श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1961–1970
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1961–1970
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एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् ।
सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा कहकर सबसे विदा ले देवराज इन्द्रने बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेवको हृदयसे लगाया ।
प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं च सारणम् ।
बभुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ॥
सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम् ।
सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम् ॥
प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सारण, बभ्रु, झल्लि, गद, भानु, चारुदेष्ण, सारण और अक्रूरका भी सत्कार करके वृत्रासुरनिषुदन इन्द्रने पुनः सात्यकिसे वार्तालाप किया । इसके बाद वृष्णि और कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनको गले लगाया ।
भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्चान्धकवृष्णिषु ।
आमन्त्र्य देवप्रवरो वासवो वासवानुजम् ॥
तत्पश्चात् भोज, कृतवर्मा तथा अन्य अन्धकवंशी एवं वृष्णिवंशियोंका आलिंगन करके देवराजने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णसे विदा ली ।
ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः ।
पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपतिः ॥
तदनन्तर शचीपति भगवान् इन्द्र सब प्राणियोंके देखते-देखते श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए ।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम् ।
मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्तमिवासकृत् ॥
वह श्रेष्ठ गजराज अपनी गम्भीर गर्जनासे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको बारंबार निनादित- सा कर रहा था ।
हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम् ।
मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम् ॥
उसकी पीठपर सोनेके खंभोंसे युक्त बहुत बड़ा हौदा कसा हुआ था। उसके दाँतोंमें सोना मढ़ा गया था । उसके ऊपर मनोहर झूल पड़ी हुई थी। वह सब प्रकारके रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित था ।
अनेकशतरत्नाभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।
नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम् ॥
सैकड़ों रत्नोंसे अलंकृत पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । उसके मस्तकसे निरन्तर मदकी धारा इस प्रकार बहती रहती थी, मानो मेघ पानी बरसा रहा हो । दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः ।
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प्रबभौ मन्दराग्रस्थः प्रतपन् भानुमानिव ॥ वह विशालकाय दिग्गज सोनेकी माला धारण किये हुए था । उसपर बैठे हुए देवराज इन्द्र मन्दराचलके शिखरपर तपते हुए सूर्यदेवकी भाँति उद्भासित हो रहे थे ।
ततो वज्रमयं भीमं प्रगृह्य परमाङ्कुशम् ।
ययौ बलवता सार्धं पावकेन शचीपतिः ॥
तदनन्तर शचीपति इन्द्र वज्रमय भयंकर एवं विशाल अंकुश लेकर बलवान् अग्निदेवके साथ स्वर्गलोकको चल दिये ।
तं करेणुगजव्रातैर्विमानैश्च मरुद्गणाः ।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः कुबेरवरुणग्रहाः ॥
उनके पीछे हाथी- हथिनियोंके समुदायों और विमानोंद्वारा मरुद्गण, कुबेर तथा वरुण आदि देवता भी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ।
स वायुपथमास्थाय वैश्वानरपथं गतः ।
प्राप्य सूर्यपथं देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
इन्द्रदेव पहले वायुपथमें पहुँचकर वैश्वानरपथ ( तेजोमय लोक ) में जा पहुँचे । तत्पश्चात् सूर्यदेवके मार्गमें जाकर वहाँ अन्तर्धान हो गये ।
ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्रुता ॥
रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पतिव्रता ।
सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि वा ॥
विशोका लक्ष्मणा साध्वी सुमित्रा केतुमा तथा ।
वासुदेवमहिष्योऽन्याः श्रिया सार्धं ययुस्तदा ॥
विभूतिं द्रष्टुमनसः केशवस्य वराङ्गनाः ।
प्रीयमाणाः सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम् ॥
तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ, राजा उग्रसेनकी रानियाँ, नन्दगोपकी विश्वविख्यात रानी यशोदा, महाभागा रेवती ( बलभद्र- पत्नी ) तथा पतिव्रता रुक्मिणी, सत्या, जाम्बवती, गान्धारराजकन्या शिंशुमा, विशोका, लक्ष्मणा, साध्वी सुमित्रा, केतुमा तथा भगवान् वासुदेवकी अन्य रानियाँ - वे सब की सब श्रीजीके साथ भगवान् केशवकी विभूति एवं नवागत सुन्दरी रानियोंको देखनेके लिये और श्रीअच्युतका दर्शन करनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ सभाभवनमें गयीं ।
देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता ।
ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभृता सह ॥
देवकी तथा रोहिणीजी सब रानियोंके आगे चल रही थीं । सबने वहाँ जाकर श्रीबलरामजीके साथ बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा ।
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तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च ।
अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥
देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातरः । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया । फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की । ववन्दे सह रामेण भगवान् वासवानुजः ॥ अथासनवरं प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ॥ उभावङ्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान् उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकुलकी महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम
और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया ।
सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ॥
देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उस समय माता देवकीकी वैसी
ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है ।
ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ॥
जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची । भारत! उसके श्रीअंग दिव्य
प्रभासे प्रज्वलित - से हो रहे थे ।
एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां तां कामरूपिणीम् ॥
यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था 'एकानंगा' । जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम
श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था ।
ततः स भगवान् समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् ॥
मूर्क्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना ।
दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥
तब भगवान् बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य - स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा । तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने
हाथसे पकड़ लिया ।
ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः ॥
रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयोः । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों ।
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अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ॥ वृष्णयोऽवाकिरन् प्रीताः संकर्षणजनार्दनौ । तत्पश्चात् वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा ( खील ),
फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की ।
सबालाः सहवृद्धाश्च सज्ञातिकुलबान्धवाः ॥
उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् । उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु- बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी
प्रसन्नतापूर्वक भगवान् मधुसूदनके समीप बैठ गये ।
पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः ॥
विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः । इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलमें प्रवेश किया । रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् ।
अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत ।
सर्वासां च यदुश्रेष्ठः सर्वकालविहारवान् ॥
वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे । भारत! तत्पश्चात् सदा लीला- विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमशः सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास -स्थानोंमें गये । जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः स्वं निवेशनम् ।
फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे ।
एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः ॥
एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः । तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है । इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है । (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[ भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण- माहात्म्यका उपसंहार ] भीष्म उवाच
द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् ।
सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥
भीष्मजी कहते हैं - महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन- रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे ।
पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा ।
सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित- साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था ।
बाणो नामाभवद् राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली ।
वीर्यवान् भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥
भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था । वह महान् बलवान् और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था ।
ततश्चक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप ।
रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहूः ॥
राजन्! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की । उसने बहुत वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की ।
तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना ।
तस्माल्लब्ध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् ससुरैरपि ॥
स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली । महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये । भगवान् शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर
बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा ।
त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥
विजित्य विबुधान् सर्वान् सेन्द्रान् बाणः समा बहूः ।
अशासत महद् राज्यं कुबेर इव भारत ॥
भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था । उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान् राज्यका शासन किया । ऋद्धयर्थं कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कविः ।
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ज्ञानी विद्वान् शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे ।
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ॥
रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकायाः सुता यथा । राजन्! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी । वह मेनका अप्सराकी पुत्री - सी प्रतीत होती थी । अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ॥ प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह । कुन्तीनन्दन! महान् तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर
छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे ।
अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ॥
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया सह ।
गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ॥
युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें हँस देनेके लिये बंदी बना लिया ।
सुकुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखमवाप सः ।
बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ॥
राजन्! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा । बाणासुरके द्वारा भाँति- भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये ।
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः ।
द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ॥
कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले । नारद उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन ।
त्वत्पौत्रो बाध्यमानोऽथ बाणेनामिततेजसा ॥
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा । नारदजीने कहा – महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं । इस समय अमित- तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है । वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं । भीष्म उवाच एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ॥
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नारदस्य वचः श्रुत्वा ततो राजन् जनार्दनः ।
आहू 'बलदेवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम् ॥
आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दनः । भीष्मजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर देवर्षि नारद बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरको चले गये । नारदजीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजी तथा
महातेजस्वी प्रद्युम्नको बुलाया और उन दोनोंके साथ वे गरुड़पर आरूढ़ हुए ।
ततः सुपर्णमारुह्य त्रयस्ते पुरुषर्षभाः ॥
जग्मुः क्रुद्धा महावीर्या बाणस्य नगरं प्रति । तदनन्तर वे तीनों महापराक्रमी पुरुषरत्न गरुड़पर आरूढ़ हो क्रोधमें भरकर
बाणासुरके नगरकी ओर चल दिये ।
अथासाद्य महाराज तत्पुरीं ददृशुश्च ते ॥
ताम्रप्राकारसंवीतां रूप्यद्वारैश्च शोभिताम् । महाराज! वहाँ जाकर उन्होंने बाणासुरकी पुरीको देखा, जो ताँबेकी चहारदीवारीसे
घिरी हुई थी । चाँदीके बने हुए दरवाजे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ।
हेमप्रासादसम्बाधां मुक्तामणिविचित्रताम् ॥
उद्यानवनसम्पन्नां नृत्तगीतैश्च शोभिताम् । वह पुरी सुवर्णमय प्रासादोंसे भरी हुई थी और मुक्तामणियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । उसमें स्थान-स्थानपर उद्यान और वन शोभा पा रहे थे । वह नगरी नृत्य और
गीतोंसे सुशोभित थी ।
तोरणैः पक्षिभिः कीर्णां पुष्करिण्या च शोभिताम् ॥
तां पुरीं स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ।
दृष्ट्वा मुदा युतां हैमां विस्मयं परमं ययुः ॥
वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे । सब ओर भाँति- भाँतिके पक्षी चहचहाते थे । कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी । उसमें हृष्ट -पुष्ट स्त्री- पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्गके समान मनोहर दिखायी देती थी । प्रसन्नतासे भरी हुई उस सुवर्णमयी नगरीको देखकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनोंको बड़ा विस्मय हुआ ।
तस्य बाणपुरस्यासन् द्वारस्था देवताः सदा ।
महेश्वरो गुहश्चैव भद्रकाली च पावकः ॥
एता वै देवता राजन् ररक्षुस्तां पुरीं सदा । बाणासुरकी राजधानीमें कितने ही देवता सदा द्वारपर बैठकर पहरा देते थे । राजन्! भगवान् शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्नि- ये देवता सदा उस पुरीकी रक्षा करते
थे ।
अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान् युधिष्ठिर ॥
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सुसंक्रुद्धो महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः ।
आससादोत्तरद्वारं शङ्करेणाभिपालितम् ॥
युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी श्रीकृष्णने अत्यन्त कुपित हो पूर्वद्वारके रक्षकोंको बलपूर्वक जीतकर भगवान् शंकरके द्वारा सुरक्षित उत्तरद्वारपर आक्रमण किया ।
तत्र तस्थौ महातेजाः शूलपाणिर्महेश्वरः ।
पिनाकं सशरं गृह्य बाणस्य हितकाम्यया ॥
ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम् ।
महेश्वरो महाबाहुः कृष्णाभिमुखमाययौ ॥
वहाँ महान् तेजस्वी भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े थे । जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान् श्रीकृष्ण मुँह बाये कालकी भाँति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुरके हित- साधनकी इच्छासे बाणसहित पिनाक नामक धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णके सम्मुख आये ।
ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहेश्वरौ ।
तद् युद्धमभवद् घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् ॥
तदनन्तर भगवान् वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे । उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था ।
अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाङ्क्षिणी ।
दिव्यास्त्राणि च तौ देवौ क्रुद्धौ मुमुचतुस्तदा ॥
वे दोनों देवता एक- दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे । दोनों ही क्रोधमें भरकर एक- दूसरेपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते थे ।
ततः कृष्णो रणं कृत्वा मुहूर्तं शूलपाणिना ।
विजित्य तं महादेवं ततो युद्धे जनार्दनः ॥
अन्यांश्च जित्वा द्वारस्थान् प्रविवेश पुरोत्तमम् । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने शूलपाणि भगवान् शंकरके साथ दो घड़ीतक युद्ध करके महादेवजीको जीत लिया तथा द्वारपर खड़े हुए अन्य शिवगणोंको भी परास्त करके उस
उत्तम नगरमें प्रवेश किया ।
प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दनः ॥
चक्रे युद्धं महाक्रुद्धस्तेन बाणेन पाण्डव । पाण्डुनन्दन! पुरीमें प्रवेश करके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीजनार्दनने बाणासुरके पास
पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया ।
बाणोऽपि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ ॥
सुसंक्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे ।
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भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोधसे आगबबूला हो रहा था । उसने भी युद्धमें भगवान्
केशवपर सभी तीखे - तीखे अस्त्र - शस्त्र चलाये ।
पुनरुद्यम्य शस्त्राणां सहस्रं सर्वबाहुभिः ॥
मुमोच बाणः संक्रुद्धः कृष्णं प्रति रणाजिरे । फिर उसने उद्योगपूर्वक अपनी सभी भुजाओंसे उस समरांगणमें कुपित हो श्रीकृष्णपर
सहस्रों शस्त्रोंका प्रहार किया ।
ततः कृष्णस्तु सञ्छिद्य तानि सर्वाणि भारत ॥
कृत्वा मुहूर्तं बाणेन युद्धं राजन्नधोक्षजः ।
चक्रमुद्यम्य राजन् वै दिव्यं शस्त्रोत्तमं ततः ॥
सहस्रबाहुश्चिच्छेद बाणस्यामिततेजसः । भारत! परंतु श्रीकृष्णने वे सभी शस्त्र काट डाले । राजन्! तदनन्तर भगवान् अधोक्षजने दो घड़ीतक बाणासुरके साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथमें उठाया और
अमिततेजस्वी बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काट दिया ।
ततो बाणो महाराज कृष्णेन भृशपीडितः ॥
छिन्नबाहुः पपाताशु विशाख इव पादपः । महाराज! तब श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जानेपर
शाखाहीन वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़ा ।
स पातयित्वा बालेयं बाणं कृष्णस्त्वरान्वितः ॥
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प्राद्युम्निं मोक्षयामास क्षिप्तं कारागृहे तदा । इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुरको रणभूमिमें गिराकर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ कैदमें पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको छुड़ा लिया ।
मोक्षयित्वाथ गोविन्दः प्राद्युम्निं सह भार्यया ।
बाणस्य सर्वरत्नानि असंख्यानि जहार सः ॥
पत्नीसहित अनिरुद्धको छुड़ाकर भगवान् गोविन्दने बाणासुरके सभी प्रकारके असंख्य रत्न हर लिये ।
गोधनान्यथ सर्वस्वं स बाणस्यालये बलात् ।
जहार च हृषीकेशो यदूनां कीर्तिवर्धनः ॥
ततः स सर्वरत्नानि चाहृत्य मधुसूदनः ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे तत् सर्वं गरुडोपरि ॥
उसके घरमें जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकारके धन मौजूद थे, उन सबको भी यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भगवान् हृषीकेशने हर लिया । फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदनने शीघ्रतापूर्वक गरुड़पर रख लिये ।
त्वरयाथ स कौन्तेय बलदेवं महाबलम् ।
प्रद्युम्नं च महावीर्यमनिरुद्धं महाद्युतिम् ॥
उषां च सुन्दरीं राजन् भृत्यदासीगणैः सह ।
सर्वानेतान् समारोप्य रत्नानि विविधानि च ॥
कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान् अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियोंसहित सुन्दरी उषा – इन सबको और नाना प्रकारके रत्नोंको भी गरुड़पर चढ़ाया ।
मुदा युक्तो महातेजाः पीताम्बरधरो बली ।
दिव्याभरणचित्राङ्गः शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥
आरुरोह गरुत्मन्तमुदयं भास्करो यथा । इसके बाद शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, महाबली एवं महातेजस्वी श्रीकृष्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ स्वयं भी गरुड़पर आरूढ़ हुए, मानो भगवान् भास्कर उदयाचलपर आसीन हुए हों । उस समय भगवान्के श्रीअंग दिव्य आभूषणोंसे
विचित्र शोभा धारण कर रहे थे ।
अथारुह्य सुपर्णं स प्रययौ द्वारकां प्रति ॥
प्रविश्य स्वपुरं कृष्णो यादवैः सहितस्ततः ।
प्रमुमोद तदा राजन् स्वर्गस्थो वासवो यथा ॥
गरुड़पर आरूढ़ हो श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर चल दिये। राजन्! अपनी पुरी द्वारकामें पहुँचकर वे यदुवंशियोंके साथ ठीक वैसे ही आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गलोकमें