श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1571–1580
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580
पृष्ठ 1571
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई - ॥ १५३ ॥
न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥ १६ ॥
दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ । ‘वासव! तुम्हारे सखा नागप्रवर तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं । वे खाण्डवदाहके समय कुरुक्षेत्र चले गये थे ॥ १६३ ॥
न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥ १७ ॥
वासुदेवार्जुनावेतौ निबोध वचनान्मम ।
नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥ १८ ॥
भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ ।
ती शक्यौ दुराधर्षी विजेतुमजितौ युधि ॥ १ ९ ॥
‘ भगवान् वासुदेव तथा अर्जुनको किसी प्रकार युद्धसे जीता नहीं जा सकता । मेरे कहनेसे तुम इस बातको समझ लो । ये दोनों पहलेके देवता नर और नारायण हैं । देवलोकमें भी इनकी ख्याति है । इनका बल और पराक्रम कैसा है, यह तुम भी जानते हो । ये अपराजित और दुर्धर्ष वीर हैं । सम्पूर्ण लोकोंमें किसीके द्वारा भी ये युद्धमें जीते नहीं जा सकते ॥ १७–१९ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ ।
पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥ २० ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः । ' ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायण सम्पूर्ण देवताओं, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों तथा नागोंके लिये भी परम पूजनीय हैं ॥ २०३३ ॥
तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥ २१ ॥
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम् । ‘ अतः इन्द्र! तुम्हें देवताओंके साथ यहाँसे चले जाना ही उचित है । खाण्डववनके इस विनाशको तुम प्रारब्धका ही कार्य समझो ' ॥ २१ ॥
इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥ २२ ॥
क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा । यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इन्द्रने इसे ही सत्य माना और क्रोध तथा अमर्ष छोड़कर वे उसी समय स्वर्गलोकको लौट गये ॥ २२३ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥ २३ ॥
सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ।
पृष्ठ 1572
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! महात्मा इन्द्रको वहाँसे प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेनासहित उनके पीछे - पीछे चले गये ॥ २३ ॥
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ॥ २४ ॥
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः । उस समय देवताओंसहित देवराज इन्द्रको जाते देख वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनने सिंहनाद किया ॥ २४ ॥
देवराजे गते राजन् प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ॥ २५ ॥
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा । राजन्! देवराजके चले जानेपर वीरवर केशव तथा अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो उस समय बेखटके खाण्डववनका दाह कराने लगे ॥ २५३ ॥
स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वार्जुनः सुरान् ॥ २६ ॥
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् । जैसे प्रबल वायु बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने देवताओंको भगाकर अपने बाणोंके समुदायसे खाण्डववासी प्राणियोंको मारना आरम्भ किया ॥ २६३ || न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ॥ २७ ॥
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना । सव्यसाची अर्जुनके बाण चलाते समय उनके बाणोंसे कट जानेके कारण कोई भी जीव वहाँसे बाहर न निकल सका ॥ २७ ॥
नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ॥ २८ ॥
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे ।
शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्त्रिणाम् ॥ २९ ॥
अमोघ अस्त्रधारी अर्जुनको उस समय बड़े - से - बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे । वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे ॥ २८-२९ ॥
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव ।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च ॥ ३० ॥
वे सभी प्राणी प्राणशून्य होकर साक्षात् कालसे मारे हुएकी भाँति आगमें गिर पड़ते थे । वे वनके किनारे हों या दुर्गम स्थानोंमें हों, कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३० ॥
पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाप्यजायत ।
भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ॥ ३१ ॥
पृष्ठ 1573
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पितरों और देवताओंके लोकमें भी खाण्डववनके दाहकी गर्मी पहुँचने लगी । बहुतेरे प्राणियोंके समुदाय कातर हो जोर- जोर से चीत्कार करने लगे ॥ ३१ ॥
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ।
तेन शब्देन वित्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ॥ ३२ ॥
हाथी, मृग और चीते भी रोदन करते थे । उनके आर्तनादसे गंगा तथा समुद्रके भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे ॥ ३२ ॥
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः ।
न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ॥ ३३ ॥
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद् योद्धुं कुतः पुनः । उस वनमें रहनेवाले जो विद्याधर- जातिके लोग थे, उनकी भी यही दशा थी । महाबाहो! उस समय कोई श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ॥ ३३ ॥
एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ॥ ३४ ॥
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान् हरिः । जो कोई राक्षस, दानव और नाग वहाँ एक साथ संघ बनाकर निकलते थे, उन सबको भगवान् श्रीहरि चक्रद्वारा मार देते थे ॥ ३४३ ॥
ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद् गतासवः ॥ ३५ ॥
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि । वे तथा दूसरे विशालकाय प्राणी चक्रके वेगसे शरीर और मस्तक छिन्न - भिन्न हो जानेके कारण निर्जीव हो प्रज्वलित आगमें गिर पड़ते थे ॥ ३५३ ॥
स मांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ॥ ३६ ॥
उपर्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।
दीप्ताक्ष दीप्तजिह्वश्च सम्प्रदीप्तमहाननः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदेके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये । उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्वामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा ॥ ३६-३७ ॥
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन् प्राणभृतां वसाम् ।
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ॥ ३८ ॥
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः । उनके चमकीले केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे, आँखें पिंगलवर्णकी थीं और वे प्राणियोंके मेदेका रस पी रहे थे । श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गये । उन्हें बड़ी शान्ति मिली ॥ ३८३ ॥
तथासुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठ 1574
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३ ९ ३ ॥ तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥
शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०३ ॥
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥
जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः ।
स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥
अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये । मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला- ' अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ ' ॥ ४१-४२ ॥ तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥
पृष्ठ 1575
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा — ‘डरो मत ' ॥ ४३३ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥
= अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा – ' तुम्हें डरना नहीं चाहिये ' ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् ।
न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥
अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च ।
ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च ।
अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥
उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥
F
पृष्ठ 1576
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः शार्ङ्गकोपाख्यान – मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता- शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना जनमेजय उवाच
किमर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तस्मिन् वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत् प्रचक्ष्व मे ॥ १ ॥
जनमेजय पूछा—ब्रह्मन्! इस प्रकार सारे वनके जलाये जानेपर भी अग्निदेवने उन चारों शार्ङ्गकोंको क्यों दग्ध नहीं किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च ।
कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्छार्ङ्गकाणां न कीर्तितम् ॥ २ ॥
विप्रवर! आपने अश्वसेन नाग तथा मयदानवके न जलनेका कारण तो बताया है; परंतु शार्ङ्गकोंके दग्ध न होनेका कारण नहीं कहा है ॥ २ ॥
तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्छार्ङ्गकाणामनामयम् ।
कीर्तयस्वाग्निसम्मर्दे कथं ते न विनाशिताः ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! उस भयानक अग्निकाण्डमें उन शार्ङ्गकोंका सकुशल बच जाना, यह बड़े आश्चर्यकी बात है । कृपया बताइये, उनका नाश कैसे नहीं हुआ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथाभूतमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -शत्रुदमन जनमेजय! वैसे भयंकर अग्निकाण्डमें भी अग्निदेवने जिस कारणसे शार्ङ्गकोंको दग्ध नहीं किया और जिस प्रकार वह घटना घटित हुई, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः ।
आसीन्महर्षिःः श्रुतवान् मन्दपाल इति श्रुतः ॥ ५ ॥
मन्दपाल नामसे विख्यात एक विद्वान् महर्षि थे । वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ ५ ॥
स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स्वाध्यायवान् धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1577
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! वे ऊर्ध्वरेता मुनियोंके मार्ग (ब्रह्मचर्य) - का आश्रय लेकर सदा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न और धर्मपालनमें तत्पर रहते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था और वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ॥ ६ ॥
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत ।
जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥ ७ ॥
भारत! वे अपनी तपस्याको पूरी करके शरीरका त्याग करनेपर पितृलोकमें गये; किंतु वहाँ उन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला ॥ ७ ॥
स लोकानफलान् दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि ।
पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान् दिवौकसः ॥ ८ ॥
उन्होंने तपस्याद्वारा वशमें किये हुए लोकोंको भी निष्फल देखकर धर्मराजके पास बैठे हुए देवताओंसे पूछा ॥ ८ ॥
मन्दपाल उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिताः ।
किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मणः फलम् ॥ ९ ॥
मन्दपाल बोले— देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्यों हैं? ( उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं? ) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है ॥ ९ ॥
तत्राहं तत् करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् ।
फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः ॥ १० ॥
जिसके लिये इस तपस्याका फल ढका हुआ है, मैं उस लोकमें जाकर वह कर्म करूँगा । आपलोग मुझसे उसको बताइये ॥ १० ॥
देवा ऊचुः
ऋणिनो मानवा ब्रह्मन् जायन्ते येन तच्छृणु ।
क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः ॥ ११ ॥
तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा श्रुतैः ।
तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा ॥ १२ ॥
देवताओंने कहा — ब्रह्मन्! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये । यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति- इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है । यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है । आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है ॥ ११-१२ ॥ त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1578
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं । इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा ॥ १३
पुंनाम्नो नरकात् पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः ।
तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम ॥ १४ ॥
श्रुतिका कथन है कि पुत्र ' पुत्' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है । अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम् ।
क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत् ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा - विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी ॥ १५ ॥
स चिन्तयन्नभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान् ।
शार्ङ्गिकां शार्ङ्गिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान् ॥ १६ ॥
यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ङ्गिक होकर जरिता नामवाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया ॥ १६ ॥
तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः ।
तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति ॥ १७ ॥
बालान् स तानण्डगतान् सह मात्रा मुनिर्वने । जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया । अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये ॥ १७३ ॥
तस्मिन् गते महाभागे लपितां प्रति भारत ॥ १८ ॥
अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत् । भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १८३ ॥
तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान् वने ॥ १ ९ ॥
न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान् ।
बभार चैतान् संजातान् स्ववृत्त्या स्नेहविप्लवा ॥ २० ॥
अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे । अतः पुत्र - शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा । वह स्नेहसे विह्वल होकर अपनी वृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण- पोषण करती रही ॥ १ ९ -२० ॥ ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः ।
पृष्ठ 1579
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मन्दपालश्चरंस्तस्मिन् वने लपितया सह ॥ २१ ॥
उधर वनमें लपिताके साथ विचरते हुए मन्दपाल मुनिने अग्निदेवको खाण्डववनका दाह करनेके लिये आते देखा ॥ २१ ॥
तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान् ।
सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्ब्राह्मणो जातवेदसम् ॥ २२ ॥
पुत्रान् प्रति वदन् भीतो लोकपालं महौजसम् । अग्निदेवके संकल्पको जानकर और अपने पुत्रोंकी बाल्यावस्थाका विचार करके ब्रह्मर्षि मन्दपाल भयभीत होकर महातेजस्वी लोकपाल अग्निसे अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये निवेदन करते हुए ( ईश्वरकी भाँति) उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥
मन्दपाल उवाच त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ॥ २३ ॥
मन्दपालने कहा — अग्निदेव! आप सब लोकोंके मुख हैं, आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचाते हैं ॥ २३ ॥
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ।
त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ॥ २४ ॥
पावक! आप समस्त प्राणियोंके अन्तस्तलमें गूढ़-रूपसे विचरते हैं । विद्वान् पुरुष आपको एक (अद्वितीय ब्रह्मरूप) बताते हैं । फिर दिव्य, भौम और जठरानलरूपसे आपके त्रिविध स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं ॥ २४ ॥
त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् ।
त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः ॥ २५ ॥
आपको ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान –इन आठ मूर्तियोंमें विभक्त करके ज्ञानी पुरुषोंने आपको यज्ञवाहन बनाया है । महर्षि कहते हैं कि इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि आपने ही की है ॥ २५ ॥
त्वदृते हि जगत् कृत्स्नं सद्यो नश्येद् हुताशन ।
तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ॥ २६ ॥
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् । हुताशन! आपके बिना सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा । ब्राह्मणलोग आपको नमस्कार करके अपनी पत्नियों और पुत्रोंके साथ कर्मानुसार प्राप्त की हुई सनातन गतिको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥
त्वामग्ने 'जलदानाहुः खे विषक्तान् सविद्युतः ॥ २७ ॥
अग्ने! आकाशमें विद्युत्कें साथ मेघोंकी जो घटा घिर आती है, उसे भी आपका ही स्वरूप कहते हैं ॥ २७ ॥
पृष्ठ 1580
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ।
जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥ २८ ॥
प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं । महान् तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ॥ २८ ॥
तवैव कर्म विहितं भूतं सर्वं चराचरम् ।
त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥ २ ९ ॥
तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है । आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २ ९ ॥
त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम् ।
त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥ ३० ॥
त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः । आपहीमें हव्य और कव्य यथावत् प्रतिष्ठित हैं । देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण- पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र ( सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥ ३१ ॥
तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः ।
उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित - तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले —' मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ? ' ॥ ३१-३२ ॥
तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् ।
प्रदहन् खाण्डवं दावं मम पुत्रान् विसर्जय ॥ ३३ ॥
तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा — ' भगवन्! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें ' ॥ ३३ ॥
तथेति तत् प्रतिश्रुत्य भगवान् हव्यवाहनः ।
खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३४ ॥
'बहुत अच्छा ' कहकर भगवान् हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्यानेऽष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥