श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1651–1660

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1651–1660

पृष्ठ 1651

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षष्ठोऽध्यायः युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा वैशम्पायन उवाच

सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेर्वचनात् परम् ।

प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! देवर्षि नारदका यह उपदेश पूर्ण होनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भलीभाँति उनकी पूजा की; तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर उनके प्रश्नका उत्तर दिया ॥ १ ॥

युधिष्ठिरउवाच

भगवन् न्याय्यमाहैतं यथावद् धर्मनिश्चयम् ।

यथाशक्ति यथान्यायं क्रियतेऽयं विधिर्मया ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले- भगवन्! आपने जो यह राजधर्मका यथार्थ सिद्धान्त बताया है, वह सर्वथा न्यायोचित है । मैं आपके इस न्यायानुकूल आदेशका यथाशक्ति पालन करता हूँ ॥ २ ॥

राजभिर्यद् यथा कार्यं पुरा वै तन्न संशयः ।

यथान्यायोपनीतार्थं कृतं हेतुमदर्थवत् ॥ ३ ॥

इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन कालके राजाओंने जो कार्य जैसे सम्पन्न किया, वहप्रत्येक न्यायोचित, सकारण और किसी विशेष प्रयोजनसे युक्त होता था ॥ ३ ॥

वयं तु सत्पथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो ।

न तु शक्यं तथा गन्तुं यथा तैर्नियतात्मभिः ॥ ४ ॥

प्रभो! हम भी उन्हींके उत्तम मार्गसे चलना चाहते हैं, परंतु उस प्रकार ( सर्वथा ) चल नहीं पाते; जैसे वे नियतात्मा महापुरुष चला करते थे ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक्यं तदभिपूज्य च ।

मुहूर्तात् प्राप्तकालं च दृष्ट्वा लोकचरं मुनिम् ॥ ५ ॥

नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः ।

अपृच्छत् पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युतिः ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की । फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शान्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा

पृष्ठ 1652

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युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे ॥ ५-६ ॥ युधिष्ठिर उवाच

भवान् संचरते लोकान् सदा नानाविधान् बहून् ।

ब्रह्मणा निर्मितान् पूर्वं प्रेक्षमाणो मनोजवः ॥ ७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—- मुनिवर! आप मनके समान वेगशाली हैं, अतः ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिनका निर्माण किया है, उन अनेक प्रकारके बहुत - से लोकोंका दर्शन करते हुए आप उनमें सदा बेरोक - टोक विचरते रहते हैं ॥ ७ ॥

ईदृशी भवता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् ।

इतो वा श्रेयसी ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ८ ॥

ब्रह्मन्! क्या आपने पहले कहीं ऐसी या इससे भी अच्छी कोई सभा देखी है? मैं जानना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे यह बात बतावें ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् ।

पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन् मधुरया गिरा ॥ ९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर देवर्षि नारदजी मुसकराने लगे और उन पाण्डुकुमारको इसका उत्तर देते हुए मधुर वाणीमें बोले ॥ ९ ॥

नारद उवाच

मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता ।

सभा मणिमयी राजन् यथेयं तव भारत ॥ १० ॥

नारदजीने कहा — तात! भरतवंशी नरेश! मणि एवं रत्नोंकी बनी हुई जैसी तुम्हारी यह सभा है, ऐसी सभा मैंने मनुष्यलोकमें न तो पहले कभी देखी है और न कानोंसे ही सुनी है ॥ १० ॥

सभां तु पितृराजस्य वरुणस्य च धीमतः ।

कथयिष्ये तथेन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च ॥ ११ ॥

ब्रह्मणश्च सभां दिव्यां कथयिष्ये गतक्लमाम् ।

दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपेतां विश्वरूपिणीम् ॥ १२ ॥

देवैः पितृगणैः साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभिः ।

जुष्टां मुनिगणैः शान्तैर्वेदयज्ञैः सदक्षिणैः ।

यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1653

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भरतश्रेष्ठ! यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है । वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है । वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है ॥ ११–१३ ॥

नारदेनैवमुक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

प्राञ्जलिर्भ्रातृभिः सार्धं तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ॥ १४ ॥

नारदं प्रत्युवाचेदं धर्मराजो महामनाः ।

सभाः कथय ताः सर्वाः श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ १५ ॥

नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा-' महर्षे! हम सभी दिव्य

सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये ॥ १४-१५ ॥

किंद्रव्यास्ताः सभा ब्रह्मन् किंविस्ताराः किमायताः ।

पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते ॥ १६ ॥

‘ ब्रह्मन्! उन सभाओंका निर्माण किस द्रव्यसे हुआ है? उनकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है? ब्रह्माजीकी उस दिव्य सभामें कौन - कौन सभासद् उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठते हैं? ॥ १६ ॥

वासवं देवराजं च यमं वैवस्वतं च के ।

वरुणं च कुबेरं च सभायां पर्युपासते ॥ १७ ॥

‘ इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वैवस्वत यम, वरुण तथा कुबेरकी सभामें कौन - कौन लोग उनकी उपासना करते हैं? ॥ १७ ॥

एतत् सर्वं यथान्यायं ब्रह्मर्षे वदतस्तव ।

श्रोतुमिच्छाम सहिताः परं कौतूहलं हि नः ॥ १८ ॥

‘ ब्रह्मर्षे! हम सब लोग आपके मुखसे ये सब बातें यथोचित रीतिसे सुनना चाहते हैं ।

हमारे मनमें उसके लिये बड़ा कौतूहल है ' ॥ १८ ॥

एवमुक्तः पाण्डवेन नारदः प्रत्यभाषत ।

क्रमेण राजन् दिव्यास्ताः श्रूयन्तामिह नः सभाः ॥ १ ९ ॥

पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया- ' राजन्! तुम हमसे यहाँ उन सभी दिव्य सभाओंका क्रमशः वर्णन सुनो ' ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरसभाजिज्ञासायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1654

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इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमेंजिज्ञासाविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

Pata

पृष्ठ 1655

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सप्तमोऽध्यायः इन्द्रसभाका वर्णन नारद उवाच

शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मनिर्मिता ।

स्वयं शक्रेण कौरव्य निर्जितार्कसमप्रभा ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं – कुरुनन्दन! इन्द्रकी तेजोमयी दिव्य सभा सूर्यके समान प्रकाशित होती है । ( विश्वकर्माके ) प्रयत्नोंसे उसका निर्माण हुआ है । स्वयं इन्द्रने ( सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके ) उसपर विजय पायी है ॥ १ ॥

विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायता ।

वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छ्रिता ॥ २ ॥

उसकी लंबाई डेढ़ सौ और चौड़ाई सौ योजनकी है । वह आकाशमें विचरनेवाली और इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द गतिसे चलनेवाली है । उसकी ऊँचाई भी पाँच योजनकी है ॥ २ ॥

जराशोकक्लमापेता निरातङ्का शिवा शुभा ।

वेश्मासनवती रम्या दिव्यपादपशोभिता ॥ ३ ॥

उसमें जीर्णता, शोक और थकावट आदिका प्रवेश नहीं है । वहाँ भय नहीं है, वह मंगलमयी और शोभासम्पन्न है । उसमें ठहरनेके लिये सुन्दर- सुन्दर महल और बैठनेके लिये उत्तमोत्तम सिंहासन बने हुए हैं । वह रमणीय सभा दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित होती है ॥ ३ ॥

तस्यां देवेश्वरः पार्थ सभायां परमासने ।

आस्ते शच्या महेन्द्राण्या श्रिया लक्ष्म्या च भारत ॥ ४ ॥

भारत! कुन्तीनन्दन! उस सभामें सर्वश्रेष्ठ सिंहासनपर देवराज इन्द्र शोभामें लक्ष्मीके समान प्रतीत होनेवाली इन्द्राणी शचीके साथ विराजते हैं ॥ ४ ॥

बिभ्रद्वपुरनिर्देश्यं किरीटी लोहिताङ्गदः ।

विरजोऽम्बरश्चित्रमाल्यो ह्रीकीर्तिद्युतिभिः सह ॥ ५ ॥

उस समय वे अवर्णनीय रूप धारण करते हैं । उनके मस्तकपर किरीट रहता है और दोनों भुजाओंमें लाल रंगके बाजूबंद शोभा पाते हैं । उनके शरीरपर स्वच्छ वस्त्र और कण्ठमें विचित्र माला सुशोभित होती है । वे लज्जा, कीर्ति और कान्ति–इन देवियोंके साथ उस दिव्य सभामें विराजमान होते हैं ॥ ५ ॥

तस्यामुपासते नित्यं महात्मानं शतक्रतुम् ।

मरुतः सर्वशो राजन् सर्वे च गृहमेधिनः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1656

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राजन्! उस दिव्य सभामें सभी मरुद्गण और गृहवासी देवता सौ यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेनेवाले महात्मा इन्द्रकी प्रतिदिन सेवा करते हैं ॥ ६ ॥

सिद्धा देवर्षयश्चैव साध्या देवगणास्तथा ।

मरुत्वन्तश्च सहिता भास्वन्तो हेममालिनः ॥ ७ ॥

एते सानुचराः सर्वे दिव्यरूपाः स्वलंकृताः ।

उपासते महात्मानं देवराजमरिंदमम् ॥ ८ ॥

सिद्ध, देवर्षि, साध्यदेवगण तथा मरुत्वान्- ये सभी सुवर्णमालाओंसे सुशोभित हो तेजस्वी रूप धारण किये एक साथ उस दिव्य सभामें बैठकर शत्रुदमन महामना देवराज इन्द्रकी उपासना करते हैं । वे सभी देवता अपने अनुचरों ( सेवकों ) के साथ वहाँ विराजमान होते हैं । वे दिव्यरूपधारी होनेके साथ ही उत्तमोत्तम अलंकारोंसे अलंकृत रहते हैं ॥ ७-८ ॥

तथा देवर्षयः सर्वे पार्थ शक्रमुपासते ।

अमला धूतपाप्मानो दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ ९ ॥

कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार जिनके पाप धुल गये हैं, वे अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले सभी निर्मल देवर्षि वहाँ इन्द्रकी उपासना करते हैं ॥ ९ ॥

तेजस्विनः सोमसुतो विशोका विगतज्वराः ।

वे देवर्षिगण तेजस्वी, सोमयाग करनेवाले तथा शोक और चिन्तासे शून्य हैं ॥ ९ ३ ॥

पराशरः पर्वतश्च तथा सावर्णिगालवौ ॥ १० ॥

शङ्खश्च लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनिः ।

दुर्वासाः क्रोधनः श्येनस्तथा दीर्घतमा मुनिः ॥ ११ ॥

पवित्रपाणिः सावर्णिर्याज्ञवल्क्योऽथ भालुकिः ।

उद्दालकः श्वेतकेतुस्ताण्ड्यो भाण्डायनिस्तथा ॥ १२ ॥

हविष्मांश्च गरिष्ठश्च हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः ।

हृद्यश्चोदरशाण्डिल्यः पाराशर्यः कृषीवलः ॥ १३ ॥

वातस्कन्धो विशाखश्च विधाता काल एव च ।

करालदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्बुरुः ॥ १४ ॥

अयोनिजा योनिजाश्च वायुभक्षा हुताशिनः ।

ईशानं सर्वलोकस्य वज्रिणं समुपासते ॥ १५ ॥

पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय ), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्, गरिष्ठ, राजा हरिश्चन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु — ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य-

पृष्ठ 1657

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1657 का मूल पृष्ठ
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पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं ॥ १०–१५ ॥ सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः शमीकःकः सत्यवाक् चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ॥ १६ ॥

मेधातिथिर्वामदेवः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।

मरुत्तश्च मरीचिश्च स्थाणुश्चात्र महातपाः ॥ १७ ॥

कक्षीवान् गौतमस्तार्क्ष्यस्तथा वैश्वानरो मुनिः ( षडर्तुः कवषो धूम्रो रैभ्यो नलपरावसू । स्वस्त्यात्रेयो जरत्कारुः कहोलः काश्यपस्तथा । विभाण्डकर्ष्यशृङ्गौ च उन्मुखो विमुखस्तथा ॥ ) मुनिः कालकवृक्षीय आश्राव्योऽथ हिरण्मयः ॥ १८ ॥

संवर्ती देवहव्यश्च विष्वक्सेनश्च वीर्यवान् । ( कण्वः कात्यायनो राजन् गार्ग्यः कौशिक एव च । ) दिव्या आपस्तथौषध्यः श्रद्धा मेधा सरस्वती ॥ १ ९ ॥

अर्थो धर्मश्च कामश्च विद्युतश्चैव पाण्डव ।

जलवाहस्तथा मेघा वायवः स्तनयित्नवः ॥ २० ॥

प्राची दिग्र यज्ञवाहाश्च पावकाः सप्तविंशतिः ।

अग्नीषोमौ तथेन्द्राग्नी मित्रश्च सवितार्यमा ॥ २१ ॥

भगो विश्वे च साध्याश्च गुरुः शुक्रस्तथैव च ।

विश्वावसुश्चित्रसेनः सुमनस्तरुणस्तथा ॥ २२ ॥

यज्ञाश्च दक्षिणाश्चैवं ग्रहास्ताराश्च भारत ।

यज्ञवाहश्च ये मन्त्राः सर्वे तत्र समासते ॥ २३ ॥

भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत्, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक, * सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र— ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं ॥ १६–२३ ॥

पृष्ठ 1658

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तथैवाप्सरसो राजन् गन्धर्वाश्च मनोरमाः ।

नृत्यवादित्रगीतैश्च हास्यैश्च विविधैरपि ॥ २४ ॥

रमयन्ति स्म नृपते देवराजं शतक्रतुम् । राजन्! इसी प्रकार मनोहर अप्सराएँ तथा सुन्दर गन्धर्व नृत्य, वाद्य, गीत एवं नाना प्रकारके हास्योंद्वारा देवराज इन्द्रका मनोरंजन करते हैं ॥ २४ ॥

स्तुतिभिर्मङ्गलैश्चैव स्तुवन्तः कर्मभिस्तथा ॥ २५ ॥

विक्रमैश्च महात्मानं बलवृत्रनिषूदनम् । इतना ही नहीं, वे स्तुति, मंगलपाठ और पराक्रम- सूचक कर्मोंके गायनद्वारा बल और वृत्रनामक असुरोंके नाशक महात्मा इन्द्रका स्तवन करते हैं ॥ २५३ ॥

ब्रह्मराजर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥ २६ ॥

विमानैर्विविधैर्दिव्यैर्दीप्यमाना इवाग्नयः ।

स्रग्विणो भूषिताः सर्वे यान्ति चायान्ति चापरे ॥ २७ ॥

ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा सम्पूर्ण देवर्षि माला पहने एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो, नाना प्रकारके दिव्य विमानोंद्वारा अग्निके समान देदीप्यमान होते हुए वहाँ आते - जाते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥

बृहस्पतिश्च शुक्रश्च नित्यमास्तां हि तत्र वै ।

एते चान्ये च बहवो महात्मानो यतव्रताः ॥ २८ ॥

विमानैश्चन्द्रसंकाशैः सोमवत्प्रियदर्शनाः ।

ब्रह्मणः सदृशा राजन् भृगुः सप्तर्षयस्तथा ॥ २ ९ ॥

बृहस्पति और शुक्र वहाँ नित्य विराजते हैं । ये तथा और भी बहुत - से संयमी महात्मा जिनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्रिय है, चन्द्रमाकी भाँति चमकीले विमानोंद्वारा वहाँ उपस्थित होते हैं । राजन्! भृगु और सप्तर्षि, जो साक्षात् ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली हैं, ये भी इन्द्र- सभाकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ २८-२९ ॥

एषा सभा मया राजन् दृष्टा पुष्करमालिनी ।

शतक्रतोर्महाबाहो याम्यामपि सभां शृणु ॥ ३० ॥

महाबाहु नरेश! शतक्रतु इन्द्रकी यह कमल-मालाओंसे सुशोभित सभा मैंने अपनी आँखों देखी है । अब यमराजकी सभाका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकसभाख्यानपर्वणि इन्द्रसभावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें इन्द्रसभा- वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1659

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पृष्ठ 1660

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अष्टमोऽध्यायः यमराजकी सभाका वर्णन नारद उवाच

कथयिष्ये सभां याम्यां युधिष्ठिर निबोध ताम् ।

वैवस्वतस्य यां पार्थ विश्वकर्मा चकार ह ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं –कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! अब मैं सूर्यपुत्र यमकी सभाका वर्णन करता हूँ, सुनो । उसकी रचना भी विश्वकर्माने ही की है ॥ १ ॥

तैजसी सा सभा राजन् बभूव शतयोजना ।

विस्तारायामसम्पन्ना भूयसी चापि पाण्डव ॥ २ ॥

राजन्! वह तेजोमयी विशाल सभा लम्बाई और चौड़ाईमें भी सौ योजन है तथा पाण्डुनन्दन! सम्भव है, इससे भी कुछ बड़ी हो ॥ २ ॥

अर्कप्रकाशा भ्राजिष्णुः सर्वतः कामरूपिणी ।

नातिशीता न चात्युष्णा मनसश्च प्रहर्षिणी ॥ ३ ॥

उसका प्रकाश सूर्यके समान है । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वह सभा सब ओरसे प्रकाशित होती है । वह न तो अधिक शीतल है, न अधिक गर्म । मनको अत्यन्त आनन्द देनेवाली है ॥ ३ ॥

न शोको न जरा तस्यां क्षुत्पिपासे न चाप्रियम् ।

न च दैन्यं क्लमो वापि प्रतिकूलं न चाप्युत ॥ ४ ॥

उसके भीतर न शोक है, न जीर्णता; न भूख लगती है, न प्यास । वहाँ कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटित होती । दीनता, थकावट अथवा प्रतिकूलताका तो वहाँ नाम भी नहीं है ॥ ४ ॥

सर्वे कामाः स्थितास्तस्यां ये दिव्या ये च मानुषाः ।

सारवच्च प्रभूतं च भक्ष्यं भोज्यमरिंदम ॥५ ॥

शत्रुदमन! वहाँ दिव्य और मानुष, सभी प्रकारके भोग उपस्थित रहते हैं । सरस एवं स्वादिष्ठ भक्ष्य - भोज्य पदार्थ प्रचुर मात्रामें संचित रहते हैं ॥ ५ ॥

लेह्यं चोष्यं च पेयं च हृद्यं स्वादु मनोहरम् ।

पुण्यगन्धाः स्रजस्तस्य नित्यं कामफला द्रुमाः ॥ ६ ॥

इसके सिवा चाटनेयोग्य, चूसनेयोग्य, पीनेयोग्य तथा हृदयको प्रिय लगनेवाली और भी स्वादिष्ठ एवं मनोहर वस्तुएँ वहाँ सदा प्रस्तुत रहती हैं। उस सभामें पवित्र सुगन्ध फैलानेवाली पुष्प-मालाएँ और सदा इच्छानुसार फल देनेवाले वृक्ष लहलहाते रहते हैं ॥ ६ ॥