श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1771–1780
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1771–1780
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ततः कृष्णं महाबाहुं भ्रातृभ्यां सहितं तदा ।
रथस्थं मागधा दृष्ट्वा समपद्यन्त विस्मिताः ॥ २० ॥
तदनन्तर दोनों फुफेरे भाइयोंके साथ रथपर बैठे हुए महाबाहु श्रीकृष्णको देखकर मगधके निवासी बड़े विस्मित हुए ॥ २० ॥
हयैर्दिव्यैः समायुक्तो रथो वायुसमो जवे ।
अधिष्ठितः स शुशुभे कृष्णेनातीव भारत ॥ २१ ॥
वह रथ वायुके समान वेगशाली था, उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे । भारत! श्रीकृष्णके बैठ जानेसे उस दिव्य रथकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २१ ॥
असङ्गो देवविहितस्तस्मिन् रथवरे ध्वजः ।
योजनाद् ददृशे श्रीमानिन्द्रायुधसमप्रभः ॥ २२ ॥
उस उत्तम रथपर देवनिर्मित ध्वज फहराता रहता था, जो रथसे अछूता था (रथके साथ उसका लगाव नहीं था, वह बिना आधारके ही उसके ऊपर लहराया करता था ) । इन्द्रधनुषके समान प्रकाशमान बहुरंगी एवं शोभाशाली वह ध्वज एक योजन दूरसे ही दीखने लगता था ॥ २२ ॥
चिन्तयामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् ।
क्षणे तस्मिन् स तेनासीच्चैत्यवृक्ष इवोत्थितः ॥ २३ ॥
व्यादितास्यैर्महानादैः सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
तस्मिन् रथवरे तस्थौ गरुत्मान् पन्नगाशनः ॥ २४ ॥
उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गरुडजीका स्मरण किया । गरुडजी उसी क्षण वहाँ आ गये । उस रथकी ध्वजामें बहुत- से भूत मुँह बाये हुए विकट गर्जना करते रहते थे । उन्हींके साथ सर्पभोजी गरुडजी भी उस श्रेष्ठ रथपर स्थित हो गये । उनके द्वारा वह ध्वज ऊँचे उठे हुए चैत्य वृक्षके समान सुशोभित हो गया ॥ २३-२४ ॥
दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसाभ्यधिकं बभौ ।
आदित्य इव मध्याह्ने सहस्रकिरणावृतः ॥ २५ ॥
न स सज्जति वृक्षेषु शस्त्रैश्चापि न रिष्यते ।
दिव्यो ध्वजवरो राजन् दृश्यते चेह मानुषैः ॥ २६ ॥
अब वह उत्तम ध्वज सहस्रों किरणोंसे आवृत मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति अपने तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा । प्राणियोंके लिये उसकी ओर देखना कठिन हो गया । वह वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं था, अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा कटता नहीं था । राजन्! वह दिव्य और श्रेष्ठ ध्वज इस लोकके मनुष्योंको दृष्टिगोचर मात्र होता था ॥ २५-२६ ॥
तमास्थाय रथं दिव्यं पर्जन्यसमनिःस्वनम् ।
निर्ययौ पुरुषव्याघ्रः पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ॥ २७ ॥
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मेघके समान गम्भीर घर्घर ध्वनिसे परिपूर्ण उसी दिव्य रथपर भीमसेन और अर्जुनके साथ बैठे हुए पुरुषसिंह भगवान् श्रीकृष्ण नगरसे बाहर निकले ॥ २७ ॥
यं लेभे वासवाद् राजा वसुस्तस्माद् बृहद्रथः ।
बृहद्रथात् क्रमेणैव प्राप्तो बार्हद्रथं नृप ॥ २८ ॥
राजन्! इन्द्रसे उस रथको राजा वसुने प्राप्त किया था । फिर क्रमशः वसुसे बृहद्रथको और बृहद्रथसे जरासंधको वह रथ मिला था ॥ २८ ॥
स निर्याय महाबाहुः पुण्डरीकेक्षणस्ततः ।
गिरिव्रजाद् बहिस्तस्थौ समदेशे महायशाः ॥ २ ९ ॥
महायशस्वी कमलनयन महाबाहु श्रीकृष्ण गिरिव्रजसे बाहर आ समतल भूमिपर खड़े हुए ॥ २ ९ ॥
तत्रैनं नागराः सर्वे सत्कारेणाभ्ययुस्तदा ।
ब्राह्मणप्रमुखा राजन् विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ३० ॥
जनमेजय! वहाँ ब्राह्मण आदि सभी नागरिकोंने शास्त्रीय विधिसे उनका सत्कार एवं पूजन किया ॥ ३० ॥
बन्धनाद् विप्रमुक्ताश्च राजानो मधुसूदनम् ।
पूजयामासुरूचुश्च स्तुतिपूर्वमिदं वचः ॥ ३१ ॥
कैदसे छूटे हुए राजाओंने भी मधुसूदनकी पूजा की और उनकी स्तुति करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ३१ ॥
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नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने ।
भीमार्जुनबलोपेते धर्मस्य प्रतिपालनम् ॥ ३२ ॥
‘ महाबाहो! आप देवकी देवीको आनन्दित करनेवाले साक्षात् भगवान् हैं, भीमसेन और अर्जुनका बल भी आपके साथ है । आपके द्वारा जो धर्मकी रक्षा हो रही है, वह आप -सरीखे धर्मावतारके लिये आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३२ ॥
जरासंधह्रदे घोरे दुःखपङ्के निमज्जताम् ।
राज्ञां समभ्युद्धरणं यदिदं कृतमद्य वै ॥ ३३ ॥
‘ प्रभो! हम सब राजा दुःखरूपी पंकसे युक्त जरासंध-रूपी भयानक कुण्डमें डूब रहे थे, आपने जो आज हमारा यह उद्धार किया है, वह आपके योग्य ही है ॥ ३३ ॥
विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे ।
दिष्ट्या मोक्षाद् यशो दीप्तमाप्तं ते यदुनन्दन ॥ ३४ ॥
‘ विष्णो! अत्यन्त भयंकर पहाड़ी किलेमें कैद हो हम बड़े दुःखसे दिन काट रहे थे । यदुनन्दन! आपने हमें इस संकटसे मुक्त करके अत्यन्त उज्ज्वल यश प्राप्त किया है; यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ३४ ॥
किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र शाधि नः प्रणतिस्थितान् ।
कृतमित्येव तद् विद्धि नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ॥ ३५ ॥
' पुरुषसिंह! हम आपके चरणोंमें पड़े हैं । आप हमें आज्ञा दीजिये, हम क्या सेवा करें? कोई दुष्कर कार्य हो तो भी आपको यह समझना चाहिये मानो हम सब राजाओंने मिलकर उसे पूर्ण कर ही दिया' ॥ ३५ ॥
तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः ।
युधिष्ठिरो राजसूयं क्रतुमाहर्तुमिच्छति ॥ ३६ ॥
तब महामना भगवान् हृषीकेशने उन सबको आश्वासन देकर कहा – ' राजाओ! धर्मराज युधिष्ठिर राजसूययज्ञ करना चाहते हैं ॥ ३६ ॥
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः ।
सर्वैर्भवद्भिर्विज्ञाय साहाय्यं क्रियतामिति ॥ ३७ ॥
‘ धर्ममें तत्पर रहते हुए ही उन्हें सम्राट् पद प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है । इस कार्यमें तुम सब लोग उनकी सहायता करो ' ॥ ३७ ॥
ततः सुप्रीतमनसस्ते नृपा नृपसत्तम ।
तथेत्येवाब्रुवन् सर्वे प्रतिगृह्यास्य तां गिरम् ॥ ३८ ॥
नृपश्रेष्ठ जनमेजय! तब उन सभी राजाओंने प्रसन्नचित्त हो ' तथास्तु ' कहकर भगवान्की वह आज्ञा शिरोधार्य कर ली ॥ ३८ ॥
रत्नभाजं च दाशार्हं चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः ।
कृच्छ्राज्जग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पया ॥ ३ ९ ॥
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इतना ही नहीं, उन भूपालोंने दशार्हकुलभूषण भगवान्को रत्न भेंट किये । भगवान् गोविन्दने बड़ी कठिनाईसे उन सबपर कृपा करनेके लिये ही वह भेंट स्वीकार की ॥ ३ ९ ॥
जरासंधात्मजश्चैव सहदेवो महामनाः ।
निर्ययौ सजनामात्यः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ॥ ४० ॥
तदनन्तर जरासंधका पुत्र महामना सहदेव पुरोहितको आगे करके सेवकों और मन्त्रियोंके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ ४० ॥
स नीचैः प्रणतो भूत्वा बहुरत्नपुरोगमः ।
सहदेवो नृणां देवं वासुदेवमुपस्थितः ॥ ४१ ॥
उसके आगे रत्नोंका बहुत बड़ा भण्डार आ रहा था । सहदेव अत्यन्त विनीतभावसे चरणोंमें पड़कर नरदेव भगवान् वासुदेवकी शरणमें आया था ॥ ४१ ॥
(सहदेव उवाच
यत् कृतं पुरुषव्याघ्र मम पित्रा जनार्दन ।
तत् ते हृदि महाबाहो न कार्यं पुरुषोत्तम ॥
सहदेव बोला – पुरुषसिंह जनार्दन! महाबाहु पुरुषोतम! मेरे पिताने जो अपराध किया है, उसे आप अपने हृदयसे निकाल दें ।
त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द प्रसादं कुरु मे प्रभो ।
पितुरिच्छामि संस्कारं कर्तुं देवकिनन्दन ॥
गोविन्द! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। प्रभो! आप मुझपर कृपा कीजिये। देवकीनन्दन! मैं अपने पिताका दाह- संस्कार करना चाहता हूँ ।
त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य भीमसेनात् तथार्जुनात् ।
निर्भयो विचरिष्यामि यथाकामं यथासुखम् ॥
आपसे, भीमसेनसे तथा अर्जुनसे आज्ञा लेकर यह कार्य करूँगा और आपकी कृपासे निर्भय हो इच्छानुसार सुखपूर्वक विचरूँगा । वैशम्पायन उवाच
एवं विज्ञाप्यमानस्य सहदेवस्य मारिष ।
प्रहृष्टो देवकीपुत्रः पाण्डवौ च महारथौ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सहदेवके इस प्रकार निवेदन करनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण तथा महारथी भीमसेन और अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ।
क्रियतां संस्क्रिया राजन् पितुस्त इति चाब्रुवन् ।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पार्थयोश्च स मागधः ॥
प्रविश्य नगरं तूर्णं सह मन्त्रिभिरप्युत ।
चितां चन्दनकाष्ठैश्च कालेयसरलैस्तथा ॥
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कालागुरुसुगन्धैश्च तैलैश्च विविधैरपि ।
घृतधाराक्षतैश्चैव सुमनोभिश्च मागधम् ॥
समन्तादवकीर्यन्त दह्यन्तं मगधाधिपम् । उन सबने एक स्वरसे कहा - ' राजन्! तुम अपने पिताका अन्त्येष्टि - संस्कार करो । ' भगवान् श्रीकृष्ण तथा दोनों कुन्तीकुमारोंका यह आदेश सुनकर मगधराजकुमारने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया । फिर चन्दनकी लकड़ी तथा केसर, देवदारु और काला अगुरु आदि सुगन्धित काष्ठोंसे चिता बनाकर उसपर मगधराजका शव रखा गया । तत्पश्चात् जलती चितामें दग्ध होते हुए मगधराजके शरीरपर नाना प्रकारके चन्दनादि सुगन्धित तैल और घीकी धाराएँ गिरायी गयीं । सब ओरसे अक्षत और फूलोंकी वर्षा की
गयी ।
उदकं तस्य चक्रेऽथ सहदेवः सहानुजः ॥
कृत्वा पितुः स्वर्गगतिं निर्ययौ यत्र केशवः ।
पाण्डवौ च महाभागौ भीमसेनार्जुनावुभौ ॥
स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा विज्ञापयत माधवम् । शवदाहके पश्चात् सहदेवने अपने छोटे भाईके साथ पिताके लिये जलांजलि दी । इस प्रकार पिताका पारलौकिक कार्य करके राजकुमार सहदेव नगरसे निकलकर उस स्थानमें गया, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा महाभाग पाण्डुपुत्र भीमसेन और अर्जुन विद्यमान थे । उसने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा । सहदेव उवाच
इमे रत्नानि भूरीणि गोऽजाविमहिषादयः ।
हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानि च ॥
दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यते भवान् । ) सहदेवने कहा - प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़ - बकरे आदि पशु, बहुत - से रत्न, हाथी - घोड़े और नाना प्रकारके वस्त्र आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं । गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिरको दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझे सेवाके लिये आदेश दीजिये ।
भयार्ताय ततस्तस्मै कृष्णो दत्त्वाभयं तदा ।
आददेऽस्य महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः ॥ ४२ ॥
वह भयसे पीड़ित हो रहा था; पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने उसे अभयदान देकर उसके लाये हुए बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट स्वीकार कर ली ॥ ४२ ॥
अभ्यषिञ्चत तत्रैव जरासंधात्मजं मुदा ।
गत्वैकत्वं च कृष्णेन पार्थाभ्यां चैव सत्कृतः ॥ ४३ ॥
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तत्पश्चात् जरासंधकुमारको प्रसन्नतापूर्वक वहीं पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया । श्रीकृष्णने सहदेवको अपना अभिन्न सुहृद् बना लिया, इसलिये भीमसेन और अर्जुनने भी उसका बड़ा सत्कार किया ॥ ४३ ॥
विवेश राजा द्युतिमान् बार्हद्रथपुरं नृप ।
अभिषिक्तो महाबाहुर्जारासंधिर्महात्मभिः ॥ ४४ ॥
राजन्! उन महात्माओंद्वारा अभिषिक्त हो महाबाहु जरासंधपुत्र तेजस्वी राजा सहदेव अपने पिताके नगरमें लौट गया ॥ ४४ ॥
कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिया परमया युतः ।
रत्नान्यादाय भूरीणि प्रययौ पुरुषर्षभः ॥ ४५ ॥
और पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सर्वोत्तम शोभासे सम्पन्न हो प्रचुर रत्नोंकी भेंट ले दोनों कुन्तीकुमारोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ४५ ॥
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ।
समेत्य धर्मराजानं प्रीयमाणोऽभ्यभाषत ॥ ४६ ॥
भीमसेन और अर्जुनके साथ इन्द्रप्रस्थमें आकर भगवान् श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिरसे मिले और अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले- ॥ ४६ ॥
दिष्ट्या भीमेन बलवाञ्जरासंधो निपातितः ।
राजानो मोक्षिताश्चैव बन्धनान्नृपसत्तम ॥ ४७ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! सौभाग्यकी बात है कि महाबली भीमसेनने जरासंधको मार गिराया और समस्त राजाओंको उसकी कैदसे छुड़ा दिया ॥ ४७ ॥
दिष्ट्या कुशलिनौ चेमौ भीमसेनधनंजयौ ।
पुनः स्वनगरं प्राप्तावक्षताविति भारत ॥ ४८ ॥
‘ भारत! भाग्यसे ही ये दोनों भाई भीमसेन और अर्जुन अपने नगरमें पुनः सकुशल लौट आये और इन्हें कोई क्षति नहीं पहुँची ' ॥ ४८ ॥
ततो युधिष्ठिरः कृष्णं पूजयित्वा यथार्हतः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव प्रहृष्टः परिषस्वजे ॥ ४ ९ ॥
तब युधिष्ठिरने श्रीकृष्णका यथायोग्य सत्कार करके भीमसेन और अर्जुनको भी प्रसन्नतापूर्वक गले लगाया ॥ ४ ९ ॥
ततः क्षीणे जरासंधे भ्रातृभ्यां विहितं जयम् ।
अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ॥ ५० ॥
तदनन्तर जरासंधके नष्ट होनेपर अपने दोनों भाइयोंद्वारा की हुई विजयको पाकर अजातशत्रु राजा युधिष्ठिर भाइयोंसहित आनन्दमग्न हो गये ॥ ५० ॥
( हृष्टश्च धर्मराड् वाक्यं जनार्दनमभाषत । फिर धर्मराजने हर्षमें भरकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ।
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युधिष्ठिरउवाच
त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्र भीमसेनेन पातितः ।
मागधोऽसौ बलोन्मत्तो जरासंधः प्रतापवान् ॥
युधिष्ठिर बोले- पुरुषसिंह जनार्दन! आपका सहारा पाकर ही भीमसेनने बलके अभिमानसे उन्मत्त रहनेवाले प्रतापी मगधराज जरासंधको मार गिराया है ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं प्राप्स्यामि विगतज्वरः ।
त्वद्बुद्धिबलमाश्रित्य यागार्होऽस्मि जनार्दन ॥
अब मैं निश्चिन्त होकर यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूयका शुभ अवसर प्राप्त करूँगा । प्रभो! आपके बुद्धि - बलका सहारा पाकर मैं यज्ञ करनेयोग्य हो गया ।
पीतं पृथिव्यां युद्धेन यशस्ते पुरुषोत्तम ।
जरासंधवधेनैव प्राप्तास्ते विपुलाः श्रियः ॥
पुरुषोत्तम! इस युद्धसे भूमण्डलमें आपके यशका विस्तार हुआ । जरासंधके वधसे ही आपको प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त हुई है । वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य कौन्तेयः प्रादाद् रथवरं प्रभोः ।
प्रतिगृह्य तु गोविन्दो जरासंधस्य तं रथम् ॥
प्रहृष्टस्तस्य मुमुदे फाल्गुनेन जनार्दनः । प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मराजपुरस्कृतः ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भगवान्को श्रेष्ठ रथ प्रदान किया । जरासंधके उस रथको पाकर गोविन्द बड़े प्रसन्न हुए और अर्जुनके साथ उसमें बैठकर बड़े हर्षका अनुभव करने लगे । धर्मराज युधिष्ठिरके उस भेंटको अंगीकार करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ ।
यथावयः समागम्य भ्रातृभिः सह पाण्डवः ।
सत्कृत्य पूजयित्वा च विससर्ज नराधिपान् ॥ ५१ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भाइयोंके साथ जाकर समस्त राजाओंसे उनकी अवस्थाके अनुसार क्रमशः मिले; फिर उन सबका यथायोग्य सत्कार एवं पूजन करके उन्होंने सभी नरपतियोंको विदा कर दिया ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिराभ्यनुज्ञातास्ते नृपा हृष्टमानसाः ।
जग्मुः स्वदेशांस्त्वरिता यानैरुच्चावचैस्ततः ॥ ५२ ॥
राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा ले वे सब नरेश मन- ही- मन अत्यन्त प्रसन्न हो अनेक प्रकारकी सवारियोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक अपने - अपने देशको चले गये ॥ ५२ ॥
एवं पुरुषशार्दूलो महाबुद्धिर्जनार्दनः ।
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पाण्डवैर्घातयामास जरासंधमरिं तदा ॥ ५३ ॥
जनमेजय! इस प्रकार महाबुद्धिमान् पुरुषसिंह जनार्दनने उस समय पाण्डवोंद्वारा अपने शत्रु जरासंधका वध करवाया ॥ ५३ ॥
घातयित्वा जरासंधं बुद्धिपूर्वमरिंदमः ।
धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ॥ ५४ ॥
सुभद्रां भीमसेनं च फाल्गुनं यमजौ तथा ।
धौम्यमामन्त्रयित्वा च प्रययौ स्वां पुरीं प्रति ॥ ५५ ॥
तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना ।
धर्मराजविसृष्टेन दिव्येनानादयन् दिशः ॥ ५६ ॥
भारत! जरासंधको बुद्धिपूर्वक मरवाकर शत्रुदमन श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर, कुन्ती तथा द्रौपदीसे आज्ञा ले, सुभद्रा, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा धौम्यजीसे भी पूछकर धर्मराजके दिये हुए उसी मनके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए अपनी द्वारकापुरीको चले गये ॥ ५४–५६ ॥
ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ ।
प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥ ५७ ॥
भरतश्रेष्ठ! जाते समय युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंने अनायास ही सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा की ॥ ५७ ॥
ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने ।
जयं लब्ध्वा सुविपुलं राज्ञां दत्त्वाभयं तदा ॥ ५८ ॥
संवर्धितं यशो भूयः कर्मणा तेन भारत ।
द्रौपद्याः पाण्डवा राजन् परां प्रीतिमवर्धयन् ॥ ५ ९ ॥
भारत! महान् विजयको प्राप्त करके और जरासंधके द्वारा कैद किये हुए उन राजाओंको अभयदान देकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर उक्त कर्मके द्वारा पाण्डवोंके यशका बहुत विस्तार हुआ और वे पाण्डव द्रौपदीकी भी प्रीतिको बढ़ाने लगे ॥ ५८-५९ ॥
तस्मिन् काले तु यद् युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् ।
तद् राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ॥ ६० ॥
उस समय धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये जो उचित कर्तव्य था, उसका राजा युधिष्ठिरने धर्मपूर्वक पालन किया । वे प्रजाओंकी रक्षा करनेके साथ ही उन्हें धर्मका उपदेश भी देते रहते थे ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधवधे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें जरासंधवधविषयक चौबीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं ) नरकट बेंतकी तरह पोले डंठलका एक पौधा होता है, जो कलम बनानेके काम आता है ।
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(दिग्विजयपर्व) पञ्चविंशोऽध्यायः अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा वैशम्पायन उवाच
पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेषुधी ।
रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अर्जुन श्रेष्ठ धनुष, दो विशाल एवं अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वज और अद्भुत सभाभवन पहले ही प्राप्त कर चुके थे; अब वे युधिष्ठिरसे बोले ॥ १ ॥
अर्जुन उवाच
धनुरस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् ।
प्राप्तमेतन्मया राजन् दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ॥ २ ॥
अर्जुनने कहा —राजन्! मुझे धनुष, अस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रीकृष्ण- जैसे सहायक, भूमि ( राज्य एवं इन्द्रप्रस्थका दुर्ग ), यश और बल - ये सभी दुर्लभ एवं मनोवांछित वस्तुएँ प्राप्त हो चुकी हैं ॥ २ ॥
तत्र कृत्यमहं मन्ये कोशस्य परिवर्धनम् ।
करमाहारयिष्यामि राज्ञः सर्वान् नृपोत्तम ॥ ३ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब मैं अपने कोषको बढ़ाना ही आवश्यक कार्य समझता हूँ। मेरी इच्छा है कि समस्त राजाओंको जीतकर उनसे कर वसूल करूँ ॥ ३ ॥
विजयाय प्रयास्यामि दिशं धनदपालिताम् ।
तिथावथ मुहूर्ते च नक्षत्रे चाभिपूजिते ॥ ४ ॥
आपकी आज्ञा हो तो उत्तम तिथि, मुहूर्त और नक्षत्रमें कुबेरद्वारा पालित उत्तर दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान करूँ ॥ ४ ॥
(एतच्छ्रुत्वा कुरुश्रेष्ठो धर्मराजः सहानुजः ।
प्रहृष्टो मन्त्रिभिश्चैव व्यासधौम्यादिभिः सह ॥
ततो व्यासो महाबुद्धिरुवाचेदं वचोऽर्जुनम् ।