श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1251–1260
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260
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स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः ।
जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् ॥ १ ९ ॥
जब शक्तिने शाप दे दिया, तब नृपतिशिरोमणि कल्माषपाद उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनके शरण होने चले ॥ १ ९ ॥
तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम ।
विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिदेश नृपं प्रति ॥ २० ॥
कुरुश्रेष्ठ! राजाके मनोभावको समझकर उक्त विश्वामित्रजीने एक राक्षसको राजाके भीतर प्रवेश करनेके लिये आज्ञा दी ॥ २० ॥
शापात् तस्य तु विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया ।
राक्षसः किंकरो नाम विवेश नृपतिं तदा ॥ २१ ॥
ब्रह्मर्षि शक्तिके शाप तथा विश्वामित्रजीकी आज्ञासे किंकर नामक राक्षसने तब राजाके भीतर प्रवेश किया ॥ २१ ॥
रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः ।
विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत् तस्माद् देशादरिंदम ॥ २२ ॥
शत्रुसूदन! राक्षसने राजाको आविष्ट कर लिया है, यह जानकर मुनिवर विश्वामित्रजी भी उस स्थानसे चले गये ॥ २२ ॥
ततः स नृपतिस्तेन रक्षसान्तर्गतेन वै ।
बलवत् पीडितः पार्थ नान्यबुध्यत किंचन ॥ २३ ॥
कुन्तीनन्दन! भीतर घुसे हुए राक्षससे अत्यन्त पीड़ित हो उन नरेशको किसी भी बातकी सुध - बुध न रही ॥ २३ ॥
ददर्शाथ द्विजः कश्चिद् राजानं प्रस्थितं वनम् ।
अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा ॥ २४ ॥
एक दिन किसी ब्राह्मणने ( राक्षससे आविष्ट ) राजाको वनकी ओर जाते देखा और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण उनसे मांससहित भोजन माँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा ।
आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन् ॥ २५ ॥
तब राजर्षि मित्रसह ( कल्माषपाद ) - ने उस द्विजसे कहा – ' ब्रह्मन्! आप यहीं बैठिये और दो घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये ॥ २५ ॥
निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् ।
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः ॥ २६ ॥
‘ मैं वनसे लौटनेपर आपको यथेष्ट भोजन दूँगा । ' यह कहकर राजा चले गये और वह ब्राह्मण ( वहाँ) ठहर गया ॥ २६ ॥
ततो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम् ।
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निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः ॥ २७ ॥
पार्थ! तत्पश्चात् महामना राजा मित्रसह इच्छानुसार मौजसे घूम - फिरकर जब लौटे, तब अन्तःपुरमें चले गये ॥ २७ ॥
ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् ।
उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम् ॥ २८ ॥
गच्छामुष्मिन् वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते ।
अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसेनोपपादय ॥ २ ९ ॥
वहाँ आधी रातके समय उन्हें ब्राह्मणको भोजन देनेकी प्रतिज्ञाका स्मरण हुआ । फिर तो वे उठ बैठे और तुरंत रसोइयेको बुलाकर बोले— 'जाओ, वनके अमुक प्रदेशमें एक ब्राह्मण भोजनके लिये मेरी प्रतीक्षा करता है। उसे तुम मांसयुक्त भोजनसे तृप्त करो' ॥ २८-२९ ॥ गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित् ।
निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ॥ ३० ॥
गन्धर्व कहता है — उनके यों कहनेपर रसोइयेने मांसके लिये खोज की; परंतु जब कहीं भी मांस नहीं मिला, तब उसने दुःखी होकर राजाको इस बातकी सूचना दी ॥ ३० ॥
राजा तु रक्षसाऽऽविष्टः सूदमाह गतव्यथः ।
अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः ॥ ३१ ॥
राजापर राक्षसका आवेश था, अतः उन्होंने रसोइयेसे निश्चिन्त होकर कहा- ' उस ब्राह्मणको मनुष्यका मांस ही खिला दो ' यह बात उन्होंने बार- बार दुहरायी ॥ ३१ ॥
तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् ।
गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ॥ ३२ ॥
तब रसोइया ‘ तथास्तु ' कहकर वध्यभूमिमें जल्लादोंके घर गया और ( उनसे ) निर्भय होकर तुरंत ही मनुष्यका मांस ले आया ॥ ३२ ॥
एतत् संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै ।
तस्मै प्रादाद् ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने ॥ ३३ ॥
फिर उसीको तुरंत विधिपूर्वक राँधकर अन्नके साथ उसे उस तपस्वी एवं भूखे ब्राह्मणको दे दिया ॥ ३३ ॥
स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः ।
अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३४ ॥
तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने तपःसिद्ध दृष्टिसे उस अन्नको देखा और ' यह खानेयोग्य नहीं है ' यों समझकर क्रोधपूर्ण नेत्रोंसे देखते हुए कहा ॥ ३४ ॥
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ब्राह्मणउवाच
यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नृपाधमः ।
तस्मात् तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणने कहा — वह नीच राजा मुझे न खाने योग्य अन्न दे रहा है, अतः उसी मूर्खकी जिह्वा ऐसे अन्नके लिये लालायित रहेगी ॥ ३५ ॥
सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना तथा ।
उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम् ॥ ३६ ॥
जैसा कि शक्ति मुनिने कहा है, वह मनुष्योंके मांसमें आसक्त हो समस्त प्राणियोंका उद्वेगपात्र बनकर इस पृथ्वीपर विचरेगा ॥ ३६ ॥
द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो बलवानभूत् ।
रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृपः ॥ ३७ ॥
दो बार इस तरहकी बात कही जानेके कारण राजाका शाप प्रबल हो गया । उसके साथ उनमें राक्षसके बलका समावेश हो जानेके कारण राजाकी विवेकशक्ति सर्वथा लुप्त हो गयी ॥ ३७ ॥
ततः स नृपतिश्रेष्ठो रक्षसापहृतेन्द्रियः ।
उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत ॥ ३८ ॥
भारत! राक्षसने राजाके मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया था, अतः उन नृपश्रेष्ठने कुछ ही दिनों बाद उक्त शक्ति मुनिको अपने सामने देखकर कहा- ॥ ३८ ॥
यस्मादसदृशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया ।
तस्मात् त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं पुरुषानहम् ॥ ३ ९ ॥
' चूँकि तुमने मुझे यह सर्वथा अयोग्य शाप दिया है, अतः अब मैं तुम्हींसे मनुष्योंका भक्षण आरम्भ करूँगा ' ॥ ३ ९ ॥
एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयुज्य च ।
शक्तिनं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम् ॥ ४० ॥
यों कहकर राजाने तत्काल ही शक्तिके प्राण ले लिये और जैसे बाघ अपनी रुचिके अनुकूल पशुको चबा जाता है, उसी प्रकार वे भी शक्तिको खा गये ॥ ४० ॥
शक्तिनं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनः पुनः ।
वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद् रक्षः संदिदेश ह ॥ ४१ ॥
शक्तिको मारा गया देख विश्वामित्र बार- बार वसिष्ठके पुत्रोंपर ही आक्रमण करनेके लिये उस राक्षसको प्रेरित करते थे ॥ ४१ ॥
स ताञ्छक्त्यवरान् पुत्रान् वसिष्ठस्य महात्मनः ।
भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ४२ ॥
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जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह छोटे मृगोंको खा जाता है, उसी प्रकार उन ( राक्षसभावापन्न ) नरेशने महात्मा वसिष्ठके उन सब पुत्रोंको भी, जो शक्तिसे छोटे थे, ( मारकर ) खा लिया ॥ ४२ ॥
वसिष्ठो घातिताञ्छ्रुत्वा विश्वामित्रेण तान् सुतान् ।
धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम् ॥ ४३ ॥
वसिष्ठने यह सुनकर भी कि विश्वामित्रने मेरे पुत्रोंको मरवा डाला है, अपने शोकके वेगको उसी प्रकार धारण कर लिया, जैसे महान् पर्वत सुमेरु इस पृथ्वीको ॥ ४३ ॥
चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तमः ।
न त्वेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः ॥ ४४ ॥
उस समय ( अपनी पुत्रवधुओंके दुःखसे दुःखित हो ) वसिष्ठने अपने शरीरको त्याग देनेका विचार कर लिया; परंतु विश्वामित्रका मूलोच्छेद करनेकी बात बुद्धि - मानोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठके मनमें ही नहीं आयी ॥ ४४ ॥
स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः ।
गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत् ॥ ४५ ॥
महर्षि भगवान् वसिष्ठने मेरुपर्वतके शिखरसे अपने - आपको उसी पर्वतकी शिलापर गिराया; परंतु उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो वे रूईके ढेरपर गिरे हों ॥ ४५ ॥
न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव ।
तदाग्निमिद्धं भगवान् संविवेश महावने ॥ ४६ ॥
पाण्डुनन्दन! जब (इस प्रकार ) गिरनेसे भी वे नहीं मरे, तब वे भगवान् वसिष्ठ महान् वनके भीतर धधकते हुए दावानलमें घुस गये ॥ ४६ ॥
तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशनः ।
दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत् ततः ॥ ४७ ॥
यद्यपि उस समय अग्नि प्रचण्ड वेगसे प्रज्वलित हो रही थी, तो भी उन्हें जला न सकी । शत्रुसूदन अर्जुन! उनके प्रभावसे वह दहकती हुई आग भी उनके लिये शीतल हो गयी ॥ ४७ ॥
स समुद्रमभिप्रेक्ष्य शोकाविष्टो महामुनिः ।
बद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वीं निपपात तदाम्भसि ॥ ४८ ॥
तब शोकके आवेशसे युक्त महामुनि वसिष्ठने सामने समुद्र देखकर अपने कण्ठमें बड़ी भारी शिला बाँध ली और तत्काल जलमें कूद पड़े ॥ ४८ ॥
स समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः ।
न ममार यदा विप्रः कथंचित् संशितव्रतः ।
जगाम स ततः खिन्नः पुनरेवाश्रमं प्रति ॥ ४ ९ ॥
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परंतु समुद्रकी लहरोंके वेगने उन महामुनिको किनारे लाकर डाल दिया । कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ जब किसी प्रकार न मर सके, तब खिन्न होकर अपने आश्रमपर ही लौट पड़े ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे वसिष्ठशोके पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठचरित्रके प्रसंगमें वसिष्ठशोकविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥
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षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति गन्धर्व उवाच
ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं रहितं तैः सुतैर्मुनिः ।
निर्जगाम सुदुःखार्तः पुनरप्याश्रमात् ततः ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है — अर्जुन! तदनन्तर मुनिवर वसिष्ठ आश्रमको अपने पुत्रोंसे सूना देख अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और पुनः आश्रम छोड़कर चल दिये ॥ १ ॥
सोऽपश्यत् सरितं पूर्णां प्रावृट्काले नवाम्भसा ।
वृक्षान् बहुविधान् पार्थ हरन्तीं तीरजान् बहून् ॥ २ ॥
कुन्तीनन्दन! वर्षाका समय था; उन्होंने देखा, एक नदी नूतन जलसे लबालब भरी है और तटवर्ती बहुत - से वृक्षोंको ( अपने जलकी धारामें ) बहाये लिये जाती है ॥ २ ॥
अथ चिन्तां समापेदे पुनः कौरवनन्दन ।
अम्भस्यस्या निमज्जेयमिति दुःखसमन्वितः ॥ ३ ॥
कौरवनन्दन! ( उसे देखकर ) दुःखसे युक्त वसिष्ठजीके मनमें फिर यह विचार आया कि मैं इसी नदीके जलमें डूब जाऊँ ॥ ३ ॥
ततः पाशैस्तदाऽऽत्मानं गाढं बद्ध्वा महामुनिः ।
तस्या जले महानद्या निममज्ज सुदुःखितः ॥ ४ ॥
तब अत्यन्त दुःखी हुए महामुनि वसिष्ठ अपने शरीरको पाशोंद्वारा अच्छी तरह बाँधकर उस महानदीके जलमें कूद पड़े ॥ ४ ॥
अथ छित्त्वा नदी पाशांस्तस्यारिबलसूदन ।
स्थलस्थं तमृषिं कृत्वा विपाशं समवासृजत् ॥ ५ ॥
शत्रुसेनाका संहार करनेवाले अर्जुन! उस नदीने वसिष्ठजीके बन्धन काटकर उन्हें स्थलमें पहुँचा दिया और उन्हें विपाश ( बन्धनरहित) करके छोड़ दिया ॥ ५ ॥
उत्ततार ततः पाशैर्विमुक्तः स महानृषिः ।
विपाशेति च नामास्या नद्याश्चक्रे महानृषिः ॥ ६ ॥
तब पाशमुक्त हो महर्षि जलसे निकल आये और उन्होंने उस नदीका नाम ‘ विपाशा ’ ( व्यास ) रख दिया ॥ ६ ॥
शोकबुद्धिं तदा चक्रे न चैकत्र व्यतिष्ठत ।
सोऽगच्छत् पर्वतांश्चैव सरितश्च सरांसि च ॥ ७ ॥
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उस समय ( पुत्रवधुओंके संतोषके लिये ) उन्होंने शोकबुद्धि कर ली थी, इसलिये वे किसी एक स्थानमें नहीं ठहरते थे; पर्वतों, नदियों और सरोवरोंके तटपर चक्कर लगाते रहते थे ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा स पुनरेवर्षिर्नदीं हैमवतीं तदा ।
चण्डग्राहवतीं भीमां तस्याः स्रोतस्यपातयत् ॥ ८ ॥
( इस तरह घूमते - घूमते ) महर्षिने पुनः हिमालय पर्वतसे निकली हुई एक भयंकर नदीको देखा, जिसमें बड़े प्रचण्ड ग्राह रहते थे । उन्होंने फिर उसीकी प्रखर धारामें अपने - आपको डाल दिया ॥ ८ ॥
सा तमग्निसमं विप्रमनुचिन्त्य सरिद्वरा ।
शतधा विद्रुता यस्माच्छतद्रुरिति विश्रुता ॥ ९ ॥
वह श्रेष्ठ नदी ब्रह्मर्षि वसिष्ठको अग्निके समान तेजस्वी जान सैकड़ों धाराओंमें फूटकर इधर - उधर भाग चली । इसीलिये वह ' शतद्रु' नामसे विख्यात हुई ॥ ९ ॥
ततः स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राप्यात्मानमात्मना ।
मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाश्रमं ययौ ॥ १० ॥
वहाँ भी अपनेको स्वयं ही स्थलमें पड़ा देख ' मैं मर नहीं सकता ' यों कहकर वे फिर अपने आश्रमपर ही चले गये ॥ १० ॥
स गत्वा विविधाञ्छैलान् देशान् बहुविधांस्तथा ।
अदृश्यन्त्याख्यया वध्वाथाश्रमेऽनुसृतोऽभवत् ॥ ११ ॥
इस तरह नाना प्रकारके पर्वतों और बहुसंख्यक देशोंमें भ्रमण करके वे पुनः जब अपने आश्रमके समीप आये, उस समय उनकी पुत्रवधू अदृश्यन्ती उनके पीछे हो ली ॥ ११ ॥
अथ शुश्राव संगत्या वेदाध्ययननिःस्वनम् ।
पृष्ठतः परिपूर्णार्थं षड्भिरङ्गैरलंकृतम् ॥ १२ ॥
मुनिको पीछेकी ओरसे संगतिपूर्वक छहों अंगोंसे अलंकृत तथा स्फुट अर्थोंसे युक्त वेदमन्त्रोंके अध्ययनका शब्द सुन पड़ा ॥ १२ ॥
अनुव्रजति को न्वेष मामित्येवाथ सोऽब्रवीत् ।
अहमित्यदृश्यन्तीमं सा स्नुषा प्रत्यभाषत ।
शक्तेर्भार्या महाभाग तपोयुक्ता तपस्विनी ॥ १३ ॥
तब उन्होंने पूछा — ‘ मेरे पीछे - पीछे कौन आ रहा है? ' उक्त पुत्रवधूने उत्तर दिया, ' महाभाग! मैं तपमें ही संलग्न रहनेवाली महर्षि शक्तिकी अनाथ पत्नी अदृश्यन्ती हूँ' ॥ १३ ॥
वसिष्ठ उवाच पुत्रि कस्यैष साङ्गस्य वेदस्याध्ययनस्वनः ।
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पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मया श्रुतः ॥ १४ ॥
वसिष्ठजीने पूछा — बेटी! पहले शक्तिके मुँहसे मैं अंगोंसहित वेदका जैसा पाठ सुना करता था, ठीक उसी प्रकार यह किसके द्वारा किये हुए सांग वेदके अध्ययनकी ध्वनि मेरे कानोंमें आ रही है? ॥ १४ ॥
अदृश्यन्त्युवाच
अयं कुक्षौ समुत्पन्नः शक्तेर्गर्भः सुतस्य ते ।
समा द्वादश तस्येह वेदानभ्यस्यतो मुने ॥ १५ ॥
अदृश्यन्ती बोली- भगवन्! यह मेरे उदरमें उत्पन्न हुआ आपके पुत्र शक्तिका बालक है । मुने! उसे मेरे गर्भमें ही वेदाभ्यास करते बारह वर्ष हो गये हैं ॥ १५ ॥
गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्तया हृष्टो वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ।
अस्ति संतानमित्युक्त्वा मृत्योः पार्थ न्यवर्तत ॥ १६ ॥
गन्धर्व कहता है — अर्जुन! अदृश्यन्तीके यों कहनेपर भगवान् पुरुषोत्तमका भजन करनेवाले महर्षि वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और ' मेरी वंशपरम्पराका लोप नहीं हुआ है, ' यों कहकर मरनेके संकल्पसे विरत हो गये ॥ १६ ॥
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ततः प्रतिनिवृत्तः स तया वध्वा सहानघ ।
कल्माषपादमासीनं ददर्श विजने वने ॥। १७ ॥
अनघ! तब वे अपनी पुत्रवधूके साथ आश्रमकी ओर लौटने लगे । इतनेमें ही मुनिने निर्जन वनमें बैठे हुए राजा कल्माषपादको देखा ॥ १७ ॥
स तु दृष्ट्वैव तं राजा क्रुद्ध उत्थाय भारत ।
आविष्टो रक्षसोग्रेण इयेषात्तुं तदा मुनिम् ॥ १८ ॥
भारत! भयानक राक्षससे आविष्ट हुए राजा कल्माषपाद मुनिको देखते ही क्रोधमें भरकर उठे और उसी समय उन्हें खा जानेकी इच्छा करने लगे ॥ १८ ॥
अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः ।
भयसंविग्नया वाचा वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
उस क्रूरकर्मी राक्षसको सामने देख अदृश्यन्तीने भयाकुल वाणीमें वसिष्ठजीसे यह कहा ॥ १ ९ ॥
असौ मृत्युरिवोग्रेण दण्डेन भगवन्नितः ।
प्रगृहीतेन काष्ठेन राक्षसोऽभ्येति दारुणः ॥ २० ॥
‘ भगवन्! वह भयंकर राक्षस एक बहुत बड़ा काठ लेकर इधर ही आ रहा है, मानो साक्षात् यमराज भयानक दण्ड लिये आ रहे हैं ॥ २० ॥
तं निवारयितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ।
त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ॥ २१ ॥
‘ महाभाग! आप सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । ( इस समय) इस भूतलपर आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उस राक्षसका वेग रोक सके ॥ २१ ॥
पाहि मां भगवन् पापादस्माद् दारुणदर्शनात् ।
राक्षसोऽयमिहात्तुं वै नूनमावां समीहते ॥ २२ ॥
‘ भगवन्! देखनेमें अत्यन्त भयंकर इस पापीसे मेरी रक्षा कीजिये । निश्चय ही यह राक्षस यहाँ हम दोनोंको खा जानेकी घातमें लगा है ' ॥ २२ ॥
वसिष्ठ उवाच
मा भैः पुत्रि न भेतव्यं राक्षसात् तु कथंचन ।
नैतद् रक्षो भयं यस्मात् पश्यसि त्वमुपस्थितम् ॥ २३ ॥
वसिष्ठजीने कहा – बेटी! भयभीत न हो । इस राक्षससे तो किसी प्रकार न डरो ।
जिससे तुम्हें भय उपस्थित दिखायी देता है, यह वास्तवमें राक्षस नहीं है ॥ २३ ॥
राजा कल्माषपादोऽयं वीर्यवान् प्रथितो भुवि ।
स एषोऽस्मिन् वनोद्देशे निवसत्यतिभीषणः ॥ २४ ॥
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ये भूमण्डलमें विख्यात पराक्रमी राजा कल्माषपाद हैं । ये ही इस वनमें अत्यन्त भीषण रूप धारण करके रहते हैं ॥ २४ ॥
गन्धर्व उवाच
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य वसिष्ठो भगवानृषिः ।
वारयामास तेजस्वी हुंकारेणैव भारत ॥ २५ ॥
गन्धर्व कहता है— भारत! उस राक्षसको आते देख तेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने हुंकारमात्रसे ही रोक दिया ॥ २५ ॥
मन्त्रपूतेन च पुनः स तमभ्युक्ष्य वारिणा ।
मोक्षयामास वै शापात् तस्माद् योगान्नराधिपम् ॥ २६ ॥
और मन्त्रपूत जलसे उसके छींटे देकर अपने योगके प्रभावसे राजाको उस शापसे मुक्त कर दिया ॥ २६ ॥
स हि द्वादश वर्षाणि वासिष्ठस्यैव तेजसा ।
ग्रस्त आसीद् ग्रहेणेव पर्वकाले दिवाकरः ॥ २७ ॥
जैसे पर्वकालमें सूर्य राहुद्वारा ग्रस्त हो जाता है, उसी प्रकार राजा कल्माषपाद बारह वर्षोंतक वसिष्ठजीके पुत्र शक्तिके ही तेज ( शापके प्रभाव) से ग्रस्त रहे ॥ २७ ॥