥

( ३ ) ऐन्द्र - जो ऐश्वर्यवान्, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यश करने वाला, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त, साहसिक ( बुरे, दूसरे पर आघात पहुॅचाने