श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1331–1340
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340
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धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे । उन्होंने माताकी यह बात सुनकर दो घड़ीतक ( मन- ही- मन) कुछ विचार किया । फिर कुन्तीदेवीको भलीभाँति आश्वासन देकर उन्होंने धनंजयसे यह बात कही- ॥ ६ ॥
त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री । प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह गृहाण पाणिं विधिवत् त्वमस्याः ॥ ७ ॥
' अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है, तुम्हारे ही साथ इस राजकुमारीकी शोभा होगी । शत्रुओंका सामना करनेवाले वीर! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और ( अग्निदेवके साक्ष्यमें ) विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहण करो ' ॥ ७ ॥
अर्जुन उवाच मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः । भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥
अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे
पश्चादयं सहदेवस्तरस्वी ।
वृकोदरोऽहं च यमौ च राज- नियं च कन्या भवतो नियोज्याः ॥ ९ ॥
अर्जुन बोले - नरेन्द्र! आप मुझे अधर्मका भागी न बनाइये । ( बड़े भाईके अविवाहित रहते छोटे भाईका विवाह हो जाय, ) यह धर्म नहीं है; ऐसा व्यवहार तो अनार्योंमें देखा गया है । पहले आपका विवाह होना चाहिये; तत्पश्चात् अचिन्त्यकर्मा महाबाहु भीमसेनका और फिर मेरा । तत्पश्चात् नकुल फिर वेगवान् सहदेव विवाह कर सकते हैं । राजन्! भैया भीमसेन, मैं नकुल- सहदेव तथा यह राजकन्या –सभी आपकी आज्ञाके अधीन हैं ॥ ८ -९ ॥ एवं गते यत् करणीयमत्र धर्म्यं यशस्यं कुरु तद् विचिन्त्य । पाञ्चालराजस्य हितं च यत् स्यात् प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥
ऐसी दशामें आप यहाँ अपनी बुद्धिसे विचार करके जो धर्म और यशके अनुकूल तथा पांचालराजके लिये भी हितकर कार्य हो, वह कीजिये और उसके लिये हमें आज्ञा दीजिये ।
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हम सब लोग आपके अधीन हैं ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
जिष्णोर्वचनमाज्ञाय भक्तिस्नेहसमन्वितम् ।
दृष्टिं निवेशयामासुः पाञ्चाल्यां पाण्डुनन्दनाः ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - अर्जुनके ये भक्तिभाव तथा स्नेहसे भरे वचन सुननेके बाद समस्त पाण्डवोंने पांचालराजकुमारी द्रौपदीकी ओर देखा ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा ते तत्र पश्यन्तीं सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् ।
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन् ॥ १२ ॥
यशस्विनी कृष्णा भी उन सबको देख रही थी। वहाँ बैठे हुए पाण्डवोंने द्रौपदीको देखकर आपसमें भी एक- दूसरेपर दृष्टिपात किया और सबने अपने हृदयमें द्रुपदराजकुमारीको बसा लिया ॥ १२ ॥
तेषां तु द्रौपदीं दृष्ट्वा सर्वेषाममितौजसाम् ।
सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ॥ १३ ॥
द्रुपदकुमारीपर दृष्टि पड़ते ही उन सभी अमिततेजस्वी पाण्डुपुत्रोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर मन्मथ प्रकट हो गया ॥ १३ ॥
काम्यं हि रूपं पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वयम् ।
बभूवाधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ॥ १४ ॥
विधाताने पांचालीका कमनीय रूप स्वयं ही रचा और सँवारा था । वह संसारकी अन्य स्त्रियोंसे बहुत अधिक आकर्षक और समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाला था ॥ १४ ॥
तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनवचः कृत्स्नं सस्मार मनुजर्षभः ॥ १५ ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उनकी आकृति देखकर ही उनके मनका भाव समझ लिया । फिर उन्हें द्वैपायन वेदव्यासजीके सारे वचनोंका स्मरण हो आया ॥ १५ ॥
अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् मिथोभेदभयान्नृपः ।
सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ॥ १६ ॥
द्रौपदीको लेकर हम सब भाइयोंमें फूट ना पड़ जाय, इस भयसे राजाने अपने सभी बन्धुओंसे कहा — ‘ कल्याणमयी द्रौपदी हम सब लोगोंकी पत्नी होगी ' ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच भ्रातुर्वचस्तत् प्रसमीक्ष्य सर्वे ज्येष्ठस्य पाण्डोस्तनयास्तदानीम् । तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभिः सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वाः ॥ १७ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाईका यह वचन सुनकर उदार हृदयवाले समस्त पाण्डव मन- ही- मन उसीका चिन्तन करते हुए चुपचाप बैठे रह गये ॥ १७ ॥
वृष्णिप्रवीरस्तु कुरुप्रवीरा- नाशंसमानः सहरौहिणेयः । जगाम तां भार्गवकर्मशालां यत्रासते ते पुरुषप्रवीराः ॥ १८ ॥
इधर वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ कुरुकुलके प्रमुख वीर पाण्डवोंको पहचानकर कुम्हारके घरमें, जहाँ वे नरश्रेष्ठ निवास करते थे, मिलनेके लिये गये ॥ १८ ॥
तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घबाहुं
ददर्श कृष्णः सहरौहिणेयः ।
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्चा- प्युपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ॥ १ ९ ॥
वहाँ बलरामसहित श्रीकृष्णने मोटी और विशाल भुजाओंसे सुशोभित अजातशत्रु युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी अन्य चारों भाइयोंको देखा ॥ १ ९ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽभिगम्य कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् । कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ २० ॥
वहाँ जाकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे ' मैं श्रीकृष्ण हूँ' यों कहकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिरके दोनों चरणोंका स्पर्श किया ॥ २० ॥
तथैव तस्याप्यनु रौहिणेय- स्तौ चापि हृष्टाः कुरवोऽभ्यनन्दन् ।
पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरा- वगृह्णतां भारतमुख्य पादौ ॥ २१ ॥
उन्हींके साथ उसी प्रकार बलरामजीने भी ( अपना नाम बताकर) उनके चरण छूए । पाण्डव भी उन दोनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। जनमेजय! फिर उन यदुवीरोंने अपनी बूआ कुन्तीके भी चरणोंका स्पर्श किया ॥ २१ ॥
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः पप्रच्छ कृष्णं कुशलं विलोक्य ।
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कथं वयं वासुदेव त्वयेह गूढा वसन्तो विदिताश्च सर्वे ॥ २२ ॥
कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर अजातशत्रु युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको देखकर कुशल- समाचार पूछा और कहा — ‘ वसुदेवनन्दन! हम तो यहाँ छिपकर रहते हैं, फिर आपने हम सब लोगोंको कैसे पहचान लिया? ' ॥ २२ ॥
तमब्रवीद् वासुदेवः प्रहस्य गूढोऽप्यग्निर्ज्ञायत एव राजन् । तं विक्रमं पाण्डवेयानतीत्य कोऽन्यः कर्ता विद्यते मानुषेषु ॥ २३ ॥
तब भगवान् वासुदेवने हँसकर उत्तर दिया- ' राजन्! आग कितनी ही छिपी क्यों न हो, वह पहचानमें आ ही जाती है । भला, पाण्डवोंको छोड़कर मनुष्योंमें कौन ऐसा है, जो वैसा अद्भुत कर्म कर दिखाता ॥ २३ ॥
दिष्ट्या सर्वे पावकाद् विप्रमुक्ता यूयं घोरात् पाण्डवाः शत्रुसाहाः । दिष्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् ॥ २४ ॥
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‘बड़े सौभाग्यकी बात है कि शत्रुओंका सामना करनेकी शक्ति रखनेवाले आप सभी पाण्डव उस भयंकर अग्निकाण्डसे जीवित बच गये । पापी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अपने मन्त्रियोंसहित इस षड्यन्त्रमें सफल न हो सका, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥ २४ ॥
भद्रं वोऽस्तु निहितं यद् गुहायां विवर्धध्वं ज्वलना इवैधमानाः । मा वो विदुः पार्थिवाः केचिदेव यास्यावहे शिविरायैव तावत् ॥ सोऽनुज्ञातः पाण्डवेनाव्ययश्रीः प्रायाच्छीघ्रं बलदेवेन सार्धम् ॥ २५ ॥
‘ हमारे अन्तःकरणमें जो कल्याणकी भावना निहित है, वह आपको प्राप्त हो । आपलोग सदा प्रज्वलित अग्निकी भाँति बढ़ते रहें । अभी आपलोगोंको कोई भी राजा पहचान न सकें, इसलिये हमलोग भी अपने शिविरको ही लौट जायँगे । ' यों कहकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अक्षय शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीके साथ शीघ्र वहाँसे चल दिये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि रामकृष्णागमने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका आगमनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९० ॥
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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः धृष्टद्युम्नका गुप्तरूपसे वहाँका सब हाल देखकर राजा द्रुपदके पास आना तथा द्रौपदीके विषयमें द्रुपदका प्रश्न वैशम्पायन उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु पाञ्चाल्यः पृष्ठतः कुरुनन्दनौ ।
अन्वगच्छत् तदा यान्तौ भार्गवस्य निवेशने ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब कुरु-नन्दन भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घर जा रहे थे, उसी समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न गुप्तरूपसे उनके पीछे लग गये ॥ १ ॥
सोऽज्ञायमानः पुरुषानवधाय समन्ततः ।
स्वयमारान्निलीनोऽभूद् भार्गवस्य निवेशने ॥ २ ॥
उन्होंने चारों ओर अपने सेवकोंको बैठा दिया और स्वयं भी अज्ञातरूपसे कुम्हारके घरके पास ही छिपे रहे ॥ २ ॥
सायं च भीमस्तु रिपुप्रमाथी जिष्णुर्यमौ चापि महानुभावौ । भैक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय निवेदयाञ्चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ३ ॥
सायंकाल होनेपर शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले भीमसेन, अर्जुन और महानुभाव नकुल-सहदेवने भिक्षा लाकर युधिष्ठिरको निवेदन की । इन सबका अन्तःकरण उदार था ॥ ३ ॥
ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां ता- मुवाच काले वचनं वदान्या । त्वमग्रमादाय कुरुष्व भद्रे बलिं च विप्राय च देहि भिक्षाम् ॥ ४ ॥
तब उदारहृदया कुन्तीने उस समय द्रौपदीसे कहा-' भद्रे! तुम भोजनका प्रथम भाग लेकर उससे देवताओंको बलि अर्पण करो तथा ब्राह्मणको भिक्षा दो ॥ ४ ॥
ये चान्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः
परिश्रिता ये परितो मनुष्याः ।
ततश्च शेषं प्रविभज्य शीघ्र- मर्धं चतुर्धा मम चात्मनश्च ॥ ५ ॥
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' तथा अपने आस- पास जो दूसरे मनुष्य आश्रितभावसे रहते और भोजन चाहते हैं, उन्हें भी अन्न परोसो । तदनन्तर जो शेष बच जाय, उसके शीघ्र ही इस प्रकार विभाग करो । अन्नका आधा भाग एकके लिये रखो, फिर शेषके छः भाग करके चार भाइयोंके लिये चार भाग अलग - अलग रख दो, उसके बाद मेरे लिये और अपने लिये भी एक - एक भाग पृथक्-पृथक् परोस दो ॥ ५ ॥
अर्धं तु भीमाय च देहि भद्रे य एष नागर्षभतुल्यरूपः । गौरो युवा संहननोपपन्न एष हि वीरो बहुभुक् सदैव ॥ ६ ॥
‘ कल्याणी! ये जो गजराजके समान शरीरवाले हृष्ट - पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं, इनका नाम भीम है, इन्हें अन्नका आधा भाग दे दो । वीरवर भीम सदासे ही अधिक भोजन करनेवाले हैं ' ॥ ६ ॥
साहृष्टरूपेव तु राजपुत्री तस्या वचः साधु विशङ्कमाना । यथावदुक्तं प्रचकार साध्वी ते चापि सर्वे बुभुजुस्तदन्नम् ॥ ७ ॥
सासकी आज्ञाका पालन करनेमें ही अपना कल्याण मानती हुई साध्वी राजकुमारी द्रौपदीने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुन्तीदेवीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही किया । सबने उस अन्नका भोजन किया ॥ ७ ॥
कुशैस्तु भूमौ शयनं चकार माद्रीपुत्रः सहदेवस्तरस्वी । यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर वेगवान् वीर माद्रीकुमार सहदेवने धरतीपर कुशकी शय्या बिछा दी । फिर समस्त पाण्डव वीर अपने - अपने मृगचर्म बिछाकर भूमिधर ही सोये ॥ ८ ॥
अगस्त्यशास्तामभितो दिशं तु शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् । कुन्ती पुरस्तात् तु बभूव तेषां पादान्तरे चाथ बभूव कृष्णा ॥ ९ ॥
अशेत भूमौ सह पाण्डुपुत्रैः पादोपधानीव कृता कुशेषु । न तत्र दुःखं मनसापि तस्या न चावमेने कुरुपुङ्गवांस्तान् ॥ १० ॥
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उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके सिर दक्षिण दिशाकी ओर थे । कुन्ती उनके मस्तककी ओर और द्रौपदी पैरोंकी ओर पृथ्वीपर ही पाण्डवोंके साथ सोयी, मानो उन कुशासनोंपर वह उनके पैरोंकी तकिया बन गयी । वहाँ उस परिस्थितिमें रहकर भी द्रौपदीके मनमें तनिक भी दुःख नहीं हुआ और उसने उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका किंचिन्मात्र भी तिरस्कार नहीं किया ॥ ९ -१० ॥ ते तत्र शूराः कथयाम्बभूवुः कथा विचित्राः पृतनाधिकाराः । अस्त्राणि दिव्यानि रथांश्च नागान् खड्गान् गदाश्चापि परश्वधांश्च ॥ ११ ॥
वे शूरवीर पाण्डव वहाँ सेनापतियोंके योग्य अद्भुत कथाएँ कहने लगे । उन्होंने नाना प्रकारके दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसोंके विषयमें भी चर्चाएँ कीं ॥ ११ ॥
तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम् । शुश्राव कृष्णां च तदा विषण्णां ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः ॥ १२ ॥
उनकी कही हुई वे सभी बातें उस समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने सुनीं और उन सभी लोगोंने वहाँ सोयी हुई द्रौपदीको भी देखा ॥ १२ ॥
धृष्टद्युम्नो राजपुत्रस्तु सर्वं वृत्तं तेषां कथितं चैव रात्रौ । सर्वं राज्ञे द्रुपदायाखिलेन निवेदयिष्यंस्त्वरितो जगाम ॥ १३ ॥
तदनन्तर राजकुमार धृष्टद्युम्न रातमें पाण्डवोंका इतिहास तथा उनकी कही हुई सारी बातें राजा द्रुपदको पूर्णरूपसे सुनानेके लिये बड़ी उतावलीके साथ राजभवनमें गये ॥ १३ ॥
पाञ्चालराजस्तु विषण्णरूप- स्तान् पाण्डवानप्रतिविन्दमानः । धृष्टद्युम्नं पर्यपृच्छन्महात्मा क्व सा गता केन नीता च कृष्णा ॥ १४ ॥
पांचालराज द्रुपद पाण्डवोंका पता न पानेके कारण बहुत खिन्न थे । धृष्टद्युम्नके आनेपर महात्मा द्रुपदने उससे पूछा - ' बेटा! मेरी पुत्री कृष्णा कहाँ गयी? कौन उसे ले गया? ॥ १४ ॥
कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन
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वैश्येन वा करदेनोपपन्ना । कच्चित् पदं मूर्ध्नि न पङ्कदिग्धं कच्चिन्न माला पतिता श्मशाने ॥ १५ ॥
'कहीं किसी शूद्रने अथवा नीच जातिके पुरुषद्वारा ऊँची जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न मनुष्यने या कर देनेवाले वैश्यने तो मेरी पुत्रीको प्राप्त नहीं कर लिया? और इस प्रकार उन्होंने मेरे सिरपर अपना कीचड़से सना पाँव तो नहीं रख दिया? मालाके समान सुकुमारी और हृदयपर धारण करनेयोग्य मेरी लाडली पुत्री श्मशानके समान अपवित्र किसी पुरुषके हाथमें तो नहीं पड़ गयी? ॥ १५ ॥
कच्चित् सवर्णप्रवरो मनुष्य उद्रिक्तवर्णोऽप्युत एव कच्चित् । कच्चिन्न वामो मम मूर्ध्नि पादः कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ॥ १६ ॥
' क्या द्रौपदीको पानेवाला मनुष्य अपने समान वर्ण ( क्षत्रियकुल ) -का ही कोई श्रेष्ठ पुरुष है? अथवा वह अपने से भी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलका है? ' बेटा! मेरी कृष्णाका स्पर्श कर किसी निम्नवर्णवाले मनुष्यने आज मेरे मस्तकपर अपना बायाँ पैर तो नहीं रख दिया? ॥ १६ ॥
कच्चिन्न तप्स्ये परमप्रतीतः संयुज्य पार्थेन नरर्षभेण । वदस्व तत्त्वेन महानुभाव कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाद्य ॥ १७ ॥
‘ क्या ऐसा सौभाग्य होगा कि मैं नरश्रेष्ठ अर्जुनसे द्रौपदीका विवाह करके अत्यन्त प्रसन्न होऊँ और कभी भी संतप्त न हो सकूँ? महानुभाव पुत्र! ठीक- ठीक बताओ, आज जिसने मेरी पुत्रीको जीता है, वह पुरुष कौन है? ॥ १७ ॥
विचित्रवीर्यस्य सुतस्य कच्चित् कुरुप्रवीरस्य ध्रियन्ति पुत्राः । कच्चित् तु पार्थेन यवीयसाद्य धनुर्गृहीतं निहतं च लक्ष्यम् ॥ १८ ॥
‘ क्या कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर विचित्रवीर्यकुमार पाण्डुके शूरवीर पुत्र अभी जीवित हैं? क्या आज कुन्तीके सबसे छोटे पुत्र अर्जुनने ही उस धनुषको उठाया और लक्ष्यको मार गिराया था? ' ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नप्रत्यागमने एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ १ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें धृष्टद्युम्नका प्रत्यागमनविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ १ ॥