श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1361–1370

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1361–1370

पृष्ठ 1361

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ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः ।

पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थं विशाम्पते ॥ ४ ॥

कथमेका बहूनां स्याद् धर्मपत्नी न संकरः ।

एतन्मे भगवान् सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम् ॥ ५ ॥

राजन्! तदनन्तर दो घड़ीके बाद राजा द्रुपदने मीठी वाणी बोलकर महात्मा व्यासजीसे द्रौपदीके विषयमें पूछा— ' भगवन्! एक ही स्त्री बहुत- से पुरुषोंकी धर्मपत्नी कैसे हो सकती है? जिससे संकरताका दोष न लगे, यह सब आप ठीक - ठीक बतावें ' ॥ ४-५ ॥ व्यास उवाच

अस्मिन् धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके ।

यस्य यस्य मतं यद् यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ॥ ६ ॥

व्यासजीने कहा – अत्यन्त गहन होनेके कारण शास्त्रीय आवरणके द्वारा ढके हुए अतएव इस लोक- वेद - विरुद्ध धर्मके सम्बन्धमें तुममेंसे जिसका -जिसका जो - जो मत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

द्रुपद उवाच

अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः ।

न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम ॥ ७ ॥

द्रुपद बोले- द्विजश्रेष्ठ! मेरी रायमें तो यह अधर्म ही है; क्योंकि यह लोक और वेद दोनोंके विरुद्ध है । बहुत- से पुरुषोंकी एक ही पत्नी हो, ऐसा व्यवहार कहीं भी नहीं

पृष्ठ 1362

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है ॥ ७ ॥

न चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः ।

न चाप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन ॥ ८ ॥

पूर्ववर्ती महात्मा पुरुषोंने भी ऐसे धर्मका आचरण नहीं किया है और विद्वान् पुरुषोंको किसी प्रकार भी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥

ततोऽहं न करोम्येनं व्यवसायं क्रियां प्रति ।

धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे त्वयम् ॥ ९ ॥

इसलिये मैं इस धर्मविरोधी आचारको काममें नहीं लाना चाहता । मुझे तो इस कार्यके धर्मसंगत होनेमें सदा ही संदेह जान पड़ता है ॥ ९ ॥

धृष्टद्युम्नउवाच

यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ ।

ब्रह्मन् समभिवर्तेत सवृत्तः संस्तपोधन ॥ १० ॥

धृष्टद्युम्न बोले – द्विजश्रेष्ठ! आप ब्राह्मण हैं, तपोधन हैं; आप ही बताइये, बड़ा भाई सदाचारी होते हुए भी अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ समागम कैसे कर सकता है? ॥ १० ॥

न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद् गतिं विद्म कथंचन ।

अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते ॥ ११ ॥

कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततोऽयं न व्यवस्यते ।

पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन ॥ १२ ॥

धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण हम उसकी गतिको सर्वथा नहीं जानते; अतः यह कार्य अधर्म है या धर्म, इसका निश्चय करना हम जैसे लोगोंके लिये असम्भव है । ब्रह्मन्! इसीलिये हम किसी तरह भी ऐसी सम्मति नहीं दे सकते कि राजकुमारी कृष्णा पाँच पुरुषोंकी धर्मपत्नी हो ॥ ११-१२ ॥ युधिष्ठिर उवाच

न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः ।

वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन ॥ १३ ॥

श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी ।

ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा ॥ १४ ॥

युधिष्ठिरने कहा- मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि भी कभी अधर्ममें नहीं लगती; परंतु इस विवाह में मेरे मनकी प्रवृत्ति हो रही है, इसलिये यह किसी प्रकार भी अधर्म नहीं है । पुराणोंमें भी सुना जाता है कि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जटिला नामवाली गौतम गोत्रकी कन्याने सात ऋषियोंके साथ विवाह किया था ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 1363

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तथैव मुनिजा वार्क्षी तपोभिर्भावितात्मनः ।

संगताभूद् दश भ्रातॄनेकनाम्नः प्रचेतसः ॥ १५ ॥

इसी प्रकार कण्डु मुनिकी पुत्री वार्क्षीने तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले दस प्रचेताओंके साथ, जिनका एक ही नाम था और जो आपसमें भाई- भाई थे, विवाहसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ १५ ॥

गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम ।

गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः ॥ १६ ॥

धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ व्यासजी! गुरुजनोंकी आज्ञाको धर्मसंगत बताया गया है और समस्त गुरुओंमें माता परम गुरु मानी गयी है ॥ १६ ॥

सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद् भुज्यतामिति ।

तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम ॥ १७ ॥

हमारी माताने भी यही बात कही है कि तुम सब लोग भिक्षाकी भाँति इसका उपभोग करो; अतः द्विजश्रेष्ठ! हम पाँचों भाइयोंके साथ होनेवाले इस विवाहसम्बन्धको परम धर्म मानते हैं ॥ १७ ॥

कुन्त्युवाच

एवमेतद् यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः ।

अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येऽहमनृतात् कथम् ॥ १८ ॥

कुन्तीने कहा – धर्मका आचरण करनेवाले युधिष्ठिरने जैसा कहा है, वह ठीक है । ( अवश्य मैंने द्रौपदीके साथ पाँचों भाइयोंके विवाहसम्बन्धकी आज्ञा दे दी है । ) मुझे झूठसे बहुत भय लगता है; बताइये, मैं झूठके पापसे कैसे बच सकूँगी? ॥ १८ ॥

व्यासउवाच

अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैष सनातनः ।

न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम् ॥ १ ९ ॥

व्यासजी बोले- भद्रे! तुम झूठसे बच जाओगी । ( पाण्डवोंके लिये ) यह सनातन धर्म है । ( कुन्तीसे यों कहकर वे द्रुपदसे बोले) पांचालराज! ( इस विवाह में एक रहस्य है, जिसे )

मैं सबके सामने नहीं कहूँगा । तुम स्वयं एकान्तमें चलकर मुझसे सुन लो ॥ १ ९ ॥

यथायं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः ।

यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः ॥ २० ॥

जिस प्रकार और जिस कारणसे यह सनातन धर्मके अनुकूल कहा गया है और कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जिस प्रकार इसकी धर्मानुकूलताका प्रतिपादन किया है, उसपर विचार करनेसे निस्संदेह यही सिद्ध होता है कि यह विवाह धर्मसम्मत है ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 1364

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तत उत्थाय भगवान् व्यासो द्वैपायनः प्रभुः ।

करे गृहीत्वा राजानं राजवेश्म समाविशत् ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर शक्तिशाली द्वैपायन भगवान् व्यासजी अपने आसनसे उठे और राजा द्रुपदका हाथ पकड़कर राजभवनके भीतर चले गये ॥ २१ ॥

पाण्डवाश्चापि कुन्ती च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।

विविशुर्यत्र तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ ॥ २२ ॥

पाँचों पाण्डव, कुन्तीदेवी तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न –ये सब लोग जहाँ बैठे थे, वहीं उन दोनों ( व्यास और द्रुपद ) - की प्रतीक्षा करने लगे ॥ २२ ॥

ततो द्वैपायनस्तस्मै नरेन्द्राय महात्मने ।

आचख्यौ तद् यथा धर्मो बहूनामेकपत्निता ॥ २३ ॥

तदनन्तर व्यासजीने उन महात्मा नरेशको वह कथा सुनायी, जिसके अनुसार यहाँ बहुत- से पुरुषोंका एक ही पत्नीसे विवाह करना धर्मसम्मत माना गया ॥ २३ ॥

वैवाहिकपर्वणि व्यासवाक्ये इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें व्यास-वाक्यविषयक एक सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९५ ॥

पृष्ठ 1365

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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना व्यास उवाच

पुरा वै नैमिषारण्ये देवाः सत्रमुपासते ।

तत्र वैवस्वतो राजञ्शामित्रमकरोत् तदा ॥ १ ॥

व्यासजीने कहा — पांचालनरेश! पूर्व कालकी बात है, नैमिषारण्य क्षेत्रमें देवता लोग एक यज्ञ कर रहे थे । उस समय वहाँ सूर्यपुत्र यम शामित्र ( यज्ञ) - कार्य करते थे ॥ १ ॥

ततो यमो दीक्षितस्तत्र राजन् नामारयत् कंचिदपि प्रजानाम् । ततः प्रजास्ता बहुला बभूवुः कालातिपातान्मरणप्रहीणाः ॥ २ ॥

राजन्! उस यज्ञकी दीक्षा लेनेके कारण यमराजने मानवप्रजाकी मृत्युका काम बंद कर रखा था । इस प्रकार मृत्युका नियत समय बीत जानेसे सारी प्रजा अमर होकर दिनों-दिन बढ़ने लगी । धीरे - धीरे उसकी संख्या बहुत बढ़ गयी ॥ २ ॥

सोमश्च शक्रो वरुणः कुबेरः साध्या रुद्रा वसवोऽथाश्विनौ च । प्रजापतिर्भुवनस्य प्रणेता समाजग्मुस्तत्र देवास्तथान्ये ॥ ३ ॥

ततोऽब्रुवन् लोकगुरुं समेता भयात् तीव्रान्मानुषाणां च वृद्धया । तस्माद् भयादुद्विजन्तः सुखेप्सवः प्रयाम सर्वे शरणं भवन्तम् ॥ ४ ॥

चन्द्रमा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, साध्यगण, रुद्रगण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्य सब देवता मिलकर जहाँ सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्माजी रहते थे, वहाँ गये । वहाँ जाकर वे सब देवता लोकगुरु ब्रह्माजीसे बोले –'भगवन्! मनुष्योंकी संख्या बहुत बढ़ रही है । इससे हमें बड़ा भय लगता है । उस भयसे हम सबलोग व्याकुल हो उठे हैं और सुख पानेकी इच्छासे आपकी शरणमें आये हैं ' ॥ ३-४ ॥ पितामह उवाच

पृष्ठ 1366

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किं वो भयं मानुषेभ्यो यूयं सर्वे यदामराः ।

मा वो मर्त्यसकाशाद् वै भयं भवितुमर्हति ॥ ५ ॥

ब्रह्माजीने कहा – तुम्हें मनुष्योंसे क्यों भय लगता है? जबकि तुम सभी लोग अमर हो, तब तुम्हें मरणधर्मा मनुष्योंसे कभी भयभीत नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥

देवा ऊचुः

मर्त्या अमर्त्याः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन ।

अविशेषादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहागताः ॥ ६ ॥

देवता बोले- जो मरणशील थे, वे अमर हो गये । अब हममें और उनमें कोई अन्तर नहीं रह गया । यह अन्तर मिट जानेसे ही हमें अधिक घबराहट हो रही है । हमारी विशेषता बनी रहे, इसीलिये हम यहाँ आये हैं ॥ ६ ॥

श्रीभगवानुवाच वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो- स्तेन त्विमे न म्रियन्ते मनुष्याः । तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये तत एषां भवितैवान्तकालः ॥ ७ ॥

वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता वीर्येण युष्माकमुत प्रयुक्ता । सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले न तत्र वीर्यं भविता नरेषु ॥ ८ ॥

भगवान् ब्रह्माजीने कहा - सूर्यपुत्र यमराज यज्ञके कार्यमें लगे हैं, इसीलिये ये मनुष्य मर नहीं रहे हैं । जब वे यज्ञका सारा काम पूरा करके इधर ध्यान देंगे, तब इन मनुष्योंका अन्तकाल उपस्थित होगा । तुमलोगोंके बलके प्रभावसे जब सूर्यनन्दन यमराजका शरीर यज्ञकार्यसे अलग होकर अपने कार्यमें प्रयुक्त होगा, तब वही अन्तकाल आनेपर मनुष्योंकी मृत्युका कारण बनेगा । उस समय मनुष्योंमें इतनी शक्ति नहीं होगी कि वे मृत्युसे अपनेको बचा सकें ॥ ७-८ ॥ व्यास उवाच ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं श्रुत्वा जग्मुर्यत्र देवा यजन्ते । समासीनास्ते समेता महाबला भागीरथ्यां ददृशुः पुण्डरीकम् ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1367

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व्यासजी कहते हैं — राजन्! तब वे अपने पूर्वज देवता ब्रह्माजीका वचन सुनकर फिर वहीं चले गये, जहाँ सब देवता यज्ञ कर रहे थे । एक दिन वे सभी महाबली देवगण गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये और वहाँ तटपर बैठे । उसी समय उन्हें भागीरथीके जलमें बहता हुआ एक कमल दिखायी दिया ॥ ९ ॥

दृष्ट्वा च तद् विस्मितास्ते बभूवु- स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम । सोऽपश्यद् योषामथ पावकप्रभां यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ॥ १० ॥

उसे देखकर वे सब देवता चकित हो गये । उनमें सबसे प्रधान और शूरवीर इन्द्र उस कमलका पता लगानेके लिये गंगाजीके मूल स्थानकी ओर गये । गंगोत्तरीके पास, जहाँ गंगादेवीका जल सदा अविच्छिन्नरूपसे झरता रहता है, पहुँचकर इन्द्रने एक अग्निके समान तेजस्विनी युवती देखी ॥ १० ॥

सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी

गङ्गां देवीं व्यवगाह्य व्यतिष्ठत् ।

तस्याश्रुबिन्दुः पतितो जले य- स्तत् पद्ममासीदथ तत्र काञ्चनम् ॥ ११ ॥

वह युवती वहाँ जलके लिये आयी थी और भगवती गंगाकी धारामें प्रवेश करके रोती हुई खड़ी थी । उसके आँसुओंका एक- एक बिन्दु, जो जलमें गिरता था, वहाँ सुवर्णमय कमल बन जाता था ॥ ११ ॥

तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी- मपृच्छत् तां योषितमन्तिकाद् वै ।

का त्वं भद्रे रोदिषि कस्य हेतो- र्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ॥ १२ ॥

यह अद्भुत दृश्य देखकर वज्रधारी इन्द्रने उस समय उस युवतीके निकट जाकर पूछा -' भद्रे! तुम कौन हो और किसलिये रोती हो? बताओ, मैं तुमसे सच्ची बात जानना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥

स्त्र्युवाच त्वं वेत्स्यसे मामिह यास्मि शक्र यदर्थं चाहं रोदिमि मन्दभाग्या । आगच्छ राजन् पुरतो गमिष्ये द्रष्टासि तद् रोदिमि यत्कृतेऽहम् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1368

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युवती बोली – देवराज इन्द्र! मैं एक भाग्यहीन अबला हूँ; कौन हूँ और किसलिये रो रही हूँ, यह सब तुम्हें ज्ञात हो जायगा । तुम मेरे पीछे - पीछे आओ, मैं आगे - आगे चल रही हूँ। वहाँ चलकर स्वयं ही देख लोगे कि मैं किसलिये रोती हूँ ॥ १३ ॥

व्यासउवाच तां गच्छन्तीमन्वगच्छत् तदानीं सोऽपश्यदारात् तरुणं दर्शनीयम् । सिद्धासनस्थं युवतीसहायं क्रीडन्तमैक्षद् गिरिराजमूर्ध्नि ॥ १४ ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! यों कहकर आगे- आगे जाती हुई उस स्त्रीके पीछे - पीछे उस समय इन्द्र भी गये । गिरिराज हिमालयके शिखरपर पहुँचकर उन्होंने देखा — पास ही एक परम सुन्दर तरुण पुरुष सिद्धासनसे बैठे हैं, उनके साथ एक युवती भी है । इन्द्रने उस युवतीके साथ उन्हें क्रीड़ा- विनोद करते देखा ॥ १४ ॥

तमब्रवीद् देवराजो ममेदं त्वं विद्धि विद्वन् भुवनं वशे स्थितम् । ईशोऽहमस्मीति समन्युरब्रवीद् दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ॥ १५ ॥

वे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे क्रीड़ामें अत्यन्त तन्मय हो रहे थे, अतः इधर - उधर उनका ध्यान नहीं जाता था । उन्हें इस प्रकार असावधान देख देवराज इन्द्रने कुपित होकर कहा – ' महानुभाव! यह सारा जगत् मेरे अधिकारमें है, मेरी आज्ञाके अधीन है; मैं इस जगत्का ईश्वर हूँ' ॥ १५ ॥

क्रुद्धं च शक्रं प्रसमीक्ष्य देवो

जहास शक्रं च शनैरुदैक्षत ।

संस्तम्भितोऽभूदथ देवराज- स्तेनेक्षितः स्थाणुरिवावतस्थे ॥ १६ ॥

इन्द्रको क्रोधमें भरा देख वे देवपुरुष हँस पड़े । उन्होंने धीरेसे आँख उठाकर उनकी ओर देखा । उनकी दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्रका शरीर स्तम्भित हो गया ( अकड़ गया) । वे ठूंठे काठकी भाँति निश्चेष्ट हो गये ॥ १६ ॥

यदा तु पर्याप्तमिहास्य क्रीडया

तदा देवीं रुदतीं तामुवाच ।

आनीयतामेष यतोऽहमारा- न्नैनं दर्पः पुनरप्याविशेत ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1369

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जब उनकी वह क्रीड़ा समाप्त हुई, तब वे उस रोती हुई देवीसे बोले - ‘ इस इन्द्रको जहाँ मैं हूँ, यहीं – मेरे समीप ले आओ, जिससे फिर इसके भीतर अभिमानका प्रवेश न हो' ॥ १७ ॥

ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तया तु स्रस्तैरङ्गैः पतितोऽभूद् धरण्याम् । तमब्रवीद् भगवानुग्रतेजा मैवं पुनः शक्र कृथाः कथंचित् ॥ १८ ॥

तदनन्तर उस स्त्रीने ज्यों ही इन्द्रका स्पर्श किया, उनके सारे अंग शिथिल हो गये और वे धरतीपर गिर पड़े । तब उग्र तेजस्वी भगवान् रुद्रने उनसे कहा—' इन्द्र! फिर किसी प्रकार भी ऐसा घमंड न करना ॥ १८ ॥

निवर्तयैनं च महाद्रिराजं बलं च वीर्यं च तवाप्रमेयम् । छिद्रस्य चैवाविश मध्यमस्य यत्रासते त्वद्विधाः सूर्यभासः ॥ १ ९ ॥ ' तुममें अनन्त बल और पराक्रम है, अतः इस गुफाके दरवाजेपर लगे हुए इस महान् पर्वतराजको हटा दो और इसी गुफाके भीतर घुस जाओ, जहाँ सूर्यके समान तेजस्वी तुम्हारे -जैसे और भी इन्द्र रहते हैं ' ॥ १ ९ ॥ स तद् विवृत्य विवरं महागिरे- स्तुल्यद्युतींश्चतुरोऽन्यान् ददर्श । स तानभिप्रेक्ष्य बभूव दुःखितः कच्चिन्नाहं भविता वै यथेमे ॥ २० ॥

उन्होंने उस महान् पर्वतकी कन्दराका द्वार खोलकर उसमें अपने ही समान तेजस्वी अन्य चार इन्द्रोंको भी देखा । उन्हें देखकर वे बहुत दुखी हुए और सोचने लगे — ‘ कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मैं भी इन्हींके समान दुर्दशामें पड़ जाऊँ' ॥ २० ॥

ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच । दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो यन्मां बाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ॥ २१ ॥

तब पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजीने आँखें तरेरकर कुपित हो वज्रधारी इन्द्रसे कहा— ‘ शतक्रतो! तुमने मूर्खतावश पहले मेरा अपमान किया है, इसलिये अब इस कन्दरामें प्रवेश करो ' ॥ २१ ॥

उक्तस्त्वेवं विभुना देवराजः प्रावेपतार्तो भृशमेवाभिषङ्गात् ।

पृष्ठ 1370

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स्रस्तैरङ्गैरनिलेनेव नुन्न- मश्वत्थपत्रं गिरिराजमूर्ध्नि ॥ २२ ॥

उस पर्वत-शिखरपर भगवान् रुद्रके यों कहनेपर देवराज इन्द्र पराभवकी आशंकासे अत्यन्त दुःखी हो गये, उनके सारे अंग शिथिल पड़ गये और हवासे हिलनेवाले पीपलके पत्तेकी तरह वे थर- थर काँपने लगे ॥ २२ ॥

स प्राञ्जलिर्वै वृषवाहनेन

प्रवेपमानः सहसैवमुक्तः ।

उवाच देवं बहुरूपमुग्र- स्रष्टाशेषस्य भुवनस्य त्वं भवाद्यः ॥ २३ ॥

वृषभवाहन भगवान् शंकरके द्वारा इस प्रकार सहसा गुहाप्रवेशकी आज्ञा मिलनेपर काँपते हुए इन्द्रने हाथ जोड़कर उन अनेक रूपधारी उग्रस्वरूप रुद्रदेवसे कहा — ‘ जगद्योने! आप ही समस्त जगत्की उत्पत्ति करनेवाले आदिपुरुष हैं ' ॥ २३ ॥

तमब्रवीदुग्रवर्चाः प्रहस्य नैवंशीलाः शेषमिहाप्नुवन्ति । एतेऽप्येवं भवितारः पुरस्तात् तस्मादेतां दरीमाविश्य शेष्व ॥ २४ ॥

तब भयंकर तेजवाले रुद्रने हँसकर कहा - ' तुम्हारे - जैसे शील- स्वभाववाले लोगोंको यहाँ प्रसादकी प्राप्ति नहीं होती । ये लोग भी पहले तुम्हारेही जैसे थे, अतः तुम भी इस कन्दरामें घुसकर शयन करो ॥ २४ ॥

तत्र ह्येवं भवितारो न संशयो योनिं सर्वे मानुषीमाविशध्वम् । तत्र यूयं कर्म कृत्वाविषह्यं बहूनन्यान् निधनं प्रापयित्वा ॥ २५ ॥

आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकं स्वकर्मणा पूर्वजितं महार्हम् । सर्वं मया भाषितमेतदेवं कर्तव्यमन्यद् विविधार्थयुक्तम् ॥ २६ ॥

‘ वहाँ भविष्यमें निश्चय ही तुमलोग ऐसे ही होनेवाले हो- तुम सबको मनुष्ययोनिमें प्रवेश करना पड़ेगा । उस जन्ममें तुम अनेक दुःसह कर्म करके बहुतोंको मौतके घाट उतारकर पुनः अपने शुभ कर्मोंद्वारा पहलेसे ही उपार्जित पुण्यात्माओंके निवासयोग्य इन्द्रलोकमें आ जाओगे । मैंने जो कुछ कहा है, वह सब कुछ तुम्हें करना होगा । इसके सिवा और भी नाना प्रकारके प्रयोजनोंसे युक्त कार्य तुम्हारे द्वारा सम्पन्न होंगे ' ॥ २५-२६ ॥ पूर्वेन्द्राऊचुः