श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 81–90
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 81–90
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६६ चरकसंहिता [ अ ० ४ ~ / www.w वाले ) क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त पुरुष को ' ऐन्द्र ' समझे ॥ ४० ॥
लेखास्थवृत्त ' प्राप्तकारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्य-लम्भिनं व्यपगतराग - द्वेष- मोहं याम्यं विद्यात् ॥ ४१ ॥
( ४ ) याम्य- जो कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की मर्यादा के भीतर रहनेवाला, प्रातकारी, ( अवसर के अनुसार काम करने वाला ), असप्रहार्य अर्थात् जिस पर कोई प्रहार न कर सके वा जिसकी मार रोकी न जा सके, उन्नतिशील, स्मृतिमान्, ऐश्वर्य्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको ' याम्य'जाने ४१ शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं यज्वानमम्भोविहार - रतिमक्लिष्टकर्माण स्थानकोपप्रसादं वारुण विद्यात् ॥ ४२ ॥
( ५ ) वारुण – जो शूरवीर, वीर, पवित्र ओर मैलेपन से द्वेष करनेवाला यज्ञ करने वाला, जल क्रीड़ा में रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले कर्मों को करने वाला, उचित स्थान में कोप तथा प्रसाद करने वाला पुरुष हो उसको ' वारण जाने ॥ ४२ ॥
स्थान मानोपभोगपरिवारोपपन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं शचि व्यक्तकोपप्रसाद कौबेरं विद्यात् ॥ ४३ ॥
( ६ ) कौवेर -- जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार ( कुटुम्ब ) से युक्त, नित्य धर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र सुखपूर्वक विहार विनोद करने वाला, उचित स्थान पर कोप और प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो उसको ' कौवेर ' प्रकृति का जाने ॥ ४३ ॥
प्रिय नृत्य गीत - वादित्रोल्लापक श्लोकाख्यायिकेतिहास - पुराणेषु कुशलं गन्ध - माल्यानुलेप - नव - वसन - स्त्रीविहार- नित्य मनसूयक गान्धर्व विद्यात् ( ७ ) गान्धर्व - जो नृत्य, गीत, बाजे, स्तोत्र, श्लोक, आख्यायिका, इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला, अनु-लेपन, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिन्द्य पुरुष हो उसको ' गान्धर्व ' जाने ॥ ४४ ॥
इत्येवं शुद्धस्य सवस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात्कल्याणांशत्वात्, संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत् ॥ ४५ ॥
ये शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं, ये शुभ या कल्याण के अथ है । इसके सयोग होने से ' ब्राह्म ' को ही सब से अधिक शुद्ध निर्दोष जाने ॥ ४५ ॥
राजस सत्त्व के ६ भेद–
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37047 शारीरस्थानम् ६७ शूरं चण्डमसूयकमश्वयवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजक-मासुरं विद्यात् ॥ ४६ ॥
( १ ) आसुर - जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरे की निन्दा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको ' आसुर ' जाने ॥ ४६ ॥
अमर्षणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमा मिषप्रियतम स्वप्नायासबहुलमीषु राक्षसं विद्यात् ॥ ४७ ॥
( २ ) राक्षस - जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात् शत्रु के कमजोर स्थान पर चोट करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्या-शील हो उसको ' राक्षस ' चित्त वाला जाने ॥ ४७ ॥
महालसं ( शनं ) स्त्रैण स्त्रीरहस्काममशुचि शुचिद्वेषिणं भीरु भीषयि-तारं विकृत - विहाराहार - शील पैशाचं विद्यात् ॥ ४८ ॥
( ३ ) पैशाच - जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव का, स्त्रियों के साथ एकान्त मे रहने की इच्छावाला, अपवित्र, शुद्धता वा स्वच्छता से द्वेष करनेवाला, भीरु, दूसरों को डरानेवाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको ' पैशाच ' स्वभाव का जाने ॥ ४८ ॥
क्रुद्धं शूरमक्रुद्धं भीरु तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्वगोचरमाहारविहा-परं सापं विद्यात् ॥ ४६ ॥
( ४ ) सार्प - जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोधित होने पर भीरु, तीखे स्वभाव का, परिश्रम करनेवाला, भययुक्त स्थानों मे भी दीखनेवाला और आहार विहार करने वाला हो उस पुरुष को ' सार्प ' स्वभाष का जाने ॥ ४६ ॥
आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकम संविभागिनमतिलो लुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ५० ॥
( ५ ) प्रैत -- जो सदा भोजन की इच्छा करने वाला, बहुत दुःखकारी शील और आचार और उपचार से युक्त, निन्दा करने वाला, दूसरों को अपने धन में से भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरुष हो उसको ' व्रत ' अर्थात् प्रेत स्वभाव का जाने ॥ ५० ॥
अनुषक्तकाममजस्रमाहार - विहार पर मनवस्थितममर्षिणमसंचयं-शाकुणं विद्यात् ॥ ५१ ॥
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६८ चरकसंहिता [ अ ० ४ w www इत्येवं खलु राजसस्य सत्वस्य षविध भेदाशं विद्याद्रोषांशत्वात् ५२ ( ६ ) शाकुन -- जो कामों मे फसा हुआ, निरन्तर आहार - विहार मे लिस, चचल, असहनशील, सचय न करने वाला पुरुष हो उसको ' शाकुन ' जाने । इस प्रकार से रोष अर्थात् क्रोव के अश होने से राजस सत्व के ये छः भेद जाने ॥ ५१-५२ ॥ तामस के तीन प्रकार-निरलंकरिष्णुमधमवेश जुगुप्सिताचाराहार -मैथुन पर स्वप्नशील पाशवं विद्यात् ॥ ५३ ॥
( १ ) पाशव - जो शरीर को अलकृत करने की इच्छा न रखने वाला, अपवित्रस्वभाव, निन्दितआचार और भोजनवाला, मैथुनकामी, सोने के स्वभाववाला पुरुष हो उसको ' पाशव ' प्रकृति का जाने ॥ ५३ ॥
भीमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्त - काम - क्रोध सरणशीलं तोयकाम मात्स्य विद्यात् ॥ ५४ ॥
( २ ) मात्स्य - जो डरपाक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिरचित्त, चंचल, काम और क्रोध में फसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह करनेवाला हो उसको ' मात्स्य ' प्रकृति का जाने ॥ ५४ ॥
अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्धया हीनं वानस्पत्यं विद्यात् १५ इत्येव खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविध भेदाश विद्यान्मोहांशत्वात् ५६ ( ३ ) वानस्पत्य - जो आलसी, केवल भोजन में ही दत्तचित्त, सब प्रकार के ज्ञान वा बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको ' बानस्पत्य ' अर्थात् स्थावर प्रकृति का जाने | इस प्रकार से मोह का अथ होने से तामस सत्त्व के तीन भेद हैं || ५५-५६ ॥ इत्यपरिसख्येयभेदानां खल त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः शुद्धस्य सन्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षि शक्र- वरुण - यम- कुबेर-गन्धर्व - सत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्य - राक्षस - पिशाच - सर्प - प्रेत-शकुनि सत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशु- मत्स्य- वनस्पति- सवा-नुकारेण । कथ च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति । केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः । तस्यार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्य - गर्भकराणा व भावानामनुसमाधिर्विघातश्च विघातकराणा भावानामिति ॥ ५७ ॥
इस प्रकार से तीनों प्रकार के सत्त्वों ( चित्तों ) के असंख्य भेद होने पर भी कुछ मेदों के कुछ अंश की व्याख्या कर दी है । ब्रह्म, ऋषि, शुक्र, यम,
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अ ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६ वरुण, कुबेर, गन्धर्वं इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं । दैव्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस सत्त्व के छः भेद हैं । पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके तत्व के अनुसार तामस सव के तीन भेद हैं । किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ बर्चा हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है । इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह गर्भावान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप मे कह दिया है । इसमें जानने के प्रयोजन, गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय मे सम्पूर्ण रूप मे कह दिया है ॥५७ ॥
तत्र श्लोकाः - निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षो क्रमेण च ।
वृद्धि गर्भस्य पार्थाः शुभसज्ञिताः ॥ ५८ ॥
अजन्मनि यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि ।
इमास्त्रनिशुभान भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥ १६ ॥
शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् ।
सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ ६० ॥
अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति ।
ये च गर्भविघातोक्ता भावास्तांश्चाप्युदारधीः ॥ ६१ ॥
गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है - गर्भ का कारण, आमा, प्रकृति, बुद्धि और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण । ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते हैं । गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन बातें गर्भ को नाश करनेवाले ' अशुभ ' कहे जाते हैं । जो वैद्य इन शुभ - अशुभ रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने योग्य है । उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥ ५८- ६१ ॥ इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव-क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ।
अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ' पुरुषविचय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
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७० चरकसंहिता [ अ ० ५ A00 पुरुषोऽयं लोकसंमित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यात्रन्तः पुरुषे तावन्तो लोके, इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - नैतावता वाक्ये -नोक्तं वाक्यार्थमवगाहामहे, भगवता बुद्धचा भूयस्तरमनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामहे - इति । ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने उपदेश किया है कि यह पुरुष लोक के तुल्य है, लोक में जितने भी विशेष भाव ( पदार्थ ) है, वे सब इस पुरुष ( शरीर ) मे हैं, और जितनी बाते इस पुरुष मे हैं, उतनी ही सब लोक में हैं, इस प्रकार कहते हुए भगवान् पुनर्वसु को शिष्य अग्निवेश ने कहा-हे भगवन्! इतना कह देने से ही हम सम्पूर्ण वाक्यार्थ नही समझ सकते । हे भगवन्! आपकी बुद्धि से हम अधिक विस्तार में इसको सुनना चाहते हैं । तमुवाच भगवानात्रेयः - अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषा, पुरु-पावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येया । तेषा यथास्थूलं भावान् सामान्य-मभिप्रेत्योदाहरिष्यामः तानेकमना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्नि-वेश | षड्धातव. समुदिता ' लोक ' इति शब्द लभन्ते । तद्यथा - पृथि-व्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समु-दिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते ॥ ३ ॥
इस पर अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा - लोक के विशेष अवयव ( वृक्ष, तृण, पशु आदि ) तथा पुरुष के विशेष अवयव ( स्नायु, कण्डरा, धमनी आदि ) भी असख्य हैं । परन्तु यहा पर मोटी माटी बातो का सामान्य रूप से दिग्दर्शन करायेगे । हे अग्निवेश! उनका वर्णन एकाग्र चित्त होकर ध्यान से सुनो! छ धातुऐ मिलकर एक समुदाय ' पुरुष ' नाम से कहे जाते हैं । अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और अव्यक्त ब्रह्म । इन छ धातु का समुदाय मिलकर ' पुरुष ' ऐसा कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्ति, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसंतापो, वायुः प्राणो, वियच्छुषिराणि, ब्रह्माऽन्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूति, ब्रह्मणो विभूतिलोंके प्रजापति-रन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सरख, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यास्तु आदान, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादो, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं,
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अ ० ५ ] शारीरस्थानम् ७१ ^^ यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं 9 यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं यथा कलिरेवमातुर्य, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एव-मनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश | सामा-न्य विद्यात् ॥ ४ ॥
इस पुरुष मे पृथिवी कठिन भाग है, क्लेद अर्थात् जलवाळा अथ आप ( जल ) है, तेज उष्णिमा है, वायु प्राण है, आकाश छिद्ररूप है, ब्रह्म अत्मा है । नि प्रकार लोक में ब्रह्म को विभूति है उसी प्रकार पुरुष मे अन्नरात्मा की विभूति ( ऐश्वन ) है । लोक मे ब्रह्म की विभूति प्रजान से है, पुरुष में अन्त-रामा की विभूति ' सत्त्व ' है । लोक में जो इन्द्र है, पुरुष में वही अहकार है । लाक में जो आदित्य है, पुरुष में वही आदान हे । लोक मे जो रुद्र है पुरुष में ही रोष ( क्रोध ) है । लोक का सोम पुरुष मे प्रसाद है । लोक में जो वसु हैं, वे पुरुष मे सुख हैं । लोक के दो अश्विनी हैं, पुरुष मे वे हो कान्तिरूप हैं । लोक से जो मस्त हैं पुरुष मे वह उत्साह है । लोक में जो विश्वेदेव हैं, पुरुष में वे इन्द्रिया और इन्द्रियों के विषय हैं । लोक का तम पुरुष मे मोह है । लोक की ज्योति पुरुष में ज्ञान है । जिस प्रकार लोक में सर्ग अर्थात् सृष्टि का प्रारम्भ है उसी प्रकार पुरुष में गर्भाधान क्रिया है । जिस प्रकार लोक में सतयुग है उसी प्रकार पुरुष में बाल्य अवस्था है । जिस प्रकार लोक में त्रेतायुग है उसी प्रकार पुरुष में योवन है । जिस प्रकार लोक में द्वापर है उसी प्रकार पुरुष में बुढापा है । जिस प्रकार लोक में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष में रोग है । जिस प्रकार लोक में युग का समाति है उसी प्रकार पुरुष में मृत्यु हे । इस प्रकार से हे अग्निवेश! लोक और पुरुष इन दोनों के उन २ विशेष अवयवों को समानता को अनुमान के द्वारा जान लेना चाहिये जिनका यहा वर्णन नही किया है ॥ ४ ॥
इत्येववादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - एवमेतत्सर्व मनप बाद यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्वस्य सामान्यो-पदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा है भगवन् ' आपने जो लोक और पुरुष की समानता कही है वह बिना किसो अपवाद के निर्विवाद ठीक है । परन्तु इस समानता के उपदेश का प्रयोजन क्या है? ॥ ५ ॥
भगवानुवाच –— कथमद्मिवेश! सर्व लोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके समनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पत्स्यते इति, सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो
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७२ चरकसंहिता [ अ ० ५ भवत्यात्मैव सुखदुःखयो कर्ता नान्य इति, कर्मात्मकत्वाच हेत्वादिभि
युक्तः सर्वलोकाऽहमिति विदित्वा ज्ञान पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गाति ।
तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्द, षड्धातुसमुदायो हि सामान्यत-सर्वलोकः ॥ ६ ॥
भगवान् बोले — हे अग्निवेश क्योंकि - अपने में सम्पूर्ण लोक और सम्पूर्ण लोक में अपनी समानता देख कर ' सत्य बुद्धि ' उत्पन्न होती है । सम्पूर्ण लोक को अपने में देखने मे प्रतीत होता है कि अपना आत्मा ही सुख - दुःख का कर्त्ता है और दूसरा नहीं । कर्म के कारण यह सब कुछ होने से तथा आगे कहे जाने वाले हेतु आदि से ‘ मैं सम्पूर्ण लोक हू ' ऐसा जान लेने पर ही मोक्ष के लिये प्रथम ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यहा ' लोक ' शब्द सयोग की अपेक्षा से है । छः धातुओं का समुदाय ही सामान्यत ' ' सर्वलोक ' है ॥ ६ ॥
तस्य हेतुरुत्पत्तिर्वृद्धिरुपसवो वियोगश्च । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं, उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनं, उपसत्रो दुःखागम । षड्धातुविभागो वियोग, स जीवापगमः, स प्राणनिरोधः, स भङ्गः, स लोकम्बभावः । तस्य मूलं सर्वोपलवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः । प्रवृत्तिर्दुःख निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत्सत्य, तस्य हेतुः सर्वलोकसामा-न्यज्ञान, तत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ७ ॥
उसके उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव और वियोग ये पाच हेतु हैं 1 । इनमें से उत्पत्ति के कारण को ' हेतु ' कहते हैं । उत्पत्ति का अर्थ ' जन्म ' है । वृद्धि का अर्थ है बढ़ना | दुख का आना ' उपप्लव ' है, छ धातुओं के विभाग का नाम ' वियोग ' है, यही जीव का देह से पृथक् होजाना है । इसी को प्राण का नाश और इसी को ' भग ' कहते हैं । यह लोक का स्वभाव है । सब सुख दुःखों को प्रवृत्ति इसका मूल कारण । सब से उपरम निवृत्ति है । प्रवृत्ति दुःख है, निवृत्ति सुख है । जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । इस सत्य ज्ञान का कारण सम्पूर्ण लोक की समानता का ज्ञान होना है का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
अथाग्निवेश उवाच – किंमूला भगवन् ।
इति ॥ ८ ॥
अग्निवेश ने पूछा - हे भगवन् । ससाररूप रूप निवृत्ति का उपाय क्या है? ॥ ८ ॥
भगवानुवाच — मोहेच्छा - द्वेष कर्म- मूला । समानता के उपदेश करने प्रवृत्तिर्निवृत्तौ वा उपाय प्रवृत्ति का कारण तथा मोक्ष प्रवृत्तिः, तज्जा ह्यहङ्कार-सङ्ग - संशयाभिसंसचाभ्यवपात विप्रत्ययाविशेषानुपायास्तरुणमिव तुम-
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अ ० ५ ] शारीरस्थानम् ७३ मतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते, यैरभिभूतो न सत्तामतिवर्तते । भगवान् आत्रेय बोले — मोह ( मिथ्याज्ञान ), इच्छा, द्वेष और कर्म ( धर्मा-धर्म ) इनके कारण से प्रवृत्ति होती है । जैसे- एक छोटे वृक्ष को इसी वृक्ष से उत्पन्न बहुत बड़ी बड़ी शाखाये और अन्य अनेक वृद्ध घेर लेते है, उसी प्रकार sa मोह आदि से उत्पन्न अहंकार ( मैं हू ऐसा भाव ), अच्छा बुरा सग, सशय, अभिसप्लव ( अपने को सब कुछ मानना ), अभ्यवपात ( बाह्य सम्बन्धों की ममता में फसना ), विप्रत्यय ( विपरीत प्रतीति करना ), अविशेष ( धर्म अधर्म आदि मे समान प्रतीति ) और अनुपाय ( स्नान, मार्जन, होम, जप, अग्नि में प्रवेश आदि अवास्तविक उपायो का अवलम्बन ) पुरुष को घेर कर स्वय प्रबल हो जाते हैं | इनसे दब कर पुरुष अपनी वास्तविक सत्ता वा प्रवृत्ति के कारण को नहीं जान सकता । तत्रैवजाति - रूप - वित्त - वृत्त - बुद्धि - शील- विद्याभिजन - वयो- वीर्य-प्रभाव- सपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यद्यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गीयस सङ्गः । कर्मफल- मोक्ष- पुरुष - प्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति सशयः, सर्वास्ववस्थास्व-नन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावससिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रिय - बुद्धि - स्मृति- विशेष-राशिरिवि ग्रहणन भिसप्लवः, मम मातृ पितृ भ्रातृ - - दारापत्य - बन्धु - मित्र-भृत्य - गणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य हिताहित- शुभाशुभेषु विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृ-त्यो सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्र- त्रिः सवनाभ्युक्ष-णावाहन - यजन- याजन याचना - सलिल हुताशन- प्रवेशादयः समारम्भाः प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः । इस अवस्था मे वह जाति, रूप, वित्त, आचार, बुद्धि, चील, विद्या, कुटुम्ब, बय, वीर्य, प्रभाव से मैं ऐश्वर्य्यशाली हूँ ऐसा भाव होना ' महार ' है । मन, वाणी, शरीर के जो कार्य मोक्ष के लिये न हों वह ' सग ' है । कर्मों के कल, मोक्ष, पुरुष ( आत्मा ) प्रेत्यभाव अर्थात् पुनर्जन्म आदि है या नहीं इसका नाम ' सशय ' है । सब अवस्थाओं में मैं ही एक मात्र हूँ, मैं ही स्रष्टा हॅू, मै स्वभाव से सिद्ध हूँ, मै ही शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, स्मृति विशेष का समूह हॅू - ऐसा सम-झना अभिसप्लव है । मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, मेरे बन्धु, मेरे मित्र, मेरे भृत्य आदि और मै इनका हूँ, इसी का नाम ममता ' अभ्य वपात ' है । कार्य - अकार्य, हित - अहित, शुभ - अशुभ में विपरीत ( कार्य में अकार्य और अकार्य में कार्य आदि का ) ज्ञान होना ' विप्रत्यय ' है । ज्ञानी- अज्ञानो
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७४ चरकसंहिता [ अ ०५ प्रकृति - विकार, प्रवृत्ति निवृत्ति इनमे समानता देखना ' अविशेष ' है । प्रोक्षण, उपवास, अग्निहोत्र, तीनवार भली प्रकार स्नान, अभ्युक्षण ( जल से मार्जन ), आवाहन, वचन, याजन, याचना ( प्रार्थना ) जय में प्रवेश वा अग्नि में प्रवेश आदि कर्म परम मोक्ष के उपान नहीं हैं, तो भो उनका उपाय समझना यह ' अनुपाय ' है । एवमयमधीधृनि स्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्त ससशयोऽभिसंप्लु-तबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिर विशेषग्राही विमार्गगनिनिवासवृक्षः सत्व शरीर- दोष मूलानां मूलं सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभि दोषम्यमाणो नानिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमघस्य ॥ ६ ॥
इस प्रकार से यह पुरुष बुद्धि, वृति और स्मृति से रहित, अहकार से अह-कार्ग होकर, माध्य मे दूर करने वाले कार्यो में फस कर, कर्मफल, मोक्ष, आत्मा आदि मे सन्देह करता हुआ, अपने को हो कर्त्ता, धचा आदि सब कुछ समझता हुआ, ' ये मेरे मै इनका ' इस ममता के गढ़े मे गिरा हुआ, अन्यथा - दृष्टि अर्थात् सम्यग्दृष्टि से राहत होकर, धर्म - अधर्म, कर्तव्य अकर्त्तव्य आदि में विशेष विवेक न करता हुआ, विपरीत मार्ग से चलता हुआ चित्त और शरीर के दोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त दुखों का निवास वृक्ष हो जाता है । इस प्रकार से अहकार आदि आठ दोषों के कारण चक्कर खाता हुआ प्रवृत्ति ( ससार ), से निकल नही सकता और यह प्रवृत्ति ही पाप का कारण है ॥६ ॥
निवृत्तिरपवर्गस्तत्परं तत् प्रशान्त तदक्षरं तद् ब्रह्म स मोक्षः । तत्र मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः-निवृति का नाम ' अपवर्ग ' है । यही परम सर्वश्रेष्ठ शान्त पद है, यही अक्षर, यही ब्रह्म और इसी को मोक्ष कहते है । इस प्रसग में मुमुक्षु पुरुषों के लिये उन्नति के उपायों का उपदेश करते हैं । तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाऽऽचार्याभिगमन, तस्योपदे शानुष्ठान, अग्नेरेवोपचर्या, धमशाखान्तगमन ', तदर्थावबाधः, तेना-वष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनमसतां परिवजन, अस-ङ्गतिर्दुर्जनेन, सत्य सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचन, सव-प्राणिष्वात्मनीवावेक्षा, सर्वासामस्मरणमसंकल्पनमप्रार्थनमनभिभा पण च स्त्रीणा, सर्वपरिग्रहत्यागः, कोपानं प्रच्छादनार्थं धातुरागनि-वसन, कन्थासीवनहेतो. सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्ज लकुण्डिका, १. ' सर्व प्रवृत्तिष्ववसज्ञा ' इति च पाठः ।
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अ ० ५ ] शारीरस्थानम् ७५ दण्डधारणं, भैक्ष्यचर्यार्थ पात्रं, प्राणधारणार्थमे कामग्राम्यो यथोपपन्नोऽभ्यवहारः, श्रमापनयनार्थ शीर्ण - शुष्क पर्ण - तृणास्तरणोप-धान, ध्यानहेतोः कायनिबन्धन, वनेष्वनिकेतवास, तन्द्रा - निद्रालस्यादि-कर्म वर्जनं, इन्द्रियार्थेष्वनुरागोपतापनिग्रह, सुप्तस्थित गत- प्रेक्षिताहार-प्रत्यङ्ग चेष्टादिकेष्वारम्भेषु स्मृतिपूर्विका प्रवृत्तिः, सत्कार - स्तुति - गहू-वमान क्षमत्वं, क्षुत्पिपासायास श्रम - शीतोष्ण - वात - वर्षा सुख - दुःख-संस्पर्श - सहत्वं शो - देन्योग - मद - मान लोभ - रागेय - भय - क्रोधादि-भिरसचलनम्, अहङ्कारादिपूपसर्गसज्ञा, लोकपुरुषयो सर्गादिसामान न्यावेक्षणं, कार्यकालात्ययभय, योगारम्भे सततमनिर्वेद, सरवीत्सा-होऽपवर्गाय धी - वृति स्मृति - बलावान, नियमनमिन्द्रियाणां चेतसि चेतस आत्मनश्च बातुभेदेन शरीरावयवसंख्यान, अभीक्ष्ण सर्व कार-णवद् दुःखमम्ब मनित्यमित्यभ्युपगमः, सर्वप्रवृत्तिषु दुःखसंज्ञा ', सर्व-संम्यासेषु सुखमित्यभिनिवेशः एष मार्गोऽपवर्गाय । अतोऽन्यथा बध्यत इत्युदयनानि व्याख्यातानि ॥ २० ॥
लोक में दोष देख कर मुमुक्षु पुरुष का सब से प्रथम आचार्य के पास जाना, आचार्य के उपदेश के अनुसार आचरण करना, अग्नि आर अग्नि के तुल्य आचार्य की सेवा करना, धर्मशास्त्र का सम्पूर्ण अध्ययन करना, धमशास्त्र के अर्थ का ज्ञान, अर्थज्ञान मे धर्य, दृढता रखना, शास्त्र के अनुसार क्रिया करना, सत्पुरुषों की सेवा, दुर्जनों का परित्याग, दुर्जन के साथ मेल न करना, मन, वचन से सत्य का पालन, सब प्राणियों का हितकारी रहना, कठोर भाषण न करना, मधुर और समय पर परीक्षा करके बोलना, सब प्राणियों पर अपने समान प्रेम दृष्टि रखना, किसी भी स्त्री का स्मरण न करना, न स्त्रियों का सङ्कल्प करना, न उनसे कोई प्रार्थना करना और न उनसे बातचीत करना, सब प्रकार के परिग्रहो का त्याग, कटि को ढापने मात्र तथा ब्रह्मचर्य रक्षा के लिये कौपीन काही धारण करना, कन्था ( गूदड़ी ) को सीने के लिये सूई और सूई रखने का पात्र, शौच क्रिया के लिये जलपात्र ( कमण्डलु ), दण्ड का धारण करना, मिक्षा अर्थात् मधुकरी के लिये पात्र, प्राणरक्षामात्र के लिये एक समय अग्राम्य ( पवित्र ) जैसा प्राप्त हो सके वैसा भोजन, थकान दूर करने के लिये गिरे सूखे पत्ते, तिनकों आदि का बिस्तर और तकिया, ध्यान समाधि के लिये शरीर की रक्षा, जगलो मे बिना घर बनाए रहना, तन्द्रा, निद्रा, आलस्य आदि का परि-त्याग, इन्द्रियों के विषय, गन्ध आदि में अनुराग न करना, उपताप, उनके न १. ' धर्मशास्त्रानुगमन ' इति च पाठः ।