श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1541–1550
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1541–1550
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हमारा त्याग कर सकते हैं । निष्पाप नरेश! आप तो भगवान् रुद्रके ही समीप जाइये । अब वे ही आपका यज्ञ करायेंगे ' ॥ ३४-३५ ॥
साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वेतकिर्नृपः ।
कैलासं पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणोंका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर राजा श्वेतकिको बड़ा क्रोध हुआ । वे कैलास पर्वतपर जाकर उग्र तपस्यामें लग गये ॥ ३६ ॥
आराधयन् महादेवं नियतः संशितव्रतः ।
उपवासपरो राजन् दीर्घकालमतिष्ठत ॥ ३७ ॥
राजन्! तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले राजा श्वेतकि मन-इन्द्रियोंके संयमपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हुए बहुत दिनोंतक निराहार खड़े रहे ॥ ३७ ॥
कदाचिद् द्वादशे काले कदाचिदपि षोडशे ।
आहारमकरोद् राजा मूलानि च फलानि च ॥ ३८ ॥
वे कभी बारहवें दिन और कभी सोलहवें दिन फल- मूलका आहार कर लेते थे ॥ ३८ ॥
ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन् स्थाणुरिवाचलः ।
षण्मासानभवद्राजा श्वेतकिः सुसमाहितः ॥ ३ ९ ॥
दोनों बाहें ऊपर उठाकर एकटक देखते हुए राजा श्वेतकि एकाग्रचित हो छः महीनोंतक ठँठकी तरह अविचल भावसे खड़े रहे ॥ ३ ९ ॥
तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत् तपः ।
शंकरः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ॥ ४० ॥
भारत! उन नृपश्रेष्ठको इस प्रकार भारी तपस्या करते देख भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया ॥ ४० ॥
उवाच चैनं भगवान् स्निग्धगम्भीरया गिरा ।
प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप ॥ ४१ ॥
और स्नेहपूर्वक गम्भीर वाणीमें भगवान्ने उनसे कहा - ' परंतप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ४१ ॥
वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्यामिततेजसः ॥ ४२ ॥
प्रणिपत्य महात्मानं राजर्षिः प्रत्यभाषत । ' भूपाल! तुम्हारा कल्याण हो । तुम जैसा चाहते हो, वैसा वर माँग लो । ' अमिततेजस्वी रुद्रका यह वचन सुनकर राजर्षि श्वेतकिने परमात्मा शिवके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ ४२ ॥
यदि मे भगवान् प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ४३ ॥
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स्वयं मां देवदेवेश याजयस्व सुरेश्वर ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञा तेन प्रभाषितम् ॥ ४४ ॥
उवाच भगवान् प्रीतः स्मितपूर्वमिदं वचः । ‘ देवदेवेश! सुरेश्वर! यदि मेरे ऊपर आप सर्वलोक- वन्दित भगवान् प्रसन्न हुए हैं तो स्वयं चलकर मेरा यज्ञ करायें । ' राजाकी कही हुई यह बात सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न होकर मुसकराते हुए बोले – ॥ ४३-४४ ॥ नास्माकमेष विषयो वर्तते याजनं प्रति ॥ ४५ ॥
त्वया च सुमहत् तप्तं तपो राजन् वरार्थिना ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां समयेन परंतप ॥ ४६ ॥
‘ राजन्! यज्ञ कराना हमारा काम नहीं है; परंतु तुमने यही वर माँगनेके लिये भारी तपस्या की है, अतः परंतप नरेश! मैं एक शर्तपर तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा' ॥ ४५-४६ ॥ रुद्र उवाच
समा द्वादश राजेन्द्र ब्रह्मचारी समाहितः ।
सततं त्वाज्यधाराभिर्यदि तर्पयसेऽनलम् ॥ ४७ ॥
कामं प्रार्थयसे यं त्वं मत्तः प्राप्स्यसि तं नृप । रुद्र बोले- राजेन्द्र! यदि तुम एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षोंतक घृतकी निरन्तर अविच्छिन्न धाराद्वारा अग्निदेवको तृप्त करो तो मुझसे जिस कामनाके लिये प्रार्थना कर रहे हो, उसे पाओगे ॥ ४७३ ॥
एवमुक्तश्च रुद्रेण श्वेतकिर्मनुजाधिपः ॥ ४८ ॥
तथा चकार तत् सर्वं यथोक्तं शूलपाणिना ।
पूर्णे तु द्वादशे वर्षे पुनरायान्महेश्वरः ॥ ४ ९ ॥
भगवान् रुद्रके ऐसा कहनेपर राजा श्वेतकिने शूलपाणि शिवकी आज्ञाके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न किया । बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् महेश्वर पुनः आये ॥ ४८-४९ ॥
दृष्ट्वैव च स राजानं शंकरो लोकभावनः ।
उवाच परमप्रीतः श्वेतकिं नृपसत्तमम् ॥ ५० ॥
सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर नृपश्रेष्ठ श्वेतकिको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— ॥ ५० ॥
तोषितोऽहं नृपश्रेष्ठ त्वयेहाद्येन कर्मणा ।
याजनं ब्राह्मणानां तु विधिदृष्टं परंतप ॥ ५१ ॥
' भूपालशिरोमणे! तुमने इस वेदविहित कर्मके द्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट किया है, परंतु परंतप! शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करानेका अधिकार ब्राह्मणोंको ही है ॥ ५१ ॥
अतोऽहं त्वां स्वयं नाद्य याजयामि परंतप ।
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ममांशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तमः ॥ ५२ ॥
‘ अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा । पृथ्वीपर मेरे ही अंशभूत एक महाभाग श्रेष्ठ द्विज हैं ॥ ५२ ॥
दुर्वासा इति विख्यातः स हि त्वां याजयिष्यति ।
मन्नियोगान्महातेजाः सम्भाराः सम्भ्रियन्तु ते ॥ ५३ ॥
‘ वे दुर्वासा नामसे विख्यात हैं । महातेजस्वी दुर्वासा मेरी आज्ञासे तुम्हारा यज्ञ करायेंगे; तुम सामग्री जुटाओ ' ॥ ५३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रेण समुदाहृतम् ।
स्वपुरं पुनरागम्य सम्भारान् पुनरार्जयत् ॥ ५४ ॥
भगवान् रुद्रका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा पुनः अपने नगरमें आये और यज्ञसामग्री जुटाने लगे ॥ ५४ ॥
ततः सम्भृतसम्भारो भूयो रुद्रमुपागमत् ।
सम्भृता मम सम्भाराः सर्वोपकरणानि च ॥ ५५ ॥
त्वत्प्रसादान्महादेव श्वो मे दीक्षा भवेदिति ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ५६ ॥
दुर्वाससं समाहूय रुद्रो वचनमब्रवीत् ।
एष राजा महाभागः श्वेतकिर्द्विजसत्तम ॥ ५७ ॥
एनं याजय विप्रेन्द्र मन्नियोगेन भूमिपम् ।
बाढमित्येव वचनं रुद्रं त्वृषिरुवाच ह ॥ ५८ ॥
तदनन्तर सामग्री जुटाकर वे पुनः भगवान् रुद्रके पास गये और बोले— ‘ महादेव! आपकी कृपासे मेरी यज्ञसामग्री तथा अन्य सभी आवश्यक उपकरण जुट गये । अब कल मुझे यज्ञकी दीक्षा मिल जानी चाहिये । ' महामना राजाका यह कथन सुनकर भगवान् रुद्रने दुर्वासाको बुलाया और कहा - ' द्विजश्रेष्ठ! ये महाभाग राजा श्वेतकि हैं । विप्रेन्द्र! मेरी आज्ञासे तुम इन भूमिपालका यज्ञ कराओ। ' यह सुनकर महर्षिने ' बहुत अच्छा ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ५५—५८ ॥
ततः सत्रं समभवत् तस्य राज्ञो महात्मनः ।
यथाविधि यथाकालं यथोक्तं बहुदक्षिणम् ॥ ५ ९ ॥
तदनन्तर यथासमय विधिपूर्वक उन महामना नरेशका यज्ञ आरम्भ हुआ। शास्त्रमें जैसा बताया गया है, उसी ढंगसे सब कार्य हुआ । उस यज्ञमें बहुत - सी दक्षिणा दी गयी ॥ ५ ९ ॥
तस्मिन् परिसमाप्ते तु राज्ञः सत्रे महात्मनः ।
दुर्वाससाभ्यनुज्ञाता विप्रतस्थुः स्म याजकाः ॥ ६० ॥
ये तत्र दीक्षिताः सर्वे सदस्याश्च महौजसः ।
सोऽपि राजन् महाभागः स्वपुरं प्राविशत् तदा ॥ ६१ ॥
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पूज्यमानो महाभागैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
वन्दिभिः स्तूयमानश्च नागरैश्चाभिनन्दितः ॥ ६२ ॥
उन महामना नरेशका वह यज्ञ पूरा होनेपर उसमें जो महातेजस्वी सदस्य और ऋत्विज दीक्षित हुए थे, वे सब दुर्वासाजीकी आज्ञा ले अपने - अपने स्थानको चले गये । राजन्! वे महान् सौभाग्यशाली नरेश भी वेदोंके पारंगत महाभाग ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उस समय अपनी राजधानीमें गये । उस समय वन्दीजनोंने उनका यश गाया और पुरवासियोंने अभिनन्दन किया ॥ ६०–६२ ॥
एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः ।
कालेन महता चापि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥ ६३ ॥
ऋत्विग्भिः सहितः सर्वैः सदस्यैश्च समन्वितः ।
तस्य सत्रे पपौ वह्निर्हविर्द्वादश वत्सरान् ॥ ६४ ॥
नृपश्रेष्ठ राजर्षि श्वेतकिका आचार- व्यवहार ऐसा ही था । वे दीर्घकालके पश्चात् अपने यज्ञके सम्पूर्ण सदस्यों तथा ऋत्विजोंसहित देवताओंसे प्रशंसित हो स्वर्गलोकमें गये । उनके यज्ञमें अग्निने लगातार बारह वर्षोंतक घृतपान किया था ॥ ६३-६४ ॥
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि ।
हविषा च ततो वह्निः परां तृप्तिमगच्छत ॥ ६५ ॥
उस अद्वितीय यज्ञमें निरन्तर घीकी अविच्छिन्न धाराओंसे अग्निदेवको बड़ी तृप्ति प्राप्त हुई ॥ ६५ ॥
न चैच्छत् पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् ।
पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत् प्रकाशते ॥ ६६ ॥
अब उन्हें फिर दूसरे किसीका हविष्य ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं रही । उनका रंग सफेद हो गया, कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होते थे ॥ ६६ ॥
ततो भगवतो वहनेर्विकारः समजायत ।
तेजसा विप्रहीणश्च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥ ६७ ॥
तब भगवान् अग्निदेवके उदरमें विकार हो गया । वे तेजसे हीन हो ग्लानिको प्राप्त होने लगे ॥ ६७ ॥
स लक्षयित्वा चात्मानं तेजोहीनं हुताशनः ।
जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥ ६८ ॥
अपनेको तेजसे हीन देख अग्निदेव ब्रह्माजीके लोकपूजित पुण्यधाममें गये ॥ ६८ ॥
तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ।
भगवन् परमा प्रीतिः कृत्वा मे श्वेतकेतुना ॥ ६ ९ ॥
वहाँ बैठे हुए ब्रह्माजीसे वे यह वचन बोले —' भगवन्! राजा श्वेतकिने अपने यज्ञमें मुझे परम संतुष्ट कर दिया ॥ ६ ९ ॥
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अरुचिश्चाभवत् तीव्रा तां न शक्नोम्यपोहितुम् ।
तेजसा विप्रहीणोऽस्मि बलेन च जगत्पते ॥ ७० ॥
इच्छेय त्वत्प्रसादेन स्वात्मनः प्रकृतिं स्थिराम् । ‘ परंतु मुझे अत्यन्त अरुचि हो गयी है, जिसे मैं किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता । जगत्पते!! उस अरुचिके कारण मैं तेज और बलसे हीन होता जा रहा हूँ । अतः मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपासे मैं स्वस्थ हो जाऊँ; मेरी स्वाभाविक स्थिति सुदृढ़ बनी रहे ' ॥ ७० ॥
एतच्छ्रुत्वा हुतवहाद् भगवान् सर्वलोककृत् ॥ ७१ ॥
हव्यवाहमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव ।
त्वया द्वादश वर्षाणि वसोर्धाराहुतं हविः ॥ ७२ ॥
उपयुक्तं महाभाग तेन त्वां ग्लानिराविशत् ।
तेजसा विप्रहीणत्वात् सहसा हव्यवाहन ॥ ७३ ॥
मा गमस्त्वं यथा वहने प्रकृतिस्थो भविष्यसि ।
अरुचिं नाशयिष्येऽहं समयं प्रतिपद्य ते ॥ ७४ ॥
अग्निदेवकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी हव्यवाहन अग्निसे हँसते हुए - से इस प्रकार बोले – ' महाभाग! तुमने बारह वर्षोंतक वसुधाराकी आहुतिके रूपमें प्राप्त हुई घृतधाराका उपभोग किया है । इसीलिये तुम्हें ग्लानि प्राप्त हुई है । हव्यवाहन! तेजसे हीन होनेके कारण तुम्हें सहसा अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये । वहने! तुम फिर पूर्ववत् स्वस्थ हो जाओगे । मैं समय पाकर तुम्हारी अरुचि नष्ट कर दूँगा ॥ ७१–७४ ॥
पुरा देवनियोगेन यत् त्वया भस्मसात् कृतम् ।
आलयं देवशत्रूणां सुघोरं खाण्डवं वनम् ॥ ७५ ॥
तत्र सर्वाणि सत्त्वानि निवसन्ति विभावसो ।
तेषां त्वं मेदसा तृप्तः प्रकृतिस्थो भविष्यसि ॥ ७६ ॥
‘ पूर्वकालमें देवताओंके आदेशसे तुमने दैत्योंके जिस अत्यन्त घोर निवासस्थान खाण्डववनको जलाया था, वहाँ इस समय सब प्रकारके जीव -जन्तु आकर निवास करते हैं । विभावसो! उन्हींके मेदसे तृप्त होकर तुम स्वस्थ हो सकोगे ॥ ७५-७६ ॥
गच्छ शीघ्रं प्रदग्धुं त्वं ततो मोक्ष्यसि किल्बिषात् ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं परमेष्ठिमुखाच्च्युतम् ॥ ७७ ॥
उत्तमं जवमास्थाय प्रदुद्राव हुताशनः ।
आगम्य खाण्डवं दावमुत्तमं वीर्यमास्थितः ।
सहसा प्राज्वलच्चाग्निः क्रुद्धो वायुसमीरितः ॥ ७८ ॥
‘ उस वनको जलानेके लिये तुम शीघ्र ही जाओ । तभी इस ग्लानिसे छुटकारा पा सकोगे । ' परमेष्ठी ब्रह्माजीके मुखसे निकली हुई यह बात सुनकर अग्निदेव बड़े वेगसे वहाँ
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दौड़े गये । खाण्डववनमें पहुँचकर उत्तम बलका आश्रय ले वायुका सहारा पाकर कुपित अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे ॥ ७७-७८ ॥
प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः ।
परमं यत्नमातिष्ठन् पावकस्य प्रशान्तये ॥ ७९ ॥
खाण्डववनको जलते देख वहाँ रहनेवाले प्राणियोंने उस आगको बुझानेके लिये बड़ा यत्न किया ॥ ७ ९ ॥
करैस्तु करिणः शीघ्रं जलमादाय सत्वराः ।
सिषिचुः पावकं क्रुद्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८० ॥
सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें हाथी अपनी सूँड़ोंमें जल लेकर शीघ्रतापूर्वक दौड़े आते और क्रोधपूर्वक उतावलीके साथ आगपर उस जलको उड़ेल दिया करते थे ॥ ८० ॥
बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसंततिम् ।
मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ ८१ ॥
अनेक सिरवाले नाग भी क्रोधसे मूर्च्छित हो अपने मस्तकोंद्वारा अग्निके समीप शीघ्रतापूर्वक जलकी धारा बरसाने लगे ॥ ८१ ॥
तथैवान्यानि सत्त्वानि नानाप्रहरणोद्यमैः ।
विलयं पावकं शीघ्रमनयन् भरतर्षभ ॥ ८२ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसी प्रकार दूसरे- दूसरे जीवोंने भी अनेक प्रकारके प्रहारों ( धूल झोंकने आदि) तथा उद्यमों ( जल छिड़कने आदि) के द्वारा शीघ्रतापूर्वक उस आगको बुझा दिया ॥ ८२ ॥
अनेन तु प्रकारेण भूयो भूयश्च प्रज्वलन् ।
सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ॥ ८३ ॥
इस तरह खाण्डववनमें अग्निने बार-बार प्रज्वलित होकर सात बार उसे जलानेका प्रयास किया; परंतु प्रतिबार वहाँके निवासियोंने उन्हें बुझा दिया ॥ ८३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ २२२ ॥
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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना वैशम्पायन उवाच
स तु नैराश्यमापन्नः सदा ग्लानिसमन्वितः ।
पितामहमुपागच्छत् संक्रुद्धो हव्यवाहनः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अपनी असफलतासे अग्निदेवको बड़ी निराशा हुई । वे सदा ग्लानिमें डूबे रहने लगे और कुपित हो पितामह ब्रह्माजीके पास गये ॥ १ ॥
तच्च सर्वं यथान्यायं ब्रह्मणे संन्यवेदयत् ।
उवाच चैनं भगवान् मुहूर्तं स विचिन्त्य तु ॥ २ ॥
वहाँ उन्होंने ब्रह्माजीसे सब बातें यथोचित रीतिसे कह सुनायीं । तब भगवान् ब्रह्माजी दो घड़ीतक विचार करके उनसे बोले— ॥ २ ॥
उपायः परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेऽनघ ।
कालं च कंचित् क्षमतां ततस्त्वं धक्ष्यसेऽनल ॥ ३ ॥
‘ अनघ! तुम जिस प्रकार खाण्डववनको जलाओगे, वह उपाय तो मुझे सूझ गया है; किंतु उसके लिये तुम्हें कुछ समयतक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अनल! इसके बाद तुम खाण्डववनको जला सकोगे ॥ ३ ॥
भविष्यतः सहायौ ते नरनारायणौ तदा ।
ताभ्यां त्वं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन ॥ ४ ॥
‘ हव्यवाहन! उस समय नर और नारायण तुम्हारे सहायक होंगे । उन दोनोंके साथ रहकर तुम उस वनको जला सकोगे ' ॥ ४ ॥
एवमस्त्विति तं वह्निर्ब्रह्माणं प्रत्यभाषत ।
सम्भूतौ तौ विदित्वा तु नरनारायणावृषी ॥ ५ ॥
कालस्य महतो राजंस्तस्य वाक्यं स्वयम्भुवः ।
अनुस्मृत्य जगामाथ पुनरेव पितामहम् ॥ ६ ॥
तब अग्निने ब्रह्माजीसे कहा- ' अच्छा, ऐसा ही सही। ' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् नर- नारायण ऋषियोंके अवतीर्ण होनेकी बात जानकर अग्निदेवको ब्रह्माजीकी बातका स्मरण हुआ । राजन्! तब वे पुनः ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५-६ ॥
अब्रवीच्च तदा ब्रह्मा यथा त्वं धक्ष्यसेऽनल ।
खाण्डवं दावमद्यैव मिषतोऽस्य शचीपतेः ॥ ७ ॥
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उस समय ब्रह्माजीने कहा - ' अनल! अब जिस प्रकार तुम इन्द्रके देखते - देखते अभी खाण्डववन जला सकोगे, वह उपाय सुनो ॥ ७ ॥
नरनारायणौ यौ तौ पूर्वदेवौ विभावसो ।
सम्प्राप्तौ मानुषे लोके कार्यार्थं हि दिवौकसाम् ॥ ८ ॥
‘विभावसो! आदिदेव नर और नारायण मुनि इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ८ ॥
अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते ।
तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपतः ॥ ९ ॥
' वहाँके लोग उन्हें अर्जुन और वासुदेवके नामसे जानते हैं । वे दोनों इस समय खाण्डववनके पास ही एक साथ बैठे हैं ॥ ९ ॥
तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च ।
ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशैरपि ॥ १० ॥
'उन दोनोंसे तुम खाण्डववन जलानेके कार्यमें सहायताकी याचना करो । तब तुम इन्द्रादि देवताओंसे रक्षित होनेपर भी उस वनको जला सकोगे ॥ १० ॥
तौ तु सत्त्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः ।
देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः ॥ ११ ॥
' वे दोनों वीर एक साथ होनेपर यत्नपूर्वक वनके सारे जीवोंको भी रोकेंगे और देवराज इन्द्रका भी सामना करेंगे, मुझे इसमें कोई संशय नहीं है ' ॥ ११ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः ।
कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थं त्वभ्यभाषत ॥ १२ ॥
तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम ।
तच्छ्रुत्वा वचनं त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम् ॥ १३ ॥
अब्रवीन्नृपशार्दूल तत्कालसदृशं वचः ।
दिधक्षं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः ॥ १४ ॥
नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही ॥ १२–१४ ॥ अर्जुन उवाच
उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च ।
यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्रधरान् बहून् ॥ १५ ॥
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अर्जुन बोले — भगवन्! मेरे पास बहुत -से दिव्य एवं उत्तम अस्त्र तो हैं, जिनके द्वारा मैं एक क्या, अनेक वज्रधारियोंसे युद्ध कर सकता हूँ ॥ १५ ॥
धनुर्मे नास्ति भगवन् बाहुवीर्येण सम्मितम् ।
कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद् विषहेन्मम ॥ १६ ॥
परंतु मेरे पास मेरे बाहुबलके अनुरूप धनुष नहीं है, जो समरभूमिमें युद्धके लिये प्रयत्न करते समय मेरा वेग सह सके ॥ १६ ॥
शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः ।
न हि वोढुं रथः शक्तः शरान् मम यथेप्सितान् ॥ १७ ॥
इसके सिवा शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते रहनेके लिये मुझे इतने अधिक बाणोंकी आवश्यकता होगी, जो कभी समाप्त न हों तथा मेरी इच्छाके अनुरूप बाणोंको ढोनेके लिये शक्तिशाली रथ भी मेरे पास नहीं है ॥ १७ ॥
अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान् वातरंहसः ।
रथं च मेघनिर्घोषं सूर्यप्रतिमतेजसम् ॥ १८ ॥
तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम् ।
येन नागान् पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे ॥ १ ९ ॥
मैं वायुके समान वेगवान् श्वेत वर्णके दिव्य अश्व तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला एवं सूर्यके समान तेजस्वी रथ चाहता हूँ। इसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णके बल- पराक्रमके अनुसार कोई आयुध इनके पास भी नहीं है, जिससे ये नागों और पिशाचोंको युद्धमें मार सकें ॥ १८-१९ ॥
उपायं कर्मसिद्धौ च भगवन् वक्तुमर्हसि ।
निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने ॥ २० ॥
भगवन्! इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो उपाय सम्भव हो, वह मुझे बताइये, जिससे मैं इस महान् वनमें जल बरसाते हुए इन्द्रको रोक सकूँ ॥ २० ॥
पौरुषेण तु यत् कार्यं तत् कर्तारौ स्व पावक ।
करणानि समर्थानि भगवन् दातुमर्हसि ॥ २१ ॥
भगवन् अग्निदेव! पुरुषार्थसे जो कार्य हो सकता है, उसे हमलोग करनेके लिये तैयार हैं; किंतु इसके लिये सुदृढ़ साधन जुटा देनेकी कृपा आपको करनी चाहिये ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अर्जुन-अग्निसंवादविषयक दो सौ तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२३ ॥
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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स भगवान् धूमकेतुर्हुताशनः ।
चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर धूमरूपी ध्वजासे सुशोभित होनेवाले भगवान् हुताशनने दर्शनकी इच्छासे लोकपाल वरुणका चिन्तन किया ॥ १ ॥
आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम् ।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् ॥ २ ॥
अदितिके पुत्र, जलके स्वामी और सदा जलमें ही निवास करनेवाले उन वरुणदेवने, अग्निदेवने मेरा चिन्तन किया है, यह जानकर तत्काल उन्हें दर्शन दिया ॥ २ ॥
तमब्रवीद् धूमकेतुः प्रतिगृह्य जलेश्वरम् ।
चतुर्थं लोकपालानां देवदेवं सनातनम् ॥ ३ ॥
चौथे लोकपाल सनातन देवदेव जलेश्वर वरुणका स्वागत- सत्कार करके धूमकेतु अग्निने उनसे कहा— ॥ ३ ॥
सोमेन राज्ञा यद् दत्तं धनुश्चैवेषुधी च ते ।
तत् प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ॥ ४ ॥
‘ वरुणदेव! राजा सोमने आपको जो दिव्य धनुष और अक्षय तरकस दिये हैं, वे दोनों मुझे शीघ्र दीजिये । साथ ही कपियुक्त ध्वजासे सुशोभित रथ भी प्रदान कीजिये ' ॥ ४ ॥
कार्यं च सुमहत् पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति ।
चक्रेण वासुदेवश्च तन्ममाद्य प्रदीयताम् ॥ ५ ॥
' आज कुन्तीपुत्र अर्जुन गाण्डीव धनुषके द्वारा और भगवान् वासुदेव चक्रके द्वारा मेरा महान् कार्य सिद्ध करेंगे; अतः वह सब आज मुझे दे दीजिये ' ॥ ५ ॥
ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत ।
तदद्भुतं महावीर्यं यशःकीर्तिविवर्धनम् ॥ ६ ॥
सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च ।
सर्वायुधमहामात्रं परसैन्यप्रधर्षणम् ॥ ७ ॥