श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1621–1630

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1621–1630

पृष्ठ 1621

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चतुर्थोऽध्यायः मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन (वैशम्पायन उवाच तां तु कृत्वा सभां श्रेष्ठां मयश्चार्जुनमब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस श्रेष्ठ सभाभवनका निर्माण करके मयासुरने अर्जुनसे कहा । मय उवाच एषा सभा सव्यसाचिन् ध्वजो ह्यत्र भविष्यति ॥ मयासुर बोला – सव्यसाचिन्! यह है आपकी सभा, इसमें एक ध्वजा होगी ।

भूतानां च महावीर्यो ध्वजाग्रे किङ्करो गणः ।

तव विस्फारघोषेण मेघवन्निनदिष्यति ॥

उसके अग्रभागमें भूतोंका महापराक्रमी किंकर नामक गण निवास करेगा । जिस समय तुम्हारे धनुषकी टंकारध्वनि होगी, उस समय उस ध्वनिके साथ ये भूत भी मेघोंके समान गर्जना करेंगे ।

अयं हि सूर्यसंकाशी ज्वलनस्य रथोत्तमः ।

इमे च दिविजाःश्वेता वीर्यवन्तो हयोत्तमाः ॥

मायामयः कृतो ह्येष ध्वजो वानरलक्षणः ।

असज्जमानो वृक्षेषु धूमकेतुरिवोच्छ्रितः ॥

यह जो सूर्यके समान तेजस्वी अग्निदेवका उत्तम रथ है और ये जो श्वेत वर्णवाले दिव्य एवं बलवान् अश्वरत्न हैं तथा यह जो वानरचिह्नसे उपलक्षित ध्वज है, इन सबका निर्माण मायासे ही हुआ है । यह ध्वज वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं है तथा अग्निकी लपटोंके समान सदा ऊपरकी ओर ही उठा रहता है ।

बहुवर्णं हि लक्ष्येत ध्वजं वानरलक्षणम् ।

ध्वजोत्कटं ह्यनवमं युद्धे द्रक्ष्यसि विष्ठितम् ॥

आपका यह वानरचिह्नित ध्वज अनेक रंगका दिखायी देता है । आप युद्धमें इस उत्कट एवं स्थिर ध्वजको कभी झुकता नहीं देखेंगे । इत्युक्त्वाऽऽलिङ्ग्य बीभत्सुं विसृष्टः प्रययौ मयः । ) ऐसा कहकर मयासुरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनसे विदा लेकर ( अभीष्ट स्थानको ) चला गया ।

पृष्ठ 1622

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वैशम्पायन उवाच

ततः प्रवेशनं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिरः ।

अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिपः ॥ १ ॥

साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च ।

कृसरेणाथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वशः ॥ २ ॥

भक्ष्यप्रकारैर्विविधैः फलैश्चापि तथा नृप ।

चोष्यैश्च विविधै राजन् पेयैश्च बहुविस्तरैः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति- भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय ( शर्बत) आदि सामग्रियों- द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा भवनमें प्रवेश किया ॥ १–३ ॥

अहतैश्चैव वासोभिर्माल्यैरुच्चावचैरपि ।

तर्पयामास विप्रेन्द्रान् नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ ४ ॥

उन्होंने नये - नये वस्त्र और छोटे- बड़े अनेक प्रकारके हार आदिके उपहार देकर अनेक दिशाओंसे आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया ॥ ४ ॥

ददौ तेभ्यः सहस्राणि गवां प्रत्येकशः पुनः ।

पुण्याहघोषस्तत्रासीद् दिवस्पृगिव भारत ॥ ५ ॥

भारत! तत्पश्चात् उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक हजार गौएँ दीं । उस समय वहाँ ब्राह्मणोंके पुण्याह - वाचनका गम्भीर घोष मानो स्वर्गलोकतक गूँज उठा ॥ ५ ॥

वादित्रैर्विविधैर्दिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ।

पूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च ॥ ६ ॥

कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने अनेक प्रकारके बाजे तथा भाँति- भाँतिके दिव्य सुगन्धित पदार्थोंद्वारा उस भवनमें देवताओंकी स्थापना एवं पूजा की । इसके बाद वे उस भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ६ ॥

तत्र मल्ला नटा झल्लाः सूता वैतालिकास्तथा ।

उपतस्थुर्महात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥

वहाँ धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें कितने ही मल्ल ( बाहुयुद्ध करनेवाले ), नट, झल्ल ( लकुटियोंसे युद्ध करनेवाले ), सूत और वैतालिक उपस्थित हुए ॥ ७ ॥

तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभिः सह पाण्डवः ।

तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शक्रो यथा दिवि ॥ ८ ॥

इस प्रकार पूजनका कार्य सम्पन्न करके भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति उस रमणीय सभामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ८ ॥

सभायामृषयस्तस्यां पाण्डवैः सह आसते ।

पृष्ठ 1623

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आसांचक्रुर्नरेन्द्राश्च नानादेशसमागताः ॥ ९ उस सभामें ऋषि तथा विभिन्न देशोंसे आये हुए नरेश पाण्डवोंके साथ बैठा करते थे ॥ ९ ॥

असितो देवलः सत्यः सर्पिर्माली महाशिराः ।

अर्वावसुः सुमित्रश्च मैत्रेयः शुनको बलिः ॥ १० ॥

बको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनः शुकः ।

सुमन्तुर्जेमिनिः पैलो व्यासशिष्यास्तथा वयम् ॥ ११ ॥

तित्तिरिर्याज्ञवल्क्यश्च ससुतो लोमहर्षणः ।

अप्सुहोम्यश्च धौम्यश्च अणीमाण्डव्यकौशिकौ ॥ १२ ॥

दामोष्णीषस्त्रैबलिश्च पर्णादो घटजानुकः ।

मौञ्जायनो वायुभक्षः पाराशर्यश्च सारिकः ॥ १३ ॥

बलिवाकः सिनीवाकः सत्यपालः कृतश्रमः ।

जातूकर्णः शिखावांश्च आलम्बः पारिजातकः ॥ १४ ॥

पर्वतश्च महाभागो मार्कण्डेयो महामुनिः ।

पवित्रपाणिः सावर्णो भालुकिर्गालवस्तथा ॥ १५ ॥

जङ्घाबन्धुश्च रैभ्यश्च कोपवेगस्तथा भृगुः ।

हरिबभ्रुश्च कौण्डिन्यो बभ्रुमाली सनातनः ॥ १६ ॥

काक्षीवानौशिजश्चैव नाचिकेतोऽथ गौतमः ।

पैङ्गयो वराहः शुनकः शाण्डिल्यश्च महातपाः ॥ १७ ॥

कुक्कुरो वेणुजङ्घोऽथ कालापः कठ एव च ।

मुनयो धर्मविद्वांसो धृतात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १८ ॥

असित, देवल, सत्य, सर्पिर्माली, महाशिरा, अर्वावसु, सुमित्र, मैत्रेय, शुनक, बलि, बक, दाल्भ्य, स्थूलशिरा, कृष्णद्वैपायन, शुकदेव, व्यासजीके शिष्य सुमन्तु जैमिनि, पैल तथा हमलोग, तित्तिरि, याज्ञवल्क्य, पुत्रसहित लोमहर्षण, अप्सुहोम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष, त्रैबलि, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, सारिक, बलिवाक, सिनीवाक, सत्यपाल, कृतश्रम, जातूकर्ण, शिखावान्, आलम्ब, पारिजातक, महाभाग पर्वत, महामुनि मार्कण्डेय, पवित्रपाणि, सावर्ण, भालुकि, गालव, जंघाबन्धु, रैभ्य, कोपवेग, भृगु, हरिबभ्रु, कौण्डिन्य, बभ्रुमाली, सनातन, काक्षीवान्, औशिज, नाचिकेत, गौतम, पैंगय, वराह, शुनक (द्वितीय), महातपस्वी शाण्डिल्य, कुक्कुर, वेणुजंघ, कालाप तथा कठ आदि धर्मज्ञ, जितात्मा और जितेन्द्रिय मुनि उस सभामें विराजते थे ॥ १०– १८ ॥

एते चान्ये च बहवो वेदवेदाङ्गपारगाः ।

उपासते महात्मानं सभायामृषिसत्तमाः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1624

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ये तथा और भी वेद- वेदांगोंके पारंगत बहुत- से मुनिश्रेष्ठ उस सभामें महात्मा युधिष्ठिरके पास बैठा करते थे ॥ १ ९ ॥

कथयन्तः कथाः पुण्या धर्मज्ञाः शुचयोऽमलाः ।

तथैव क्षत्रियश्रेष्ठा धर्मराजमुपासते ॥ २० ॥

वे धर्मज्ञ, पवित्रात्मा और निर्मल महर्षि राजा युधिष्ठिरको पवित्र कथाएँ सुनाया करते थे । इसी प्रकार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ नरेश भी वहाँ धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे ॥ २० ॥

श्रीमान् महात्मा धर्मात्मा मुञ्जकेतुर्विवर्धनः ।

संग्रामजिद् दुर्मुखश्च उग्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥

कक्षसेनः क्षितिपतिः क्षेमकश्चापराजितः ।

कम्बोजराजः कमठः कम्पनश्च महाबलः ॥ २२ ॥

सततं कम्पयामास यवनानेक एव यः ।

बलपौरुषसम्पन्नान् कृतास्त्रानमितौजसः ।

यथासुरान् कालकेयान् देवो वज्रधरस्तथा ॥ २३ ॥

श्रीमान् महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित्, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल - पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था । ( ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे ) ॥ २१–२३ ॥ जटासुरो मद्रकाणां च राजा कुन्तिः पुलिन्दश्च किरातराजः । तथाऽऽङ्गवाङ्गौ सह पुण्ड्रकेण पाण्ड्योड्रराजौ च सहान्ध्रकेण ॥ २४ ॥

अङ्गो वङ्गः सुमित्रश्च शैब्यश्चामित्रकर्शनः ।

किरातराजः सुमना यवनाधिपतिस्तथा ॥ २५ ॥

चाणूरो देवरातश्च भोजो भीमरथश्च यः ।

श्रुतायुधश्च कालिङ्गो जयसेनश्च मागधः ॥ २६ ॥

सुकर्मा चेकितानश्च पुरुश्चामित्रकर्शनः ।

केतुमान् वसुदानश्च वैदेहोऽथ कृतक्षणः ॥ २७ ॥

सुधर्मा चानिरुद्धश्च श्रुतायुश्च महाबलः ।

अनूपराजो दुर्धर्षः क्रमजिच्च सुदर्शनः ॥ २८ ॥

शिशुपालः सहसुतः करूषाधिपतिस्तथा ।

वृष्णीनां चैव दुर्धर्षाः कुमारा देवरूपिणः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1625

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आहुको विपृथुश्चैव गदः सारण एव च ।

अक्रूरः कृतवर्मा च सत्यकश्च शिनेः सुतः ॥ ३० ॥

भीष्मकोऽथाकृतिश्चैव द्युमत्सेनश्च वीर्यवान् ।

केकयाश्च महेष्वासा यज्ञसेनश्च सौमकिः ॥ ३१ ॥

केतुमान् वसुमांश्चैव कृतास्त्रश्च महाबलः ।

एते चान्ये च बहवः क्षत्रिया मुख्यसम्मताः ॥ ३२ ॥

उपासते सभायां स्म कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । इनके सिवा जटासुर, मद्रराज शल्य, राजा कुन्तिभोज, किरातराज पुलिन्द, अंगराज, वंगराज, पुण्ड्रक, पाण्ड्य, उड्रराज, आन्ध्रनरेश, अंग, वंग, सुमित्र, शत्रुसूदन शैब्य, किरातराज सुमना, यवननरेश, चाणूर, देवरात, भोज, भीमरथ, कलिंगराज श्रुतायुध, मगधदेशीय जयसेन, सुकर्मा, चेकितान, शत्रुसंहारक पुरु, केतुमान्, वसुदान, विदेहराज कृतक्षण, सुधर्मा, अनिरुद्ध, महाबली श्रुतायु, दुर्धर्ष वीर अनूपराज, क्रमजित्, सुदर्शन, पुत्रसहित शिशुपाल, करूषराज दन्तवक्त्र, वृष्णिवंशियोंके देवस्वरूप दुर्धर्ष राजकुमार, आहुक, विपृथु, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, शिनिपुत्र सत्यक, भीष्मक, आकृति, पराक्रमी द्युमत्सेन, महान् धनुर्धर केकयराजकुमार, सोमक-पौत्र द्रुपद, केतुमान् (द्वितीय ) तथा अस्त्रविद्यामें निपुण महाबली वसुमान्—ये तथा और भी बहुत - से प्रधान क्षत्रिय उस सभामें कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें बैठते थे ॥ २४–३२ ॥ अर्जुनं ये च संश्रित्य राजपुत्रा महाबलाः ॥ ३३ ॥

अशिक्षन्त धनुर्वेदं रौरवाजिनवाससः ।

तत्रैव शिक्षिता राजन् कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ३४ ॥

जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे ( वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे ) । राजन्! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी ॥ ३३-३४ ॥

रौक्मिणेयश्च साम्बश्च युयुधानश्च सात्यकिः ।

सुधर्मा चानिरुद्धश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ३५ ॥

एते चान्ये च बहवो राजानः पृथिवीपते ।

धनंजयसखा चात्र नित्यमास्ते स्म तुम्बुरुः ॥ ३६ ॥

रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र ( सात्यकि ) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य –ये और दूसरे भी बहुत -से राजा उस सभामें बैठते थे । पृथ्वीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे ॥ ३५-३६ ॥

उपासते महात्मानमासीनं सप्तविंशतिः ।

चित्रसेनः सहामात्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 1626

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1626 का मूल पृष्ठ
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मन्त्रीसहित चित्रसेन आदि सत्ताईस गन्धर्व और अप्सराएँ सभामें बैठे हुए महात्मा याधिष्ठिरकी उपासना करती थीं ॥ ३७ ॥

गीतवादित्रकुशलाः साम्यतालविशारदाः ।

प्रमाणेऽथ लये स्थाने किन्नराः कृतनिश्रमाः ॥ ३८ ॥

संचोदितास्तुम्बुरुणा गन्धर्वसहितास्तदा ।

गायन्ति दिव्यतानैस्ते यथान्यायं मनस्विनः ।

पाण्डुपुत्रानृषींश्चैव रमयन्त उपासते ॥ ३ ९ ॥

गाने - बजानेमें कुशल, साम्य और तालके विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोंके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे ॥ ३८-३९ ॥

तस्यां सभायामासीनाः सुव्रताः सत्यसंगराः ।

दिवीव देवा ब्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते ॥ ४० ॥

जैसे देवतालोग दिव्यलोककी सभामें ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार कितने ही सत्यप्रतिज्ञ और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महापुरुष उस सभामें बैठकर महाराज युधिष्ठिरकी आराधना करते थे ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभाप्रवेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभाप्रवेश नामक चौथा अध्याय पूराहुआ ॥ ४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३ श्लोक हैं ) १. संगीतमें नृत्य, गीत और वाद्यकी समताको लय अथवा साम्य कहते हैं; जैसा कि अमरकोषका वाक्य है — ' लयः साम्यम्' । २. नृत्य या गीतमें उसके काल और क्रियाका परिमाण, जिसे बीच - बीचमें हाथपर हाथ मारकर सूचित करते जाते हैं, ताल कहलाता है; जैसा कि अमरकोषका वचन है— ' तालः कालक्रियामानम्’ ।

पृष्ठ 1627

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( लोकपालसभाख्यानपर्व ) पञ्चमोऽध्यायः नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना वैशम्पायन उवाच

अथ तत्रोपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।

महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! एक दिन उस सभामें महात्मा पाण्डव अन्यान्य महापुरुषों तथा गन्धर्वों आदिके साथ बैठे हुए थे ॥ १ ॥

वेदोपनिषदां वेत्ता ऋषिः सुरगणार्चितः ।

इतिहासपुराणज्ञः पुराकल्पविशेषवित् ॥ २ ॥

न्यायविद् धर्मतत्त्वज्ञः षडङ्गविदनुत्तमः ।

ऐक्यसंयोगनानात्वसमवायविशारदः ॥ ३ ॥

वक्ता प्रगल्भो मेधावी स्मृतिमान् नयवित् कविः ।

परापरविभागज्ञः प्रमाणकृतनिश्चयः ॥ ४ ॥

पञ्चावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित् ।

उत्तरोत्तरवक्ता च वदतोऽपि बृहस्पतेः ॥ ५ ॥

धर्मकामार्थमोक्षेषु यथावत् कृतनिश्चयः ।

तथा भुवनकोशस्य सर्वस्यास्य महामतिः ॥ ६ ॥

प्रत्यक्षदर्शी लोकस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।

सांख्ययोगविभागज्ञो निर्विवित्सुः सुरासुरान् ॥ ७ ॥

संधिविग्रहतत्त्वज्ञस्त्वनुमानविभागवित् ।

षाङ्गुण्यविधियुक्तश्च सर्वशास्त्रविशारदः ॥ ८ ॥

युद्धगान्धर्वसेवी च सर्वत्राप्रतिघस्तथा ।

एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्युक्तो गुणगणैर्मुनिः ॥ ९ ॥

लोकाननुचरन् सर्वानागमत् तां सभां नृप ।

नारदः सुमहातेजा ऋषिभिः सहितस्तदा ॥ १० ॥

पारिजातेन राजेन्द्र पर्वतेन च धीमता ।

पृष्ठ 1628

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सुमुखेन च सौम्येन देवर्षिरमितद्युतिः ॥ ११ ॥

सभास्थान् पाण्डवान् द्रष्टुं प्रीयमाणो मनोजवः ।

जयाशीर्भिस्तु तं विप्रो धर्मराजानमार्चयत् ॥ १२ ॥

उसी समय वेद और उपनिषदोंके ज्ञाता, ऋषि, देवताओंद्वारा पूजित, इतिहास - पुराणके मर्मज्ञ, पूर्वकल्पकी बातोंके विशेषज्ञ, न्यायके विद्वान्, धर्मके तत्त्वको जाननेवाले, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्यौतिष-इन छहों अंगोंके पण्डितोंमें शिरोमणि, ऐक्य, संयोगनानात्व और समवाय के ज्ञानमें विशारद, प्रगल्भ वक्ता, मेधावी, स्मरणशक्तिसम्पन्न, नीतिज्ञ, त्रिकालदर्शी, अपर ब्रह्म और परब्रह्मको विभागपूर्वक जाननेवाले, प्रमाणोंद्वारा एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचे हुए, पंचावयवयुक्त* वाक्यके गुण-दोषको जाननेवाले, बृहस्पति- जैसे वक्ताके साथ भी उत्तर- प्रत्युत्तर करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोंके सम्बन्धमें यथार्थ निश्चय रखनेवाले तथा इन सम्पूर्ण चौदहों भुवनोंको ऊपर, नीचे और तिरछे सब ओरसे प्रत्यक्ष देखनेवाले, महाबुद्धिमान्, सांख्य और योगके विभागपूर्वक ज्ञाता, देवताओं और असुरोंमें भी निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न करनेके इच्छुक, संधि और विग्रहके तत्त्वको समझनेवाले, अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका अनुमानसे निश्चय करके शत्रुपक्षके मन्त्रियों आदिको फोड़नेके लिये धन आदि बाँटनेके उपयुक्त अवसरका ज्ञान रखनेवाले, संधि ( सुलह ), विग्रह ( कलह ), यान ( चढ़ाई करना ), आसन ( अपने स्थानपर ही चुप्पी मारकर बैठे रहना), द्वैधीभाव ( शत्रुओंमें फूट डालना ) और समाश्रय ( किसी बलवान् राजाका आश्रय ग्रहण करना ) — राजनीतिके इन छहों अंगोंके उपयोगके जानकार, समस्त शास्त्रोंके निपुण विद्वान्, युद्ध और संगीतकी कलामें कुशल, सर्वत्र क्रोधरहित, इन उपर्युक्त गुणोंके सिवा और भी असंख्य सद्गुणोंसे सम्पन्न, मननशील, परम कान्तिमान् महातेजस्वी देवर्षि नारद लोक- लोकान्तरोंमें घूमते-फिरते पारिजात, बुद्धिमान् पर्वत तथा सौम्य, सुमुख आदि अन्य अनेक ऋषियोंके साथ सभामें स्थित पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिलनेके लिये मनके समान वेगसे वहाँ आये और उन ब्रह्मर्षिने जयसूचक आशीर्वादोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरका अत्यन्त सम्मान किया ॥ २– १२ ॥

तमागतमृषिं दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् ।

सहसा पाण्डवश्रेष्ठः प्रत्युत्थायानुजैः सह ॥ १३ ॥

अभ्यवादयत प्रीत्या विनयावनतस्तदा ।

तदर्हमासनं तस्मै सम्प्रदाय यथाविधि ॥ १४ ॥

गां चैव मधुपर्कं च सम्प्रदायार्घ्यमेव च ।

अर्चयामास रत्नैश्च सर्वकामैश्च धर्मवित् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1629

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सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया ॥ १३–१५ ॥ तुतोष च यथावच्च पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् ।

सोऽर्चितः पाण्डवैः सर्वैर्महर्षिर्वेदपारगः ।

धर्मकामार्थसंयुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥

राजा युधिष्ठिरसे यथोचित पूजा पाकर नारदजी भी बहुत प्रसन्न हुए । इस प्रकार सम्पूर्ण पाण्डवोंसे पूजित होकर उन वेदवेत्ता महर्षिने युधिष्ठिरसे धर्म, काम और अर्थ तीनोंके उपदेशपूर्वक ये बातें पूछीं ॥ १६ ॥

नारद उवाच

कच्चिदर्थाश्च कल्पन्ते धर्मे च रमते मनः ।

सुखानि चानुभूयन्ते मनश्च न विहन्यते ॥ १७ ॥

नारदजी बोले – राजन्! क्या तुम्हारा धन तुम्हारे ( यज्ञ, दान तथा कुटुम्बरक्षा आदि आवश्यक कार्योंके ) निर्वाहके लिये पूरा पड़ जाता है? क्या धर्ममें तुम्हारा मन प्रसन्नतापूर्वक लगता है? क्या तुम्हें इच्छानुसार सुख भोग प्राप्त होते हैं? ( भावच्चिन्तनमें लगे हुए) तुम्हारे मनको ( किन्हीं दूसरी वृत्तियोंद्वारा ) आघात या विक्षेप तो नहीं पहुँचता है? ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1630

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Gyani पाण्डवोंद्वारा देवर्षि नारदका पूजन