श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1351–1360
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360
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कुन्तीदेवी सती - साध्वी कृष्णाको साथ ले द्रुपदके रनिवासमें गयीं । वहाँकी उदारहृदया स्त्रियोंने कौरवराज पाण्डुकी धर्मपत्नीका ( बड़ा ) आदर- सत्कार किया ॥ ९ ॥
तान् सिंहविक्रान्तगतीन् निरीक्ष्य
महर्षभाक्षानजिनोत्तरीयान् ।
गूढोत्तरांसान् भुजगेन्द्र भोग- प्रलम्बबाहून् पुरुषप्रवीरान् ॥ १० ॥
राजा च राज्ञः सचिवाश्च सर्वे पुत्राश्च राज्ञः सुहृदस्तथैव । प्रेष्याश्च सर्वे निखिलेन राजन् हर्षं समापेतुरतीव तत्र ॥ ११ ॥
राजन्! पाण्डवोंकी चाल- ढाल सिंहके समान पराक्रमसूचक थी, उनकी आँखें साँड़के समान बड़ी - बड़ी थीं, उन्होंने काले मृगचर्मके ही दुपट्टे ओढ़ रखे थे, उनकी हँसलीकी हड्डियाँ मांससे छिपी हुई थीं और भुजाएँ नागराजके शरीरके समान मोटी एवं विशाल थीं । उन पुरुषसिंह पाण्डवोंको देखकर राजा द्रुपद, उनके सभी पुत्र, मन्त्री, इष्ट- मित्र और समस्त नौकर- चाकर ये सब - के - सब वहाँ बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ १०-११ ॥ ते तत्र वीराः परमासनेषु
सपादपीठेष्वविशङ्कमानाः ।
यथानुपूर्व विविशुर्नराग्रया- स्तथा महार्हेषु न विस्मयन्तः ॥ १२ ॥
वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव वहाँ लगे हुए पादपीठसहित बहुमूल्य श्रेष्ठ सिंहासनोंपर बिना किसी हिचक या संकोचके मनमें तनिक भी विस्मय न करते हुए बड़े- छोटेके क्रमसे जा बैठे ॥ १२ ॥
उच्चावचं पार्थिवभोजनीयं पात्रीषु जाम्बूनदराजतीषु । दासाश्च दास्यश्च सुमृष्टवेषाः सम्भोजकाश्चाप्युपजह्रुरन्नम् ॥ १३ ॥
तब स्वच्छ और सुन्दर पोशाक पहने हुए दास-दासी तथा रसोइयोंने सोने - चाँदीके बरतनोंमें राजाओंके भोजन करनेयोग्य अनेक प्रकारकी सामान्य और विशेष भोजन-सामग्री लाकर परोसी ॥ १३ ॥
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ते तत्र भुक्त्वा पुरुषप्रवीरा यथाऽऽत्मकामं सुभृशं प्रतीताः । उत्क्रम्य सर्वाणि वसूनि राजन् सांग्रामिकं ते विविशुर्नृवीराः ॥ १४ ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ पाण्डव वहाँ अपनी रुचिके अनुसार उन सब वस्तुओंको खाकर बहुत अधिक प्रसन्न हुए। राजन्! ( तदनन्तर वहाँ संग्रह की हुई अन्य ) सब वैभव - भोगकी सामग्रियोंको छोड़कर वे वीर पहले उसी स्थानपर गये, जहाँ युद्धकी सामग्रियाँ रखी गयी थीं ॥ १४ ॥
तल्लक्षयित्वा द्रुपदस्य पुत्रो राजा च सर्वैः सह मन्त्रिमुख्यैः । समर्थयामासुरुपेत्य हृष्टाः कुन्तीसुतान् पार्थिव राजपुत्रान् ॥ १५ ॥
जनमेजय! यह सब देखकर राजा द्रुपद, राजकुमार और सभी प्रधान मन्त्री बड़े प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर उन्होंने अपने मनमें यही निश्चय किया कि ये राजकुमार कुन्तीदेवीके ही पुत्र हैं ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि युधिष्ठिरादिपरीक्षणे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ३ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परीक्षाविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९३ ॥
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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन वैशम्पायन उवाच
तत आहूय पाञ्चाल्यो राजपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
परिग्रहेण ब्राह्मेण परिगृह्य महाद्युतिः ॥ १ ॥
पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम् ।
कथं जानीम भवतः क्षत्रियान् ब्राह्मणानुत ॥ २ ॥
वैश्यान् वा गुणसम्पन्नानथवा शूद्रयोनिजान् ।
मायामास्थाय वा विप्रांश्चरतः सर्वतोदिशम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी, उदारचित्त, पांचालराज द्रुपदने अत्यन्त कान्तिमान् कुन्तीपुत्र राजकुमार युधिष्ठिरको ( अपने पास ) बुलाकर ब्राह्मणोचित आतिथ्य सत्कारके द्वारा उन्हें अपनाकर पूछा -' हमें कैसे ज्ञात हो कि आपलोग किस वर्णके हैं? हम आपको क्षत्रिय, ब्राह्मण, गुणसम्पन्न वैश्य अथवा शूद्र क्या समझें? अथवा मायाका आश्रय लेकर ब्राह्मणरूपसे सब दिशाओंमें विचरनेवाले आपलोगोंको हम कोई देवता मानें? ॥ १–३ ॥
कृष्णाहेतोरनुप्राप्ता देवाः संदर्शनार्थिनः ।
ब्रवीतु नो भवान् सत्यं संदेहो ह्यत्र नो महान् ॥ ४ ॥
जान पड़ता है, आप कृष्णाको पानेके लिये यहाँ दर्शक बनकर आये हुए देवता ही हैं । आप सच्ची बात हमें बता दें; क्योंकि आपके विषयमें हमको बड़ा संदेह हो रहा है ॥ ४ ॥
अपि नः संशयस्यान्ते मनः संतुष्टिमावहेत् ।
अपि नो भागधेयानि शुभानि स्युः परंतप ॥ ५ ॥
परंतप! आपसे रहस्यकी बात सुनकर क्या हमारे इस संशयका नाश और मनको संतोष होगा और क्या हमारा भाग्य उदय होगा? ॥ ५ ॥
इच्छया ब्रूहि तत् सत्यं सत्यं राजसु शोभते ।
इष्टापूर्तेन च तथा वक्तव्यमनृतं न तु ॥ ६ ॥
आप स्वेच्छासे ही सच्ची बात बतायें, राजाओंमें इष्ट* और पूर्तकी अपेक्षा सत्यकी ही अधिक महिमा है; अतः असत्य नहीं बोलना चाहिये ॥ ६ ॥
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श्रुत्वा ह्यमरसंकाश तव वाक्यमरिंदम ।
ध्रुवं विवाहकरणमास्थास्यामि विधानतः ॥ ७ ॥
देवताओंके समान तेजस्वी शत्रुसूदन! मैं आपकी बात सुनकर निश्चय ही विधिपूर्वक विवाहकी तैयारी करूँगा ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मा राजन् विमना भूस्त्वं पाञ्चाल्य प्रीतिरस्तु ते ।
ईप्सितस्ते ध्रुवः कामः संवृत्तोऽयमसंशयम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर बोले- पांचालराज! आप उदास न हों, आपको प्रसन्न होना चाहिये । आपके मनमें जो अभीष्ट कामना थी, वह निश्चय ही आज पूरी हुई है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
वयं हि क्षत्रिया राजन् पाण्डोः पुत्रा महात्मनः ।
ज्येष्ठ मां विद्धि कौन्तेयं भीमसेनार्जुनाविमौ ॥ ९ ॥
राजन्! हमलोग क्षत्रिय ही हैं, महात्मा पाण्डुके पुत्र हैं । मुझे कुन्तीका ज्येष्ठ पुत्र समझिये, ये दोनों भीमसेन और अर्जुन हैं ॥ ९ ॥
आभ्यां तव सुता राजन् निर्जिता राजसंसदि ।
यमौ च तत्र कुन्ती च यत्र कृष्णा व्यवस्थिता ॥ १० ॥
राजन्! इन्हीं दोनोंने समस्त राजाओंके समूहमें आपकी पुत्रीको जीता है । उधर वे दोनों नकुल और सहदेव हैं । माता कुन्ती वहीं गयी हैं, जहाँ राजकुमारी कृष्णा है ॥ १० ॥
व्येतु ते मानसं दुःखं क्षत्रियाः स्मो नरर्षभ ।
पद्मिनीव सुतेयं ते हृदादन्यह्रदं गता ॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ! अब आपकी मानसिक चिन्ता निकल जानी चाहिये । हम सब लोग क्षत्रिय ही हैं । आपकी यह पुत्री कृष्णा कमलिनीकी भाँति एक सरोवरसे दूसरे सरोवरको प्राप्त हुई है ॥ ११ ॥
इति तथ्यं महाराज सर्वमेतद् ब्रवीमि ते ।
भवान् हि गुरुरस्माकं परमं च परायणम् ॥ १२ ॥
महाराज! यह सब मैं आपसे सच्ची बात कह रहा हूँ। आप हमारे बड़े तथा परम आश्रय हैं ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः स द्रुपदो राजा हर्षव्याकुललोचनः ।
प्रतिवक्तुं मुदा युक्तो नाशकत् तं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी ये बातें सुनकर महाराज द्रुपदकी आँखोंमें हर्षके आँसू छलक आये । वे आनन्दमें मग्न हो गये और ( गला भर आनेके कारण ) उन युधिष्ठिरको तत्काल ( कुछ ) उत्तर न दे सके ॥ १३ ॥
यत्नेन तु स तं हर्षं संनिगृह्य परंतपः ।
अनुरूपं तदा वाचा प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
शत्रुसूदन द्रुपदने ( बड़े ) यत्नसे अपने ( हर्षके आवेश) - को रोका और युधिष्ठिरको उनके कथनके अनुरूप ही उत्तर दिया ॥ १४ ॥
पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुताः पुरात् ।
स तस्मै सर्वमाचख्यावानुपूर्व्येण पाण्डवः ॥ १५ ॥
फिर उन धर्मात्मा पांचाल- नरेशने यह पूछा कि ' आपलोग वारणावत नगरसे किस प्रकार भाग निकले? ' पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने वे सारी बातें उन्हें क्रमशः कह सुनायीं ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा द्रुपदो राजा कुन्तीपुत्रस्य भाषितम् ।
विगर्हयमास तदा धृतराष्ट्रं नरेश्वरम् ॥ १६ ॥
आश्वासयामास च तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
प्रतिजज्ञे च राज्याय द्रुपदो वदतां वरः ॥ १७ ॥
कुन्तीकुमारके मुखसे वह सारा समाचार सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज द्रुपदने उस समय राजा धृतराष्ट्रकी बड़ी निन्दा की और कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको आश्वासन दिया । साथ ही उन्होंने यह प्रतिज्ञा भी की कि ' हम तुम्हें तुम्हारा राज्य दिलवाकर रहेंगे ' ॥ १६-१७ ॥
ततः कुन्ती च कृष्णा च भीमसेनार्जुनावपि ।
यमौ च राज्ञा संदिष्टं विविशुर्भवनं महत् ॥ १८ ॥
तत्र ते न्यवसन् राजन् यज्ञसेनेन पूजिताः ।
प्रत्याश्वस्तस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तम् ॥ १ ९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् कुन्ती, कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव राजा द्रुपदके द्वारा निर्दिष्ट किये हुए विशाल भवनमें गये और यज्ञसेन (द्रुपद ) -से सम्मानित हो वहीं रहने लगे । इस प्रकार विश्वास जम जानेपर महाराज द्रुपदने अपने पुत्रोंके साथ जाकर युधिष्ठिरसे कहा— ॥ १८-१९ ॥
गृह्णातु विधिवत् पाणिमद्यायं कुरुनन्दनः ।
पुण्येऽहनि महाबाहुरर्जुनः कुरुतां क्षणम् ॥ २० ॥
' ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु अर्जुन आजके पुण्यमय दिवसमें मेरी पुत्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण करें और ( अपने कुलोचित )
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मंगलाचारका पालन प्रारम्भ कर दें ' ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीत् ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिरः ।
ममापि दारसम्बन्धः कार्यस्तावद् विशाम्पते ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा -' राजन्! विवाह तो मेरा भी करना होगा ' ॥ २१ ॥
द्रुपदउवाच
भवान् वा विधिवत् पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम ।
यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश ॥ २२ ॥
द्रुपद बोले – वीर! तब आप ही विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण करें अथवा आप अपने भाइयोंमेंसे जिसके साथ चाहें, उसीके साथ कृष्णाको विवाहकी आज्ञा दे दें ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरउवाच
सर्वेषां महिषी राजन् द्रौपदी नो भविष्यति ।
एवं प्रव्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशाम्पते ॥ २३ ॥
युधिष्ठिरने कहा— राजन्! द्रौपदी तो हम सभी भाइयोंकी पटरानी होगी ।
मेरी माताने पहले हम सब लोगोंको ऐसी ही आज्ञा दे रखी है ॥ २३ ॥
अहं चाप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः ।
पार्थेन विजिता चैषा रत्नभूता सुता तव ॥ २४ ॥
मैं तथा पाण्डव भीमसेन भी अभीतक अविवाहित हैं और आपकी इस रत्नस्वरूपा कन्याको अर्जुनने जीता है ॥ २४ ॥
एष नः समयो राजन् रत्नस्य सह भोजनम् ।
न च तं हातुमिच्छामः समयं राजसत्तम ॥ २५ ॥
महाराज! हम लोगोंमें यह शर्त हो चुकी है कि रत्नको हम सब लोग बाँटकर एक साथ उपभोग करेंगे । नृपशिरोमणे! हम अपनी उस ( पुरानी ) शर्तको छोड़ना या तोड़ना नहीं चाहते ॥ २५ ॥
सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति ।
आनुपूर्व्येण सर्वेषां गृह्णातु ज्वलने करान् ॥ २६ ॥
अतः कृष्णा धर्मके अनुसार हम सभीकी महारानी होगी । इसलिये वह प्रज्वलित अग्निके सामने क्रमशः हम सबका पाणिग्रहण करे ॥ २६ ॥
द्रुपद उवाच
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एकस्य बह्वयो विहिता महिष्यः कुरुनन्दन ।
नैकस्या बहवः पुंसः श्रूयन्ते पतयः क्वचित् ॥ २७ ॥
द्रुपद बोले—' कुरुनन्दन! एक राजा बहुत- सी रानियाँ ( अथवा एक पुरुषकी अनेक स्त्रियाँ) हों, ऐसा विधान तो वेदोंमें देखा गया है; परंतु एक स्त्रीके अनेक पुरुष पति हों, ऐसा कहीं सुननेमें नहीं आया है * ॥ २७ ॥
लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्मं धर्मविच्छुचिः ।
कर्तुमर्हसि कौन्तेय कस्मात् ते बुद्धिरीदृशी ॥ २८ ॥
' तुम धर्मके ज्ञाता और पवित्र हो, अतः तुम्हें लोक और वेदके विरुद्ध यह अधर्म नहीं करना चाहिये । तुम कुन्तीके पुत्र हो; तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्यों हो रही है? ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर उवाच
सूक्ष्मो धर्मो महाराज नास्य विद्मो वयं गतिम् ।
पूर्वेषामानुपूर्व्येण यातं वर्त्मानुयामहे ॥ २ ९ ॥
युधिष्ठिरने कहा — महाराज! धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, हम उसकी गतिको नहीं जानते । पूर्वकालके प्रचेता आदि जिस मार्गसे गये हैं, उसीका हमलोग क्रमशः अनुसरण करते हैं ॥ २ ९ ॥
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः ।
एवं चैव वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम् ॥ ३० ॥
मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि भी कभी अधर्ममें नहीं लगती । हमारी माताने हमें ऐसा ही करनेकी आज्ञा दी है और मेरे मनमें भी यही ठीक जँचा है ॥ ३० ॥
एष धर्मो ध्रुवो राजंश्चरैनमविचारयम् ।
मा च शंका तत्र ते स्यात् कथंचिदपि पार्थिव ॥ ३१ ॥
राजन्! यह अटल धर्म है । आप बिना किसी सोच- विचारके इसका पालन करें । पृथ्वीपते! आपको इस विषयमें किसी प्रकारकी आशंका नहीं होनी चाहिये ॥ ३१ ॥
द्रुपद उवाच
त्वं च कुन्ती च कौन्तेय धृष्टद्युम्नश्च मेमे सुतः ।
कथयन्त्विति कर्तव्यं श्वः काले करवामहे ॥ ३२ ॥
द्रुपद बोले— कुन्तीनन्दन! तुम, कुन्तीदेवी और मेरा पुत्र धृष्टद्युम्न– ये सब लोग मिलकर यह निश्चय करके बतायें कि क्या करना चाहिये? उसे ही कल ठीक समयपर हमलोग करेंगे ॥ ३२ ॥
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वैशम्पायन उवाच
ते समेत्य ततः सर्वे कथयन्ति स्म भारत ।
अथ द्वैपायनो राजन्नभ्यागच्छद् यदृच्छया ॥ ३३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भारत! तदनन्तर वे सब लोग मिलकर इस विषयमें सलाह करने लगे । राजन्! इसी समय भगवान् वेदव्यास वहाँ अकस्मात् आ पहुँचे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें वेदव्यासके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ चौरानबेवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १९४ ॥
* स्मृतियोंमें इष्ट और पूर्तका परिचय इस प्रकार दिया गया है— अग्निहोत्रं तपः सत्यं वेदानां चानुपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते ॥
वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामाः पूर्तमित्यभिधीयते ॥
‘ अग्निहोत्र, तप, सत्यभाषण, वेदोंकी आज्ञाका निरन्तर पालन, अतिथियोंका सत्कार तथा बलिवैश्वदेव कर्म — ये ‘ इष्ट ' कहलाते हैं । बावली, कुआँ, पोखरे आदि बनवाना, देवमन्दिर निर्माण कराना, अन्नदान देना और बगीचे लगाना— इनका नाम पूर्त है। ' * इस विषयमें यह श्रुतिका वचन प्रसिद्ध है— ' एकस्य बह्वयो जाया भवन्ति, नैकस्यै बहवः सहपतयः ’ अर्थात् एक पुरुषकी बहुत- सी स्त्रियाँ होती हैं, किंतु एक स्त्रीके लिये बहुत- से पति नहीं होते ।
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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः व्यासजीके सामने द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने - अपने विचार व्यक्त करना वैशम्पायन उवाच
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाञ्चाल्यश्च महायशाः ।
प्रत्युत्थाय महात्मानं कृष्णं सर्वेऽभ्यवादयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर वे पाण्डव तथा महायशस्वी पांचालराज द्रुपद — सबने खड़े होकर महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीको प्रणाम किया ॥ १ ॥
प्रतिनन्द्य स तां पूजां पृष्ट्वा कुशलमन्ततः ।
आसने काञ्चने शुद्धे निषसाद महामनाः ॥ २ ॥
उनके द्वारा की हुई पूजाको प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करके अन्तमें सबसे कुशल - मंगल पूछकर महामना व्यासजी शुद्ध सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए ॥ २ ॥
अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा ॥ आसनेषु महार्हेषु निषेदुर्द्विपदां वराः ॥ ३ ॥
फिर अमित - तेजस्वी व्यासजीकी आज्ञा पाकर वे सभी नरश्रेष्ठ बहुमूल्य आसनोंपर बैठे ॥ ३ ॥