श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1761–1770

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1761–1770

पृष्ठ 1761

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त्रयोविंशोऽध्यायः जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट वैशम्पायन उवाच

ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय यदुनन्दनः ।

उवाच वाग्मी राजानं जरासंधमधोक्षजः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा जरासंधने अपने मनमें युद्धका निश्चय कर लिया है, यह देख बोलनेमें कुशल यदुनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा ॥ १ ॥

श्रीकृष्णउवाच

त्रयाणां केन ते राजन् योद्धुमुत्सहते मनः ।

अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ॥ २ ॥

श्रीकृष्णने पूछा — राजन्! हम तीनोंमेंसे किस एक व्यक्तिके साथ युद्ध करनेके लिये तुम्हारे मनमें उत्साह हो रहा है? हममें से कौन तुम्हारे साथ युद्धके लिये तैयार हो? ॥ २ ॥

एवमुक्तः स नृपतिर्युद्धं वव्रे महाद्युतिः ।

जरासंधस्ततो राजा भीमसेनेन मागधः ॥ ३ ॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी मगधनरेश राजा जरासंधने भीमसेनके साथ युद्ध करना स्वीकार किया ॥ ३ ॥

आदाय रोचनां माल्यं मङ्गल्यान्यपराणि च ।

धारयन्नगदान् मुख्यान् निर्वृतीर्वेदनानि च ।

उपतस्थे जरासंधं युयुत्सुं वै पुरोहितः ॥ ४ ॥

जरासंधको युद्ध करनेके लिये उत्सुक देख उसके पुरोहित गोरोचन, माला, अन्यान्य मांगलिक वस्तुएँ तथा उत्तम उत्तम ओषधियाँ, जो पीड़ाके समय भी सुख देनेवाली और मूर्च्छाकालमें भी होश बनाये रखनेवाली थीं, लेकर उसके पास आये ॥ ४ ॥

कृतस्वस्त्ययनो राजा ब्राह्मणेन यशस्विना ।

समनह्यज्जरासंधः क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ५ ॥

यशस्वी ब्राह्मणके द्वारा स्वस्तिवाचन सम्पन्न हो जानेपर जरासंध क्षत्रियधर्मका स्मरण करके युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गया ॥ ५ ॥

अवमुच्य किरीटं स केशान् समनुगृह्य च ।

उदतिष्ठज्जरासंधो वेलातिग इवार्णवः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1762

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जरासंधने किरीट उतारकर केशोंको कसकर बाँध लिया । तत्पश्चात् वह युद्धके लिये उठकर खड़ा हो गया; मानो महासागर अपनी मर्यादा - तटवर्तिनी भूमिको लाँघ जानेको उद्यत हो गया हो ॥ ६ ॥

उवाच मतिमान् राजा भीमं भीमपराक्रमः ।

भीम योत्स्ये त्वया सार्धं श्रेयसा निर्जितं वरम् ॥ ७ ॥

उस समय भयानक पराक्रम करनेवाले बुद्धिमान् राजा जरासंधने भीमसेनसे कहा -' भीम! आओ, मैं तुमसे युद्ध करूँगा; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषसे लड़कर हारना भी अच्छा है ' ॥ ७ ॥

एवमुक्त्वा जरासंधो भीमसेनमरिंदमः ।

प्रत्युद्ययौ महातेजाः शक्रं बल इवासुरः ॥ ८ ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी शत्रुदमन जरासंध भीमसेनकी ओर बढ़ा; मानो बल नामक असुर इन्द्रसे भिड़नेके लिये बढ़ा जा रहा हो ॥ ८ ॥

ततः सम्मन्त्र्य कृष्णेन कृतस्वस्त्ययनो बली ।

भीमसेनो जरासंधमाससाद युयुत्सया ॥ ९ ॥

तदनन्तर बलवान् भीमसेन भी श्रीकृष्णसे सलाह लेकर स्वस्तिवाचनके अनन्तर युद्धकी इच्छासे जरासंधके पास आ धमके ॥ ९ ॥

ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुशस्त्रौ समीयतुः ।

वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ ॥ १० ॥

फिर तो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी वे दोनों वीर अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरकर एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए परस्पर भिड़ गये ॥ १० ॥

करग्रहणपूर्वं तु कृत्वा पादाभिवन्दनम् ।

कक्षैः कक्षां विधुन्वानावास्फोटं तत्र चक्रतुः ॥ ११ ॥

पहले उन दोनोंने हाथ मिलाये । फिर एक-दूसरेके चरणोंका अभिवन्दन किया । तत्पश्चात् भुजाओंके मूलभागके संचालनसे वहाँ बँधे हुए बाजूबंदकी डोरको हिलाते हुए वे दोनों वीर वहीं ताल ठोंकने लगे ॥ ११ ॥

स्कन्धे दोर्भ्यां समाहत्य निहत्य च मुहुर्मुहुः ।

अङ्गमङ्गैः समाश्लिष्य पुनरास्फालनं विभो ॥ १२ ॥

राजन्! फिर वे दोनों हाथोंसे एक- दूसरेके कंधे पर बार- बार चोट करते हुए अंग - अंगसे भिड़कर आपसमें गुँथ गये तथा एक- दूसरेको बार- बार रगड़ने लगे ॥ १२ ॥

चित्रहस्तादिकं कृत्वा कक्षाबन्धं च चक्रतुः ।

गलगण्डाभिघातेन सस्फुलिङ्गेन चाशनिम् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1763

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वे कभी हाथोंको बड़े वेगसे सिकोड़ लेते, कभी फैला देते, कभी ऊपर- नीचे चलाते और कभी मुट्ठी बाँध लेते । इस प्रकार चित्रहस्त आदि दाँव दिखाकर उन दोनोंने कक्षाबन्धका प्रयोग किया अर्थात् एक-दूसरेकी काख या कमरमें दोनों हाथ डालकर प्रतिद्वन्द्वीको बाँध लेनेकी चेष्टा की । फिर गलेमें और गालमें ऐसे - ऐसे हाथ मारने लगे कि आगकी चिनगारी - सी निकलने लगी और वज्रपातका - सा शब्द होने लगा ॥ १३ ॥

बाहुपाशादिकं कृत्वा पादाहतशिरावुभौ ।

उरोहस्तं ततश्चक्रे पूर्णकुम्भौ प्रयुज्य तौ ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् वे ‘ बाहुपाश ' और ' चरणपाश ' आदि दाँव- पेंचोंसे काम लेते हुए एक-दूसरेपर पैरोंसे ऐसा भीषण प्रहार करने लगे कि शरीरकी नस- नाड़ियाँतक पीड़ित हो उठीं । तदनन्तर दोनोंने दोनोंपर ‘ पूर्णकुम्भ ' नामक दाँव लगाया (दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको परस्पर गूँथकर उन हाथोंकी हथेलियोंसे शत्रुके सिरको दबाया ) । इसके बाद ' उरोहस्त ' का प्रयोग किया (छातीपर थप्पड़ मारना शुरू कर दिया) ॥ १४ ॥

करसम्पीडनं कृत्वा गर्जन्तौ वारणाविव ।

नर्दन्तौ मेघसंकाशौ बाहुप्रहरणावुभौ ॥ १५ ॥

फिर एक- दूसरेके हाथ दबाकर वे दोनों दो गजराजोंकी भाँति गर्जने लगे । दोनों ही भुजाओंसे प्रहार करते हुए मेघके समान गम्भीर स्वरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १५ ॥

तलेनाहन्यमानौ तु अन्योन्यं कृतवीक्षणौ ।

सिंहाविव सुसंक्रुद्धावाकृष्याकृष्य युध्यताम् ॥ १६ ॥

थप्पड़ोंकी मार खाकर वे परस्पर घूर घूरकर देखते और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दो सिंहोंके समान एक - दूसरेको खींच- खींचकर लड़ने लगे ॥ १६ ॥

अङ्गेनाङ्गं समापीड्य बाहुभ्यामुभयोरपि ।

आवृत्य बाहुभिश्चापि उदरं च प्रचक्रतुः ॥ १७ ॥

उस समय दोनों अपने अंगों और भुजाओंसे प्रतिद्वन्द्वीके शरीरको दबाकर शत्रुकी पीठमें अपने गलेकी हँसली भिड़ाकर उसके पेटको दोनों बाँहोंसे कस लेते और उठाकर दूर फेंकते थे ॥ १७ ॥

उभौ कट्यां सुपार्श्वे तु तक्षवन्तौ च शिक्षितौ ।

अधोहस्तं स्वकण्ठे तूदरस्योरसि चाक्षिपत् ॥ १८ ॥

इसी प्रकार कमरमें और बगलमें भी हाथ लगाकर दोनों प्रतिद्वन्द्वीको पछाड़नेकी चेष्टा करते थे । अपने शरीरको सिकोड़कर शत्रुकी पकड़से छूट जानेकी कला दोनों जानते थे । दोनों ही मल्लयुद्धकी शिक्षामें प्रवीण थे । वे उदरके नीचे हाथ लगाकर दोनों हाथोंसे पेटको लपेट लेते और विपक्षीको कण्ठ एवं छातीतक ऊँचे उठाकर धरतीपर दे मारते थे ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1764

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TRNAK

सर्वातिक्रान्तमर्यादं पृष्ठभङ्गं च चक्रतुः ।

सम्पूर्णमूर्च्छा बाहुभ्यां पूर्णकुम्भं प्रचक्रतुः ॥ १ ९ ॥

फिर वे सारी मर्यादाओंसे ऊँचे उठे हुए ' पृष्ठभंग' नामक दाँव- पेंचसे काम लेने लगे ( अर्थात् एक- दूसरेकी पीठको धरतीसे लगा देनेकी चेष्टामें लग गये) । दोनों भुजाओंसे सम्पूर्ण मूर्च्छा (उदर आदिमें आघात करके मूर्च्छित करनेका प्रयत्न ) तथा पूर्वोक्त पूर्णकुम्भका प्रयोग करने लगे ॥ १ ९ ॥

तृणपीडं यथाकामं पूर्णयोगं समुष्टिकम् ।

एवमादीनि युद्धानि प्रकुर्वन्तौ परस्परम् ॥ २० ॥

तदनन्तर वे अपनी इच्छाके अनुसार ' तृणपीड' ( रस्सी बनानेके लिये बटे जानेवाले तिनकोंकी भाँति हाथ - पैर आदिको ऐंठना ) तथा मुष्टिकाघातसहित पूर्णयोग ( मुक्केको एक अंगमें मारनेकी चेष्टा दिखाकर दूसरे अंगमें आघात करना ) आदि युद्धके दाँव- पेंचोंका प्रयोग एक- दूसरेपर करने लगे ॥ २० ॥

तयोर्युद्धं ततो द्रष्टुं समेताः पुरवासिनः ।

ब्राह्मणा वणिजश्चैव क्षत्रियाश्च सहस्रशः ॥ २१ ॥

शूद्राश्च नरशार्दूल स्त्रियो वृद्धाश्च सर्वशः ।

निरन्तरमभूत् तत्र जनौघैरभिसंवृतम् ॥ २२ ॥

जनमेजय! उस समय उनका मल्लयुद्ध देखनेके लिये हजारों पुरवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ एवं वृद्ध इकट्ठे हो गये । मनुष्योंकी अपार भीड़से वह स्थान ठसाठस भर गया ॥ २१-२२ ॥

पृष्ठ 1765

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तयोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात् तथा ।

आसीत् सुभीमसम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २३ ॥

उन दोनोंकी भुजाओंके आघातसे तथा एक- दूसरेके निग्रह-प्रग्रहसे * ऐसा भयंकर चटचट शब्द होता था, मानो वज्र और पर्वत परस्पर टकरा रहे हों ॥ २३ ॥

उभौ परमसंहृष्टौ बलेन बलिनां वरौ ।

अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २४ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अत्यन्त हर्ष एवं उत्साहमें भरे हुए थे और एक- दूसरेकी दुर्बलता या असावधानीपर दृष्टि रखते हुए परस्पर बलपूर्वक विजय पानेकी इच्छा रखते थे ॥ २४ ॥

तद् भीममुत्सार्यजनं युद्धमासीदुपप्लवे ।

बलिनोः संयुगे राजन् वृत्रवासवयोरिव ॥ २५ ॥

राजन्! उस समरभूमिमें जहाँ वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनों बलवान् वीरोंमें संघर्ष छिड़ा था, ऐसा भयंकर युद्ध हुआ कि दर्शकलोग दूर भाग खड़े हुए ॥ २५ ॥

प्रकर्षणाकर्षणाभ्यामनुकर्षविकर्षणैः ।

आचकर्षतुरन्योन्यं जानुभिश्चावजघ्नतुः ॥ २६ ॥

वे एक- दूसरेको पीछे ढकेलते और आगे खींचते थे । बार- बार खींचतान और छीना-झपटी करते थे । दोनोंने अपने प्रहारोंसे एक- दूसरेके शरीरमें खरौंच एवं घाव पैदा कर दिये और दोनों दोनोंको पटककर घुटनोंसे मारने तथा रगड़ने लगे ॥ २६ ॥

ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् ।

पाषाणसंघातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ॥ २७ ॥

फिर बड़े भारी गर्जन -तर्जनके द्वारा आपसमें डाँट बताते हुए एक- दूसरेपर ऐसे प्रहार करने लगे मानो पत्थरोंकी वर्षा कर रहे हों ॥ २७ ॥

व्यूढोरस्की दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ ।

बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ॥ २८ ॥

दोनोंकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी - बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे और लोहेकी परिघ - जैसी मोटी भुजाओंको भिड़ाकर आपसमें गुँथ जाते थे ॥ २८ ॥

कार्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि ।

अनाहारं दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत ॥ २ ९ ॥

कार्तिक मासके पहले दिन उन दोनोंका युद्ध प्रारम्भ हुआ और दिन- रात बिना खाये-पिये अविरामगतिसे चलता रहा ॥ २ ९ ॥

तद् वृत्तं तु त्रयोदश्यां समवेतं महात्मनोः ।

चतुर्दश्यां निशायां तु निवृत्तो मागधः क्लमात् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1766

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उन महात्माओंका वह युद्ध इसी रूपमें त्रयोदशी -तक होता रहा । चतुर्दशीकी रातमें मगधनरेश जरासंध क्लेशसे थककर युद्धसे निवृत्त-सा होने लगा ॥ ३० ॥

तं राजानं तथा क्लान्तं दृष्ट्वा राजञ्जनार्दनः ।

उवाच भीमकर्माणं भीमं सम्बोधयन्निव ॥ ३१ ॥

राजन्! उसे इस प्रकार थका देख भगवान् श्रीकृष्ण भयानक कर्म करनेवाले भीमसेनको समझाते हुए- से बोले – ॥ ३१ ॥

क्लान्तः शत्रुर्न कौन्तेय लभ्यः पीडयितुं रणे ।

पीड्यमानो हि कार्त्स्न्येन जह्याज्जीवितमात्मनः ॥ ३२ ॥

'कुन्तीनन्दन! शत्रु थक गया हो तो युद्धमें उसे अधिक पीड़ा देना उचित नहीं है । यदि उसे पूर्णतः पीड़ा दी जाय तो वह अपने प्राण त्याग देगा ॥ ३२ ॥

तस्मात् ते नैव कौन्तेय पीडनीयो जनाधिपः ।

सममेतेन युध्यस्व बाहुभ्यां भरतर्षभ ॥ ३३ ॥

‘ अतः पार्थ! तुम्हें राजा जरासंधको अधिक पीड़ा नहीं देनी चाहिये । भरतश्रेष्ठ! तुम अपनी भुजाओंद्वारा इनके साथ समभावसे ही युद्ध करो ' ॥ ३३ ॥

एवमुक्तः स कृष्णेन पाण्डवः परवीरहा ।

जरासंधस्य तद् रूपं ज्ञात्वा चक्रे मतिं वधे ॥। ३४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेनने जरासंधको थका हुआ जानकर उसके वधका विचार किया ॥ ३४ ॥

ततस्तमजितं जेतुं जरासंधं वृकोदरः ।

संरम्भं बलिनां श्रेष्ठो जग्राह कुरुनन्दनः ॥ ३५ ॥

तदनन्तर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वृकोदरने उस अपराजित शत्रु जरासंधको जीतनेके लिये भारी क्रोध धारण किया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधक्लान्तौ त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें जरासंधकी थकावटसे सम्बन्ध रखनेवाला तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

* दोनों हाथोंसे शत्रुका कंधा पकड़कर खींचने और उसे नीचे मुख गिरानेकी चेष्टाका नाम ' निग्रह ' है तथा शत्रुको उत्तान गिरा देनेके लिये उसके पैरोंको पकड़कर खींचना ' प्रग्रह ' कहलाता है ।

पृष्ठ 1767

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चतुर्विंशोऽध्यायः भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना वैशम्पायन उवाच

भीमसेनस्ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् ।

बुद्धिमास्थाय विपुलां जरासंधवधेप्सया ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर भीमसेनने विशाल बुद्धिका सहारा ले जरासंधके वधकी इच्छासे यदुनन्दन श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कहा- ॥ १ ॥

नायं पापो मया कृष्ण युक्तः स्यादनुरोधितुम् ।

प्राणेन यदुशार्दूल बद्धकक्षेण वाससा ॥ २ ॥

' यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! जरासंधने लंगोटसे अपनी कमर खूब कस ली है । यह पापी प्राण रहते मेरे वशमें आनेवाला नहीं जान पड़ता' ॥ २ ॥

एवमुक्तस्ततः कृष्णः प्रत्युवाच वृकोदरम् ।

त्वरयन् पुरुषव्याघ्रो जरासंधवधेप्सया ॥ ३ ॥

उनके ऐसा कहने पर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने जरासंधके वधके लिये भीमसेनको उत्तेजित करते हुए कहा- ॥ ३ ॥

यत् ते दैवं परं सत्त्वं यच्च ते मातरिश्वनः ।

बलं भीम जरासंधे दर्शयाशु तदद्य नः ॥ ४ ॥

‘ भीम! तुम्हारा जो सर्वोत्कृष्ट दैवी स्वरूप है और तुम्हें वायुदेवतासे जो दिव्य बल प्राप्त हुआ है, उसे आज हमारे सामने जरासंधपर शीघ्रतापूर्वक दिखाओ ॥ ४ ॥

( तवैष वध्यो दुर्बुद्धिः जरासंधो महारथः ।

इत्यन्तरिक्षे त्वश्रौषं यदा वायुरपोह्यते ॥

‘ यह खोटी बुद्धिवाला महारथी जरासंध तुम्हारे हाथोंसे ही मारा जा सकता है । यह बात आकाशमें मुझे उस समय सुनायी पड़ी थी जब कि बलरामजीके द्वारा जरासंधके प्राण लेनेकी चेष्टा की जा रही थी ।

गोमन्ते पर्वतश्रेष्ठे येनैष परिमोक्षितः ।

बलदेवबलं प्राप्य कोऽन्यो जीवेत मागधात् ॥

' इसीलिये गिरिश्रेष्ठ गोमन्तपर भैया बलरामने इसे जीवित छोड़ दिया था; अन्यथा बलदेवजीके काबूमें आ जानेपर इस जरासंधके सिवा दूसरा कौन जीवित बच सकता था?

पृष्ठ 1768

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तदस्य मृत्युर्विहितः त्वदृते न महाबल । वायुं चिन्त्य महाबाहो जहीमं मगधाधिपम् ॥ ) ' महाबली भीम! तुम्हारे सिवा और किसीके द्वारा इसकी मृत्यु नहीं होनेवाली है । महाबाहो! तुम वायुदेवका चिन्तन करके इस मगधराजको मार डालो ’ ।

एवमुक्तस्तदा भीमो जरासंधमरिंदमः ।

उत्क्षिप्य भ्रामयामास बलवन्तं महाबलः ॥ ५ ॥

उनके इस तरह संकेत करनेपर शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबली भीमने उस समय बलवान् जरासंधको उठाकर आकाशमें वेगसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ५ ॥

( ततस्तु भगवान् कृष्णो जरासंधजिघांसया ।

भीमसेनं समालोक्य नलं जग्राह पाणिना ॥

द्विधा चिच्छेद वै तत् तु जरासंधवधं प्रति । ) तब भगवान् श्रीकृष्णने जरासंधका वध करानेकी इच्छासे भीमसेनकी ओर देखकर एक नरकट* हाथमें ले लिया और उसे ( दातुनकी भाँति ) दो टुकड़ोंमें चीर डाला ( तथा उसे फेंक दिया ) । यह जरासंधको मारनेके लिये एक संकेत था ।

भ्रामयित्वा शतगुणं जानुभ्यां भरतर्षभ ।

बभञ्ज पृष्ठं संक्षिप्य निष्पिष्य विननाद च ॥ ६ ॥

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! ( भीमने उनके संकेतको समझ लिया और उन्होंने सौ बार घुमाकर उसे धरतीपर पटक दिया और उसकी पीठको धनुषकी तरह मोड़कर दोनों घुटनोंकी चोटसे उसकी रीढ़ तोड़ डाली, फिर अपने शरीरकी रगड़से पीसते हुए भीमने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ६ ॥

करे गृहीत्वा चरणं द्वेधा चक्रे महाबलः ॥ ७ ॥

इसके बाद अपने एक हाथसे उसका एक पैर पकड़कर और दूसरे पैरपर अपना पैर रखकर महाबली भीमने उसे दो खण्डोंमें चीर डाला ॥ ७ ॥

( पुनः संधाय तु तदा जरासंधः प्रतापवान् ॥

भीमेन च समागम्य बाहुयुद्धं चकार ह ।

तयोः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥

सर्वलोकक्षयकरं सर्वभूतभयावहम् ।

पुनः कृष्णस्तमिरिणं द्विधा विच्छिद्य माधवः ॥

व्यत्यस्य प्राक्षिपत् तत् तु जरासंधवधेप्सया । तब वे दोनों टुकड़े फिरसे जुड़ गये और प्रतापी जरासंध भीमसे भिड़कर बाहुयुद्ध करने लगा । उन दोनों वीरोंका वह युद्ध अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी था । उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सम्पूर्ण जगत्का संहार हो जायगा । वह द्वन्द्वयुद्ध सम्पूर्ण प्राणियोंके भयको बढ़ानेवाला था । उस समय भगवान् श्रीकृष्णने पुनः एक नरकट लेकर

पृष्ठ 1769

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पहलेकी ही भाँति चीरकर उसके दो टुकड़े कर दिये और उन दोनों टुकड़ोंको अलग- अलग

विपरीत दिशामें फेंक दिया । जरासंधके वधके लिये यह दूसरा संकेत था ।

भीमसेनस्तदा ज्ञात्वा निर्बिभेद च मागधम् ॥

द्विधा व्यत्यस्य पादेन प्राक्षिपच्च ननाद ह । भीमसेनने उसे समझकर पुनः मगधराजको दो टुकड़ोंमें चीर डाला और पैरसे ही उन दोनों टुकड़ोंको विपरीत दिशाओंमें करके फेंक दिया । इसके बाद वे विकट गर्जना करने

लगे ।

शुष्कमांसास्थिमेदस्त्वग्भिन्नमस्तिष्कपिण्डकः ॥

शवभूतस्तदा राजन् पिण्डीकृत इवाबभौ । ) राजन्! उस समय जरासंधका शरीर शवरूप होकर मांसके लोंदे - सा जान पड़ने लगा । उसके शरीरके मांस, हड्डियाँ, मेदा और चमड़ा सभी सूख गये थे । मस्तिष्क और शरीर दो भागों में विदीर्ण हो गये थे ।

तस्य निष्पिष्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः ।

अभवत् तुमुलो नादः सर्वप्राणिभयंकरः ॥ ८ ॥

वित्रेसुर्मागधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुस्रुवुः ।

भीमसेनस्य नादेन जरासंधस्य चैव ह ॥ ९ ॥

जब जरासंध रगड़ा जा रहा था और पाण्डुकुमार गर्ज- गर्जकर उसे पीसे डालते थे, उस समय भीमसेनकी गर्जना और जरासंधकी चीत्कारसे जो तुमुल नाद प्रकट हुआ, वह समस्त

प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था । उसे सुनकर सभी मगधनिवासी भयसे थर्रा उठे ।

स्त्रियोंके तो गर्भतक गिर गये ॥ ८ - ९ ॥

किं नु स्याद्धिमवान् भिन्नः किं नु स्विद् दीर्यते मही ।

इति वै मागधा जज्ञुर्भीमसेनस्य निःस्वनात् ॥ १० ॥

भीमसेनकी गर्जना सुनकर मगधके लोग भयभीत होकर सोचने लगे कि ' कहीं हिमालय पहाड़ तो नहीं फट पड़ा? कहीं पृथ्वी तो विदीर्ण नहीं हो रही है? ॥ १० ॥

ततो राज्ञः कुलद्वारि प्रसुप्तमिव तं नृपम् ।

रात्रौ गतासुमुत्सृज्य निश्चक्रमुररिंदमाः ॥ ११ ॥

तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे तीनों वीर रातमें राजा जरासंधके प्राणहीन शरीरको सोते हुएके समान राजभवनके द्वारपर छोड़कर वहाँसे चल दिये ॥ ११ ॥

जरासंधरथं कृष्णो योजयित्वा पताकिनम् ।

आरोप्य भ्रातरौ चैव मोक्षयामास बान्धवान् ॥ १२ ॥

श्रीकृष्णने जरासंधके ध्वजा - पताकामण्डित दिव्य रथको जोत लिया और उसपर दोनों भाई भीमसेन और अर्जुनको बिठाकर पहाड़ी खोहके पास जा वहाँ कैदमें पड़े हुए अपने बान्धवस्वरूप समस्त राजाओंको छुड़ाया ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1770

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वैरत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हाः पृथिवीश्वराः ।

राजानश्चक्रुरासाद्य मोक्षिता महतो भयात् ॥ १३ ॥

उस महान् भयसे छूटे हुए रत्नभोगी नरेशोंने भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें विविध रत्नोंसे युक्त कर दिया ॥ १३ ॥

अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः ।

रथमास्थाय तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ॥ १४ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण क्षतरहित और अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न थे । वे शत्रुपर विजय पा चुके थे, उस अवस्थामें वे उस दिव्य रथपर आरूढ़ हो कैदसे छूटे हुए राजाओंके साथ गिरिव्रज नगरसे बाहर निकले ॥ १४ ॥

यः स सोदर्यवान् नाम द्वियोधी कृष्णसारथिः ।

अभ्यासघाती संदृश्यो दुर्जयः सर्वराजभिः ॥ १५ ॥

उस रथका नाम था सोदर्यवान्, उसमें दो महारथी योद्धा एक साथ बैठकर युद्ध कर सकते थे, इस समय भगवान् श्रीकृष्ण उसके सारथि थे । उस रथमें बार- बार शत्रुओंपर आघात करनेकी सुविधा थी तथा वह दर्शनीय होनेके साथ ही समस्त राजाओंके लिये दुर्जय था ॥ १५ ॥

भीमार्जुनाभ्यां योधाभ्यामास्थितः कृष्णसारथिः ।

शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जयः सर्वधन्विभिः ॥ १६ ॥

शक्रविष्णू हि संग्रामे चेरतुस्तारकामये । भीम और अर्जुन — से दो योद्धा उस रथपर बैठे थे, श्रीकृष्ण सारथिका काम सँभाल रहे थे, सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंके लिये भी उसे जीतना कठिन था । इन दोनों रथियोंके द्वारा उस श्रेष्ठ रथकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो इन्द्र और विष्णु एक साथ बैठकर तारकामय संग्राममें विचर रहे हों ॥ १६३ ॥

रथेन तेन वै कृष्ण उपारुह्य ययौ तदा ॥ १७ ॥

तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना ।

मेघनिर्घोषनादेन जैत्रेणामित्रघातिना ॥ १८ ॥

वह रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था । उसमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं । उसकी घर्घराहट मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ती थी । वह शत्रुओंका विघातक और विजय प्रदान करनेवाला था । उसी रथपर सवार हो उसके द्वारा श्रीकृष्णने उस समय यात्रा की ॥ १७-१८ ॥

येन शक्रो दानवानां जघान नवतीर्नव ।

तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ॥ १ ९ ॥

यह वही रथ था, जिसके द्वारा इन्द्रने निन्यानबे दानवोंका वध किया था । उस रथको पाकर वे तीनों नरश्रेष्ठ बहुत प्रसन्न हुए ॥ १ ९ ॥