श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 431–440
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 431–440
पृष्ठ 431
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय । २६१
क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च ।
सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ॥ २६२ ॥
खेत, कुत्रां तालाब, बगीचा और घरों की सीमा का निर्णय श्रासपास के गवाहों से करना चाहिए ॥ २६२ ॥
सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदर्ता नृणाम् ।
सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम्॥ २६३ ॥
गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषया हरन् ।
शतानि पञ्च दण्डः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः ॥ २६४॥
सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् ।
प्रविशेद्भूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ॥ २६५ ॥
एपोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये ।
श्रत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ॥ २६६ ॥
यदि सीमाके झगड़े में पास के सामन्त भूँड वोलें तो हर एक को पांच पांच सौ पण दण्ड करे । घर, तालाव वग्रीचा वा खेत को डर दिखा कर कोई छीनले तो पांचसी पण उसपर दण्ड करेका और ज्ञान में ले तो दोसौ पण दण्ड करे । सीमा के निर्णयको बांध कोई भी ठीक सबूत न मिले तो धर्मज्ञ राजा स्वयं सीमाविषय कहा दे यही मर्यादा है इस भांति सब सीमा निर्णय का॥ २६३ - २६६ ॥ गया है, श्रय कठोर वचन का निर्णय कहा जायगा ।वैश्योऽप्यर्धशतंशतं ब्राह्मणमाक्रुश्यद्वे वाक्षत्रियोदण्डमर्हतिशूद्रस्तु वधमर्हति ॥ २६७। ॥ पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ॥ २६८ ॥
पृष्ठ 432
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६१ मनुस्मृति ।
समवर्णे द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे ।
वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत् ॥ २६६ ॥
एकजातिर्द्विजातस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् ।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः ॥ २७० ॥
कठोर वचन-गाली आदि का निर्णय । ब्राह्मण को क्षत्रिय गाली दे तो सौं पण दण्ड करे, वैश्यं को डेढ़ सौ या दो सौ पण दण्ड करे । शूद्र को तो पीटनाही योग्य है | क्षत्रिय को गाली ब्राह्मण दे तो पचास पण, वैश्य को दे तो पच और शूद्र को गाली दे तो वारह पण दराड करे । द्विजाति अपने समान वर्ण को गाली दे तो बारह पण और गंदी गाली दे तो इसका दूना दण्ड करे । कोई शूद्र, द्विजाति का कठोर वाणी से अपमान करे तो उसकी जीभ काट ले । क्योंकि शुद्ध पैर से पैदा हुआ है || २६७-२७९ ॥
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः ।
निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्तास्येदशाङ्गुलः ॥ २७१ ॥
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तसमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे व पार्थिवः ॥ २७२ ॥
श्रुतं देशं च जातिं च कर्म शारीरमेव च ।
वितथेन ब्रुवन्दाप्यः स्याद् द्विशतं दमम् ॥ २७३ ॥
काणं वाप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम् ।
तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणावरम् ॥ २७४ ॥
सातरं पितरं जायांभ्रातरं तनयं गुरुम् ।
श्राक्षारयञ्छतं दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः ॥ २७५ ॥
पृष्ठ 433
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय । -२६३ · ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यो विजानता । ब्राह्मणे साहसः पूर्वः क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ २७६ ॥ } विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः ।
छेदवर्जं प्रणयनं दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ २७७ ॥; एष दण्डविधिः प्रोक्तो वाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्डपारुष्यनिर्णयम् ॥ २७८ ॥
यदि नाम और जाति को बोलकर द्वेष से द्विजातियों को गाली दे तो उस शूद्र के मुख में अग्नि में तपाई दश अंगुल की कौल डाले । शुद्ध, अभिमान से द्विजों को धर्मोपदेश करे तो राजा उसके मुख और कान में खौलता तेल छोड़वावे । यदि अभिमान से कहे कि तू वेद नहीं पढ़ा है, श्रमुक देश का नहीं है, तेरी यह जाति नहीं है, तेरे संस्कार नहीं हुए हैं तो राजा दो सौ पर दण्ड करे | काना, लूला अंधा आदि किसी को सच भी कहे तो एक कापण दण्ड करे । माता, पिता, स्त्री, भाई, पुत्र, गुरु को गाली देनेवाला और गुरु को मार्ग न छोड़नेवाला सौ पण दण्ड योग्य है । ब्राह्मण, क्षत्रिय श्रापस में गाली दें तो राजा ब्राह्मण पर ढ़ाई लौ धौर क्षत्रिय पर पांच सौ पण दण्ड करे । वैश्य शूद्र श्रापस में गाली दें तो वैश्य को साधारण दण्ड और शूद्र की जभिका न काटकर कोई दूसरा दण्ड करे इस प्रकार दण्डनिर्णयकठोर वचनकहा दण्ड निर्णय कहा गया है, अब मारपीट का जायगा ॥ २७१-२७८ ॥ येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः । ' छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ॥ २७६ ॥
पाणिमुद्यस्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति । ॥ पादेन प्रहरन् कोपात्पादच्छेदनमर्हति ॥ २८०
पृष्ठ 434
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६४ मनुस्मृति ।
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः ।
कट्या कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचंवास्यावकर्तयेत्॥ २८१ ॥
प्रवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।
अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्धयतो गुदम् ॥ २८२ ॥
केशेषु गृह्णतो हस्ता छेदयेदविचारयन् ।
पादयोर्बाढिकायां च ग्रीवायां वृपणेषु च ॥ २८३ ॥
दण्डपारुष्य -मार पीट का निर्णय । शूद्रं, द्विजों को अपने जिस श्रङ्ग से मारे उसी श्रङ्ग को कटवा डाले यही मनुजी की धाज्ञा है । हाथ, दंडा उठाकर मारे तो हाथ और कोप से पैर से मारे तो पैर काटने योग्य है । नीच जाति का ऊंची जातिवाले के साथ अभिमान से बैठना चाहे तो उसकी कमर में दाग़करके देश से निकाल दे । हीनवर्ण ऊंचे वर्ण के ऊपर धूके तो दोनों श्रोठ कटवावे, मृते तो लिङ्ग और पाढे तो गुझ कटवावे वाल पकड़े, पैर पकड़े, घसीटे दाढ़ी गर्दन और अण्डकोष में हाथ लगावे तो चिना विचार केंद्र हाथ कटवादे ॥ २७६ -२८३ ॥
त्वग्भदेकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः ।
मांसभेत्ता तु षरिनष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः॥ २८४॥
वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगं यथा यथा ।
'तथा तथा दमः कार्यो हिंसायामिति धारणा ॥ २८५॥
मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति ।
यथा यथा महद्दुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ॥ २८६ ॥
'खाल खींचने और खून निकालने पर सौ पण दण्ड करे । मांस काटे तो छःनिष्क और हड्डी तोड़े तो देशनिकाले की सज़ा करे । संपूर्ण वृक्षों का उपयोग विचार कर उनके काटनेवाले को दण्ड देवे | मनुष्य और पशुओं को मारने पर जैसा अधिक दुःख हो
पृष्ठ 435
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय | २६५ उसके अनुसार अपराधी को दण्ड भी दुःखदायी करना चाहिये || २८४ - २८६ ॥
अङ्गावपीडनायां च व्रणशोणितयोस्तथा ।
समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापि वा ॥ २८७ ॥
द्रव्याणि हिंस्याद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।
स तस्योत्पादयेष्टिं राज्ञो दद्याच्च तत्समम् ॥ २८८ ॥
चर्मचार्मिकभाण्डेषु कालोष्ठमयेषु च ।
मूल्यात्पञ्चगुणेो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ २८६ ॥
यानस्य चैव यातुश्च यानस्वामिन एव च ।
दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ २६० ॥
छिन्नास्ये भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते ।
अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव च ॥ २६ ९ ॥
छेदने चैव यन्त्राणां योक्करश्म्योस्तथैव च ।
आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ॥ २६२ ॥
हाथ, पैर आदि अङ्ग तोड़ने वा घायल करनेवाले से उसके अच्छे होने के लिए खर्च दिलवावे अथवा सब प्रकार का दण्ड देय । जो जानकर वा न जानकर किसी की कोई वस्तु बिगाड़े तो उसको दाम वगैरह देकर खुश करे और राजा को उतनाही दरड देय । चमड़ा, चाम के पात्र-मशक आदि, काठ और मिट्टी के पात्र, फूल, मूल और फलों की हानि करने पर मूल्य से पाँचको गुना दराज करे । सवारी सारथि और सवारी के मालिक दश हालतों में छोड़कर बाक़ी में दण्ड दिया जाता है । नाथ टूटने, , जुवा टूटने, नीचे ऊंचे के कारण, टेढ़े वा अड़कर चलने, रथ की धुरा टूटने, पहिया टूटने, रस्सी टूटने, गले की रस्सी टूटने, लगाम टूटने और ' हटो- बचो ' श्रादि कहने पर भी यदि किसी
पृष्ठ 436
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६६ मनुस्मृति ।
का नुक़सान होजाय तो मनुजी ने दण्ड नहीं कहा ॥ २८७-२६२ ॥
यत्रापवर्तते युग्यं वैगुण्यात्प्राजकस्य तु ।
तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो हिंसायां द्विशतं दमम् ॥ २६३ ॥
प्राजकश्चेद्भवेदातः प्राजको दण्डमर्हति ।
युग्चस्थाः प्राजकेऽनाप्ते सर्वेदण्ड्याः शतं शतम्॥२६४॥
जहां सारथि के चतुर न होने से रथ इधर उधर चलता है उस से नुकसान होने पर स्वामी को दो सौ पण दरड होना चाहिए । और सारथि चतुर होशियार हो तो उसीको दो सौ परा दरड करे । सारथि कुशल न होने पर जो सवारी करते हैं वे सब सौ सौ.पण दण्ड काविल हैं ॥ २६३-२६४ ॥
स चेन्तु पथि संरुद्धः पशुभिर्वा रथेन वा ।
प्रमापयेत् प्राणभृतस्तत्र दण्डोऽविचारितः ॥ २६५ ॥
मनुष्यमारणे क्षिप्रं चौरवत्किल्विषं भवेत् ।
प्राणभृत्सु महत्स्वर्ध, गोगजोष्ट्रयादिषु ॥ २६६ ॥
क्षुद्रकाणां पशूनां तु हिंसायां द्विशतो दमः ।
पञ्चाशन्तु भवेद्दण्डः शुभेषु मृगपक्षिषु ॥ २६७ ॥
गर्दभाजाविकानां तु दण्डः स्यात्पञ्चमाषिकः ।
माषकस्तु भवेद्दण्डः श्वसूकरनिपातने ॥ २६८ ॥
भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सौंदरः ।
प्राप्तापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥ २६६ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरन्प्रातः स्याच्चोरकिल्विषम्॥ ३०० ॥
पृष्ठ 437
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय | २६७
एपोखिलेनाभिहितो दण्डपारुष्यनिर्णयः ।
स्तेनस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं दण्डविनिर्णये ॥ ३०१ ॥
मार्ग में पशु या दूसरी गाड़ी से रुकने पर भी सारथी हाँकते चला जाय और किसीके चोट लग जाय तो राजा तुरंत नीचे लिखा दएड करे: --मनुष्य का प्राणघात हुआ हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा आदि बड़े पशुओं का घात होने पर पांच सौ पण दण्ड करे । छोटे छोटे पशुओं की हिंसा होने पर 'सौ परा और मृग, मोर वगैरह सुन्दर पक्षी मर जायें तो पचास पण दराड करे । गधा, बकरी और भेड़ भरे तो पाँच मापक दण्ड करे । कुत्ता, सुअर मरे तो एक मापक दण्ड करे । त्री, पुत्र, दास, शिष्य और छोटा भाई अपराध करें तो रस्सी या बाँस की छड़ी से ताड़न के योग्य हैं, परन्तु इनके पीठ में मारे, शिर आदि मैं न मारे, नहीं तो चोर के समान दण्ड योग्य होता है । इस प्रकार मार पीट का पूरा निर्णय कहा, श्रव चोर के
दण्ड का निर्णय कहेंगे । २६५-३०१ ॥
परमं यत्नमातिष्ठेत्स्तेनानां निग्रहे नृपः । स्तेनानां निग्रहादस्य यशो राष्ट्रं च वर्धते ॥ ३०२ ॥.
चोर-दण्डनिर्णय | राजा चोरों को दण्ड देने में सदा पूरा यत्न करे | क्योंकि चोरों के निग्रह से राजा का यश और राज्य वृद्धि को पाता है ॥ ३०२ ॥
अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः ।
सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाभयदक्षिणम् ॥ ३०३ ॥
सर्वतो धर्मषड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः ।
धर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य ह्यरक्षतः ॥ ३०४ ॥
३८
पृष्ठ 438
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६८ मनुस्मृति | यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति ।.. तस्य षड्भागभाद्यांजा सम्यग्भवति रक्षणात्॥ ३०५॥
रक्षन् धर्मेण भूतानि राजा वध्यश्च घातयन् ।. यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः ॥ ३०.६ ॥ "
योऽरक्षन् बलिमादते- करं शुल्कं च पार्थिवः ।
प्रतिभागं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३०७ ॥।
अरक्षितारं राजानं वलिषभागहारिणम् ।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ॥ ३०८ ॥
जो राजा अभय देता है वह सदा पूज्य है । उस अभय-दक्षिणा देनेवाले का राज्य खूब बढ़ता है । जो रक्षा करता है उस राजा का सब के धर्म से छठा भाग होता है और जो रक्षा नहीं करता उसका सबके अधर्म में से छठा भाग होता है । जो रक्षाशील है वह प्रजा में जो वेद पढ़ता है, यश करता है, दान देता है, पूजा- पाठ करता है, सत्र के छठे भाग का फल पाता है । प्रतिदिनं प्रा- शियों की धर्म से रक्षा और दुष्टों को दण्ड देने से मानो राजा लाखों रुपया की दक्षिणा का यज्ञ कर रहा है और जो राजी प्रजापालन न करके भेंट कर आदि लेता है वह शीघ्रही नरक- गामी होता है । इस प्रकार का राजा अन्न का छठा भाग जा लेता है वह सब लोगों का ' पाप लेनेवाला' कहलाता है ॥ ३०३-३०८॥
अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विलुम्पकम् ।
अरक्षितारमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ ३०६ ॥
अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः ।
निरोधनेन बन्धेन विविधेन वधेन च ॥ ३१० ॥
धर्ममर्यादा से रहित, नास्तिक, प्रजा धन उगनेवाला और बिना प्रजापालन कर लेनेवाला राजा नरकगामी होता है ।
पृष्ठ 439
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय | २६६ को तीन उपायों से सदा वश में रक्खे -नज़रबंद, क़ैद और चैत श्रादि से मारकर ॥ ३०६-३१० ॥
निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च ।
द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ ३११ ॥
क्षन्तव्यं प्रभुरणा नित्यं क्षिपतां कार्यिणां नृणाम् ।
बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ ३१२ ॥
यःक्षितो मयत्यास्तेन स्वर्गे महीयते ।
स्वैश्वर्यान क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ ३१३ ॥
राजा स्तेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता । " चक्षाणेन तत्यमेवं कर्मास्मि शाधिमाम्॥ ३१४ ॥
स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम् ।
शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा ॥ ३१५ ॥
शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते ।
प्रशासित्वात्तु तं राजास्तेनस्याप्तोतिकिल्बिषम्॥३१६॥
! पापियों को दण्ड देने से और साधु पुरुषों का संग्रह करने हैसे! राजा पवित्र होता है, जैसे यज्ञ करने से ब्राह्मण पवित्र होता कोई वादी --प्रतिवादी और बालक, वृद्ध औरदें तोपीडितराजा उनकोमनुष्य अपने दुःख से दुखी होकर कोई कुवचन कहलेता है वह राजा स्वर्ग- क्षमा करे । जो श्राक्षेप वचनों को सहनकर होता है और जो ऐश्वर्य के अद से नहीं सहताराजा, वहके नपास गामी होता है । चोर शिर के बाल खोले दौड़कर का मूल या अपने अपराध को निवेदन करें, खैर की लकड़ीवरी या लोह का लट्ठ अथवा जिसमें दोनों तरफ़ धार होप्रार्थनाऐसी करे । उस हालत में. दण्डा कंधे पर रखकर दण्ड के लिएचोर को चोरी का पाप नहीं राजा के दण्ड देने वा छोड़ देने से ,
पृष्ठ 440
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०० मनुस्मृति । लगता । पर उसको दण्ड न करने से उसका पाप राजा को लगता है ॥ ३११-३१६ ॥
अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि पत्यौ भार्यापचारिणी ।
गुरौ शिष्यश्चयाज्यश्च स्तेनो राजनि किल्बिषम्॥३१७॥
राजनिधूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१८॥
गर्भघाती का पाप उसके श्रम खानेवाले को, व्यभिचारिणी स्त्री का पाप उसके पति को, शिष्य का पाप गुरु को और यश करनेवाले का करानेवाले को क्षमा करने से लगता है । वैसेही छोड़ने से राजा को पाप होता है । पाप करके भी राजदण्ड पाये हुए मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं जैसे पुण्य करने से साधु पुरुष जाते हैं ॥ ३१७-३१८ ॥
यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद्भिद्याच्चयः प्रपाम् ।
स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तञ्चेत्तस्मिन् समाहरेत् ॥३१६ ॥
धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः ।
शेषेऽप्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ ३२० ॥
तथा धरिममेयानां शतादभ्यधिके वधः ।
सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम्॥ ३२१ ॥
पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते ।
शेषे त्वेकादशगुणं मूल्याद्दण्डं प्रकल्पयेत् ॥ ३२२ ॥
पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः ।
मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ॥ ३२३ ॥
जो पुरुष कूप पर से रस्सी और घड़ा चुरावे या जो पोशाला