श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1531–1540
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1531–1540
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प्रजाने महाराज युधिष्ठिरके रूपमें ऐसा राजा पाया था, जो परम ब्रह्म परमात्माका चिन्तन करनेवाला, बड़े - बड़े यज्ञोंमें वेदोंका उपयोग करनेवाला और शुभ लोकोंके संरक्षणमें तत्पर रहनेवाला था ॥ ५ ॥
अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः ।
वर्धमानोऽखिलो धर्मस्तेनासीत् पृथिवीक्षिताम् ॥ ६ ॥
राजा युधिष्ठिरके द्वारा दूसरे राजाओंकी चंचल लक्ष्मी भी स्थिर हो गयी, बुद्धि उत्तम निष्ठावाली हो गयी और सम्पूर्ण धर्मकी दिनोंदिन वृद्धि होने लगी ॥ ६ ॥
भ्रातृभिः सहितो राजा चतुर्भिरधिकं बभौ ।
प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरिव महाध्वरः ॥ ७ ॥
जैसे यथावसर उपयोगमें लाये जानेवाले चारों वेदोंके द्वारा विस्तारपूर्वक आरम्भ किया हुआ महायज्ञ शोभा पाता है, उसी प्रकार अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त सुशोभित होते थे ॥ ७ ॥
तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे ।
बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः ॥ ८ ॥
जैसे बृहस्पति- सदृश मुख्य-मुख्य देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार धौम्य आदि ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठते थे ॥ ८ ॥
धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले ।
प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च ॥ ९ ॥
निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्दप्रद राजा युधिष्ठिरके प्रति अत्यन्त प्रीति होनेके कारण उन्हें देखकर प्रजाके नेत्र और मन एक साथ प्रफुल्लित हो उठते थे ॥ ९ ॥
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे ।
यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥ १० ॥
प्रजा केवल उनके पालनरूप राजोचित कर्मसे ही संतुष्ट नहीं थी, वह उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिभाव रखनेके कारण भी सदा आनन्दित रहती थी । राजाके प्रति प्रजाकी भक्ति इसलिये थी कि प्रजाके मनको जो प्रिय लगता था, राजा युधिष्ठिर उसीको क्रियाद्वारा पूर्ण करते थे ॥ १० ॥
न ह्ययुक्तं न चासत्यं नासह्यं न च वाप्रियम् ।
भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ॥ ११ ॥
सदा मीठी बातें करनेवाले बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरके मुखसे कभी कोई अनुचित, असत्य, असह्य और अप्रिय बात नहीं निकलती थी ॥ ११ ॥
स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च ।
चिकीर्षन् सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम ॥ १२ ॥
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भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर सब लोगोंका और अपना भी हित करनेकी चेष्टामें लगे रहकर सदा प्रसन्नतापूर्वक समय बिताते थे ॥ १२ ॥
तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः ।
अवसन् पृथिवीपालांस्तापयन्तः स्वतेजसा ॥ १३ ॥
इस प्रकार सभी पाण्डव अपने तेजसे दूसरे नरेशोंको संतप्त करते हुए निश्चिन्त तथा आनन्दमग्न होकर वहाँ निवास करते थे ॥ १३ ॥
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत् ।
उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति ॥ १४ ॥
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा - ' कृष्ण! बड़ी गरमी पड़ रही है । चलिये, यमुनाजीमें स्नानके लिये चलें ॥ १४ ॥
सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन ।
सायाह्ने पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन ॥ १५ ॥
' मधुसूदन! मित्रोंके साथ वहाँ जलविहार करके हमलोग शामतक फिर लौट आयेंगे ।
जनार्दन! यदि आपकी रुचि हो, तो चलें ' ॥ १५ ॥
वासुदेव उवाच
कुन्तीमातर्ममाप्येतद् रोचते यद् वयं जले ।
सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ॥ १६ ॥
वासुदेव बोले- कुन्तीनन्दन! मेरी भी ऐसी ही इच्छा हो रही है कि हमलोग सुहृदोंके साथ वहाँ चलकर सुखपूर्वक जलविहार करें ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
आमन्त्र्य तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत ।
जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! यह सलाह करके युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अर्जुन और श्रीकृष्ण सुहृदोंके साथ वहाँ गये ॥ १७ ॥
विहारदेशं सम्प्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् ।
गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम् ॥ १८ ॥
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च रसवद्भिर्महाधनैः ।
माल्यैश्च विविधैर्गन्धैर्युक्तं वार्ष्णेयपार्थयोः ॥ १ ९ ॥
विवेशान्तःपुरं तूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः ।
यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ॥ २० ॥
यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं । वह
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उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी । वहाँ बने हुए अनेक छोटे- बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था । अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति- भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे । भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी- अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे ॥ १८–२० ॥
स्त्रियश्च विपुलश्रोण्यश्चारुपीनपयोधराः ।
मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः ॥ २१ ॥
विशाल नितम्बों और मनोहर पीन उरोजोंवाली वामलोचना वनिताएँ भी यौवनके मदके कारण डगमगाती चालसे चलकर इच्छानुसार क्रीड़ाएँ करने लगीं ॥ २१ ॥
वने काश्चिचज्जले काश्चित् काश्चिद् वेश्मसु चाङ्गनाः ।
यथायोग्यं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः ॥ २२ ॥
वे स्त्रियाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रुचिके अनुसार कुछ वनमें, कुछ जलमें और कुछ घरोंमें यथोचितरूपसे क्रीड़ा करने लगीं ॥ २२ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च ।
प्रायच्छतां महाराज ते तु तस्मिन् मदोत्कटे ॥ २३ ॥
महाराज! उस समय यौवनमदसे युक्त द्रौपदी और सुभद्राने बहुत - से वस्त्र और आभूषण बाँटे ॥ २३ ॥
काश्चित् प्रहृष्टा ननृतुश्चुक्रुशुश्च तथापराः ।
जहसुश्च परा नार्यो जगुश्चान्या वरस्त्रियः ॥ २४ ॥
वहाँ कुछ श्रेष्ठ स्त्रियाँ हर्षोल्लासमें भरकर नृत्य करने लगीं । कुछ जोर- जोरसे कोलाहल करने लगीं । अन्य बहुत-सी स्त्रियाँ ठठाकर हँसने लगीं तथा कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ गीत गाने लगीं ॥ २४ ॥
रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् ।
मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ॥ २५ ॥
कुछ एक- दूसरीको पकड़कर रोकने और मृदु प्रहार करने लगीं तथा कुछ दूसरी स्त्रियाँ एकान्तमें बैठकर आपसमें कुछ गुप्त बातें करने लगीं ॥ २५ ॥
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः ।
शब्देन पूर्यते हर्म्यं तद् वनं सुमहर्द्धिमत् ॥ २६ ॥
वहाँका राजभवन और महान् समृद्धिशाली वन वीणा, वेणु और मृदंग आदि मनोहर वाद्योंकी सुमधुर ध्वनिसे सब ओर गूँजने लगा ॥ २६ ॥
तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ ।
समीपं जग्मतुः कंचिदुद्देशं सुमनोहरम् ॥ २७ ॥
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इस प्रकार जब वहाँ क्रीड़ा- विहारका आनन्दमय उत्सव चल रहा था, उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पासके ही किसी अत्यन्त मनोहर प्रदेशमें गये ॥ २७ ॥
तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरंजयौ ।
महार्हासनयो राजंस्ततस्तौ संनिषीदतुः ॥ २८ ॥
तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च ।
बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ ॥ २ ९ ॥
राजन्! वहाँ जाकर शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन दो बहुमूल्य सिंहासनोंपर बैठे और पहले किये हुए पराक्रमों तथा अन्य बहुत - सी बातोंकी चर्चा करके आमोद -प्रमोद करने लगे ॥ २८-२९ ॥
तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव ।
अभ्यागच्छत् तदा विप्रो वासुदेवधनंजयौ ॥ ३० ॥
वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए धनंजय और वासुदेव स्वर्गलोकमें स्थित अश्विनीकुमारोंकी
भाँति सुशोभित हो रहे थे । उसी समय उन दोनोंके पास एक ब्राह्मणदेवता आये ॥ ३० ॥
बृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः ।
हरिपिङ्गोज्ज्वलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः ॥ ३१ ॥
वे विशाल शालवृक्षके समान ऊँचे थे । उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी । उनके सारे अंग नीले और पीले रंगके थे, दाढ़ी - मूँछें अग्निज्वालाके समान पीतवर्णकी थीं तथा ऊँचाईके अनुसार ही उनकी मोटाई थी ॥ ३१ ॥
तरुणादित्यसंकाशश्चीरवासा जटाधरः ।
पद्मपत्राननः पिङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ३२ ॥
वे प्रातःकालिक सूर्यके समान तेजस्वी जान पड़ते थे । वे चीरवस्त्र पहने और मस्तकपर जटा धारण किये हुए थे । उनका मुख कमलदलके समान शोभा पा रहा था । उनकी प्रभा पिंगलवर्णकी थी और वे अपने तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे ॥ ३२ ॥
उपसृष्टं तु तं कृष्णौ भ्राजमानं द्विजोत्तमम् ।
अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ॥ ३३ ॥
वे तेजस्वी द्विजश्रेष्ठ जब निकट आ गये, तब अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही आसनसे उठकर खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि ब्राह्मणरूप्यनलागमने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमेंब्राह्मणरूपी अग्निदेवके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ इक्कीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा वैशम्पायन उवाच
सोऽब्रवीदर्जुनं चैव वासुदेवं च सात्वतम् ।
लोकप्रवीरौ तिष्ठन्तौ खाण्डवस्य समीपतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उन ब्राह्मण-देवताने अर्जुन और सात्वतवंशी भगवान् वासुदेवसे, जो विश्वविख्यात वीर थे और खाण्डववनके समीप खड़े हुए थे, कहा — ॥ १ ॥
ब्राह्मणो बहुभोक्तास्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा भिक्षे वार्ष्णेयपार्थौ वामेकां तृप्तिं प्रयच्छतम् ॥ २ ॥
' मैं अधिक भोजन करनेवाला एक ब्राह्मण हूँ और सदा अपरिमित अन्न भोजन करता हूँ । वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन! आज मैं आप दोनोंसे भिक्षा माँगता हूँ। आपलोग एक बार पूर्ण भोजन कराकर मुझे तृप्ति प्रदान कीजिये ' ॥ २ ॥
एवमुक्तौ तमब्रूतां ततस्तौ कृष्णपाण्डवौ ।
केनान्नेन भवांस्तृप्येत् तस्यान्नस्य यतावहे ॥ ३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले— ' ब्रह्मन्! बताइये, आप किस अन्नसे तृप्त होंगे? हम दोनों उसीके लिये प्रयत्न करेंगे' ॥ ३ ॥
एवमुक्तः स भगवानब्रवीत् तायुभौ ततः ।
भाषमाणौ तदा वीरौ किमन्नं क्रियतामिति ॥ ४ ॥
जब वे दोनों वीर ‘ आपके लिये किस अन्नकी व्यवस्था की जाय? ' इसी बातको बार-बार दुहराने लगे, तब उनके ऐसा कहनेपर भगवान् अग्निदेव उन दोनोंसे इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥
ब्राह्मणउवाच
नाहमन्नं बुभुक्षे वै पावकं मां निबोधतम् ।
यदन्नमनुरूपं मे तद् युवां सम्प्रयच्छतम् ॥ ५ ॥
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ब्राह्मणदेवताने कहा – वीरो! मुझे अन्नकी भूख नहीं है, आपलोग मुझे अग्नि समझें ।
जो अन्न मेरे अनुरूप हो, वही आप दोनों मुझे दें ॥ ५ ॥
इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति ।
न च शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ॥ ६ ॥
इन्द्र सदा इस खाण्डववनकी रक्षा करते हैं । उन महामनासे सुरक्षित होनेके कारण मैं इसे जला नहीं पाता ॥ ६ ॥
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा ।
सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ॥ ७ ॥
इस वनमें इन्द्रका सखा तक्षक नाग अपने परिवारसहित सदा निवास करता है । उसीके लिये वज्रधारी इन्द्र सदा इसकी रक्षा करते हैं ॥ ७ ॥
तत्र भूतान्यनेकानि रक्षतेऽस्य प्रसङ्गतः ।
तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ॥ ८ ॥
उस तक्षक नागके प्रसंगसे ही यहाँ रहनेवाले और भी अनेक जीवोंकी वे रक्षा करते हैं, इसलिये इन्द्रके प्रभावसे मैं इस वनको जला नहीं पाता । परंतु मैं सदा ही इसे जलानेकी इच्छा रखता हूँ ॥ ८ ॥
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति ।
ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ॥ ९ ॥
मुझे प्रज्वलित देखकर वे मेघोंद्वारा जलकी वर्षा करने लगते हैं, यही कारण है कि जलानेकी इच्छा रखते हुए भी मैं इस खाण्डववनको दग्ध करनेमें सफल नहीं हो पाता ॥ ९ ॥
स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः ।
दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया ॥ १० ॥
आप दोनों अस्त्रविद्याके पूरे जानकार हैं, अतः मैं इसी उद्देश्यसे आपके पास आया हूँ कि आप दोनोंकी सहायतासे इस खाण्डववनको जला सकूँ । मैं इसी अन्नकी भिक्षा माँगता हूँ ॥ १० ॥
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः ।
उत्तमास्त्रविदौ सम्यक् सर्वतो वारयिष्यथः ॥ ११ ॥
आप दोनों उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः जब मैं इस वनको जलाने लगूँ, उस समय आपलोग ऊपरसे बरसती हुई जलकी धाराओं तथा इस वनसे निकलकर चारों ओर भागनेवाले प्राणियोंको रोकियेगा ॥ ११ ॥
जनमेजय उवाच किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति ।
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रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्त्वसमायुतम् ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! भगवान् अग्निदेव देवराज इन्द्रके द्वारा सुरक्षित और अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए खाण्डववनको किसलिये जलाना चाहते थे? ॥ १२ ॥
न ह्येतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं सम्प्रतिभाति मे ।
यद् ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥ १३ ॥
विप्रवर! मुझे इसका कोई साधारण कारण नहीं जान पड़ता, जिसके लिये कुपित होकर हव्यवाहन अग्निने समूचे खाण्डववनको भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
एतद् विस्तरशो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥ १४ ॥
ब्रह्मन्! मुने! पूर्वकालमें खाण्डववनका दाह जिस प्रकार हुआ, वह सब विस्तारके साथ मैं ठीक - ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे ब्रुवतो राजन् सर्वमेतद् यथातथम् ।
यन्निमित्तं ददाहाग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - महाराज जनमेजय! अग्निदेवने जिस कारण खाण्डववनको जलाया, वह सब वृत्तान्त मैं यथावत् बतलाता हूँ, सुनो ॥ १५ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृषिसंस्तुताम् ।
कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! खाण्डववनके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्राचीन कथा महर्षियोंद्वारा
प्रस्तुत की गयी है । उसीको मैं तुमसे कहूँगा ॥ १६ ॥
पौराणः श्रूयते राजन् राजा हरिहयोपमः ।
श्वेतकिर्नाम विख्यातों बलविक्रमसंयुतः ॥ १७ ॥
राजन्! सुना जाता है, प्राचीनकालमें इन्द्रके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्वेतकि नामके एक राजा थे ॥ १७ ॥
यज्वा दानपतिर्धीमान् यथा नान्योऽस्ति कश्चन ।
ईजे च स महायज्ञैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥ १८ ॥
उस समय उनके - जैसा यज्ञ करनेवाला, दाता और बुद्धिमान् दूसरा कोई नहीं था ।
उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेक बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १८ ॥
तस्य नान्याभवद् बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप ।
सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेषु च ॥ १ ९ ॥
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राजन्! प्रतिदिन उनके मनमें यज्ञ और दानके सिवा दूसरा कोई विचार ही नहीं उठता था । वे यज्ञकर्मोंके आरम्भ और नाना प्रकारके दानोंमें ही लगे रहते थे ॥ १ ९ ॥
ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवमीजे स भूमिपः ।
ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥ २० ॥
इस प्रकार वे बुद्धिमान् नरेश ऋत्विजोंके साथ यज्ञ किया करते थे । यज्ञ करते - करते उनके ऋत्विजोंकी आँखें धूएँसे व्याकुल हो उठीं ॥ २० ॥
कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्ते नराधिपम् ।
ततः प्रचोदयामास ऋत्विजस्तान् महीपतिः ॥ २१ ॥
चक्षुर्विकलतां प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् ।
ततस्तेषामनुमते तद् विप्रैस्तु नराधिपः ॥ २२ ॥
सत्रं समापयामास ऋत्विग्भिरपरैः सह । दीर्घकालतक आहुति देते - देते वे सभी खिन्न हो गये थे । इसलिये राजाको छोड़कर चले गये । तब राजाने उन ऋत्विजोंको पुनः यज्ञके लिये प्रेरित किया । परंतु जिनके नेत्र दुखने लगे थे, वे ऋत्विज उनके यज्ञमें नहीं आये । तब राजाने उनकी अनुमति लेकर दूसरे ब्राह्मणोंको ऋत्विज बनाया और उन्हींके साथ अपने चालू किये हुए यज्ञको पूरा किया ॥ २१-२२ ॥ तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् कालपर्यये ॥ २३ ॥
सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल ।
ऋत्विजो नाभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥ २४ ॥
इस प्रकार यज्ञपरायण राजाके मनमें किसी समय यह संकल्प उठा कि मैं सौ वर्षोंतक चालू रहनेवाला एक सत्र प्रारम्भ करूँ; परंतु उन महामनाको वह यज्ञ आरम्य करनेके लिये ऋत्विज ही नहीं मिले ॥ २३-२४ ॥
स च राजाकरोद् यत्नं महान्तं ससुहृज्जनः ।
प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशाः ॥ २५ ॥
ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः ।
ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः ॥ २६ ॥
उन महायशस्वी नरेशने अपने सुहृदोंको साथ लेकर इस कार्यके लिये बहुत बड़ा प्रयत्न किया। पैरोंपर पड़कर, सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और इच्छानुसार दान देकर बार - बार निरालस्यभावसे ऋत्विजोंको मनाया, उनसे यज्ञ करानेके लिये अनुनय - विनय की; परंतु उन्होंने अमिततेजस्वी नरेशके मनोरथको सफल नहीं किया ॥ २५-२६ ॥
स चाश्रमस्थान् राजर्षिस्तानुवाच रुषान्वितः ।
यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूषायां न च स्थितः ॥ २७ ॥
आशु त्याज्योऽस्मि युष्माभिर्ब्राह्मणैश्च जुगुप्सितः ।
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तन्नार्हथ क्रतुश्रद्धां व्याघातयितुमद्य ताम् ॥ २८ ॥
तब उन राजर्षिने कुछ कुपित होकर आश्रमवासी महर्षियोंसे कहा - 'ब्राह्मणो! यदि मैं पतित होऊँ और आपलोगोंकी शुश्रूषासे मुँह मोड़ता होऊँ तो निन्दित होनेके कारण आप सभी ब्राह्मणोंके द्वारा शीघ्र ही त्याग देनेयोग्य हूँ, अन्यथा नहीं; अतः यज्ञ करानेके लिये मेरी इस बढ़ी हुई श्रद्धामें आपलोगोंको बाधा नहीं डालनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥
अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमाः ।
प्रपन्न एव वो विप्राः प्रसादं कर्तुमर्हथ ॥ २ ९ ॥
‘ विप्रवरो! इस प्रकार बिना किसी अपराधके मेरा परित्याग करना आपलोगोंके लिये कदापि उचित नहीं है । मैं आपकी शरणमें हूँ । आपलोग कृपापूर्वक मुझपर प्रसन्न होइये ॥ २ ९ ॥
सान्त्वदानादिभिर्वाक्यैस्तत्त्वतः कार्यवत्तया ।
प्रसादयित्वा वक्ष्यामि यन्नः कार्यं द्विजोत्तमाः ॥ ३० ॥
‘ श्रेष्ठ द्विजगण! मैं कार्यार्थी होनेके कारण सान्त्वना देकर दान आदि देनेकी बात कहकर यथार्थ वचनोंद्वारा आपलोगोंको प्रसन्न करके आपकी सेवामें अपना कार्य निवेदन कर रहा हूँ ॥ ३० ॥
अथवाहं परित्यक्तो भवद्भिर्द्वेषकारणात् ।
ऋत्विजोऽन्यान् गमिष्यामि याजनार्थं द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥
‘ द्विजोत्तमो! यदि आपलोगोंने द्वेषवश मुझे त्याग दिया तो मैं यह यज्ञ करानेके लिये दूसरे ऋत्विजोंके पास जाऊँगा ' ॥ ३१ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स पार्थिवः ।
यदा न शेकू राजानं याजनार्थं परंतप ॥ ३२ ॥
ततस्ते याजकाः क्रुद्धास्तमूचुर्नृपसत्तमम् ।
तव कर्माण्यजस्रं वै वर्तन्ते पार्थिवोत्तम ॥ ३३ ॥
इतना कहकर राजा चुप हो गये । परंतप जनमेजय! जब वे ऋत्विज राजाका यज्ञ करानेके लिये उद्यत न हो सके, तब वे रुष्ट होकर उन नृपश्रेष्ठसे बोले — ‘ भूपालशिरोमणे! आपके यज्ञकर्म तो निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥
ततो वयं परिश्रान्ताः सततं कर्मवाहिनः ।
श्रमादस्मात् परिश्रान्तान् स त्वं नस्त्यक्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥
बुद्धिमोहं समास्थाय त्वरासम्भावितोऽनघ ।
गच्छ रुद्र सकाशं त्वं स हि त्वां याजयिष्यति ॥ ३५ ॥
‘ अतः सदा कर्ममें लगे रहनेके कारण हमलोग थक गये हैं, पहलेके परिश्रमसे हमारा कष्ट बढ़ गया है । ऐसी दशामें बुद्धिमोहित होनेके कारण उतावले होकर आप चाहें तो