श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1781–1790

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1781–1790

पृष्ठ 1781

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यह सुनकर भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही मन्त्रियों तथा व्यास, धौम्य आदि महर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ । तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् व्यासजीने अर्जुनसे कहा । व्यास उवाच

साधु साध्विति कौन्तेय दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी ।

पृथिवीमखिलां जेतुमेकोऽध्यवसितो भवान् ॥

व्यासजी बोले – कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें बारंबार साधुवाद देता हूँ । सौभाग्यसे तुम्हारी बुद्धिमें ऐसा संकल्प हुआ है । तुम सारी पृथ्वीको अकेले ही जीतनेके लिये उत्साहित हो रहे हो ।

धन्यः पाण्डुर्महीपालो यस्य पुत्रस्त्वमीदृशः ।

सर्वं प्राप्स्यति राजेन्द्रो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

त्वद्वीर्येण स धर्मात्मा सार्वभौमत्वमेष्यति । राजा पाण्डु धन्य थे, जिनके पुत्र तुम ऐसे पराक्रमी निकले । तुम्हारे पराक्रमसे धर्मपुत्र धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर सब कुछ पा लेंगे । सार्वभौम सम्राट्के पदपर प्रतिष्ठित होंगे । त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राजसूयमवाप्स्यति ॥

सुनयाद् वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च ।

यमयोश्चैव वीर्येण सर्वं प्राप्स्यति धर्मराट् ॥

तुम्हारे बाहुबलका सहारा पाकर ये राजसूययज्ञ पूर्ण कर लेंगे । भगवान् श्रीकृष्णकी उत्तम नीति, भीम और अर्जुनके बल तथा नकुल और सहदेवके पराक्रमसे धर्मराज युधिष्ठिरको सब कुछ प्राप्त हो जायगा ।

तस्माद् दिशं देवगुप्तामुदीचीं गच्छ फाल्गुन ।

शक्तो भवान् सुराञ्जित्वा रत्नान्याहर्तुमोजसा ॥

इसलिये अर्जुन! तुम तो देवताओंद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशाकी यात्रा करो; क्योंकि देवताओंको जीतकर वहाँसे बलपूर्वक रत्न ले आनेमें तुम्हीं समर्थ हो ।

प्राचीं भीमो बलश्लाघी प्रयातु भरतर्षभः ।

याम्यां तत्र दिशं यातु सहदेवो महारथः ॥

प्रतीचीं नकुलो गन्ता वरुणेनाभिपालिताम् ।

एषा मे नैष्ठिकी बुद्धिः क्रियतां भरतर्षभाः ॥

अपने बलद्वारा दूसरोंसे होड़ लेनेवाले भरतकुल भूषण भीमसेन पूर्व दिशाकी यात्रा करें । महारथी सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करें और नकुल वरुणपालित पश्चिम दिशापर आक्रमण करें । भरतश्रेष्ठ पाण्डवो! मेरी बुद्धिका ऐसा ही निश्चय है । तुमलोग इसका पालन करो ।

पृष्ठ 1782

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वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा व्यासवचो हृष्टास्तमूचुः पाण्डुनन्दनाः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! व्यासजीकी यह बात सुनकर पाण्डवोंने बड़े हर्षके साथ कहा । पाण्डवा ऊचुः एवमस्तु मुनिश्रेष्ठ यथाऽऽज्ञापयसि प्रभो । ) पाण्डव बोले — मुनिश्रेष्ठ! आप जैसी आज्ञा देते हैं वैसा ही हो । वैशम्पायन उवाच

धनंजयवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

स्निग्धगम्भीरनादिन्या तं गिरा प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी पूर्वोक्त बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले – ॥ ५ ॥

स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् प्रयाहि भरतर्षभ ।

दुर्हृदामप्रहर्षाय सुहृदां नन्दनाय च ॥ ६ ॥

‘ भरतकुलभूषण! पूजनीय ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यात्रा करो । तुम्हारी यह यात्रा शत्रुओंका शोक और सुहृदोंका आनन्द बढ़ानेवाली हो ॥ ६ ॥

विजयस्ते ध्रुवं पार्थ प्रियं काममवाप्स्यसि ।

‘ पार्थ! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है, तुम अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करोगे ' ॥ ६३ ॥

इत्युक्तः प्रययौ पार्थः सैन्येन महताऽऽवृतः ॥ ७ ॥

अग्निदत्तेन दिव्येन रथेनाद्भुतकर्मणा ।

तथैव भीमसेनोऽपि यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ८ ॥

ससैन्याःप्रययुः सर्वे धर्मराजेन पूजिताः । उनके इस प्रकार आदेश देनेपर कुन्तीपुत्र अर्जुन विशाल सेनाके साथ अग्निके दिये हुए अद्भुतकर्मा दिव्य रथद्वारा वहाँसे प्रस्थित हुए । इसी प्रकार भीमसेन तथा नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव–इन सभी भाइयोंने धर्मराजसे सम्मानित हो सेनाओंके साथ दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया ॥ ७-८३ ॥ दिशं धनपतेरिष्टामजयत् पाकशासनिः ॥ ९ ॥

भीमसेनस्तथा प्राचीं सहदेवस्तु दक्षिणाम् ।

प्रतीचीं नकुलो राजन् दिशं व्यजयतास्त्रवित् ॥ १० ॥

राजन्! इन्द्रकुमार अर्जुनने कुबेरकी प्रिय उत्तर दिशापर विजय पायी । भीमसेनने पूर्व दिशा, सहदेवने दक्षिण दिशा तथा अस्त्रवेत्ता नकुलने पश्चिम दिशाको जीता ॥ ९ -१० ॥

पृष्ठ 1783

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खाण्डवप्रस्थमध्यस्थो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

आसीत् परमया लक्ष्म्या सुहृद्गणवृतः प्रभुः ॥ ११ ॥

केवल धर्मराज युधिष्ठिर सुहृदोंसे घिरे हुए अपनी उत्तम राजलक्ष्मीके स् खाण्डवप्रस्थमें रह गये थे ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि दिग्विजयसंक्षेपकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमेंदिग्विजयका संक्षिप्त वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल २०३ श्लोक हैं ) Fard

पृष्ठ 1784

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षड्विंशोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय जनमेजय उवाच

दिशामभिजयं ब्रह्मन् विस्तरेणानुकीर्तय ।

न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ १ ॥

जनमेजय बोले- ब्रह्मन्! दिग्विजयका विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये । अपने पूर्वजोंके इस महान् चरित्रको सुनते - सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

धनंजयस्य वक्ष्यामि विजयं पूर्वमेव ते ।

यौगपद्येन पार्थैर्हि निर्जितेयं वसुन्धरा ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यद्यपि कुन्तीके चारों पुत्रोंने एक ही समय इन चारों दिशाओंकी पृथ्वीपर विजय प्राप्त की थी, तो भी पहले तुम्हें अर्जुनका दिग्विजयवृत्तान्त सुनाऊँगा ॥ ||

पूर्वं कुलिन्दविषये वशे चक्रे महीपतीन् ।

धनंजयो महाबाहुर्नातितीव्रेण कर्मणा ॥ ३ ॥

महाबाहु धनंजयने अत्यन्त दुःसह पराक्रम प्रकट किये बिना ही पहले कुलिन्द देशके भूमिपालोंको अपने वशमें किया ॥ ३ ॥

आनर्तान् कालकूटांश्च कुलिन्दांश्च विजित्य सः ।

सुमण्डलं च विजितं कृतवान् सहसैनिकम् ॥ ४ ॥

कुलिन्दोंके साथ- साथ कालकूट और आनर्त देशके राजाओंको जीतकर सेनासहित राजा सुमण्डलको भी जीत लिया ॥ ४ ॥

स तेन सहितो राजन् सव्यसाची परंतपः ।

विजिग्ये शाकलं द्वीपं प्रतिविन्ध्यं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥

राजन्! तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने सुमण्डलको साथी बना लिया और उनके साथ जाकर शाकलद्वीप तथा राजा प्रतिविन्ध्य पर विजय प्राप्त की ॥ ५ ॥

शाकलद्वीपवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः ।

अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1785

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शाकलद्वीप तथा अन्य सातों द्वीपोंमें जो राजा रहते थे, उनके साथ अर्जुनके सैनिकोंका घमासान युद्ध हुआ ॥ ६ ॥

स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ ।

तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ॥ ७ ॥

भरतकुलभूषण जनमेजय! अर्जुनने उन महान् धनुर्धरोंको भी जीत लिया और उन सबको साथ लेकर प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ॥ ७ ॥

तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते ।

तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ८ ॥

महाराज! प्राग्ज्योतिषपुरके प्रधान राजा भगदत्त थे । उनके साथ महात्मा अर्जुनका बड़ा भारी`युद्ध हुआ ॥ ८ ॥

स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत् ।

अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः ॥ ९ ॥

प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश किरात, चीन तथा समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले अन्य बहुतेरे योद्धाओंसे घिरे हुए थे ॥ ९ ॥

ततः स दिवसानष्टौ योधयित्वा धनंजयम् ।

प्रहसन्नब्रवीद् राजा संग्रामविगतक्लमम् ॥ १० ॥

राजा भगदत्तने अर्जुनके साथ आठ दिनोंतक युद्ध किया, तो भी उन्हें युद्धसे थकते न देख वे हँसते हुए बोले- ॥ १० ॥

उपपन्नं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन ।

पाकशासनदायादे वीर्यमाहवशोभिनि ॥ ११ ॥

' महाबाहु कौरवनन्दन! तुम इन्द्रके पुत्र और संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर हो । तुममें ऐसा बल और पराक्रम उचित ही है ॥ ११ ॥

अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे ।

न शक्ष्यामि च ते तात स्थातुं प्रमुखतो युधि ॥ १२ ॥

‘ मैं देवराज इन्द्रका मित्र हूँ और युद्धमें उनसे तनिक भी कम नहीं हूँ, बेटा! तो भी मैं संग्राममें तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो सकूँगा ॥ १२ ॥

त्वमीप्सितं पाण्डवेय ब्रूहि किं करवाणि ते ।

यद् वक्ष्यसि महाबाहो तत् करिष्यामि पुत्रक ॥ १३ ॥

‘पाण्डुनन्दन! तुम्हारी इच्छा क्या है, बताओ? मैं तुम्हारा कौन- सा प्रिय कार्य करूँ? वत्स! महाबाहो! तुम जो कहोगे, वही करूँगा' ॥ १३ ॥

अर्जुन उवाच कुरूणामृषभो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

पृष्ठ 1786

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धर्मज्ञः सत्यसंधश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १४ ॥

तस्य पार्थिवतामीप्से करस्तस्मै प्रदीयताम् ।

भवान् पितृसखा चैव प्रीयमाणो मयापि च ।

ततो नाज्ञापयामि त्वां प्रीतिपूर्वं प्रदीयताम् ॥ १५ ॥

अर्जुन बोले- महाराज! धर्मज्ञ सत्यप्रतिज्ञ कुरु- कुलरत्न धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत दक्षिणा देकर राजसूययज्ञ करनेवाले हैं । मैं चाहता हूँ वे चक्रवर्ती सम्राट् हों । आप उन्हें कर दीजिये । आप मेरे पिताके मित्र हैं और मुझसे भी प्रेम रखते हैं; अतः मैं आपको आज्ञा नहीं दे सकता । आप प्रेमभावसे ही उन्हें भेंट दीजिये ॥ १४-१५ ॥ भगदत्त उवाच

कुन्तीमातर्यथा मे त्वं तथा राजा युधिष्ठिरः ।

सर्वमेतत् करिष्यामि किं चान्यत् करवाणि ते ॥ १६ ॥

भगदत्तने कहा – कुन्तीकुमार! मेरे लिये जैसे तुम हो वैसे राजा युधिष्ठिर हैं, मैं यह सब कुछ करूँगा । बोलो, तुम्हारे लिये और क्या करूँ? ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनदिग्विजये भगदत्तपराजये षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें अर्जुनदिग्विजयप्रसंगमें भगदत्तपराजयसम्बन्धी छब्बीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २६ ॥

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पृष्ठ 1787

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सप्तविंशोऽध्यायः अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजयः ।

अनेनैव कृतं सर्वमनुजानीहि याम्यहम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर धनंजयने भगदत्तसे कहा —‘राजन्! आपने जो कर देना स्वीकार कर लिया, इतनेसे ही मेरा सब सत्कार हो जायगा, अब आज्ञा दीजिये, मैं जाता हूँ' ॥ १ ॥

तं विजित्य महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।

प्रययावुत्तरां तस्माद् दिशं धनदपालिताम् ॥ २ ॥

भगदत्तको जीतकर महाबाहु कुन्तीपुत्र अर्जुन वहाँसे कुबेरद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशामें गये ॥ २ ॥

अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम् ।

तथैवोपगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥

कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि नामक प्रदेशोंपर विजय प्राप्त की ॥ ३ ॥

विजित्य पर्वतान् सर्वान् ये च तत्र नराधिपाः ।

तान् वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वशः ॥ ४ ॥

फिर समस्त पर्वतों और वहाँ निवास करनेवाले राजाओंको अपने अधीन करके उन्होंने सबसे धन वसूल किये ॥ ४ ॥

तैरेव सहितः सर्वैरनुरज्य च तान् नृपान् ।

उलूकवासिनं राजन् बृहन्तमुपजग्मिवान् ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् उन नरेशोंको प्रसन्न करके उन सबके साथ उलूकवासी राजा बृहन्तपर आक्रमण किया ॥ ५ ॥

मृदङ्गवरनादेन रथनेमिस्वनेन च ।

हस्तिनां च निनादेन कम्पयन् वसुधामिमाम् ॥ ६ ॥

जुझाऊ बाजे, श्रेष्ठ मृदंग आदिकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और हाथियोंकी गर्जनासे वे इस पृथ्वीको कँपाते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ६ ॥

ततो बृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरङ्गिणा ।

निष्क्रम्य नगरात् तस्माद् योधयामास फाल्गुनम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1788

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तब राजा बृहन्त तुरंत ही चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले और अर्जुनसे युद्ध करने लगे ॥ ७ ॥

सुमहान् संनिपातोऽभूद् धनंजयबृहन्तयोः ।

न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम् ॥ ८ ॥

उस समय अर्जुन और बृहन्तमें बड़े जोरकी मार- काट शुरू हुई, परंतु बृहन्त पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको न सह सके ॥ ८ ॥

सोऽविषह्यतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वरः ।

उपावर्तत दुर्धर्षो रत्नान्यादाय सर्वशः ॥ ९ ॥

कुन्तीकुमारको असह्य मानकर दुर्धर्ष वीर पर्वतराज बृहन्त युद्धसे हट गये और सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ९ ॥

स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ ।

सेनाबिन्दुमथो राजन् राज्यादाशु समाक्षिपत् ॥ १० ॥

जनमेजय! अर्जुनने बृहन्तका राज्य पुनः उन्हींके हाथमें सौंपकर उलूकराजके साथ सेनाबिन्दुपर आक्रमण किया और उन्हें शीघ्र ही राज्यच्युत कर दिया ॥ १० ॥

मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसंकुलम् ।

उलूकानुत्तरांश्चैव तांश्च राज्ञः समानयत् ॥ ११ ॥

तदनन्तर मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल तथा उत्तर उलूक देशों और वहाँके राजाओंको अपने अधीन किया ॥ ११ ॥

तत्रस्थः पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात् ।

किरीटी जितवान् राजन् देशान् पञ्चगणांस्ततः ॥ १२ ॥

राजन्! धर्मराजकी आज्ञासे किरीटधारी अर्जुनने वहीं रहकर अपने सेवकोंद्वारा पंचगण नामक देशोंको जीत लिया ॥ १२ ॥

स देवप्रस्थमासाद्य सेनाबिन्दोः पुरं प्रति ।

बलेन चतुरङ्गेण निवेशमकरोत् प्रभुः ॥ १३ ॥

वहाँसे सेनाबिन्दुकी राजधानी देवप्रस्थमें आकर चतुरंगिणी सेनाके साथ शक्तिशाली अर्जुनने वहीं पड़ाव डाला ॥ १३ ॥

स तैः परिवृतः सर्वैर्विष्वगश्वं नराधिपम् ।

अभ्यगच्छन्महातेजाः पौरवं पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥

नरश्रेष्ठ! उन सभी पराजित राजाओंसे घिरे हुए महातेजस्वी अर्जुनने पौरव राजा विष्वगश्वपर आक्रमण किया ॥ १४ ॥

विजित्य चाहवे शूरान् पर्वतीयान् महारथान् ।

जिगाय सेनया राजन् पुरं पौरवरक्षितम् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1789

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वहाँ संग्राममें शूरवीर पर्वतीय महारथियोंको परास्त करके पौरवद्वारा सुरक्षित उनकी राजधानीको भी सेनाद्वारा जीत लिया ॥ १५ ॥

पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून् पर्वतवासिनः ।

गणानुत्सवसंकेतानजयत् सप्त पाण्डवः ॥ १६ ॥

पौरवको युद्धमें जीतकर पर्वतनिवासी लुटेरोंके सात दलोंपर, जो ‘ उत्सवसंकेत ’ कहलाते थे, पाण्डुकुमार अर्जुनने विजय प्राप्त की ॥ १६ ॥

ततः काश्मीरकान् वीरान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।

व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ॥ १७ ॥

इसके बाद क्षत्रियशिरोमणि धनंजयने काश्मीरके क्षत्रियवीरोंको तथा दस मण्डलोंके साथ राजा लोहितको भी जीत लिया ॥ १७ ॥

ततस्त्रिगर्ताः कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा ।

क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥ १८ ॥

तदनन्तर त्रिगर्त, दार्व और कोकनद आदि बहुत - से क्षत्रियनरेशगण सब ओरसे कुन्तीनन्दन अर्जुनकी शरणमें आये ॥ १८ ॥

अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः ।

उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेऽजयत् ॥ १ ९ ॥

इसके बाद कुरुनन्दन धनंजयने रमणीय अभिसारी नगरीपर विजय पायी और उरगावासी राजा रोचमानको भी युद्धमें परास्त किया ॥ १ ९ ॥

ततः सिंहपुरं रम्यं चित्रायुधसुरक्षितम् ।

प्राधमद् बलमास्थाय पाकशासनिराहवे ॥ २० ॥

तदनन्तर इन्द्रकुमार अर्जुनने राजा चित्रायुधके द्वारा सुरक्षित सुरम्य नगर सिंहपुरपर सेना लेकर आक्रमण किया और उसे युद्धमें जीत लिया ॥ २० ॥

ततः सुह्मांश्च चोलांश्च किरीटी पाण्डवर्षभः ।

सहितः सर्वसैन्येन प्रामथत् कुरुनन्दनः ॥ २१ ॥

इसके बाद पाण्डवप्रवर कुरुकुलनन्दन किरीटीने अपनी सारी सेनाके साथ धावा करके सुह्म तथा चोल- देशकी सेनाओंको मथ डाला ॥ २१ ॥

ततः परमविक्रान्तो बाह्लीकान् पाकशासनिः ।

महता परिमर्देन वशे चक्रे दुरासदान् ॥ २२ ॥

तत्पश्चात् परम पराक्रमी इन्द्रकुमारने बड़ी भारी मार- काट मचाकर दुर्धर्ष वीर बाह्लीकोंको वशमें किया ॥ २२ ॥

गृहीत्वा तु बलं सारं फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः ।

दरदान् सह काम्बोजैरजयत् पाकशासनिः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1790

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पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने साथ शक्तिशालिनी सेना लेकर काम्बोजोंके साथ दरदोंको भी जीत लिया ॥ २३ ॥

प्रागुत्तरां दिशं ये च वसन्त्याश्रित्य दस्यवः निवसन्ति वने ये च तान् सर्वानजयत् प्रभुः ॥ २४ ॥

ईशान कोणका आश्रय ले जो लुटेरे या डाकू वनमें निवास करते थे, उन सबको शक्तिशाली धनंजयने जीतकर वशमें कर लिया ॥ २४ ॥

लोहान् परमकाम्बोजानृषिकानुत्तरानपि ।

सहितांस्तान् महाराज व्यजयत् पाकशासनिः ॥ २५ ॥

महाराज! लोह, परमकाम्बोज, ऋषिक तथा उत्तर देशोंको भी अर्जुनने एक साथ जीत लिया ॥ २५ ॥

ऋषिकेष्वपि संग्रामो बभूवातिभयंकरः ।

तारकामयसंकाशः परस्त्वृषिकपार्थयोः ॥ २६ ॥

ऋषिकदेशमें भी ऋषिकराज और अर्जुनमें तारकामय संग्रामके समान बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ २६ ॥

स विजित्य ततो राजन्नृषिकान् रणमूर्धनि ।

शुकोदरसमांस्तत्र हयानष्टौ समानयत् ॥ २७ ॥

राजन्! युद्धके मुहानेपर ऋषिकोंको हराकर अर्जुनने तोतेके उदरके समान हरे रंगवाले आठ घोड़े उनसे भेंट लिये ॥ २७ ॥

मयूरसदृशानन्यानुत्तरानपरानपि ।

जवनानाशुगांश्चैव करार्थं समुपानयत् ॥ २८ ॥

इनके सिवा मोरके समान रंगवाले उत्तम, गतिशील और शीघ्रगामी दूसरे भी बहुत - से घोड़े वे करके रूपमें वसूल कर लाये ॥ २८ ॥

स विनिर्जित्य संग्रामे हिमवन्तं सनिष्कुटम् ।

श्वेतपर्वतमासाद्य न्यविशत् पुरुषर्षभः ॥ २ ९ ॥

इसके बाद पुरुषोत्तम अर्जुन संग्राममें हिमवान् और निष्कुट प्रदेशके अधिपतियोंको जीतकर धवलगिरिपर आये और वहीं सेनाका पड़ाव डाला ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि फाल्गुनदिग्विजये नानादेशजये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें अर्जुनदिग्विजयके प्रसंगमें अनेक देशोंपर विजयसम्बन्धी सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥