श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1481–1490
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1481–1490
पृष्ठ 1481
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन वैशम्पायन उवाच
तं प्रयान्तं महाबाहुं कौरवाणां यशस्करम् ।
अनुजग्मुर्महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरववंशका यश बढ़ानेवाले महाबाहु अर्जुन जब जाने लगे, उस समय बहुत से वेदज्ञ महात्मा ब्राह्मण उनके साथ हो लिये ॥ १ ॥
वेदवेदाङ्गविद्वांसस्तथैवाध्यात्मचिन्तकाः ।
भैक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ॥ २ ॥
कथकाश्चापरे राजन् श्रमणाश्च वनौकसः ।
दिव्याख्यानानि ये चापि पठन्ति मधुरं द्विजाः ॥ ३ ॥
वेद- वेदांगोंके विद्वान्, अध्यात्मचिन्तन करनेवाले, भिक्षाजीवी ब्रह्मचारी, भगवद्भक्त, पुराणोंके ज्ञाता सूत, अन्य कथावाचक, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा जो ब्राह्मण मधुर स्वरसे दिव्य कथाओंका पाठ करते हैं, वे सब अर्जुनके साथ गये ॥ २-३ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिः सहायैः पाण्डुनन्दनः ।
वृतः श्लक्ष्णकथैः प्रायान्मरुद्भिरिव वासवः ॥ ४ ॥
जैसे इन्द्र देवताओंके साथ चलते हैं, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुन पूर्वोक्त पुरुषों तथा अन्य बहुत- से मधुरभाषी सहायकोंके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ ४ ॥
रमणीयानि चित्राणि वनानि च सरांसि च ।
सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत ॥ ५ ॥
पुण्यान्यपि च तीर्थानि ददर्श भरतर्षभः ।
स गङ्गाद्वारमाश्रित्य निवेशमकरोत् प्रभुः ॥ ६ ॥
भारत! नरश्रेष्ठ अर्जुनने मार्गमें अनेक रमणीय एवं विचित्र वन, सरोवर, नदी, सागर, देश और पुण्यतीर्थ देखे । धीरे - धीरे गंगाद्वार ( हरद्वार ) - में पहुँचकर शक्तिशाली पार्थने वहीं डेरा डाल दिया ॥ ५-६ ॥
तत्र तस्याद्भुतं कर्म शृणु त्वं जनमेजय ।
कृतवान् यद् विशुद्धात्मा पाण्डूनां प्रवरो हि सः ॥ ७ ॥
जनमेजय! गंगाद्वारमें अर्जुनका एक अद्भुत कार्य सुनो, जो पाण्डवोंमें श्रेष्ठ विशुद्धचित्त धनंजयने किया था ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1482
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निविष्टे तत्र कौन्तेये ब्राह्मणेषु च भारत ।
अग्निहोत्राणि विप्रास्ते प्रादुश्चक्रुरनेकशः ॥ ८ ॥
भारत! जब कुन्तीकुमार और उनके साथी ब्राह्मणलोग गंगाद्वारमें ठहर गये, तब उन ब्राह्मणोंने अनेक स्थानोंपर अग्निहोत्रके लिये अग्नि प्रकट की ॥ ८ ॥
तेषु प्रबोध्यमानेषु ज्वलितेषु हुतेषु च ।
कृतपुष्पोपहारेषु तीरान्तरगतेषु च ॥ ९ ॥
कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्नियतैः सत्पथि स्थितैः ।
शुशुभेऽतीव तद् राजन् गङ्गाद्वारं महात्मभिः ॥ १० ॥
गंगाके तटपर जब अलग - अलग अग्नियाँ प्रज्वलित हो गयीं और सन्मार्गमें स्थित एवं मन- इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मणलोग स्नान करके फूलोंके उपहार चढ़ाकर जब पूर्वोक्त अग्नियोंमें आहुति दे चुके, तब उन महात्माओंके द्वारा उस गंगाद्वार नामक तीर्थकी शोभा बहुत बढ़ गयी ॥ ९ -१० ॥
तथा पर्याकुले तस्मिन् निवेशे पाण्डवर्षभः ।
अभिषेकाय कौन्तेयो गङ्गामवततार ह ॥ ११ ॥
इस प्रकार विद्वान् एवं महात्मा ब्राह्मणोंसे जब उनका आश्रम भरा- पूरा हो गया, उस समय कुन्तीनन्दन अर्जुन स्नान करनेके लिये गंगामें उतरे ॥ ११ ॥
तत्राभिषेकं कृत्वा स तर्पयित्वा पितामहान् ।
उत्तितीर्षुर्जलाद् राजन्नग्निकार्यचिकीर्षया ॥ १२ ॥
अपकृष्टो महाबाहुर्नागराजस्य कन्यया ।
अन्तर्जले महाराज उलूप्या कामयानया ॥ १३ ॥
राजन्! वहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् अग्निहोत्र करनेके लिये वे जलसे निकलना ही चाहते थे कि नागराजकी पुत्री उलूपीने उनके प्रति आसक्त हो पानीके भीतरसे ही महाबाहु अर्जुनको खींच लिया ॥ १२-१३ ॥
ददर्श पाण्डवस्तत्र पावकं सुसमाहितः ।
कौरव्यस्याथ नागस्य भवने परमार्चिते ॥ १४ ॥
नागराज कौरव्यके परम सुन्दर भवनमें पहुँचकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने एकाग्रचित्त होकर देखा, तो वहाँ अग्नि प्रज्वलित हो रही थी ॥ १४ ॥
तत्राग्निकार्यं कृतवान् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
अशङ्कमानेन हुतस्तेनातुष्यद् हुताशनः ॥ १५ ॥
उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयने निर्भीक होकर उसी अग्निमें अपना अग्निहोत्रकार्य सम्पन्न किया । इससे अग्निदेव बहुत संतुष्ट हुए ॥ १५ ॥
अग्निकार्यं स कृत्वा तु नागराजसुतां तदा ।
प्रहसन्निव कौन्तेय इदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
पृष्ठ 1483
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अग्निहोत्रका कार्य कर लेनेके पश्चात् अर्जुनने नागराजकन्यासे हँसते हुए - से यह बात कही— ॥ १६ ॥
किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भाविनि ।
कश्चायं सुभगे देशः का च त्वं कस्य वाऽऽत्मजा ॥ १७ ॥
‘ भीरु! तुमने ऐसा साहस क्यों किया है? भाविनि! यह कौन- सा देश है? सुभगे! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? ' ॥ १७ ॥
उलूप्युवाच
ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः ।
तस्यास्मि दुहिता राजन्नुलूपी नाम पन्नगी ॥ १८ ॥
उलूपीने कहा — राजन्! ऐरावत नागके कुलमें कौरव्य नामक नाग उत्पन्न हुए हैं, मैं
उन्हींकी पुत्री नागिन हूँ। मेरा नाम उलूपी है ॥ १८ ॥
साहं त्वामभिषेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् ।
दृष्ट्वैव पुरुषव्याघ्र कन्दर्पेणाभिमूर्च्छिता ॥ १ ९ ॥
नरश्रेष्ठ! जब आप स्नान करनेके लिये समुद्रगामिनी नदी गंगामें उतरे थे, उस समय आपको देखते ही मैं कामवेदनासे मूर्च्छित हो गयी थी ॥ १ ९ ॥
तां मामनङ्गग्लपितां त्वत्कृते कुरुनन्दन ।
अनन्यां नन्दयस्वाद्य प्रदानेनात्मनोऽनघ ॥ २० ॥
निष्पाप कुरुनन्दन! मैं आपके ही लिये कामदेवके तापसे जली जा रही हूँ । मैंने आपके सिवा दूसरेको अपना हृदय अर्पण नहीं किया है । अतः मुझे आत्मदान देकर आनन्दित कीजिये ॥ २० ॥
अर्जुन उवाच
ब्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशवार्षिकम् ।
धर्मराजेन चादिष्टं नाहमस्मि स्वयंवशः ॥ २१ ॥
अर्जुन बोले — भद्रे! यह मेरे बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले ब्रह्मचर्यव्रतका समय है । धर्मराज युधिष्ठिरने मुझे इस व्रतके पालनकी आज्ञा दी है । अतः मैं अपने वशमें नहीं हूँ ॥ २१ ॥
तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि ।
अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कर्हिचित् ॥ २२ ॥
जलचारिणि! मैं तुम्हारा भी प्रिय करना चाहता हूँ । मैंने पहले कभी कोई असत्य बात नहीं कही है ॥ २२ ॥
कथं च नानृतं मे स्यात् तव चापि प्रियं भवेत् ।
न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्या भुजङ्गमे ॥ २३ ॥
पृष्ठ 1484
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नागकन्ये! तुम ऐसा कोई उपाय करो, जिससे मुझे झूठका दोष न लगे, तुम्हारा भी प्रिय हो और मेरे धर्मको भी हानि न पहुँचे ॥ २३ ॥
उलूप्युवाच
जानाम्यहं पाण्डवेय यथा चरसि मेदिनीम् ।
यथा च ते ब्रह्मचर्यमिदमादिष्टवान् गुरुः ॥ २४ ॥
उलूपीने कहा - पाण्डुनन्दन! आप जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचर रहे हैं और आपके बड़े भाईने जिस प्रकार आपको ब्रह्मचर्य पालनका आदेश दिया है, वह सब मैं जानती हूँ ॥ २४ ॥
परस्परं वर्तमानान् द्रुपदस्यात्मजां प्रति ।
यो नोऽनुप्रविशेन्मोहात् स वै द्वादशवार्षिकम् ॥ २५ ॥
वने चरेद् ब्रह्मचर्यमिति वः समयः कृतः । आपलोगोंने आपसमें यह शर्त कर रखी है कि हम लोगोंमेंसे कोई भी यदि द्रौपदीके पास रहे, उस दशामें यदि दूसरा मोहवश उस घरमें प्रवेश करे, तो वह बारह वर्षोंतक वनमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥ २५३ ॥
तदिदं द्रौपदीहेतोरन्योन्यस्य प्रवासनम् ॥ २६ ॥
कृतवांस्तत्र धर्मार्थमत्र धर्मो न दुष्यति ।
परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचन ॥ २७ ॥
अतः आपके बड़े भाईने वहाँ धर्मकी रक्षाके लिये केवल द्रौपदीको निमित्त बनाकर यह एक- दूसरेके प्रवासका नियम बनाया है । यहाँ आपका धर्म दूषित नहीं होता। विशाल नेत्रोंवाले अर्जुन! आपको आर्त प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २६-२७ ॥
कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते ।
यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याद् व्यतिक्रमः ॥ २८ ॥
स च ते धर्म एव स्याद् दत्त्वा प्राणान् ममार्जुन ।
भक्तां च भज मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो ॥ २ ९ ॥
मेरी रक्षा करनेसे आपके धर्मका लोप नहीं होगा । यदि आपके इस धर्मका थोड़ा - सा व्यतिक्रम भी हो जाय तो भी मुझे प्राणदान देनेसे तो आपको महान् धर्म होगा ही । अतः मेरे स्वामी कुन्तीकुमार अर्जुन! मैं आपकी भक्त हूँ, मुझे स्वीकार कीजिये; यह आर्तरक्षण सत्पुरुषोंका मत है ॥ २८-२९ ॥
न करिष्यसि चेदेवं मृतां मामुपधारय ।
प्राणदानान्महाबाहो चर धर्ममनुत्तमम् ॥ ३० ॥
महाबाहो! यदि आप मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो निश्चय जानिये, मैं मर जाऊँगी । अतः मुझे प्राणदान देकर अत्यन्त उत्तम धर्मका अनुष्ठान कीजिये ॥ ३० ॥
पृष्ठ 1485
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम ।
दीनाननाथान् कौन्तेय परिरक्षसि नित्यशः ॥ ३१ ॥
पुरुषोत्तम! आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ । कुन्तीकुमार! आप प्रतिदिन न जाने कितने दीनों और अनाथोंकी रक्षा करते हैं ॥ ३१ ॥
साहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता ।
याचे त्वां चाभिकामाहं तस्मात् कुरु मम प्रियम् ।
स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥
मैं भी यही आशा लेकर शरणमें आयी हूँ और बार - बार दुःखी होकर रोती - गिड़गिड़ाती हूँ । मैं आपके प्रति अनुरक्त हूँ और आपसे समागमकी याचना करती हूँ । अतः मेरा प्रिय मनोरथ पूर्ण कीजिये । मुझे आत्मदान देकर मेरी कामना सफल कीजिये ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पन्नगेश्वरकन्यया ।
कृतवांस्तत् तथा सर्वं धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥ ३३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपीके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने धर्मको ही सामने रखकर वह सब कार्य पूर्ण किया ॥ ३३ ॥
स नागभवने रात्रिं तामुषित्वा प्रतापवान् ।
उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ॥ ३४ ॥
प्रतापी अर्जुनने नागराजके घरमें ही वह रात्रि व्यतीत की । फिर सूर्योदय होनेपर वे कौरव्यके भवनसे ऊपरको उठे ॥ ३४ ॥
आगतस्तु पुनस्तत्र गङ्गाद्वारं तया सह ।
परित्यज्य गता साध्वी उलूपी निजमन्दिरम् ॥ ३५ ॥
उलूपीके साथ अर्जुन फिर गंगाद्वारमें आ पहुँचे । साध्वी उलूपी उन्हें वहाँ छोड़कर पुनः अपने घरको लौट गयी ॥ ३५ ॥
दत्त्वा वरमजेयत्वं जले सर्वत्र भारत ।
साध्या जलचराः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३६ ॥
( पुत्रमुत्पादयामास स तस्यां सुमनोहरम् । इरावन्तं महाभागं महाबलपराक्रमम् ॥ ) भारत! जाते समय उसने अर्जुनको यह वर दिया ' कि आप जलमें सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वशमें रहेंगे, इसमें संशय नहीं है । ' इस प्रकार अर्जुनने उलूपीके गर्भसे अत्यन्त मनोहर तथा महान् बल- पराक्रमसे सम्पन्न इरावान् नामक महा उत्पन्न किया ॥ ३६ ॥
पृष्ठ 1486
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वण्युलूपीसङ्गमे च त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें उलूपी- समागमविषयक दोसौ तेरहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २१३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं )
पृष्ठ 1487
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपूरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना वैशम्पायन उवाच
कथयित्वा च तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत ।
प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! रातकी वह सारी घटना ब्राह्मणोंसे कहकर इन्द्रपुत्र अर्जुन हिमालयके पास चले गये ॥ १ ॥
अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम् ।
भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्छौचमात्मनः ॥ २ ॥
अगस्त्यवट, वसिष्ठपर्वत तथा भृगुतुंगपर जाकर उन्होंने शौच- स्नान आदि किये ॥ २ ॥
प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत ।
निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत् कुरुसत्तमः ॥ ३ ॥
भारत! कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने उन तीर्थोंमें ब्राह्मणोंको कई हजार गौएँ दान कीं और द्विजातियोंके रहनेके लिये घर एवं आश्रम बनवा दिये ॥ ३ ॥
हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः ।
दृष्टवान् पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च ॥ ४ ॥
हिरण्यबिंदुतीर्थमें स्नान करके पाण्डवश्रेष्ठ पुरुषोत्तम अर्जुनने अनेक पवित्र स्थानोंका दर्शन किया ॥ ४ ॥
अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत ।
प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥ ५ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् हिमालयसे नीचे उतरकर भरत- कुलभूषण नरश्रेष्ठ अर्जुन पूर्व दिशा की ओर चल दिये ॥ ५ ॥
आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान् कुरुसत्तमः ।
नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति ॥ ६ ॥
नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम् ।
महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥ ७ ॥
भारत! फिर उस यात्रामें कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अनेक तीर्थोंका तथा नैमिषारण्यतीर्थमें बहनेवाली रमणीय उत्पलिनी नदी, नन्दा, अपरनन्दा, यशस्विनी कौशिकी
पृष्ठ 1488
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( कोसी ), महानदी, गयातीर्थ और गंगाजीका भी दर्शन किया ॥ ६-७ ॥
एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाऽऽश्रमान् ।
आत्मनः पावनं कुर्वन् ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥ ८ ॥
इस प्रकार उन्होंने सब तीर्थों और आश्रमोंको देखते हुए स्नान आदिसे अपनेको पवित्र करके ब्राह्मणोंके लिये बहुत - सी गौएँ दान कीं ॥ ८ ॥
अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् ।
जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ ९ ॥
तदनन्तर अंग, वंग और कलिंग देशोंमें जो कोई भी पवित्र तीर्थ और मन्दिर थे, उन सबमें वे गये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च विधिवत् तानि धनं चापि ददौ ततः ।
कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः ।
अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत ॥ १० ॥
और उन तीर्थोंका दर्शन करके उन्होंने विधिपूर्वक वहाँ धन- दान किया । कलिंग राष्ट्रके द्वारपर पहुँचकर अर्जुनके साथ चलनेवाले ब्राह्मण उनकी अनुमति लेकर वहाँसे लौट गये ॥ १० ॥
स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः ॥ ११ ॥
परंतु कुन्तीपुत्र शूरवीर धनंजय उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले थोड़े - से सहायकोंके साथ उस स्थानकी ओर गये, जहाँ समुद्र लहराता था ॥ ११ ॥
स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च ।
हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥ १२ ॥
कलिंग देशको लाँघकर शक्तिशाली अर्जुन अनेक देशों, मन्दिरों तथा रमणीय अट्टालिकाओंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ १२ ॥
महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् ।
समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह ॥ १३ ॥
इस प्रकार वे तपस्वी मुनियोंसे सुशोभित महेन्द्र पर्वतका दर्शन कर समुद्रके किनारे-किनारे यात्रा करते हुए धीरे- धीरे मणिपूर पहुँच गये ॥ १३ ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् ॥ १४ ॥
वहाँके सम्पूर्ण तीर्थों और पवित्र मन्दिरोंमें जानेके बाद महाबाहु अर्जुन मणिपूरनरेशके पास गये ॥ १४ ॥
मणिपूरेश्वरं राजन् धर्मज्ञं चित्रवाहनम् ।
तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1489
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! मणिपूरके स्वामी धर्मज्ञ चित्रवाहन थे । उनके चित्रांगदा नामवाली एक परम सुन्दरी कन्या थी ॥ १५ ॥
तां ददर्श पुरे तस्मिन् विचरन्तीं यदृच्छया ।
दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम् ॥ १६ ॥
उस नगरमें विचरण करती हुई उस सुन्दर अंगोंवाली चित्रवाहनकुमारीको अकस्मात् देखकर अर्जुनके मनमें उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषा हुई ॥ १६ ॥
अभिगम्य च राजानमवदत् स्वं प्रयोजनम् ।
देहि मे खल्विमां राजन् क्षत्रियाय महात्मने ॥ १७ ॥
अतः राजासे मिलकर उन्होंने अपना अभिप्राय इस प्रकार बताया- ' महाराज! मुझ महामनस्वी क्षत्रियको आप अपनी यह पुत्री प्रदान कर दीजिये ' ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा त्वब्रवीद् राजा कस्य पुत्रोऽसि नाम किम् ।
उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ १८ ॥
यह सुनकर राजाने पूछा- ' आप किनके पुत्र हैं और आपका क्या नाम है? ' अर्जुनने उत्तर दिया, ' मैं महाराज पाण्डु तथा कुन्तीदेवीका पुत्र हूँ। मुझे लोग धनंजय कहते हैं' ॥ १८ ॥
तमुवाचाथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः ।
राजा प्रभञ्जनो नाम कुलेऽस्मिन् सम्बभूव ह ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 1490
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तब राजाने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा -' इस कुलमें पहले प्रभंजन नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं ॥ १ ९ ॥
अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् ।
उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ॥ २० ॥
ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः ।
स तस्मै भगवान् प्रादादेकैकं प्रसवं कुले ॥ २१ ॥
‘ उनके कोई पुत्र नहीं था, अतः उन्होंने पुत्रकी इच्छासे उत्तम तपस्या प्रारम्भ की । पार्थ! उन्होंने उस उग्र तपस्यासे पिनाकधारी देवाधिदेव महेश्वरको संतुष्ट कर लिया । तब देवदेवेश्वर भगवान् उमापति उन्हें वरदान देते हुए बोले- ' तुम्हारे कुलमें एक-एक संतान होती जायगी' ॥ २०-२१ ॥
एकैकः प्रसवस्तस्माद् भवत्यस्मिन् कुले सदा ।
तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥ २२ ॥
एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादिनी भृशम् ।
पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥ २३ ॥
‘ इस कारण हमारे इस कुलमें सदासे एक-एक संतान ही होती चली आ रही है । मेरे अन्य सभी पूर्वजोंके तो पुत्र होते आये हैं, परंतु मेरे यह एक कन्या ही हुई है । यही इस कुलकी परम्पराको चलानेवाली है । अतः भरतश्रेष्ठ! इसके प्रति मेरी यही भावना रहती है कि ' यह मेरा पुत्र है ' ॥ २२-२३ ॥
पुत्रिका हेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ ।
तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥ २४ ॥
एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह ।
एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ॥ २५ ॥
‘ यद्यपि यह पुत्री है, तो भी हेतुविधिसे ( अर्थात् इससे जो प्रथम पुत्र होगा, वह मेरा ही पुत्र माना जायगा, इस हेतुसे ) मैंने इसे पुत्रकी संज्ञा दे रखी है । भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा इसके गर्भसे जो एक पुत्र उत्पन्न हो, वह यहीं रहकर इस कुलपरम्पराका प्रवर्तक हो; इस कन्याके विवाहका यही शुल्क आपको देना होगा । पाण्डुनन्दन! इसी शर्तके अनुसार आप इसे ग्रहण करें' ॥ २४-२५ ॥
स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च ।
उवास नगरे तस्मिंस्तिस्रः कुन्तीसुतः समाः ॥ २६ ॥
‘ तथास्तु ' कहकर अर्जुनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और उस कन्याका पाणिग्रहण करके उन्होंने तीन वर्षोंतक उसके साथ उस नगरमें निवास किया ॥ २६ ॥
तस्यां सुते समुत्पन्ने परिष्वज्य वराङ्गनाम् ।
आमन्त्र्य नृपतिं तं तु जगाम परिवर्तितुम् ॥ २७ ॥