श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1701–1710

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1701–1710

पृष्ठ 1701

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वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः ।

पौण्ड्रको वासुदेवेति योऽसौ लोकेऽभिविश्रुतः ॥ २० ॥

जिसे मैंने पहले मारा नहीं, उपेक्षावश छोड़ रखा है, जिसकी बुद्धि बड़ी खोटी है, जो चेदिदेशमें पुरुषोत्तम समझा जाता है, इस जगत्में जो अपने - आपको पुरुषोतम ही कहकर बताया करता है और मोहवश सदा मेरे शंख-चक्र आदि चिह्नोंको धारण करता है; वंग, पुण्ड्र तथा किरातदेशका जो राजा है तथा लोकमें वासुदेवके नामसे जिसकी प्रसिद्धि हो रही है, वह बलवान् राजा पौण्ड्रक भी जरासंधसे ही मिला हुआ है ॥ १८–२० ॥

चतुर्थभाग् महाराज भोज इन्द्रसखो बली ।

विद्याबलाद् यो व्यजयत् सपाण्ड्यक्रथकैशिकान् ॥ २१ ॥

भ्राता यस्याकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत् ।

स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा ॥ २२ ॥

राजन्! जो पृथ्वीके एक चौथाई भागके स्वामी हैं, इन्द्रके सखा हैं, बलवान् हैं, जिन्होंने अस्त्र- विद्याके बलसे पाण्ड्य, क्रथ और कैशिक देशोंपर विजय पायी है, जिनका भाई आकृति जमदग्निनन्दन परशुरामके समान शौर्यसम्पन्न है, वे भोजवंशी शत्रुहन्ता राजा भीष्मक ( मेरे श्वशुर होते हुए ) भी मगधराज जरासंधके भक्त हैं ॥ २१-२२ ॥

प्रियाण्याचरतः प्रह्वान् सदा सम्बन्धिनस्ततः ।

भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः ॥ २३ ॥

हम सदा उनका प्रिय करते रहते हैं, उनके प्रति नम्रता दिखाते हैं और उनके सगे-सम्बन्धी हैं; तो भी वे हम- जैसे अपने भक्तोंको तो नहीं अपनाते हैं और हमारे शत्रुओंसे मिलते - जुलते हैं ॥ २३ ॥

न कुलं स बलं राजन्नभ्यजानात् तथाऽऽत्मनः ।

पश्यमानो यशो दीप्तं जरासंधमुपस्थितः ॥ २४ ॥

राजन्! वे अपने बल और कुलकी ओर भी ध्यान नहीं देते, केवल जरासंधके उज्ज्वल यशकी ओर देखकर उसके आश्रित बन गये हैं ॥ २४ ॥

उदीच्याश्च तथा भोजाः कुलान्यष्टादश प्रभो ।

जरासंधभयादेव प्रतीचीं दिशमास्थिताः ॥ २५ ॥

प्रभो! इसी प्रकार उत्तर दिशामें निवास करनेवाले भोजवंशियोंके अठारह कुल जरासंधके ही भयसे भागकर पश्चिम दिशामें रहने लगे हैं ॥ २५ ॥

शूरसेना भद्रकारा बोधाः शाल्वाः पटच्चराः ।

सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह ॥ २६ ॥

शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह ।

दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोशलाः ॥ २७ ॥

तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः ।

पृष्ठ 1702

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मत्स्याः संन्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ २८ ॥

शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व, पटच्चर, सुस्थल, सुकुट्ट, कुलिन्द, कुन्ति तथा शाल्वायन आदि राजा भी अपने भाइयों तथा सेवकोंके साथ दक्षिण दिशामें भाग गये हैं । जो लोग दक्षिण पंचाल एवं पूर्वी कुन्तिप्रदेशमें रहते थे, वे सभी क्षत्रिय तथा कोशल, मत्स्य, संन्यस्तपाद आदि राजपूत भी जरासंधके भयसे पीड़ित हो उत्तर दिशाको छोड़कर दक्षिण दिशाका ही आश्रय ले चुके हैं ॥ २६–२८ ॥

तथैव सर्वपञ्चाला जरासंधभयार्दिताः ।

स्वराज्यं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतो दिशम् ॥ २ ९ ॥

उसी प्रकार समस्त पंचालदेशीय क्षत्रिय जरासंधके भयसे दुःखी हो अपना राज्य छोड़कर चारों दिशाओंमें भाग गये हैं ॥ २ ९ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य कंसो निर्मथ्य यादवान् ।

बार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद् वृथामतिः ॥ ३० ॥

कुछ समय पहलेकी बात है, व्यर्थ बुद्धिवाले कंसने समस्त यादवोंको कुचलकर जरासंधकी दो पुत्रियोंके साथ विवाह किया ॥ ३० ॥

अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽबले ।

बलेन तेन स्वज्ञातीनभिभूय वृथामतिः ॥ ३१ ॥

श्रैष्ठ्यं प्राप्तः स तस्यासीदतीवापनयो महान् । उनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति । वे दोनों अबलाएँ सहदेवकी छोटी बहिनें थीं । निःसार बुद्धिवाला कंस जरासंधके ही बलसे अपने जाति- भाइयोंको अपमानित करके सबका

प्रधान बन बैठा था । यह उसका बहुत बड़ा अत्याचार था ॥ ३१३ ॥

भोजराजन्यवृद्धैश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना ॥ ३२ ॥

ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता । उस दुरात्मासे पीड़ित हो भोजराजवंशके बड़े- बूढ़े लोगोंने जाति- भाइयोंकी रक्षाके लिये हमसे प्रार्थना की ॥ ३२ ॥

दत्त्वाक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा ॥ ३३ ॥

संकर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम् ।

हतौ कंससुनामानौ मया रामेण चाप्युत ॥ ३४ ॥

तब मैंने आहुककी पुत्री सुतनुका विवाह अक्रूरसे करा दिया और बलरामजीको साथी बनाकर जाति- भाइयोंका कार्य सिद्ध किया। मैंने और बलरामजीने कंस और सुनामाको मार डाला ॥ ३३-३४ ॥

भये तु समतिक्रान्ते जरासंधे समुद्यते ।

मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन् कुलैरष्टादशावरैः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1703

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इससे कंसका भय तो जाता रहा; परंतु जरासंध कुपित हो हमसे बदला लेनेको उद्यत हो गया । राजन्! उस समय भोजवंशके अठारह कुलों ( मन्त्री -पुरोहित आदि ) -ने मिलकर इस प्रकार विचार- विमर्श किया— ॥ ३५ ॥

अनारभन्तो निघ्नन्तो महास्त्रैः शत्रुघातिभिः ।

न हन्यामो वयं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्बलम् ॥ ३६ ॥

' यदि हमलोग शत्रुओंका अन्त करनेवाले बड़े- बड़े अस्त्रोंद्वारा निरन्तर आघात करते रहें, तो भी तीन सौ वर्षोंमें भी उसकी सेनाका नाश नहीं कर सकते ॥ ३६ ॥

तस्य ह्यमरसंकाशौ बलेन बलिनां वरौ ।

नामभ्यां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ ॥ ३७ ॥

' क्योंकि बलवानोंमें श्रेष्ठ हंस और डिम्भक उसके सहायक हैं, जो बलमें देवताओंके समान हैं । उन दोनोंको यह वरदान प्राप्त है कि वे किसी अस्त्र- शस्त्रसे नहीं मारे जा सकते ' ॥ ३७ ॥

तावुभौ सहितौ वीरौ जरासंधश्च वीर्यवान् ।

त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥ ३८ ॥

भैया युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि एक साथ रहनेवाले वे दोनों वीर हंस और डिम्भक तथा पराक्रमी जरासंध – ये तीनों मिलकर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त थे ॥ ३८ ॥

न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः ।

तथैव तेषामासीच्च बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ॥ ३ ९ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ नरेश! यह केवल मेरा ही मत नहीं है, दूसरे भी जितने भूमिपाल हैं, उन सबका यही विचार रहा है ॥ ३ ९ ॥

अथ हंस इति ख्यातः कश्चिदासीन्महान् नृपः ।

रामेण स हतस्तत्र संग्रामेऽष्टादशावरे ॥ ४० ॥

जरासंधके साथ जब सत्रहवीं बार युद्ध हो रहा था, उसमें हंस नामसे प्रसिद्ध कोई दूसरा राजा भी लड़ने आया था, वह उस युद्धमें बलरामजीके हाथसे मारा गया ॥ ४० ॥

हतो हंस इति प्रोक्तमथ केनापि भारत ।

तच्छ्रुत्वा'डिम्भको` राजन् यमुनाम्भस्यमज्जत ॥ ४१ ॥

भारत! यह देख किसी सैनिकने चिल्लाकर कहा- ' हंस मारा गया । ' राजन्! उसकी वह बात कानमें पड़ते ही डिम्भक अपने भाईको मरा हुआ जान यमुनाजीमें कूद पड़ा ॥ ४१ ॥

विना हंसेन लोकेऽस्मिन् नाहं जीवितुमुत्सहे ।

इत्येतां मतिमास्थाय डिम्भको निधनं गतः ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 1704

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‘ मैं हंसके बिना इस संसारमें जीवित नहीं रह सकता । ' ऐसा निश्चय करके डिम्भकने अपनी जान दे दी ॥ ४२

तथा तु डिम्भकं श्रुत्वा हंसः परपुरंजयः ।

प्रपेदे यमुनामेव सोऽपि तस्यां न्यमज्जत ॥ ४३ ॥

डिम्भककी इस प्रकार मृत्यु हुई सुनकर शत्रु- नगरीको जीतनेवाला हंस भी भाईके शोकसे यमुनामें ही कूद पड़ा और उसीमें डूबकर मर गया ॥ ४३ ॥

तौ स राजा जरासंधः श्रुत्वा च निधनं गतौ ।

पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ ॥ ४४ ॥

भरतश्रेष्ठ! उन दोनोंकी मृत्यु हुई सुनकर राजा जरासंध हताश हो गया और उत्साहशून्य हृदयसे अपनी राजधानीको लौट गया ॥ ४४ ॥

ततो वयममित्रघ्न तस्मिन् प्रतिगते नृपे ।

पुनरानन्दिनः सर्वे मथुरायां वसामहे ॥ ४५ ॥

शत्रुसूदन! उसके इस प्रकार लौट जानेपर हम सब लोग पुनः मथुरामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४५ ॥

यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना ।

कंसभार्या जरासंधं दुहिता मागधं नृपम् ।

चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता ॥ ४६ ॥

पतिघ्नं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिंदम । शत्रुदमन राजेन्द्र! फिर जब पतिके शोकसे पीड़ित हुई कंसकी कमललोचना भार्या अपने पिता मगधनरेश जरासंधके पास जाकर उसे बार- बार उकसाने लगी कि मेरे पतिके घातकको मार डालो ॥ ४६३ ॥

ततो वयं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् ॥ ४७ ॥

संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप । तब हमलोग भी पहले की हुई गुप्त मन्त्रणाको स्मरण करके उदास हो गये । महाराज! फिर तो हम मथुरासे भाग खड़े हुए ॥ ४७३ ॥

पृथक्त्वेन महाराज संक्षिप्य महतीं श्रियम् ॥ ४८ ॥

पलायामो भयात् तस्य ससुतज्ञातिबान्धवाः ।

इति संचिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः ॥ ४ ९ ॥

राजन्! उस समय हमने यही निश्चय किया कि ' यहाँकी विशाल सम्पत्तिको पृथक्-पृथक् बाँटकर थोड़ी - थोड़ी करके पुत्र एवं भाई- बन्धुओंके साथ शत्रुके भयसे भाग चलें । ’ ऐसा विचार करके हम सबने पश्चिम दिशाकी शरण ली ॥ ४८-४९ ॥

कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् ।

ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप ॥ ५० ॥

पृष्ठ 1705

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और राजन्! रैवतक पर्वतसे सुशोभित रमणीय कुशस्थली पुरीमें जाकर हमलोग निवास करने लगे ॥ ५० ॥

तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम् ।

स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः ॥ ५१ ॥

हमने कुशस्थली दुर्गकी ऐसी मरम्मत करायी कि देवताओंके लिये भी उसमें प्रवेश करना कठिन हो गया । अब तो उस दुर्गमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं, फिर वृष्णिकुलके महारथियोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ५१ ॥

तस्यां वयममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभयाः ।

आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च ॥ ५२ ॥

माधवाः कुरुशार्दूल परां मुदमवाप्नुवन् । शत्रुसूदन! हमलोग द्वारकापुरीमें सब ओरसे निर्भय होकर रहते हैं । कुरुश्रेष्ठ! गिरिराज रैवतककी दुर्गमताका विचार करके अपनेको जरासंधके संकटसे पार हुआ मानकर हम सभी मधुवंशियोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई है ॥ ५२ ॥

एवं वयं जरासंधादभितः कृतकिल्बिषाः ॥ ५३ ॥

सामर्थ्यवन्तः सम्बन्धाद् गोमन्तं समुपाश्रिताः । राजन्! हम जरासंधके अपराधी हैं, अतः शक्तिशाली होते हुए भी जिस स्थानसे हमारा सम्बन्ध था, उसे छोड़कर गोमान् ( रैवतक) पर्वतके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ५३३ ॥

त्रियोजनायतं सद्म त्रिस्कन्धं योजनावधि ॥ ५४ ॥

योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम् ।

अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः ॥ ५५ ॥

रैवतकी दुर्गकी लम्बाई तीन योजनकी है । एक-एक योजनपर सेनाओंके तीन- तीन दलोंकी छावनी है । प्रत्येक योजनके अन्तमें सौ -सौ द्वार हैं, जो सेनाओंसे सुरक्षित हैं । वीरोंका पराक्रम ही उस गढ़का प्रधान फाटक है। युद्धमें उन्मत्त होकर पराक्रम दिखानेवाले अठारह यादववंशी क्षत्रियोंसे वह दुर्ग सुरक्षित है ॥ ५४-५५ ॥

अष्टादश सहस्राणि भ्रातॄणां सन्ति नः कुले ।

आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः ॥ ५६ ॥

हमारे कुलमें अठारह हजार भाई हैं । आहुकके सौ पुत्र हैं, जिनमेंसे एक-एक देवताओंके समान पराक्रमी हैं ॥ ५६ ॥

चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः ।

अहं च रौहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च ॥ ५७ ॥

एवमतिरथाः सप्त राजन्नन्यान् निबोध मे ।

कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समितिंजयः ॥ ५८ ॥

कङ्कः शङ्कुश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः ।

पृष्ठ 1706

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पुत्रौ चान्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश ॥ ५ ९ ॥ अपने भाईके साथ चारुदेष्ण, चक्रदेव, सात्यकि, मैं, बलरामजी, साम्ब और प्रद्युम्न-ये सात अतिरथी वीर हैं । राजन्! अब मुझसे दूसरोंका परिचय सुनिये । कृतवर्मा, अनाधृष्टि, समीक, समितिंजय, कंक, शंकु और कुन्ति –ये सात महारथी हैं । अन्धक भोजके दो पुत्र और बूढ़े राजा उग्रसेनको भी गिन लेनेपर उन महारथियोंकी संख्या दस हो जाती है ॥ ५७ –५ ९ ॥

वज्रसंहनना वीरा वीर्यवन्तो महारथाः ।

स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिमध्ये व्यवस्थिताः ॥ ६० ॥

ये सभी वीर वज्रके समान सुदृढ़ शरीरवाले, पराक्रमी और महारथी हैं, जो मध्यदेशका स्मरण करते हुए वृष्णिकुलमें निवास करते हैं ॥ ६० ॥

( वितद्रुर्झल्लिबभ्रू च उद्धवोऽथ विदूरथः ।

वसुदेवोग्रसेनौ च सप्तैते मन्त्रिपुङ्गवाः ॥

प्रसेनजिच्च यमलो राजराजगुणान्वितः । स्यमन्तको मणिर्यस्य रुक्मं निस्रवते बहु || ) वितद्रु, झल्लि, बभ्रु, उद्धव, विदूरथ, वसुदेव तथा उग्रसेन –ये सात मुख्य मन्त्री हैं । प्रसेनजित् और सत्राजित्- ये दोनों जुड़वें बन्धु कुबेरोपम सद्गुणोंसे सुशोभित हैं । उनके पास जो ‘ स्यमन्तक ' नामक मणि है, उससे प्रचुरमात्रामें सुवर्ण झरता रहता है ।

स त्वं सम्राड्गुणैर्युक्तः सदा भरतसत्तम ।

क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत ॥ ६१ ॥

भरतवंशशिरोमणे! आप सदा ही सम्राट्के गुणोंसे युक्त हैं । अतः भारत! आपको क्षत्रियसमाजमें अपनेको सम्राट् बना लेना चाहिये ॥ ६१ ॥

( दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम् ।

कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम् ॥

एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च ।

एतानजित्वा संग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम् ॥

अथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः । ) दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शिशुपाल, रुक्मी, धनुर्धर एकलव्य, द्रुम, श्वेत, शैब्य तथा शकुनि - इन सब वीरोंको संग्राममें जीते बिना आप कैसे वह यज्ञ कर सकते हैं? परंतु ये नरश्रेष्ठ आपका गौरव मानकर युद्ध नहीं करेंगे ।

न तु शक्यं जरासंधे जीवमाने महाबले ।

राजसूयस्त्वयावाप्तुमेषा राजन् मतिर्मम ॥ ६२ ॥

किंतु राजन्! मेरी सम्मति यह है कि जबतक महाबली जरासंध जीवित है, तबतक आप राजसूययज्ञ पूर्ण नहीं कर सकते ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 1707

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तेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिव्रजे ।

कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः ॥ ६३ ॥

उसने सब राजाओंको जीतकर गिरिव्रजमें इस प्रकार कैद कर रखा है, मानो सिंहने किसी महान् पर्वतकी गुफामें बड़े - बड़े गजराजोंको रोक रखा हो ॥ ६३ ॥

स हि राजा जरासंधो यियक्षुर्वसुधाधिपैः ।

महादेवं महात्मानमुमापतिमरिंदम ॥ ६४ ॥

आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवाः ।

प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम ॥ ६५ ॥

शत्रुदमन! राजा जरासंधने उमावल्लभ महात्मा महादेवजीकी उग्र तपस्याके द्वारा आराधना करके एक विशेष प्रकारकी शक्ति प्राप्त कर ली है; इसीलिये वे सभी राजा उससे परास्त हो गये हैं । वह राजाओंकी बलि देकर एक यज्ञ करना चाहता है । नृपश्रेष्ठ! वह अपनी प्रतिज्ञा प्रायः पूरी कर चुका है ॥ ६४-६५ ॥

स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान् पृतनागतान् ।

पुरमानीय बद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम् ॥ ६६ ॥

क्योंकि उसने सेनाके साथ आये हुए राजाओंको एक- एक करके जीता है और अपनी राजधानीमें लाकर उन्हें कैद करके राजाओंका बहुत बड़ा समुदाय एकत्र कर लिया ॥ ६६ ॥

वयं चैव महाराज जरासंधभयात् तदा ।

मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६७ ॥

महाराज! उस समय हम भी जरासंधके भयसे ही पीड़ित हो मथुराको छोड़कर द्वारकापुरीमें चले गये ( और अबतक वहीं निवास करते हैं ) ॥ ६७ ॥

यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि ।

यतस्व तेषां मोक्षाय जरासंधवधाय च ॥ ६८ ॥

राजन्! यदि आप इस यज्ञको पूर्णरूपसे सम्पन्न करना चाहते हैं तो उन कैदी राजाओंको छुड़ाने और जरासंधको मारनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६८ ॥

समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन ।

राजसूयश्च कार्त्स्न्येन कर्तुं मतिमतां वर ॥ ६ ९ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना राजसूययज्ञका आयोजन पूर्णरूपसे सफल न हो सकेगा ॥ ६ ९ ॥ (जरासंधवधोपायश्चिन्त्यतां भरतर्षभ । तस्मिन् जिते जितं सर्वं सकलं पार्थिवं बलम् ॥ ) भरतश्रेष्ठ! आप जरासंधके वधका उपाय सोचिये । उसके जीत लिये जानेपर समस्त भूपालोंकी सेनाओंपर विजय प्राप्त हो जायगी ।

पृष्ठ 1708

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इत्येषा मे मती राजन् यथा वा मन्यसेऽनघ ।

एवंगते ममाचक्ष्व स्वयं निश्चित्य हेतुभिः ॥ ७० ॥

निष्पाप नरेश! मेरा मत तो यही है, फिर आप जैसा उचित समझें, करें । ऐसी दशामें स्वयं हेतु और युक्तियोंद्वारा कुछ निश्चय करके मुझे बताइये ॥ ७० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि कृष्णवाक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें श्रीकृष्णवाक्य- विषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ७५३ श्लोक हैं ) Fard

पृष्ठ 1709

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पञ्चदशोऽध्यायः जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत युधिष्ठिर उवाच

उक्तं त्वया बुद्धिमता यन्नान्यो वक्तुमर्हति ।

संशयानां हि निर्मोक्ता त्वन्नान्यो विद्यते भुवि ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले – श्रीकृष्ण! आप परम बुद्धिमान् हैं, आपने जैसी बात कही है, वैसी दूसरा कोई नहीं कह सकता । इस पृथ्वीपर आपके सिवा समस्त संशयोंको मिटानेवाला और कोई नहीं है ॥ १ ॥

गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियंकराः ।

न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट्छब्दो हि कृच्छ्रभाक् ॥ २ ॥

आजकल तो घर- घरमें राजा हैं और सभी अपना- अपना प्रिय कार्य करते हैं, परंतु वे सम्राट्पदको नहीं प्राप्त कर सके; क्योंकि सम्राट्की पदवी बड़ी कठिनाईसे मिलती है ॥ २ ॥

कथं परानुभावज्ञः स्वं प्रशंसितुमर्हति ।

परेण समवेतस्तु यः प्रशस्यः स पूज्यते ॥ ३ ॥

जो दूसरोंके प्रभावको जानता है, वह अपनी प्रशंसा कैसे कर सकता है? दूसरेके साथ मुकाबला होनेपर भी जो प्रशंसनीय बना रह जाय, उसीकी सर्वत्र पूजा होती है ॥ ३ ॥

विशाला बहुला भूमिर्बहुरत्नसमाचिता ।

दूरं गत्वा विजानाति श्रेयो वृष्णिकुलोद्वह ॥ ४ ॥

वृष्णिकुलभूषण! यह पृथ्वी बहुत विशाल है, अनेक प्रकारके रत्नोंसे भरी हुई है, मनुष्य दूर जाकर ( सत्पुरुषोंका संग करके ) यह समझ पाता है कि अपना कल्याण कैसे होगा ॥ ४ ॥

शममेव परं मन्ये शमात् क्षेमं भवेन्मम ।

आरम्भे पारमेष्ठ्ये 'तुतु न प्राप्यमिति मे मतिः ॥ ५ ॥

मैं तो मन और इन्द्रियोंके संयमको ही सबसे उत्तम मानता हूँ, उसीसे मेरा भला होगा । राजसूय - यज्ञका आरम्भ करनेपर भी उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोककी प्राप्ति अपने लिये असम्भव है — मेरी तो यही धारणा है ॥ ५ ॥

एवमेते हि जानन्ति कुले जाता मनस्विनः ।

कश्चित् कदाचिदेतेषां भवेच्छ्रेष्ठो जनार्दन ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1710

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जनार्दन! ये उत्तम कुलमें उत्पन्न मनस्वी सभासद् ऐसा जानते हैं कि इनमें कभी कोई श्रेष्ठ ( सर्वविजयी ) भी हो सकता है ॥ ६ ॥

वयं चैव महाभाग जरासंधभयात् तदा ।

शङ्किताः स्म महाभाग दौरात्म्यात् तस्य चानघ ॥ ७ ॥

अहं हि तव दुर्धर्ष भुजवीर्याश्रयः प्रभो ।

नात्मानं बलिनं मन्ये त्वयि तस्माद् विशङ्किते ॥ ८ ॥

पापरहित महाभाग! हम भी जरासंधके भयसे तथा उसकी दुष्टतासे सदा शंकित रहते हैं । किसीसे परास्त न होनेवाले प्रभो! मैं तो आपके ही बाहुबलका भरोसा रखता हूँ । जब आप ही जरासंधसे शंकित हैं, तब तो मैं अपनेको उसके सामने कदापि बलवान् नहीं मान सकता ॥ ७-८ ॥ त्वत्सकाशाच्च रामाच्च भीमसेनाच्च माधव ।

अर्जुनाद् वा महाबाहो हन्तुं शक्यो न वेति वै ।

एवं जानन् हि वार्ष्णेय विमृशामि पुनः पुनः ॥ ९ ॥

महाबाहु माधव! आपसे, बलरामजीसे, भीमसेनसे अथवा अर्जुनसे वह मारा जा सकता है या नहीं? वार्ष्णेय! ( आपकी शक्ति अनन्त है, ) यह जानते हुए भी मैं बार- बार इसी बातपर विचार करता रहता हूँ ॥ ९ ॥

त्वं मे प्रमाणभूतोऽसि सर्वकार्येषु केशव ।

तच्छ्रुत्वा चाब्रवीद् भीमो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ १० ॥

केशव! मेरे लिये सभी कार्योंमें आप ही प्रमाण हैं । युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर बोलनेमें चतुर भीमसेनने यह वचन कहा ॥ १० ॥

भीम उवाच

अनारम्भपरो राजा वल्मीक इव सीदति ।

दुर्बलश्चानुपायेन बलिनं योऽधितिष्ठति ॥ ११ ॥

भीमसेन बोले – महाराज! जो राजा उद्योग नहीं करता तथा जो दुर्बल होकर भी उचित उपाय अथवा युक्तिसे काम न लेकर किसी बलवान्से भिड़ जाता है, वे दोनों दीमकोंके बनाये हुए मिट्टीके ढेरके समान नष्ट हो जाते हैं ॥ ११ ॥

अतन्द्रितश्च प्रायेण दुर्बलो बलिनं रिपुम् ।

जयेत् सम्यक् प्रयोगेण नीत्यार्थानात्मनो हितान् ॥ १२ ॥

परंतु जो आलस्य त्यागकर उत्तम युक्ति एवं नीतिसे काम लेता है, वह दुर्बल होनेपर भी बलवान् शत्रुको जीत लेता है और अपने लिये हितकर एवं अभीष्ट अर्थ प्राप्त करता है ॥ १२ ॥

कृष्णे नयो मयि बलं जयः पार्थे धनंजये ।