श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1241–1250
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250
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न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः ॥ २८ ॥
गन्धर्व कहता है — अर्जुन! नन्दिनी इस प्रकार अपमानित होकर करुण क्रन्दन कर रही थी, तो भी दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महामुनि वसिष्ठ न तो क्षुब्ध हुए और न धैर्यसे ही विचलित हुए ॥ २८ ॥
वसिष्ठ उवाच
क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम् ।
क्षमा मां भजते यस्माद् गम्यतां यदि रोचते ॥ २ ९ ॥
वसिष्ठजी बोले – भद्रे! क्षत्रियोंका बल उनका तेज है और ब्राह्मणोंका बल उनकी क्षमा है । चूँकि मुझे क्षमा अपनाये हुए है, अतः तुम्हारी रुचि हो, तो जा सकती हो ॥ २ ९ ॥ नन्दिन्युवाच
किं नु त्यक्तास्मि भगवन् यदेवं त्वं प्रभाषसे ।
अत्यक्ताहं त्वया ब्रह्मन् नेतुं शक्या न वै बलात् ॥ ३० ॥
नन्दिनीने कहा — भगवन्! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ऐसी बात कहते हैं? ब्रह्मन्! आपने त्याग न दिया हो, तो कोई मुझे बलपूर्वक नहीं ले जा सकता ॥ ३० ॥
वसिष्ठउवाच
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यते ।
दृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते हियते बलात् ॥ ३१ ॥
वसिष्ठजी बोले — कल्याणि! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता । तुम यदि रह सको तो यहीं रहो । यह तुम्हारा बछड़ा मजबूत रस्सीसे बाँधकर बलपूर्वक ले जाया जा रहा है ॥ ३१ ॥
गन्धर्वउवाच
स्थीयतामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पयस्विनी ।
ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रबभौ रौद्रदर्शना ॥ ३२ ॥
गन्धर्व कहता है— अर्जुन! ' यहीं रहो ' वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर नन्दिनीने अपने सिर और गर्दनको ऊपरकी ओर उठाया । उस समय वह देखनेमें बड़ी भयानक जान पड़ती थी ॥ ३२ ॥
क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हम्भारवघनस्वना ।
विश्वामित्रस्य तत् सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः ॥ ३३ ॥
क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयी थीं । उसके डकरानेकी आवाज जोर- जोरसे सुनायी देने लगी । उसने विश्वामित्रकी उस सेनाको चारों ओर खदेड़ना शुरू किया ॥ ३३ ॥
कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः ।
क्रोधरक्तेक्षणा क्रोधं भूय एव समाददे ॥ ३४ ॥
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कोड़ोंके अग्रभाग और डंडोंसे मार- मारकर इधर- उधर हाँके जानेके कारण उसके नेत्र पहलेसे ही क्रोधके कारण रक्तवर्णके हो गये थे । फिर उसने और भी क्रोध धारण किया ॥ ३४ ॥
आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ ।
अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ॥ ३५ ॥
असृजत् पह्लवान् पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविडाञ्छकान् ।
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहुन् ॥ ३६ ॥
क्रोधके कारण उसके शरीरसे अपूर्व दीप्ति प्रकट हो रही थी । वह दोपहरके सूर्यकी भाँति उद्भासित हो उठी । उसने अपनी पूँछसे बारंबार अंगारकी भारी वर्षा करते हुए पूँछसे स पह्लवोंकी सृष्टि की, थनोंसे द्रविडों और शकोंको उत्पन्न किया, योनिदेशसे यवनों और गोबरसे बहुतेरे शबरोंको जन्म दिया ॥ ३५-३६ ॥
मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ ३७ ॥
कितने ही शबर उसके मूत्रसे प्रकट हुए। उसके पाश्वभागसे पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर और खसोंकी सृष्टि हुई ॥ ३७ ॥
चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान् ।
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ससर्ज फेनतः सा गौर्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३८ ॥
इसी प्रकार उस गौने फेनसे चिबुक, पुलिन्द, चीन, हूण, केरल आदि बहुत प्रकारके म्लेच्छोंकी सृष्टि की ॥ ३८ ॥
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- विश्वामित्रकी सेनापर नन्दिनीका कोप
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तैर्विसृष्टैर्महासैन्यैर्नानाम्लेच्छ्गणैस्तदा ।
नानावरणसंच्छन्नैर्नानायुधधरैस्तथा ॥ ३ ९ ॥
अवाकीर्यत संरब्धैर्विश्वामित्रस्य पश्यतः ।
एकैकश्च तदा योधः पञ्चभिः सप्तभिर्वृतः ॥ ४० ॥
उसके द्वारा रचे गये नाना प्रकारके म्लेच्छगणोंकी वे विशाल सेनाएँ जो अनेक प्रकारके कवच आदिसे आच्छादित थीं । सबने भाँति- भाँतिके आयुध धारण कर रखे थे और सभी सैनिक क्रोधमें भरे हुए थे । उन्होंने विश्वामित्रके देखते- देखते उनकी सेनाको तितर-बितर कर दिया । विश्वामित्रके एक -एक सैनिकको म्लेच्छ- सेनाके पाँच-पाँच, सात-सात योद्धाओंने घेर रखा था ॥ ३ ९ -४० ॥
अस्त्रवर्षेण महता वध्यमानं बलं तदा ।
प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः ॥ ४१ ॥
उस समय अस्त्र - शस्त्रोंकी भारी वर्षासे घायल होकर विश्वामित्रकी सेनाके पाँव उखड़ गये और उनके सामने ही वे सभी योद्धा भयभीत हो सब ओर भाग चले ॥ ४१ ॥
न च प्राणैर्वियुज्यन्ते केचित् तत्रास्य सैनिकाः ।
विश्वामित्रस्य संक्रुद्धैर्वासिष्ठैर्भरतर्षभ ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! क्रोधमें भरे हुए होनेपर भी वसिष्ठसेनाके सैनिक विश्वामित्रके किसी भी योद्धाका प्राण नहीं लेते थे ॥ ४२ ॥
सा गौस्तत् सकलं सैन्यं कालयामास दूरतः ।
विश्वामित्रस्य तत् सैन्यं काल्यमानं त्रियोजनम् ॥ ४३ ॥
क्रोशमानं भयोद्विग्नं त्रातारं नाध्यगच्छत । इस प्रकार नन्दिनी गायने उनकी सारी सेनाको दूर भगा दिया । विश्वामित्रकी वह सेना तीन योजनतक खदेड़ी गयी । वह सेना भयसे व्याकुल होकर चीखती-चिल्लाती रही; किंतु कोई भी संरक्षक उसे नहीं मिला ॥ ४३ ॥
( विश्वामित्रस्ततो दृष्ट्वा क्रोधाविष्टः स रोदसी ।
ववर्ष शरवर्षाणि वसिष्ठे मुनिसत्तमे ॥
घोररूपांश्च नाराचान् क्षुरान् भल्लान् महामुनिः ।
विश्वामित्रप्रयुक्तांस्तान् वैणवेन व्यमोचयत् ॥
वसिष्ठस्य तदा दृष्ट्वा कर्मकौशलमाहवे ॥
विश्वामित्रोऽपि कोपेन भूयः शत्रुनिपातनः ।
दिव्यास्त्रवर्षं तस्मै तु प्राहिणोन्मुनये रुषा ॥
आग्नेयं वारुणं चैन्द्रं याम्यं वायव्यमेव च ।
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विससर्ज महाभागे वसिष्ठे ब्रह्मणः सुते ॥
अस्त्राणि सर्वतो ज्वालां विसृजन्ति प्रपेदिरे ।
युगान्तसमये घोराः पतङ्गस्येव रश्मयः ॥
वसिष्ठोऽपि महातेजा ब्रह्मशक्तिप्रयुक्तया ।
यष्ट्या निवारयामास सर्वाण्यस्त्राणि स स्मयन् ॥
ततस्ते भस्मसाद्भूताः पतन्ति स्म महीतले ।
अपोह्य दिव्यान्यस्त्राणि वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
यह देखकर विश्वामित्र क्रोधसे व्याप्त हो मुनि श्रेष्ठ वसिष्ठको लक्षित करके पृथिवी और आकाशमें बाणोंकी वर्षा करने लगे; परंतु महामुनि वसिष्ठने विश्वामित्रके चलाये हुए भयंकर नाराच, क्षुर और भल्ल नामक बाणोंका केवल बाँसकी छड़ीसे निवारण कर दिया । युद्धमें वसिष्ठ मुनिका वह कार्य - कौशल देखकर शत्रुओंको मार गिरानेवाले विश्वामित्र भी पुनः कुपित हो महर्षि वसिष्ठपर रोषपूर्वक दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगे । उन्होंने ब्रह्माजीके पुत्र महाभाग वसिष्ठपर आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, याम्यास्त्र और वायव्यास्त्रका प्रयोग किया । वे सब अस्त्र प्रलयकालके सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंके समान सब ओरसे आगकी लपटें छोड़ते हुए महर्षिपर टूट पड़े; परंतु महातेजस्वी वसिष्ठने मुसकराते हुए ब्राह्मबलसे प्रेरित हुई छड़ीके द्वारा इन सब अस्त्रोंको पीछे लौटा दिया । फिर तो वे सभी अस्त्र भस्मीभूत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । इस प्रकार उन दिव्यास्त्रोंका निवारण करके वसिष्ठजीने विश्वामित्रसे यह बात कही । वसिष्ठ उवाच
निर्जितोऽसि महाराज दुरात्मन् गाधिनन्दन ।
यदि तेऽस्ति परं शौर्यं तद् दर्शय मयि स्थिते ॥
वसिष्ठजी बोले – महाराज दुरात्मा गाधिनन्दन! अब तू परास्त हो चुका है । यदि तुझमें और भी उत्तम पराक्रम है तो मेरे ऊपर दिखा । मैं तेरे सामने डटकर खड़ा हूँ । गन्धर्व उवाच विश्वामित्रस्तथा चोक्तो वसिष्ठेन नराधिप । नोवाच किंचिद् व्रीडाढ्यो विद्रावितमहाबलः ॥ ) गन्धर्व कहता है — राजन्! विश्वामित्रकी वह विशाल सेना खदेड़ी जा चुकी थी । वसिष्ठके द्वारा पूर्वोक्तरूपसे ललकारे जानेपर वे लज्जित होकर कुछ भी
उत्तर न दे सके ।
दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं ब्रह्मतेजोभवे तदा ॥ ४४ ॥
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विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निर्विण्णो वाक्यमब्रवीत् ।
धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् ॥ ४५ ॥
ब्रह्मतेजका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक चमत्कार देखकर विश्वामित्र क्षत्रियत्वसे खिन्न एवं उदासीन हो यह बात बोले- ' क्षत्रिय-बल तो नाममात्रका ही बल है, उसे धिक्कार है । ब्रह्मतेजजनित बल ही वास्तविक बल है' ॥ ४४-४५ ॥
बलाबलं विनिश्चित्य तप एव परं बलम् ।
स राज्यं स्फीतमुत्सृज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम् ॥ ४६ ॥
भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे ।
स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान् विष्टभ्य तेजसा ॥ ४७ ॥
तताप सर्वान् दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् ।
अपिबच्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार बलाबलका विचार करके उन्होंने तपस्याको ही सर्वोत्तम बल निश्चत किया और अपने समृद्धिशाली राज्य तथा देदीप्यमान राज्यलक्ष्मीको छोड़कर, भोगोंको पीछे करके तपस्यामें ही मन लगाया । इस तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हो उद्दीप्त तेजवाले विश्वामित्रजीने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण लोकोंको स्तब्ध एवं संतप्त कर दिया और ( अन्ततोगत्वा ) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया; फिर वे इन्द्रके साथ सोमपान करने लगे ॥ ४६–४८ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे विश्वामित्रपराभवे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमेंवसिष्ठजीके चरित्रके प्रसंगमेंविश्वामित्र-पराभवविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०३ श्लोक मिलाकर कुल ५८३ श्लोक हैं ) १. गौओंके मस्तक आदि छः अंगोंका बड़ा एवं विस्तृत होना शुभ माना गया है । जैसा कि शास्त्रका वचन है— शिरो ग्रीवा सक्थिनी च सास्ना पुच्छमथ स्तनाः । शुभान्येतानि धेनूनामायतानि प्रचक्षते ॥ २. गौओंका ललाट, दोनों नेत्र और दोनों कान - ये पाँचों अंग पृथु ( पुष्ट एवं विस्तृत) हों तो विद्वानोंद्वारा अच्छे माने जाते हैं । जैसा कि शास्त्रका वचन है— ललाटं श्रवणौ चैव नयनद्वितयं तथा । पृथून्येतानि शस्यन्ते धेनूनां पञ्च सूरिभिः ॥ [ नीलकण्ठी टीकासे ]
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पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक गन्धर्वउवाच
कल्माषपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह ।
इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसासदृशो भुवि ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है— अर्जुन! इक्ष्वाकुवंशमें एक राजा हुए, जो लोकमें कल्माषपादके नामसे प्रसिद्ध थे । इस पृथ्वीपर वे एक असाधारण तेजस्वी राजा थे ॥ १ ॥
स कदाचिद् वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात् ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः ॥ २ ॥
एक दिन वे नगरसे निकलकर वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गये । वहाँ वे रिपुमर्दन नरेश वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए इधर- उधर विचरने लगे ॥ २ ॥
तस्मिन् वने महाघोरे खड्गांश्च बहुशोऽहनत् ।
हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः ॥ ३ ॥
उस महाभयानक वनमें उन्होंने बहुत- से गैंडे भी मारे । बहुत देरतक हिंस्र पशुओंको मारकर जब राजा थक गये, तब वहाँसे नगरकी ओर लौटे ॥ ३ ॥
अकामयत् तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान् ।
स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ४ ॥
तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि ।
अपश्यदजितः संख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् ॥ ५ ॥
प्रतापी विश्वामित्र उन्हें अपना यजमान बनाना चाहते थे । राजा कल्माषपाद युद्धमें कभी पराजित नहीं होते थे । उस दिन वे भूख - प्याससे पीड़ित थे और ऐसे तंग रास्तेपर आ पहुँचे थे, जहाँ एक ही आदमी आ-जा सकता था । वहाँ आनेपर उन्होंने देखा, सामनेकी ओरसे मुनिश्रेष्ठ महामना वसिष्ठकुमार आ रहे हैं ॥ ४-५ ॥
शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलवर्धनम् ।
ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद् वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
वे वसिष्ठजीके वंशकी वृद्धि करनेवाले महाभाग शक्ति थे । महात्मा वसिष्ठजीके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े वे ही थे ॥ ६ ॥
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अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् ।
तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ॥ ७ ॥
उन्हें देखकर राजाने कहा– ' हमारे रास्तेसे हट जाओ । ' तब शक्ति मुनिने मधुर वाणीमें उन्हें समझाते हुए कहा— ॥ ७ ॥
मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः ।
राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये ॥ ८ ॥
‘ महाराज! मार्ग तो मुझे ही मिलना चाहिये । यही सनातन धर्म है । सभी धर्मोंमें राजाके लिये यही उचित है कि ब्राह्मणको मार्ग दे ' ॥ ८ ॥
एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः ।
अपसर्पापसर्पेति वागुत्तरमकुर्वताम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार वे दोनों आपसमें रास्तेके लिये वाग्युद्ध करने लगे । एक कहता, ' तुम हटो ' तो दूसरा कहता, ' नहीं, तुम हटो । ' इस प्रकार वे उत्तर- प्रत्युत्तर करने लगे ॥ ९ ॥
ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन् धर्मपथे स्थितः ।
नापि राजा मुनेर्मानात् क्रोधाच्चाथ जगाम ह ॥ १० ॥
अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः ।
जघान कशया मोहात् तदा राक्षसवन्मुनिम् ॥ ११ ॥
ऋषि तो धर्मके मार्गमें स्थित थे, अतः वे रास्ता छोड़कर नहीं हटे । उधर राजा भी मान और क्रोधके वशीभूत हो मुनिके मार्गसे इधर- उधर नहीं हट सके । राजाओंमें श्रेष्ठ कल्माषपादने मार्ग न छोड़नेवाले शक्ति मुनिके ऊपर मोह-वश राक्षसकी भाँति कोड़ेसे आघात किया ॥ १०-११ ॥
कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः ।
तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १२ ॥
कोड़ेकी चोट खाकर मुनिश्रेष्ठ शक्तिने क्रोधसे मूर्च्छित हो उन उत्तम नरेशको शाप दे दिया ॥ १२ ॥
हंसि राक्षसवद् यस्माद् राजापसद तापसम् ।
तस्मात् त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि ॥ १३ ॥
मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् ।
गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ॥ १४ ॥
तपस्याकी प्रबल शक्तिसे सम्पन्न शक्तिमुनिने कहा - ' राजाओंमें नीच कल्माषपाद! तू एक तपस्वी ब्राह्मणको राक्षसकी भाँति मार रहा है, इसलिये आजसे नरभक्षी राक्षस हो
जायगा तथा अबसे तू मनुष्योंके मांसमें आसक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरता रहेगा ।
नृपाधम! जा यहाँसे ' ॥ १३-१४ ॥
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ततो याज्यनिमित्ते तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
वैरमासीत् तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत ॥ १५ ॥
उन्हीं दिनों यजमानके लिये विश्वामित्र और वसिष्ठमें वैर चल रहा था । उस समय विश्वामित्र राजा कल्माषपादके पास आये ॥ १५ ॥
तयोर्विवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे ।
ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १६ ॥
अर्जुन! जब राजा तथा ऋषिपुत्र दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे,, उग्रतपस्वी प्रतापी विश्वामित्र मुनि उनके निकट चले गये ॥ १६ ॥
ततः स बुबुधे पश्चात् तमृषिं नृपसत्तमः ।
ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठमिव तेजसा ॥ १७ ॥
तदनन्तर नृपश्रेष्ठ कल्माषपादने वसिष्ठके समान तेजस्वी वसिष्ठ मुनिके पुत्र उन महर्षि शक्तिको पहचाना ॥ १७ ॥
अन्तर्धाय तदाऽऽत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत ।
तावुभावतिचक्राम चिकीर्षन्नात्मनः प्रियम् ॥ १८ ॥
भारत! तब विश्वामित्रजीने भी अपनेको अदृश्य करके अपना प्रिय करनेकी इच्छासे राजा और शक्ति दोनोंको चकमा दिया ॥ १८ ॥