श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1721–1730
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1721–1730
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'इस बुढ़ापेमें पुत्रहीन रहकर मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है? इसलिये अब मैं दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें रहकर तपस्या करूँगा । नाप्रजस्य मुने कीर्तिः स्वर्गश्चैवाक्षयो भवेत् एवमुक्तस्य राज्ञा तु मुनेः कारुण्यमागतम् ॥ ) ' मुने! संतानहीन मनुष्यको न तो इस लोकमें कीर्ति प्राप्त होती है और न परलोकमें अक्षय स्वर्ग ही प्राप्त होता है । ' राजाके ऐसा कहनेपर महर्षिको दया आ गयी ।
तमब्रवीत् सत्यधृतिः सत्यवागृषिसत्तमः ।
परितुष्टोऽस्मि राजेन्द्र वरं वरय सुव्रत ॥ २४ ॥
ततः सभार्यः प्रणतस्तमुवाच बृहद्रथः ।
पुत्रदर्शननैराश्याद् वाष्पसंदिग्धया गिरा ॥ २५ ॥
तब धैर्यसे सम्पन्न और सत्यवादी मुनिवर चण्डकौशिकने राजा बृहद्रथसे कहा — ‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ । तुम इच्छानुसार वर माँगो । ' यह सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों रानियोंके साथ मुनिके चरणोंमें पड़ गये और पुत्रदर्शनसे निराश होनेके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले ॥ २४-२५ ॥ राजोवाच
भगवन् राज्यमुत्सृज्य प्रस्थितोऽहं तपोवनम् ।
किं वरेणाल्पभाग्यस्य किं राज्येनाप्रजस्य मे ॥ २६ ॥
राजाने कहा — भगवन्! मैं तो अब राज्य छोड़कर तपोवनकी ओर चल पड़ा हूँ । मुझ अभागे और संतानहीनको वर अथवा राज्यकी क्या आवश्यकता? ॥ २६ ॥
श्रीकृष्णउवाच
एतच्छ्रुत्वा मुनिर्ध्यानमगमत् क्षुभितेन्द्रियः ।
तस्यैव चाम्रवृक्षस्यच्छायायां समुपाविशत् ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं - राजाका यह कातर वचन सुनकर मुनिकी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो गयीं ( उनका हृदय पिघल गया ) । तब वे ध्यानस्थ हो गये और उसी आम्रवृक्षकी छायामें बैठे रहे ॥ २७ ॥
तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सङ्गे निपपात ह ।
अवातमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल ॥ २८ ॥
उसी समय वहाँ बैठे हुए मुनिकी गोदमें एक आमका फल गिरा । वह न हवाके चलनेसे गिरा था, न किसी तोतेने ही उस फलमें अपनी चोंच गड़ायी थी ॥ २८ ॥
तत् प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाभिमन्त्र्य च ।
राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसम्प्राप्तिकारणम् ॥ २ ९ ॥
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मुनिश्रेष्ठ चण्डकौशिकने उस अनुपम फलको हाथमें ले लिया और उसे मन- ही- मन अभिमन्त्रित करके पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये राजाको दे दिया ॥ २ ९ ॥
उवाच च महाप्राज्ञस्तं राजानं महामुनिः ।
गच्छ राजन् कृतार्थोऽसि निवर्तस्व नराधिप ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् उन महाज्ञानी महामुनिने राजासे कहा– ' राजन्! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया । नरेश्वर! अब तुम अपनी राजधानीको लौट जाओ ॥ ३० ॥
(एष ते तनयो राजन् मा तप्सीस्त्वं तपो वने ।
प्रजाः पालय धर्मेण एष धर्मो महीक्षिताम् ॥
महाराज! यह फल तुम्हें पुत्रप्राप्ति करायेगा, अब तुम वनमें जाकर तपस्या न करो; धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो । यही राजाओंका धर्म है ।
यजस्व विविधैर्यज्ञैरिन्द्रं तर्पय चेन्दुना ।
पुत्रं राज्ये प्रतिष्ठाप्य तत आश्रममाव्रज ॥
‘ नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करो और देवराज इन्द्रको सोमरससे तृप्त करो । फिर पुत्रको राज्यसिंहासनपर बिठाकर वानप्रस्थाश्रममें आ जाना ।
अष्टौ वरान् प्रयच्छामि तव पुत्रस्य पार्थिव ।
ब्रह्मण्यतामजेयत्वं युद्धेषु च तथा रतिम् ॥
‘ भूपाल! मैं तुम्हारे पुत्रके लिये आठ वर देता हूँ- वह ब्राह्मणभक्त होगा, युद्धमें अजेय होगा, उसकी युद्धविषयक रुचि कभी कम न होगी ' ।
प्रियातिथेयतां चैव दीनानामन्ववेक्षणम् ।
तथा बलं च सुमहल्लोके कीर्तिं च शाश्वतीम् ॥
अनुरागं प्रजानां च ददौ तस्मै स कौशिकः । ) ' वह अतिथियोंका प्रेमी होगा, दीन- दुखियोंपर उसकी सदा कृपा- दृष्टि बनी रहेगी, उसका बल महान् होगा, लोकमें उसकी अक्षय कीर्तिका विस्तार होगा और प्रजाजनोंपर उसका सदा स्नेह बना रहेगा । ' इस प्रकार चण्डकौशिक मुनिने उसके लिये ये आठ वर दिये ।
एतच्छ्रुत्वा मुनेर्वाक्यं शिरसा प्रणिपत्य च ।
मुनेः पादौ महाप्राज्ञः स नृपः स्वगृहं गतः ॥ ३१ ॥
मुनिका यह वचन सुनकर उन परम बुद्धिमान् राजा बृहद्रथने उनके दोनों चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और अपने घरको लौट गये ॥ ३१ ॥
यथासमयमाज्ञाय तदा स नृपसत्तमः ।
द्वाभ्यामेकं फलं प्रादात् पत्नीभ्यां भरतर्षभ ॥ ३२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन उत्तम नरेशने उचित कालका विचार करके दोनों पत्नियोंके लिये वह एक फल दे दिया ॥ ३२ ॥
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ते तदाभ्रं द्विधा कृत्वा भक्षयामासतुः शुभे ।
भावित्वादपि चार्थस्य सत्यवाक्यतया मुनेः ॥ ३३ ॥
तयोः समभवद् गर्भः फलप्राशनसम्भवः ।
ते च दृष्ट्वा स नृपतिः परां मुदमवाप ह ॥ ३४ ॥
उन दोनों शुभस्वरूपा रानियोंने उस आमके दो टुकड़े करके एक- एक टुकड़ा खा लिया । होनेवाली बात होकर ही रहती है, इसलिये तथा मुनिकी सत्यवादिताके प्रभावसे वह फल खानेके कारण दोनों रानियोंको गर्भ रह गये । उन्हें गर्भवती हुई देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३३-३४ ॥
अथ काले महाप्राज्ञ यथासमयमागते ।
प्रजायेतामुभे राजञ्छरीरशकले तदा ॥ ३५ ॥
महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! प्रसवकाल पूर्ण होनेपर उन दोनों रानियोंने यथासमय अपने गर्भसे शरीरका एक- एक टुकड़ा पैदा किया ॥ ३५ ॥
एकाक्षिबाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिचे ।
दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपतुरुभे भृशम् ॥ ३६ ॥
प्रत्येक टुकड़ेमें एक आँख, एक हाथ, एक पैर, आधा पेट, आधा मुँह और कटिके नीचेका आधा भाग था । एक शरीरके उन टुकड़ोंको देखकर वे दोनों भयके मारे थर- थर काँपने लगीं ॥ ३६ ॥
000000 उद्विग्ने सह सम्मन्त्र्य ते भगिन्यौ तदाबले ।
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सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदुःखिते ॥ ३७ ॥
उनका हृदय उद्विग्न हो उठा; अबला ही तो थीं । उन दोनों बहिनोंने अत्यन्त दुःखी होकर परस्पर सलाह करके उन दोनों टुकड़ोंको, जिनमें जीव तथा प्राण विद्यमान थे, त्याग दिया ॥ ३७ ॥
तयोर्धात्र्यौ सुसंवीते कृत्वा ते गर्भसम्प्लवे ।
निर्गम्यान्तःपुरद्वारात् समुत्सृज्याभिजग्मतुः ॥ ३८ ॥
उन दोनोंकी धायें गर्भके उन टुकड़ोंको कपड़ेसे ढककर अन्तःपुरके दरवाजेसे बाहर निकलीं और चौराहेपर फेंककर चली गयीं ॥ ३८ ॥
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी ।
जग्राह मनुजव्याघ्र मांसशोणितभोजना ॥ ३ ९ ॥
पुरुषसिंह! चौराहेपर फेंके हुए उन टुकड़ोंको रक्त और मांस खानेवाली जरा नामकी एक राक्षसीने उठा लिया ॥ ३ ९ ॥
कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी ।
संयोजयामास तदा विधानबलचोदिता ॥ ४० ॥
विधाताके विधानसे प्रेरित होकर उस राक्षसीने उन दोनों टुकड़ोंको सुविधापूर्वक ले जानेयोग्य बनानेकी इच्छासे उस समय जोड़ दिया ॥ ४० ॥
ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ ।
एकमूर्तिधरो वीरः कुमारः समपद्यत ॥ ४१ ॥
नरश्रेष्ठ! उन टुकड़ोंका परस्पर संयोग होते ही एक शरीरधारी वीर कुमार बन गया ॥ ४१ ॥
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ततः सा राक्षसी राजन् विस्मयोत्फुल्ललोचना ।
न शशाक समुद्वोढुं वज्रसारमयं शिशुम् ॥ ४२ ॥
राजन्! यह देखकर राक्षसीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे । उसे वह शिशु वज्रके
सारतत्त्वका बना जान पड़ा । राक्षसी उसे उठाकर ले जानेमें असमर्थ हो गयी ॥ ४२ ॥
बालस्ताम्रतलं मुष्टिं कृत्वा चास्ये निधाय सः ।
प्राक्रोशदतिसंरब्धः सतोय इव तोयदः ॥ ४३ ॥
उस बालकने अपने लाल हथेलीवाले हाथोंकी मुट्ठी बाँधकर मुँहमें डाल ली और अत्यन्त क्रुद्ध होकर जलसे भरे मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे रोना शुरू कर दिया ॥ ४३ ॥
तेन शब्देन सम्भ्रान्तः सहसान्तःपुरे जनः ।
निर्जगाम नरव्याघ्र राज्ञा सह परंतप ॥ ४४ ॥
परंतप नरव्याघ्र! बालकके उस रोने - चिल्लानेके शब्दसे रनिवासकी सब स्त्रियाँ घबरा उठीं तथा राजाके साथ सहसा बाहर निकलीं ॥ ४४ ॥
ते चाबले परिम्लाने पयःपूर्णपयोधरे ।
निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाभ्यगच्छताम् ॥ ४५ ॥
दूधसे भरे हुए स्तनोंवाली वे दोनों अबला रानियाँ भी, जो पुत्रप्राप्तिकी आशा छोड़ चुकी थीं, मलिन मुख हो सहसा बाहर निकल आयीं ॥ ४५ ॥
अथ दृष्ट्वा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम् ।
तं च बालं सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी ॥ ४६ ॥
नार्हामि विषये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिनः ।
बालं पुत्रमिमं हन्तुं धार्मिकस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥
उन दोनों रानियोंको उस प्रकार उदास, राजाको संतान पानेके लिये उत्सुक तथा उस बालकको अत्यन्त बलवान् देखकर राक्षसीने सोचा, ' मैं इस राजाके राज्यमें रहती हूँ। यह पुत्रकी इच्छा रखता है; अतः इस धर्मात्मा तथा महात्मा नरेशके बालक पुत्रकी हत्या करना मेरे लिये उचित नहीं है ' ॥ ४६-४७ ॥
सा तं बालमुपादाय मेघलेखेव भास्करम् ।
कृत्वा च मानुषं रूपमुवाच वसुधाधिपम् ॥ ४८ ॥
ऐसा विचारकर उस राक्षसीने मानवीका रूप धारण किया और जैसे मेघमाला सूर्यको धारण करे, उसी प्रकार वह उस बालकको गोदमें उठाकर भूपालसे बोली ॥ ४८ ॥
राक्षस्युवाच बृहद्रथ सुतस्तेऽयं मया दत्तः प्रगृह्यताम् ।
तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात् ।
धात्रीजनपरित्यक्तो मयायं परिरक्षितः ॥ ४ ९ ॥
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राक्षसीने कहा – बृहद्रथ! यह तुम्हारा पुत्र है, जिसे मैंने तुम्हें दिया है । तुम इसे ग्रहण करो । ब्रह्मर्षिके वरदान एवं आशीर्वादसे तुम्हारी पत्नियोंके गर्भसे इसका जन्म हुआ है । धायोंने इसे घरके बाहर लाकर डाल दिया था; किंतु मैंने इसकी रक्षा की है ॥ ४ ९ ॥ श्रीकृष्ण उवाच
ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे ।
तं बालमभिपद्याशु प्रस्रवैरभ्यषिञ्चताम् ॥ ५० ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं- भरतकुलभूषण! तब काशिराजकी उन दोनों शुभलक्षणा कन्याओंने उस बालकको तुरंत गोदमें लेकर उसे स्तनोंके दूधसे सींच दिया ॥ ५० ॥
ततः स राजा संहृष्टः सर्वं तदुपलभ्य च ।
अपृच्छद्धेमगर्भाभां राक्षसीं तामराक्षसीम् ॥ ५१ ॥
यह सब देख - सुनकर राजाके हर्षकी सीमा न रही । उन्होंने सुवर्णकी - सी कान्तिवाली उस राक्षसीसे, जो स्वरूप से राक्षसी नहीं जान पड़ती थी, इस प्रकार पूछा ॥ ५१ ॥
राजोवाच
का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी ।
कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे ॥ ५२ ॥
राजाने कहा — कमलके भीतरी भागके समान मनोहर कान्तिवाली कल्याणी! मुझे पुत्र प्रदान करनेवाली तुम कौन हो? बताओ । मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम इच्छानुसार विचरनेवाली कोई देवी हो ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल ६१३ श्लोक हैं )
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अष्टादशोऽध्यायः जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना राक्षस्युवाच
जरा नामास्मि भद्रं ते राक्षसी कामरूपिणी ।
तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम् ॥ १ ॥
राक्षसीने कहा- राजेन्द्र! तुम्हारा कल्याण हो । मेरा नाम जरा है । मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी हूँ और तुम्हारे घरमें पूजित हो सुखपूर्वक रहती चली आयी हूँ ॥ १ ॥
गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी ।
गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयंभुवा ॥ २ ॥
मैं मनुष्योंके घर- घरमें सदा मौजूद रहती हूँ । कहनेको मैं राक्षसी ही हूँ; किंतु पूर्वकालमें ब्रह्माजीने गृहदेवीके नामसे मेरी सृष्टि की थी ॥ २ ॥
दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी ।
यो मां भक्त्या लिखेत् कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम् ॥ ३ ॥
गृहे तस्य भवेद् वृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात् ।
त्वद्गृहे तिष्ठमानाहं पूजिताहं सदा विभो ॥। ४ ॥
और उन्होंने मुझे दानवोंके विनाशके लिये नियुक्त किया था । मैं दिव्य रूप धारण करनेवाली हूँ। जो अपने घरकी दीवारपर मुझे अनेक पुत्रोंसहित युवती स्त्रीके रूपमें भक्तिपूर्वक लिखता है ( मेरा चित्र अंकित करता है ), उसके घरमें सदा वृद्धि होती है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है । प्रभो! मैं तुम्हारे घरमें रहकर सदा पूजित होती चली आयी हूँ ॥ ३-४ ॥
लिखिता चैव कुड्येषु पुत्रैर्बहुभिरावृता ।
गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यभोज्यैः सुपूजिता ॥ ५ ॥
एवं तुम्हारे घरकी दीवारोंपर मेरा ऐसा चित्र अंकित किया गया है, जिसमें मैं अनेक पुत्रोंसे घिरी हुई खड़ी हूँ। उस चित्रके रूपमें मेरा गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंद्वारा भलीभाँति पूजन होता आ रहा है ॥ ५ ॥
साहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तयाम्यनिशं तव ।
तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिक ॥ ६ ॥
संश्लेषिते मया दैवात् कुमारः समपद्यत ।
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तव भाग्यान्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह ॥ ७ ॥
अतः मैं उस पूजनके बदले तुम्हारा कोई उपकार करनेकी बात सदा सोचती रहती थी । धर्मात्मन्! मैंने तुम्हारे पुत्रके शरीरके इन दोनों टुकड़ोंको देखा और दोनोंको जोड़ दिया । महाराज! दैववश तुम्हारे भाग्यसे ही उन टुकड़ोंके जुड़नेसे यह राजकुमार प्रकट हो गया है । मैं तो इसमें केवल निमित्तमात्र बन गयी हूँ ॥ ६-७ ॥ ( तस्य बालस्य यत् कृत्यं तत् कुरुष्व नराधिप । मम नाम्ना च लोकेऽस्मिन् ख्यात एष भविष्यति ॥ ) राजन्! अब इस बालकके लिये जो आवश्यक संस्कार हैं, उन्हें करो । यह इस संसारमें मेरे ही नामसे विख्यात होगा ।
मेरुं वा खादितुं शक्ता किं पुनस्तव बालकम् ।
गृहसम्पूजनात् तुष्ट्या मया प्रत्यर्पितस्तव ॥ ८ ॥
मुझमें सुमेरु पर्वतको भी निगल जानेकी शक्ति है; फिर तुम्हारे इस बच्चेको खा जाना कौन बड़ी बात है? किंतु तुम्हारे घरमें जो मेरी भलीभाँति पूजा होती आयी है, उसीसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हें यह बालक समर्पित किया है ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णउवाच
एवमुक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ।
स संगृह्य कुमारं तं प्रविवेश गृहं नृपः ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर जरा राक्षसी वहीं अन्तर्धान हो गयी और राजा उस बालकको लेकर अपने महलमें चले आये ॥ ९ ॥
तस्य बालस्य यत् कृत्यं तच्चकार नृपस्तदा ।
आज्ञापयच्च राक्षस्या मगधेषु महोत्सवम् ॥ १० ॥
उस समय राजाने उस बालकके जातकर्म आदि सभी आवश्यक संस्कार सम्पन्न किये और मगधदेशमें जरा राक्षसी ( गृहदेवी ) -के पूजनका महान् उत्सव मनानेकी आज्ञा दी ॥ १० ॥
तस्य नामाकरोच्चैव पितामहसमः पिता ।
जरया संधितो यस्माज्जरासंधो भवत्वयम् ॥ ११ ॥
ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली राजा बृहद्रथने उस बालकका नाम रखते हुए कहा —‘इसको जराने संधित किया ( जोड़ा ) है, इसलिये इसका नाम जरासंध होगा ' ॥ ११ ॥
सोऽवर्धत महातेजा मगधाधिपतेः सुतः ।
प्रमाणबलसम्पन्नो हुताहुतिरिवानलः ।
मातापित्रोर्नन्दिकरः शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १२ ॥
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मगधराजका वह महातेजस्वी बालक माता- पिताको आनन्द प्रदान करते हुए आकार और बलसे सम्पन्न हो घीकी आहुति दी जानेसे प्रज्वलित हुई अग्नि और शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३ श्लोक हैं )
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एकोनविंशोऽध्यायः चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना श्रीकृष्णउवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य पुनरेव महातपाः ।
मगधेषूपचक्राम भगवांश्चण्डकौशिकः ॥ १ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं — राजन्! कुछ कालके पश्चात् महातपस्वी भगवान् चण्डकौशिक मुनि पुनः मगधदेशमें घूमते हुए आये ॥ १ ॥
तस्यागमनसंहृष्टः सामात्यः सपुरःसरः ।
सभार्यः सह पुत्रेण निर्जगाम बृहद्रथः ॥ २ ॥
उनके आगमनसे राजा बृहद्रथको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे मन्त्री, अग्रगामी सेवक, रानी तथा पुत्रके साथ मुनिके पास गये ॥ २ ॥
पाद्यार्ध्याचमनीयैस्तमर्चयामास भारत ।
स नृपो राज्यसहितं पुत्रं तस्मै न्यवेदयत् ॥ ३ ॥
भारत! पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदिके द्वारा राजाने महर्षिका पूजन किया और अपने सारे राज्यके सहित पुत्रको उन्हें सौंप दिया ॥ ३ ॥
प्रतिगृह्य च तां पूजां पार्थिवाद् भगवानृषिः ।
उवाच मागधं राजन् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ४ ॥
सर्वमेतन्मया ज्ञातं राजन् दिव्येन चक्षुषा ।
पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र यादृशोऽयं भविष्यति ॥ ५ ॥
महाराज! राजाकी ओरसे प्राप्त हुई उस पूजाको स्वीकार करके ऐश्वर्यशाली महर्षिने मगधनरेशको सम्बोधित करके प्रसन्न चित्तसे कहा - ' राजन्! जरासंधके जन्मसे लेकर अबतककी सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टिसे ज्ञात हो चुकी हैं । राजेन्द्र! अब यह सुनो कि तुम्हारा पुत्र भविष्यमें कैसा होगा? ॥ ४-५ ॥
अस्य रूपं च सत्त्वं च बलमूर्जितमेव च ।
एष श्रिया समुदितः पुत्रस्तव न संशयः ॥ ६ ॥
'इसमें रूप, सत्त्व, बल और ओजका विशेष आविर्भाव होगा । इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारा यह पुत्र साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न होगा ॥ ६ ॥
प्रापयिष्यति तत् सर्वं विक्रमेण समन्वितः ।
अस्य वीर्यवतो वीर्यं नानुयास्यन्ति पार्थिवाः ॥ ७ ॥