श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1641–1650

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1641–1650

पृष्ठ 1641

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कच्चिद् बलेनानुगताः समानि विषमाणि च ।

पुराणि चौरान् निघ्नन्तश्चरन्ति विषये तव ॥ ८३ ॥

क्या तुम्हारे राज्यमें कुछ रक्षक पुरुष सेना साथ लेकर चोर डाकुओंका दमनकरते हुए सुगम एवं दुर्गम नगरोंमें विचरते रहते हैं? ॥ ८३ ॥

कच्चित् स्त्रियः सान्त्वयसि कच्चित् ताश्च सुरक्षिताः ।

कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद् गुह्यं न भाषसे ॥ ८४ ॥

तुम स्त्रियोंको सान्त्वना देकर संतुष्ट रखते हो न? क्या वे तुम्हारे यहाँ पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं? तुम उनपर पूरा विश्वास तो नहीं करते? और विश्वास करके उन्हें कोई गुप्त बात तो नहीं बता देते? ॥ ८४ ॥

कच्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च ।

प्रियाण्यनुभवञ्छेषे न त्वमन्तःपुरे नृप ॥ ८५ ॥

राजन्! तुम कोई अमंगलसूचक समाचार सुनकर और उसके विषयमें बार-बार विचार करके भी प्रिय भोग- विलासोंका आनन्द लेते हुए अन्तःपुरमें ही सोते तो नहीं रह जाते? ॥ ८५ ॥

कच्चिद् द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रेः सुप्त्वा विशाम्पते संचिन्तयसि धर्मार्थौ याम उत्थाय पश्चिमे ॥ ८६ ॥

प्रजानाथ! क्या तुम रात्रिके ( पहले पहरके बाद) जो प्रथम दो ( दूसरे- तीसरे ) याम हैं, उन्हींमें सोकर अन्तिम पहरमें उठकर बैठ जाते और धर्म एवं अर्थका चिन्तन करते हो? ॥ ८६ ॥

कच्चिदर्थयसे नित्यं मनुष्यान् समलंकृतः ।

उत्थाय काले कालज्ञैः सह पाण्डव मन्त्रिभिः ॥ ८७ ॥

पाण्डुनन्दन! तुम प्रतिदिन समयपर उठकर स्नान आदिके पश्चात् वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो देश- कालके ज्ञाता मन्त्रियोंके साथ बैठकर ( प्रार्थी या दर्शनार्थी) मनुष्योंकी इच्छा पूर्ण करते हो न? ॥ ८७ ॥

कच्चिद् रक्ताम्बरधराः खड्गहस्ताः स्वलंकृताः ।

उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिंदम ॥ ८८ ॥

शत्रुदमन! क्या लाल वस्त्र धारण करके अलंकारोंसे अलंकृत हुए योद्धा अपने हाथोंमें तलवार लेकर तुम्हारी रक्षाके लिये सब ओरसे सेवामें उपस्थित रहते हैं? ॥ ८८ ॥

कच्चिद् दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशाम्पते ।

परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च ॥ ८ ९ ॥

महाराज! क्या तुम दण्डनीय अपराधियोंके प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषोंके प्रति धर्मराजका सा बर्ताव करते हो? प्रिय एवं अप्रिय व्यक्तियोंकी

पृष्ठ 1642

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भलीभाँति परीक्षा करके ही व्यवहार करते हो न? ॥ ८ ९ ॥

कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा ।

मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थापकर्षसि ॥ ९ ० ॥

कुन्तीकुमार! क्या तुम ओषधिसेवन या पथ्य- भोजन आदि नियमोंके पालनद्वारा अपने शारीरिक कष्टको तथा वृद्ध पुरुषोंकी सेवारूप सत्संगद्वारा मानसिक संतापको सदा दूर करते रहते हो? ॥ ९ ० ॥

कच्चिद् वैद्याश्चिकित्सायामष्टाङ्गायां विशारदाः ।

सुहृदश्चानुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ॥ ९ १ ॥

तुम्हारे वैद्य अष्टांगचिकित्सामें कुशल, हितैषी, प्रेमी एवं तुम्हारे शरीरको स्वस्थ रखनेके प्रयत्नमें सदा संलग्न रहनेवाले हैं न? ॥ ९ १ ॥

कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा मानाद् वापि विशाम्पते ।

अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तान् न पश्यसि कथंचन ॥ ९ २ ॥

नरेश्वर! कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम अपने यहाँ आये हुए अर्थी ( याचक ) और प्रत्यर्थी ( राजाकी ओरसे मिली हुई वृत्ति बंद हो जानेसे दुःखी हो पुनः उसीको पानेके लिये प्रार्थी) की ओर लोभ, मोह अथवा अभिमानवश किसी प्रकार आँख उठाकर देखतेतक नहीं? ॥ ९ २ ॥

कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा विश्रम्भात् प्रणयेन वा ।

आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै ॥ ९ ३ ॥

कहीं अपने आश्रितजनोंकी जीविकावृत्तिको तुम लोभ, मोह, आत्मविश्वास अथवा आसक्तिसे बंद तो नहीं कर देते? ॥ ९ ३ ॥

कच्चित् पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिन ।

त्वया सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथंचन ॥ ९ ४ ॥

तुम्हारे नगर तथा राष्ट्रके निवासी मनुष्य संगठित होकर तुम्हारे साथ विरोध तो नहीं करते? शत्रुओंने उन्हें किसी तरह घूस देकर खरीद तो नहीं लिया है? ॥ ९ ४ ॥

कच्चिन्न दुर्बलः शत्रुर्बलेन परिपीडितः ।

मन्त्रेण बलवान् कश्चिदुभाभ्यां च कथंचन ॥ ९ ५ ॥

कोई दुर्बल शत्रु जो तुम्हारे द्वारा पहले बलपूर्वक पीड़ित किया गया ( किंतु मारा नहीं गया ), अब मन्त्रणाशक्तिसे अथवा मन्त्रणा और सेना दोनों ही शक्तियोंसे किसी तरह बलवान् होकर सिर तो नहीं उठा रहा है? ॥ ९ ५ ॥

कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः ।

कच्चित् प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वयाऽऽदृताः ॥ ९ ६ ॥

पृष्ठ 1643

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क्या सभी मुख्य- मुख्य भूपाल तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे द्वारा सम्मान पाकर तुम्हारे लिये अपने प्राणोंकी बलि दे सकते हैं? ॥ ९ ६ ॥ कच्चित् ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते ।

ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा ।

दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदाः ॥ ९ ७ ॥

क्या तुम्हारे मनमें सभी विद्याओंके प्रति गुणके अनुसार आदरका भाव है? क्या तुम ब्राह्मणों तथा साधु - संतोंकी सेवा- पूजा करते हो? जो तुम्हारे लिये शुभ एवं कल्याणकारिणी है । इन ब्राह्मणोंको तुम सदा दक्षिणा तो देते रहते हो न? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है ॥ ९ ७ ॥

कच्चिद् धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः ।

यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन् कर्मणि वर्तसे ॥ ९ ८ ॥

तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है? ॥ ९ ८ ॥

कच्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्नन्ति वै द्विजाः ।

गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्षं सदक्षिणम् ॥ ९९ ॥

क्या तुम्हारे महलमें तुम्हारी आँखोंके सामने गुणवान् ब्राह्मण स्वादिष्ठ और गुणकारक अन्न भोजन करते हैं? और भोजनके पश्चात् उन्हें दक्षिणा दी जाती है? ॥ ९९ ॥

कच्चित् क्रतूनेकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वशः ।

पुण्डरीकांश्च कार्त्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ॥ १०० ॥

अपने मनको वशमें करके एकाग्रचित्त हो वाजपेय और पुण्डरीक आदि सभी यज्ञ-यागोंका तुम पूर्णरूपसे अनुष्ठान करनेका प्रयत्न तो करते हो न? ॥ १०० ॥

कच्चिज्ज्ञातीन् गुरून् वृद्धान् दैवतांस्तापसानपि ।

चैत्यांश्च वृक्षान् कल्याणान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥ १०१ ॥

जाति- भाई, गुरुजन, वृद्ध पुरुष, देवता, तपस्वी, चैत्यवृक्ष ( पीपल ) आदि तथा कल्याणकारी ब्राह्मणोंको नमस्कार तो करते हो न? ॥ १०१ ॥

कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेऽनघ ।

अपि मङ्गलहस्तश्च जनः पार्श्वे नु तिष्ठति ॥ १०२ ॥

निष्पाप नरेश! तुम किसीके मनमें शोक या क्रोध तो नहीं पैदा करते? तुम्हारे पास कोई मनुष्य हाथमें मंगलसामग्री लेकर सदा उपस्थित रहता है न? ॥ १०२ ॥

पृष्ठ 1644

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कच्चिदेषा च ते बुद्धिर्वृत्तिरेषा च तेऽनघ ।

आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥ १०३ ॥

पापरहित युधिष्ठिर! अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति ( विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है ॥ १०३ ॥

एतया वर्तमानस्य बुद्धया राष्ट्रं न सीदति ।

विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तसुखमेधते ॥ १०४ ॥

जो ऐसी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करता है, उसका राष्ट्र कभी संकटमें नहीं पड़ता । वह राजा सारी पृथ्वीको जीतकर बड़े सुखसे दिनोदिन उन्नति करता है ॥ १०४ ॥

कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारितश्चौरकर्मणि ।

अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद् वध्यते शुचिः ॥ १०५ ॥

कहीं ऐसा तो नहीं होता कि शास्त्रकुशल विद्वानोंका संग न करनेवाले तुम्हारे मूर्ख मन्त्रियोंने किसी विशुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ एवं पवित्र पुरुषपर चोरीका अपराध लगाकर उसका सारा धन हड़प लिया हो? और फिर अधिक धनके लोभसे वे उसे प्राणदण्ड देते हों? ॥ १०५ ॥

दुष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ञैर्दृष्टः सकारणः ।

कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नरर्षभ ॥ १०६ ॥

नरश्रेष्ठ! कोई ऐसा दुष्ट चोर जो चोरी करते समय गृहरक्षकोंद्वारा देख लिया गया और चोरीके मालसहित पकड़ लिया गया हो, धनके लोभसे छोड़ तो नहीं दिया जाता? ॥ १०६ ॥

उत्पन्नान् कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत ।

अर्थान् न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनैः ॥ १०७ ॥

भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते? ॥ १०७ ॥

नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् ।

अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् ।

एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् ॥ १०८ ॥

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् ।

मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ॥ १० ९ ॥

पृष्ठ 1645

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कच्चित्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश ।

प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवाः ॥ ११० ॥

युधिष्ठिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मूर्खोके साथ विचार- विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना — इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं ॥ १०८—११० ॥

कच्चित् ते सफला वेदाः कच्चित् ते सफलं धनम् ।

कच्चित् ते सफला दाराः कच्चित् ते सफलं श्रुतम् ॥ १११ ॥

क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? क्या तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी स्त्री सफल है? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान सफल है? ॥ १११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं वै सफला वेदाः कथं वै सफलं धनम् ।

कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं श्रुतम् ॥ ११२ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- देवर्षे! वेद कैसे सफल होते हैं, धनकी सफलता कैसे होती है? स्त्रीकी सफलता कैसे मानी गयी है तथा शास्त्रज्ञान कैसे सफल होता है? ॥ ११२ ॥

नारद उवाच

अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् ।

रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ॥ ११३ ॥

नारदजीने कहा — राजन्! वेदोंकी सफलता अग्निहोत्रसे होती है, दान और भोगसे ही धन सफल होता है, स्त्रीका फल है - रति और पुत्रकी प्राप्ति तथा शास्त्रज्ञानका फल है, शील और सदाचार ॥ ११३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपाः ।

पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ११४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यह कहकर महातपस्वी नारद मुनिने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ ११४ ॥

पृष्ठ 1646

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नारदउवाच

कच्चिदभ्यागता दूराद् वणिजो लाभकारणात् ।

यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्कं शुल्कोपजीविभिः ॥ ११५ ॥

नारदजीने पूछा- राजन्! कर वसूलनेका काम करनेवाले तुम्हारे कर्मचारीलोग दूरसे लाभ उठानेके लिये आये हुए व्यापारियोंसे ठीक- ठीक कर वसूल करते हैं न? ( अधिक तो नहीं लेते? ) ॥ ११५ ॥

कच्चित् ते पुरुषा राजन् पुरे राष्ट्रे च मानिताः ।

उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवञ्चिताः ॥ ११६ ॥

महाराज! वे व्यापारीलोग आपके नगर और राष्ट्रमें सम्मानित हो विक्रीके लिये उपयोगी सामान लाते हैं न! उन्हें तुम्हारे कर्मचारी छलसे ठगते तो नहीं? ॥ ११६ ॥

कच्चिच्छृणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिरः ।

नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम् ॥ ११७ ॥

तात! तुम सदा धर्म और अर्थके ज्ञाता एवं अर्थशास्त्रके पूरे पण्डित बड़े - बूढ़े लोगोंकी धर्म और अर्थसे युक्त बातें सुनते रहते हो न? ॥ ११७ ॥

कच्चित् ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च ।

धर्मार्थं च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी ॥ ११८ ॥

क्या तुम्हारे यहाँ खेतीसे उत्पन्न होनेवाले अन्न तथा फल - फूल एवं गौओंसे प्राप्त होनेवाले दूध, घी आदिमेंसे मधु (अन्न ) और घृत आदि धर्मके लिये ब्राह्मणोंको दिये जाते हैं? ॥ ११८ ॥

द्रव्योपकरणं किंचित् सर्वदा सर्वशिल्पिनाम् ।

चातुर्मास्यावरं सम्यङ् नियतं सम्प्रयच्छसि ॥ ११ ९ ॥

नरेश्वर! क्या तुम सदा नियमसे सभी शिल्पियोंको व्यवस्थापूर्वक एक साथ इतनी वस्तु- निर्माणकी सामग्री दे देते हो, जो कम-से - कम चौमासे भर चल सके ॥ ११ ९ ॥

कच्चित् कृतं विजानीषे कर्तारं च प्रशंससि ।

सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजयन् ॥ १२० ॥

महाराज! क्या तुम्हें किसीके किये हुए उपकारका पता चलता है? क्या तुम उस उपकारीकी प्रशंसा करते हो और साधु पुरुषोंसे भरी हुई सभाके बीच उस उपकारीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसका आदर- सत्कार करते हो? ॥ १२० ॥

कच्चित् सूत्राणि सर्वाणि गृह्णासि भरतर्षभ ।

हस्तिसूत्राश्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो ॥ १२१ ॥

पृष्ठ 1647

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भरतश्रेष्ठ! क्या तुम संक्षेपसे सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले सभी सूत्रग्रन्थ —– हस्तिसूत्र, अश्वसूत्र एवं रथसूत्र आदिका संग्रह ( पठन एवं अभ्यास) करते रहते हो? ॥ १२१ ॥

कच्चिदभ्यस्यते सम्यग् गृहे ते भरतर्षभ ।

धनुर्वेदस्य सूत्रं वै यन्त्रसूत्रं च नागरम् ॥ १२२ ॥

भरतकुलभूषण! क्या तुम्हारे घरपर धनुर्वेदसूत्र, यन्त्रसूत्र और नागरिक’ सूत्रका अच्छी तरह अभ्यास किया जाता है? ॥ १२२ ॥

कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि ब्रह्मदण्डश्च तेऽनघ ।

विषयोगास्तथा सर्वे विदिताः शत्रुनाशनाः ॥ १२३ ॥

निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र ( जो मन्त्रबलसे प्रयुक्त होते हैं ), वेदोक्त दण्ड- विधान तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले सब प्रकारके विषप्रयोग ज्ञात हैं न? ॥ १२३ ॥

कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्वं व्यालभयात् तथा ।

रोगरक्षोभयाच्चैव राष्ट्रं स्वं परिरक्षसि ॥ १२४ ॥

क्या तुम अग्नि, सर्प, रोग तथा राक्षसोंके भयसे अपने सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करते हो? ॥ १२४ ॥

कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गून् व्यङ्गानबान्धवान् ।

पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि ॥ १२५ ॥

धर्मज्ञ! क्या तुम अंधों, गूंगों, पंगुओं, अंगहीनों और बन्धु बान्धवोंसे रहित अनाथों तथा संन्यासियोंका भी पिताकी भाँति पालन करते हो? ॥ १२५ ॥

षडनर्था महाराज कच्चित् ते पृष्ठतः कृताः ।

निद्राऽऽलस्यं भयं क्रोधोऽमार्दवं दीर्घसूत्रता ॥ १२६ ॥

महाराज! क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, कठोरता और दीर्घसूत्रता - इन छः दोषोंको पीछे कर दिया (त्याग दिया) है? ॥ १२६ ॥

वैशम्पायन उवाच ततः कुरूणामृषभो महात्मा श्रुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य । प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो राजाब्रवीन्नारदं देवरूपम् ॥ १२७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरुश्रेष्ठ महात्मा राजा युधिष्ठिरने ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ नारदजीका यह वचन सुनकर उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम एवं अभिवादन किया और अत्यन्त संतुष्ट हो देवस्वरूप नारदजीसे कहा ॥

पृष्ठ 1648

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युधिष्ठिर उवाच एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजा लेभे महीं सागरमेखलां च ॥ १२८ ॥

युधिष्ठिर बोले- देवर्षे! आपने जैसा उपदेश दिया है, वैसा ही करूंगा । आपके इस प्रवचनसे मेरी प्रज्ञा और भी बढ़ गयी है । ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने वैसा ही आचरण किया और इसीसे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पा लिया ॥ १२८ ॥

नारद उवाच

एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे ।

स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम् ॥ १२ ९ ॥

नारदजीने कहा — जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों ( और वर्णाश्रमधर्म) -की रक्षामें संलग्न रहता है, वह इस लोकमें अत्यन्त सुखपूर्वक विहार करके अन्तमें देवराज इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ १२ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रश्नमुखेन राजधर्मानुशासने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें नारदजीके द्वारा प्रश्नके व्याजसे राजधर्मका उपदेशविषयक पाँचवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

Of Fattal ३. परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले वेदके वचनोंकी एकवाक्यता । ४. एकमें मिले हुए वचनोंको प्रयोगके अनुसार अलग- अलग करना । ५. यज्ञके अनेक कर्मोंके एक साथ उपस्थित होनेपर अधिकारके अनुसार यजमानके साथ कर्मका जो सम्बन्ध होता है, उसका नाम समवाय है । *- दूसरेको किसी वस्तुका बोध करानेके लिये प्रवृत्त हुआ पुरुष जिस अनुमानवाक्यका प्रयोग करता है, उसमें पाँच अवयव होते हैं -प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन । जैसे किसीने कहा — ' इस पर्वतपर आग है' यह वाक्य प्रतिज्ञा है । ' क्योंकि वहाँ धूम है' यह हेतु है । ' जैसे रसोईघरमें धूआँ दीखनेपर वहाँ आग देखी जाती है ' यह दृष्टान्त ही उदाहरण है । ' चूँकि इस पर्वतपर धूआँ दिखायी देता है ' हेतुकी इस उपलब्धिका नाम उपनय है । ' इसलिये वहाँ आग है' यह निश्चय ही निगमन है । इस वाक्यमें अनुकूल तर्कका होना गुण है और प्रतिकूल तर्कका होना दोष है, जैसे ' यदि वहाँ आग न होती, तो धूआँ भी नहीं उठता ' यह अनुकूल तर्क है । जैसे कोई तालाबसे भाप उठती देखकर यह कहे कि इस तालाब में आग है, तो उसका वह अनुमान आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभाससे युक्त होगा । 3. दक्षस्मृतिमें त्रिवर्गसेवनका काल - विभाग इस प्रकार बताया गया है—

पृष्ठ 1649

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पूर्वाह्णे त्वाचरेद् धर्मं मध्याह्नेऽर्थमुपार्जयेत् । सायाह्ने चाचरेत् काममित्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ पूर्वाह्नकालमें धर्मका आचरण करे, मध्याह्नके समय धनोपार्जनका काम देखे और सायाह्न ( रात्रि) -के समय कामका सेवन करे । यह वैदिक श्रुतिका आदेश है । ( नीलकण्ठीसे उद्धृत) २. राजाओंमें छः गुण होने चाहिये – व्याख्यानशक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, भूतकालकी स्मृति, भविष्यपर दृष्टि तथा नीतिनिपुणता । ३. सात उपाय ये हैं — मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, साम, दान, दण्ड और भेद । ४. परीक्षाके योग्य चौदह स्थान या व्यक्ति नीतिशास्त्रमें इस प्रकार बताये गये हैं- देशो दुर्गं रथो हस्तिवाजियोधाधिकारिणः । अन्तःपुरान्नगणनाशास्त्रलेख्यधनासवः ॥ देश, दुर्ग, रथ, हाथी, घोड़े, शूर सैनिक, अधिकारी, अन्तःपुर, अन्न, गणना, शास्त्र, लेख्य, धन और असु ( बल), इनके जो चौदह अधिकारी हैं, राजाओंको उनकी परीक्षा करते रहना चाहिये । ५. राजाके कोष और धनकी वृद्धिके लिये आठ कर्म ये हैं— कृषिर्वणिक्पथो दुर्गं सेतुः कुञ्जरबन्धनम् । खन्याकरकरादानं शून्यानां च निवेशनम् ॥ अष्ट संधानकर्माणि प्रयुक्तानि मनीषिभिः ॥ खेतीका विस्तार, व्यापारकी रक्षा, दुर्गकी रचना एवं रक्षा, पुलोंका निर्माण और उनकी रक्षा, हाथी बाँधना, सोने - हीरे आदिकी खानोंपर अधिकार करना, करकी वसूली और उजाड़ प्रान्तोंमें लोगोंको बसाना - मनीषी पुरुषोंद्वारा ये आठ संधानकर्म बताये गये हैं । ६. स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना एवं पुरवासी – ये राज्यके सात अंग ही सात प्रकृतियाँ हैं । अथवा — दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्योतिषी — ये भी सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं । * स्मृतिमें कहा है कि— ' ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम् । ' अर्थात् ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने हितका चिन्तन करे। ( नीलकण्ठी टीकासे उद्धृत) १. शत्रुपक्षके मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक ( अन्तःपुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनको व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा ( पहरेदारोंको काम बतानेवाला ), नगराध्यक्ष ( कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता ( शिल्पियोंका परिचालक ), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक – ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये । २. उपर्युक्त टिप्पणीमें अठारह तीर्थोंमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं । * विजयके इच्छुक राजाके आगे खड़े होनेवाले उसके शत्रुके शत्रु २, उन शत्रुओंके मित्र २, उन मित्रोंके मित्र २ – ये छः व्यक्ति युद्धमें आगे खड़े होते हैं । विजिगीषुके पीछे पार्ष्णिग्राह ( पृष्ठरक्षक) और आक्रन्द ( उत्साह दिलानेवाला) – ये दो व्यक्ति खड़े होते हैं । इन दोनोंकी सहायता करनेवाले एक-एक व्यक्ति इनके पीछे खड़े होते हैं, जिनकी आसार संज्ञा है । ये क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार कहे जाते हैं । इस प्रकार आगेके छः और पीछेके चार मिलकर दस होते हैं । विजिगीषुके पार्श्वभागमें मध्यम और उसके भी पार्श्वभागमें उदासीन होता है । इन दोनोंको जोड़ लेनेसे इन सबकी संख्या बारह होती है । इन्हींको द्वादश राजमण्डल अथवा ‘ पार्ष्णिमूल ' कहते हैं । अपने और शत्रुपक्षके इन व्यक्तियोंको जानना चाहिये । 3. नीतिशास्त्रके अनुसार विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जो लोभी हो, किंतु जिसे वेतन न मिला हो, जो मानी हो किंतु किसी तरह अपमानित हो गया हो, जो क्रोधी हो और उसे क्रोध दिलाया गया हो, जो स्वभावसे ही डरनेवाला हो और उसे पुनः डरा दिया गया हो– इन चार प्रकारके लोगोंको फोड़ ले और अपने पक्षमें ऐसे लोग हों, तो उन्हें उचित सम्मान देकर मिला ले । २. व्यसन दो प्रकारके हैं – दैव और मानुष । दैव व्यसन पाँच प्रकारके हैं— अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और महामारी । मानुष व्यसन भी पाँच प्रकारका है- मूर्ख पुरुषोंसे, चोरोंसे, शत्रुओंसे, राजाके प्रिय व्यक्तिसे तथा राजाके लोभसे प्रजाको प्राप्त भय । ( नीलकंठी टीकाके अनुसार) ३. आठ अंग और चार बल भारतकौमुदीटीकाके अनुसार लिये गये हैं ।

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महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1650 का मूल पृष्ठ
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१. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे । २. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्वा, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श- ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं । 3. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं — यन्त्र कहते हैं । उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं । २. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक्योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है ।