श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1861–1870

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1861–1870

पृष्ठ 1861

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन शिशुपाल उवाच

नायमर्हति वार्ष्णेयस्तिष्ठत्स्विह महात्मसु ।

महीपतिषु कौरव्य राजवत् पार्थिवार्हणम् ॥ १ ॥

शिशुपाल बोला – कौरव्य! यहाँ इन महात्मा भूमिपतियोंके रहते हुए यह वृष्णिवंशी कृष्ण राजाओंकी भाँति राजोचित पूजाका अधिकारी कदापि नहीं हो सकता ॥ १ ॥

नायं युक्तः समाचारः पाण्डवेषु महात्मसु ।

यत् कामात् पुण्डरीकाक्षं पाण्डवार्चितवानसि ॥ २ ॥

बाला यूयं न जानीध्वं धर्मः सूक्ष्मो हि पाण्डवाः ।

अयं च स्मृत्यतिक्रान्तो ह्यापगेयोऽल्पदर्शनः ॥ ३ ॥

महात्मा पाण्डवोंके लिये यह विपरीत आचार कभी उचित नहीं है । पाण्डुकुमार! तुमने स्वार्थवश कमलनयन श्रीकृष्णका पूजन किया है । पाण्डवो! अभी तुमलोग बालक हो । तुम्हें धर्मका पता नहीं है, क्योंकि धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है । ये गंगानन्दन भीष्म बहुत बूढ़े हो गये हैं । अब इनकी स्मरणशक्ति जवाब दे चुकी है । इनकी सूझ और समझ भी बहुत कम हो गयी है ( तभी इन्होंने श्रीकृष्णपूजाकी सम्मति दी है ) ॥ २-३ ॥ DABA

पृष्ठ 1862

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त्वादृशो धर्मयुक्तो हि कुर्वाणः प्रियकाम्यया ।

भवत्यभ्यधिकं भीष्म लोकेष्ववमतः सताम् ॥ ४ ॥

भीष्म तुम्हारे -जैसा धर्मात्मा पुरुष भी जब मनमाना अथवा किसीका प्रिय करनेके लिये मुँहदेखी करने लगता है, तब वह साधु पुरुषोंके समाजमें अधिक अपमानका पात्र बन जाता है ॥ ४ ॥

कथं ह्यराजा दाशाहो मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ।

अर्हणामर्हति तथा यथा युष्माभिरर्चितः ॥ ५ ॥

यह सभी जानते हैं कि यदुवंशी कृष्ण राजा नहीं है, फिर सम्पूर्ण भूपालोंके बीच तुमलोगोंने जिस प्रकार इसकी पूजा की है, वैसी पूजाका अधिकारी यह कैसे हो सकता है? ॥ ५ ॥

अथ वा मन्यसे कृष्णं स्थविरं कुरुपुङ्गव ।

वसुदेवे स्थिते वृद्धे कथमर्हति तत्सुतः ॥ ६ ॥

कुरुपुंगव! अथवा यदि तुम श्रीकृष्णको बड़ा- बूढ़ा समझते हो तो इसके पिता वृद्ध वसुदेवजीके रहते हुए उनका यह पुत्र कैसे पूजाका पात्र हो सकता है? ॥ ६ ॥

अथ वा वासुदेवोऽपि प्रियकामोऽनुवृत्तवान् ।

द्रुपदे तिष्ठति कथं माधवोऽर्हति पूजनम् ॥ ७ ॥

आचार्यं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन ।

द्रोणे तिष्ठति वार्ष्णेयं कस्मादर्चितवानसि ॥ ८ ॥

अथवा यह मान लिया जाय कि वासुदेव कृष्ण तुमलोगोंका प्रिय चाहनेवाला और तुम्हारा अनुसरण करनेवाला सुहृद् है, इसीलिये तुमने इसकी पूजा की है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि तुम्हारे सबसे बड़े सुहृद् तो राजा द्रुपद हैं । उनके रहते यह माधव पूजा पानेका अधिकारी कैसे हो सकता है । कुरुनन्दन! अथवा यह समझ लें कि तुम कृष्णको आचार्य मानते हो, फिर भी आचार्योंमें भी बड़े - बूढ़े द्रोणाचार्यके रहते हुए इस यदुवंशीकी पूजा तुमने क्यों की है? ॥ ७-८ ॥

पृष्ठ 1863

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भीष्मका युधिष्ठिरको श्रीकृष्णकी महिमा बताना शिशुपालका युद्धके लिये उद्योग

पृष्ठ 1864

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ऋत्विजं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन ।

द्वैपायने स्थिते वृद्धे कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥ ९ ॥

कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! अथवा यदि यह कहा जाय कि तुम कृष्णको अपना ऋत्विज् समझते हो तो ऋत्विजोंमें भी सबसे वृद्ध द्वैपायन वेदव्यासके रहते हुए तुमने कृष्णकी अग्रपूजा कैसे की? ॥ ९ ॥

भीष्मे शान्तनवे राजन् स्थिते पुरुषसत्तमे ।

स्वच्छन्दमृत्युके राजन् कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥ १० ॥

अश्वत्थाम्नि स्थिते वीरे सर्वशास्त्रविशारदे ।

कथं कृष्णस्त्वया राजन्नर्चितः कुरुनन्दन ॥ ११ ॥

राजन्! शान्तनुनन्दन भीष्म पुरुषशिरोमणि तथा स्वच्छन्दमृत्यु हैं । इनके रहते तुमने कृष्णकी अर्चना कैसे की? कुरुनन्दन युधिष्ठिर! सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् वीर अश्वत्थामाके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजा कैसे कर डाली? ॥ १०-११ ॥

दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे ।

कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयार्चितः ॥ १२ ॥

द्रुमं किम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथार्चितः ।

भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत् कृतलक्षणे ॥ १३ ॥

नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च ।

शल्ये मद्राधिपे चैव कथं कृष्णस्त्वयार्चितः ॥ १४ ॥

पुरुषप्रवर राजाधिराज दुर्योधन और भरतवंशके आचार्य महात्मा कृपके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजाका औचित्य कैसे स्वीकार किया? तुमने किम्पुरुषोंके आचार्य द्रुमका उल्लंघन करके कृष्णकी अग्रपूजा क्यों की? पाण्डुके समान दुर्धर्ष वीर तथा राजोचित शुभ-लक्षणोंसे सम्पन्न भीष्मक, राजा रुक्मी और उसी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य तथा मद्रराज शल्यके रहते हुए तुम्हारे द्वारा कृष्णकी पूजा किस दृष्टिसे की गयी? ॥ १२–१४ ॥

अयं च सर्वराज्ञां वै बलश्लाघी महाबलः ।

जामदग्न्यस्य दयितः शिष्यो विप्रस्य भारत ॥ १५ ॥

येनात्मबलमाश्रित्य राजानो युधि निर्जिताः ।

तं च कर्णमतिक्रम्य कथं कृष्णस्त्वयार्चितः ॥ १६ ॥

भारत! ये जो अपने बलके द्वारा सब राजाओंसे होड़ लेते हैं, विप्रवर परशुरामजीके प्रिय शिष्य हैं तथा जिन्होंने अपने बलका भरोसा करके युद्धमें अनेक राजाओंको परास्त किया है, उन महाबली कर्णको छोड़कर तुमने कृष्णकी आराधना कैसे की? ॥ १५-१६ ॥

नैवर्त्विग् नैव चाचार्यो न राजा मधुसूदनः ।

अर्चितश्च कुरुश्रेष्ठ किमन्यत्प्रियकाम्यया ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1865

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कुरुश्रेष्ठ! मधुसूदन कृष्ण न ऋत्विज् है, न आचार्य है और न राजा ही है; फिर तुमने किस प्रिय कामनासे इसकी पूजा की है? ॥ १७ ॥

अथ वाभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदनः ।

किं राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत ॥ १८ ॥

भारत! अथवा यदि यह मधुसूदन ही तुमलोगोंका पूजनीय देवता है, इसलिये इसकी ही पूजा तुम्हें करनी थी तो इन राजाओंको केवल अपमानित करनेके लिये बुलानेकी क्या आवश्यकता थी? ॥ १८ ॥

वयं तु न भयादस्य कौन्तेयस्य महात्मनः ।

प्रयच्छामः करान् सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ॥ १ ९ ॥

राजाओ! हम सब लोग इन महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जो कर दे रहे हैं, वह भय, लोभ अथवा कोई विशेष आश्वासन मिलनेके कारण नहीं ॥ १ ९ ॥

अस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः ।

करानस्मै प्रयच्छामः सोऽयमस्मान् न मन्यते ॥ २० ॥

हमने तो यही समझा था कि यह धर्माचरणमें संलग्न रहनेवाला क्षत्रिय सम्राट्का पद पाना चाहता है तो अच्छा ही है । यही सोचकर हम उसे कर देते हैं, परंतु यह राजा युधिष्ठिर हमलोगोंको नहीं मानता है ॥ २० ॥

किमन्यदवमानाद्धि यदेनं राजसंसदि ।

अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्थ्येणार्चितवानसि ॥ २१ ॥

युधिष्ठिर! इससे बढ़कर दूसरा अपमान और क्या हो सकता है कि तुमने राजाओंकी सभामें जिसे राजोचित चिह्न छत्र- चँवर आदि प्राप्त नहीं हुआ है, उस कृष्णकी अर्घ्यके द्वारा पूजा की है ॥ २१ ॥

अकस्माद् धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् ।

को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत् ॥ २२ ॥

धर्मपुत्र युधिष्ठिरको अकस्मात् ही धर्मात्मा होनेका यश प्राप्त हो गया है, अन्यथा कौन ऐसा धर्मनिष्ठ पुरुष होगा जो किसी धर्मच्युतकी इस प्रकार पूजा करेगा ॥ २२ ॥

योऽयं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान् पुरा ।

जरासंधं महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान् ॥ २३ ॥

वृष्णिकुलमें पैदा हुए इस दुरात्माने तो कुछ ही दिन पहले महात्मा राजा जरासंधका अन्यायपूर्वक वध किया है ॥ २३ ॥

अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् ।

दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णेऽर्घ्यस्य निवेदनात् ॥ २४ ॥

आज युधिष्ठिरका धर्मात्मापन दूर निकल गया, क्योंकि इन्होंने कृष्णको अर्घ्य निवेदन करके अपनी कायरता ही दिखायी है ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1866

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यदि भीताश्च कौन्तेयाः कृपणाश्च तपस्विनः ।

ननु त्वयापि बोद्धव्यं यां पूजां माधवार्हसि ॥ २५ ॥

( अब शिशुपालने भगवान् श्रीकृष्णको देखकर कहा— ) माधव! कुन्तीके पुत्र डरपोक, कायर और तपस्वी हैं । इन्होंने तुम्हें ठीक- ठीक न जानकर यदि तुम्हारी पूजा कर दी तो तुम्हें तो समझना चाहिये था कि तुम किस पूजाके अधिकारी हो? ॥ २५ ॥

अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन ।

पूजामनर्हः कस्मात् त्वमभ्यनुज्ञातवानसि ॥ २६ ॥

अथवा जनार्दन! इन कायरोंद्वारा उपस्थित की हुई इस अग्रपूजाको उसके योग्य न होते हुए भी तुमने क्यों स्वीकार कर लिया? ॥ २६ ॥

अयुक्तामात्मनः पूजां त्वं पुनर्बहु मन्यसे ।

हविषः प्राप्य निष्यन्दं प्राशिताश्वेव निर्जने ॥ २७ ॥

जैसे कुत्ता एकान्तमें चूकर गिरे हुए थोड़े से हविष्य ( घृत ) - को चाट ले और अपनेको धन्य धन्य मानने लगे, उसी प्रकार तुम अपने लिये अयोग्य पूजा स्वीकार करके अपने-आपको बहुत बड़ा मान रहे हो ॥ २७ ॥

न त्वयं पार्थिवेन्द्राणामपमानः प्रयुज्यते ।

त्वामेव कुरवो व्यक्तं प्रलम्भन्ते जनार्दन ॥ २८ ॥

कृष्ण! तुम्हारी इस अग्रपूजासे हम राजाधिराजोंका कोई अपमान नहीं होता, परंतु ये कुरुवंशी पाण्डव तुम्हें अर्घ्य देकर वास्तवमें तुम्हींको ठग रहे हैं ॥ २८ ॥

क्लीबे दारक्रिया यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् ।

अराज्ञो राजवत् पूजा तथा ते मधुसूदन ॥ २ ९ ॥

मधुसूदन! जैसे नपुंसकका ब्याह रचाना और अंधेको रूप दिखाना उनका उपहास ही करना है, उसी प्रकार तुम - जैसे राज्यहीनकी यह राजाओंके समान पूजा भी विडम्बनामात्र ही है ॥ २ ९ ॥

दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीष्मश्च यादृशः ।

वासुदेवोऽप्ययं दृष्टः सर्वमेतद् यथातथम् ॥ ३० ॥

आज मैंने राजा युधिष्ठिरको देख लिया; भीष्म भी जैसे हैं, उनको भी देख लिया और इस वासुदेव कृष्णका भी वास्तविक रूप क्या है, यह भी देख लिया । वास्तवमें ये सब ऐसे ही हैं ॥ ३० ॥

इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय परमासनात् ।

निर्ययौ सदसस्तस्मात् सहितो राजभिस्तदा ॥ ३१ ॥

उनसे ऐसा कहकर शिशुपाल अपने उत्तम आसनसे उठकर कुछ राजाओंके साथ उस सभाभवनसे जानेको उद्यत हो गया ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1867

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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि शिशुपालक्रोधे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें शिशुपालकाक्रोधविषयक सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 1868

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा शिशुपालमुपाद्रवत् ।

उवाच चैनं मधुरं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिर शिशुपालके समीप दौड़े गये और उसे शान्तिपूर्वक समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले— ॥ १ ॥

नेदं युक्तं महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान् ।

अधर्मश्च परो राजन् पारुष्यं च निरर्थकम् ॥ २ ॥

‘ राजन्! तुमने जैसी बात कह डाली है, वह कदापि उचित नहीं है । किसीके प्रति इस प्रकार व्यर्थ कठोर बातें कहना महान् अधर्म है ॥ २ ॥

न हि धर्मं परं जातु नावबुध्येत पार्थिवः ।

भीष्मः शान्तनवस्त्वेनं मावमंस्थास्त्वमन्यथा ॥ ३ ॥

‘ शान्तनुनन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको न जानते हों ऐसी बात नहीं है, अतः तुम इनका अनादर न करो ॥ ३ ॥

पश्य चैतान् महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतरान् बहून् ।

मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत् त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥

‘देखो! ये सभी नरेश, जिनमेंसे कई तो तुम्हारी अपेक्षा बहुत बड़ी अवस्थाके हैं, श्रीकृष्णकी अग्रपूजाको चुपचाप सहन कर रहे हैं, इसी प्रकार तुम्हें भी इस विषयमें कुछ नहीं बोलना चाहिये ॥ ४ ॥

वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्चेदिपते भृशम् ।

न ह्येनं त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरवः ॥ ५ ॥

‘ चेदिराज! भगवान् श्रीकृष्णको यथार्थरूपसे हमारे पितामह भीष्मजी ही जानते हैं ।

कुरुनन्दन भीष्मजीको उनके तत्त्वका जैसा ज्ञान है, वैसा तुम्हें नहीं है ' ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

नास्मै देयो ह्यनुनयो नायमर्हति सान्त्वनम् ।

लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाभिमन्यते ॥ ६ ॥

भीष्मजीने कहा — धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्में सबसे बढ़कर हैं । वे ही परम पूजनीय हैं । जो उनकी अग्रपूजा स्वीकार नहीं करता है, उसकी अनुनय-ि-विनय

पृष्ठ 1869

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नहीं करनी चाहिये । वह सान्त्वना देने या समझाने -बुझानेके योग्य भी नहीं है ॥ ६ ॥

क्षत्रियः क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वरः ।

यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः ॥ ७ ॥

जो योद्धाओंमें श्रेष्ठ क्षत्रिय जिसे युद्धमें जीतकर अपने वशमें करके छोड़ देता है, वह उस पराजित क्षत्रियके लिये गुरुतुल्य पूज्य हो जाता है ॥ ७ ॥

अस्यां हि समितौ राज्ञामेकमप्यजितं युधि ।

न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्रतेजसा ॥ ८ ॥

राजाओंके इस समुदायमें एक भी भूपाल ऐसा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके तेजसे परास्त न हो चुका हो ॥ ८ ॥

न हि केवलमस्माकमयमर्च्यतमोऽच्युतः ।

त्रयाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुजः ॥ ९ ॥

महाबाहु श्रीकृष्ण केवल हमारे लिये ही परम पूजनीय हों, ऐसी बात नहीं है, ये तो तीनों लोकोंके पूजनीय हैं ॥ ९ ॥

कृष्णेन हि जिता युद्धे बहवः क्षत्रियर्षभाः ।

जगत् सर्वं च वार्ष्णेये निखिलेन प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥

श्रीकृष्णके द्वारा संग्राममें अनेक क्षत्रियशिरोमणि परास्त हुए हैं । यह सम्पूर्ण जगत् वृष्णिकुलभूषण भगवान् श्रीकृष्णमें ही पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है ॥ १० ॥

तस्मात् सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान् ।

एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी ॥ ११ ॥

इसीलिये हम दूसरे वृद्ध पुरुषोंके होते हुए भी श्रीकृष्णकी ही पूजा करते हैं, दूसरोंकी नहीं । राजन्! तुम्हें श्रीकृष्णके प्रति वैसी बातें मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये थीं । उनके प्रति तुम्हें ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये ॥ ११ ॥

ज्ञानवृद्धा मया राजन् बहवः पर्युपासिताः ।

तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान् ॥ १२ ॥

समागतानामश्रौषं बहुन् बहुमतान् सताम् । मैंने बहुत- से ज्ञानवृद्ध महात्माओंका संग किया है । अपने यहाँ पधारे हुए उन संतोंके मुखसे अनन्तगुणशाली भगवान् श्रीकृष्णके असंख्य बहुसम्मत गुणोंका वर्णन सुना ॥ १२३ ॥

कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः ॥ १३ ॥

बहुशः कथ्यमानानि नरैर्भूयः श्रुतानि मे । जन्मकालसे लेकर अबतक इन बुद्धिमान् श्रीकृष्णके जो -जो चरित्र बहुधा बहुतेरे मनुष्योंद्वारा कहे गये हैं, उन सबको मैंने बार- बार सुना है ॥ १३३ ॥

न केवलं वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1870

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न सम्बन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथंचन ।

अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भूतसुखावहम् ॥ १५ ॥

चेदिराज! हमलोग किसी कामनासे, अपना सम्बन्धी मानकर अथवा इन्होंने हमारा किसी प्रकारका उपकार किया है, इस दृष्टिसे श्रीकृष्णकी पूजा नहीं कर रहे हैं । हमारी दृष्टि तो यह है कि ये इस भूमण्डलके सभी प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाले हैं और बड़े - बड़े संत-महात्माओंने इनकी पूजा की है ॥ १४-१५ ॥

यशः शौर्यं जयं चास्य विज्ञायाच प्रयुञ्ज्महे ।

न च कश्चिदिहास्माभिः सुबालोऽप्यपरीक्षितः ॥ १६ ॥

हम इनके यश, शौर्य और विजयको भलीभाँति जानकर इनकी पूजा कर रहे हैं । यहाँ बैठे हुए लोगोंमेंसे कोई छोटा- सा बालक भी ऐसा नहीं है, जिसके गुणोंकी हमलोगोंने पूर्णतः परीक्षा न की हो ॥ १६ ॥

गुणैर्वृद्धानतिक्रम्य हरिरर्च्यतमो मतः ।

ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां बलाधिकः ॥ १७ ॥

श्रीकृष्णके गुणोंको ही दृष्टिमें रखते हुए हमने वयोवृद्ध पुरुषोंका उल्लंघन करके इनको ही परम पूजनीय माना है । ब्राह्मणोंमें वही पूजनीय समझा जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो तथा क्षत्रियोंमें वही पूजाके योग्य हैं, जो बलमें सबसे अधिक हो ॥ १७ ॥

वैश्यानां धान्यधनवाञ्छूद्राणामेव जन्मतः ।

पूज्यतायां च गोविन्दे हेतू द्वावपि संस्थितौ ॥ १८ ॥

वैश्योंमें वही सर्वमान्य है, जो धन - धान्यमें बढ़कर हो, केवल शूद्रोंमें ही जन्मकालको ध्यानमें रखकर जो अवस्थामें बड़ा हो, उसको पूजनीय माना जाता है । श्रीकृष्णके परम पूजनीय होनेमें दोनों ही कारण विद्यमान हैं ॥ १८ ॥

वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाभ्यधिकं तथा ।

नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ॥ १ ९ ॥

इनमें वेद- वेदांगोंका ज्ञान तो है ही, बल भी सबसे अधिक है । श्रीकृष्णके सिवा संसारके मनुष्योंमें दूसरा कौन सबसे बढ़कर है? ॥ १ ९ ॥

दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा ।

सन्नतिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताच्युते ॥ २० ॥

दान, दक्षता; शास्त्रज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धृति, तुष्टि और पुष्टि – ये सभी सद्गुण भगवान् श्रीकृष्णमें नित्य विद्यमान हैं ॥ २० ॥

तमिमं गुणसम्पन्नमार्यं च पितरं गुरुम् ।

अर्घ्यमर्चितमर्चार्हं सर्वे संक्षन्तुमर्हथ ॥ २१ ॥

जो अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य और पूजनीय है, उन सकलगुणसम्पन्न, श्रेष्ठ, पिता और गुरु भगवान् श्रीकृष्णकी हमलोगोंने पूजा की है, अतः सब राजालोग इसके लिये हमें क्षमा