श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1851–1860
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860
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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः राजसूययज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच
पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिरः ।
अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
भीष्मं द्रोणं कृपं द्रौणिं दुर्योधनविविंशती ।
अस्मिन् यज्ञे भवन्तों मामनुगृह्णन्तु सर्वशः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदिकी अगवानी करके युधिष्ठिरने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, दुर्योधन और विविंशतिसे कहा - 'इस यज्ञमें आपलोग सब प्रकारसे मुझपर अनुग्रह करें ॥ १-२ ॥
इदं वः सुमहच्चैव यदिहास्ति धनं मम ।
प्रणयन्तु भवन्तो मां यथेष्टमभिमन्त्रिताः ॥ ३ ॥
यहाँ मेरा जो यह महान् धन है, उसे आपलोग मेरी प्रार्थना मानकर इच्छानुसार सत्कर्मोंमें लगाइये ॥ ३ ॥
एवमुक्त्वा स तान् सर्वान् दीक्षितः पाण्डवाग्रजः ।
युयोज स यथायोगमधिकारेष्वनन्तरम् ॥ ४ ॥
यज्ञदीक्षित युधिष्ठिरने ऐसा कहकर उन सबको यथायोग्य अधिकारोंमें लगाया ॥ ४ ॥
भक्ष्यभोज्याधिकारेषु दुःशासनमयोजयत् ।
परिग्रहे ब्राह्मणानामश्वत्थामानमुक्तवान् ॥ ५ ॥
भक्ष्य- भोज्य आदि सामग्रीकी देख-रेख तथा उसके बाँटने परोसनेकी व्यवस्थाका अधिकार दुःशासनको दिया । ब्राह्मणोंके स्वागत- सत्कारका भार उन्होंने अश्वत्थामाको सौंप दिया ॥ ५ ॥
राज्ञां तु प्रतिपूजार्थं संजयं स न्ययोजयत् ।
कृताकृतपरिज्ञाने भीष्मद्रोणौ महामती ॥ ६ ॥
राजाओंकी सेवा और सत्कारके लिये धर्मराजने संजयको नियुक्त किया । कौन काम हुआ और कौन नहीं हुआ, इसकी देख- रेखका काम महाबुद्धिमान् भीष्म और द्रोणाचार्यको मिला ॥ ६ ॥
हिरण्यस्य सुवर्णस्य रत्नानां चान्ववेक्षणे ।
दक्षिणानां च वै दाने कृपं राजा न्ययोजयत् ॥ ७ ॥
तथान्यान् पुरुषव्याघ्रांस्तस्मिंस्तस्मिन् न्ययोजयत् ।
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बाह्लिको धृतराष्ट्रश्च सोमदत्तो जयद्रथः ।
नकुलेन समानीताः स्वामिवत् तत्र रेमिरे ॥ ८ ॥
उत्तम वर्णके स्वर्ण तथा रत्नोंको परखने, रखने और दक्षिणा देनेके कार्यमें राजाने कृपाचार्यकी नियुक्ति की । इसी प्रकार दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंको यथायोग्य भिन्न-भिन्न कार्योंमें लगाया । नकुलके द्वारा सम्मानपूर्वक बुलाकर लाये हुए बाह्निक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रथ वहाँ घरके मालिककी तरह सुखपूर्वक रहने और इच्छानुसार विचरने लगे ॥ ७-८ ॥
क्षत्ता व्ययकरस्त्वासीद् विदुरः सर्वधर्मवित् ।
दुर्योधनस्त्वर्हणानि प्रतिजग्राह सर्वशः ॥ ९ ॥
सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता विदुरजी धनको व्यय करनेके कार्यमें नियुक्त किये गये थे तथा राजा दुर्योधन कर देनेवाले राजाओंसे सब प्रकारकी भेंट स्वीकार करने और व्यवस्थापूर्वक रखनेका काम सँभाल रहे थे ॥ ९ ॥
चरणक्षालने कृष्णो ब्राह्मणानां स्वयं ह्यभूत् ।
सर्वलोकसमावृत्तः पिप्रीषुः फलमुत्तमम् ॥ १० ॥
सब लोगोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण सबको संतुष्ट करनेकी इच्छासे स्वयं ही ब्राह्मणोंके चरण पखारनेमें लगे थे, जिससे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥
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द्रष्टुकामाः सभां चैव धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
न कश्चिदाहरत् तत्र सहस्रावरमर्हणम् ॥ ११ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरको और उनकी सभाको देखनेकी इच्छासे आये हुए राजाओंमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे कम भेंट लाया हो ॥ ११ ॥
रत्नैश्च बहुभिस्तत्र धर्मराजमवर्धयत् ।
कथं तु मम कौरव्यो रत्नदानैः समाप्नुयात् ॥ १२ ॥
यज्ञमित्येव राजानः स्पर्धमाना ददुर्धनम् । प्रत्येक राजा बहुसंख्यक रत्नोंकी भेंट देकर धर्मराज युधिष्ठिरके धनकी वृद्धि करने लगा । सभी राजा यह होड़ लगाकर धन दे रहे थे कि कुरुनन्दन युधिष्ठिर किसी प्रकार मेरे ही दिये हुए रत्नोंके दानसे अपना यज्ञ सम्पूर्ण करें ॥ १२३ ॥
भवनैः सविमानाग्रैः सोदर्कैर्बलसंवृतैः ॥ १३ ॥
लोकराजविमानैश्च ब्राह्मणावसथैः सह ।
कृतैरावसथैर्दिव्यैर्विमानप्रतिमैस्तथा ॥ १४ ॥
विचित्रै रत्नवद्भिश्च ऋद्धया परमया युतैः ।
राजभिश्च समावृत्तैरतीव श्रीसमृद्धिभिः ।
अशोभत सदो राजन् कौन्तेयस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
राजन्! जिनके शिखर यज्ञ देखनेके लिये आये हुए देवताओंके विमानोंका स्पर्श कर रहे थे, जो जलाशयोंसे परिपूर्ण और सेनाओंसे घिरे हुए थे, उन सुन्दर भवनों, इन्द्रादि लोकपालोंके विमानों, ब्राह्मणोंके निवासस्थानों तथा परम समृद्धिसे सम्पन्न रत्नोंसे परिपूर्ण चित्र एवं विमानके तुल्य बने हुए दिव्य गृहोंसे, समागत राजाओंसे तथा असीम श्रीसमृद्धियोंसे महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी वह सभा बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १३— १५ ॥
ऋद्धया तु वरुणं देवं स्पर्धमानो युधिष्ठिरः ।
षडग्निनाथ यज्ञेन सोऽयजद् दक्षिणावता ॥ १६ ॥
महाराज युधिष्ठिर अपनी अनुपम समृद्धिद्वारा वरुणदेवताकी बराबरी कर रहे थे । उन्होंने यज्ञमें छः अग्नियोंकी* स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणा देकर उस यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन किया ॥ १६ ॥
सर्वाञ्जनान् सर्वकामैः समृद्धैः समतर्पयत् ।
अन्नवान् बहुभक्ष्यश्च भुक्तवज्जनसंवृतः ।
रत्नोपहारसम्पन्नो बभूव स समागमः ॥ १७ ॥
राजाने उस यज्ञमें आये हुए सब लोगोंको उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण करके संतुष्ट किया । वह यज्ञसमारोह अन्नसे भरापूरा था, उसमें खाने - पीनेकी सब सामग्रियाँ पर्याप्त
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मात्रामें सदा प्रस्तुत रहती थीं । वह यज्ञ खा- पीकर तृप्त हुए लोगोंसे ही पूर्ण था । वहाँ कोई भूखा नहीं रहने पाता था तथा उस उत्सवसमारोहमें सब ओर रत्नोंका ही उपहार दिया जाता था ॥ १७ ॥
इडाज्यहोमाहुतिभिर्मन्त्रशिक्षाविशारदैः ।
तस्मिन् हि ततृपुर्देवास्तते यज्ञे महर्षिभिः ॥ १८ ॥
मन्त्रशिक्षामें निपुण महर्षियोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें इडा ( मन्त्र-पाठ एवं स्तुति), घृतहोम तथा तिल आदि शाकल्य पदार्थोंकी आहुतियोंसे देवतालोग तृप्त हो गये ॥ १८ ॥
यथा देवास्तथा विप्रा दक्षिणान्नमहाधनैः ।
ततृपुः सर्ववर्णाश्च तस्मिन् यज्ञे मुदान्विताः ॥ १ ९ ॥
जिस प्रकार देवता तृप्त हुए उसी प्रकार दक्षिणामें अन्न और महान् धन पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गये । अधिक क्या कहा जाय, उस यज्ञमें सभी वर्णके लोग बड़े प्रसन्न थे, सबको पूर्ण तृप्ति मिली थी ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि यज्ञकरणे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयपर्वमें यज्ञकरणविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
* नीलकण्ठीकी टीकामें छः अग्नियाँ इस प्रकार बतायी गयी हैं - आरम्भणीय, क्षत्र, धृति, व्युष्टि, द्विरात्र और दशपेय ।
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(अर्घाभिहरणपर्व ) षट्त्रिंशोऽध्यायः राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा वैशम्पायन उवाच
ततोऽभिषेचनीयेऽह्नि ब्राह्मणा राजभिः सह ।
अन्तर्वेदीं प्रविविशुः सत्कारार्हा महर्षयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर अभिषेचनीय कर्मके दिन सत्कारके योग्य महर्षिगण और ब्राह्मणलोग राजाओंके साथ यज्ञभवनमें गये ॥ १ ॥
नारदप्रमुखास्तस्यामन्तर्वेद्यां महात्मनः ।
समासीनाः शुशुभिरे सह राजर्षिभिस्तदा ॥ २ ॥
समेता ब्रह्मभवने देवा देवर्षयस्तथा ।
कर्मान्तरमुपासन्तो जजल्पुरमितौजसः ॥ ३ ॥
एवमेतन्न चाप्येवमेवं चैतन्न चान्यथा ।
इत्यूचुर्बहवस्तत्र वितण्डा वै परस्परम् ॥ ४ ॥
महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञभवनमें राजर्षियोंके साथ बैठे हुए नारद आदि महर्षि उस समय ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और देवर्षियोंके समान सुशोभित हो रहे थे । बीच - बीचमें यज्ञसम्वन्धी एक- एक कर्मसे अवकाश पाकर अत्यन्त प्रतिभाशाली विद्वान् आपसमें जल्प ( वाद - विवाद ) करते थे । ‘ यह इसी प्रकार होना चाहिये ', ' नहीं, ऐसे नहीं होना चाहिये ’, ‘ यह बात ऐसी ही है, ऐसी ही है, इससे भिन्न नहीं है । ' इस प्रकार कह-कहकर बहुत - से वितण्डावादी द्विज वहाँ वाद - विवाद करते थे ॥ २–४ ॥
कृशानर्थांस्ततः केचिदकृशांस्तत्र कुर्वते ।
अकृशांश्च कृशांश्चक्रुर्हेतुभिः शास्त्रनिश्चयैः ॥ ५ ॥
कुछ विद्वान् शास्त्रनिश्चित नाना प्रकारके तर्कों और युक्तियोंसे दुर्बल पक्षोंको पुष्ट और पुष्ट पक्षोंको दुर्बल सिद्ध कर देते थे ॥ ५ ॥
तत्र मेधाविनः केचिदर्थमन्यैरुदीरितम् ।
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विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवामिषम् ॥ ६ ॥
वहीं कुछ मेधावी पण्डित, जो दूसरोंके कथनमें दोष दिखानेके ही अभ्यासी थे, अन्य लोगोंके कहे हुए अनुमानसाधित विषयको उसी तरह बीचसे ही लोक लेते थे, जैसे बाज मांसके लोथड़ेको आकाशमें ही एक- दूसरेसे छीन लेते हैं ॥ ६ ॥
केचिद् धर्मार्थकुशलाः केचित् तत्र महाव्रताः ।
रेमिरे कथयन्तश्च सर्वभाष्यविदां वराः ॥ ७ ॥
उन्हींमें कुछ लोग धर्म और अर्थके निर्णयमें अत्यन्त निपुण थे । कोई महान् व्रतका पालन करनेवाले थे । इस प्रकार सम्पूर्ण भाष्यके विद्वानोंमें श्रेष्ठ वे महात्मा अच्छी कथाएँ और शिक्षाप्रद बातें कहकर स्वयं भी सुखी होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते थे ॥ ७ ॥
सा वेदिर्वेदसम्पन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः ।
आबभासे समाकीर्णा नक्षत्रैर्द्यौरिवायता ॥ ८ ॥
जैसे नक्षत्रमालाओंद्वारा मण्डित विशाल आकाश मण्डलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वेदज्ञ देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और महर्षियोंसे वह वेदी सुशोभित हो रही थी ॥ ८ ॥
न तस्यां संनिधौ शूद्रः कश्चिदासीन्न चाव्रती ।
अन्तर्वेद्यां तदा राजन् युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ९ ॥
राजन् युधिष्ठिरकी यज्ञशालाके भीतर उस अन्तर्वेदीके आस - पास उस समय न तो कोई शूद्र था और न व्रतहीन द्विज ही ॥ ९ ॥
तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मीं तदा यज्ञविधानजाम् ।
तुतोष नारदः पश्यन् धर्मराजस्य धीमतः ॥ १० ॥
परम बुद्धिमान् राजलक्ष्मीसम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिरके उस धन- वैभव और यज्ञविधिको देखकर देवर्षि नारदको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १० ॥
अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप ।
नारदस्तु तदा पश्यन् सर्वक्षत्रसमागमम् ॥ ११ ॥
जनमेजय! उस समय वहाँ समस्त क्षत्रियोंका सम्मेलन देखकर मुनिवर नारदजी सहसा चिन्तित हो उठे ॥ ११ ॥
सस्मार च पुरा वृत्तां कथां तां पुरुषर्षभ ।
अंशावतरणे यासौ ब्रह्मणो भवनेऽभवत् ॥ १२ ॥
नरश्रेष्ठ! भगवान्के सम्पूर्ण अंशों (देवताओं ) -सहित अवतार लेनेके सम्बन्धमें ब्रह्मलोकमें पहले जो चर्चा हुई थी, वह प्राचीन घटना उन्हें याद आ गयी ॥ १२ ॥
देवानां संगमं तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन तु । नारदः पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम् ॥ १३ ॥
कुरुनन्दन! नारदजीने यह जानकर कि राजाओंके इस समुदायके रूपमें वास्तवमें देवताओंका ही समागम हुआ है, मन-ही- मन कमलनयन भगवान् श्रीहरिका चिन्तन
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किया ॥ १३ ॥
साक्षात् स विबुधारिघ्नः क्षत्रे नारायणो विभुः ।
प्रतिज्ञां पालयंश्चेमां जातः परपुरंजयः ॥ १४ ॥
वे सोचने लगे — ‘ अहो! सर्वव्यापक देवशत्रु विनाशक वैरिनगरविजयी साक्षात् भगवान् नारायणने ही अपनी इस प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये क्षत्रियकुलमें अवतार ग्रहण किया है ॥ १४ ॥
संदिदेश पुरायोऽसौ विबुधान् भूतकृत् स्वयम् ।
अन्योन्यमभिनिघ्नन्तः पुनर्लोकानवाप्स्यथ ॥ १५ ॥
' पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक साक्षात् उन्हीं भगवान्ने देवताओंको यह आदेश दिया था कि तुमलोग भूतलपर जन्म ग्रहण करके अपना अभीष्ट साधन करते हुए आपसमें एक- दूसरेको मारकर फिर देवलोकमें आ जाओगे ॥ १५ ॥
इति नारायणः शम्भुर्भगवान् भूतभावनः ।
आदित्यविबुधान् सर्वानजायत यदुक्षये ॥ १६ ॥
‘ कल्याणस्वरूप भूतभावन भगवान् नारायणने सब देवताओंको यह आज्ञा देनेके पश्चात् स्वयं भी यदुकुलमें अवतार लिया ॥ १६ ॥
क्षितावन्धकवृष्णीनां वंशे वंशभृतां वरः ।
परया शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट् ॥ १७ ॥
‘ अन्धक और वृष्णियोंके कुलमें वंशधारियोंमें श्रेष्ठ वे ही भगवान् इस पृथ्वीपर प्रकट हो अपनी सर्वोत्तम कान्तिसे उसी प्रकार शोभायमान हैं, जैसे नक्षत्रोंमें चन्द्रमा सुशोभित होते हैं ॥ १७ ॥
यस्य बाहुबलं सेन्द्राः सुराः सर्व उपासते ।
सोऽयं मानुषवन्नाम हरिरास्तेऽरिमर्दनः ॥ १८ ॥
‘ इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता जिनके बाहुबलकी उपासना करते हैं, वे ही शत्रुमर्दन श्रीहरि यहाँ मनुष्यके समान बैठे हैं ॥ १८ ॥
अहो बत महद्भूतं स्वयंभूर्यदिदं स्वयम् ।
आदास्यति पुनः क्षत्रमेवं बलसमन्वितम् ॥ १ ९ ॥
‘ अहो! ये स्वयम्भू महाविष्णु ऐसे बलसम्पन्न क्षत्रियसमुदायको पुनः उच्छिन्न करना चाहते हैं ' ॥ १ ९ ॥
इत्येतां नारदश्चिन्तां चिन्तयामास सर्ववित् ।
हरिं नारायणं ध्यात्वा यज्ञैरीज्यन्तमीश्वरम् ॥ २० ॥
तस्मिन् धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः ।
महाध्वरे महाबुद्धिस्तस्थौ स बहुमानतः ॥ २१ ॥
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धर्मज्ञ नारदजीने इसी पुरातन वृत्तान्तका स्मरण किया और ये भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञोंके द्वारा आराधनीय, सर्वेश्वर नारायण हैं; ऐसा समझकर वे धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् देवर्षि मेधावी धर्मराजके उस महायज्ञमें बड़े आदरके साथ बैठे रहे ॥ २०-२१ ॥
ततो भीष्मोऽब्रवीद् राजन् धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
क्रियतामर्हणं राज्ञां यथार्हमिति भारत ॥ २२ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् भीष्मजीने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा- ' भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! अब तुम यहाँ पधारे हुए राजाओंका यथायोग्य सत्कार करो’ ॥ २२ ॥
आचार्यमृत्विजं चैव संयुजं च युधिष्ठिर ।
स्नातकं च प्रियं प्राहुः षडर्ध्यार्हान् नृपं तथा ॥ २३ ॥
आचार्य, ऋत्विज्, सम्बन्धी, स्नातक, प्रिय मित्र तथा राजा- इन छहोंको अर्घ्य देकर पूजनेयोग्य बताया गया है ॥ २३ ॥
एतानर्ध्यानभिगतानाहुः संवत्सरोषितान् ।
त इमे कालपूगस्य महतोऽस्मानुपागताः ॥ २४ ॥
‘ ये यदि एक वर्ष बिताकर अपने यहाँ आवें तो इनके लिये अर्घ्य निवेदन करके इनकी पूजा करनी चाहिये, ऐसा शास्त्रज्ञ पुरुषोंका कथन है । ये सभी नरेश हमारे यहाँ सुदीर्घकालके पश्चात् पधारे हैं ॥ २४ ॥
एषामेकैकशो राजन्नर्घ्यमानीयतामिति ।
अथ चैषां वरिष्ठाय समर्थायोपनीयताम् ॥ २५ ॥
इसलिये राजन्! तुम बारी - बारीसे इन सबके लिये अर्घ्य दो और इन सबमें जो श्रेष्ठ एवं शक्तिशाली हो, उसको सबसे पहले अर्घ्य समर्पित करो ' ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कस्मै भवान् मन्यतेऽर्घ्यमेकस्मै कुरुनन्दन ।
उपनीयमानं युक्तं च तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुनन्दन पितामह! इन समागत नरेशोंमें किस एकको सबसे पहले अर्घ्य निवेदन करना आप उचित समझते हैं? यह मुझे बताइये ॥ २६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो भीष्मः शान्तनवो बुद्धया निश्चित्य वीर्यवान् ।
अमन्यत तदा कृष्णमर्हणीयतमं भुवि ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तब महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी बुद्धिसे निश्चय करके भगवान् श्रीकृष्णको ही भूमण्डलमें सबसे अधिक पूजनीय माना ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
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एष ह्येषां समस्तानां तेजोबलपराक्रमैः ।
मध्ये तपन्निवाभाति ज्योतिषामिव भास्करः ॥ २८ ॥
असूर्यमिव सूर्येण निर्वातमिव वायुना ।
भासितं ह्लादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि नः ॥ २ ९ ॥
भीष्मने कहा —कुन्तीनन्दन! ये भगवान् श्रीकृष्ण इन सब राजाओंके बीचमें अपने तेज, बल और पराक्रमसे उसी प्रकार देदीप्यमान हो रहे हैं, जैसे ग्रह- नक्षत्रोंमें भुवनभास्कर भगवान् सूर्य । अन्धकारपूर्ण स्थान जैसे सूर्यका उदय होनेपर ज्योतिसे जगमग हो उठता है और वायुहीन स्थान जैसे वायुके संचारसे सजीव- सा हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा हमारी यह सभा आह्लादित और प्रकाशित हो रही है ( अतः ये ही अग्रपूजाके योग्य हैं ) ॥ २८-२९ ॥
तस्मै भीष्माभ्यनुज्ञातः सहदेवः प्रतापवान् ।
उपजह्नेऽथ विधिवद् वार्ष्णेयायार्घ्यमुत्तमम् ॥ ३० ॥
भीष्मजीकी आज्ञा मिल जानेपर प्रतापी सहदेवने वृष्णिकुलभूषण भगवान् श्रीकृष्णको विधिपूर्वक उत्तम अर्घ्य निवेदन किया ॥ ३० ॥
प्रतिजग्राह तत् कृष्णः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।
शिशुपालस्तु तां पूजां वासुदेवे न चक्षमे ॥ ३१ ॥
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श्रीकृष्णने शास्त्रीय विधिके अनुसार वह अर्घ्य स्वीकार किया । वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीहरिकी वह पूजा राजा शिशुपाल नहीं सह सका ॥ ३१ ॥
स उपालभ्य भीष्मं च धर्मराजं च संसदि ।
अपाक्षिपद् वासुदेवं चेदिराजो महाबलः ॥ ३२ ॥
महाबली चेदिराज भरी सभामें भीष्म और धर्मराज युधिष्ठिरको उलाहना देकर भगवान् वासुदेवपर आक्षेप करने लगा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि श्रीकृष्णार्घ्यदाने षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें श्रीकृष्णको अर्घ्यदानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
Fara 3. जिसमें पूजनीय पुरुषोंका अभिषेक- अर्घ्य देकर सम्मान किया जाता है, उस कर्मका नाम अभिषेचनीय है । यह राजसूययज्ञका अंगभूत सोमयागविशेष है । २. यह एक प्रकारका वाद है, जिसमें वादी छल, जाति और निग्रहस्थानको लेकर अपने पक्षका मण्डन और विपक्षीके पक्षका खण्डन करता है । इसमें वादीका उद्देश्य तत्त्वनिर्णय नहीं होता, किंतु स्वपक्षस्थापन और परपक्षखण्डनमात्र होता है । वादके समान इसमें भी प्रतिज्ञा, हेतु आदि पाँच अवयव होते हैं । ३. जिस बहस या वाद- विवादका उद्देश्य अपने पक्षकी स्थापना या परपक्षका खण्डन न होकर व्यर्थकी बकवादमात्र हो, उसका नाम ' वितण्डा' है ।