श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1611–1620

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1611–1620

पृष्ठ 1611

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उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ॥ नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् । ) स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा ॥ १ ९ ॥ अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियैः । इसी प्रकार नकुल - सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे - पीछे चल रहे थे । उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों) -से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया । उस छत्रमें वैदूर्य - मणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे । उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों ॥ १८-१९ ॥ पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ॥ २० ॥

युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा ।

परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः ॥ २१ ॥

श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी । गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया । युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्‌को छातीसे लगा लिया और नकुल- सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ( तब भगवान्ने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया ) ॥ २०-२१ ॥

योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरंजयः ।

युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत ॥ २२ ॥

भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि ' अब आप लौट जाइये ' ॥ २२ ॥

ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित् ।

उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्क्युपाघ्राय केशवम् ॥ २३ ॥

पाण्डवो यादवश्रेष्ठं कृष्णं कमललोचनम् ।

गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥

तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये । फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और ' जाओ ' कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी ॥ २३-२४ ॥

ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।

निवर्त्य च तथा कृच्छ्रात् पाण्डवान् सपदानुगान् ॥ २५ ॥

स्वां पुरीं प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम् ।

पृष्ठ 1612

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लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा ॥ २६ ॥

तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों - सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों । जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे ॥ २५-२६ ॥

मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् ।

अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७ ॥

क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः ।

अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥

अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया । अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये । पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी । उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया ॥ २७-२८ ॥

निवृत्योपययुस्तर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः ।

स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥

अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े । उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे ॥ २ ९ ॥ सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा ।

दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः ।

स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मानिव वेगवान् ॥ ३० ॥

सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था । उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुडकी भाँति द्वारकामें पहुँच गये ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः ।

सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ३१ ॥

विसृज्य सुहृदः सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् ।

मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 1613

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राजन! वहाँ पुरुषसिंह धर्मराजने समस्त सुहृदों, भाइयों और पुत्रोंको विदा करके राजमहलमें द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ३२ ॥

केशवोऽपि मुदा युक्तः प्रविवेश पुरोत्तमम् ।

पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा ॥ ३३ ॥

इधर भगवान् केशव भी उग्रसेन आदि श्रेष्ठ यादवोंसे सम्मानित हो प्रसन्नतापूर्वक द्वारकापुरीके भीतर गये ॥ ३३ ॥

आहुकं पितरं वृद्धं मातरं च यशस्विनीम् ।

अभिवाद्य बलं चैव स्थितः कमललोचनः ॥ ३४ ॥

कमलनयन श्रीकृष्णने राजा उग्रसेन, बूढ़े पिता वसुदेव और यशस्विनी माता देवकीको प्रणाम करके बलरामजीके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ ३४ ॥

प्रद्युम्नसाम्बनिशठांश्चारुदेष्णं गदं तथा ।

अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दनः ॥ ३५ ॥

स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवनं ययौ । तत्पश्चात् जनार्दनने प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, चारुदेष्ण, गद, अनिरुद्ध तथा भानु आदिको स्नेहपूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े - बूढ़ोंकी आज्ञा लेकर रुक्मिणीजीके महलमें प्रवेश किया ॥ ३५३ ॥

मयोऽपि स महाभागः सर्वरत्नविभूषिताम् ।

विधिवत् कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै ॥ ३६ ॥

इधर महाभाग मयने भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सभामण्डप बनानेकी मन -ही- मन कल्पना की ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि भगवद्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकायात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

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पृष्ठ 1614

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तृतीयोऽध्यायः मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्भुत सभाका निर्माण वैशम्पायन उवाच

अथाब्रवीन्मयः पार्थमर्जुनं जयतां वरम् ।

आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाप्यहम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर मयासुरने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनसे कहा— ‘ भारत! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ । मैं एक जगह जाऊँगा और फिर शीघ्र ही लौट आऊँगा ॥ १ ॥

(विश्रुतां त्रिषु लोकेषु पार्थ दिव्यां सभां तव । प्राणिनां विस्मयकरीं तव प्रीतिविवर्धिनीम् । पाण्डवानां च सर्वेषां करिष्यामि धनंजय || ) ' कुन्तीकुमार धनंजय! मैं आपके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात एक दिव्य सभाभवनका निर्माण करूँगा । जो समस्त प्राणियोंको आश्चर्यमें डालनेवाली तथा आपके साथ ही समस्त पाण्डवोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली होगी ।

उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति ।

यियक्षमाणेषु पुरा दानवेषु मया कृतम् ॥ २ ॥

चित्रं मणिमयं भाण्डं रम्यं बिन्दुसरः प्रति ।

सभायां सत्यसंधस्य यदासीद् वृषपर्वणः ॥ ३ ॥

‘ पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था ॥ २-३ ॥

आगमिष्यामि तद् गृह्य यदि तिष्ठति भारत ।

ततः सभां करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम् ॥ ४ ॥

‘ भारत! यदि वह अबतक वहीं होगा तो उसे लेकर पुनः लौट आऊँगा । फिर उसीसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यशको बढ़ानेवाली सभा तैयार करूँगा ॥ ४ ॥

मनःप्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् ।

अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन ॥ ५ ॥

‘ जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, विचित्र एवं मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली होगी । कुरुनन्दन! बिन्दुसरमें एक भयंकर गदा भी है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1615

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निहिता भावयाम्येवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् ।

सुवर्णबिन्दुभिश्चित्रा गुर्वी भारसहा दृढा ॥ ६ ॥

‘ मैं समझता हूँ, राजा वृषपर्वाने युद्धमें शत्रुओंका संहार करके वह गदा वहीं रख दी थी । वह गदा बड़ी भारी है, विशेष भार या आघात सहन करनेमें समर्थ एवं सुदृढ़ है । उसमें सोनेकी फूलियाँ लगी हुई हैं, जिनसे वह बड़ी विचित्र दिखायी देती है ॥ ६ ॥

सा वै शतसहस्रस्य सम्मिता शत्रुघातिनी ।

अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा ॥ ७ ॥

‘ शत्रुओंका संहार करनेवाली वह गदा अकेली ही एक लाख गदाओंके बराबर है । जैसे गाण्डीव धनुष आपके योग्य है, वैसे ही वह गदा भीमसेनके योग्य होगी ॥ ७ ॥

वारुणश्च महाशङ्खो देवदत्तः सुघोषवान् ।

सर्वमेतत् प्रदास्यामि भवते नात्र संशयः ॥ ८ ॥

‘ वहाँ वरुणदेवका देवदत्त नामक महान् शंख भी है, जो बड़ी भारी आवाज करनेवाला है । ये सब वस्तुएँ लाकर मैं आपको भेंट करूँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ८ ॥

इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थं प्रागुदीचीं दिशं गतः अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वतं प्रति ॥ ९ ॥

अर्जुनसे ऐसा कहकर मयासुर पूर्वोत्तर दिशा ( ईशानकोण) - में कैलाससे उत्तर मैनाक पर्वतके पास गया ॥ ९ ॥

हिरण्यशृङ्गः सुमहान् महामणिमयो गिरिः ।

रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥ १० ॥

द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । ' वहीं हिरण्यशृंग नामक महामणिमय विशाल पर्वत है, जहाँ रमणीय बिन्दुसर नामक तीर्थ है । वहीं राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोंतक ( तपस्या करते हुए ) निवास किया था ॥ १०३ ॥

यत्रेष्टं सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना ॥ ११ ॥

आहृताः क्रतवो मुख्याः शतं भरतसत्तम ।

यत्र यूपा मणिमयाश्चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥ १२ ॥

भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे ॥ ११-१२ ॥

शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः ।

अत्रेष्ट्वा स गतः सिद्धिं सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १३ ॥

यह सब शोभाके लिये बनाया गया था, शास्त्रीय विधि अथवा सिद्धान्तके अनुसार नहीं । सहस्र नेत्रोंवाले शचीपति इन्द्रने भी वहीं यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की थी ॥ १३ ॥

यत्र भूतपतिः सृष्ट्वा सर्वान् लोकान् सनातनः ।

पृष्ठ 1616

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उपास्यते तिग्मतेजाः स्थितो भूतैः सहस्रशः ॥ १४ ॥

सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त प्राणियोंके अधिपति उग्रतेजस्वी सनातन देवता महादेवजी वहीं रहकर सहस्रों भूतोंसे सेवित होते हैं ॥ १४ ॥

नरनारायणौ ब्रह्मा यमः स्थाणुश्च पञ्चमः ।

उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥ १५ ॥

एक हजार युग बीतनेपर वहीं नर-नारायण ऋषि, ब्रह्मा, यमराज और पाँचवें महादेवजी यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ १५ ॥

यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षगणान् बहून् ।

श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये ॥ १६ ॥

यह वही स्थान है, जहाँ भगवान् वासुदेवने धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोंतक निरंतर श्रद्धापूर्वक यज्ञ किया था ॥ १६ ॥

सुवर्णमालिनो यूपाश्चैत्याश्चाप्यतिभास्वराः ।

ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशवः ॥ १७ ॥

उस यज्ञमें स्वर्णमालाओंसे मण्डित खंभे और अत्यन्त चमकीली वेदियाँ बनी थीं ।

भगवान् केशवने उस यज्ञमें सहस्रों - लाखों वस्तुएँ दानमें दी थीं ॥ १७ ॥

तत्र गत्वा स जग्राह गदां शङ्खं च भारत ।

स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद् वृषपर्वणः ॥ १८ ॥

भारत! तदनन्तर मयासुरने वहाँ जाकर वह गदा, शंख और सभाभवन बनानेके लिये स्फटिक मणिमय द्रव्य ले लिया, जो पहले वृषपर्वाके अधिकारमें था ॥ १८ ॥

किंकरैः सह रक्षोभिर्यदरक्षन्महद् धनम् ।

तदगृह्णान्मयस्तत्र गत्वा सर्वं महासुरः ॥ १ ९ ॥

बहुत- से किंकर तथा राक्षस जिस महान् धनकी रक्षा करते थे, वहाँ जाकर महान् असुर मयने वह सब ले लिया ॥ १ ९ ॥

तदाहृत्य च तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् ।

विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम् ॥ २० ॥

वे सब वस्तुएँ लाकर उस असुरने वह अनुपम सभाभवन तैयार की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात, दिव्य, मणिमयी और शुभ एवं सुन्दर थी ॥ २० ॥

गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा ।

देवदत्तं चार्जुनाय शङ्खप्रवरमुत्तमम् ॥ २१ ॥

उसने उस समय वह श्रेष्ठ गदा भीमसेनको और देवदत्त नामक उत्तम शंख अर्जुनको भेंट कर दिया ॥ २१ ॥

यस्य शङ्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे ।

सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1617

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उस शंखकी आवाज सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे । महाराज! उस सभामें सुवर्णमय वृक्ष शोभा पाते थे ॥ २२ ॥

दशकिष्कुसहस्राणि समन्तादायताभवत् ।

यथा वह्नेर्यथार्कस्य सोमस्य च यथा सभा ॥ २३ ॥

भ्राजमाना तथात्यर्थं दधार परमं वपुः । वह सब ओरसे दस हजार हाथ विस्तृत थी ( अर्थात् उसकी लंबाई और चौड़ाई भी दस-दस हजार हाथ थी ) । जैसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी सभाभवन प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अत्यन्त उद्भासित होनेवाली उस सभाने बड़ा मनोहर रूप धारण किया ॥ २३ ॥

अभिघ्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम् ॥ २४ ॥

वह अपनी प्रभाद्वारा सूर्यदेवकी तेजोमयी प्रभासे टक्कर लेती थी ॥ २४ ॥

प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा ।

नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता ।

आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक्लमा ॥ २५ ॥

वह दिव्य सभाभवन अपने अलौकिक तेजसे निरंतर प्रदीप्त -सी जान पड़ती थी । उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि नूतन मेघोंकी घटाके समान वह आकाशको घेरकर खड़ी थी । उसका विस्तार भी बहुत था । वह रमणीय सभाभवन पाप -तापका नाश करनेवाली थी ॥ २५ ॥

उत्तमद्रव्यसम्पन्ना रत्नप्राकारतोरणा ।

बहुचित्रा बहुधना सुकृता विश्वकर्मणा ॥ २६ ॥

उत्तमोत्तम द्रव्योंसे उसका निर्माण किया गया था । उसके परकोटे और फाटक रत्नोंसे

बने हुए थे । उसमें अनेक प्रकारके अद्भुत चित्र अंकित थे । वह बहुत धनसे पूर्ण थी ।

दानवोंके विश्वकर्मा मयासुरने उस सभाभवनको बहुत सुन्दरतासे बनाया था ॥ २६ ॥

न दाशार्ही सुधर्मा वा ब्रह्मणो वाथ तादृशी ।

सभा रूपेण सम्पन्ना यां चक्रे मतिमान् मयः ॥ २७ ॥

बुद्धिमान् मयने जिस सभाका निर्माण किया था, उसके समान सुन्दर यादवोंकी सुधर्मा सभा अथवा ब्रह्माजीकी सभा भी नहीं थी ॥ २७ ॥

तां स्म तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च ।

सभामष्टौ सहस्राणि किंकरा नाम राक्षसाः ॥ २८ ॥

मयासुरकी आज्ञाके अनुसार आठ हजार किंकर नामक राक्षस उस सभाकी रक्षा करते और उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर उठाकर ले जाते थे ॥ २८ ॥

अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महाबलाः ।

रक्ताक्षाः पिङ्गलाक्षाश्च शुक्तिकर्णाः प्रहारिणः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1618

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वे राक्षस भयंकर आकृतिवाले, आकाशमें विचरने वाले, विशालकाय और महाबली थे । उनकी आँखें लाल और पिंगलवर्णकी थीं तथा कान सीपीके समान जान पड़ते थे । वे सब - के - सब प्रहार करनेमें कुशल थे ॥ २ ९ ॥

तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मयः ।

वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम् ॥ ३० ॥

मयासुरने उस सभाभवनके भीतर एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी बना रखी थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी । उसमें इन्द्रनीलमणिमय कमलके पत्ते फैले हुए थे । उन कमलोंके मृणाल मणियोंके बने थे ॥ ३० ॥

Malala MEDENT पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम् ।

पुष्पितैः पङ्कजैश्चित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्च काञ्चनैः ।

चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम् ॥ ३१ ॥

उसमें पद्मरागमणिमय कमलोंकी मनोहर सुगंध छा रही थी । अनेक प्रकारके पक्षी उसमें रहते थे । खिले हुए कमलों और सुनहली मछलियों तथा कछुओंसे उसकी विचित्र

शोभा हो रही थी । उस पोखरीमें उतरनेके लिये स्फटिकमणिकी विचित्र सीढ़ियाँ बनी थीं ।

उसमें पंकरहित स्वच्छ जल भरा हुआ था । वह देखनेमें बड़ी सुन्दर थी ॥ ३१ ॥

मन्दानिलसमुद्भूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम् ।

महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम् ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 1619

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मन्द वायुसे उद्वेलित हो जब जलकी बूँदें उछलकर कमलके पत्तोंपर बिखर जाती थीं, उस समय वह सारी पुष्करिणी मौक्तिकबिन्दुओंसे व्याप्त जान पड़ती थी । उसके चारों ओरके घाटोंपर बड़ी - बड़ी मणियोंकी चौकोर शिलाखण्डोंसे पक्की वेदियाँ बनायी गयी थीं ॥ ३२ ॥

मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः ।

दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात् प्रपतन्त्युत ॥ ३३ ॥

मणियों तथा रत्नोंसे व्याप्त होनेके कारण कुछ राजालोग उस पुष्करिणीके पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थतापर विश्वास नहीं करते थे और भ्रमसे उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे ॥ ३३ ॥

तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमाः ।

आसन् नानाविधा लोलाः शीतच्छाया मनोरमाः ॥ ३४ ॥

उस सभाभवनके सब ओर अनेक प्रकारके बड़े- बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, जो सदा फूलोंसे भरे रहते थे । उनकी छाया बड़ी शीतल थी । वे मनोरम वृक्ष सदा हवाके झोंकोंसे हिलते रहते थे ॥ ३४ ॥

काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः ।

हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ ३५ ॥

केवल वृक्ष ही नहीं; उस भवनके चारों ओर अनेक सुगन्धित वन, उपवन और बावलियाँ भी थीं, जो हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ ३५ ॥

जलजानां च पद्मानां स्थलजानां च सर्वशः ।

मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान् स्म निषेवते ॥ ३६ ॥

वहाँ जल और स्थलमें होनेवाले कमलोंकी सुगन्ध लेकर वायु सदा पाण्डवोंकी सेवा किया करती थी ॥ ३६ ||

ईदृशीं तां सभां कृत्वा मासैः परिचतुर्दशैः ।

निष्ठितां धर्मराजाय मयो राजन् न्यवेदयत् ॥ ३७ ॥

मयासुरने पूरे चौदह महीनोंमें इस प्रकारकी उस अद्भुत सभाभवनका निर्माण किया था । राजन्! जब वह बनकर तैयार हो गयी, तब उसने धर्मराजको इस बातकी सूचना दी ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभानिर्माणे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभानिर्माणविषयक तीसरा अध्याय पूराहुआ ॥ ३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ३८३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1620

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