श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1971–1980

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1971–1980

पृष्ठ 1971

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देवताओंके साथ रहते हैं ।

सूदिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ ।

कृतक्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥

शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ ।

धनुषश्च प्रणादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥

भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने मुरदैत्यके पाश काट दिये, निशुम्भ और नरकासुरको मार डाला और प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये निष्कण्टक बना दिया । इन्होंने अपने धनुषकी टंकार और पांचजन्य शंखके हुंकारसे समस्त भूपालोंको आतंकित कर दिया है ।

मेघप्रख्यैरनीकैश्च दाक्षिणात्यैः सुसंवृतम् ।

रुक्मिणं त्रासयामास केशवो भरतर्षभ ॥

भरतकुलभूषण! भगवान् केशवने उस रुक्मीको भी भयभीत कर दिया, जिसके पास मेघोंकी घटाके समान असंख्य सेनाएँ हैं और जो दाक्षिणात्य सेवकोंसे सदा सुरक्षित रहता है।

ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ।

उवाह महिषीं भोज्यामेष चक्रगदाधरः ॥

इन चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने रुक्मीको हराकर सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा भोजकुलोत्पन्ना रुक्मिणीका अपहरण किया, जो इस समय इनकी महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हैं ।

जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः ।

वक्रश्च सह शैब्येन शतधन्वा च क्षत्रियः ॥

ये जारूथी नगरीमें वहाँके राजा आहुतिको तथा क्राथ एवं शिशुपालको भी परास्त कर चुके हैं । इन्होंने शैब्य, दन्तवक्र तथा शतधन्वा नामक क्षत्रियोंको भी हराया है । इन्द्रद्युम्नो हतः क्रोधाद् यवनश्च कशेरुमान् ।

इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन और कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है ।

पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः ॥

विभिद्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनमयोधयत् । कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके द्युमत्सेनके

साथ युद्ध किया ।

महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ ॥

जग्राह भरतश्रेष्ठ वरुणस्याभितश्चरौ ।

इरावत्यामुभौ चैतावग्निसूर्यसमौ बले ॥

गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ।

पृष्ठ 1972

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भरतश्रेष्ठ! जो बलमें अग्नि और सूर्यके समान थे और वरुणदेवताके उभय पार्श्वमें विचरण करते तथा जिनमें पलक मारते - मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा महेन्द्र पर्वतके शिखरपर

इरावती नदीके किनारे पकड़े और मारे गये ।

अक्षप्रपतने चैव नेमिहंसपथेषु च ॥

उभौ तावपि कृष्णेन स्वराष्ट्रे विनिपातितौ । अक्षप्रपतनके अन्तर्गत नेमिहंसपथ नामक स्थानमें, जो उनके अपने ही राज्यमें पड़ता था, उन दोनोंको भगवान् श्रीकृष्णने मारा था ।

प्राग्ज्योतिषं पुरश्रेष्ठमसुरैर्बहुभिर्वृतम् ।

प्राप्य लोहितकूटानि कृष्णेन वरुणो जितः ॥

अजेयो दुष्प्रधर्षश्च लोकपालो महाद्युतिः । बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पुरश्रेष्ठ प्राग्ज्योतिषमें पहुँचकर वहाँकी पर्वतमालाके लाल शिखरोंपर जाकर श्रीकृष्णने उन लोकपाल वरुणदेवतापर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये

दुर्धर्ष, अजेय एवं अत्यन्त तेजस्वी हैं ।

इन्द्रद्वीपो महेन्द्रेण गुप्तो मघवता स्वयम् ॥

पारिजातो हृतः पार्थ केशवेन बलीयसा । पार्थ! यद्यपि इन्द्र पारिजातके लिये द्वीप ( रक्षक) बने हुए थे, स्वयं ही उसकी रक्षा

करते थे, तथापि महाबली केशवने उस वृक्षका अपहरण कर लिया ।

पाण्ड्यं पौण्ड्रं च मात्स्यं च कलिङ्गं च जनार्दनः ॥

जघान सहितान् सर्वानङ्गराजं च माधवः । लक्ष्मीपति जनार्दनने पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिंग और अंग आदि देशोंके समस्त

राजाओंको एक साथ पराजित किया ।

एष चैकशतं हत्वा रथेन क्षत्रपुङ्गवान् ॥

गान्धारीमवहत् कृष्णो महिषीं यादवर्षभः । यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने केवल एक रथपर चढ़कर अपने विरोधमें खड़े हुए सौ क्षत्रियनरेशोंको मौतके घाट उतारकर गान्धारराजकुमारी शिंशुमाको अपनी महारानी

बनाया ।

बभ्रोश्च प्रियमन्विच्छन्नेष चक्रगदाधरः ॥

वेणुदारिहृतां भार्यामुन्ममाथ युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! चक्र और गदा धारण करनेवाले इन भगवान्ने बभ्रुका प्रिय करनेकी इच्छासे

वेणुदारिके द्वारा अपहृत की हुई उनकी भार्याका उद्धार किया था ।

पर्याप्तां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् ॥

वेणुदारिवशे युक्तां जिगाय मधुसूदनः ।

पृष्ठ 1973

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इतना ही नहीं; मधुसूदनने वेणुदारिके वशमें पड़ी हुई घोड़ों, हाथियों एवं रथोंसहित

सम्पूर्ण पृथ्वीको भी जीत लिया ।

अवाप्य तपसा वीर्यं बलमोजश्च भारत ॥

त्रासिताः सगणाः सर्वे बाणेन विबुधाधिपाः ।

वज्राशनिगदापाशैस्त्रासयद्धिरनेकशः ॥

तस्य नासीद् रणे मृत्युर्देवैरपि सवासवैः ।

सोऽभिभूतश्च कृष्णेन निहतश्च महात्मना ॥

छित्त्वा बाहुसहस्रं तद् गोविन्देन महात्मना । भारत! जिस बाणासुरने तपस्याद्वारा बल, वीर्य और ओज पाकर समस्त देवेश्वरोंको उनके गणोंसहित भयभीत कर दिया था, इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा बारंबार वज्र, अशनि, गदा और पाशोंका प्रहार करके त्रास दिये जानेपर भी समरांगणमें जिसकी मृत्यु न हो सकी, उसी दैत्यराज बाणासुरको महामना भगवान् गोविन्दने उसकी सहस्र भुजाएँ काटकर

पराजित एवं क्षत-विक्षत कर दिया ।

एष पीठं महाबाहुः कंसं च मधुसूदनः ॥

पैठकं चातिलोमानं निजघान जनार्दनः । मधु दैत्यका विनाश करनेवाले इन महाबाहु जनार्दनने पीठ, कंस, पैठक और

अतिलोमा नामक असुरोंको भी मार दिया ।

जम्भमैरावतं चैव विरूपं च महायशाः ॥

जघान भरतश्रेष्ठ शम्बरं चारिमर्दनम् । भरतश्रेष्ठ! इन महायशस्वी श्रीकृष्णने जम्भ, ऐरावत, विरूप और शत्रुमर्दन

शम्बरासुरको भी ( अपनी विभूतियों द्वारा) मरवा डाला ।

एष भोगवतीं गत्वा वासुकिं भरतर्षभ ॥

निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रौहिणेयममोचयत् । भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरिने भोगवती- पुरीमें जाकर वासुकि नागको

हराकर रोहिणीनन्दनको * बन्धनसे छुड़ाया ।

एवं बहूनि कर्माणि शिशुरेव जनार्दनः ॥

कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् । इस प्रकार संकर्षणसहित कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें ही बहुत - से

अद्भुत कर्म किये थे ।

एवमेषोऽसुराणां च सुराणां चापि सर्वशः ॥

भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । ये ही देवताओं और असुरोंको सर्वथा अभय तथा भय देनेवाले हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं ।

पृष्ठ 1974

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एवमेष महाबाहुः शास्ता सर्वदुरात्मनाम् ॥ कृत्वा देवार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते । इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्टोंका दमन करनेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीहरि अनन्त देवकार्य

सिद्ध करके अपने परमधामको पधारेंगे ।

एष भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ॥

द्वारकामात्मसात् कृत्वा सागरं गमयिष्यति । ये महायशस्वी श्रीकृष्ण मुनिजनवांछित एवं भोगोंसे सम्पन्न रमणीय द्वारकापुरीको

आत्मसात् करके समुद्रमें विलीन कर देंगे ।

बहुपुण्यवतीं रम्यां चैत्ययूपवतीं शुभाम् ॥

द्वारकां वरुणावासं प्रवेक्ष्यति सकाननाम् । ये चैत्य और यूपोंसे सम्पन्न, परम पुण्यवती, रमणीय एवं मंगलमयी द्वारकाको वन-उपवनोंसहित वरुणालयमें डुबा देंगे । तां सूर्यसदनप्रख्यां मनोज्ञां शार्ङ्गधन्वना ॥ विश्लिष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति । सूर्यलोकके समान कान्तिमती एवं मनोरम द्वारकापुरीको जब शार्ङ्गधन्वा वासुदेव त्याग

देंगे, उस समय समुद्र इसे अपने भीतर ले लेगा ।

सुरासुरमनुष्येषु नाभून्न भविता क्वचित् ॥

यस्तामध्यवसद् राजा अन्यत्र मधुसूदनात् । भगवान् मधुसूदनके सिवा देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें ऐसा कोई राजा न हुआ

और न होगा ही, जो द्वारकापुरीमें रहनेका संकल्प भी कर सके ।

भ्राजमानास्तु शिशवो वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥

तज्जुष्टं प्रतिपत्स्यन्ते नाकपृष्ठं गतासवः । उस समय वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी एवं उनके कान्तिमान् शिशु भी प्राण

त्यागकर भगवत्सेवित परमधामको प्राप्त करेंगे ।

एवमेव दशार्हाणां विधाय विधिना विधिम् ॥

विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च सविता स्वयम् । इस प्रकार ये दशार्हवंशियोंके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे । ये स्वयं ही विष्णु,

नारायण, सोम, सूर्य और सविता हैं ।

अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्रकामगमो वशी ॥

मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव । ये अप्रमेय हैं । इनपर किसीका नियन्त्रण नहीं चल सकता । ये इच्छानुसार चलनेवाले और सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं । जैसे बालक खिलौनेसे खेलता है, उसी प्रकार ये भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ आनन्दमयी क्रीड़ा करते हैं ।

पृष्ठ 1975

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नैष गर्भत्वमापेदे न योन्यामवसत् प्रभुः ॥ आत्मनस्तेजसा कृष्णः सर्वेषां कुरुते गतिम् । ये प्रभु न तो किसीके गर्भमें आते हैं और न किसी योनिविशेषमें ही इनका आवास हुआ है अर्थात् ये अपने आप ही प्रकट हो जाते हैं । श्रीकृष्ण अपने ही तेजसे सबकी

सद्गति करते हैं ।

यथा बुद्बुद उत्थाय तत्रैव प्रविलीयते ॥

चराचराणि भूतानि तथा नारायणे सदा । जैसे बुद्बुद पानीसे उठकर फिर उसीमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार समस्त चराचर

भूत सदा भगवान् नारायणसे प्रकट होकर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं ।

न प्रमातुं महाबाहुः शक्यो भारत केशवः ॥

परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते । भारत! इन महाबाहु केशवकी कोई इतिश्री नहीं बतायी जा सकती । इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न पर और अपर कुछ भी नहीं है ।

अयं तु पुरुषो बालः शिशुपालो न बुध्यते ।

सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ॥ ३० ॥

यह शिशुपाल मूढ़बुद्धि पुरुष है, यह भगवान् श्रीकृष्णको सर्वत्र व्यापक तथा सर्वदा स्थिर नहीं जानता है, इसीलिये उनके सम्बन्धमें ऐसी बातें कहता है ॥ ३० ॥

यो हि धर्मं विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान् नरः ।

स वै पश्येद् यथा धर्मं न तथा चेदिराडयम् ॥ ३१ ॥

जो बुद्धिमान् मनुष्य उत्तम धर्मकी खोज करता है, वह धर्मके स्वरूपको जैसा समझता है, वैसा यह चेदिराज शिशुपाल नहीं समझता ॥ ३१ ॥

सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु ।

को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत् ॥

अथवा वृद्धों और बालकोंसहित यहाँ बैठे हुए समस्त महात्मा राजाओंमें ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण को पूज्य न मानता हो या कौन है, जो इनकी पूजा न करता हो? ॥ ३२ ॥

अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति ।

दुष्कृतायां यथान्यायं तथायं कर्तुमर्हति ॥ ३३ ॥

यदि शिशुपाल इस पूजाको अनुचित मानता है, तो अब उस अनुचित पूजाके विषयमें उसे जो उचित जान पड़े, वैसा करे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1976

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इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें भीष्मवाक्य नामक अड़तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७२८३ श्लोक मिलाकर कुल ७६१३ श्लोक हैं ) * जिनमें ऋतुधर्म ( रजस्वलावस्था) का प्रादुर्भाव न हुआ हो, उन्हें नग्निका कहते हैं । * मूर्ति या शिवलिंगके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो । शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था । - रोहिणीके गद और सारण आदि कई पुत्र थे ।

पृष्ठ 1977

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1977 का मूल पृष्ठ
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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबलः ।

व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवद् वचः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गये । तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने शिशुपालकी बातोंका मुँहतोड़ उत्तर देते हुए यह सार्थक बात कही— ॥ १ ॥

केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् ।

पूज्यमानं मया यो वः कृष्णं न सहते नृपाः ॥ २ ॥

सर्वेषां बलिनां मूर्ध्नि मयेदं निहितं पदम् ।

एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रब्रवीतु सः ॥ ३ ॥

स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशयः । ‘ राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया । मैंने खूब सोच- समझकर यह बात कही है । जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय । मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं ॥ २-३ ॥ मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् ॥ ४ ॥

अर्च्यमर्चितमर्घार्हमनुजानन्तु ते नृपाः । 'जो बुद्धिमान् राजा हों वे मेरे द्वारा की हुई आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय तथा अर्घ्यनिवेदनके सर्वथा योग्य भगवान् श्रीकृष्णकी पूजाका हृदयसे अनुमोदन करें ' ॥ ४३ ॥

ततो न व्याजहारैषां कश्चिद् बुद्धिमतां सताम् ॥ ५ ॥

मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे । सहदेवने महामानी और बलवान् राजाओंके बीच खड़े होकर अपना पैर दिखाया था, तो भी जो बुद्धिमान् एवं श्रेष्ठ नरेश थे, उनमेंसे कोई कुछ न बोला ॥ ५३ ॥

ततोऽपतत् पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि ॥ ६ ॥

अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन् साधु साध्विति ।

पृष्ठ 1978

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उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने ‘ साधु ', ' साधु' कहकर उनके सत्साहसकी प्रशंसा की ॥ ६३ ॥

आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पकः ॥ ७ ॥

सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित् ।

उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः ॥ ८ ॥

तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले – ॥ ७-८ ॥

कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः ।

जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्याः कदाचन ॥ ९ ॥

‘जो मानव कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते -जी ही मृतक-तुल्य समझे जायँगे । ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये ' ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

पूजयित्वा च पूजार्हान् ब्रह्मक्षत्रविशेषवित् ।

सहदेवो नृणां देवः समापद्यत कर्म तत् ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने - वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया ॥ १० ॥

तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः ।

अतिताम्रेक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान् ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा— ॥ ११ ॥

स्थितः सेनापतिर्योऽहं मन्यध्वं किं तु साम्प्रतम् ।

युधि तिष्ठाम संनह्य समेतान् वृष्णिपाण्डवान् ॥ १२ ॥

‘ भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो । आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जायँ' ॥ १२ ॥

इति सर्वान् समुत्साह्य राज्ञस्तांश्चेदिपुङ्गवः ।

यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः ॥ १३ ॥

तत्राहूता गताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः ।

समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1979

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इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की । शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये । वे सब- के - सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी ॥ १३-१४ ॥

युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम् ।

न स्याद् यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाब्रुवन् ॥ १५ ॥

उन सबने यह कहा कि ' युधिष्ठिरके अभिषेक और श्रीकृष्णकी पूजाका कार्य सफल न हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिये ' ॥ १५ ॥

निष्कर्षान्निश्चयात् सर्वे राजानः क्रोधमूर्च्छिताः ।

अब्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात् ॥ १६ ॥

इस निर्णय एवं निष्कर्षपर पहुँचकर वे सभी नरेश क्रोधसे मोहित हो गये । सहदेवकी बातोंसे अपमानका अनुभव करके अपनी शक्तिकी प्रबलताका विश्वास करके राजाओंने उपर्युक्त बातें कही थीं ॥ १६ ॥

सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ ।

आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् ॥ १७ ॥

अपने सगे - सम्बन्धियोंके मना करनेपर भी उनका क्रोधसे तमतमाता हुआ शरीर उन सिंहोंके समान सुशोभित हुआ, जो मांससे वंचित कर दिये जानेके कारण दहाड़ रहे हों ।

तं बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् ।

कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा ॥ १८ ॥

राजाओंका वह समुदाय अक्षय समुद्रकी भाँति उमड़ रहा था । उसका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था । सेनाएँ ही उसकी अपार जलराशि थीं । उसे इस प्रकार शपथ करते देख भगवान् श्रीकृष्णने यह समझ लिया कि अब ये नरेश युद्धके लिये तैयार हैं ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि राजमन्त्रणे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें राजाओंकी मन्त्रणाविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३९ ॥

पृष्ठ 1980

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(शिशुपालवधपर्व ) चत्वारिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना वैशम्पायन उवाच

ततः सागरसंकाशं दृष्ट्वा नृपतिमण्डलम् ।

संवर्तवाताभिहतं भीमं क्षुब्धमिवार्णवम् ॥ १ ॥

रोषात् प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः ।

भीष्मं मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरुपितामहम् ।

बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं— ॥ १-२ ॥

असौ रोषात् प्रचलितो महान् नृपतिसागरः ।

अत्र यत् प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥

‘ पितामह! यह देखिये, राजाओंका महासमुद्र रोषसे अत्यन्त चंचल हो उठा है । अब यहाँ इन सबको शान्त करनेका जो उचित उपाय जान पड़े, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥

यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात् प्रजानां च हितं भवेत् ।

यथा सर्वत्र तत् सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह ॥ ४ ॥

' दादाजी! यज्ञमें विघ्न न पड़े और प्रजाओंका हित हो तथा जिस प्रकार सर्वत्र शान्ति भी बनी रहे, वह सब उपाय अब मुझे बतानेकी कृपा करें' ॥ ४ ॥

इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे ।

उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः ॥५ ॥

धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुरुकुलपितामह भीष्मजी इस प्रकार बोले – ॥ ५ ॥

मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमर्हति ।

शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मया पूर्वतरं वृतः ॥ ६ ॥