श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1711–1720

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1711–1720

पृष्ठ 1711

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मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नयः ॥ १३ ॥

श्रीकृष्ण नीति है, मुझमें बल है और अर्जुनमें विजयकी शक्ति है । हम तीनों मिलकर मगधराज जरासंधके वधका कार्य पूरा कर लेंगे; ठीक उसी तरह, जैसे तीनों अग्नियाँ यज्ञकी सिद्धि कर देती हैं ॥ १३ ॥

(त्वबुद्धिबलमाश्रित्य सर्व प्राप्स्यति धर्मराट् । जयोऽस्माकं हि गोविन्द येषां नाथो भवान् सदा ॥ ) गोविन्द! आपके बुद्धिबलका आश्रय लेकर धर्मराज युधिष्ठिर सब कुछ पा सकते हैं । जिनकी सदा रक्षा करनेवाले आप हैं, उनकी - हम पाण्डवोंकी विजय निश्चित है । कृष्णउवाच

अर्थानारभते बालो नानुबन्धमवेक्षते ।

तस्मादरिं न मृष्यन्ति बालमर्थपरायणम् ॥ १४ ॥

जित्वा जय्यान् यौवनाश्विः पालनाच्च भगीरथः ।

कार्तवीर्यस्तपोवीर्याद् बलात् तु भरतो विभुः ॥ १५ ॥

श्रीकृष्णने कहा — राजन्! अज्ञानी मनुष्य बड़े - बड़े कार्योंका आरम्भ तो कर देता है, परंतु उनके परिणामकी ओर नहीं देखता । अतः केवल अपने स्वार्थसाधनमें लगे हुए विवेकशून्य शत्रुके व्यवहारको वीर पुरुष नहीं सह सकते । युवनाश्वके पुत्र मान्धाताने जीतनेयोग्य शत्रुओंको जीतकर सम्राट्का पद प्राप्त किया था । भगीरथ प्रजाका पालन करनेसे, कार्तवीर्य ( सहस्रबाहु अर्जुन) तपोबलसे तथा राजा भरत स्वाभाविक बलसे सम्राट् हुए थे ॥ १४-१५ ॥

ऋद्धया मरुत्तस्तान् पञ्च सम्राजस्त्वनुशुश्रुम ।

साम्राज्यमिच्छतस्ते तु सर्वाकारं युधिष्ठिर ॥ १६ ॥

निग्राह्यलक्षणं प्राप्तिर्धर्मार्थनयलक्षणैः ॥ १७ ॥

इसी प्रकार राजा मरुत्त अपनी समृद्धिके प्रभावसे सम्राट् बने थे । अबतक उन पाँच सम्राटोंका ही नाम हम सुनते आ रहे हैं । युधिष्ठिर! वे मान्धाता आदि एक- एक गुणसे ही सम्राट् हो सके थे; परंतु आप तो सम्पूर्णरूपसे सम्राट्पद प्राप्त करना चाहते हैं । साम्राज्य-प्राप्तिके जो पाँच गुण- शत्रुविजय, प्रजापालन, तपःशक्ति, धन- समृद्धि और उत्तम नीति हैं, उन सबसे आप सम्पन्न हैं ॥ १६-१७ ॥ बार्हद्रथो जरासंधस्तद् विद्धि भरतर्षभ ।

न चैनमनुरुद्धयन्ते कुलान्येकशतं नृपाः ।

तस्मादिह बलादेव साम्राज्यं कुरुते हि सः ॥ १८ ॥

परंतु भरतश्रेष्ठ! आपके मार्गमें बृहद्रथका पुत्र जरासंध बाधक है, यह आपको जान लेना चाहिये । क्षत्रियोंके जो एक सौ कुल हैं, वे कभी उसका अनुसरण नहीं करते, अतः वह

पृष्ठ 1712

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बलसे ही अपना साम्राज्य स्थापित कर रहा है ॥ १८ ॥

रत्नभाजो हि राजानो जरासंधमुपासते ।

न च तुष्यति तेनापि बाल्यादनयमास्थितः ॥ १ ९ ॥

जो रत्नोंके अधिपति हैं, ऐसे राजालोग ( धन देकर) जरासंधकी उपासना करते हैं, परंतु वह उससे भी संतुष्ट नहीं होता । अपनी विवेकशून्यताके कारण अन्यायका आश्रय ले उनपर अत्याचार ही करता है ॥ १ ९ ॥

मूर्धाभिषिक्तं नृपतिं प्रधानपुरुषो बलात् ।

आदत्ते न च नो दृष्टोऽभागः पुरुषतः क्वचित् ॥ २० ॥

आजकल वह प्रधान पुरुष बनकर मूर्धाभिषिक्त राजाको बलपूर्वक बंदी बना लेता है । जिनका विधि- पूर्वक राज्यपर अभिषेक हुआ है, ऐसे पुरुषोंमेंसे कहीं किसी एकको भी हमने ऐसा नहीं देखा, जिसे उसने बलिका भाग न बना लिया हो — कैदमें न डाल रखा हो ॥ २० ॥

एवं सर्वान् वशे चक्रे जरासंधः शतावरान् ।

तं दुर्बलतरो राजा कथं पार्थ उपैष्यति ॥ २१ ॥

इस प्रकार जरासंधने लगभग सौ राजकुलोंके राजाओंमेंसे कुछको छोड़कर सबको वशमें कर लिया है । कुन्तीनन्दन! कोई अत्यन्त दुर्बल राजा उससे भिड़नेका साहस कैसे करेगा ॥ २१ ॥

प्रोक्षितानां प्रमृष्टानां राज्ञां पशुपतेर्गृहे ।

पशूनामिव का प्रीतिर्जीविते भरतर्षभ ॥ २२ ॥

भरतश्रेष्ठ! रुद्रदेवताको बलि देनेके लिये जल छिड़ककर एवं मार्जन करके शुद्ध किये हुए पशुओंकी भाँति जो पशुपतिके मन्दिरमें कैद हैं, उन राजाओंको अब अपने जीवनमें क्या प्रीति रह गयी है? ॥ २२ ॥

क्षत्रियः शस्त्रमरणो यदा भवति सत्कृतः ।

ततः स्म मागधं संख्ये प्रतिबाधेम यद् वयम् ॥ २३ ॥

क्षत्रिय जब युद्धमें अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा मारा जाता है, तब यह उसका सत्कार है; अतः हमलोग जरासंधको द्वन्द्व - युद्धमें मार डालें ॥ २३ ॥

षडशीतिः समानीताः शेषा राजंश्चतुर्दश ।

जरासंधेन राजानस्ततः क्रूरं प्रवर्त्स्यते ॥ २४ ॥

राजन्! जरासंधने सौमेंसे छियासी ( प्रतिशत ) राजाओंको तो कैद कर लिया है, केवल चौदह ( प्रतिशत ) बाकी हैं । उनको भी बंदी बनानेके पश्चात् वह क्रूर कर्ममें प्रवृत्त होगा ॥ २४ ॥

प्राप्नुयात् स यशो दीप्तं तत्र यो विघ्नमाचरेत् ।

जयेद् यश्च जरासंधं स सम्राण्नियतं भवेत् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 1713

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जो उसके इस कर्ममें विघ्न डालेगा, वह उज्ज्वल यशका भागी होगा तथा जो जरासंधको जीत लेगा, वह निश्चय ही सम्राट् होगा ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि कृष्णवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें श्रीकृष्णवाक्य-विषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1714

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षोडशोऽध्यायः जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरके उत्साहहीन होनेपर अर्जुनका उत्साहपूर्ण उद्गार युधिष्ठिर उवाच

सम्राड्गुणमभीप्सन् वै युष्मान् स्वार्थपरायणः ।

कथं प्रहिणुयां कृष्ण सोऽहं केवलसाहसात् ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले – श्रीकृष्ण! मैं सम्राट्के गुणोंको प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर स्वार्थसाधनमें तत्पर हो केवल साहसके भरोसे आपलोगोंको जरासंधके पास कैसे भेज दूँ? ॥ १ ॥

भीमार्जुनावुभौ नेत्रे मनो मन्ये जनार्दनम् ।

मनश्चक्षुर्विहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत् ॥ २ ॥

भीमसेन और अर्जुन मेरे दोनों नेत्र हैं और जनार्दन आपको मैं अपना मन मानता हूँ ।

अपने मन और नेत्रोंको खो देनेपर मेरा यह जीवन कैसा हो जायगा? ॥ २ ॥

जरासंधबलं प्राप्य दुष्पारं भीमविक्रमम् ।

यमोऽपि न विजेताऽऽजौ तत्र वः किं विचेष्टितम् ॥ ३ ॥

जरासंधकी सेनाका पार पाना कठिन है । उसका पराक्रम भयानक है । युद्धमें उस सेनाका सामना करके यमराज भी विजयी नहीं हो सकते, फिर वहाँ आपलोगोंका प्रयत्न क्या कर सकता है? ॥ ३ ॥

( कथं जित्वा पुनर्यूयमस्मान् सम्प्रति यास्यथ । )

अस्मिंस्त्वर्थान्तरे युक्तमनर्थः प्रतिपद्यते ।

तस्मान्न प्रतिपत्तिस्तु कार्या युक्ता मता मम ॥ ४ ॥

आपलोग किस प्रकार उसे जीतकर फिर हमारे पास लौट सकेंगे? यह कार्य हमारे लिये इष्ट फलके विपरीत फल देनेवाला जान पड़ता है । इसमें लगे हुए मनुष्यको निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति होती है । इसलिये अबतक हम जिसे करना चाहते थे, उस राजसूययज्ञकी ओर ध्यान देना उचित नहीं जान पड़ता ॥ ४ ॥

यथाहं विमृशाम्येकस्तत् तावच्छ्रयतां मम ।

संन्यासं रोचये साधु कार्यस्यास्य जनार्दन ।

प्रतिहन्ति मनो मेऽद्य राजसूयो दुराहरः ॥ ५ ॥

जनार्दन! इस विषयमें मैं अकेले जैसा सोचता हूँ, मेरे उस विचारको आप सुनें । मुझे तो इस कार्यको छोड़ देना ही अच्छा लगता है । राजसूयका अनुष्ठान बहुत कठिन है । अब यह

पृष्ठ 1715

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मेरे मनको निरुत्साह कर रहा है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्ये च महेषुधी ।

रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन उत्तम गाण्डीव धनुष, दो अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वजा और सभा प्राप्त कर चुके थे; इससे उत्साहित होकर वे युधिष्ठिरसे बोले ॥ ६ ॥

अर्जुन उवाच

धनुः शस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् ।

प्राप्तमेतन्मया राजन् दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ॥ ७ ॥

अर्जुनने कहा — राजन्! धनुष, शस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रेष्ठ सहायक, भूमि, यश और लकी प्राप्ति बड़ी कठिनाईसे होती है; किंतु ये सभी दुर्लभ वस्तुएँ मुझे अपनी इच्छाके अनुकूल प्राप्त हुई हैं ॥ ७ ॥

कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिष्ठिताः ।

बलेन सदृशं नास्ति वीर्यं तु मम रोचते ॥ ८ ॥

अनुभवी विद्वान् उत्तम कुलमें जन्मकी बड़ी प्रशंसा करते हैं; परंतु बलके समान वह भी नहीं है । मुझे तो बल-पराक्रम ही श्रेष्ठ जान पड़ता है ॥ ८ ॥

कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्यः किं करिष्यति ।

निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते ॥ ९ ॥

महापराक्रमी राजा कृतवीर्यके कुलमें उत्पन्न होकर भी जो स्वयं निर्बल है, वह क्या करेगा? निर्बल कुलमें जन्म लेकर भी जो बलवान् और पराक्रमी है, वही श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥

क्षत्रियः सर्वशो राजन् यस्य वृत्तिर्द्विषज्जये ।

सर्वैर्गुणैर्विहीनोऽपि वीर्यवान् हि तरेद् रिपून् ॥ १० ॥

महाराज! शत्रुओंको जीतनेमें जिसकी प्रवृत्ति हो, वही सब प्रकारसे श्रेष्ठ क्षत्रिय है । बलवान् पुरुष सब गुणोंसे हीन हो, तो भी वह शत्रुओंके संकटसे पार हो सकता है ॥ १० ॥

सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति ।

गुणीभूता गुणाः सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे ॥ ११ ॥

जो निर्बल है, वह सर्वगुणसम्पन्न होकर भी क्या करेगा? पराक्रममें सभी गुण उसके अंग बनकर रहते हैं ॥ ११ ॥

जयस्य हेतुः सिद्धिर्हि कर्म दैवं च संश्रितम् ।

संयुक्तो हि बलैः कश्चित् प्रमादान्नोपयुज्यते ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1716

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महाराज! सिद्धि ( मनोयोग ) और प्रारब्धके अनुकूल पुरुषार्थ ही विजयका हेतु है । कोई बलसे संयुक्त होनेपर भी प्रमाद करे - कर्तव्यमें मन न लगावे, तो वह अपने उद्देश्यमें सफल नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

तेन द्वारेण शत्रुभ्यः क्षीयते सबलो रिपुः ॥ १३ ॥

प्रमादरूप छिद्रके कारण बलवान् शत्रु भी अपने शत्रुओंद्वारा मारा जाता है ॥ १३ ॥

दैन्यं यथा बलवति तथा मोहो बलान्विते ।

तावुभौ नाशकौ हेतू राज्ञा त्याज्यौ जयार्थिना ॥ १४ ॥

बलवान् पुरुषमें जैसे दीनताका होना बड़ा भारी दोष है, वैसे ही बलिष्ठ पुरुषमें मोहका होना भी महान् दुर्गुण है । दीनता और मोह दोनों विनाशके कारण हैं; अतः विजय चाहनेवाले राजाके लिये वे दोनों ही त्याज्य हैं ॥ १४ ॥

जरासंधविनाशं च राज्ञां च परिरक्षणम् ।

यदि कुर्याम यज्ञार्थं किं ततः परमं भवेत् ॥ १५ ॥

यदि हम राजसूययज्ञकी सिद्धिके लिये जरासंधका विनाश तथा कैदमें पड़े हुए राजाओंकी रक्षा कर सकें तो इससे उत्तम और क्या हो सकता है? ॥ १५ ॥

अनारम्भे हि नियतो भवेदगुणनिश्चयः ।

गुणान्निःसंशयाद् राजन् नैर्गुण्यं मन्यसे कथम् ॥ १६ ॥

यदि हम यज्ञका आरम्भ नहीं करते हैं तो निश्चय ही हमारी अयोग्यता एवं दुर्बलता प्रकट होती है; अतः राजन्! सुनिश्चित गुणकी उपेक्षा करके आप निर्गुणताका कलंक क्यों स्वीकार कर रहे हैं? ॥ १६ ॥

काषायं सुलभं पश्चान्मुनीनां शममिच्छताम् ।

साम्राज्यं तु भवेच्छक्यं वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १७ ॥

ऐसा करनेपर तो शान्तिकी इच्छा रखनेवाले संन्यासियोंका गेरुआ वस्त्र ही हमें सुलभ होगा, परंतु हमलोग साम्राज्यको प्राप्त करनेमें समर्थ हैं; अतः हमलोग शत्रुओंसे अवश्य युद्ध करेंगे ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधवधमन्त्रणे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधवधके लिये मन्त्रणाविषयक सोलहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1717

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सप्तदशोऽध्यायः श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना वासुदेव उवाच

जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्याः सुतस्य च ।

या वै युक्ता मतिः सेयमर्जुनेन प्रदर्शिता ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- राजन्! भरतवंशमें उत्पन्न पुरुष और कुन्ती- जैसी माताके पुत्रकी जैसी बुद्धि होनी चाहिये, अर्जुनने यहाँ उसीका परिचय दिया है ॥ १ ॥

न स्म मृत्युं वयं विद्म रात्रौ वा यदि वा दिवा ।

न चापि कंचिदमरमयुद्धेनानुशुश्रुम ॥ २ ॥

महाराज! हमलोग यह नहीं जानते कि मौत कब आयेगी? रातमें आयेगी या दिनमें? ( क्योंकि उसके नियत समयका ज्ञान किसीको नहीं है । ) हमने यह भी नहीं सुना है कि युद्ध न करनेके कारण कोई अमर हो गया हो ॥ २ ॥

एतावदेव पुरुषैः कार्यं हृदयतोषणम् ।

नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान् ॥ ३ ॥

अतः वीर पुरुषोंका इतना ही कर्तव्य है कि वे अपने हृदयके संतोषके लिये नीतिशास्त्रमें बतायी हुई नीतिके अनुसार शत्रुओंपर आक्रमण करें ॥ ३ ॥

सुनयस्यानपायस्य संयोगे परमः क्रमः ।

संगत्या जायतेऽसाम्यं साम्यं च न भवेद् द्वयोः ॥ ४ ॥

दैव आदिकी प्रतिकूलतासे रहित अच्छी नीति एवं सलाह प्राप्त होनेपर आरम्भ किया हुआ कार्य पूर्णरूपसे सफल होता है । शत्रुके साथ भिड़नेपर ही दोनों पक्षोंका अन्तर ज्ञात होता है । दोनों दल सभी बातोंमें समान ही हों, ऐसा सम्भव नहीं ॥ ४ ॥

अनयस्यानुपायस्य संयुगे परमः क्षयः ।

संशयो जायते साम्याज्जयश्च न भवेद् द्वयोः ॥ ५ ॥

जिसने अच्छी नीति नहीं अपनायी है और उत्तम उपायसे काम नहीं लिया है, उसका युद्धमें सर्वथा विनाश होता है । यदि दोनों पक्षोंमें समानता हो तो संशय ही रहता है तथा दोनोंमेंसे किसीकी भी जय अथवा पराजय नहीं होती ॥ ५ ॥

ते वयं नयमास्थाय शत्रुदेहसमीपगाः ।

कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्येव नदीरयाः ।

पररन्ध्रे पराक्रान्ताः स्वरन्ध्रावरणे स्थिताः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1718

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जब हमलोग नीतिका आश्रय लेकर शत्रुके शरीरके निकटतक पहुँच जायँगे, तब जैसे नदीका वेग किनारेके वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार हम शत्रुका अन्त क्यों न कर डालेंगे? हम अपने छिद्रोंको छिपाये रखकर शत्रुके छिद्रको देखेंगे और अवसर मिलते ही उसपर बलपूर्वक आक्रमण कर देंगे ॥ ६ ॥

व्यूढानीकैरतिबलैर्न युद्धयेदरिभिः सह ।

इति बुद्धिमतां नीतिस्तन्ममापीह रोचते ॥ ७ ॥

जिनकी सेनाएँ मोर्चा बाँधकर खड़ी हों और जो अत्यन्त बलवान् हों, ऐसे शत्रुओंके साथ ( सम्मुख होकर) युद्ध नहीं करना चाहिये; यह बुद्धिमानोंकी नीति है । यही नीति यहाँ मुझे भी अच्छी लगती है ॥ ७ ॥

अनवद्या ह्यसम्बुद्धाः प्रविष्टाः शत्रुसद्म तत् ।

शत्रुदेहमुपाक्रम्य तं कामं प्राप्नुयामहे ॥ ८ ॥

यदि हम छिपे - छिपे शत्रुके घरतक पहुँच जायँ तो यह हमारे लिये कोई निन्दाकी बात नहीं होगी । फिर हम शत्रुके शरीरपर आक्रमण करके अपना काम बना लेंगे ॥ ८ ॥

एको ह्येव श्रियं नित्यं बिभर्ति पुरुषर्षभः ।

अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षयं नैव लक्षये ॥ ९ ॥

यह पुरुषोंमें श्रेष्ठ जरासंध प्राणियोंके भीतर स्थित आत्माकी भाँति सदा अकेला ही साम्राज्यलक्ष्मीका उपभोग करता है; अतः उसका और किसी उपायसे नाश होता नहीं दिखायी देता ( उसके विनाशके लिये हमें स्वयं प्रयत्न करना होगा) ॥ ९ ॥

अथवैनं निहत्याजौ शेषेणापि समाहताः ।

प्राप्नुयाम ततः स्वर्गं ज्ञातित्राणपरायणाः ॥ १० ॥

अथवा यदि जरासंधको युद्धमें मारकर उसके पक्षमें रहनेवाले शेष सैनिकोंद्वारा हम भी मारे गये तो भी हमें कोई हानि नहीं है । अपने जाति- भाइयोंकी रक्षामें संलग्न होनेके कारण हमें स्वर्गकी ही प्राप्ति होगी ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

कृष्ण कोऽयं जरासंधः किंवीर्यः किम्पराक्रमः ।

यस्त्वां स्पृष्ट्वाग्निसदृशं न दग्धः शलभो यथा ॥ ११ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— श्रीकृष्ण! यह जरासंध कौन है? उसका बल और पराक्रम कैसा है जो प्रज्वलित अग्निके समान आपका स्पर्श करके भी पतंगके समान जलकर भस्म नहीं हो गया? ॥ ११ ॥

कृष्णउवाच

शृणु राजन् जरासंधो यद्वीर्यो यत्पराक्रमः ।

यथा चोपेक्षितोऽस्माभिर्बहुशः कृतविप्रियः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1719

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श्रीकृष्णने कहा- राजन्! जरासंधका बल और पराक्रम कैसा है तथा अनेक बार हमारा अप्रिय करनेपर भी हमलोगोंने क्यों उसकी उपेक्षा कर दी, यह सब बता रहा हूँ, सुनिये ॥ १२ ॥

अक्षौहिणीनां तिसृणां पतिः समरदर्पितः ।

राजा बृहद्रथो नाम मगधाधिपतिर्बली ॥ १३ ॥

मगधदेशमें बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक बलवान् राजा राज्य करते थे । वे तीन अक्षौहिणी सेनाओंके स्वामी और युद्धमें बड़े अभिमानके साथ लड़नेवाले थे ॥ १३ ॥

रूपवान् वीर्यसम्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः ।

नित्यं दीक्षाङ्किततनुः शतक्रतुरिवापरः ॥ १४ ॥

राजा बृहद्रथ बड़े ही रूपवान्, बलवान्, धनवान् और अनुपम पराक्रमी थे । उनका शरीर दूसरे इन्द्रकी भाँति सदा यज्ञकी दीक्षाके चिह्नोंसे ही सुशोभित होता रहता था ॥ १४ ॥

तेजसा सूर्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।

यमान्तकसमः क्रोधे श्रिया वैश्रवणोपमः ॥ १५ ॥

वे तेजमें सूर्य, क्षमामें पृथ्वी, क्रोधमें यमराज और धन- सम्पत्तिमें कुबेरके समान थे ॥ १५ ॥

तस्याभिजनसंयुक्तैर्गुणैर्भरतसत्तम ।

व्याप्तेयं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ १६ ॥

भरतश्रेष्ठ! जैसे सूर्यकी किरणोंसे यह सारी पृथ्वी आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उनके उत्तम कुलोचित सद्गुणोंसे समस्त भूमण्डल व्याप्त हो रहा था — सर्वत्र उनके गुणोंकी चर्चा एवं प्रशंसा होती रहती थी ॥ १६ ॥

स काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ ।

उपयेमे महावीर्यो रूपद्रविणसंयुते ।

तयोश्चकार समयं मिथः स पुरुषर्षभः ॥ १७ ॥

नातिवर्तिष्य इत्येवं पत्नीभ्यां संनिधौ तदा ।

स ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नीभ्यां वसुधाधिपः ॥ १८ ॥

प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विपः । भरतकुलभूषण! महापराक्रमी राजा बृहद्रथने काशिराजकी दो जुड़वीं कन्याओंके साथ, जो अपनी रूप - सम्पत्तिसे अपूर्व शोभा पा रही थीं, विवाह किया और उन नरश्रेष्ठने एकान्तमें अपनी दोनों पत्नियोंके समीप यह प्रतिज्ञा की कि मैं तुम दोनोंके साथ कभी विषम व्यवहार नहीं करूँगा ( अर्थात् दोनोंके प्रति समानरूपसे मेरा प्रेमभाव बना रहेगा ) । जैसे दो हथिनियोंके साथ गजराज सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे महाराज बृहद्रथ अपने मनके अनुरूप दोनों प्रिय पत्नियोंके साथ शोभा पाने लगे ॥ १७-१८३ ॥

पृष्ठ 1720

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तयोर्मध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिपः ॥ १ ९ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः । जब वे दोनों पत्नियोंके बीच विराजमान होते, उस समय ऐसा जान पड़ता, मानो गंगा और यमुनाके बीचमें मूर्तिमान् समुद्र सुशोभित हो रहा है ॥ १ ९ ३ ॥ विषयेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमभ्यगात् ॥ २० ॥

न च वंशकरः पुत्रस्तस्याजायत कश्चन ।

मङ्गलैर्बहुभिर्होमैः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः ।

नाससाद नृपश्रेष्ठः पुत्रं कुलविवर्धनम् ॥ २१ ॥

विषयोंमें डूबे हुए राजाकी सारी जवानी बीत गयी, परंतु उन्हें कोई वंश चलानेवाला पुत्र नहीं प्राप्त हुआ । उन श्रेष्ठ नरेशने बहुत- से मांगलिक कृत्य, होम और पुत्रेष्टियज्ञ कराये, तो भी उन्हें वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ २०-२१ ॥

अथ काक्षीवतः पुत्रं गौतमस्य महात्मनः ।

शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम् ॥ २२ ॥

यदृच्छयाऽऽगतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम् ।

पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैरतोषयत् ॥ २३ ॥

एक दिन उन्होंने सुना कि गौतमगोत्रीय महात्मा काक्षीवान्‌के पुत्र परम उदार चण्डकौशिक मुनि तपस्यासे उपरत होकर अकस्मात् इधर आ गये हैं और एक वृक्षके नीचे बैठे हैं । यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (एवं पुरवासियों ) -के साथ उनके पास गये तथा सब प्रकारके रत्नों ( मुनिजनोचित उत्कृष्ट वस्तुओं ) की भेंट देकर उन्हें संतुष्ट किया ॥ २२-२३ ॥

( बृहद्रथं च स ऋषिः यथावत् प्रत्यनन्दत ।

उपविष्टश्च तेनाथ अनुज्ञातो महात्मना ॥

तमपृच्छत् तदा विप्रः किमागमनमित्यथ ।

पौरैरनुगतस्यैव पत्नीभ्यां सहितस्य च ॥

महर्षिने भी यथोचित बर्तावद्वारा बृहद्रथको प्रसन्न किया । उन महात्माकी आज्ञा पाकर राजा उनके निकट बैठे । उस समय ब्रह्मर्षि चण्डकौशिकने उनसे पूछा — ' राजन्! अपनी दोनों पत्नियों और पुरवासियोंके साथ यहाँ तुम्हारा आगमन किस उद्देश्यसे हुआ है? ’ । स उवाच मुनिं राजा भगवन् नास्ति मे सुतः 1 अपुत्रस्य वृथा जन्म इत्याहुर्मुनिसत्तम ॥ तब राजाने मुनिसे कहा- ' भगवन्! मेरे कोई पुत्र नहीं है । मुनिश्रेष्ठ! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्यका जन्म व्यर्थ है ।

तादृशस्य हि राज्येन वृद्धत्वे किं प्रयोजनम् ।

सोऽहं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने ॥